8.8.18

आलू के छिलकों से बाल काले करने का तरीका

                                           

       अगर आपके बाल भी उम्र से पहले सफेद होने लगे हैं और आप इस बात को लेकर हमेशा तनाव में रहते हैं तो अब आपको परेशान होने की जरूरत नहीं हैं क्‍योंकि हम आपके लिए लाये हैं एक ऐसा उपाय जिसके इस्‍तेमाल से आप सफेद बालों की समस्‍या से बच सकते हैं। लेकिन इस घरेलू उपाय के लिए आपको थोड़े धैर्य की जरूरत है। साथ ही अपनी डायट में हरी सब्जियां, फल और प्रोटीन से भरपूर आहार को शामिल करना न भूलें।
यह पुराने जमाने की औषधि आलू के छिलके को उतारकर बनाई जाती है। यह आजमाया हुआ नुस्‍खा है जो कि बालों को सफेद होने से बचाने के साथ ही बालों के रोम को भी स्वस्थ रखता है। आलू के छिलके में मौजूद स्टार्च बालों की रक्षा करता है।
आलू के छिलके के हेयर मास्क में विटामिन ए, बी और सी होता है, जिससे यह स्‍कैल्‍प पर जमे तेल को हटाकर इसे साफ करते हैं, परतदार डैंड्रफ को हटाते हैं, रोम छिद्रों को खोलते हैं और नए बालों के रोमों को बढ़ाते हैं। इतना ही नहीं आलू में आयरन, जिंक, पोटेशियम और कैल्शियम जैसे कई मिनरल्स पाये जाते हैं जिससे बालों का गिरना कम होता है और बाल बढ़ते हैं। आलू में मौजूद स्टार्च एक प्राकृतिक कलर के रूप में काम करता है, यह ना केवल बालों को सफेद होने से रोकता है बल्कि यह चमक भी प्रदान करता है।
     बिना डाई के बाल काले करने की औषधि आलू के छिलके से तैयार होती है। इसे आप अपने घर में आसानी से तैयार कर सकते हैं। यह एक पुराना घरेलू नुस्खा है जो बालों को काला करने के साथ ही उन्हें जड़ से मजबूत रखने में भी मददगार साबित होता है। आलू के छिलके में मौजूद स्टार्च बालों को सुरक्षित रखता है।
आलू के छिलके से तैयार हेयर मास्क में विटामिन ए, बी और सी होता है। यह स्‍कैल्‍प पर जमे तेल और डैंड्रफ को हटाकर इसे साफ करता है। यह स्कैल्प के रोम छिद्रों को खोलता है जिससे नए बाल उगने में मदद मिलती है।
इसके अलावा आलू में आयरन, जिंक, पोटेशियम और कैल्शियम जैसे कई मिनरल्स पाये जाते हैं जो बालों के झड़ने से रोकते हैं। आलू में मौजूद स्टार्च एक प्राकृतिक कलर के रूप में काम करता है, यह ना केवल बालों को सफेद होने से रोकता है बल्कि इससे बाल चमकदार भी होते हैं।

औषधि बनाने के लिए सामग्री

1- आलू का छिलका- 3 या 4
2- लैवेंडर का तेल (इच्छानुसार)- कुछ बूंदें

बनाने का तरीका

3-4 आलू लेकर, उनके छिलके उतार लें। फिर इनके छिलके लेकर, एक कप ठंडे पानी में डालें। इसे फ्राइंग पैन में डालकर अच्‍छे से उबालें। जब यह पूरी तरह उबल जाए तो इसे 5 से 10 मिनट तक धीमी आंच पर पकाएं।
इसके बाद मिश्रण को थोड़ी देर के लिए ठंडा होने के लिए रख दें। फिर इसे जार में भरें। इसकी तीखी गंध से छुटकारा पाने के लिए आप कुछ बूंद लैवेंडर ऑयल डाल सकते हैं।
आलू के छिलकों से तैयार मिश्रण को अगर साफ और गीले बालों में लगाया जाये तो यह ज्यादा बेहतर असर करता है। आलू के छिलके के इस मिश्रण को आप सिर पर धीरे-धीरे लगाएं और फिर थोड़ी देर के लिए छोड़ दें।
मिश्रण के साथ बालों की 5 मिनट मसाज करें और फिर 30 मिनट तक इसे ऐसे ही छोड़ दें। अगर मिश्रण कुछ देर बालों में रहता है तो शानदार तरीके से काम करता है। इसके बाद इसे ठंडे पानी से धो लें। अब आप पाएंगे कि आपके बाल पहले से कुछ बेहतर हैं।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा



5.8.18

कर्ण रोग , कर्ण पीप,बहरेपन की जानकारी और उपचार

                                                       
                             
कान कैसे करते हैं काम ?

