25.9.26

100 रोगों की एक दवा -हरड़ के चमत्कारी फायदे । Haritika benefits


                                      

क्या आप हर रात कब्ज, गैस और भारीपन लेकर सोते हैं? एक छोटा सा फल, जो आपकी दादी की रसोई में था, आज भी पेट को सुबह-सुबह साफ कर सकता है।
आयुर्वेद कहता है हरड़ को माता के समान हितकारी। मतलब, जैसे माँ बिना नुकसान पहुँचाए बच्चे का ध्यान रखती है, वैसे ही हरड़ शरीर को धीरे-धीरे शुद्ध करती है। पर सवाल यह है, क्या हर किसी को हरड़ लेनी चाहिए? और कौन सी हरड़ किस रोग में?
आज की इस वीडियो में मैं आपको 22 ऐसे फायदों के बारे में बताऊंगा जो रिसर्च और आयुर्वेद दोनों में लिखे हैं। साथ ही बताऊंगा कि रात में शहद के साथ क्यों, सुबह घी के साथ क्यों, और किन 4 लोगों को भूलकर भी हरड़ नहीं लेनी चाहिए। अंत तक देखिए, क्योंकि अंत में मैं एक गलत तरीका बताऊंगा जो 90% लोग करते हैं।
 100 रोगों वाली बात का सच क्या है?
 नमस्ते, मैं हूँ आपका दोस्त और आज हम बात करेंगे एक ऐसे फल की जिसे आयुर्वेद में सभी औषधियों में श्रेष्ठ माना गया है। इसका नाम है हरड़, संस्कृत में हरीतकी, English में Haritaki और Botanical name Terminalia chebula।
 आयुर्वेद में ऐसा कहा गया है कि हरड़ त्रिदोष नाशक है और कई रोगों की जड़ यानी आम, कब्ज और खराब पाचन को ठीक करती है। जब जड़ ठीक होगी तो बहुत से रोग अपने आप कम होंगे। इसलिए हम 100 रोगों का दावा नहीं करेंगे, पर 22 ऐसे उपयोग जरूर समझेंगे जो पारंपरिक और आधुनिक दोनों स्रोतों में मिलते हैं।
 इस वीडियो को आप अंत तक देखिए, क्योंकि मैं आपको हरड़ का सही समय, सही अनुपान यानी किसके साथ लेना है, और सही मात्रा तीनों बताऊंगा। गलत मात्रा या गलत अनुपान से फायदा नहीं, नुकसान हो सकता है।
हरड़ क्या है और आयुर्वेद में इसे इतना खास क्यों माना गया है?
 हरड़  कम्ब्रेटासीए कुल का फल है। भारत, नेपाल, श्रीलंका और दक्षिण एशिया में इसके पेड़ पाए जाते हैं। फल कच्चा होने पर हरा और पकने पर पीला भूरा हो जाता है। सूखने पर यह सख्त, झुर्रीदार और हल्का खट्टा कसैला स्वाद देता है।
चरक संहिता में आचार्य चरक ने हरीतकी को पथ्या कहा है, मतलब जो पथ्य है, हितकारी है। भावप्रकाश निघंटु में लिखा है, यस्य माता गृहे नास्ति तस्य माता हरीतकी। जिसके घर में माँ नहीं, उसकी माँ हरड़ है। इसका अर्थ यह है कि यह बिना द्वेष के शरीर का हित करती है।
 हरीतकी = हरित + की, जो हर रोग को हर ले] यह शब्द हरित से बना है, जो रोग को हर लेती है। आयुर्वेद में इसे रसायन औषधि भी कहा गया है, जो धातुओं को पुष्ट करती है और उम्र के प्रभाव को धीमा करने में सहायक मानी गई है।
हरड़ के 7 प्रकार - कौन सी हरड़ किस काम की?
