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7.3.17

अफीम के गुण ,फायदे//Opium use,benefits

   

  अफीम च्यवन ऋषि के समय से ही औषधीय उपयोग में आती रही है। यह आयुर्वेदिक व यूनानी दोनो चिकित्सा पद्धतियों में वात रोगों, अतिसार, अनिद्रा व वाजीकरण चिकित्सा में आशुफलदायी रुप में प्रयोग होती रही है और तो और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान ऐलौपेथ ने भी इस औषधि के गुणों का प्रभाव अंगीकार करते हुये इसके मार्फीन,कोडीन,थांबेन, नार्कोटीन,पापावटीन तथा एल्कोलाइड्स को अपने फार्मोकोपिया में शामिल किया है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

   इसे आफूक, अहिफेन (संस्कृत), अफीम (हिन्दी), आफिम (बंगला), अफू (मराठी), अफीण (गुजराती), अफमून (अरबी) तथा पेपेवर सोम्नीफेरम (लैटिन) कहते हैं।
इसका पौधा 3-4 फुट ऊँचा, हरे रेशों से युक्त और चिकने काण्डवाला होता है। इसके पत्ते लम्बे, डंठलरहित, गुड़हल के पत्तों से कुछ मिलते-जुलते, आगे के हिस्से में कटे होते हैं। फूल सफेद रंग के और कटोरीनुमा बड़े सुहावने होते हैं। इसके फल छोटे और अनार की आकृति के होते हैं। जड़ साधारणतया छोटी होती है|
सायंकाल इस पौधे (खसखस) के कच्चे फलों के चारों ओर चीरा लगा देने पर दूसरे दिन प्रात: वहाँ दूध के समान निर्यास पाया जाता है। उसे खुरचकर सुखा लेने पर अफीम बन जाती है। सूखे फल को ‘डोडा’ (पोश्त) कहा जाता है। इसके बीज राई की तरह काले या सफेद रंग के होते हैं, जिन्हें ‘पोस्तादाना’ (खसखस) कहते हैं। पोश्ता लगभग 14 प्रकार का होता है।इसमें मार्फिन, नर्कोटीन, कोडीन, एपोमॉर्फीन, आपिओनियन, पापावरीन आदि क्षारतत्त्व (एल्केलाइड) तथा लेक्टिक एसिड, राल, ग्लूकोज, चर्बी व हल्के पीले रंग का निर्गन्ध तेल होता है
अफीम के गुण : यह स्वाद में कड़वी, कसैली, पचने पर कटु तथा गुण में रूखी होती है। इसका मुख्य प्रभाव नाड़ी-संस्थान पर मदकारी (नशा लानेवाला) होता है। यह नींद लानेवाली, वेदना-रोधक, श्वास-केन्द्र की अवसादक, शुक्रस्तम्भक और धातुओं को सुखानेवाली है।


पेट मे गेस के अनुपम नुस्खे 


प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों में अफीम से बनने वाले अनेकों योगों का वर्णन है
1.कामिनी विद्रावण रस( भैषज्य रत्नावली) 
, 2- ग्रहणी कपाट रस(रसयोग सागर),
3- वेदनान्तक रस (रस तरंगिणी)---
रस तरंगिणी शुद्ध अफ़ीम3 ग्राम, कपूर तीन ग्राम, खुरासानी यवानी 6 ग्राम, रस सिन्दूर 6 ग्राम, लेकर सबको खरल में डालकर भाँग की पत्तियों के स्वरस में खरल कर दें ।जब गोली बनाने योग्य हो जाऐं तो 250 मिलीग्राम की गोलियाँ बना लें इसमें से 2 गोली को गर्म पानी या दूध से देने पर अनेकों प्रकार के दर्दों में राहत मिल जाती है।
4- निद्रोदय रस (योग रत्नाकर)-
शुद्ध अफीम6 ग्राम,वंशलोचन 6 ग्राम, रस सिन्दूर 6 ग्राम व आमलकी चूर्ण- 12 ग्राम लेकर सबको लेकर भाँग की पत्तियों के स्वरस में 3 बार भावनाऐं देते हुय खरल करे और जब गोलियां बनाने योग्य हो जाऐ तब 250 मिली ग्राम की गोलियाँ बनाकर सुखा लें। एक गोली दूध से लेने पर ही नींद आ जाती है।

