2015-09-16

वसंत ऋतु में वमनकर्म से सेहत सुधारें





उल्टी करें सेहत सुधारें

     वमन कर्म आयुर्वेदीय पंचकर्म में पहला क्रिया विधान है। वमन का शाब्दिक अर्थ होता है उल्टी करना। उल्टी रोग लक्षण भी है लेकिन शरीर के शोधन में जब वमनकर्म की बात करते हैं तो अभिप्राय उल्टी करवाकर रोगों का निवारण करना होता है। 
सामान्यतः योग क्रियाओं में गरम पानी व नमक मिलाकर उल्टी करवाई जाती है। परंतु आयुर्वेदिक वमनकर्म की विधि पूर्वक क्रिया १५ से २० दिन में पूर्ण होती है, इसमें यह बात ध्यान रखने योग्य है कि इस पूरी अवधि में मात्र एक दिन वह भी ४ से ६ बार ही वमन के वेग आते हैं इसलिए यह भ्राँति बिलकुल दूर कर देनी चाहिए कि १०-१५ दिन तक या फिर एक पूरे दिन भर वमन करना होता है। वमन कर्म द्वारा कफ दोष को शरीर से बाहर निकाला जाता है। 
जब परेशान हों इन बीमारियों से  -

दमा, एसीडिटी, पेट के अल्सर, एलर्जिक खाँसी, पुरानी खाँसी, मधुमेह, आमवात (गठिया), शीत पित्त, कुष्ठ, सफेद दाग, सोराइसिस, गुदा से रक्तस्त्राव, ग्रंथियाँ, मोटापा,विषपान अथवा मद्यपान के बाद भी वमन कराकर विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकाला जाता है। अनेक रोगों में वमन कर्म के बाद विरेचन कर्म, वस्ति कर्म, रक्त मोक्षण आदि क्रियाएँ विशेषज्ञ के निर्देशानुसार अपनानी होती हैं। 


वमन के पहले : -

कुशल पंचकर्म विशेषज्ञ की देख-रेख में ३ से ५ दिन तक पाचक औषधियाँ ली जाती हैं। इसके पश्चात ५ से ७ दिन तक औषधियुक्त घृतपान प्रतिदिन बढ़ती हुई मात्रा में लिया जाता है। दिनभर में मरीज़ की स्थिति नोट की जाती है और उसके अनुसार अगले दिन के घृतपान की मात्रा तय की जाती है। जब घृतपान की संतृप्त अवस्था आ जाती है तब सुबह-शाम शरीर की मालिश एवं स्टीम बाथ किया जाता है। 

वमन के दिन :

 एक दिन रोगी को भर्ती रखकर प्रातः काल वमनकल्प पिलाया जाता है, जिससे ६ से ८ बार वमन के वेग आते हैं। विशेष दवाइयों से बने काढे द्वारा बार-बार कुल्ले करना होते हैं। इस दौरान दिनभर आराम करना होता है।

वमन के बाद :-

परहेज़युक्त खानपान के क्रम को संसर्जन क्रम कहते हैं, जिसमें भूख लगने पर क्रमशः दलिया या चावल का सूप,छिलके वाली मूँग की दाल का पानी,बघारी हुई मूंग की दाल,खिचड़ी,दाल-चावल,रोटी दी जाती है। इस प्रकार धीरे-धीरे आहार को 3 से 5 दिनों में बढ़ाते हुए पूर्ण आहार दिया जाता है तथा रोगानुसार औषधियां प्रारंभ की जाती हैं। 

सावधानियां- 

मरीज़ को पंचकर्म विशेषज्ञ के निर्देशानुसार ही दिनचर्या व्यतीत करनी होती है। घृतपान वाले दिन से ही गुनगुना पानी पीना होता है। गरिष्ठ आहार,व्यायाम तथा वज़नी कार्य नहीं करना चाहिए। विधि अनुसार,वमनकर्म होने पर किसी प्रकार के दुष्परिमाम सामने नहीं आते हैं और वर्ष भर शरीर की फिटनेस बनी रहती है। इसलिए,प्रतिवर्ष वसंत ऋतु में वमन कर्म श्रेष्ठ परिमाम देता है(