 सात प्रकार की हरड़ ट्रे में] आयुर्वेद में हरड़ के सात प्रकार बताए गए हैं, पर बाजार में मुख्यतः दो रूप ज्यादा मिलते हैं।
मुख्य प्रकार जो आपको जानने चाहिए:
1. विजया: विंध्य क्षेत्र में मिलने वाली, सभी रोगों में उपयोगी, सबसे श्रेष्ठ।
2. रोहिणी: गोल आकार, व्रण रोपण यानी घाव भरने में उपयोगी।
3. पूतना: छोटी, गुठली वाली, लेप के लिए उपयोगी।
4. अमृता: गूदेदार, विरेचन यानी दस्त लाने के लिए सबसे अच्छी।
5. अभया: नेत्र रोगों में हितकारी मानी गई।
6. जीवन्ती: सुनहरे रंग की, शरीर में चमक लाने वाली।
7. चेतकी: तीन रेखा वाली, सबसे अधिक रेचक।
व्यावहारिक रूप में आप याद रखिए: छोटी हरड़ जिसे बाल हरड़ कहते हैं, वह ज्यादा तीक्ष्ण और कब्ज में तेज असर वाली मानी जाती है। बड़ी हरड़ पीली हरड़ जो सामान्यतः त्रिफला में उपयोग होती है, वह रोजाना संतुलित उपयोग के लिए उत्तम है।
 अगर आप पहली बार शुरू कर रहे हैं, तो बड़ी पीली हरड़ से शुरू करें। छोटी हरड़ ज्यादा तेज दस्त ला सकती है, इसलिए मात्रा कम रखनी पड़ती है।
आयुर्वेदिक गुण - रस, गुण, वीर्य, विपाक
आयुर्वेद हरड़ को बहुत अनोखा मानता है क्योंकि इसमें लवण रस को छोड़कर बाकी पांच रस मौजूद हैं। प्रधान रस कषाय यानी कसैला है।
गुण में यह लघु और रुक्ष है, मतलब हल्की और रूखी। वीर्य में उष्ण है, यानी तासीर गर्म। विपाक में मधुर है, इसलिए पचने के बाद भी यह शरीर को पोषण देती है। यही कारण है कि यह वात और कफ को शांत करती है, पर अधिक मात्रा में पित्त बढ़ा सकती है।
 इसीलिए आयुर्वेद कहता है, हरड़ को अनुपान के साथ लेना जरूरी है। वात के लिए घी के साथ, कफ के लिए शहद के साथ, पित्त के लिए मिश्री या गुड़ के साथ। अनुपान बदलते ही इसका असर बदल जाता है।
आयुर्वेद के जाने माने विद्वान डॉ. दयाराम आलोक के मतानुसार हरड़ केवल एक विरेचक औषधि नहीं है, बल्कि यह एक प्रज्ञा वर्धक और रसायन औषधि है। वे कहते हैं कि हरड़ का नियमित और विधिपूर्वक सेवन तीन स्तर पर काम करता है। पहले स्तर पर यह कोष्ठ शुद्धि करती है, दूसरे स्तर पर यह धातुओं में जमा आम को पचाती है और तीसरे स्तर पर यह मन और मस्तिष्क को हल्का करती है।
डॉ. आलोक जी विशेष रूप से जोर देते हैं कि हरड़ को कभी भी अकेले और अधिक मात्रा में नहीं लेना चाहिए। उनके अनुसार छोटी हरड़ का प्रयोग तीव्र शोधन के लिए और बड़ी हरड़ का प्रयोग दैनिक स्वास्थ्य रक्षा के लिए करना चाहिए। साथ ही वे कहते हैं कि हरड़ के साथ अनुपान का ज्ञान ही इसे माता के समान हितकारी बनाता है। शहद के साथ यह कफ को, घी के साथ वात को और मिश्री के साथ पित्त को संतुलित करती है। यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता है।
हरड़ के 22 प्रामाणिक फायदे
पाचन तंत्र के 6 फायदे
1. पुरानी कब्ज में सहायक: हरड़ आंतों में पानी खींचती है और आंतों की पेरिस्टाल्टिक मूवमेंट को बेहतर करती है। रात में लेने पर सुबह पेट हल्का लगता है। कई लोग जो रोजाना चाय या केमिकल वाली दवा लेते हैं, उनके लिए यह एक प्राकृतिक विकल्प के रूप में आयुर्वेद में बताया गया है।
2. गैस और अपच: उष्ण वीर्य होने से यह जठराग्नि यानी digestive fire को तेज करती है। खाना खाने के बाद भारीपन, डकार और गैस में छोटी मात्रा में हरड़ चूर्ण गुनगुने पानी से लेने की परम्परा है।
3. पेट की गर्मी और एसिडिटी के साथ संतुलन: अधिक मात्रा में यह पित्त बढ़ा सकती है, पर मिश्री के साथ छोटी मात्रा में लेने पर यह पेट की जलन को शांत करने में सहायक मानी गई है।
4. आंतों की सफाई - आम पाचन: आयुर्वेद में आम यानी अधपचा भोजन सभी रोगों की जड़ है। हरड़ आम को पचाने और मल के साथ बाहर निकालने में मदद करती है।
5. बवासीर में सहायक: कब्ज बवासीर का मुख्य कारण है। मल नरम होने से जोर कम लगता है। अभयारिष्ट जैसी आयुर्वेदिक दवा में हरड़ मुख्य घटक है।
6. पेट के कीड़े: इसके कषाय रस और कृमिघ्न गुण के कारण पेट के कृमि में पारंपरिक रूप से उपयोग किया जाता है।
डिटॉक्स, वजन और मेटाबॉलिज्म के 5 फायदे:
7. लिवर डिटॉक्स सपोर्ट: हरड़ लिवर के एंजाइम्स को संतुलित रखने और शरीर से अतिरिक्त पित्त निकालने में सहायक मानी गई है। त्रिफला के रूप में यह लिवर पर बोझ कम करती है।
8. वजन प्रबंधन में अप्रत्यक्ष मदद: यह कोई फैट बर्नर नहीं है। पर जब पाचन ठीक होता है, मल नियमित निकलता है और मेटाबॉलिज्म सुधरता है तो वजन घटाने की यात्रा आसान हो जाती है। गुनगुने पानी के साथ सुबह लेना इसीलिए बताया जाता है।
9. ब्लड शुगर सपोर्ट: कुछ पशु अध्ययन और छोटे मानव अध्ययन में हरड़ का अर्क ब्लड शुगर स्पाइक को कम करने में सहायक पाया गया है। यह इंसुलिन नहीं है, पर खाने के बाद शुगर संतुलन में मदद कर सकती है। डायबिटीज के मरीज डॉक्टर से पूछकर ही लें।
10. कोलेस्ट्रॉल और हृदय स्वास्थ्य: Chebulinic acid LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल के ऑक्सीडेशन को रोकने में मदद करता है। आयुर्वेद में हृदय को बल देने के लिए इसे अर्जुन के साथ भी दिया जाता है।
11. रक्त शुद्धि की पारंपरिक अवधारणा: त्वचा पर बार बार फोड़े फुंसी होना, आयुर्वेद में रक्त की अशुद्धि से जोड़ते हैं। हरड़ विरेचन द्वारा शरीर के अतिरिक्त दोषों को निकालने में सहायक मानी गई है।
इम्यूनिटी और श्वसन के 4 फायदे
12. इम्यूनिटी बूस्टर: इसमें मौजूद टैनिन और विटामिन C जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर करने में सहायक हैं। बदलते मौसम में त्रिफला के रूप में इसका उपयोग बहुत प्रचलित है।
13. खांसी, जुकाम और गले में खराश: शहद के साथ हरड़ चूर्ण को चाटने से कफ निकलने में मदद मिलती है। आयुर्वेद में इसे कासहर यानी खांसी को दूर करने वाला कहा गया है।
14. मुंह के छाले और मसूड़ों की सूजन: हरड़ के काढ़े से कुल्ला करने पर मुंह के छाले और मसूड़ों से खून आना कम होने में मदद मिलती है। इसका एंटी माइक्रोबियल गुण यहां काम करता है।
15. सूजन और जोड़ों का दर्द: इसके anti inflammatory गुण वात जन्य सूजन में सहायक माने गए हैं। घी के साथ लेने पर वात शमन ज्यादा अच्छा होता है।
त्वचा, बाल, आंखें और मस्तिष्क के 4 फायदे
16. त्वचा में निखार और मुहांसों में कमी: जब पेट साफ रहता है और रक्त शुद्धि की प्रक्रिया बेहतर होती है तो चेहरे पर मुहांसे कम होते हैं। हरड़ का लेप भी पारंपरिक रूप से घाव और सूजन पर लगाया जाता है।
17. बालों का झड़ना और समय से पहले सफेद होना: त्रिफला के तेल या त्रिफला चूर्ण का आंतरिक सेवन बालों की जड़ों को पोषण देने में सहायक माना गया है। यह प्रत्यक्ष हेयर ग्रोथ दवा नहीं है, पर पोषण सुधारती है।
18. आंखों की रोशनी: अभया यानी हरड़ को नेत्र हितकारी कहा गया है। त्रिफला को घी के साथ लेने और त्रिफला के पानी से आंखें धोने की परम्परा नेत्र ज्योति के लिए बताई गई है, पर आंखों में कुछ भी डालने से पहले वैद्य से पूछें।
19. याददाश्त और मानसिक थकान: आयुर्वेद में हरीतकी को मेध्य यानी बुद्धि बढ़ाने वाला कहा गया है। एंटीऑक्सीडेंट्स ब्रेन फॉग कम करने में मदद कर सकते हैं।
समग्र स्वास्थ्य के 3 फायदे
20. घाव भरने में सहायक: रोहिणी प्रकार की हरड़ को व्रण रोपण कहा गया है। इसका चूर्ण शहद में मिलाकर छोटे घावों पर पारंपरिक रूप से लगाया जाता है।
21. अनिद्रा और थकान: जब वात बढ़ा होता है तो नींद टूटती है और थकान रहती है। घी के साथ छोटी मात्रा में हरड़ वात को शांत कर गहरी नींद में सहायक मानी गई है।
22. त्रिफला के रूप में दीर्घकालीन रसायन: आंवला + बहेड़ा + हरड़ मिलकर त्रिफला बनाते हैं। अकेली हरड़ तेज है, पर त्रिफला संतुलित है। रोजाना संतुलन के लिए त्रिफला ज्यादा सुरक्षित विकल्प है।
कैसे लेनी है हरड़? सही मात्रा और सही अनुपान
सबसे जरूरी बात, हरड़ की मात्रा बहुत छोटी होती है। आम तौर पर वयस्कों के लिए हरड़ चूर्ण 1 से 3 ग्राम, दिन में एक या दो बार। छोटी हरड़ हो तो 1 ग्राम से शुरू करें। हमेशा कम मात्रा से शुरू करें।
अनुपान के अनुसार उपयोग
शहद के साथ: कफ, खांसी, वजन संतुलन और त्वचा के लिए। रात में सोने से 1 घंटा पहले।
घी के साथ: वात, जोड़ों का दर्द, अनिद्रा, मस्तिष्क के लिए। सुबह खाली पेट या रात में।
गुड़ या मिश्री के साथ: पित्त, जलन, मुंह के छालों में। दोपहर भोजन के बाद।
गुनगुने पानी के साथ: सामान्य कब्ज और डिटॉक्स के लिए सबसे सुरक्षित।
रूप के अनुसार
चूर्ण: सबसे सामान्य। 1-3 ग्राम।
त्रिफला चूर्ण: 3-5 ग्राम रात में गुनगुने पानी से। रोजाना उपयोग के लिए ज्यादा संतुलित।
अभयारिष्ट: तरल रूप। 15-20 ml भोजन के बाद पानी के साथ, वैद्य की सलाह से।
काढ़ा / कुल्ला: 5 ग्राम हरड़ को 200 ml पानी में उबालें, आधा रहने पर छानकर कुल्ला करें।
हमेशा कम से शुरू करें] पहले 3 दिन सिर्फ 1 ग्राम रात में गुनगुने पानी से लें। शरीर का रिएक्शन देखें। अगर ज्यादा दस्त या मरोड़ हो तो रोक दें और वैद्य से बात करें।
किन लोगों को हरड़ नहीं लेनी चाहिए और बड़ी गलतियां
किसे नहीं लेनी या डॉक्टर से पूछकर लेनी चाहिए:
1. गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाएं: विरेचक होने से गर्भाशय पर असर पड़ सकता है। बिल्कुल न लें।
2. छोटे बच्चे, बहुत कमजोर या डिहाइड्रेटेड व्यक्ति: दस्त ज्यादा हो सकता है।
3. जिनको पहले से ही ज्यादा दस्त, IBS-D या अल्सरेटिव कोलाइटिस है: बिना वैद्य सलाह के न लें।
4. पित्त प्रकृति वाले लोग जिन्हें बहुत जलन, नकसीर, हाथ पैर में जलन रहती हो: अकेली न लें, मिश्री या त्रिफला के रूप में वैद्य से पूछें।
5. जो ब्लड थिनर, डायबिटीज या BP की दवा ले रहे हैं: इंटरैक्शन हो सकता है, डॉक्टर को बताकर लें।
90% लोग जो गलती करते हैं: बड़ी गलती - वे रोजाना 5-10 ग्राम हरड़ चूर्ण बिना अनुपान के, ठंडे पानी से, महीनों तक लेते रहते हैं। इससे आंतें कमजोर, शरीर में रूखापन, नींद की कमी और पित्त बढ़ना हो सकता है। आयुर्वेद में किसी भी विरेचक औषधि को लगातार महीनों तक लेने की मनाही है। 15-20 दिन लें, 5-7 दिन गैप दें, फिर जरूरत हो तो दोबारा।
और दूसरी गलती, बाजार से बिना जांच का चूर्ण लेना। हमेशा GMP सर्टिफाइड, अच्छी कंपनी का लें और सूखी, साफ जगह पर रखें।
तो क्या हरड़ सच में 100 रोगों की दवा है?
 देखिए, हरड़ कोई जादू नहीं है। यह आपके पाचन, आपकी आंतों की सफाई और आपके शरीर की संतुलन प्रणाली को सहारा देती है। जब पाचन सुधरता है तो नींद, त्वचा, ऊर्जा और इम्यूनिटी चारों सुधरते हैं। इसी कारण पुराने ग्रंथों में इसे 100 रोगों में सहायक कहा गया।
अगर आपको कब्ज रहता है, तो छोटी मात्रा, सही अनुपान और सही समय पर शुरू करें। अगर कोई गंभीर बीमारी है, तो सेल्फ मेडिकेशन नहीं, वैद्य या डॉक्टर से मिलें।


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