2016-06-13

मेथी दाना के फायदे



       

मेथी दाना 5 से 10 ग्राम  रोजाना प्रात:खाली पेट ,धीरे धीरे चबा चबा कर खाते रहे तो व्यक्ति सदा निरोग और चुस्त बना रहेगा और मधुमेह,जोड़ो के दर्द,शोथ,रक्तचाप,बलगमी बीमारियों,अपचन आदि अनेकानेक रोगों से बचाव होगा।वृद्धावस्था की व्याधिया यथा सायिटका ,घुटनों का दर्द,हाथ पैरो का सुन्न पड़ जाना,मांसपेशियों मे खिचाव,भूख न लगना,बार बार मूत्र आना,चक्कर आना इत्यादि उसके पास नहीं फटकेगी।ओज,कान्ति और स्फ्रुती में वृदि होकर व्यक्ति दीर्घायु होगा।

यधपि अलग अलग बीमारियों इलाज के लिए मेथीदाना का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता हैं जैसे -मेथीदाना भिगोकर उसका पानी पीना या भिगोये मेथीदाना को घोटकर पीना,उसे अंकुरित करके चबाना या रस निकालकर पीना,उसे उबालकर उसका पानी पीना या सब्जी बनाकर खाना,खिचड़ी या कड़ी पकाते समय उसे डालकर सेवन करना,साबुत मेथीदाना प्रात चबाकर खाना और रात्रि में पानी संग निगलना,भूनकर या वैसे हे उसका दलिया या चूर्ण बनाकर ताज़ा पानी के साथ फक्की लेना,मेथीदाना के लड्डू बनाकर खाना आदि परन्तु मेथी का सेवन का निरापद और अच्छा तरीका हैं -उसका काढा या चाय बनाकर पीना।


मेथी का काढा या चाय बनाने की विधि -

पाँच ग्राम एक डेढ़ चमच मेथीदाना (दरदरा मोटा कूटा हुआ )200 ग्राम पानी में डाल कर धीमी आंच उबलने रख दे।लगभग दस मिनट उबलने के बाद जब पानी 150 ग्राम रह जाए तब बर्तन को आग पर से नीचे उतार ले।पीने लायक गर्म रहने पर इसे स्वच्छ कपडे से छानकर चाय की भांति घुट घुट कर गरम गरम पी ले।यदि कोई व्यक्ति कड़वा काढ़ा न पी सके तो तो वह इसमें थोड़ा गरम दूध और गुड या खांड मिला कर चाय के रूप में भी ले सकता हैं।बलगमी खांसी,छाती के दर्द और पुराने हृदय रोग में थोड़े गरम मेथी के काढ़े में एक दो चमच शहद मिलकर लेना विशेष लाभप्रद रहता हैं,परन्तु शहद मिलाते समय काढ़ा गुनगुना रहना चाहिए न की गरम।

काढ़ा बनाने के लिए यदि रात में एक कांच के गिलास में पानी में मेथीदाना भिगोने को रखने के बाद सवेरे उसी पानी में भिगोया मेथीदाना उबाल कर उसका काढ़ा बनाया जाये तो वह जल्दी भी बनेगा तथा मेथीदाना का सत्व ज्यादा आने के कारण वह काढ़ा ज्यादा गुण कारी भी रहेगा।यह मेथीदाना का काढ़ा (बिना इसमें कुछ मिलाये)दिन में दो बार,प्रथम सवेरे नाश्ते से लगभग आधा घंटे पहले और रात्रि में सोने से पहले पीना चाहिए।इसे निरन्तर पीते रहने से आंव नहीं बन पायेगी, क्योकि मेथीदाना विशेष रूप से आँव नाशक और पाचन क्रिया सुधारक हैं।

विशेष-

1) मेथी उष्ण रूक्ष लघु गुणों से युक्त होने के कारण आँव नाषक,कफ निस्सारक और वातनाशक हैं।मेथी पाचन अंगों,श्वसन संस्थान,रक्त वाहनियो,आंतो एवं भीतरी त्वचा (झिल्ली )से चिपकी हुईआँव या चिकनाई और संचित गंदंगी और विषो को देह से बाहर कर देती हैं।और भीतरी अवव्यो की शुद्दि प्रदान करके अंगो की सूजन,जलन और पीड़ा मिटाकर उन्हें पुनः आरोग्य प्रदान कर कार्यक्षम बनाती हैं।