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5- शंखोदर रस (योग रत्नाकर)-
शंख भस्म 40 ग्राम, शुद्ध अफीम- 10 ग्राम, जायफल व सुहागे का फूला 10 -10 ग्राम लेकर सबको मिला लें और जल के साथ मर्दन करके 125 मिली ग्राम की गोलियाँ बना कर रख लें इसमें से 1-1 गोली मख्खन व गर्म जल के साथ लेने से अतिसार, संग्रहणी, पेट दर्द, आदि में पूर्ण लाभ होता है।
6- समीर गज केशरी रस(रसराज सुन्दर)-
शुद्ध अफीम , शुद्ध कुचला, काली मिर्च चूर्ण, सभी 50-50 ग्राम लेकर सबको खरल करके 125 -125 मिली ग्राम की गोलियाँ बना कर रख लें इसमें से 1 गोली खाकर ऊपर से पान खाना चाहिये यह बात व्याधि नाशक, विसूचिका , अरूचि, अपस्मार, आदि पाचन तंत्र की व्याधियों को हर लेने वाली महौषधि है।
7- महावातराज रस(सिद्ध भैषज्य संग्रह-
इस महौषधि को निर्मित करने के लिए धतूरे के बीज, शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, लौह भस्म, सभी 20- 20 ग्राम लेकर ,अभ्रक भस्म,लौंग, जावित्री,जायफल,इलायची बीज,भीमसेनी कपूर, काली मिर्च, चन्द्रोदय या रस सिन्दूर प्रत्येक 10 -10 ग्राम लेकर अफीम 120 ग्राम लें।पहले पारे व गंधक की कज्जली बना कर लौह भस्म, अभ्रक भस्म, और चन्द्रोदय मिला कर खूब मर्दन करें फिर शेष औषधियों का चूर्ण मिलाक र बाद में अफीम मिलाऐं इसे धतूरे के रस में एक दिन खरल कर 125 मिली ग्राम की गोलियाँ बना ले।आधे से एक गोली जल अथवा रोग के अनुसार अनुपान से दिन में दो बार देनी चाहियें ।न्यूमोनिया, श्वांस, अतिसार , खाँसी, मधुमेह व गृधशी या सायटिका में इस औषधि के परिणाम आशुफलप्रद हैं।

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विभिन्न शूल : 

अफीम को तेल या घी में मिलाकर वेदना-स्थानों पर (बवासीर के मस्से, नेत्र, पसली के दर्द) तथा शिर:शूल में भी सिर पर लेप करें। लेकिन कान के दर्द में तेल ही डालें, घृत नहीं।

नजला : 

एक तोला खसखस घी के साथ कड़ाही में भूनें। फिर चीनी मिला हलुआ बनाकर लें। प्रात:काल इसके सेवन से पुराना सिरदर्द और प्रतिश्याय (नजला) दूर हो जाते हैं।

दस्त : 

चार रत्ती अफीम एक छुहारे के अन्दर रख उसे आग में भुने। फिर उसे पीसकर, मूँग के बराबर 1-1 रत्ती की गोली बना लें। इसके सेवन से मरोड़ देकर आँवसहित होनेवाले दस्तों में लाभ होता है। बच्चों को आधी मात्रा देनी चाहिए। पोस्त (फल के छिलके या ‘पोस्त-डोंडा’) उबालकर पीने से अतिसार और पतले दस्त रुक जाते हैं। अधिक मात्रा में यह मादक हो जाता है।

मोतियाबिन्द : 


चौथाई रत्ती अफीम और 3 रत्ती केसर की गोली बनाकर बादाम के हलुए के साथ खाने से पुराना सिरदर्द, बार-बार होनेवाला नजला और जुकाम रुक जाता है। आँखों में मोतियाबिन्द उतर रहा हो, तो वह भी इससे रुक जाता है। दो सप्ताह इसके सेवन के बाद केवल बादाम और केसर का सेवन करें, अफीम निकाल दें। आवश्यकता होने पर पुन: इसे लें। यह अनुभूत प्रयोग है।

चोट, मोच या सूजन -

अफीम 2 रत्ती और एलुआ 1 तोला अदरख के रस में पीसकर धीमी अग्नि पर पका लेप बना लें। कपड़े पर रखकर किसी प्रकार की चोट, मोच या सूजन पर लगा दें तो निश्चित आराम होगा।

सिर दर्द :

 आधा ग्राम अफीम और 1 ग्राम जायफल को दूध में मलकर, इस तैयार लेप को मस्तक पर लगाएं या फिर आधा ग्राम अफीम को 2 लौंग के चूर्ण के साथ हल्का गर्म करके खोपड़ी (सिर) पर लेप लगाने से सर्दी और बादी से उत्पन्न सिर दर्द दूर होगा।

गर्भस्राव (गर्भ से रक्त के बहने पर) :

40 मिलीग्राम अफीम पिण्ड को खजूर के साथ मिलाकर दिन में गर्भस्राव से पीड़ित स्त्री को 3 बार खिलाएं। इससे गर्भस्राव शीघ्र रुकेगा।

स्वरदोष (गला खराब होने पर) : 

अजवायन और अफीम के डोडे समान मात्रा में पानी में उबाकर छान लें और फिर छाने हुए पानी से गरारे करने से स्वरदोष में आराम होगा।

कमर का दर्दं : 

