2010-07-12

मिट्टी के प्रयोग से रहें निरोग.:(मड थिरेपि)


प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैग्यानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

     नंगे पैर जमीन पर चलना स्वास्थ्य के लिये उपकारी है। इस प्रक्रिया में धरती की उर्जा शरीर को प्राप्त होती है। धरती-चिकित्सा करने वाले अपने शरीर को मिट्टी के घोल में डुबा देते हैं केवल सिर बाहर रखा जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने से हमारा शरीर चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी खनिज तत्व गृहण कर लेता है। जमीन में जो चुम्बकत्व होता है उसका आवश्यक अंश भी शरीर को उपलब्ध हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में माटी चिकित्सा के कई रूप है। गीली मिटी के घोल में स्नान, सूती कपडे पर गीली मिट्टी रखकर मड पेक से चिकित्सा करना आदि। मड पेक का प्रयोग घावों,गूमडे-गांठ,शरीर में पुरानी सूजन, वेदना निवारण के लिये किया जाता है। यह चिकित्सा विधान उचित खान-पान के नियमों को व्यवहार में लाते हुए किया जाता है। गीली मिट्टी का प्रयोग जल चिकित्सा की बनिस्बत ज्यादा लम्बे समय तक शरीर में नमी और ठंडाई बनाये रखता है। मड पेक चिकित्सा से शरीर के रोम कूप शिथिल हो जाते हैं,रक्त खिंचकर चमडी की सतह पर आ जाता है, शरीर के अंदरूनी अवरोध हट जाते हैं,शरीर में उष्मा संचरण संतुलित हो जाता है,और शरीर में मौजूद विष तत्व का निष्कासन हो जाता है कैसे बनाएं मड पेक-




जमीन के ऊपर की करीब आधा इंच मिट्टी हटाकर नीचे की मिट्टी इकट्ठा करें। यह मिट्टी एकदम शुद्ध होनी चाहिये ,याने इसमें कंकड,पत्थर वगैरह नहीं होना चाहिये। अब इस मिट्टी में गरम पानी डालते जाएं और घोल बनाते जाएं। इसे ठंडा होने दें। अब जरूरत के मुताबिक आकार का कपडे का टुकडा बिछाकर उस पर यह गीली मिट्टी एकरस फ़ैला दें। यह हुई मड पेक तैयार करने की विधि। इसे रोग प्रभावित स्थान पर आधे से एक घंटा रखना चाहिये। इस चिकित्सा से सामान्य कमजोरी और नाडी मंडल के रोग दूर किये जा सकते हैं। यह प्रयोग ज्वर उतारने में सफ़ल है,फ़्लू का ज्वर और खसरा रोग में भी इसके चमत्कारी परिणाम आते हैं। इस चिकित्सा से गठिया रोग सूजन,आंख और कान के रोग, वात विकार, लिवर और गुर्दे की कार्य प्रणाली में व्यवधान, पेट के रोग,कब्ज, यौन रोग, शरीर के दर्द, सिर दर्द और दांत के दर्द आदि रोगों शमन होता है।
मिट्टी को गीला कर घोल बनाकर उससे स्नान करना मिट्टी चिकित्सा का दूसरा रूप है। पूरे शरीर पर यह कीचड चुपडा जाता है। इसे बनाने के लिये मिट्टी को गरम पानी डालते हुए घोला जाता है। यह घोल शरीर पर भली प्रकार लगाकर ऊपर से एक -दो कंबल भी लपेट दिये जाते हैं। आधा-एक घंटे बाद गरम जल से नहालें। बाद में थोडे समय ठंडा पानी से स्नान करें। इस प्रकार के कीचड स्नान से त्वचा रोगों मे आशातीत लाभ होता है। चमडी मे रौनक आ जाती है। रंग रूप में निखार आता है। नियमित रूप से कीचड स्नान करने से सोरियासिस,सफ़ेद दाग और यहां तक कि कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाते हैं। जोडों के दर्द,गठिया रोग में यह बेहद फ़ायदेमंद उपचार है।