2016-07-17

विधारा के गुण लाभ उपचार:Healing properties of elephant creeper



     विधारा को घाव बेल भी कहते हैं| यह बेल सर्दी में भी हरी भरी रहती है| वर्षा ऋतु में इसके फूल आते हैं |इसके अन्दर एक बड़ा ही अनोखा गुण है |यह मांस को जल्दी भर देता है या कहें कि जोड़ देता है |आदिवासी लोग विधारा के पत्तों में मांस के टुकड़ों को रख देते थे कि अगले दिन पकाएंगे | अगले दिन वे पाते थे कि मांस के टुकड़े जुड़ गए हैं |यह बड़ी ही रहस्यभरी घटना है | यह सच है कि किसी भी प्रकार के घाव पर इसके ताज़े पत्तों को गर्म करके बांधें तो घाव बहुत जल्दी भर जाता है |
*सबसे अधिक मदद ये gangrene में करता है | शुगर की बीमारी में कोई भी घाव आराम से नहीं भरता है . gangrene होने पर तो पैर गल जाते हैं और अंगुलियाँ भी गल जाती हैं . अगर pus भी पड़ जाए तो भी चिंता न करें | इसकी पत्तियों को कूटकर उसके रस में रुई डुबोकर घावों पर अच्छी तरह लगायें | उसके बाद ताज़े विधारा के पत्ते गर्म करके घावों पर रखें और पत्ते बाँधें | हर 12 घंटे में पत्ते बदलते रहें | बहुत जल्द घाव ठीक हो जायेंगे . ये बहुत पुराने घाव भी भर देता है| Varicose veins की बीमारी भी इससे ठीक होती है |


*Bedsore हो गए हों तो रुई से इसका रस लगायें . किसी भी तरह की ब्लीडिंग हो , periods की, अल्सर की , आँतों के घाव हों | बाहर या अंदर के कोई भी घाव हों तो इसके 2-3 पत्तों का रस एक कप पानी में मिलाकर प्रात:काल पी लें | हर तरह का रक्तस्राव रुक जाएगा . कहीं भी सूजन या दर्द हो तो इसका पत्ता बाँधें |
*इसके बीज भूनकर उसका पावडर गर्म पानी या शहद के साथ लें तो बलगम और खांसी खत्म होती है | लक्ष्मी विलास रस में भी इसे डालते हैं | लक्ष्मी विलास रस की दो-दो गोली सवेरे शाम लेने से सर्दी दूर होती है | शरीर में दर्द हो या arthritis की समस्या हो तो इसकी 10 ग्राम जड़ का काढा पीयें |

 वानस्पतिक नाम : Argyreia nervosa.

· प्रचलित नाम:Elephant Creeper, अधोगुडा, घाव बेल, समुद्र सोख, Hawaiian Baby Woodrose, Woolly Morning Glory.


आयुर्वेद में गुण:
· रस (Taste) – कटु (Pungent), तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent)
· गुण (Characteristics) - लघु (Light); स्निग्ध (Unctuous)
· वीर्य (Potency) - उष्ण (Hot)
· विपाका (Post digestion effect) - मधुर (Sweet) 

आयुर्वेद में प्रभाव:
· त्रिदोषों पर प्रभाव (Effect on Tridosha): विधारा मूल का प्रभाव प्रमुखतः कफ़ और वात दोषों पर होता है अतः इसका उपयोग वात, कफ़ और वात-कफ़ प्रधान/कारक रोगों में प्रभावी/लाभकारी होता है Vidhara mool pacifies Kapha and Vata Doshas in the body so it can be used effectively in management of all the diseases which originate from aggravation of Kapha/ Vata or both.).
· रसायन:

 विधारा मूल शरीर की प्रत्येक कोशिका तक कार्य करती है और उन्हें बल प्रदान करती है. यह एक उच्च कोटि का वाजीकरण रसायन है|
· वृष्य:

 यौन उत्तेजना वर्धक, वीर्य के गुण बढ़ता है, शुक्राणुओं कि संख्या बढ़ाता है, गर्भाशय की जलन/सूजन लाभकारी है|
· आमवातहर:

 वात जनित रोगों एवं गठिया आदि रोगों में विशेष लाभकारी है|
· अर्शहर:

 बवासीर/अर्श/हैमोरोइड में लाभकारी
· शोथहर:

 विधारा मूल सभी प्रकार की सूजन या दर्द में राहत प्रदान करता है|
· मेहाप्रनुत: 

विधारा मूल सभी प्रकार के मूत्र रोगों में लाभकारी होता है. यह मूत्र विसर्जन के द्वारा शरीर से शर्करा का निष्कासन करता है, अतः मधुमेह में लाभकारी होता है|
· आयुष्कर:
 शरीर के सभी दोषों को दूर कर मनुष्य की आयु वर्धन करता है|
· मेधावर्धक: मस्तिष्क को बल प्रदान करता है तथा तर्क एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाता है|
· कान्तिकर: त्वचा को कांतिमय तथा निर्दोष करता है|
*यह घाव को जल्दी भर देता है या मांस को जोड़ देता है। जब पत्ती के निचली बालों वाली या रोंएदार सतह को सूजन या घाव वाले हिस्से पर लगाते हैं तो यह उसे पका कर मवाद या पीप निकालने में मददगार होता है, जबकि ऊपरी चिकनी सतह घाव भरने में मदद करता है|
*विधारा मूल गैंग्रीन/कोथ/मांस के सड़ने के इलाज में सर्वाधिक उपयोगी है. गैंग्रीन/कोथ होने पर पैर गल जाते हैं और अंगुलियाँ भी गल जाती हैं पस भी पड़ जाए तो भी चिंता न करें. ये गैंग्रीन/कोथ के पुराने से पुराने घावों को ठीक कर देता है|
*रक्त वाहिनियों/शिराओं में सूजन व नसों में खिंचाव (Varicose veins) या चिक चढ़ जाने की बीमारी भी इससे ठीक होती है|
*शय्या व्रण या शय्या क्षत (Bedsore) के फोड़े/घाव में यह अत्यंत लाभकारी होता है|
*माहवारी/मासिक धर्म में, अल्सर में, आँतों के घाव में, शरीर के बाहर या अंदर के कोई भी घाव में इसके प्रयोग से रक्तस्राव रुक जाता है|
*किसी भी प्रकार सूजन या दर्द हो तो इसका पत्ता बाँधें, आराम मिलता है|
*इसके प्रयोग से बलगम और खांसी खत्म होती है|
*शीतकाल में उपयोगी शक्तिवर्धक चूर्ण बनाने की विधि बता रहा हूँ | इस चूर्ण का उपयोग करने से पहले 3 दिनों तक एक कप गुनगुने दूध में 2 चम्मच अरंड का तेल मिलाकर सुबह-शाम लेने से पेट साफ़ कर लें. यह चूर्ण बनाने के लिए 50 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण, 50 ग्राम विधारा चूर्ण, 50 ग्राम मुलैठी चूर्ण, 25 ग्राम सौंठ चूर्ण, 25 ग्राम गिलोय सत्व, 50 ग्राम सफ़ेद मूसली चूर्ण और 50 ग्राम सतावर चूर्ण को एक साथ मिलाकर रखे. इस 1 चम्मच चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम लेना शीतकाल में लाभदायक है|