एक चम्मच पोस्त के दानों को समान मात्रा में मिश्री के साथ पीसकर एक कप दूध में मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ होगा।

अतिसार (दस्त) में :


आम की गिरी का चूर्ण 2 चम्मच, अफीम लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर एक चौथाई चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराएं।
अफीम और केसर को समान मात्रा में लेकर पीस लें तथा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बना लें। इसे शहद के साथ देने से अतिसार में लाभ होता है।
अफीम को सेंककर खिलाने से दस्त में आराम मिलता है।
लगभग 4 से 9 ग्राम तक पोस्त के डोडे पीसकर पिलाने से दस्त मिटता है।

आमातिसार (आंवयुक्त पेचिश) :

भुनी हुई लहसुन की कली में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिलाकर खाने से इस रोग में राहत में मिलती है।
5 ग्राम अफीम, मोचरस, बेलगिरी, इन्द्रजौ, गुलधावा, आम की गुठली की गिरी को 10-10 ग्राम लें। प्रत्येक औषधि को अलग-अलग पीसकर चूर्ण बना लें। फिर सबको एकत्रकर उसमें अफीम मिला लें। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चूर्ण को लस्सी के साथ सेवन करने से पेचिश के रोगी का रोग ठीक हो जाता है।

उल्टी :

कपूर, नौसादर और अफीम बराबर मात्रा में मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां शहद के साथ बना लें। दिन में 3 बार 1-1 गोली पानी के साथ लें।
अफीम, नौसादर और कपूर को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। फिर इसके अंदर पानी डालकर मूंग के बराबर की छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इस 1-1 गोली को ठंडे पानी के साथ खाने से उल्टी और उबकाई आना बंद हो जाती है।

अनिद्रा (नींद का कम आना) :

 गुड़ और पीपलामूल का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिला लें। इसकी 1 चम्मच की मात्रा में अफीम की लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग मात्रा मिलाकर रात्रि में भोजन के बाद सेवन करने से लाभ होता है।

नपुंसकता लाने वाला : 

कुछ लोग भ्रमवश अफीम का प्रयोग संभोग व सेक्स की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि अफीम खाने से कुछ दिन व्यक्ति नामर्द हो जाता है और उसकी संभोग (सेक्स) शक्ति क्षीण हो जाती है।

मस्तक पीड़ा : 

1 ग्राम अफीम और 2 लौंग को पीसकर लेप करने से बादी और सर्दी के कारण उत्पन्न मस्तक पीड़ा मिटती है।

आंखों के रोग -

आंख के दर्द और आंख के दूसरे रोगों में इसका लेप बहुत लाभकारी है।
नकसीर (नाक से खून आने पर) : अफीम और कुंदरू गोंद दोनों बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर सूंघने से नकसीर बंद होती है।

केश (बाल) -

 अफीम के बीजों को दूध में पीसकर सिर पर लगाने से इसमें होने वाली फोड़े फुन्सियां एवं रूसी साफ हो जाती है।

दंतशूल (दांत का दर्द) -

लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग नौसादर, दोनों को दांतों में रखने से दाड़ की पीड़ा मिटती है और दांत के छेद में रखने से दांतों का दर्द मिटता है।
अफीम और नौसादर बराबर की मात्रा में मिलाकर कीड़ा लगे दांत के छेद में दबाकर रखने से दांत दर्द में राहत मिलती है।

प्रतिषेध : 

अफीम के अधिक प्रयोग से तन्द्रा, निद्रा, हृदय का अवसाद होने लगे तो तुरन्त राई-नमक मिलाकर दें तथा वमन करा दें। अरहर की कच्ची दाल पानी में पीसकर या हींग पानी में घोलकर पिला देने से भी तुरन्त आराम पहुँचता है।

सावधानी-

यह मादक द्रव्य है। अधिक प्रयोग से विषाक्त प्रभाव सम्भव है। अत: अत्यावश्यक होने पर ही इसका प्रयोग करें। फिर भी कभी अधिक मात्रा में नहीं। अतिआवश्यक होने पर ही बच्चों, वृद्धों तथा सुकुमार स्त्रियों को बड़ी सावधानी एवं कम मात्रा में ही इसे दिया जाय।

यूनानी मतानुसार : 

अफीम मस्तिष्क की शक्ति को उत्तेजित करती है, शरीर की शक्ति व गर्मी को बढ़ाने से आनन्द और संतोष की अनुभूति प्रदान करती है। आदत पड़ने पर निर्भरता बढ़ाना, शारीरिक अंगों की पीड़ा दूर करने की प्रकृति, कामोत्तेजक, स्तम्भन शक्ति बढ़ाने वाली, आधासीसी, कमर दर्द, जोड़ों के दर्द, बहुमूत्र, मधुमेह, श्वास के रोग, अतिसार तथा खूनी दस्त में गुणकारी है।

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