20.11.19

किडनी फेल की हर्बल चिकित्सा केस रिपोर्ट सहित


                                        
किडनी शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में से एक है। किडनी रक्त में मौजूद पानी और व्यर्थ पदार्थो को अलग करने का काम करता है। इसके अलावा शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में भी सहायता प्रदान करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है। इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो शरीर की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है। लगातार दूषित पदार्थ ,दूषित जल पीने और नेफ़्रोंस के टूटने से किडनी के रोग उत्पन्न होते|इसके कारण किडनी शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। बदलती लाइफस्टाइल व काम के बढ़ते दबाव के कारण लोगों में जंकफूड व फास्ट फूड का सेवन ज्यादा करने लगे हैं। इसी वजह से लोगों की खाने की प्लेट से स्वस्थ व पौष्टिक आहार गायब होते जा रहें हैं। किडनी के रोगों को दूर करने के लिए कुछ प्राकृतिक उपायों की मदद लेना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। ऐसे ही कुछ खास उपाय लेकर आए हैं हम आपके लिए।
विटामिन कुछ खास तरह के विटामिन के सेवन से किडनी को स्वस्थ व मजबूत बनाया जा सकता है। यूं तो विटामिन पूरे शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं लेकिन कुछ खास तरह के विटामिन का सेवन किडनी को स्वस्थ रखने के लिए किया जाता है। विटामिन डी के सेवन से किडनी के रोगों के लक्षणों को कम किया जा सकता है। अगर आप हर रोज विटामिन बी6 का सेवन करें तो किडनी स्टोन की समस्या से बच सकते हैं या आप इस समस्या से ग्रस्त हैं तो बिना किसी डर इस विटामिन का सेवन कर सकते हैं। कुछ ही दिनों स्टोन की समस्या अपने आप खत्म हो जाएगी। इसके अलावा विटामिन सी के सेवन से किडनी को क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता है।
बेकिंग सोडा ब्रिटिश शोधर्कर्ताओं के मुताबिक किडनी के रोगों से बचने के लिए सोडियम बाइकार्बोनेट का सेवन फायदेमंद होता है। इसके सेवन से किडनी के रोगों की गति को कम किया जा सकता है। बेकिंग सोडा की मदद से रक्त में होने वाली एसिडिटी की समस्या खत्म हो जाती है जो कि किडनी की समस्याओं के मुख्य कारणों में से एक है।
एप्पल साइडर विनेगर इसका प्रयोग कई शारीरिक जरूरतों के लिए किया जाता है। इसके अलावा किडनी संबंधी समस्याओं के बारे में भी काफी कारगर साबित होता है। इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरियल तत्व शरीर को बैक्टीरियल इंफेक्शन से बचाते हैं जिसमें किडनी भी शामिल है। एप्पल साइडर विनेगर प्रयोग से किडनी में मौजूद स्टोन धीरे-धीरे अपने आप खत्म हो जाता है। इसमें मूत्रवर्धक तत्व होते हैं जो किडनी से व्यर्थ पदार्थों को बाहर निकालते हैं और किडनी को स्वस्थ रखते हैं।
सब्जियों का रस किडनी की समस्या होने पर गाजर, खीरा, पत्तागोभी तथा लौकी के रस पीना चाहिए। इससे किडनी के रोगों से उबरने में मदद मिलती है और किडनी स्वस्थ रहती है। इसके अलावा तरबूज तथा आलू का रस भी गुर्दे के रोग को ठीक करने के लिए सही होता है इसलिए पीड़ित रोगी को इसके रस का सेवन सुबह शाम करना चाहिए।
मुनक्का का पानी व्यक्ति को रात के समय में सोते वक्त कुछ मुनक्का को पानी में भिगोने के लिए रखना चाहिए तथा सुबह के समय में मुनक्का पानी से निकाल कर, इस पानी को पीना चाहिए। ऐसा कुछ दिनों तक लगातार करने से गुर्दे का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
पानी ज्यादा पीएं गुर्दे के रोगों से बचने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में पानी पीते रहें। इससे किडनी में मौजूद व्यर्थ पदार्थ यूरीन के जरिए बाहर निकल जाएगें और आप किडनी के रोगों से बचे रहेंगे। चाहें तों पानी में नींबू के रस को निचोड़ कर भी पी सकते हैं इससे शरीर को विटामिन सी व पानी दोनों साथ मिलेगा।
नमक की मात्रा कम लें किडनी की समस्या से ग्रस्त लोगों को अपने आहार पर खास ध्यान देना चाहिए। खाने में नमक व प्रोटीन की मात्रा कम रखनी चाहिए जिससे किडनी पर कम दबाव पड़ता है। इसके अलावा फासफोरस और पौटेशियम युक्त आहार से भी दूर ही रहना चाहिए।

विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -





इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-
रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl
हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl
जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 
सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 
 केस रिपोर्ट 2-
रोगी का नाम - Awdhesh 
निवासी - कानपुर 
ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट
दिनांक - 26/4/2016
Urea- 55.14   mg/dl
creatinine-13.5   mg/dl 
यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -
creatinine 1.34 mg/dl
urea 22  mg/dl

18.11.19

ग्रीन टी सेहत के लिए वरदान तुल्य



ग्रीन टी में अधिक मात्रा में पौषक तत्व पाये जाते है जो हमारे शरीर के प्रतिरक्षातन्त्र को ताकतवर बनाते है| इससे हमारा शरीर विभिन्न तरह के रोगों से लड़ने लिये मजबूत हो जाता है, ग्रीन टी को मॉर्निंग ड्रिंक की तरह उपयोग करने के अलावा इसे हम अलग-अलग के तरह घरेलू नुस्खों और सौंदर्य संबंधी नुस्खों में भी इस्तेमाल करते है--आज हम भी आपसे घर पर ग्रीन टी बनाने की विधि बता रहे हैं जिससे आप भी इसे आसानी से बनाकर तैयार कर सकें तो आईये आज हम स्वादिष्ट और पौष्टिक ग्रीन टी (Green Tea) बनायेंगें-सामग्री :-
ग्रीन टी की पत्ती एक चम्मच या 5 ग्राम
पानी डेढ कप पावडर 1-2 चुटकी भर
शकर या शहद एक चम्मच या स्वाद के मुताबिक
ईलायची

पेट मे गेस बनने के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार 

विधि :-
ग्रीन टी बनाने के लिये सबसे पहले चाय बनाने की एक तपेली में पानी डालकर गरम करने के लिये गैस पर रखें, जब पानी में उबाल आ जाए तब उबलते हुये पानी में ग्रीन टी पाउडर डालकर गैस बंद दें और तपेली को
एक प्लेट से ढक दें जिससे ग्रीन टी पाउडर फ्लेवर पानी में अच्छी तरह से आ जाये। करीब 2 मिनट के बाद ग्रीन टी को एक छन्नी की सहायता से एक कप में छानकर निकाल लें और अब इस छनी हुई चाय में अपने स्वाद के अनुसार चीनी या फिर शहद और इलाइची पाउडर को डालकर चम्मच से अच्छी तरह मिला लें । स्वादिष्ट और पौष्टिक ग्रीन टी बनकर तैयार गयी है, आप ग्रीन टी को हल्का गुनगुना या फिर ठंडा करके सर्विंग कप में निकालकर सर्व करें। ग्रीन टी एंटी ऑक्सीडेंट की तरह काम करती है|

गुर्दों की सेहत   के प्रति रहें सतर्क

व्यायाम से भी आपको लग रहा है कि आपका वज़न कम नहीं हो रहा, तो आप दिन में ग्रीन टी पीना शुरू करें। ग्रीन टी में एंटी-ऑक्सीडेंट्स होने की वजह से यह शरीर की चर्बी को खत्म करती है। एक अध्ययन के अनुसार, ग्रीन टी शरीर के वज़न को स्थिर रखती है। ग्रीन टी सिर्फ चर्बी ही कम नहीं होती बल्कि मेटाबॉल्ज़िम भी सुधरता है और पाचक संस्थान की परेशानियां भी खत्म होती हैं। यह मोटापा कम करने के लिये काफी सहायक सिद्ध होती है, इसलिये ग्रीन टी को रोजाना कम से कम एक बार अपनी दिनचर्या में जरूर शामिल करें|

धनिया के  चोक़ाने वाले फ़ायदे जानकर हैरान रह जायेंगे

फ्रेश तैयार हरी चाय शरीर के लिए अच्छी और स्वस्थ्य वर्धक होती है। आप इसे या तो गर्म या ठंडा कर के पी सकते हैं, लेकिन इस बात का यकीन हो कि चाय एक घंटे से अधिक समय की पुरानी ना हो। ज्यादा खौलती गर्म चाय गले के कैंसर को आमंत्रित कर सकती है, तो बेहद गर्म चाय भी ना पिएं। यदि आप चाय को लंबे समय के लिए स्टोर कर के रखेंगे तो, इसके एंटीऑक्सीडेंट्स और विटामिन्स खत्म हो जाएँगे| इसके अलावा, इसमें मौजूद जीवाणुरोधी गुण भी समय के साथ कम हो जाते हैं। वास्तव में, अगर चाय अधिक देर के लिये रखी रही तो यह बैक्टीरिया को शरण देना शुरू कर देगी। इसलिये हमेशा ताजी ग्रीन टी ही पिएं|

दालचीनी के अद्भुत फायदे

*ग्रीन टी को भोजन से एक घंटा पहले पीने से वजन कम होता है। इसे पीने से भूख देर से लगती है दरअसल यह हमारी भूख को नियंत्रित करती है। ग्रीन टी को सुबह-सुबह खाली पेट बिल्‍कुल भी नहीं पीनी चाहिये|
दवाई के साथ ग्रीन टी लेना वर्जित है | दवाई को हमेशा पानी के साथ ही लेना चाहिये|
*ग्रीन टी में गुलाब जल मिलाने से इसमें मौजूद एंटी एजिंग और एंटी कार्सिनोजेनिक (कैंसर विरोधी तत्‍व) लाभ डबल हो जाते हैं। और शरीर में जमा अतिरिक्त टॉक्सिन निकल जाते है। इसे बनाने के लिए ग्रीन टी में एक बड़ा चम्‍मच गुलाब जल का मिलाये। 