दरअसल कान के तीन हिस्से होते हैं।
1- आउटर ईयर
2- मिडल ईयर
3- इनर ईयर
इसमें आउटर ईयर वातावरण से ध्वनि तरंगों के रूप में आवाजों को ग्रहण करता है। और यह तरंगें कैनाल से होकर ईयरड्रम तक पहुंचती हैं और इनकी वजह से ईयरड्रम कंपन करने लगता है। इस कंपन से मिडल ईयर में स्थित 3 बेहद छोटी हड्डियां गतिमान हो जाती हैं और इस गति के कारण कान के अंदर मौजूद द्रव हिलना शुरू हो जाता है। इनर ईयर में कुछ सुनने वाली कोशिकाएं होती हैं, जो इस द्रव की गति से थोड़ी मुड़ जाती हैं और इलेक्ट्रिक पल्स के रूप में संकेत दिमाग को भेजती हैं। ये संकेत ही हमें शब्दों और ध्वनियों के रूप में सुनाई देते हैं।

हियरिंग लॉस के प्रकार

हियरिंग लॉस यानी दो प्रॅकार, कंडक्टिव हियरिंग लॉस, सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस से हो सकता है।
कंडक्टिव हियरिंग लॉस
कंडक्टिव हियरिंग लॉस कान के बाहरी और बीच के हिस्से में हुई किसी क्षति या किसी बीमारी की वजह से हो सकता है। इसीलिए इसे बीमारी की वजह से होने वाला बहरापन भी कहा जाता है। इसके होने की कुछ वजहें निम्न प्रकार से हैं।
कानों से पस बहने या किसी इन्फेक्शन के कारण
कानों की हड्डी में कोई खराबी आने से
कान के पर्दे का क्षतिग्रस्त हो जाना
किसी कैंसर रहित ट्यूमर के कारण
सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस
सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस कान के अंदर आई किसी खराबी के कारण हो सकता है। ऐसा तब होता है, जब हियर सेल्स ठीक से काम नहीं करते या नष्ट होने लगते हैं। सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस होने के कई कारण हो सकते हैं, जैसे-
बढ़ती उम्र
कुछ खास तरह की दवाएं। जैसे जेंटामाइसिन का इंजेक्शन, बैक्टीरियल इन्फेक्शन आदि
कुछ बीमारियां जैसे डायबीटीज और असंतुलित हॉर्मोंस। इसके अलावा मेनिंजाइटिस, खसरा, कंठमाला आदि बीमारियां भी सेंसरीन्यूरल हियरिंग लॉस का कारण बन सकती हैं।

अधिक शोर

इसके अलावा कई लोग कान साफ करने समय धातु की नुकीली चीज का इस्‍तेमाल करते हैं। इससे कान के पर्दे को नुकसान हो सकता है।
कानों में जमा होने वाली वैक्स (मैल) के कारण भी लोगों को हियरिंग लॉस व बच्चों में डिलेड स्पीच हो सकता है। इसलिए कान में वैक्स जमा होने को गंभीरता से लेना चाहिए। और इसको डॉक्टर से साफ कराना चाहिए। इसके अलावा कान में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर बिना समय बिताए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।

