2016-03-05

धतूरा के ओषधीय उपयोग: Medicinal use of Datura



    आयुर्वेद के ग्रंथों में अनेक औषधीय गुणों से युक्त वनस्पतियों का वर्णन मिलता है। आज मैं आपको एक ऐसी ही औषधीय वनस्पति के बारे मे उल्लेख करूंगा जिसका नाम धतूरा है। यूं तो ईश्वर को सभी वनस्पतियाँ प्रिय होती हैं, लेकिन धतूरा इसके औषधीय गुणों के कारण एवं सरंक्षण के उद्देश्य से शिवजी को विशेष प्रिय है। आचार्य चरक ने इसे ''कनक'' तथा सुश्रुत ने ''उन्मत्त'' नाम से संबोधित किया है।
परिचय- 
धतूरे का पौधा सारे भारत में सर्वत्र सुगमता के साथ मिलता है। आमतौर पर यह खेतों के किनारे, जंगलों में, गांवों में और शहरों में यहां-वहां उगा हुआ दिख जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए लोग इसके फूल और फलों का उपयोग करते हैं। धतूरा सफेद, काला, नीला, पीला तथा लाल फूल वाला 5 जातियों का मिलता है। इसका पौधा 170 सेमी तक ऊंचा तथा झाड़ीदार होता है। इसकी तना और शाखाएं बैंगनी या हल्के काले रंग की होती हैं। इसके पत्ते दिल के आकार के, अण्डे के समान, चिकने दन्तुर या मुड़े-मुडे़ 3 से 7 इंच तक लम्बे होते हैं। इसके फूल घंटाकार तुरही के आकार के एक साथ 2-2 या 3-3 सफेद बैंगनी चमक लिए हुए 5 से 7 इंच तक लम्बे हो जाते हैं। इसके फल हरे रंग के कांटेदार, गोल-गोल नीचे की ओर लटके 4 खण्डों से युक्त होते हैं। धतूरा के फल पकने पर अपने आप अनियमित ढंग से फट जाते हैं जिनमें से चटपटे, मटमैले भूरे, वृक्काकार, अनेक बीज निकलकर बाहर निकल जाते हैं।
 
स्वभाव :
 धतूरा गर्म प्रकृति का होता है।
हानिकारक -: 
धतूरा नशा अधिक लाता है और प्राणों का भी नाश कर देता है। धतूरे के पत्ते और बीज काफी विषैले होते हैं। धतूरे की निर्धारित मात्रा से अधिक सेवन करने पर मुंह, गले, आमाशय में तेज जलन और सूजन पैदा होती है। व्यक्ति को तेज प्यास लगती हैं। त्वचा सूख जाती है। आंखे व चेहरा लाल हो जाता है। शरीर का तापमान बढ़ जाता है। चक्कर आने लगता है। आंखों के तारे फैल जाते हैं और व्यक्ति को एक वस्तु देखने पर एक से दिखाई पड़ने लगती है। रोगी रोने लगता है। नाड़ी कमजोर होकर अनियमित चलने लगती है। यहां तक की श्वासावरोध होकर या हृदयावरोध होकर मृत्यु तक हो सकती है। धतूरे के विषाक्तता के लक्षण मालुम पड़ते ही तुरन्त ही चिकित्सक की सेवाएं लेनी चाहिए।
दोषों को दूर करने वाला
शहद, मिर्च, सौंफ धतूरा के दोषों को नष्ट करते हैं।
मात्रा- :
 धतूरा के सेवन की मात्रा लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग तक होती है।
गुण : 
 