स्तनों का दूध बढ़ाने के उपाय 

*ज्यादा  तेज ग्रीन टी में कैफीन और पोलीफिनॉल की मात्रा बहुत अधिक  होती है। ग्रीन टी में इन सब सामग्री से शरीर पर खराब प्रभाव पड़ता है। तेज और कड़वी ग्रीन टी पीने से पेट की खराबी, अनिद्रा और चक्‍कर आने जैसी प्राबलेंम  पैदा हो सकती है|
*ज्यादा  चाय नुक्‍सानदायक हो सकती है। इसी तरह से अगर आप रोजाना 2-3 कप से ज्‍यादा ग्रीन टी पिएंगे तो यह नुक्‍सान करेगी। क्‍योंकि इसमें कैफीन होती है इसलिये तीन कप से ज्‍यादा चाय ना पिएं|
ग्रीन टी सेवन करने के लाभ 
*ग्रीन टी (Green Tea) मृत्यु दर को कम करने में सहायक होती हैं -
*शोध द्वारा ज्ञात हुआ कि ग्रीन टी (Green Tea) पीने वालों को मृत्यु का खतरा अन्य की अपेक्षा कम रहता हैं |*ग्रीन टी (Green Tea) से हृदय रोगियों को राहत मिलती हैं इससे हार्ट अटैक का खतरा कम होता हैं | और आज के समय में हार्ट अटैक से ही अधिक मृत्यु होती हैं जिस पर उम्र का कोई बंधन नहीं रह गया हैं | इस तरह ग्रीन टी मृत्यु दर को कम करती हैं |

गोखरू के औषधीय गुण और प्रयोग


ग्रीन टी कैंसर में भी फायदेमंद होती हैं -
*एक शौध के अनुसार ग्रीन टी से ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी का खतरा 25 % तक कम होता हैं |यह कैंसर विषाणुओं को मारता हैं और शरीर के लिए आवश्यक तत्व को शरीर में बनाये रखता हैं |
*ग्रीन टी से वजन कम होता हैं :
ग्रीन टी से शरीर का मेटाबोलिज्म बढ़ता हैं जिससे उपापचय की क्रिया संतुलित होती हैं और शरीर का एक्स्ट्रा वसा कम होता हैं | और इससे वजन कम होता हैं और साथ ही उर्जा मिलती हैं |
ग्रीन टी मधुमेह के रोगियों के लिए भी फायदेमंद हैं :ग्रीन टी के सेवन से मधुमेह रोगी के रक्त में शर्करा का स्तर कम होता हैं | मधुमेह रोगी जैसे ही भोजन करता हैं | उसके शर्करा का स्तर बढ़ता हैं इसी लेवल को ग्रीन टी संतुलित करने में सहायक होती हैं |

ग्रीन टी से रक्त का कॉलेस्ट्रोल कम होता हैं :
ग्रीन टी से शरीर का हानिकारक कॉलेस्ट्रोल कम होता हैं और लाभकारी कॉलेस्ट्रोल का लेवल बनाये रखता हैं |ग्रीन टी ब्लडप्रेशर के रोगियों के लिए फायदेमंद हैं :
ग्रीन टी के सेवन से शरीर का ब्लड प्रेशर नियंत्रित रहता हैं क्यूंकि यह कॉलेस्ट्रोल के लेवल को बनाये रखता हैं |अल्जाईमर एवम पार्किन्सन जैसे रोगियों के लिए ग्रीन टी फायदेमंद होती हैं - ग्रीन टी के सेवन से अल्जाईमर एवम पार्किन्सन जैसी बीमारियाँ धीरे-धीरे बढ़ती हैं |ग्रीन टी ब्रेन सेल्स को बचाती हैं |और डैमेज सेल्स को रिकवर करते हैं |

ग्रीन टी दांत के लिए भी फायदेमंद होती हैं -
ग्रीन टी में केफीन होता हैं जो दांतों में लगे कीटाणुओं को मारता हैं, बेक्टेरिया को कम करता हैं | इससे दांत सुरक्षित होते हैं |ग्रीन टी (Green Tea)के सेवन से मानसिक शांति मिलती हैं :
ग्रीन टी (Green Tea)में थेनाइन होता हैं जिससे एमिनो एसिड बनता हैं जो शरीर में ताजगी बनाये रखता हैं इससे थकावट दूर होती हैं और मानसिक शांति मिलती हैं |
ग्रीन टी (Green Tea)से स्किन की केयर होती हैं : ग्रीन टी में एंटीएजिंग तत्व होते हैं जिससे चेहरे की झुर्रियां कम होती हैं | और चेहरे पर चमक और ताजगी बनी रहती हैं |इससे सन बर्न ने भी राहत मिलती हैं | स्किन पर सूर्य की तेज किरणों का प्रभाव नहीं पड़ता |
ग्रीन टी में केफीन की मात्रा अधिक होती हैं अतः इसका अत्यधिक सेवन हानिकारक हो सकता हैं | केफीन की अधिक मात्रा मेटाबोलिज्म बढाती हैं जिससे कई लाभ मिलते हैं जो उपर दिए गये हैं लेकिन अधिक मात्रा में केफीन भी शरीर के लिए गलत हो सकता हैं | खासतौर पर गर्भवती महिला या जो महिलायें गर्भ धारण करना चाहती हैं उनके लिए ग्रीन टी सही नहीं हैं कारण इससे आयरन और फोलिक एसिड कम होता हैं |ग्रीन टी को अदरक, नींबू एवम तुलसी के साथ लेना और भी फायदेमंद होता हैं | ऐसा नहीं हैं कि ग्रीन टी में केफीन होने से इसके सारे गुण अवगुण हो जाए लेकिन किसी भी चीज की अधिकता नुकसान का रूप ले लेती हैं |गर्भावस्था में हरी चाय के फायदे
ग्रीन चाय गर्भावस्था के दौरान शरीर में लौह, कैल्शियम और मैग्नेशियम की मात्रा की पूर्ती करती है।
आमतौर पर रात को सोते समय और भूख लगने पर कैफीन नहीं पीना चाहिये। रात को पीने से यह भूख बढ़ाता है और नींद भी ठीक से नहीं आती लेकिन इसके विपरीत गर्भावस्था के दौरान भी रात में हरी चाय पी सकते हैं, क्योंकि इसमें कैफीन की मात्रा कम होती है।


वैवाहिक जीवन की मायूसी दूर  करें इन जबर्दस्त  नुस्खों से

हाल में हुए शोधों से पता चला है कि हरी चाय बहुत सी कैंसर जैसी भयावह बीमारियों से भी बचाती हैं।
गर्भावस्था के दौरान हरी चाय रोगों से लड़ने का ना सिर्फ एक अच्छा उपाय है बल्कि इसमें सम्भावित रोगों से लड़ने की शक्ति भी है। यानी गर्भावस्था के दौरान होने वाली किसी भी संक्रमित बीमारी से बचाने का काम हरी चाय करती है।
गर्भावस्था के दौरान दांतों और मसूड़ों की कई तरह की समस्याएं हो जाती हैं और कई अध्ययनों के अनुसार दांतों के लिए ग्रीन-टी काफी लाभदायक है।गर्भावस्था के दौरान तरोताजा महसूस करवाने और चुस्त-दुरूस्त रखने में हरी चाय फायदेमंद है|


17.11.19

रतनजोत के फायदे


    


  रतनजोत का उपयोग बालों को काला करने के लिए किया जाता है | परन्तु इसका उपयोग मसाले के रूप में भी किया जाता है | रतनजोत को और भी कई नामों से जाना जाता है | जैसे :- लालजड़ी और दामिनी बालछड | अंगेजी भाषा में इस पौधे को onosma भी कहा जाता है | रतनजोत अधिकतर हिमालय के भागों में पाया जाता है | इसका उपयोग आँखों की रौशनी और बालो को काला करने के लिए किया जाता है | तो आइए जानते है कि रतनजोत को कैसे बालों के लिए प्रयोग करें | *सबसे पहले महंदी का पेस्ट बना लें | इसके बाद इस पेस्ट में रतनजोत मिला लें और गर्म कर लें | जब यह गर्म हो जाये तो ठंडा होने के लिए रख दें | जब यह ठंडा हो जाये तो इसे बालों में लगा लें और कम से कम 15 से 20 मिनट के लिए छोड़ दें | इसके बाद पानी से सिर धो लें | जिस तेल का आप प्रयोग करते है | उस तेल में रतनजोत के थोड़े से टुकड़े डालकर अच्छी तरह से मिलाएं | इसके मिलाने से तेल का रंग सुंदर तो होता है | इस तेल को बालों में लगाने से बाल स्वस्थ और काले हो जाते है | इसके साथ ही साथ इस तेल का प्रयोग करने से मष्तिष्क की ताकत भी बढती है | *रतनजोत को थोडा सा घिस लें | इस घिसे हुए रतनजोत को अपने माथे पे लगायें | इस उपचार को करने से डिप्रेशन नही होता और मानसिक क्षमता बढती है | *रतनजोत को बारीक़ पीस लें | इसे तेल में डाल दें | इस तैयार तेल से अपने शरीर की मालिश करें | ऐसा करने से स्किन का रुखापन दूर हो जाता है 
 रतनजोत के और भी अन्य उपाय निम्नलिखित है :-  रतनजोत के पौधे की जड़ को पीसकर बारीक कर लें | जिन लोगों को मिर्गी या दौरे पड़ते हों ,उन्हें इस बारीक़ चूर्ण की एक ग्राम की मात्रा को सुबह के समय और शाम के समय खिलाएं | इस उपचार को लगातार करने से मिर्गी और दौरे की समस्या दूर हो जाती है  |यदि आपको स्किन की बीमारी है तो रतनजोत के पौधे की जड़ को पीसकर पावडर बना लें | इस पावडर को रोजाना सुबह और शाम लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सेवन करें | इस उपचार को करने से स्किन की प्रोब्लम दूर हो जाती है |
  रतनजोत के पौधे की पत्तियों की चाय बनाकर पीने से दिल से जुडी हुई बीमारी नही होती | · रतनजोत की ताज़ी पत्तियों का सेवन करने से खून का शुद्धिकरण होता है | इसके आलावा रतनजोत का उपयोग से स्किन पर होने वाले दाद , खुजली से छुटकारा मिल जाता है | जिसे पथरी की समस्या है , उसे नियमित रूप से रतनजोत के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीना चाहिए | इस उपचार को करने से गुर्दे की पथरी ठीक हो जाती है |

