2017-06-13

होम्योपैथिक औषधि ऐमोनियम म्यूरियेटिकम ( Ammonium Muriaticum ) के गुण लक्षण उपयोग

लक्षण 
 ऋतु-स्राव लेटे-लेटे होता है, खड़े होने पर बन्द हो जाता है।
*गले की दुखन (Sore-throat)
*गर्मी की लहरें तथा ज्वर में गर्म लहर के साथ पसीना छुटना
*खांसी या छाती के दर्द में दोनों कन्धों के बीच ठंड का अनुभव होना
*कब्ज
*मांसपेशियों, पुट्ठों तथा जोड़ो में खिंचाव तथा दर्द की अनुभूति
लक्षणों में कमी
* खुली हवा में रोग में कमी
*तेज चलने से रोग में कमी
*ठंड में रोग में कमी होना

लक्षणों में वृद्धि (Worse)
 सायंकाल (त्वचा, ज्वर, अंगों में रोग का बढ़ना)
* पुरानी मिचकोड़, कालान्तर में रोग का बढ़ना
*प्रात:काल (सिर तथा छाती के रोग का बढ़ना )
* दोपहर (पेट के रोग का बढ़ना)
*खांसी या छाती के दर्द में दोनों कन्धों के बीच ठंड का अनुभव – 
ऐमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का बहुमूल्य लक्षण यह है कि दोनां कन्धों के बीच ठंड का अनभव होता है। छाती की दो तकलीफ में प्राय: यह अनुभव हुआ करता है। एक तो खाँसी में, दूसरा खाँसी के बिना छाती में दर्द के होने में। डॉ० नैश का कथन है कि जैसे दोनों कन्धों के बीच जलन का अनुभव होना लाइकोपोडियम और फॉसफोरस में पाया जाता है, वैसे ठंड का अनुभव होना ऐमोनियम म्यूर में पाया जाता है। लैकनैन्थिस का लक्षण यह है कि रोगी अनुभव करता है कि कन्धों के बीच एक बर्फ का टुकड़ा रखा हुआ है।
मांसपेशियों, पुट्ठों तथा जोड़ों में खिचाव तथा दर्द की अनुभूति – 
इसका मांसपेशियों, पुट्ठों तथा जोड़ों में खिचाव तथा दर्द की अनुभूति पर विशेष प्रभाव है। इस लक्षण में, गठिया तथा पुरानी मिचकोड़ के दर्द आदि में ऐमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि अच्छा काम करती है। रोगी को पुट्ठों में, मांसपेशियों में और जोड़ों में एक प्रकार का तनाव अनुभव होता है। जब मांसपेशियों में खिचाव के कारण उनमें कार्य करने की असमर्थता का अनुभव हो तब ऐमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि को स्मरण करना चाहिये।
सिर्फ तीन औषधियां हैं जिनमें ऋतु-स्राव सिर्फ रात को लेटने पर होता है, चलने-फिरने पर बन्द हो जाता है। वे औषधियां है – ऐमोनिया म्यूर, बोविस्टा तथा मैग कार्ब। ऋतु-स्राव की औषधियों की तुलना निम्न है:
रात को ऋतु-स्राव, दिन को बन्द – ऐमोनिया म्यर, बोविस्टा, मैग कार्ब
दिन को ऋतु-स्राव, लेटने से बन्द – कैक्टस, कॉस्टिकम, लिलियम
ऋतु-स्राव सिर्फ लेटने पर, चलने-फिरने से बन्द – क्रियोजोट
 
*कब्ज – 
ऐमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि में अत्यन्त सख्त कब्ज होती हैं। मल कठोर, खुश्क, टूट-टूट कर गिरता है और कठिनाई से निकलता है। कभी-कभी कॉस्टिकम की तरह मल आंव से लिपटा रहता है। कॉस्टिकम में मलद्वार की पक्षाघात की-सी हालत होने के कारण मल कठिनाई से निकलता है। कब्ज के विषय में यह जानना उचित है कि जितने म्यूरेट्स हैं उनमें मल खुश्क और कठोर होता है। उदाहरणार्थ, ऐमोनिया म्यूर, मैगनेशिया म्यूर, नैट्रम म्यूर-सब में कब्ज और कठोर मल पाया जाता है। ऐमोनिया म्यूर में मल का रंग सदा परिवर्तित होता रहता है। मल का रंग बदलते रहने पल्सेटिला में भी पाया जाता है, परन्तु एमोनिया म्यूर ठंड पंसद नहीं करता, पल्सेटिला ठंड पसन्द करता है। कॉस्टिकम और ऐमोनिया में भेद यह है कि कॉस्टिकम में तो नसें वास्तव में खिंच जाती हैं और हाथ-पांव भी छोटे नहीं पड़ते, परन्तु नसों में इस प्रकार का खिंचाव मालूम पड़ता है मानो नसें और मांसपेशियां छोटी पड़ गई हैं, छोटी पड़ी नही होती।
गले की दुखन (sore-throat) –
 गले की ऐसी दुखन के लिये जिसका कुछ अता-पता न चले, ऐमोनियम म्यूरियेटिकम बहुत उत्तम औषधि है। खासकर गले की ऐसी हालत जिसमें जलन हो, गले में चिपचिपा कफ चिपटा रहे, गले में शोथ हो जाय, थूक निगलने में कष्ट हो, बार-बार गले में से कफ खांस-खांस कर निकालना पड़े, आवाज ही बैठ जाय! ऐसे रोगियों में भी इस से लाभ होता है जो इस प्रकार की खांसी के साथ कमजोर पड़ते जायें, रोज खांसते रहें और तपेदिक की तरफ बढ़ते जायें।*गर्मी की लहरें तथा ज्वर में गर्म लहर के साथ पसीना छूटना –
 रोगी अनुभव करता है कि शरीर की सब नसों में रुधिर उबल रहा है। शरीर की आभ्यन्तर-झिल्लियों में जलन, उत्ताप तथा काटने का-सा अनुभव। गर्मी की लहरें आती हैं और पसीनें में समाप्त होती हैं। रात के अन्तिम भाग में बहुत पसीना आता है। ज्वर में बार-बार गर्मी की लहरें आती हैं और हर गर्म लहर के बाद पसीना छूटता है।
 
ऐमोनिया म्यूर की प्रकृति –
ऐमोनिया म्यूर का रोगी देह से स्थूल होता है, परन्तु टांगें उसकी पतली होती हैं। स्वभाव से आलसी। ठंड तथा खुली हवा को बर्दाश्त नहीं कर सकता। गर्मी की लहरें आती हैं तो उनके बाद पसीना आ जाता है। मानसिक-लक्षण तो बहुत नहीं होते, परन्तु किसी-किसी व्यक्ति के प्रति वह घृणा प्रदर्शित करता है। ऐमोनिया म्यूर के रोगी के रोग के लक्षणों में वृद्धि की विलक्षणता यह है कि उसके भिन्न-भिन्न अंगों के रोग बढ़ने का समय भिन्न-भिन्न है। उसके सिर तथा छाती के रोगों के लक्षण प्रात:काल बढ़ जाते हैं; पेट की शिकायतों के लक्षण दोपहर को बढ़ते हैं; त्वचा, ज्वर तथा अन्य रोगों के लक्षण सायंकाल बढ़ते हैं।
शक्ति तथा प्रकृति – 3, 6 (इस औषधि की क्रिया दीर्घकालिक है। औषधि ‘गर्म-Hot-प्रकृति के लिये हैं)
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