धतूरा नशा, गर्मी, गैस को बढ़ाता है, बुखार और कोढ़ को नष्ट करता है तथा सिर की लीखों व जुओं को खत्म करता है।
*धतूरे के पत्तों का धूँआ दमा शांत करता है। तथा
*धतूरे के पत्तों का अर्क कान में डालने से आँख का दुखना बंद हो जाता है।
*धतूरे की जड सूंघे तो मृगीरोग शाँत हो जाता है।
*धतूरे की फल को बीच से तरास कर उसमें लौंग रखे फिर कपड मिट्टी कर भोभर में भूने जब भून जावे तब पीस कर उसका उडद बराबर गोलीयाँ बनाये सबेरे साँझ एक -एक गोली खाने से ताप और तिजारी रोग दूर हो जाय और वीर्य का बंधेज होवे।
*धतूरे के कोमल पत्तो पर तेल चुपडे और आग पर सेंक कर बालक के पेट पर बाँधे इससे बालक़ की सर्दी दूर हो जाती है। और फोडा पर बाँधने से फोडा अच्छा हो जाता है। बवासीर और भगन्दर पर धतूरे के पत्ते सेंक कर बाँधे स्त्री के प्रसूती रोग अथवा गठिया रोग होने से धतूरे के बीजों तेल मला जाता है।
*आयुर्वेद के ग्रथों में इसे विष वर्ग में रखा गया है। रस विद्या के जानकार इसके बीज का इस्तेमाल विभिन्न योगों में करते हैं। धतूरे के पत्तों और बीजों में हायो- सायमीन और हायोसीन रसायन पाया जाता है ,यही इसका एक्टिव-तत्व है। कटु ,रूक्ष एवं कफ दोष का शमन करने जैसे गुणों से युक्त यह मदकारक (नशा ) भी पैदा करता है। आइये अब हम इसके कुछ औषधीय प्रयोगों को जानते हैं....
*आधा लीटर सरसों के तेल में ढाई सौ ग्राम धतूरे के पत्तों का रस निकालकर तथा इतनी ही मात्रा में पत्तियों का कल्क बनाकर धीमी आंच पर पकाकर जब केवल तेल बच जाय तब बोतल में भरकर रख लें यह सिर में पाए जानेवाले कृमियों (जूएं ) के श्रेष्ठ औषधि है।
*यदि शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो तो बस धतूरे के पत्तों को हल्का गुनगुना कर गर्म कर सूजन वाले स्थान पर बाँध दें निश्चित लाभ मिलेगा।
*धतूरा के बीज को अकरकरा और लौंग के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गुटिका बना लें। यह श्रेष्ठ कामोद्दीपक प्रभाव दर्शाता है।

*धतूरे के पत्तों का कल्क बनाकर संक्रमित घाव पर लगाने और इसकी पुल्टीश बांधने से घाव जल्द भर जाता है।
*सरसों का तेल 250 मिली ,60 मिलीग्राम गंधक और 500 ग्राम धतूरे के पत्तों का स्वरस इन सबको एक साथ धीमी आंच पर पकाएं। जब तेल बचा रहे तब उसे इक्कठा कर कान में एक या दो बूँद टपका दें। कान दर्द में तुरंत लाभ मिलेगा।
*धतूरे के बीजों के तेल की मालिश पैर के तलवों पर करने से यह उत्तेजक प्रभाव दर्शाता है।
*आधा लीटर सरसों के तेल में ढाई सौ ग्राम धतूरे के पत्तों का रस निकालकर तथा इतनी ही मात्रा में पत्तियों का कल्क बनाकर धीमी आंच पर पकाकर जब केवल तेल बच जाय तब बोतल में भरकर रख लें यह सिर में पाए जानेवाले कृमियों (जूएं ) के श्रेष्ठ औषधि है।
*यदि शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो तो बस धतूरे के पत्तों को हल्का गुनगुना कर गर्म कर सूजन वाले स्थान पर बाँध दें निश्चित लाभ मिलेगा।
 
*धतूरा के बीज को अकरकरा और लौंग के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गुटिका बना लें। यह श्रेष्ठ कामोद्दीपक प्रभाव दर्शाता है।
*धतूरे के पत्तों का कल्क बनाकर संक्रमित घाव पर लगाने और इसकी पुल्टीश बांधने से घाव जल्द भर जाता है।
*सरसों का तेल 250 मिली ,60 मिलीग्राम गंधक और 500 ग्राम धतूरे के पत्तों का स्वरस इन सबको एक साथ धीमी आंच पर पकाएं। जब तेल बचा रहे तब उसे इक्कठा कर कान में एक या दो बूँद टपका दें। कान दर्द में तुरंत लाभ मिलेगा।
*धतूरे के बीजों के तेल की मालिश पैर के तलवों पर करने से यह उत्तेजक प्रभाव दर्शाता है।
*बीजों की राख को 125 -250 मिलीग्राम की मात्रा में देने पर ज्वर में भी लाभ मिलता है।
* धतूरे के फलों का चूर्ण 2 .5 ग्राम की मात्रा में बनाकर इसमें आधा चम्मच गाय का घी और शहद मिलकर नित्य चटाने से गर्भधारण में भी मदद मिलती है।
सावधानी-
   ये तो रही इसके औषधीय गुणों की बात परन्तु धतूरा विष है तथा अधिक मात्रा में सेवन शरीर में रुखापन ला देता है। मात्रा से अधिक प्रयोग करने पर सिरदर्द ,पागलपन और संज्ञानाश (बेहोशी ) जैसे लक्षण उत्पन्न करता है और मृत्यु का कारण भी बन सकता है। अत: इसका प्रयोग चिकित्सक के निर्देशन में सावधानीपूर्वक करें तो बेहतर होगा।