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*


     रतनजोत , एक किलोग्राम सरसों का तेल , मेंहदी के पत्ते , जलभांगर के पत्ते , और आम की गुठलियों को आपस में मिलाकर सरसों के तेल को छोडकर कूट लें | (लेकिन ध्यान रहे कि इन सभी पदार्थों की लगभग 100 – 100 ग्राम की मात्रा ही लेनी है | ) जब यह कूट जाये तो इसे निचोड़ लें | निचोड़ने के बाद इसे सरसों के तेल में इतना उबाल ले कि इसका पानी खत्म हो जाये और केवल तेल बचे | अब इस तेल को छानकर अलग कर लें | इस तरह से यह एक औषधि तैयार है | इस तेल को रोजाना सिर पर लगाने से बाल काले हो जाते है | इस तेल को लगाने के साथ ही साथ कम से कम 250 ग्राम दूध का सेवन करना चाहिए |यह उपचार बेहद कारगर है | · आंवले को पीसकर बारीक़ चूर्ण बना लें | इस चूर्ण में निम्बू का रस और रतनजोत मिलाकर के मिश्रण बनाएं | इस तैयार मिश्रण को बालों में लेप की तरह लगा लें | इस लेप को लगभग १५ से 20 मिनट तक रखें और सिर धो लें | ऐसा करने से बाल काले हो जाते है | आंवला और लौह चूर्ण को आपस में मिलाकर पानी के साथ पीस लें | इसे अपने बालो में लगा लें और कुछ समय बाद सिर धो लें | ऐसा करने से सफेद बाल काले हो जाते है |
  100 ग्राम दही ,100 ग्राम हल्दी , पीसी हुई एक ग्राम काली मिर्च और रतनजोत लें | अब इन सभी को आपस में मिलाकर एक मिश्रण बनाएं | इस मिश्रण को सिर में कुछ देर तक लगाकर छोड़ दें और हल्के गर्म पानी से सिर धो लें | इस तरह के उपचार को एक सप्ताह में कम से कम एक बार करें | इससे आपके बालों का झड़ना बंद हो जायेगा और बाल स्वस्थ और काले हो जायेंगे |

हीमोग्लोबिन बढ़ाने के घरेलू उपाय



 हीमोग्‍लोबिन लाल रक्‍त कोशिकाओं में मौजूद लौह समृद्ध प्रोटीन है जो पूरे शरीर में आक्‍सीजन पहुंचाने का काम करता है। वयस्‍क पुरुषों के शरीर में 14 से 18 ग्राम / डीएल और वयस्‍क महिलाओं के लिए 12 से 16 ग्राम / डीएल तक हीमोग्‍लोबिन को बनाए रखने की आवश्‍यकता होती है। अगर आपका शरीर जरूरत के अनुसार लौह तत्व यानी आयरन नहीं ले रहा है तो यह आपकी पूरी सेहत पर असर डालता है. इससे एनिमिया (Anaemia) की शिकायत हो सकती है. एनिमिया के लक्षणों (Anaemia Symptoms) में आलस, चक्कर आना, सिरदर्द रहना वगैरह शामिल हैं. आइए जाने हीमोग्‍लोबिन कैसे बढ़ाएं और खून बढ़ाने के लिए क्या खाना चाहिए। हीमोग्लोबिन बढ़ाने के घरेलू उपाय
जब हमारे शरीर में फोलिक एसिड की कमी हो जाती है तो शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा भी कम हो जाती है. इसकी कमी को पूरा करने के लिए हमें खाने में दाल, मटर, बंदगोभी, बादाम और केले का अवश्य इस्तेमाल करना चाहिए.
अमरुद, पपीता, संतरा और अंगूर विटामिन सी की कमी को पूरा करते हैं. विटामिन सी की कमी पूरी होते ही आपके हीमोग्लोबिन की कमी भी पूरी हो जाती है.
किशमिश, बादाम, मांस और मछली आयरन के सबसे प्रमुख स्रोत होते हैं. इसके सेवन से हम जल्द ही खून की कमी को दूर कर सकते हैं.
मेथी, पालक, चावल, दाल, बाजरा, मकई आदि जैसे खाद्य पदार्थों का इस्तेमाल करके हम हीमोग्लोबिन की कमी को दूर कर सकते हैं.
अनार- गर्भावस्‍था के दौरान महिलाओं में खूनी की कमी अक्‍सर देखी जाती है जो कि सीधे ही हीमोग्‍लोबिन की कमी को बताता है। इस स्थिति में महिलाओं के शरीर में कैल्शियम और आयरन दोनो की कमी होती है। लेकिन आप अनार का सेवन कर इस समस्‍या का समाधान कर सकते हैं। अनार के पौष्टिक तत्‍व रक्‍त में हीमोग्‍लोबिन को बढ़ावा देने में मदद करते है। एक मध्‍यम आकार के अनार को आप अपने भोजन के साथ शामिल कर सकते हैं या फिर आप इसे अपने नाश्‍ते के रूप में भी उपयोग कर सकते हैं। आप अपने नियमित दूध के गिलास में अनार (Pomegranate) के सूखे दाने के 2 चम्‍मच पाउडर को मिलाकर भी उपयोग कर सकते हैं। यह आपके शरीर में हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने में मदद करता है।  सेब- प्रतिदिन यदि एक सेव का सेवन किया जाता है तो यह आपके शरीर में हीमोग्‍लोबिन की उचित मात्रा को बनाए रखने में मदद करता है। शरीर में हीमोग्‍लोबिन बढ़ाने के लिए आयरन की आवश्‍यकता होती है जो कि सेब (Apple) में पर्याप्‍त मात्रा में उपलब्‍ध रहता है। यदि संभव हो पाये तो आपको प्रतिदिन 1 हरे सेब का उपभोग करना चाहिए। आप सेब के जूस के साथ चुकंदर के जूस का भी उपयोग कर सकते हैं। इस मिश्रण को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आप इसमें अदरक और नींबू के रस को मिलाकर भी सेवन कर सकते हैं। यह ध्‍यान रखें कि हीमोग्‍लोबिन आपके स्‍वस्‍थ्‍य शरीर के लिए बहुत ही आवश्‍यक है। इसलिए शरीर में हीमोग्‍लोबिन बढ़ाने का हर संभव प्रयास जरूरी है। 
खाएं फलियां- अगर आप मांसाहार (non-veg) का उपयोग नहीं करते हैं तो आपको अपने भोजन में दूसरे लौह तत्‍व से भरपूर भोजन को शामिल करना आवश्‍यक है। इसके लिए आपके पास बहुत सारे विकल्‍प हैं जिनमें फलियां भी शामिल हैं जो आपके शरीर के लिए बहुत ही फायदेमंद होते हैं। आप सोयाबीन, राजमा, चने, मटर मूंगफली और जितनी भी फलियां होती हैं उनका सेवन कर सकते हैं। इनमें आपके शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य रखने वाले सभी पोषक तत्‍व शामिल होते हैं। जैसे यदि सोयाबीन की बात की जाए तो 100 ग्राम सोयाबीन में 15.7 मिलीग्राम आयरन, 375 मिलीग्राम फोलेट और 6 मिलीग्राम विटामिन सी होता है।
चुकंदर- चुकंदर भी एक ऐसा खाद्य पदार्थ है जिसमें आयरन की भरपूर मात्रा होती है साथ ही इसमें फोलिक एसिड के साथ फाइबर और पोटेशियम भी भरपूर मात्रा में होते हैं जो हमारे शरीर के लिए अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण होते हैं। ये पोषक तत्‍व हमारे शरीर में हीमोग्‍लोबिन की मात्रा को बढ़ाने में मदद करते हैं। आप चुकंदर का उपयोग अपनी सलाद या विभिन्‍न प्रकार के व्‍यंजनों में कर सकते हैं। आप चाहें तो इसका जूस (Beet root juice) भी ले सकते हैं जो आपके शरीर में लाल रक्‍तकोशिकाओं के उत्‍पादन और उनकी संख्‍या को बढ़ाने में मदद कर सकता है। 
आयरन रिच फूड्स- कई अध्‍ययनों से यह साबित हो चुका है कि लोहे की कमी (Iron deficiency) के कारण ही होमोग्‍लोबिन के स्‍तर में कमी आती है। हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने के लिए आयरन एक महत्‍वपूर्ण तत्‍व है। आप अपने और अपने बच्‍चों में खून की कमी को दूर करने के लिए कुछ अच्‍छे लौह आधारित खाद्य पदार्थ जैसे कि मांस, झींगा, टोफू, पालक, बादाम, शतावरी (Asparagus) आदि का उपयोग कर सकते हैं। इनके अलावा आप लौह पूरक भी ले सकते हैं। इनका उचित मात्रा में सेवन करने के लिए आप अपने डॉक्‍टर से सलाह लें, क्‍योंकि जरूरत से ज्‍यादा लोहे की मात्रा (Excess iron) आपके शरीर के लिए नुकसान दायक भी हो सकती है। खाएं स्‍टार्च और अनाज- आप अपने शरीर में हीमोग्‍लोबिन स्‍तर बढ़ाने के पौष्टिक खाद्य पदार्थों का चुनाव कर सकते हैं जिनमें चोकर युक्‍त चावल (Rice bran), गेंहू और जई जो कि स्‍टार्च के अच्‍छे स्रोत माने जाते हैं। इनके अलावा आप पूरे अनाजों (Whole grains) का भी सेवन कर सकते हैं जो आपके शरीर में खून बढ़ाने में सहायक होते हैं इनमें आप सभी प्रकार की दालों को शामिल कर सकते हैं। शरीर में लोहे की कमी को दूर करने के लिए आप ब्राउन राइस (Brown rice) का भी उपयोग कर सकते हैं।  सब्जियां – शारीरिक स्‍वास्‍थ्‍य (Physical health) को बनाए रखने और शरीर में हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने के लिए सब्जियों का चुनाव करना बहुत ही आसान है। क्‍योंकि लगभग सभी सब्जियों में पर्याप्‍त मात्रा में पोषक तत्‍व मौजूद रहते हैं। शरीर में खून बढ़ाने के लिए आप पालक, ब्रोकोली (Broccoli), आलू, समुद्री शैवाल और चुकंदर आदि का उपयोग कर सकते हैं जो आसानी से उपलब्‍ध भी हो जाते हैं। शरीर में हीमोग्‍लोबिन बढ़ाने के लिए पालक सबसे अच्‍छा विकल्‍प होता है क्‍योंकि इसमें आयरन (Iron) बहुत ही अच्‍छी मात्रा में होता है। 
   जड़ी बूटियां – कुछ विशेष प्रकार की जड़ी-बूटियों का उपयोग करके भी शरीर में हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाया जा सकता है। यद्यपि कुछ मसाले जैसे अजवायन, पुदीना और जीरा आदि भी आयरन के अच्‍छे स्रोत माने जाते हैं जिनका नियमित सेवन करने से आपके शरीर में लोहे की दैनिक जरूरत को पूरा किया जा सकता है। इसके अलावा भी आप कुछ अन्‍य जड़ी बूटियों (Herbs) का इस्‍तेमाल कर सकते हैं जो आपके लिए बहुत ही फायदेमंद हो सकते हैं जैसे कि शतावरी या बिच्छू बूटी (Nettle Leaf) आदि। ये जड़ी बूटियां आपके हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने में मदद करती हैं। नेटल (बिच्छू बूटी) के पत्‍तों में लोहा, विटामिन बी और सी के साथ बहुत से विटामिन होते हैं जो लाल रक्‍त कोशिकाओं को बढ़ाने में मदद करते हैं। 
व्‍यायाम करें – आप अपनी दिनचर्या में कुछ प्रकार के व्‍यायाम शामिल करें। जब आप व्‍यायाम करते हैं, तो आपके पूरे शरीर में ऑक्‍सीजन की ज्‍यादा आवश्‍यकता होती है जिसे पूरा करने के लिए शरीर द्वारा अधिक लाल रक्‍त कोशिकाओं का उत्‍पादन किया जाता है। आप व्‍यायाम अपके शरीर को तंदुस्‍त और क्रियाशील बनाए रखने में मदद करता है। इसलिए अपने शरीर मे हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को बढ़ाने के लिए आप नियमित व्‍यायाम शुरु करें। 
आयरन अवरोधकों से बचें- यदि आपके शरीर में हीमोग्‍लोबिन की कमी है तो आपको ऐसे खाद्य पदार्थों से बचना चाहिए जो आपके शरीर में लोहे के अवशोषण को रोकने का काम करते हैं। यदि आप ऐसे खाद्य पदार्थों का नियमित रूप से सेवन करते हैं तो यह आपके शरीर में हीमोग्‍लोबिन के स्‍तर को कम कर सकता है। ऐसे कुछ खाद्य पदार्थों में शामिल हैं : कॉफी चाय शीतल कार्बनिक पेये जैसे कोला आदि वाइन बीयर आदि .