ईयरफोन से रहें सावधान

नाक, कान, गला रोग विशेषज्ञ इस संदर्भ में बताते हैं कि ईयरफोन्स भी बहरे पन का कारण बन सकते हैं। इनके लगातार प्रयोग से सुनने की क्षमता 40 से 50 डेसीबेल तक कम हो सकती है। फलस्वरूप कान का पर्दा वाइब्रेट होने लगता है व दूर की आवाज सुनने में परेशानी होने लगती है। यहां तक कि इससे बहरापन भी हो सकता है। इसके अलावा ईयरफोन्स के अत्यधिक प्रयोग से कान में दर्द, सिर में दर्द या नींद न आना आदि समस्याएं हो सकती हैं। यही नहीं इनके कारण वर्टिगो, बहरापन और लैबिरिंथिस जैसी बीमारियां भी होने का खतरा हो सकता है।
सुनने की क्षमता में कमी जन्म से भी हो सकती है, इसीलिए पैदा होने के बाद प्रत्येक बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच जरूर करानी चाहिए। लेकिन सामान्य बाल रोग विशेषज्ञ इस प्रकार की जांच नहीं करते हैं। इसके लिए किसी ईएनटी रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए। याद रखिए सुनने की क्षमता ईश्‍वर की दी एक अनमोल कृति है। इसे यूं ही बेकार न करें। अपने कानों का पूरा खयाल रखें और किसी भी प्रकार की समस्‍या होने पर चिकित्‍सक से संपर्क करें।
सुनने की क्षमता में कमी जन्म से भी हो सकती है, इसीलिए पैदा होने के बाद प्रत्येक बच्चे की सुनने की क्षमता की जांच जरूर करानी चाहिए। लेकिन सामान्य बाल रोग विशेषज्ञ इस प्रकार की जांच नहीं करते हैं। इसके लिए किसी ईएनटी रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए।
कानों में जमा होने वाली वैक्स (मैल) के कारण भी लोगों को हियरिंग लॉस व बच्चों में डिलेड स्पीच हो सकता है। इसलिए कान में वैक्स जमा होने को गंभीरता से लेना चाहिए। और इसको डॉक्टर से साफ कराना चाहिए। इसके अलावा कान में किसी भी प्रकार की समस्या होने पर बिना समय बिताए डॉक्टर से जांच करानी चाहिए।
आवाजें सुनने के लिए कान जरूरी हैं, ये बात आपको भी पता है। मगर क्या आप जानते हैं कि कान आपके शरीर का संतुलन बनाने में भी मददगार होते हैं। कान बहने की समस्या शरीर के इस महत्वपूर्ण अंग की कार्य प्रणाली को क्षतिग्रस्त कर देती है। आइए जानते हैं इस समस्या का कारण और इलाज।

गंभीर है कान बहने की समस्या

कान बहने की समस्या को हल्के ढंग से लेना सेहत के लिए भारी यानी नुकसानदेह साबित हो सकता है। इस समस्या से कान के पर्दे में छेद हो जाता है और इससे रोगी बहरा भी हो सकता है। हम कान बहने की समस्या के प्रति सचेत तभी होते हैं, जब यह समस्या गंभीररूप धारण कर लेती है। कान बहने की समस्या के गंभीर परिणामों से बचने के लिए जरूरी है कि कानों की छोटी समस्याओं को भी नजरअंदाज न किया जाए।

अनदेखी ठीक नहीं

आमतौर पर कान से मवाद आने को मरीज गंभीरता से नहीं लेता। इसे अत्यंत गंभीरता से लेकर नाक, कान व गला विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए अन्यथा यह कभी-कभी गंभीर रोग जैसे मेनिनजाइटिस या दिमागी बुखार आदि को उत्पन्न करने का कारण बन सकता है। कान में मवाद की समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है, किंतु प्राय: यह एक वर्ष से छोटे बच्चों या ऐसे बच्चों में ज्यादा होती है जो मां की गोद में ही रहते हैं यानी जो छोटे बच्चे बैठ नहीं सकते या करवट नहीं ले सकते।

कान से मवाद आने का कारण

कान से मवाद आने का स्थान मध्य कान (कान का मध्यवर्ती भाग) में संक्रमण है। मध्य कान में सूजन होकर, कान का पर्दा फटकर मवाद आने लगता है। मध्य कान में संक्रमण पहुंचने के तीन रास्ते हैं, जिसमें 80 से 90 प्रतिशत कारण गले से कान को जोड़ने वाली नली है। इसके अलावा नाक और गले की सामान्य सर्दी-जुकाम, टांसिलाइटिस, खांसी आदि कारणों से मध्य कान में संक्रमण पहुंच जाता है।

सर्जरी है कान बहने का इलाज

शुरुआती दौर में कान बहने का इलाज एंटीबॉयोटिक और ओरल दवाओं से किया जा सकता है, जो अस्थायी समाधान है। स्थायी समाधान के लिए रोगी को सर्जिकल प्रक्रियाओं की जरूरत होती है। सर्जरी की ये प्रक्रियाएं इस प्रकार हैं।

