2010-07-06

स्टोन थिरेपि से करें रोगों का ईलाज.










स्टोन थिरेपी में बेसाल्ट किस्म के पत्थरों को गरम करके शरीर निर्धारित बिंदुओं पर रखा जाता है।पत्थरों की गर्माहट से रक्त शिराएं फ़ैलती हैं जिससे रक्त परिसंचरण तेज हो जाता है बाद में उन्हीं स्थानों पर संगमरमर का ठंडा पत्थर रखा जाता है जिससे शिराएं पुन: पूर्व स्थिति में आ जाती हैं।यह गरम_ठंडा पत्थर रखने की प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है। इससे शिराएं चुस्त-दुरुस्त बनती हैं।पुराने जमाने में भी पत्थर चिकित्सा का उल्लेख चिकित्सा साहित्य में पाया जाता है। इस चिकित्सा का कोइ दुष्प्रभाव भी नहीं होता है। इस पुरानी रोगोपचार की पद्धति को पुन: नये नियम सिद्दांत के साथ प्रचलित करने वाले तुकसान नामक एक फ़िजीयो थेरेपिस्ट हैं।



स्टोन थिरेपी किन रोगों में फ़ायदेमंद है?



संधिवात,पीठ दर्द,नींद नहीं आना, मांस पेशियों का दर्द,अवसाद के अलावा उच्च रक्त चाप और निम्न रक्त चाप में स्टोन थिरेपी आशातीत लाभकारी साबित हो चुकी है। इस चिकित्सा प्रणाली का उपयोग रोग के लक्छण मौजूद नहीं हों तब भी किया जा सकता है। यह चिकित्सा रोग को शरीर में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर देती है। आज की भाग दौड भरी और तनाव की जीवन शैली में हमारे हृदय और मांसपेशियों पर अतिरिक्त दवाब आ जाता है। इसका उपचार स्टोन थिरेपी से आसानी से किया जाता है।



स्टोन थिरेपी का व्यावहारिक पहलू-



इस चिकित्सा पद्धति में ४६ प्रकार के बेसाल्ट और ६ प्रकार के संगमरमर पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। बेसाल्ट पत्थरों को करीब १२५ से १३५ डीग्री के तापमान पर गर्म किया जाता है। फ़िर इन पत्थरों को शरीर के विभिन्न ४६ बिन्दुओं पर रखा जाताहै। पत्थर रखने से पहिले शरीर पर एक खास औशधि युक्त तैल की मालिश की जाती है। इसके बाद पैरों की ऊंगलियों से शुरु करते हुए पिंडलियों जांघों ,कमर रीध,कंधा,हाथ और हाथ की ऊंगलियों के बीच अलग-अलग आकार के पत्थर रखे जाते हैं,ज्यादा संवेदन शील स्थानों पर गरम पत्थरों को कपडे में लपेटकर रखा जाता है।ये पत्थर शरीर के ७ चक्रों को दुरुस्त करते हैं जिससे शरीर का रक्त संचार तीव्र हो जाता है। इन पत्थरों की खासियत ये है कि ये लंबे समय तक गरम रहते हैं।करीब एक से सवा घंटे तक इन पत्थरों से सिकाई होती है ,इसके बाद ६ संगमरमर के पत्थरों को बर्फ़ के सम्मान ठंडा करके (आइस कूल बेग में रखकर)रीढ के बीचों बीच और कुछ विशेष बिन्दुओं पर रखते हैं। हर पत्थर का प्रयोग किसी विशेष अंग के लिये निर्धारित रहता है। विदेशों में कामयाबी हासिल करनेके बाद यह चिकित्सा पद्दति अब भारत में भी आहिस्ता-आहिस्ता प्रचलित हो रही है।