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

मूत्र चिकित्सा (यूरिन थेरेपी) से रोग निवारण




परिचय-
मूत्र चिकित्सा के बारे मे जहा बाइबिल मे जिक्र है वही आयुर्वेद मे इसका विस्तृत विवरण और रोगो का निदान है आयुर्वेद मे 9 प्रकार के मूत्र के बारे मे जिक्र है वर्तमान मे गोमूत्र का प्रचलन बड़ी तेजी से बढने का मुख्य कारण इससे उन रोगो का निदान भी हो रहा है जिनका प्रचलित किसी भी पद्धति मे इलाज नही है ,परन्तु यह लेख स्वमूत्र चिकित्सा के बारे मे और अनुभव के बाद लिखा हुआ है सामान्यतः स्वमूत्र चिकित्सा का सिद्धांत ,प्राकृतिक भोजन मे ही पूर्ण स्वास्थ्य के तत्व होते है के आधार पर है जैसे जैसे शरीर की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे शारारिक क्षमता घटने के कारण स्वास्थ्य के मुख्य तत्व मूत्र मे विसर्जित होने लगते है यदि इन्ही तत्वो को पुनः लिया जाए तो शरीर स्वस्थ्य होने लगता है चिकित्सा मे स्वमूत्र का मुख्य तीन प्रकार से प्रयोग किया जाता है

कालमेघ के उपयोग ,फायदे

1.बाह्य रूप से -इसमे शरीर पर मालिश इत्यादि है
2.अतः करण रूप से -इसमे स्वमूत्र को पिया जाता है
3.गंध द्वारा- स्वमूत्र की गंध को सुंघकर चिकित्सा की जाती है



स्वमूत्र का प्रयोग -
अतः करण रूप मे इसका प्रयोग जहा इसको तुरंत विसर्जित वाले का सेवन किया जाता है वही बाह्य रूप मे इसका प्रयोग तुरंत विसर्जित से लेकर 9 दिन तक पुराने वाले का प्रयोग किया जाता है इसमे प्रतिदिन एक बोतल भरतेहुए 9 बोतल भर लेते हैं 10 वे दिन ,पहली दिन वाली बोतल अर्थात 9 दिन पुराने मूत्र से शरीर पर चर्म रोग ,अन्य दर्दों वाले स्थानो पर मालिश लगातार 15-20 दिन की जाए तो चर्म व अन्य रोग दूर हो जाते हैं वही तुरंत विसर्जित वाले मूत्र को आंख,कान दर्द, जैसे अनेक रोगो मे इसकी बूंद डालकर इसका प्रयोग किया जा सकता है 

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

यदि बॉल झडते है तब इससे इनको धोया जाए तो उनका झड़ना बंद हो जाता है परहेज के नाम पर मात्र साबुन शेम्पू का प्रयोग नही करना है खाने के नाम पर मात्र सात्विक भोजन करना है ये तो मात्र कुछ उदहारण है मात्र उपरोक्त सरल विधि विधान से स्वमूत्र चिकित्सा द्वारा लगभग सभी रोगों का इलाज है इस पद्धति मे पहले रोग अपने चरम अवस्था मे आकर धीमे-धीमे उसका शमन होने लगता है यदि सामान्य अवस्था मे स्वमूत्र चिकित्सा को किया जाए तो तो शरीर उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त करता जाता है तब स्वमूत्र को जिसे हम सबसे घ्रृणित व त्याज्य मानते है वह तो हमारी सभी रोगो की रामवाण दवा है अर्थात एक अनार( स्वमूत्र),सौ बीमार की दवा है यह स्वमूत्र चिकित्सा मानव के लिए ही नही ,पशुयों के लिए भी उतनी उपयोगी है जितनी मानव के लिए .वैसे दवा दवे(रहस्य) की होती है और प्राण के मूल्य पर ,औषधि का हर रूप स्वीकार होता है तब क्या समाज मे स्वमूत्र का औषधि रूप प्रचलित हो पाएगा ? जिसको कभी हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री मोरार जी देसाई ने जीवन जल का नाम दिया था अर्थात कलियुग का गंगाजल.

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*


स्वमूत्र चिकित्सा का अर्थ है स्वयं के मूत्र द्वारा विभिन्न बीमारियों का उपचार। इस पद्धति में न तो रोगी की नाड़ी देखने की आवश्यकता है, न एक्स-रे लेने की। न थर्मामीटर लगाना है, न सूई की जरूरत। न दवा और पथ्य का सिरदर्द है और न धन या समय खर्च करने की अनिवार्यता। इसमें स्वमूत्र ही निदानकर्ता, चिकित्सक एवं दवा है। रोगी स्वयं बिना खर्च और बिना किसी परिश्रम के स्वमूत्र सेवन कर रोगमुक्त हो सकता है।
 स्वमूत्र चिकित्सा के माध्यम से कई असाध्य बीमारियों का उपचार भी संभव है।स्वमूत्र चिकित्सा निम्न छह प्रकार से की जाती है|स्वमूत्र से सारे शरीर की मालिश स्वमूत्रपान,केवल स्वमूत्र और पानी के साथ उपवास,स्वमूत्र की पट्टी रखना,स्वमूत्र के साथ अन्य प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग|स्वमूत्र को सूर्य किरण देकर प्रावीष्ठ बड़े फोड़े, चमड़ी की सूजन, चीरे, जख्म, फफोले और आग के घाव आदि को छोड़कर शेष सभी रोगों के उपचार का आरंभ स्वमूत्र मालिश से करना चाहिए। मालिश के लिए 36 घंटे से सात-आठ दिन का पुराना स्वमूत्र ही अत्यधिक फायदेमंद सिद्ध होता है। पुराना होने पर इसमें अमोनिया नामक द्रव्य बढ़ जाता है। अमोनिया के कारण यह मूत्र शरीर के लाखों लाख छिद्रों में जल्दी से और ज्यादा परिमाण में प्रविष्ठ>हो जाता है।

प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 


प्रत्येक व्यक्ति को मालिश के लिए प्रतिदिन करीब आधा लीटर स्वमूत्र की आवश्यकता होती है। सात बड़ी शीशियों में सात दिन के पुराने स्वमूत्र का संग्रह क्रम में रखा जाए। शीशियों का मुँह हमेशा बन्द रखा जाए, ताकि उसमें कोई भी जीव-जन्तु मरने न पाए। मानव मूत्र कृमिनाशक है। उसमें कीड़े नहीं पड़ते। शीशियाँ इस क्रम में रखी जाएँ, ताकि जो शीशी खाली हो जाए वह भरती जाए। सर्दी की ऋतु में या मनुष्य की प्रकृति के अनुसार रखा हुआ मूत्र थोड़ा गरम भी किया जा सकता है।पहले रखे हुए स्वमूत्र में से एक पाव मूत्र एक कटोरी में डालकर तलवे से कमर तक मालिश करके सुखा दें और जो गंदा अंश कटोरी में बचे उसे गिरा दें। फिर एक पाव लेकर कमर से सिर तक मालिश करनी चाहिए। मालिश हलके हाथ से करनी चाहिए, ताकि रोगी या मालिश कराने वाले को कष्ट न हो। हाथ ऊपर-नीचे ले जाना चाहिए। मालिश कितनी देर की जाए यह आवश्यकतानुसार तय किया जा सकता है। अगर मालिश के लिए अपना मूत्र पर्याप्त न हो, तो दूसरे स्वस्थ व्यक्ति का (जो उसी प्रकार का आहार लेता हो) मूत्र ले सकते हैं।सभी रोग में, स्वमूत्र का प्रयोग मालिश से प्रारंभ किया जाए तो पहले सप्ताह में ही फायदा झलकने लगता है।