मायरिंगोप्लास्टी: 

एक सरल सर्जरी है। यह सर्जरी कान में हुए छोटे छेद की समस्या का बेहतर इलाज करती है। इसमें कान के पीछे की त्वचा को कान के नए पर्दे के रूप में लगाया जाता है।
टिम्पैनोप्लास्टी: यह सर्जरी आमतौर पर सामान्य बेहोशी की स्थिति में की जाती है। इस सर्जरी में पर्दे के साथ सुनने की हड्डी को भी बदला जाता है।

मसटॉइडेक्टमी: 

सर्जरी की यह प्रक्रिया सामान्य बेहोशी के तहत की जाती है। इस सर्जरी के माध्यम से कान के पीछे की जो हड्डी गल जाती है, उसे निकाल दिया जाता है।
कान सुनने के अलावा शरीर के संतुलन को भी बरकरार रखते हैं। इसलिए कान का स्वस्थ रहना जरूरी है, लेकिन बहरेपन की समस्या पीड़ित व्यक्ति के अलावा उसके परिजनों को भी परेशान करती है, लेकिन अब इससे छुटकारा संभव है। बहरेपन में सुनने की शक्ति के कम होने के अलावा व्यक्ति की सामजिक व मानसिक परेशानियां भी बढ़ जाती हैं, लेकिन अब इस समस्या को अच्छी तरह से नियंत्रित किया जा सकता है।

क्यों होता है ऐसा

जब कोई व्यक्ति बोलता है, तो वह ध्वनि तरंगों के द्वारा हवा में एक कंपन पैदा करता है। यह कंपन कान के पर्दे और सुनने से संबधित तीन हड्डियों-मेलियस, इन्कस और स्टेप्स के द्वारा आंतरिक कान में पहुंचता है और सुनने की नस द्वारा आंतरिक कान से मस्तिष्क में संप्रेषित होता है। इस कारण हमें ध्वनि का अहसास होता है। यदि किसी कारण से ध्वनि की इन तरंगों में अवरोध पैदा हो जाए, तो बहरेपन की समस्या पैदा हो जाएगी। यदि अवरोध कान के पर्दे या सुनने की हड्डियों तक सीमित रहता है तो इसे कन्डक्टिव डेफनेस (एक प्रकार का बहरापन) कहते हैं। यदि अवरोध कान के आंतरिक भाग में या सुनने से संबन्धित नस में है, तो इसे सेन्सरी न्यूरल डेफनेस कहते हैं।
योग और प्राणायाम सिर्फ मांस‍पेशियों को लचीला बनाने के लिए ही किया जाता है। योग यह सांस लेने की तकनीकों का मेल है जो शरीर को कई तरह की बीमारियों को दूर करने में मदद करता है। इससे हमारा शरीर फिट रहता है। आज हम आपको योग से कान की बीमारियों को दूर करने का तरीका बताएंगे। इस योगासन से कान की कई तरह की बीमारियां सही होती हैं। यहां तक कि योग से बहरापन भी काफी हद तक दूर हो सकता है। आइए जानते है कान के लिए कौन सा योग फायदेमंद हो सकता है।

ताड़ासन

ताड़ासन आपके कान के लिए बहुत ही उपयोगी आसन है। इसे नियमित रूप से करने से आपके पोस्चर में सुधार देखने को मिलता है। यह जांघों, घुटनों और टखनों को मजबूत करता है तथा इससे पैर और कूल्हों में ताकत, शक्ति और गतिशीलता बढ़ जाती है।

कैसे करें

तड़ासन करने के लिए आप 4 से 6 इंच का गैप रखकर खड़े हो जाइए। इसके बाद दोनों भुजाओं को ऊपर की ओर उठाइए। इस दौरान अपनी आंखों को सामने पड़ने वाली किसी भी चीज पर अपनी दृष्टि जमा लीजिए। इसमें आपके शरीर का सारा भार आपकी पैरों की अंगुलियों पर होगा। कुछ समय तक इस अवस्था में रहने के बाद वापिस इस सामान्य में आ जाइए। इस आसन को आप कम से कम दस बार कीजिए। इस आसन के दौरान ऊपर उठते समय श्वास अंदर व नीचे की ओर आते समय बाहर लीजिए।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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रुद्राक्ष थैरेपी से करें रोग उन्मूलन

                                                 


   रुद्र का मतलब भगवान शंकर (शिव) है। अक्ष आंख को कहते हैं। इन दोनों शब्दों से रुद्राक्ष बना। रुद्राक्ष मूल रूप से पर्वतीय क्षेत्र में होता है। जावा सुमात्रा (इन्डोनेशिया) में छोटे आकार के और नेपाल में बड़े आकार के रुद्राक्ष होते हैं। भारत में भी अब कई स्थलों पर यह वृक्ष लगाया गया है।
रुद्राक्ष हमारे लिए कितना लाभकारी है, यह हमारे पूर्वज जानते थे और प्रयोग करते थे। पुराणों के अनुसार भगवान शंकर के नेत्र से ज्ञानानंद अश्रु (आंसू) की बूंद से यह वृक्ष जन्म लेता है। शिव का अर्थ ही कल्याण है तो यह रुद्राक्ष कल्याण के लिए ही धरती पर आया है। इसके अनेक नाम हैं रुद्राक्ष, शिवाक्ष, भूतनाशक, पावन, नीलकंठाक्ष, हराक्ष, शिवप्रिय, तृणमेरु, अमर, पुष्पचामर, रुद्रक, रुद्राक्य, अक्कम, रूद्रचल्लू आदि।
रुद्राक्ष को हम एक साधारण वृक्ष बीज समझ लेते हैं। कोई-कोई इसे गले में तरह-तरह के लाकेट बनाकर माला बनाकर पहन लेते हैं। उसका भी असर होता है, लेकिन विधि-विधान से इसे धारण करना परम लाभकारी है। रुद्राक्ष वृक्ष और फल दोनों ही पूजनीय हैं। मानव के अनेकों रोग, शोक, बाधा नष्ट करने की शक्ति रुद्राक्ष में है।
रुद्राक्ष के दानों में गैसीय तत्व हैं जो इस प्रकार हैं कार्बन 50.031 प्रतिशत, हाईड्रोजन 17.897 प्रतिशत नाइट्रोजन 0.095 प्रतिशत, आक्सीजन 30.453 प्रतिशत इसके अतिरिक्त एल्युमिनियम, कैल्शियम, तांबा, कोबाल्ट, तांबा, आयरन की मात्रा भी होती है। इसमें चुम्बकीय और विद्युत ऊर्जा से शरीर को रुद्राक्ष का अलग-अलग लाभ होता है। एक मुखी रुद्राक्ष दुर्लभ है। शायद ही कभी उसके दर्शन हो पाएं लेकिन बाजार, टैलीविजन में बेधड़क एक मुखी रुद्राक्ष बिक रहे हैं जो शायद ही शुद्ध हों।

एक मुखी रुद्राक्ष :

इसके मुख्य ग्रह सूर्य होते हैं। इसे धारण करने से हृदय रोग, नेत्र रोग, सिर दर्द का कष्ट दूर होता है। चेतना का द्वार खुलता है, मन विकार रहित होता है और भय मुक्त रहता है। लक्ष्मी की कृपा होती है।

दो मुखी रुद्राक्ष : 

मुख्य ग्रह चन्द्र हैं यह शिव और शक्ति का प्रतीक है मनुष्य इसे धारण कर फेफड़े, गुर्दे, वायु और आंख के रोग को बचाता है। यह माता-पिता के लिए भी शुभ होता है।

तीन मुखी रुद्राक्ष : 

मुख्य ग्रह मंगल, भगवान शिव त्रिनेत्र हैं। भगवती महाकाली भी त्रिनेत्रा है। यह तीन मुखी रुद्राक्ष धारण करना साक्षात भगवान शिव और शक्ति को धारण करना है। यह अग्रि स्वरूप है इसका धारण करना रक्तविकार, रक्तचाप, कमजोरी, मासिक धर्म, अल्सर में लाभप्रद है। आज्ञा चक्र जागरण (थर्ड आई) में इसका विशेष महत्व है।

चार मुखी रुद्राक्ष : 

चार मुखी रुद्राक्ष के मुख्य देवता ब्रह्मा हैं और यह बुधग्रह का प्रतिनिधित्व करता है इसे वैज्ञानिक, शोधकर्त्ता और चिकित्सक यदि पहनें तो उन्हें विशेष प्रगति का फल देता है। यह मानसिक रोग, बुखार, पक्षाघात, नाक की बीमारी में भी लाभप्रद है।

पांच मुखी रुद्राक्ष :

यह साक्षात भगवान शिव का प्रसाद एवं सुलभ भी है। यह सर्व रोग हरण करता है। मधुमेह, ब्लडप्रैशर, नाक, कान, गुर्दा की बीमारी में धारण करना लाभप्रद है। यह बृहस्पति ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है।

छ: मुखी रुद्राक्ष : 

शिवजी के पुत्र कार्तिकेय का प्रतिनिधित्व करता है। इस पर शुक्रग्रह सत्तारूढ़ है। शरीर के समस्त विकारों को दूर करता है, उत्तम सोच-विचार को जन्म देता है, राजदरबार में सम्मान विजय प्राप्त कराता है।

सात मुखी रुद्राक्ष : 

इस पर शनिग्रह की सत्तारूढ़ता है। यह भगवती महालक्ष्मी, सप्त ऋषियों का प्रतिनिधित्व करता है। लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, हड्डी के रोग दूर करता है, यह मस्तिष्क से संबंधित रोगों को भी रोकता है।

आठ मुखी रुद्राक्ष :

भैरव का स्वरूप माना जाता है, इसे धारण करने वाला व्यक्ति विजय प्राप्त करता है। गणेश जी की कृपा रहती है। त्वचा रोग, नेत्र रोग से छुटकारा मिलता है, प्रेत बाधा का भय नहीं रहता। इस पर राहू ग्रह सत्तारूढ़ है।

नौ मुखी रुद्राक्ष : 

नवग्रहों के उत्पात से रक्षा करता है। नौ देवियों का प्रतीक है। दरिद्रता नाशक होता है। लगभग सभी रोगों से मुक्ति का मार्ग देता है।

दस मुखी रुद्राक्ष :

भगवान विष्णु का प्रतीक स्वरूप है। इसे धारण करने से परम पवित्र विचार बनता है। अन्याय करने का मन नहीं होता। सन्मार्ग पर चलने का ही योग बनता है। कोई अन्याय नहीं कर सकता, उदर और नेत्र का रोग दूर करता है।

ग्यारह मुखी रुद्राक्ष :

रुद्र के ग्यारहवें स्वरूप के प्रतीक, इस रुद्राक्ष को धारण करना परम शुभकारी है। इसके प्रभाव से धर्म का मार्ग मिलता है। धार्मिक लोगों का संग मिलता है। तीर्थयात्रा कराता है। ईश्वर की कृपा का मार्ग बनता है।

बारह मुखी रुद्राक्ष :

बारह ज्योतिर्लिंगों का प्रतिनिधित्व करता है। शिव की कृपा से ज्ञानचक्षु खुलता है, नेत्र रोग दूर करता है। ब्रेन से संबंधित कष्ट का निवारण होता है।

तेरह मुखी रुद्राक्ष :

इन्द्र का प्रतिनिधित्व करते हुए मानव को सांसारिक सुख देता है, दरिद्रता का विनाश करता है, हड्डी, जोड़ दर्द, दांत के रोग से बचाता है।

चौदह मुखी रुद्राक्ष :

भगवान शंकर का प्रतीक है। शनि के प्रकोप को दूर करता है, त्वचा रोग, बाल के रोग, उदर कष्ट को दूर करता है। शिव भक्त बनने का मार्ग प्रशस्त करता है।
रुद्राक्ष को विधान से अभिमंत्रित किया जाता है, फिर उसका उपयोग किया जाता है। रुद्राक्ष को अभिमंत्रित करने से वह अपार गुणशाली होता है। अभिमंत्रित रुद्राक्ष से मानव शरीर का प्राण तत्व अथवा विद्युत शक्ति नियमित होती है। भूतबाधा, प्रेतबाधा, ग्रहबाधा, मानसिक रोग के अतिरिक्त हर प्रकार के शारीरिक कष्ट का निवारण होता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को सशक्त करता है, जिससे रक्त चाप का नियंत्रण होता है।
रोगनाशक उपाय रुद्राक्ष से किए जाते हैं, तनावपूर्ण जीवन शैली में ब्लडप्रैशर के साथ बे्रन हैमरेज, लकवा, मधुमेह जैसे भयानक रोगों की भीड़ लगी है। यदि इस आध्यात्मिक उपचार की ओर ध्यान दें तो शरीर को रोगमुक्त कर सकते हैं।


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