मेथी के प्रयोग से पाचन-क्रिया सुधरने से शरीर में रस आदि का निर्माण ठीक से होने लगता लगता हैं। मल बंध कर आता हैं,पेट ठीक प्रकार से साफ़ होने लगता हैं,यकृत आदि अंग सशक्त बनते हैं और उनकी शिथिलिता दूर होती हैं,जिससे शरीर मे स्फूर्ति, ताकत का अनुभव होने लगता हैं।

2) .मेथी के बीज की रासायनिक बनावट कांड-लीवर आयल के सामान हैं,अतः शाकाहारियो के लिए मेथी मछली के तेल का अच्छा विकल्प हैं और उसी की तरह यह खून की कमी (अनीमिया )दुर्बलता,स्नायु -रोग घुटनों का दर्द-संधिवात सूखा रोग छूत के रोग पश्चात् बनने कमजोरी,बहुमुत्रता,मधुमेह आदि रोगों में बहुत लाभदायक हैं।

3) पाचन संस्थान के रोगों यथा-शूल,अफारा अग्निमाध्य अरुचि,आमातिसार(पेचिश),तिल्ली व जिगर की बढ़ोतरी ,अल्सर,कोलोटिएस आदि के अतरिक्त श्वसन संस्थान के रोग यथा -बलगमी खांसी,दमा,श्वसन अंगो में सूजन,ब्रांकाईटीज़ ,छाती के पुराने रोगों आदि में मेथी का सेवन लाभकारी हैं।अंगो में प्रदाह एवं सूजन मिटाकर उन्हें पुनः कार्यक्षम बनाने का गुण होने के कारण मेथी आंत्र -पुच्छ प्रदाह ,टॉन्सिल एवं सिनासिटेस आदि रोगों को दूर करने में सहायता करती व उससे बचाव भी।

महिलाओं की पीरियड्स की गड़बड़ियो,लिकोरिया,गर्भाशय में सूजन में लाभ करती हैं तथा आर्तव संबंधी अंगों की शुद्दि कर उनकी सूजन मिटाकर महिलाओ को आरोग्य प्रदान करती हैं।प्रसूति में शिथिल बने हुए अंगो को शुद्द करती हैं और मां के दूध के प्रवाह की रूकावटो को दूर करती हैं।मेथी पौषक तत्वों से भरपूर होने के कारण सामान्य शक्तिवर्धक (टॉनिक )का कार्य करती हैं।


4).आधुनिक खोजो से सिद्द हो चूका हैं की मेथी के प्रयोग से मूत्र और रक्त की शर्करा में कमी आती हैं,रक्त में काल्सत्रोल का स्तर घट जाता हैं और उच्च रक्त चाप संतुलित होता हैं।अंकुरित मेथीदाना में कैंसर को नियंत्रित करने वाली विशेष विटामिन बी-17 भी विशिष्ट मात्रा में पाया जाता हैं तथा अंकुरित मेथी का रस अमाशय के अल्सर,आंतो की सूजन आदि रोगियों के अत्यधिक लाभकारी सिद्द हुआ हैं।

5.) कफ और वात प्रकृति वाले व्यक्तियों के लिए मेथी के बीज किसी वरदान से कम नहीं हैं फिर भी मेथी का सेवन करते समय निमंलिखित सावधानिया रखना जरूरी हैं।

सावधानिया -

*पित्त पृकृति वालो को या जिन्हें रक्तपित,रक्त प्रदर,खुनी बवासीर,नकसीर,मूत्र में रक्त आना या शारीर में कही से भी खून गिरने की शिकायत हो उन्हें मेथी का प्रयोग नहीं करना चाहिए,क्योकि मेथी उषण और खुश्क होती हैं।तेज गर्मी के मौसम में भी मेथी का प्रयोग करना उचित नहीं हैं।

*जिन्हें गरम तासीर की वस्तुए अनुकूल नहीं पडती हो तथा जिनके शारीर में दाह अथवा आग की लपटों जैसी जलन महसूस होती हो।

*जो रोगी अंत्यंत दुर्बल व कृशकाय हो,चक्कर आने की बीमारी से पीड़ित हो तथा लगातार धातु क्षय के कारण जिनका शारीर सूखकर मात्र हड्डियों का पिंजर रह गया हो।