बढ़ी हुई तिल्ली प्लीहा के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार



15.11.19

चक्कर आना(Vertigo) के आयुर्वेदिक उपचार



आपने कभी न कभी महसूस किया ही होगा कि अचानक से आपकी आंखों के आगे अंधेरा-सा छा गया हो, फिर चाहे आप बैठे हों या खड़े हों। साथ ही कभी न कभी आपको ऐसा भी लगा होगा कि अचानक आपका सिर घूमने लगा है। अगर हां, तो यह चक्कर आने के लक्षण हैं। अगर आपको भी बार बार चक्कर आना या सिर चकराने जैसी समस्या हुई है, तो स्टाइलक्रेज का यह लेख खास आपके लिए है। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि चक्कर किन कारणों से आते हैं, इसके लक्षण क्या हैं और इनसे राहत पाने के लिए क्या किया जा सकता है।क्‍या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है, कि अचानक से आसपास रखी सारी चीजें मानों घूमने लगती हों या आपकी आंखों के सामने एक तेज रौशनी के बाद अंधेरा सा होने लगता हो। आपके आसपास की आवजे आपको सुनाई देना बंद होने लगता हो और आप जमीन पर गिर पड़ते हों। जी हां ऐसा ही कुछ होता है अचानक जब आपको चक्‍कर आ जाता है। अचानक चक्‍कर आने के कई कारण हो सकते हैं जैसे कि ज्‍यादा समय भूखे पेट रहना, कमजोरी या अन्‍य कोई वजह जिसकी वजह से आप अचानक बेहोश गिर पड़ते हैं। वैसे कई बार तो चक्‍कर ज्‍यादा देर बैठे रहने के बाद अचानक उठने पर भी आते हैं, जिसमें आपको लगता है मानो पूरी धरती गोल-गोल घूम रही हो। यह सब मस्तिष्‍क में रक्‍त की पूर्ति की कमी होने के कारण या रक्‍तचाप कम होने के कारण होता है। लेकिन अचानक व बार-बार चक्‍कर आने की स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस स्थिति में आप अपने घर पर रखी कुछ चीजों का इस्‍तेमाल उपचार के तौर पर कर सकते हैं।वर्टिगो सबसे आम बीमारियों में से एक है। वर्टिगो का अर्थ है चक्कर आने की भावना। इस बीमारी में आपको अपने आस पास की चीजे घूमती हुई लगती हें। इस बीमारी में व्यक्ति को उल्टी और मितली हो सकती हैं। वर्टिगो के कुछ गंभीर मामलों में व्यक्ति बेहोश भी हो सकता है, लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता है। वर्टिगो में अक्सर चक्कर आने के कारण मालूम नहीं हो पाते हें। वर्टिगो, प्रकाशस्तंभ के समान नहीं है। वैसे तो यह बीमारी अपने आप ही ठीक हो जाती ही । वर्टिगो का उपचार कारण पर निर्भर करता है। लोकप्रिय उपचारों में कुछ शारीरिक आभ्यास शामिल हैं और यदि आवश्यक हो, तो विशेष दवाएं जिन्हें वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंट (vestibular blocking agents) कहा जाता है दी जातीं हैं।
वर्टिगो का अर्थ है चलते-चलते या अचानक खड़े होने पर चक्कर आना। इसमें व्यक्ति को शारीरिक संतुलन बनाए रखने में समस्या होती है। यह कई स्थितियों का लक्षण है। यह तब हो सकता है जब आंतरिक कान, मस्तिष्क या संवेदी तंत्रिका मार्ग के साथ कोई समस्या उत्पन्न हो रही हो। हम आपको बता दें कि ऊंचाई के डर (fear of heights) को वर्टिगो नहीं कहते। इसे एक्रोफोबिया (Acrophobia) कहा जाता है और वह वर्टिगो से बहुत अलग होता है।
यह अक्सर अधिक ऊंचाई से नीचे देखने के साथ जुड़ा हुआ है लेकिन ऊंचाई से नीचे देखने पर चक्कर आना किसी भी अस्थायी आंतरिक कान या मस्तिष्क में समस्याओं के कारण हो सकता है।
इस बीमारी के कारणों में मिनियर रोग (Meniere’s disease) आंतरिक कान का बिकार (बेनाइन पैरॉक्सिज्मल पोजिशनल वर्टिगो) और तंत्रिका कि सूजन सहित और भी रोग हो सकते हें।
चक्कर आने का कारण –
चक्कर आने के कई कारण हो सकते हैं, नीचे हम इसके कुछ सामान्य कारण बता रहे हैं, जिस वजह से यह समस्या हो सकती है
माइग्रेन : यह ऐसा विकार है, जिसमें गंभीर सिरदर्द होता है। माइग्रेन होने पर सिरदर्द के पहले या सिरदर्द के बाद चक्कर आ सकते हैं।
चिंता या तनाव : चिंता या तनाव भी चक्कर आने का कारण बन सकता है। ऐसे में आपको असामान्य रूप से सांस लेने की समस्या हो सकती है।
लो ब्लड शुगर : सिर में चक्कर आना लो ब्लड प्रेशर के कारण भी हो सकता है। यह आमतौर पर डायबिटीज के मरीजों में देखने को मिलता है।
लो ब्लड प्रेशर : लो ब्लड प्रेशर यानी कम रक्तचाप के कारण चक्कर आना आम है। कम रक्तचाप होने से मस्तिष्क में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिस कारण चक्कर आने लगते हैं।
अचानक से रक्त प्रवाह होना : जब आप काफी देर से बैठे हो और अचानक से उठो, तो रक्त प्रवाह में तेजी से बदलाव आता है, जिस कारण कभी-कभी चक्कर आ सकते हैं।
डिहाइड्रेशन, गर्मी या थकान : तेज गर्मी में, शरीर में पानी की कमी होने पर या फिर थकान होने पर भी चक्कर आ सकते हैं।
वर्टिगो के लक्षण
वर्टिगो वाले व्यक्ति को यह महसूस होगा कि उनका सिर, या उनके आसपास का वातावरण घूम रहा है या चल रहा है।
वर्टिगो की अन्य स्थितियों का यह एक लक्षण हो सकता है, और इससे संबंधित कई लक्षण एक साथ भी हो सकते है। जिनसे आप वर्टिगो का पता लगा सकते हैं, इसमें शामिल है:
संतुलन बनाने में समस्या
मोशन सिकनेस की भावना
मतली और उल्टी
ठीक से सुनाई न देना
टिनिटस (किसी एक कान में सीटी जैसी आवाज आना)
कान में किसी चीज के होने की भावना
आंखों को नियंत्रित करने में समस्या
सिरदर्द
जी मिचलाना
वर्टिगो बेहोशी की सामान्य भावना नहीं है। यह एक घूर्णी चक्कर जैसा होता है।
कारण के आधार पर, वर्टिगो विभिन्न प्रकार के होते हैं। वर्टिगो के दो मुख्य प्रकार निम्न हैं।
पेरिफेरल वर्टिगो आमतौर पर तब होता है जब आंतरिक कान के संतुलन अंगों में गड़बड़ी होती है। आंतरिक कान या वेस्टिबुलर तंत्रिका (कान का आंतरिक हिस्सा, जो शरीर के संतुलन को नियंत्रित करता है) में एक समस्या के कारण पेरिफेरल वर्टिगो होता है। वेस्टिबुलर तंत्रिका आंतरिक कान को मस्तिष्क से जोड़ती है। ऐसे में, व्यक्ति को अपना संतुलन बनाये रखने में परेशानी होती है।
सेंट्रल वर्टिगो तब होता है जब मस्तिष्क में कोई समस्या होती है, विशेष रूप से सेरिबैलम या मध्य मस्तिष्क में सेरिबैलम हिंदब्रेन (मस्तिस्क का पिछला हिस्सा) है जो मूवमेंट और संतुलन के समन्वय को नियंत्रित करता है। सेंट्रल वर्टिगो मस्तिष्क के एक या एक से अधिक हिस्सों में गड़बड़ी के परिणामस्वरूप होता है, जिसे संवेदी तंत्रिका मार्ग के रूप में जाना जाता है।
परिधीय वर्टिगो
लगभग 93 प्रतिशत वर्टिगो के मामले परिधीय वर्टिगो हैं, जो निम्न में से एक के कारण होता है:
सौम्य पैरॉक्सिस्मल पॉसिबल वर्टिगो आपके सिर की स्थिति में होने वाले परिवर्तनों के कारण होता है। कान के अन्दर के घुमे हुये भाग में तैरते कैल्शियम क्रिस्टल की वजह से यह बीमारी होती हैं।
मिनियर रोग (Meniere) एक आंतरिक कान का विकार है जो शरीर के संतुलन और हमारी सुनने कि क्षमता को प्रभावित करता है।
तीव्र परिधीय वेस्टिबुलोपैथी (एपीवी) आंतरिक कान की सूजन है, जो अचानक चक्कर की शुरुआत का कारण बनती हैं।
एक और प्रकार का वर्टिगो होता है, जिसे सेंट्रल वर्टिगो (central vertigo) कहा जाता है। यह दिमाग के निचले या पिछले हिस्से (सेरिबैलम) में समस्या होने पर होता है। इसके कारण पेरिफेरल वर्टिगो (Peripheral Vertigo) के कारण से कुछ अलग हो सकते हैं, जैसे
केंद्रीय वर्टिगो के कारण
आघात
दिमाग के मध्य भाग में एक ट्यूमर
माइग्रेन
मल्टीपल स्क्लेरोसिस
वर्टिगो को मोशन सिकनेस के समान लगता है, या जैसे कमरा घूम रहा है।
सिर से जुड़ी बीमारी के कारण वर्टिगो के निम्न लक्षण हो सकते हैं
जी मिचलाना
उल्टी
सरदर्द
चलते समय ठोकर खाना
वर्टिगो का निदान
वर्टिगो के प्रकार को निर्धारित करने के लिए टेस्ट
हेड-थ्रस्ट टेस्ट( Head-thrust test): आप परीक्षार्थी की नाक पर नज़र डालते हैं, और परीक्षार्थी एक त्वरित सिर की तरफ गति करता है और आँख की गति को देखता है।
रोमबर्ग परीक्षण (Romberg test): आप एक जगह पैरों के बल खड़े होते हैं और आँखें खुली होती हैं, फिर अपनी आँखें बंद करें और संतुलन बनाए रखने की कोशिश करें।
फुकुदा-ऊंटबर्गर परीक्षण (Fukuda-Unterberger tes)t: आप से अपनी आंखों को बंद कर के जगह-जगह मार्च करने के लिए कहा जाता है।
डिक्स-हिलपाइक परीक्षण: आप एक कुर्सी पर बेठ कर अपनी दाएं तथा बाए झुकते हें अब एक डॉक्टर आपके चक्कर के बारे में अधिक जानने के लिए आपकी आंख की चाल को देखेगा जिससे यह पता चलता हें आप को वर्टिगो कि समस्या हें कि नहीं।
वर्टिगो के लिए इमेजिंग परीक्षणों में शामिल हैं
सीटी स्कैन
एमआरआई
वर्टिगो का इलाज
वर्टिगो का उपचार कारण पर निर्भर करता है। कुछ प्रकार के वर्टिगो बिना उपचार के टीक हो जाते हैं, लेकिन किसी भी अंतर्निहित समस्या के कारण वर्टिगो होने पर चिकित्सा ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है, उदाहरण के लिए, एक जीवाणु संक्रमण जिसमें एंटीबायोटिक चिकित्सा की आवश्यकता होगी।
ड्रग्स कुछ लक्षणों को राहत दे सकता है, उदाहरण के लिए, मोशन सिकनेस और मतली को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन या एंटी-इमीटिक्स (antihistamines or anti-emetics) दवाएं शामिल हो सकतीं हैं।
मध्य कान के संक्रमण से जुड़े एक तीव्र वेस्टिबुलर विकार वाले मरीजों को स्टेरॉयड, एंटीवायरल ड्रग्स या एंटीबायोटिक दवाइयां दी जा सकती हैं।
न्यस्टागमस एक अनियंत्रित आंख मूवमेंट है, आमतौर पर एक साइड से दसरी साइड की ओर। यह तब हो सकता है जब किसी व्यक्ति को मस्तिष्क या आंतरिक कान की शिथिलता के कारण चक्कर आता है।
कभी-कभी, अंतरंगनीय सौम्य पैरॉक्सिस्मल पोजीटिअल वर्टिगो (BPPV) के रोगियों के इलाज के लिए आंतरिक सर्जरी की जाती है। सर्जन उस क्षेत्र को अवरुद्ध करने के लिए आंतरिक कान में एक हड्डी प्लग (bone plug) लगाता है जहां से वर्टिगो (सिर का चक्कर) को उत्पन्न किया जाता है।
वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंट (VBA) सबसे लोकप्रिय प्रकार की दवा है। वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंटों में शामिल हैं:
एंटीहिस्टामाइन (प्रोमेथाज़िन, बिटाहिस्टिन)
बेंज़ोडायजेपाइन (डायजेपाम, लॉराज़ेपम)
एंटीमेटिक्स (प्रोक्लोरेरज़ीन, मेटोक्लोप्रमाइड)
वर्टिगो के जोखिम कारक
वर्टिगो के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं:
हृदय रोगों, विशेष रूप से पुराने वयस्कों में
हाल ही में कान के संक्रमण, जो भीतरी कान में असंतुलन का कारण बनता है
सिर का आघात
एंटीडिप्रेसेंट्स और एंटीसाइकोटिक्स जैसी दवाएं
सावधानियां
जो कोई भी वर्टिगो या अन्य प्रकार के चक्कर का अनुभव करता है, उसे ड्राइविंग या सीढ़ी का उपयोग नहीं करना चाहिए। गिरने से बचने के लिए घर में अनुकूलन करना एक अच्छा विचार हो सकता है। धीरे-धीरे उठने से समस्या दूर हो सकती है। लोगों को ऊपर की ओर देखते समय ध्यान रखना चाहिए और सिर की स्थिति में अचानक बदलाव नहीं करना चाहिए।
वर्टिगो के घरेलू उपचार
तुलसी और साइप्रस का तेल
वर्टिगो के लक्षण जैसे सिरदर्द से छुटकारा दिलाने में तुलसी मदद कर सकती है। तुलसी और साइप्रस के तेल कि दो –दो बुँदे ले मलें और माथे में रख दे क्योंकि तुलसी एक दर्द निवारक ओषधि हैं। इसलिए यह सिर दर्द से छुटकारा दिलाने में मदद करती है।
*पकने के बाद सूखी हुई लौकी को डण्ठल की तरफ से काट दें, ताकि अन्दर का खोखलापन दिखाई दे। अगर सूखा गूदा हो तो उसे निकाल दें। अब इसमें ऊपर तक पानी भर कर 12 घण्टे तक रखें फिर हिलाकर पानी निकाल कर साफ कपड़े छान लें। इस पानी को ऐसे बर्तन में भरें, जिसमें आप अपनी नाक डुबो सकें। नाक डुबोकर जोर से सांस खींचें, ताकि पानी नाक से अन्दर चढ़ जाए। पानी खींचने के बाद नाक नीची करके आराम करें। इस उपाय से चक्कर आने की समस्या सदा के लिए खत्म हो जाती है।
पेपरमिंट ऑयल
तीन से चार बूंद पेपर मेंट ऑयल ओर एक चम्मस बादाम का तेल ले अब दोनों को मिला ले और फिर इसे अपनी गर्दन तथा माथे पर लगाये इससे आपको सिर दर्द ठीक हो जायेगा।
अदरक
वर्टिगो के घरेलू उपचार में अदरक बहुत लाभदायक होता है। अदरक का एक टुकड़ा, शक्कर, आधा चम्मच चाय पत्ती और एक कप दूध इन सभी को एक वर्तन में लेकर गरम करे और छानकर पिए। इससे आपको उल्टी, जी मिचलाना आदि से राहत मिलेगी।
*चक्कर आने पर तुलसी के रस में चीनी मिलाकर सेवन करने से या तुलसी के पत्तों में शहद मिलाकर चाटने से चक्कर आना बंद हो जाता है।
*चक्कर आने पर धनिया पाउडर दस ग्राम तथा आंवले का पाउडर दस ग्राम लेकर एक गिलास पानी में भिगो कर रख दें। सुबह अच्छी तरह मिलाकर पी लें। इससे चक्कर आने बंद हो जाते है।
*सिर चकराने पर आधा गिलास पानी में दो लौंग डालकर उसे उबाल लें और फिर उस पानी को पी लें। इस पानी को पीने से लाभ मिलता है।
*10 ग्राम आंवला, 3 ग्राम काली मिर्च और 10 ग्राम बताशे को पीस लें। 15 दिनों तक रोजाना इसका सेवन करें चक्कर आना बंद हो जाएगा।
*जिन लोगों को चक्कर आते हैं उन्हें दोपहर के भोजन के 2 घंटे पहले और शाम के नाश्ते में फलों का जूस पीना चाहिए। रोजाना जूस पीने से चक्कर आने बंद हो जाएंगे। लेकिन ध्यान रखें कि जूस में किसी प्रकार का मीठा या मसाला नहीं डालें सादा जूस पियें। जूस की जगह चाहें तो ताजे फल भी खा सकते हैं।

शहद
चक्कर आने पर शहद काफी प्रभावी तरीके असर डालता है। आपको बता दें कि जब शरीर में ब्लड शुगर का स्तर कम होने लगता है, तो चक्कर आने लगते हैं। ऐसे में शहद का सेवन करना चाहिए, जिसमें प्राकृतिक शर्करा होती है। शहद आपको ऊर्जा प्रदान करती है। इससे ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रहता है
लोबान तेल
लोबान तेल कि कुछ बुँदे ले ओर अपने कंधे कि मसाज करें। इससे आपको सिर दर्द तथा अकडन से छुटकारा मिलेगा।
बादाम
बादाम पौष्टिक गुणों से भरपूर है। एक स्वस्थ शरीर के लिए नियमित रूप से बादाम का सेवन काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। बादाम में प्रचुर मात्रा में विटामिन-ई व विटामिन-बी होता है, जो आपको ऊर्जा प्रदान करता है। ऊर्जा से भरपूर बादाम चक्कर आने से राहत दिलाता है
पर्याप्त मात्रा में नींद लेना
नींद की कमी से वर्टिगो की भावनाओं को ट्रिगर किया जा सकता है। यदि आप पहली बार वर्टिगो का अनुभव कर रहे हैं, तो यह तनाव या नींद की कमी का परिणाम हो सकता है। यदि आप यह सोच रहे हैं कि आप क्या कर सकते हैं तो एक छोटी झपकी ले सकते हैं, इससे आपकी चक्कर की भावनाओं को कम किया जा सकता है।
*नारियल का पानी रोज पीने से भी चक्कर आने बंद हो जाते है।
*चाय व कॉफ़ी कम पीनी चाहिए। अधिक चाय व कॉफ़ी पीने से भी चक्कर आते हैं।
*20 ग्राम मुनक्का घी में सेंककर सेंधा नमक डालकर खाने से चक्कर आने बंद हो जाते है।
*खरबूजे के बीजों को पीसकर घी में भुन लें। अब इसकी थोड़ी थोड़ी मात्रा सुबह शाम लें, इससे चक्कर आने की समस्या में बहुत लाभ होता है।

आंवला
चक्कर आने पर आंवले का सेवन लंबे समय से किया जा रहा है। आंवले में विटामिन-ए और विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में होता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा, इससे रक्त संचार भी दुरुस्त रहता है, जिससे चक्कर आने की समस्या से राहत मिलती है
क्या करें?
आप आंवले का पेस्ट बनाकर इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आप 10 ग्राम आंवला लें। उसमें तीन काली मिर्च और कुछ बताशे मिलाकर पीस लें। इस पेस्ट का आप 15 दिन तक रोजाना सेवन करें। इससे आपकी चक्कर आने की समस्या धीरे-धीरे कम होगी।
इसके अलावा, आप आंवले का मुरब्बा या आंवला कैंडी का सेवन भी नियमित रूप से कर सकते हैं।
नींबू
चक्कर आने पर नींबू का सेवन करना काफी प्रभावी होता है। इसमें विटामिन-सी होता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके अलावा, नींबू शरीर को हाइड्रेट रखता है, जिससे चक्कर आने के दौरान राहत मिलती है
क्या करें?
चक्कर आने पर एक गिलास पानी में आधा नींबू निचोड़ लें।
इस पानी में एक चम्मच चीनी डालें और इस मिश्रण को पी लें।
सलाद में नींबू का सेवन करने से भी आपको आराम मिलेगा

पर्याप्त पानी पीना
कभी-कभी सिर का चक्कर निर्जलीकरण के कारण होता है। ऐसा होने पर सोडियम का सेवन कम करने से मदद मिल सकती है। लेकिन हाइड्रेटेड रहने का सबसे अच्छा तरीका है जिसमे कि आप बस भरपूर मात्रा में पानी पिएं। अपने पानी के सेवन पर नजर रखें और गर्म, नम स्थितियों और पसीने से तर स्थितियों के बारे में जानने की कोशिश करें जो आपको अतिरिक्त तरल पदार्थ खो सकते हैं। जब आप निर्जलित हो जाते हैं, तब अतिरिक्त पानी पीने की योजना बनाएं। बस इस बात से अवगत रहें कि आप कितना पानी पी रहे हैं, आप देखतें हैं कि यह वर्टिगो को कम करने में आपकी मदद करता है।
वर्टिगो उतना खतरनाक बीमारी नहीं है, लेकिन अगर यह होता रहता है तो यह एक अंतर्निहित स्थिति का लक्षण है। घर पर वर्टिगो का इलाज करना अल्पकालिक समाधान के रूप में काम कर सकता है। लेकिन अगर आपको लगातार चक्कर आना जारी है, तो इसका कारण पता लगाना महत्वपूर्ण है। आपका सामान्य चिकित्सक इसकी जाँच करने में सक्षम हो सकता है, या आपको आगे की जाँच के लिए एक कान, नाक और गले के विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट के लिए भेजा जा सकता है।
स्वस्थ आहार लें
अगर आपको चक्कर आने की समस्या है और चक्कर की दवा से बचना चाहते हैं, तो जरूरी है कि आप स्वस्थ खानपान लें। एक स्वस्थ खानपान आपको कई समस्याओं से दूर रखने में मदद करता है। खाना ऐसा खाएं, जो जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर हो। अपने आहार में आयरन, विटामिन-ए, फाइबर व फोलेट से भरपूर खाद्य पदार्थ लें। नीचे हम बता रहे हैं कि चक्कर आने से बचने के लिए आपको अपने खानपान में क्या शामिल करना चाहिए :
विटामिन-सी : चक्कर से बचने के लिए विटामिन-सी लेना जरूरी है। इसके लिए आप संतरे, नींबू व अंगूर जैसी चीजों का सेवन करें।
आयरन : जैसा कि हमने बताया शरीर में खून की कमी होने से भी चक्कर आते हैं। ऐसे में आयरन की जरूरत होती है। आप आयरन युक्त चीजें जैसे पालक, सेब व खजूर आदि का सेवन करें।
फोलिक एसिड : फोलिक एसिड का सेवन करना भी जरूरी है। इसके लिए आप हरी सब्जियों जैसे – ब्रोकली, अनाज, मूंगफलियां व केले को अपने खानपान में शामिल करें।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार


वजन कम करने के लिए पानी कितना ,कैसे पीएं?


सेहत के लिए सबसे जरुरी है भरपूर मात्रा में पानी पीना। खासकर, अगर आप वजन कम करने का सोच रहे हैं तो पानी और भी जरुरी हो जाता है। पानी पीने से कैलोरी इनटेक कम हो जाती है क्योंकि इससे आपका पेट भरा हुआ रहता है।
 शोधकर्ता इस बात पर पूर्ण सहमत हैं कि पानी कैलोरी के सेवन को कम करता है, मेटाबोलिस्म को बढ़ाता है और पूर्णता की भावना को बनाए रखता है। इसके साथ ही पानी कोशिकाओं को हाइड्रेटेड रखने,   डिटॉक्सिफिकेशन और वजन घटाने की प्रक्रियाओं में योगदान देता है। यही कारण है कि फिटनेस विशेषज्ञ व्यक्तियों को “अधिक पानी” पीने की सलाह देते हैं। आप इस लेख में पानी और वजन कम करने के बीच संबंध को जान पायेगें। इस आर्टिकल में आप निम्न प्रश्नों के बारे में जानेगें, जैसे- पानी कैसे वजन कम करने में मदद करता है? वजन घटाने के लिए कितना पानी पीना पर्याप्त है? और वजन कम करने के लिए रोज कितना पानी पीना चाहिए।
 रिसर्च द्वारा स्पष्ट किया गया है कि, पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से वजन में कमी आती है। पानी थर्मोजेनेसिस (thermogenesis) को बढ़ाने में मदद करता है। यह प्रक्रिया शरीर में ऊष्मा के उत्पादन अर्थात चयापचय की क्रिया को बढ़ाती है। इसके अतिरिक्त भोजन से पहले पानी पीने से, पूर्णता की भावना में वृद्धि होती है जिससे पेट भरा हुआ महसूस करता है और जिससे अधिक भोजन का सेवन करने से बचा जा सकता है।
वजन घटाने के लिए कैसे पीएं पानी?
सुबह उठने के बाद - 2 गिलास सादा या नींबू पानी
वर्कआउट से 1 घंटे पहले - 2 गिलास
वर्काउट के बाद - 2 गिलास
खाने से 30 मिनट पहले - 2 गिलास
स्नैक्स टाइम - 2 गिलास पानी या डिटॉक्स वॉटरएक अन्य अध्ययन में पाया गया कि पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन नहीं करने वाले व्यक्तियों की अपेक्षा, उन लोगों में जो पर्याप्त मात्रा में पानी का सेवन करते थे उनमे 12 सप्ताह में 44% अधिक वजन में कमी देखी गई।
गर्म पानी है ज्यादा फायदेमंद?
सर्दी हो या गर्मी, एक्सपर्ट हमेशा गुनगुना पानी पीने की ही सलाह देते हैं। दरअसल, ठंडे पानी से फैट जम जाता है और जल्दी नहीं पिघलता इसलिए हमेशा गुनगुना पानी पीने की सलाह दी जाती हैं। वहीं सुबह 1 गिलास गुनगुना पानी पीने से मेटाबॉलिज्म भी बूस्ट होता है, जिससे आप दिनभर एनर्जी के साथ वजन घटाने में भी काफी मदद मिलती है। यही नहीं, शरीर को डिटॉक्सीफाई करने के लिए गुनगुना पानी पीना फायदेमंद होता है।   पानी, लिपोलिसिस (lipolysis) की क्रिया को बढ़ाता है। लिपोलिसिस एक चयापचय प्रक्रिया है जिसके माध्यम से लिपिड ट्राइग्लिसराइड्स (lipid triglycerides) को ग्लिसरॉल और फैटी एसिड में हाइड्रोलाइज किया जाता है।
ऐसे आहार जिसमे अधिक पानी हो का सेवन करने से बॉडी मास इंडेक्स (बीएमआई) कम हो जाता है, 
 अतः पानी का अधिक मात्रा में सेवन करने से व्यक्तियों को वजन कम करने में मदद मिल सकती है। पर्याप्त पानी का सेवन भूख में कमी करने, पूर्णता में वृद्धि करने, चयापचय और इंसुलिन संवेदनशीलता में सुधार करने, बीएमआई को कम करने और वसा को जलाने का काम करता है। पानी विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालने में भी मदद करता है, जिससे शरीर में सूजन और अन्य बीमारियों का ख़तरा कम होता है।
क्या पानी कैलोरी जला सकता है
 पीने का पानी थर्मोजेनेसिस (thermogenesis) को बढ़ाने में मदद करता है। थर्मोजेनेसिस जीवों में ऊष्मा के उत्पादन की एक प्रक्रिया है, जो कैलोरी को जलाने में मदद करती है। अधिक वजन और मोटापे से ग्रस्त बच्चों के एक अध्ययन में देखा गया है कि ठंडा पानी पीनेके बाद ऊर्जा की खपत 25% तक बढ़ गई। इसी के साथ एक अध्ययन में पाया कि 0.5 लीटर पानी पीने से अतिरिक्त 23 कैलोरी बर्न हो जाती है।
 पानी प्राकृतिक रूप से कैलोरी-मुक्त (calorie-free) होता है, इसलिए इसे आमतौर पर कम कैलोरी डाइट में शामिल किया जाता है। भोजन से पहले पानी पीने से मध्यम आयु वर्ग और वृद्ध व्यक्तियों को भूख कम लगती है। जिसके फलस्वरूप कैलोरी की मात्रा घटती है, और वजन में कमी आती है।
पेयजल या पीने का पानी भूख को प्रभावित करता है और पूर्णता में सुधार होता है। अध्ययनों से पता चला है कि नियमित रूप से भोजन से कुछ समय पहले पानी पीने से भूख में कमी आती है और 12 सप्ताह की अवधि में 2 किलो वजन कम हो सकता है। अतः वजन कम करने का प्रयास करने वाले व्यक्तियों को भोजन के 20 से 30 मिनट पहले पानी पीने की सलाह दी जाती है। एक अध्ययन से पता चला है कि नाश्ते से पहले पानी का सेवन करने से भोजन के दौरान कैलोरी की खपत 13% तक कम हो जाती है।
वजन घटाने के लिए एक दिन में कितना पानी पीना चाहिए
 सामान्य स्थितियों में, जब व्यक्ति वर्कआउट नहीं करता है, तब महिलाओं के लिए प्रतिदिन 2200 मिलीलीटर (2 लीटर) और पुरुषों को 3000 मिलीलीटर (3 लीटर) पानी पीना चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से 60 मिनट तक कसरत (workout) करता है, तो उसे पानी का अधिक सेवन करने पर जोर देना चाहिए। एक्सरसाइज (exercising) करते समय 900 मिलीलीटर (लगभग 1 लीटर) पानी या हर 15 से 20 मिनट में 150-300 मिलीलीटर (mL) पानी घूंट-घूंट करके पीना आवश्यक होता है। जैसे-जैसे व्यायाम में वृद्धि की जाती है, तो सम्बंधित व्यक्ति को अपने आहार में हाइड्रेटिंग खाद्य पदार्थों और नारियल पानी को शामिल करने पर विचार करना चाहिए तथा इलेक्ट्रोलाइट संतुलन पर भी ध्यान रखना चाहिए।
 पानी का सेवन, किसी विशेष क्षेत्र के मौसम पर भी निर्भर करता है। शुष्क या आर्द्र क्षेत्रों में अधिक पसीना निकलने के कारण शरीर में पानी की कमी आ सकती है। अतः इस स्थिति में व्यक्ति को हर 15 मिनट में कम से कम 150 से 200 मिलीलीटर (mL) पानी पीना चाहिए।
 जो व्यक्ति औसतन वजन घटाने का प्रयास कर रहें है, उन्हें नियमित रूप से इंटेंसिव एक्सरसाइज करने के साथ-साथ महिलाओं को 4 से 5 लीटर प्रतिदिन और पुरुषों को 6 से 7 लीटर प्रतिदिन पानी पीने पर जोर देना चाहिए।
 वजन कम करने और सेल्युलर डिटॉक्सिफिकेशन (cellular detoxification) के लिए पर्याप्त इलेक्ट्रोलाइट्स की जरूरत होती है। वजन कम करने के लिए पानी की उच्च मात्रा वाले निम्नलिखित खाद्य पदार्थों का सेवन किया जा सकता हैं, जैसे:
अजवायन
तरबूज
खीरा
कीवी
बेल मिर्च
खट्टे फल
गाजर
अनानास
मूली , इत्यादि।
पर्याप्त पानी पीने के फायदे
पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से व्यक्ति को निम्न फायदे होते हैं जैसे:
पानी अनेक प्रकार के रोगों को रोकने में मदद करता है।
पानी शरीर में विषाक्तता को कम करने में मदद करता है।
पर्याप्त पानी का सेवन तनाव की स्थिति को कम करने में मदद करता है।
पानी मस्तिष्क के कार्य में सुधार करके मूड को बेहतर बनाने में मदद करता है।
पानी त्वचा को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
फाइबर आहार के साथ अधिक पानी का सेवन, मल त्याग को बेहतर बनाने में मदद करता है।
पानी पीने का सही तरीका
-भोजन से आधा घंटे पहले कम से कम 2 गिलास पानी पीएं।
-भोजन करने के बाद भी तुरंत पानी ना पीएं। इसके 30 मिनट बाद पानी पीएं।
-बाहर से घर आने के बाद भी तुरंत पानी नहीं पीना चाहिए।
-वर्कआउट से पहले व बाद में 1-2 गिलास पानी जरूर पीएं।

14.11.19

हाथ और पैर काँपने के आयुर्वेदिक उपचार





    शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन एक दिमाग का रोग है जो लम्बे समय दिमाग में पल रहा होता है। इस रोग का प्रभाव धीरे-धीरे होता है। पता भी नहीं पडता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गडबड है।
जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के हाथ तथा पैर कंपकंपाने लगते हैं। कभी-कभी इस रोग के लक्षण कम होकर खत्म हो जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बहुत से रोगियों में हाथ तथा पैरों के कंप-कंपाने के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वह लिखने का कार्य करता है तब उसके हाथ लिखने का कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं।
कारण-
इस बीमारी का कारण हर व्यक्ति में अलग होता है। दिमाग के कुछ हिस्सों में न्यूरोट्रांसमीटर केमिकल होते हैं। यह केमिकल पूरे शरीर या किसी विशेष हिस्से की मांसपेशियों को नियंत्रित करते हैं।
जब यह केमिकल लीक होने लगते हैं तो ट्रेमरनाम की समस्या सामने आती है। मांसपेशियों के असामान्य होने के कारण भी यह समस्या पैदा होती है। यह समस्या न्यूरोडीजेनरेटीव बीमारी के कारण भी होती है।
इस बीमारी में ब्रेनस्टेम पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। इसके अलावा अन्य कारणों जैसे अधिक मात्रा में शराब पीना, लीवर का खराब हो जाना, पार्किंसन, थाइराइड , मेंटल डिसआर्डर, कैल्शियम, पोटाशियम की भी इस समस्या का कारण बन सकती है। कई बार यह समस्या वंशानुगत भी होती है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन (Parkinson’s disease)
यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।
बहुत सारे मरीज़ों में ‍कम्पन पहले कम रहता है, यदाकदा होता है, रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन (parkinson’s disease )के लक्षण कारण और उपचार
*शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन एक दिमाग का रोग है जो लम्बे समय दिमाग में पल रहा होता है। इस रोग का प्रभाव धीरे-धीरे होता है। पता भी नहीं पडता कि कब लक्षण शुरू हुए। अनेक सप्ताहों व महीनों के बाद जब लक्षणों की तीव्रता बढ जाती है तब अहसास होता है कि कुछ गडबड है।
*जब यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो रोगी व्यक्ति के हाथ तथा पैर कंपकंपाने लगते हैं। कभी-कभी इस रोग के लक्षण कम होकर खत्म हो जाते हैं। इस रोग से पीड़ित बहुत से रोगियों में हाथ तथा पैरों के कंप-कंपाने के लक्षण दिखाई नहीं देते हैं, लेकिन वह लिखने का कार्य करता है तब उसके हाथ लिखने का कार्य करने में असमर्थ हो जाते हैं।
*यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।



*बहुत सारे मरीज़ों में ‍कम्पन पहले कम रहता है, यदाकदा होता है, रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
*जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन पार्किन्सन रोग के लक्षण  Parkinson’s disease  Symptoms :- 
आंखें चौडी खुली रहती हैं। व्यक्ति मानों सतत घूर रहा हो या टकटकी लगाए हो ।
चेहरा भावशून्य प्रतीत होता है बातचीत करते समय चेहरे पर खिलने वाले तरह-तरह के भाव व मुद्राएं (जैसे कि मुस्कुराना, हंसना, क्रोध, दुःख, भय आदि ) प्रकट नहीं होते या कम नज़र आते हैं।
खाना खाने में तकलीफें होती है। भोजन निगलना धीमा हो जाता है। गले में अटकता है। कम्पन के कारण गिलास या कप छलकते हैं।
हाथों से कौर टपकता है। मुंह से पानी-लार अधिक निकलने लगता है। चबाना धीमा हो जाता है। ठसका लगता है, खांसी आती है।
आवाज़ धीमी हो जाती है तथा कंपकंपाती, लड़खड़ाती, हकलाती तथा अस्पष्ट हो जाती है, सोचने-समझने की ताकत कम हो जाती है और रोगी व्यक्ति चुपचाप बैठना पसन्द करताहै।
नींद में कमी, वजन में कमी, कब्जियत, जल्दी सांस भर आना, पेशाब करने में रुकावट, चक्कर आना, खडे होने पर अंधेरा आना, सेक्स में कमज़ोरी, पसीना अधिक आता है।
उपरोक्त वर्णित अनेक लक्षणों में से कुछ, प्रायः वृद्धावस्था में बिना पार्किन्सोनिज्म के भी देखे जा सकते हैं । कभी-कभी यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि बूढे व्यक्तियों में होने वाले कम्पन, धीमापन, चलने की दिक्कत, डगमगापन आदि
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन (Parkinson’s disease)
यदि रोगी व्यक्ति लिखने का कार्य करता भी है तो उसके द्वारा लिखे अक्षर टेढ़े-मेढ़े हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति को हाथ से कोई पदार्थ पकड़ने तथा उठाने में दिक्कत महसूस होती है। इस रोग से पीड़ित रोगी के जबड़े, जीभ तथा आंखे कभी-कभी कंपकंपाने लगती है।
बहुत सारे मरीज़ों में ‍कम्पन पहले कम रहता है, यदाकदा होता है, रुक रुक कर होता है। बाद में अधिक देर तक रहने लगता है व अन्य अंगों को भी प्रभावित करता है। प्रायः एक ही ओर (दायें या बायें) रहता है, परन्तु अनेक मरीज़ों में, बाद में दोनों ओर होने लगता है।
जब यह रोग धीरे-धीरे बढ़ता है तो रोगी की विभिन्न मांसपेशियों में कठोरता तथा कड़ापन आने लगता है। शरीर अकड़ जाता है, हाथ पैरों में जकडन होती है। मरीज़ को भारीपन का अहसास हो सकता है। परन्तु जकडन की पहचान चिकित्सक बेहतर कर पाते हैं जब से मरीज़ के हाथ पैरों को मोड कर व सीधा कर के देखते हैं बहुत प्रतिरोध मिलता है। मरीज़ जानबूझ कर नहीं कर रहा होता। जकडन वाला प्रतिरोध अपने आप बना रहता है।
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन पार्किन्सन रोग के लक्षण  Parkinson’s disease  Symptoms :- 
आंखें चौडी खुली रहती हैं। व्यक्ति मानों सतत घूर रहा हो या टकटकी लगाए हो ।
चेहरा भावशून्य प्रतीत होता है बातचीत करते समय चेहरे पर खिलने वाले तरह-तरह के भाव व मुद्राएं (जैसे कि मुस्कुराना, हंसना, क्रोध, दुःख, भय आदि ) प्रकट नहीं होते या कम नज़र आते हैं।
खाना खाने में तकलीफें होती है। भोजन निगलना धीमा हो जाता है। गले में अटकता है। कम्पन के कारण गिलास या कप छलकते हैं।
हाथों से कौर टपकता है। मुंह से पानी-लार अधिक निकलने लगता है। चबाना धीमा हो जाता है। ठसका लगता है, खांसी आती है।
आवाज़ धीमी हो जाती है तथा कंपकंपाती, लड़खड़ाती, हकलाती तथा अस्पष्ट हो जाती है, सोचने-समझने की ताकत कम हो जाती है और रोगी व्यक्ति चुपचाप बैठना पसन्द करताहै।
नींद में कमी, वजन में कमी, कब्जियत, जल्दी सांस भर आना, पेशाब करने में रुकावट, चक्कर आना, खडे होने पर अंधेरा आना, सेक्स में कमज़ोरी, पसीना अधिक आता है।
उपरोक्त वर्णित अनेक लक्षणों में से कुछ, प्रायः वृद्धावस्था में बिना पार्किन्सोनिज्म के भी देखे जा सकते हैं । कभी-कभी यह भेद करना मुश्किल हो जाता है कि बूढे व्यक्तियों में होने वाले कम्पन, धीमापन, चलने की दिक्कत, डगमगापन आदि
शरीर (हाथ-पैर) में कम्पन ( पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease)) के कारण :
*पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) व्यक्ति को अधिक सोच-विचार का कार्य करने तथा नकारात्मक सोच ओर मानसिक तनाव के कारण होता है।






*किसी प्रकार से दिमाग पर चोट लग जाने से भी पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) हो सकता है। इससे मस्तिष्क के ब्रेन पोस्टर कंट्रोल करने वाले हिस्से में डैमेज हो जाता है।
*कुछ प्रकार की औषधियाँ जो मानसिक रोगों में प्रयुक्‍त होती हैं, अधिक नींद लाने वाली दवाइयों का सेवन तथा एन्टी डिप्रेसिव दवाइयों का सेवन करने से भी पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) हो जाता है।
अधिक धूम्रपान करने, तम्बाकू का सेवन करने, फास्ट-फूड का सेवन करने, शराब, प्रदूषण तथा नशीली दवाईयों का सेवन करने के कारण भी पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) हो जाता है।
*शरीर में विटामिन `ई´ की कमी हो जाने के कारण भी पार्किन्सन रोग (Parkinson’s disease) हो जाता है।
तरह -तरह के इन्फेक्शन — मस्तिष्क में वायरस के इन्फेक्शन (एन्सेफेलाइटिस) ।
*मस्तिष्क तक ख़ून पहुंचाने वाले नलियों का अवरुद्ध होना ।
*मैंगनीज की विषाक्तता।
हाथ पांव कापने का घरेलु उपचार
यहाँ कुछ घरेलु उपाय दिए गए हैं जो की आपके शरीर के कम्पन की समस्या को काफी हद  तक कम करने में सक्षम हो सकते हैं|*कुछ चाय जैसे chamomile, laung और lavandula आदि पीने से आपके दिमाग में शान्ति बनती है और दिमाग की तंत्रिकाओं को आराम मिलता है इसके फलसवरूप मानसिक तनाव में कमी आती है| यदि आपको मानसिक तनाव और टेंशन के कारण हाथ काम्पने की शिकायत है तो आज से ही इन चाय का सेवन करना शुरू कर दीजिये|
*तगार की जड़ nerves और दिमाग को शांत करने वाले और अनिद्रा दूर करने वाले गुण होते हैं| तगार की अड़ की चाय रोजाना दिन में २-३ बार पीने से हाथ पांव काम्पने में काफी आराम मिलता है|
विटामिन B की कमी होने से भी कम्पन और दिमाग के कार्यों में बाधा पड़ने की समस्या हो सकती है इसलिए जरुरी सप्लीमेंट लीजिये साथ ही फल, सब्जियां, दाल, बीन्स, अंडा आदि से जरुरी विटामिन्स और मिनरल्स प्राप्त कीजिये|
   * ध्यान और योग के साथ अपने दिन की शुरुवात कीजिये क्योंकि इससे आपका दिमाग रिलैक्स होगा और मानसिक तनाव, अनिद्रा की परेशानी दूर होगी|  आप कुछ देर दिन में सुबह और शाम रनिंग या जॉगिंग करके अपने दिमाग को कण्ट्रोल में रख सकते हैं
*शराब, मैदा जैसी refined शुगर से दूर रहे क्योंकि refiend शुगर आपके खून में ग्लूकोस के स्टार को असंतुलित करते हैं जिससे आपके शरीर में कम्पन की समस्या पैदा होती है|
किडनी फेल (गुर्दे खराब) की अमृत औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार