29.12.18

तुलसी है अनेक रोगों मे उपयोगी पौधा

                                               


तुलसी अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी पौधा है। इसके सभी भाग अलौकिक शक्ति और तत्वों से परिपूर्ण माने गए हैं। तुलसी के पौधे से निकलने वाली सुगंध वातावरण को शुध्द रखने में तो अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती ही है, भारत में आयुर्वेद चिकित्सा पध्दति में भी तुलसी का बहुत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। तुलसी का सदियों में औषधीय रूप में प्रयोग होता चला आ रहा है। तुलसी दल का प्रयोग खांसी, विष, श्वांस, कफ, बात, हिचकी और भोज्य पदार्थों की दुर्गन्ध को दूर करता है। इसके अलावा तुलसी बलवर्ध्दक होती है तथा सिरदर्द स्मरण शक्ति, आंखों में जलन, मुंह में छाले, दमा, ज्वर, पेशाब में जलन व विभिन्न प्रकार के रक्त व हृदय संबंधी बीमारियों को दूर करने में भी सहायक है।
तुलसी में छोटे-छोटे रोगों से लेकर असाध्य रोगों को भी जड़ में खत्म कर देने की अद्भुत क्षमता है। इसके गुणों को जानकर और तुलसी का उचित उपयोग कर हमें अत्यधिक लाभ मिल सकता है। तो लीजिए डाल लेते है 

तुलसी के महत्वपूर्ण औषधीय उपयोगी एवं गुणों पर एक नजरः

श्वेत तुलसी बच्चों के कफ विकार, सर्दी, खांसी इत्यादि में लाभदायक है। कफ निवारणार्थ तुलसी को काली मिर्च पाउडर के साथ लेने से बहुत लाभ होता है। गले में सूजन तथा गले की खराश दूर करने के लिए तुलसी के बीज का सेवन शक्कर के साथ करने से बहुत राहत मिलती। तुलसी के पत्तों को काली मिर्च, सौंठ तथा चीनी के साथ पानी में उबालकर पीने में खांसी, जुकाम, फ्लू और बुखार में फायदा पहुंचता है। पेट में दर्द होने पर तुलसी रस और अदरक का रस समान मात्रा में लेने से दर्द में राहत मिलती है। इसके उपयोग से पाचन क्रिया में भी सुधार होता है। कान के साधारण दर्द में तुलसी की पत्तियों का रस गुनगुना करके डाले। नित्य प्रति तुलसी की पत्तियां चबाकर खाने से रक्त साफ होता है।

चर्म रोग होने पर तुलसी के पत्तों के रस के नींबू के रस में मिलाकर लगाने से फायदा होता है। तुलसी के पत्तों का रस पीने से शरीर में ताकत और स्मरण शक्ति में वृध्दि होती है। प्रसव के समय स्त्रियों को तुलसी के पत्तों का रस देन से प्रसव पीड़ा कम होती है। तुलसी की जड़ का चूर्ण पान में रखकर खिलाने से स्त्रियों का अनावश्यक रक्तस्राव बंद होता है। जहरीले कीड़े या सांप के काटने पर तुलसी की जड़ पीसकर काटे गए स्थान पर लगाने से दर्द में राहत मिलती है। फोड़े फुंसी आदि पर तुलसी के पत्तो का लेप लाभदायक होता है। तुलसी की मंजरी और अजवायन देने से चेचक का प्रभाव कम होता है। सफेद दाग, झाईयां, कील, मुंहासे आदि हो जाने पर तुलसी के रस में समान भाग नींबू का रस मिलाकर 24 घंट तक धूप में रखे। थोड़ा गाढ़ा होने पर चेहरे पर लगाएं। इसके नियमित प्रयोग से झाईयां, काले दाग, कीले आदि नष्ट होकर चेहरा बेदाग हो जाता है।
तुलसी के बीजों का सेवन दूध के साथ करने से पुरुषों में बल, वीर्य और संतोनोत्पति की क्षमता में वृध्दि होती है। तुलसी का प्रयोग मलेरिया बुखार के प्रकोप को भी कम करता है। तुलसी का शर्बत, अबलेह इत्यादि बनाकर पीने से मन शांत रहता है। आलस्य निराशा, कफ, सिरदर्द, जुकाम, खांसी, शरीर की ऐठन, अकड़न इत्यादि बीमारियों को दूर करने के लिए तुलसी की जाय का सेवन करें। क्या आपने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि आपके घर, परिवार या आप पर कोई मुसीबत आने वाली होती है तो उसका असर सबसे पहले आपके घर में स्थित तुलसी के पौधे पर होता है। आप उस पौधे का कितना भी ध्यान रखें धीरे-धीरे वो पौधा सूखने लगता है। तुलसी का पौधा ऐसा है जो आपको पहले ही बता देगा कि आप पर या आपके घर परिवार को किसी मुसीबत का सामना करना पड़ सकता है।
पुराणों और शास्त्रों के अनुसार माना जाए तो ऐसा इसलिए होता है कि जिस घर पर मुसीबत आने वाली होती है उस घर से सबसे पहले लक्ष्मी यानी तुलसी चली जाती है। क्योंकि दरिद्रता, अशांति या क्लेश जहां होता है वहां लक्ष्मी जी का निवास नही होता। अगर ज्योतिष की माने तो ऐसा बुध के कारण होता है। बुध का प्रभाव हरे रंग पर होता है और बुध को पेड़ पौधों का कारक ग्रह माना जाता है। बुध ऐसा ग्रह है जो अन्य ग्रहों के अच्छे और बुरे प्रभाव जातक तक पहुंचाता है। अगर कोई ग्रह अशुभ फल देगा तो उसका अशुभ प्रभाव बुध के कारक वस्तुओं पर भी होता है। अगर कोई ग्रह शुभ फल देता है तो उसके शुभ प्रभाव से तुलसी का पौधा उत्तरोत्तर बढ़ता रहता है।
बुध के प्रभाव से पौधे में फल फूल लगने लगते हैं।प्रतिदिन चार पत्तियां तुलसी की सुबह खाली पेट ग्रहण करने से मधुमेह, रक्त विकार, वात, पित्त आदि दोष दूर होने लगते है मां तुलसी के समीप आसन लगा कर यदि कुछ समय हेतु प्रतिदिन बैठा जाये तो श्वास के रोग अस्थमा आदि से जल्दी छुटकारा मिलता है। घर में तुलसी के पौधे की उपस्थिति एक वैद्य समान तो है ही यह वास्तु के दोष भी दूर करने में सक्षम है हमारें शास्त्र इस के गुणों से भरे पड़े है जन्म से लेकर मृत्यु तक काम आती है यह तुलसी. कभी सोचा है कि मामूली सी दिखने वाली यह तुलसी हमारे घर या भवन के समस्त दोष को दूर कर हमारे जीवन को निरोग एवम सुखमय बनाने में सक्षम है माता के समान सुख प्रदान करने वाली तुलसी का वास्तु शास्त्र में विशेष स्थान है हम ऐसे समाज में निवास करते है कि सस्ती वस्तुएं एवम सुलभ सामग्री को शान के विपरीत समझने लगे है महंगी चीजों को हम अपनी प्रतिष्ठा मानते है कुछ भी हो तुलसी का स्थान हमारे शास्त्रों में पूज्यनीय देवी के रूप में है तुलसी को मां शब्द से अलंकृत कर हम नित्य इसकी पूजा आराधना भी करते है इसके गुणों को आधुनिक रसायन शास्त्र भी मानता है इसकी हवा तथा स्पर्श एवम इसका भोग दीर्घ आयु तथा स्वास्थ्य विशेष रूप से वातावरण को शुद्ध करने में सक्षम होता है शास्त्रानुसार तुलसी के विभिन्न प्रकार के पौधे मिलते है उनमें श्रीकृष्ण तुलसी, लक्ष्मी तुलसी, राम तुलसी, भू तुलसी, नील तुलसी, श्वेत तुलसी, रक्त तुलसी, वन तुलसी, ज्ञान तुलसी मुख्य रूप से विद्यमान है सबके गुण अलग अलग है शरीर में नाक कान वायु कफ ज्वर खांसी और दिल की बिमारिओं पर खास प्रभाव डालती है द्य वास्तु दोष को दूर करने के लिए तुलसी के पौधे अग्नि कोण अर्थात दक्षिण-पूर्व से लेकर वायव्य उत्तर-पश्चिम तक के खाली स्थान में लगा सकते है यदि खाली जमीन ना हो तो गमलों में भी तुलसी को स्थान दे कर सम्मानित किया जा सकता है।
  तुलसी का गमला रसोई के पास रखने से पारिवारिक कलह समाप्त होती है पूर्व दिशा की खिडकी के पास रखने से पुत्र यदि जिद्दी हो तो उसका हठ दूर होता है यदि घर की कोई सन्तान अपनी मर्यादा से बाहर है अर्थात नियंत्रण में नहीं है तो पूर्व दिशा मंग रखे तुलसी के पौधे में से तीन पत्ते किसी ना किसी रूप में सन्तान को खिलाने से सन्तान आज्ञानुसार व्यवहार करने लगती है। कन्या के विवाह में विलम्ब हो रहा हो तो अग्नि कोण में तुलसी के पौधे को कन्या नित्य जल अर्पण कर एक प्रदक्षिणा करने से विवाह जल्दी और अनुकूल स्थान में होता है सारी बाधाए दूर होती है। यदि कारोबार ठीक नहीं चल रहा तो दक्षिण-पश्चिम में रखे तुलसी कि गमले पर प्रति शुक्रवार को सुबह कच्चा दूध अर्पण करे व मिठाई का भोग रख कर किसी सुहागिन स्त्री को मीठी वस्तु देने से व्यवसाय में सफलता मिलती है।
  नौकरी में यदि उच्चाधिकारी की वजह से परेशानी हो तो ऑफिस में खाली जमीन या किसी गमले आदि जहाँ पर भी मिटटी हो वहां पर सोमवार को तुलसी के सोलह बीज किसी सफेद कपडे में बाँध कर सुबह दबा दे इससे सम्मान की वृद्धि होगी. नित्य पंचामृत बना कर यदि घर कि महिला शालिग्राम जी का अभिषेक करती है तो घर में वास्तु दोष हो ही नहीं सकता। कुछ मित्रो ने इसे अन्ध विश्वास करार दिया है सो ये उनकी सोच हो सकती है। इसमें किसी को बाध्य भी नहीं किया गया है। तुलसी की देखभाल, उपाय के बारे में जानकारी दी गई है। ये तो पुराणों में भी लिखा हुआ है कि तुलसी का महत्व क्या है।


तुलसी का प्रयोग-

मलेरिया पर :- 

मलेरिया की तो तुलसी शत्रु है। तुलसी मलेरिया के कीटाणुओं को भगाती है। मलेरिया के मरीज को जितनी हो सके (अधिक से अधिक 50 या 60 तुलसी की पत्तियाँ प्रतिदिन खानी चाहिए तथा काली मिर्च पीसकर तुलसी के रस के साथ पीनी चाहिए। इससे ज्वर जड़ से नष्ट हो जायेगा।

ज्वर पर :- 

तुलसी का काढ़ा बनाकर रोगी को पिलाना चाहिए, इसके बाद रजाई ओढ़कर कुछ देर सो रहिए, पसीना आकर बुखार उतर जायगा।

खाँसी पर :- 

तुलसी और अडूसा के पत्तों को बराबर मात्रा में घोट कर पीजिए।

जी घबड़ाने पर :- 

तुलसी की पत्तियाँ 1 तोला और काली मिर्च 1 मासा पीसकर शहद के साथ चाटिए। आपका जी नहीं घबड़ायेगा तथा चित्त प्रसन्न रहेगा।

कान के दर्द पर :- 

तुलसी की पत्तियों को पीसकर उनके रस में रुई को भिगोकर कान पर रखे रहिए। दर्द फौरन बन्द हो जायगा।

दांतों के दर्द पर :-

तुलसी और काली मिर्च पीसकर उसकी गोलियाँ बनाकर पीड़ा के स्थान पर रखने से दर्द बन्द हो जायगा।

गले के दर्द पर :- 

तुलसी की पत्तियों को पीसकर शहद में चाटने से गले का दर्द बन्द हो जावेगा।

जुकाम पर :- 

तुलसी का रस पीजिए और तुलसी की सूखी पत्तियाँ खाइए। अगर हो सके तो तुलसी की चाय भी पीजिये। जुकाम नष्ट हो जायेगा।

फोड़ो पर :-

तुलसी की एक छटाँक पत्तियों को औटा लीजिए और उसके पानी को छानकर फोड़ो को धोइये, दर्द बन्द हो जायेगा तथा विष भी नष्ट हो जावेगा।

सिर दर्द पर :- 

तुलसी की पत्तियों के रस को और कपूर को चन्दन में घिसिये। खूब गाढ़ा करके उसे सिर पर लगाइये। सिर दर्द बंद हो जाएगा।

जल जाने पर :- 

तुलसी का लेप बनाकर उसमें गोले का तेल मिलाकर जले हुए स्थान पर लगाइये।

आंखों के रोग पर :- 


तुलसी का लेप बनाकर आंखों के आस-पास रखना चाहिए। इससे आँख ठीक हो जाती है। अगर हो सके तो तुलसी के रस में रुई को भागो कर पलक के ऊपर रखिए। इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है।

पित्ती निकलने पर :- 
तुलसी के बीजों को पीसकर आँवले के मुरब्बे के साथ खाने से पित्ती दूर हो जाती है।

जहर खा लेने पर :- 

तुलसी की पत्तियों को पीस कर उनको मक्खन के साथ खाने से विष दूर होता है।

बाल झड़ने पर अथवा सफेदी होने पर :-

 तुलसी की पत्तियों के साथ आँवले से सिर धोने पर बाल न तो सफेद होते है और न झड़ते हैं।

तपैदिक होने पर :- 

तपैदिक के मरीज को किसी तुलसी के बगीचे में रहना चाहिये और अधिक से अधिक तुलसी खानी चाहिये इससे वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जावेगा। तुलसी की आव-हवा का तपैदिक के मरीज पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। तुलसी की गन्ध से तपैदिक के कीटाणु मर जाते है। रोगी शीघ्र स्वस्थ होकर स्वास्थ्य लाभ भी प्राप्त करेगा।
इसी तरह साँप के विष को दूर करने के लिये भी तुलसी एक अमूल्य औषधि है। साँप के काट लेने पर तुरन्त ही रोगी को तुलसी की पत्तियाँ खिलानी चाहिये। इसके बाद जहाँ साँप ने काटा है उस जगह को शीघ्र ही चाकू से काट देना चाहिये तथा घाव के ऊपर एक कपड़ा बड़ी मजबूती से कसकर बाँध दीजिये। इसके पश्चात जहां साँप ने काटा है वहाँ तुलसी की सुखी जड़ को घिस कर मक्खन मिलाकर उसकी पट्टी बाँधनी चाहिए। पट्टी विष को अपनी तरफ खींचेगी। जिससे उसका रंग काला पड़ जायेगा। रंग काला पड़ते ही दूसरी पट्टी बाँधनी चाहिये। जब तक पट्टी का रंग बिलकुल सफेद ही न रहे यह क्रम जारी रखना चाहिये। शीघ्र ही साँप का विष उतर जायगा।

शिरो रोग :-

- तुलसी की छाया शुष्क मंजरी के 1-2 ग्राम चूर्ण को मधु के साथ खाने से शिरो रोग से लाभ होता है।
- तुलसी के 5 पत्रों को प्रतिदिन पानी के साथ निगलने से बुद्धि, मेधा तथा मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है।
- तुलसी तेल को 1-2 बूंद नाक में टपकाने से पुराना स्मि दर्द तथा अन्य सिर संबंध्ी रोग दूर होते हैं।
- तुलसी के तेल को सिर में लगाने से जुएं व लीखें मर जाती हैं। तेल को मुंह पर मलने से चेहरे का रंग सापफ हो जाता है।

कर्ण रोग :-

- कर्णशाल - तुलसी पत्रा स्वरस को गर्म करके 2-2 बूंद कान में टपकाने से कर्णशूल का शमन होता है।

- तुलसी के पत्ते, एरंड की कॉपले और चुटकी भर नमक को पीसकर कान पर उसका गुनगुना लेप करने से कान के पीछे (कर्णशूल) की सूजन नष्ट होती है।

मुख रोग :-

- दंतशूल- काली मिर्च और तुलसी के पत्तों की गोली बनाकर दांत के नीचे रखने से दंतशूल दूर होता है।
- तुलसी के रस को हल्के गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ला करने से कंठ के रोगों में लाभ होता है।
- तुलसी रस युक्त जल में हल्दी और संेध नमक मिलाकर कुल्ला करने से मुख, दांत तथा गले के विकार दूर हाते हैं।

वक्ष रोग :-

- सर्दी, खांसी, प्रतिश्चाय एवं जुकाम-तुलसी पत्रा (मंजरी सहित) 50 ग्राम, अदरक 25 ग्राम तथा काली मिर्च 15 ग्राम को 500 मिली जल में मिलाकर क्वाथ करें। चौथाई शेष रहने पर छाने तथा इसमें 10 ग्राम छोटी इलायची के बीजों को महीन चूर्ण डालें व 200 ग्राम चीनी डालकर पकायें और एक बार की चाशनी हो जाने पर छानकर रख लें।
- इस शर्बत का आधे से डेढ़ चम्मच की मात्रा में बच्चों को तथा 2 से चार चम्मच तक बड़ों को सेवन कराने से खांसी, श्वास, काली खांसी, कुक्कर खांसी, गले की खराश आदि से फायदा होता है।
- इस शर्बत में गर्म पानी मिलाकर लेने से जुकाम तथा दमा में बहुत लाभ होता है।
- तुलसी की मंजरी, सोंठ, प्याज का रस और शहद मिलाकर चटाने से सूखी खांसी और बच्चे के दमें में लाभ होता है।

उदर रोग :-

- वमन: 

10 मिली तुलसी पत्रा स्वरस में समभाग अदरक स्वरस तथा 500 मिग्रा इलायची चूर्ण मिलाकर लेने से आराम मिलता है।

- अग्निमांद्य-

तुलसी पत्रा के स्वरस अथवा पफाण्ट को दिन में तीन बार भोजन से पहले पिलाने से अजीर्ण अग्निमांद्य, बालकों की वकृत प्लीहा की विकृतियों में लाभ होता है।

- अपच-

-तुलसी की 2 ग्राम मंजरी को पीसकर काले नमक के साथ दिन में 3 से 4 बार देने से लाभ होता है।

अस्थिसंधि रोग :-

- वातव्याधि - 2 से 4 ग्राम तुलसी पन्चाड चूर्ण का सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से संधिशोथ एवं गठिया के दर्द में लाभ होता है।

बाल रोग:

- छोटे बच्चों को सर्दी जुकाम होने पर तुलसी व 5-7 बूंद अदरक रस को शहद में मिलाकर चटाने से बच्चों का कफ, सर्दी, जुकाम ठीक हो जाता है पर नवजात शिशु को यह मिश्रण अल्प मात्रा में ही दें।इन सब गुणों के अतिरिक्त तुलसी और बहुत से रोगों को दूर करती है। तुलसी की पत्तियों को सुखाकर उनको कूटकर छान लेना चाहिये और फिर नहाते समय दूध अथवा दही के साथ शरीर पर मलना चाहिये। इस प्रकार तुलसी साबुन का काम भी दे सकती है। तुलसी की पत्तियाँ और काली मिर्च सुबह नहा धोकर खानी चाहिये इससे दिन भर चित्त प्रसन्न रहता है, दिनभर शरीर में स्फूर्ति रहती है और मन शान्त रहता है। तभी तो शास्त्रों में भी लिखा है :-
“महा प्रसाद जननी, सर्व सौभाग्य वर्दिधुनी। आदि व्याधि हरि निर्त्य, तुलसित्वं नमोस्तुते॥”

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9.12.18

आयरनयुक्त शाकाहारी चीजों से हेमोग्लोबिन बढ़ाएँ


                                                 

आयरन हमारे शरीर के लिए जरूरी है क्योंकि ये रक्त में हीमोग्लोबिन का सबसे जरूरी घटक है। यही हीमोग्लोबिन हमारे शरीर के सभी अंगों तक ऑक्सीजन ले जाने में मदद करता है। आयरन हमारे शरीर के लिए इसलिए भी जरूरी है क्योंकि ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्यूनिटी बढ़ाता है।
क्यों जरूरी है आयरन
शरीर में आयरन पर्याप्त मात्रा में होने पर शरीर की हर कोशिका पूरी तरह से ऊर्जा से भरी रहती है। आयरन की कमी से एनीमिया की बीमारी होने के अलावा दूसरी बीमारी होने का जोखिम बना रहता है। इसके कमी से शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता घटती है, जिससे कोई भी बीमारी जल्दी शरीर में घर कर जाती है। बच्चों इसकी कमी से एकाग्र नहीं हो पाते हैं। गर्भवती महिला में इसके कमी से उनके साथ-साथ शिशु पर भी बूरा प्रभाव पड़ता है।
कितनी होनी चाहिए आयरन की मात्रा
गर्भवती महिलाओं को आयरन की सबसे अधिक जरूरत होती है। किसी गर्भवती महिला को रोज़ 27 मिलीग्राम आयरन की ज़रुरत होती है। 18 से 35 वर्ष के महिलाओं और पुरुषों को 18 मिलीग्राम आयरन के सेवन की सलाह दी जाती है। 35 से 50 साल के लोगों को 10 मिलीग्राम आयरन की जरूरत होती है वहीं 50 वर्ष से ऊपर की उम्र के पुरुषों और महिलाओं को 8 मिलीग्राम आयरन की आवश्यकता होती है।
वैसे शरीर की जरूरत देखें, तो हमें सिर्फ 1 से 2 ग्राम आयरन की जरूरत होती है मगर आहार से मिल रहे कुल आयरन का 10 फीसदी आंत अवशोषित कर लेती है। इसलिए हमें कम-से-कम 10 से 20 मिलीग्राम आयरन का सेवन करना चाहिए।
आयरन के शाकाहारी स्रोत

काजू

काजू शरीर में खास पोषक तत्‍वों की कमी को दूर करता है। जिन लोगों के शरीर में आयरन की कमी होती है डॉक्‍टर उन्‍हें काजू लेने की सलाह देते हैं। पुरुषों को 8 मिलीग्राम आयरन की जरूरत है जबकि महिलाओं को 18 मिलीग्राम आयरन की जरूरत होती हैं। अगर कोई 10 ग्राम काजू खाता है तो उसको 0.3 मिलीग्राम आयरन प्राप्‍त होता है।

पालक

पालक में आयरन काफी अधिक मात्रा में होता है। हीमोग्‍लोबिन की कमी होने पर पालक का सेवन करने से शरीर में इसकी कमी पूरी होती है। इसके अलावा पालक में कैल्शियम, सोडियम, क्लोरीन, फास्फोरस, खनिज लवण और प्रोटीन जैसे तत्‍व आदि मुख्य हैं।

मुनक्का

मुनक्के में आयरन और बी कॉम्पलेक्स यानि विटामिन बी भरपूर मात्रा में होता है इसलिए मुनक्का शरीर की कमजोरी और एनीमिया को ठीक करता है। इसमें मौजूद आयरन रक्त में हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाता है। यह स्‍वाद में मीठा और हल्‍का, सुपाच्‍य और नर्म होता है। गर्मियों में कम मुनक्का खाना चाहिए क्योंकि इसकी तासीर गर्म होती है।

मूंगफली

मूंगफली एक ऐसा नट्स है जो सस्ता और पौष्टिकता से भरपूर होता है। यह आयरन और कैल्शियम का भंडार होता है। इसके अलावा इसमें फाइबर भी होता है। जब मूंगफली को मूंगफली मक्‍खन के रूप में सेवन किया जाता है तो इसके दो बड़े चम्‍मच में 0.6 मिलीग्राम आयरन शामिल होता है। इसमें पोटेशियम, मैग्नीशियम और विटामिन बी भी शामिल होता हैं।

चने


एनीमिया का इलाज करने के लिए रोज सुबह नाश्ते में भीगे हुए चना दाल खाएं। रात को एक कटोरी चना दाल भिगा लें। सुबह उसमें आधा प्याज, लहसुन और एक टमाटर काट कर मिला लें। थोड़ा सा नमक डालें। अब इसे खा लें। रोजाना चना दाल ऐसे ही सुबह खाएं। हीमोग्लोबिन कंट्रोल करने के लिए आप भीगे हुए दाल में एक चम्मच शहद मिलाकर भी खाएंगे तो फायदा करेगा।

तिल

तिल भी आयरन का बहुत अच्छा स्रोत है। इसमें कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्‍प्‍लेक्‍स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्‍व पाये जाते हैं। तिल का सेवन करने से तनाव दूर होता है और मानसिक दुर्बलता नही होती। प्रतिदिन लगभग पचास ग्राम तिल खाने से आयरन और कैल्शियम की आवश्यकता पूरी होती है। तिल को आप गुड़ के साथ मिलाकर लड्डू के रूप में भी खा सकते हैं।

गुड़ का सेवन

एक चम्मच गुड़ में 3.2 मि.ग्रा. आयरन होता है। इसीलिए एनिमिया से ग्रस्त लोगों को रोज 100 ग्राम गुड़ जरूर खाना चाहिए। गुड़ में सुक्रोज 59.7 प्रतिशत, ग्लूकोज 21.8 प्रतिशत, खनिज तरल 26 प्रतिशत तथा जल अंश 8.86 प्रतिशत मौजूद होते हैं। खाने के बाद थोड़ा सा गुड़ खाने से भी एनिमिया दूर होता है। इसे खाने से ब्‍लड में शुगर की समस्‍या नहीं होगी।

रागी

रागी आयरन का बहुत अच्छा प्राकृतिक स्रोत है। रागी की खपत से खून की कमी की स्थिति बेहतर होती है।नई माँओं को रागी खाने की सलाह दी जाती है, जिससे उनमें हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाया जा सके। जिन मांओं के स्तनों में दूध का ठीक से उत्पादन ना हो रहा हो, उन्हें हरी रागी का सेवन करने की सलाह दी जाती है।दूध पिलाने वाली माताओं में दूध की कमी के लिये यह टॉनिक का कार्य करता है।

ब्रोकली

ब्रोकली में आयरन और विटामिन सी की भरपूर मात्रा होती है। विटामिन सी शरीर में इम्यूनिटी सिस्टम को मजबूत करने और इन्फेक्शन से लड़ने का काम करता है। इसमें कुछ ऐसे तत्व भी मौजूद होते हैं जो शरीर से टॉक्सिन्स निकाल बाहर करते हैं और सर्दी-जुकाम से प्रतिरक्षा प्रदान करते हैं।

मोटे अनाज

अनाज का सेवन करने से भी आयरन की कमी दूर होती है क्‍योंकि इसमें आयरन अधिक मात्रा में होता है। हीमोग्लोबिन का स्तर बढ़ाने के लिए भोजन में गेंहू और सूजी की बनी चीजे बहुत फायदेमंद हैं।


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4.12.18

अनिद्रा की होम्योपैथिक औषधियाँ( Insomnia and Homeopathy )

                                         

अच्छी सेहत के लिए सिर्फ प्रॉपर डाइट लेना ही काफी नहीं है। अच्छी नींद भी हेल्दी रहने के लिए उतनी ही जरूरी है। आजकल कई प्रफेशन में डिफरेंट शिफ्ट्स में काम होता है। ऐसे में सबसे ज्यादा नींद पर असर पड़ता है। कई बार तो ऐसा होता है कि टुकड़ों में नींद पूरी करनी पड़ती है, लेकिन छोटी-छोटी नैप लेना सेहत के लिहाज से बेहद खराब होता है। एक रिसर्च के मुताबिक, खराब नींद यानि छोटे-छोटे टुकड़ों में ली गई नींद बिल्कुल न सोने से भी ज्यादा खतरनाक होती है। इससे कई तरह की बीमारियां शरीर को शिकार बना सकती हैं।
टुकड़ों में सोने वाले लोग सुबह उठकर भी फ्रेश नहीं फील करते हैं। रिसर्च में यह साबित हो चुका है। अमेरिका के जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में दो तरह की नींद का अध्ययन किया है। इसमें रुकावट के साथ सोने वाली नींद और कम समय के लिए ही सही लेकिन शांति वाली नींद शामिल है। इन लोगों के मिजाज को जब कंपेयर किया गया तो पाया कि टुकड़ों में सोने वाले लोगों की तुलना में शांति से सोने वाले लोगों का मूड बेहतर था।
खराब नींद किडनी पर भी बुरा असर डालती है। शरीर में ज्यादातर प्रोसेस नैचरल डेली रिद्म (सरकाडियन क्लॉक या शरीर की प्राकृतिक घड़ी) के आधार पर होते हैं। ये हमारी नींद से ही कंट्रोल होता है। एक रिसर्च के मुताबिक जब सोने की साइकल बिगड़ती है तो किडनी को नुकसान होता है। इससे किडनी से जुड़ी कई बीमारियां हो सकती हैं।

आधी-अधूरी नींद दिल के लिए भी खतरे की घंटी है। इससे हार्ट डिजीज होने के चांस तो बढ़ते ही हैं, साथ ही दिल का दौरा भी पड़ सकता है। एक रिसर्च में खराब नींद की शिकायत करने वालों में अच्छी नींद लेने वालों के मुकाबले 20 फीसदी ज्यादा कोरोनरी कैल्शियम पाया गया।
कम नींद लेने से दिमाग सही तरह से काम नहीं कर पाता है। इसका सीधा असर हमारी याद‌्‌दाश्त पर पड़ता है। इसके अलावा, पढ़ने, सीखने व डिसीजन लेने की क्षमताएं भी इफेक्ट होती हैं। खराब नींद से स्ट्रेस लेवल भी बढ़ता है और इमोशनली वीक लोग डिप्रेशन के भी शिकार हो सकते हैं।
होम्योपैथिक उपचार में प्रयुक्त विभिन्न औषधियों से चिकित्सा–
नींद लाने के लिए बार-बार कॉफिया औषधि का सेवन करना होम्योपैथी चिकित्सा नहीं है, हां यदि नींद न आना ही एकमात्र लक्षण हो दूसरा कोई लक्षण न हो तब इस प्रकार की औषधियां लाभकारी है जिनका नींद लाने पर विशेष-प्रभाव होता है- कैल्केरिया कार्ब, सल्फर, फॉसफोरस, कॉफिया या ऐकानाइट आदि।


1. लाइकोडियम- 


दोपहर के समय में भोजन करने के बाद नींद तेज आ रही हो और नींद खुलने के बाद बहुत अधिक सुस्ती महसूस हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए लाइकोडियम औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।

2. चायना-


 रक्त-स्राव या दस्त होने के कारण से या शरीर में अधिक कमजोरी आ जाने की वजह से नींद न आना या फिर चाय पीने के कारण से अनिद्रा रोग हो गया हो तो उपचार करने के लिए चायना औषधि 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।

3. कैल्केरिया कार्ब –


 इस औषधि की 30 शक्ति का उपयोग दिन में तीन-तीन घंटे के अंतराल सेवन करने से रात के समय में नींद अच्छी आने लगती है। यह नींद किसी प्रकार के नशा करने के समान नहीं होती बल्कि स्वास्थ नींद होती है।

4. कॉफिया –


 खुशी के कारण नींद न आना, लॉटरी या कोई इनाम लग जाने या फिर किसी ऐसे समाचार सुनने से मन उत्तेजित हो उठे और नींद न आए, मस्तिष्क इतना उत्तेजित हो जाए कि आंख ही बंद न हो, मन में एक के बाद दूसरा विचार आता चला जाए, मन में विचारों की भीड़ सी लग जाए, मानसिक उत्तेजना अधिक होने लगे, 3 बजे रात के बाद भी रोगी सो न पाए, सोए भी तो ऊंघता रहें, चौंक कर उठ बैठे, नींद आए भी ता स्वप्न देखें। इस प्रकार के लक्षण रोगी में हो तो उसके इस रोग का उपचार करने के लिए कॉफिया औषधि की 200 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। यह नींद लाने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि है। यदि गुदाद्वार में खुजली होने के कारण से नींद न आ रही हो तो ऐसी अवस्था में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है। रोगी के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए कॉफिया औषधि की 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।

5. जेल्सीमियम –


 यदि उद्वेगात्मक-उत्तेजना (इमोशनल एक्साइटमेंट) के कारण से नींद न आती हो तो जेल्सीमियम औषधि के सेवन से मन शांत हो जाता है और नींद आ जाती है। किसी भय, आतंक या बुरे समाचार के कारण से नींद न आ रही हो तो जेल्सीमियम औषधि से उपचार करने पर नींद आने लगती है। बुरे समाचार से मन के विचलित हो जाने पर उसे शांत कर नींद ले आते हैं। अधिक काम करने वाले रोगी के अनिंद्रा रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का उपयोग करना चाहिए। ऐसे रोगी जिनकों अपने व्यापार के कारण से रात में अधिक बेचैनी हो और नींद न आए, सुबह के समय में उठते ही और कारोबार की चिंता में डूब जाते हो तो ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।

6. ऐकोनाइट – 


बूढ़े-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तथा इसके साथ ही उन्हें घबराहट हो रही हो, गर्मी महसूस हो रही हो, चैन से न लेट पाए, करवट बदलते रहें। ऐसे बूढ़े रोगियों के इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 30 का उपयोग करना लाभकारी है। यह औषधि स्नायु-मंडल को शांत करके नींद ले आती है। किसी प्रकार की बेचैनी होने के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।

7. कैम्फर – 


नींद न आने पर कैम्फर औषधि के मूल-अर्क की गोलियां बनाकर, घंटे आधे घंटे पर इसका सेवन करने से नींद आ जाती है।

8. इग्नेशिया – 


किसी दु:ख के कारण से नींद न आना, कोई सगे सम्बंधी की मृत्यु हो जाने से मन में दु:ख अधिक हो और इसके कारण से नींद न आना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को इग्नेशिया औषधि की 200 शक्ति का सेवन करना चाहिए। यदि किसी रोगी में भावात्मक या भावुक होने के कारण से नींद न आ रही हो तो उसके इस रोग का उपचार इग्नेशिया औषधि से करना लाभदायक होता है। हिस्टीरिया रोग के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग का उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 200 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है। यदि रोगी को नींद आ भी जाती है तो उसे सपने के साथ नींद आती है, देर रात तक सपना देखता रहता है और रोगी अधिक परेशान रहता है। नींद में जाते ही अंग फड़कते हैं नींद बहुत हल्की आती है, नींद में सब-कुछ सुनाई देता है और उबासियां लेता रहता है लेकिन नींद नहीं आती है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए इग्नेशिया औषधि का उपयोग करना उचित होता है। मन में दु:ख हो तथा मानसिक कारणों से नींद न आए और लगातार नींद में चौक उठने की वजह से नींद में गड़बड़ी होती हो तो उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 3 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।

9. बेलाडोना – 


मस्तिष्क में रक्त-संचय होने के कारण से नींद न आने पर बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। रोगी के मस्तिष्क में रक्त-संचय (हाइपरमिया) के कारण से रोगी ऊंघता रहता है लेकिन मस्तिष्क में थाकवट होने के कारण से वह सो नहीं पाता। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए के लिए भी बेलाडोना औषधि उपयोगी है। रोगी को गहरी नींद आती है और नींद में खर्राटें भरता है, रोगी सोया तो रहता है लेकिन उसकी नींद गहरी नहीं होती। रोगी नींद से अचानक चिल्लाकर या चीखकर उठता है, उसकी मांस-पेशियां फुदकती रहती हैं, मुंह भी लगतार चलता रहता है, ऐसा लगता है मानो वह कुछ चबा रहा हो, दांत किटकिटाते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी का मस्तिष्क शांत नहीं रहता। जब रोगी को सोते समय से उठाया जाता है तो वह उत्तेजित हो जाता है, अपने चारों तरफ प्रचंड आंखों (आंखों को फाड़-फाड़कर देखना) से देखता है, ऐसा लगता है कि मानो वह किसी पर हाथ उठा देगा या रोगी घबराकर, डरा हुआ उठता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है। अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए कैमोमिला औषधि का उपयोग करने पर लाभ न मिले तो बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करें।

10. काक्युलस- 


यदि रात के समय में अधिक जागने के कारण से नींद नहीं आ रही हो तो ऐसे रोगी के इस लक्षण को दूर करने के लिए काक्युलस औषधि की 3 से 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। जिन लोगों का रात के समय में जागने का कार्य करना होता है जैसे-चौकीदार, नर्स आदि, उन्हें यदि नींद न आने की बीमारी हो तो उनके के लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद है। यदि नींद आने पर कुछ परेशानी हो और इसके कारण से चक्कर आने लगें तो रोग को ठीक करने के लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।

11. सल्फर – 


रोगी की नींद बार-बार टूटती है, जारा सी भी आवाजें आते ही नींद टूट जाती है, जब नींद टूटती है तो रोगी उंघाई में नहीं रहता, एकदम जाग जाता है, रोगी की नींद कुत्ते की नींद के समान होती है। रोगी के शरीर में कहीं न कहीं जलन होती है, अधिकतर पैरों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।

12. नक्स वोमिका –



 रोगी का मस्तिष्क इतना कार्य में व्यस्त रहता है कि वह रात भर जागा रहता है, व्यस्त मस्तिष्क के कारण नींद न आ रही हो, मन में विचारों की भीड़ सी लगी हो, आधी रात से पहले तो नींद आती ही नहीं यादि नींद आती भी है तो लगभग तीन से चार बजे नींद टूट जाती है। इसके घंटे बाद जब वह फिर से सोता है तो उठने पर उसे थकावट महसूस होती है, ऐसा लगता है कि मानो नींद लेने पर कुछ भी आराम न मिला हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
किसी रोगी को आधी रात से पहले नींद नहीं आती हो, शाम के समय में नींद नहीं आती हो और तीन या चार बजे नींद खुल जाती हो, इस समय वह स्वस्थ अनुभव करता है लेकिन नींद खुलने के कुछ देर बाद उसे फिर नींद आ घेरती है और तब नींद खुलने पर वह अस्वस्थ अनुभव करता है, इस नींद के बाद तबीयत ठीक नहीं रहती। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कब्ज बनना, पेट में कीड़ें होना, अधिक पढ़ना या अधिक नशा करने के कारण से नींद न आए तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए नक्स वोमिका औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।


13.पल्स – 


रोगी शाम के समय में बिल्कुल जागे हुए अवस्था में होता है, दिमाग विचारों से भरा हो, आधी रात तक नींद नहीं आती, बेचैनी से नींद बार-बार टूटती है, परेशान भरे सपने रात में दिखाई देते हैं, गर्मी महसूस होती है, उठने के बाद रोगी सुस्त तथा अनमाना स्वभाव का हो जाता है। आधी रात के बाद नींद न आना और शाम के समय में नींद के झोकें आना, रोगी का मस्तिष्क व्यस्त हो अन्यथा साधारण तौर पर तो शाम होते ही नींद आती है और 3-4 बजे नींद टूट जाती है, इस समय रोगी रात को उठकर स्वस्थ अनुभव करता है, यह इसका मुख्य लक्षण है-शराब, चाय, काफी से नींद न आए। ऐसी अवस्था में रोगी को पल्स औषधि का सेवन कराना चाहिए।

14. सेलेनियम –
 

रोगी की नींद हर रोज बिल्कुल ठीक एक ही समय पर टूटती है और नींद टूटने के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार करने के लिए सेलेनियम औषधि का उपयोग कर सकते हैं।

15. ऐम्ब्राग्रीशिया –
 

रोगी अधिक चिंता में पड़ा रहता है और इस कारण से वह सो नहीं पाता है, वह जागे रहने पर मजबूर हो जाता है। व्यापार या कोई मानसिक कार्य की चिंताए होने से नींद आने में बाधा पड़ती है। सोने के समय में तो ऐसा लगता है कि नींद आ रही है लेकिन जैसे ही सिर को तकिए पर रखता है बिल्कुल भी नींद नहीं आती है। इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्राग्रीशिया औषधि की 2 या 3 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है। इस औषधि का उपयोग कई बार करना पड़ सकता है।

16. फॉसफोरस – 


रोगी को दिन के समय में नींद आती रहती है, खाने के बाद नींद नहीं आती लेकिन रात के समय में नींद बिल्कुल भी नहीं आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
वृद्ध-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
आग लगने या संभोग करने के सपने आते हों और नींद देर से आती हो तथा सोकर उठने के बाद कमजोरी महसूस होता हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए फॉसफोरस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
रोगी को धीरे-धीरे नींद आती है और रात में कई बार जाग पड़ता है, थोड़ी नींद आने पर रोगी को बड़ा आराम मिलता है, रोगी के रीढ़ की हड्डी में जलन होती है और रोग का अक्रमण अचानक होता है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना अधिक लाभकारी है।


17. टैबेकम-

 यदि स्नायविक-अवसाद (नर्वस ब्रेकडाउन) के कारण से अंनिद्रा रोग हुआ हो या हृदय के फैलाव के कारण नींद न आने के साथ शरीर ठंडा पड़ गया हो, त्वचा चिपचिपी हो, घबराहट हो रही हो, जी मिचलाना और चक्कर आना आदि लक्षण हो तो रोग को ठीक करने के लिए टैबेकम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।

18. ऐवैना सैटाइवा –


 स्नायु-मंडल पर ऐवैना सैटाइवा औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। ऐवैना सैटाइवा जई का अंग्रेजी नाम है। जई घोड़ों को ताकत के लिए खिलाई जाती है जबकि यह मस्तिष्क को ताकत देकर अच्छी नींद लाती है। कई प्रकार की बीमारियां शरीर की स्नायु-मंडल की शक्ति को कमजोर कर देती है जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आती है। ऐसी स्थिति में ऐवैना सैटाइवा औषधि के मूल-अर्क के 5 से 10 बूंद हल्का गर्म पानी के साथ लेने से स्नायुमंडल की शक्ति में वृद्धि होती है जिसके परिणाम स्वरूप नींद भी अच्छी आने लगती है। अफीम खाने की आदत को छूड़ाने के लिए भी ऐवैना सैटाइवा औषधि का उपयोग किया जा सकता है।

19. स्कुटेलेरिया –


 यदि किसी रोगी को अंनिद्रा रोग हो गया हो तथा सिर में दर्द भी रहता हो, दिमाग थका-थका सा लग रहा हो, अपनी शक्ति से अधिक काम करने के कारण उसका स्नायु-मंडल ठंडा पड़ गया हो तो ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए स्कुटेलेरिया औषधि का प्रयोग आधे-आधे घंटे के बाद इसके दस-दस बूंद हल्का गर्म पानी के साथ देते रहना चाहिए, इससे अधिक लाभ मिलेगा।

20. सिप्रिपीडियम –


 अधिक खुशी का सामाचार सुनकर जब मस्तिष्क में विचारों की भीड़ सी लग जाए और इसके कारण से नींद न आए या जब छोटे बच्चे रात के समय में उठकर एकदम से खेलने लगते हैं और हंसते रहते हैं और उन्हें नींद नहीं आती है। ऐसे रोगियों के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए सिप्रिपीडियम औषधि के मूल-अर्क के 30 से 60 बूंद दिन में कई बार हल्का गर्म पानी के साथ सेवन कराना चाहिए। रात में अधिक खांसी होने के कारण से नींद न आ रही हो तो सिप्रिपीडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप खांसी से आराम मिलता है और नींद आने लगती है।

21. कैमोमिला –
 

दांत निकलने के समय में बच्चों को नींद न आए और जंहाई आती हो और बच्चा औंघता रहता हो लेकिन फिर भी उसे नींद नहीं आती हो, उसे हर वक्त अनिद्रा और बेचैनी बनी रहती है। ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए कैमोमिला औषधि की 12 शक्ति का सेवन कराने से अधिक लाभ मिलता है।
22. बेल्लिस पेरेन्नि स- यदि किसी रोगी को सुबह के तीन बजे के बाद नींद न आए तो बेल्लिस पेरेन्निस औषधि के मूल-अर्क या 3 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।
23. कैनेबिस इंडिका- 

अनिद्रा रोग (ओब्सीनेट इंसोम्निया) अधिक गंभीर हो और आंखों में नींद भरी हुई हो लेकिन नींद न आए। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए कैनेबिस इंडिका औषधि के मूल-अर्क या 3 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद है। इस प्रकार के लक्षण होने पर थूजा औषधि से भी उपचार कर सकते हैं।

24. पल्सेटिला-


 रात के समय में लगभग 11 से 12 बजे नींद न आना। इस लक्षण से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

25. सिमिसि- 


यदि स्त्रियों के वस्ति-गव्हर   की गड़बड़ी के कारण से उन्हें अनिद्रा रोग हो तो उनके इस रोग का उपचार करने के लिए सिमिसि औषधि की 3 शक्ति का उपयोग किया जाना चाहिए।

26. साइना- 


पेट में कीड़ें होने के कारण से नींद न आने पर उपचार करने के लिए साइना औषधि की 2x मात्रा या 200 शक्ति का उपयोग करना लाभदाक है।

27. पैसिफ्लोरा इंकारनेट-


 नींद न आने की परेशानी को दूर करने के लिए यह औषधि अधिक उपयोगी होती है। उपचार करने के लिए इस औषधि के मल-अर्क का एक बूंद से 30 बूंद तक उपयोग में लेना चाहिए।

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प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा

3.12.18

संधि बुखार (Rheumatic fever) से बचाव और उपचार



रुमैटिक फीवर (आमवातिक ज्वर)के लिए स्ट्रेप्टोकोकस नामक बैक्टीरिया को जि़म्मेदार माना जाता है। शुरुआती दौर में इसकी वजह से होने वाले संक्रमण को स्कारलेट फीवर कहा जाता है। जब सही समय पर इसका उपचार नहीं किया जाता तो रुमैटिक फीवर होने की आशंका बढ़ जाती है। इसकी वजह से शरीर का इम्यून सिस्टम असंतुलित हो जाता है और वह अपने स्वस्थ टिश्यूज़ को नष्ट करने लगता है। स्कूली बच्चों मेंरुमैटिक फीवर होने की एक प्रमुख वजह यह भी है कि उनका इम्यून सिस्टम पूरी तरह विकसित नहीं होता लेकिन बाहरी वातावरण से उनका संपर्क बहुत ज्य़ादा होता है। ऐसे में बैक्टीरिया उनके कमज़ोर शरीर पर हमला कर देता है और बच्चों का इम्यून सिस्टम उससे लडऩे में सक्षम नहीं होता। आनुवंशिक कारणों की वजह से बच्चों को यह समस्या हो सकती है। अगर घर में सफाई का ध्यान न रखा जाए, तब भी बच्चों को यह फीवर हो सकता है।

मुख लक्षण

गले में खराश, जोड़ों में दर्द, सूजन, छाती और पेट में दर्द, नॉजि़या, वोमिटिंग, सांस फूलना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, त्वचा पर लाल रैशेज़, शारीरिक गतिविधियों में असंतुलन, हाथ-पैरों में कंपन और कंधे में झटके लगना आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं।
बुखार के साथ नाक से पानी गिरने की स्थिति में उसके साथ नुकसानदेह बैक्टीरिया भी शरीर से बाहर निकल जाते हैं, जिससे व्यक्ति शीघ्र स्वस्थ हो जाता है। इसलिए अगर बुखार के साथ बच्चे को रनिंग नोज़ की समस्या न हो तो ऐसी स्थिति ज्य़ादा चिंताजनक मानी जाती है।

सेहत पर असर

रुमैटिक फीवर के कारण कई बार हार्ट के मसल्स और वॉल्व डैमेज हो जाते हैं, जिसे रुमैटिक हार्ट डिज़ीज़ कहा जाता है। दिल के वॉल्व वन-वे डोर के रूप में कार्य करते हैं। इसी वजह से हृदय द्वारा पंप किए जाने वाले रक्त का प्रवाह एक ही दिशा में होता है। वॉल्व के क्षतिग्रस्त होने पर इनसे ब्लड लीक हो सकता है। यह ज़रूरी नहीं है कि ऐसे बुखार के कारण हृदय को हमेशा नुकसान पहुंचे लेकिन उपचार में देर होने पर हार्ट के डैमेज होने की आशंका बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में हार्ट के आसपास पानी जमा होने लगता है। इससे उसके हार्ट के वॉल्व बहुत ढीले या टाइट हो जाते हैं। इन दोनों ही स्थितियों में वह सही ढंग से काम नहीं कर पाता। कुछ मामलों में रुमैटिक फीवर के लक्षण महीनों तक दिखाई देते हैं, जिससे बच्चों में रुमैटिक हार्ट डिज़ीज़ की आशंका बढ़ जाती है और उसके साथ ही स्वास्थ्य संबंधी कुछ और भी जटिलताएं हो सकती हैं, जो इस प्रकार हैं :

वॉल्व स्टेनोसिस : वॉल्व का संकरा होना

वॉल्व रिगर्गिटेशन (valveregurgitation) : 

इस स्थिति में वॉल्व से लीकेज होता है, जिस कारण रक्त का गलत दिशा में प्रवाह होने लगता है।

हार्ट मसल्स में डैमेज : 

सूजन के कारण हृदय की मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे वह ब्लड को सही ढंग से पंप नहीं कर पाता।

उपचार एवं बचाव

- अगर बच्चे के गले में संक्रमण या दो-तीन दिनों तक 101 डिग्री से ज्य़ादा बुखार हो तो उसे तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।
- अगर घर में किसी एक बच्चे को ऐसा संक्रमण है तो उसे दूसरे बच्चों से दूर रखें, अन्यथा उसे भी ऐसी समस्या हो सकती है।
- आमतौर पर कुछ सप्ताह से लेकर महीने भर में यह समस्या दूर हो जाती है लेकिन यह ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि इसकी वजह से बच्चे के हार्ट को कोई नुकसान न पहुंचे क्योंकि उसकी क्षतिपूर्ति असंभव है।
- इसके उपचार के लिए डॉक्टर एंटीबायोटिक दवाएं देते हैं पर अपने मन से बच्चे को ऐसी दवा देने की कोशिश न करें।
- अगर स्थिति ज्य़ादा गंभीर हो तो डॉक्टर स्टेरॉयड देने की भी सलाह देते हैं।
- बच्चे के लिए एक टेंपरेचर चार्ट बनाएं। हर दो घंटे के बाद थर्मामीटर से उसके शरीर का तापमान जांच कर उसे चार्ट में दर्ज करें।
- उपचार को बीच में अधूरा न छोड़ें। बच्चे को सभी दवाएं निश्चित समय पर दें। अगर स्थिति गंभीर हो तो बच्चे को महीनों तक दवाएं देने की ज़रूरत होती है।

Rheumatic fever में उपयोग की जाने वाली medicines

Antibiotic medication — Penicilline
Erythromycin — ये उन मरीजों को दी जाती है ,जिन मरीजों को penicilline से allergy हो
Antiinflammatory medicines — Aspirin ( inflammation को control करने के लिए )
Diazepam — यह medicine chorea को treat करने के लिए उपयोग की जाती है ।
Anti pyretic medication — Paracetamol , fever के उपचार के लिए

Rheumatic fever के मरीज के लिए diet

हमें ऐसे मरीजों को Nutritious diet ( पोषण डाइट )देनी चाहिए ।
ऐसे मरीजों को spicy diet ( मिर्च मसाले ) वाला खाना नही खाना चाहिए।
ऐसे मरीजों को दलिया या soft food खाने के लिए देना चाहिए , क्योंकि इसे उन्हें निगलने में problem नही होगी ।
ऐसे मरीजों को Fruit के juice पिलाने चाहिए

उपचार या management

ऐसे मरीज को जितना हो सके आराम करना चाहिए
Regular अपने vitals ( blood pressure , temprature , ) चेक कराने चाहिए
Infected joinds ( जिसमे pain हो रहा हो ) उसे ज्यादा न चलाये या movement न करें
गर्म सिकाई swelling और pain को सही करती है इसलिए इसका उपयोग करना चाहिए ।
डॉक्टर से परामर्श लेकर ही दवाइयों का उपयोग करना चाहिए
समय समय पर डॉक्टर से परामर्श लेते रहें
ऐसे patients को emotional support की आवश्यकता होती है ,इसलिए उन्हें tension या stress नही लेना चाहिए
पैरो या affected joints को हल्के हाथों से मालिश करें
ऐसे मरीजों के आस पास और उनकी खुद की साफ सफाई का ध्यान रखना चाहिए
जब तक doctor बताये तब तक regular treatment जारी रखें
धुले हुए और साफ कपड़ो का उपयोग करें।

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15.11.18

ट्राईग्लिसराईड बढ़ने के कारण और सावधानियाँ


जैसी ही हमारे खुन में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ता है, यह रक्त कोशिकाओं की दीवारों के ऊपर एक परत बना देता है जिसके परिणामस्वरूप पुरे शरीर में रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता है। इस कारण हृदय की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है क्योंकि यह लगातार रक्त को आवश्यकता से अधिक बल से पंप करता है।
यदि ट्राइग्लिसराइड का स्तर 200mg/dl से ज्यादा बढ़ता है तो कमर का भाग शरीर के अन्य अंगों की तुलना में ज्यादा मोटा हो जाता है और यह डायबिटीज के खतरे को बढ़ाता है।
ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ता है रक्त कोशिकाएं अवरूद्ध हो जाती है और इस अवरोध को दुर करने के लिए पैन्क्रीया लाइपेस एन्जाइम के उत्पादन के लिए पैन्क्रीया की कोशिकाएं संख्या में बढ़ जाती है। इस कारण पैन्क्रीया का आकार बढ़ जाता है जिससे पैन्क्रीयाइटिस होता है।
ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ने के कारण कई समस्याएँ जैसे आँखों की नसें प्रभावित होती है और इसका परिणाम अंधापन भी हो सकता है। इस दौरान हमें शरीर में कई जगहों जैसे घुटनों के जोड़, कोहनी आदि पर वसा की गांठे महसूस होती है। ये गांठे पीले रंग की हो सकती है।
आमतौर पर ट्राइग्लिसराइड का सामान्य स्तर स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है क्योंकि ये हमारे शरीर के द्वारा ऊर्जा के रूप में उपयोग होते है लेकिन ज्यादा कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थों के सेवन से हमारे शरीर में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ता है और यह हृदय रोग और मेटाबॉलिक सिंड्रोम के खतरे को बढ़ाता है। सामान्यतया ट्राइग्लिसराइड के स्तर का पता कोलेस्ट्रॉल के लिए किए जाने वाले ब्लड टेस्ट से चल जाता है।

ट्राइग्लिसराइड का स्वास्थ्य पर प्रभाव -

ट्राइग्लिसराइड के स्वास्थ्य पर कई प्रभाव पड़ते है। यदि ट्राइग्लिसराइड का स्तर मध्यम से ज्यादा हो तो हमें कई रोग होने का खतरा बढ़ जायेगा।

1. हृदय रोग

जैसी ही हमारे खुन में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ता है, यह रक्त कोशिकाओं की दीवारों के ऊपर एक परत बना देता है जिसके परिणामस्वरूप पुरे शरीर में रक्त का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता है। इस कारण हृदय की मांसपेशियों पर दबाव बढ़ता है क्योंकि यह लगातार रक्त को आवश्यकता से अधिक बल से पंप करता है।
इससे हमें हृदय रोग और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

2. डायबिटीज 

चीनी, ज्यादा कैलोरी युक्त खाद्य पदार्थ, कार्बोहाइड्रेट का सेवन जो आसानी से पच जाते है और खुन में ट्राइग्लिसराइड में बदल जाते है।
यदि ट्राइग्लिसराइड का स्तर 200mg/dl से ज्यादा बढ़ता है तो कमर का भाग शरीर के अन्य अंगों की तुलना में ज्यादा मोटा हो जाता है और यह डायबिटीज के खतरे को बढ़ाता है। यदि व्यक्ति को पहले से डायबिटीज है तो ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ना शुगर लेवल के नियंत्रण में नहीं होने का संकेत है। यह अनेक शारीरिक समस्याओं को पैदा करता है।

3. पैन्क्रीयाइटिस 

पैन्क्रीया, एक अंग है जो इंसुलिन, ग्लूकागन आदि हार्मोन्स स्त्रावित करता है जो मेटाबॉलिज्म और भोजन के पाचन के लिए उत्तरदायी होते है। पैन्क्रीयाइटिस इस अंग में सुजन की एक अवस्था है।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब भी रक्त में ट्राइग्लिसराइड का स्तर बढ़ता है रक्त कोशिकाएं अवरूद्ध हो जाती है और इस अवरोध को दुर करने के लिए पैन्क्रीया लाइपेस एन्जाइम के उत्पादन के लिए पैन्क्रीया की कोशिकाएं संख्या में बढ़ जाती है। इस कारण पैन्क्रीया का आकार बढ़ जाता है जिससे पैन्क्रीयाइटिस होता है।

4. अन्य ट्राइग्लिसराइड्स

ट्राइग्लिसराइड्स का स्तर बढ़ने के कारण कई समस्याएँ जैसे आँखों की नसें प्रभावित होती है और इसका परिणाम अंधापन भी हो सकता है। इस दौरान हमें शरीर में कई जगहों जैसे घुटनों के जोड़, कोहनी आदि पर वसा की गांठे महसूस होती है। ये गांठे पीले रंग की हो सकती है।

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8.11.18

आयुर्वेदिक सर्जरी की उपयोगिता और फायदे

                                      

आम राय के विपरीत आयुर्वेद में कई बीमारियों की शल्य चिकित्सा की जाती है और फिस्टुला के लिए तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान, दिल्ली में भी क्षारसूत्र से इलाज की सलाह दी जाती है.
आयुर्वेद की आठ शाखाओं में से एक शल्य तंत्र या सर्जरी शुरुआत से ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी विधा रही है. वाराणसी के महाराजा काशीराज दिवोदास धन्वंतरि आयुर्वेद में शल्य संप्रदाय के जनक रहे हैं.
आचार्य सुश्रुत (500 ई.पू.) काशीराज दिवोदास धन्वंतरि के सात शिष्यों में प्रमुख थे. उन्होंने काशी (वाराणसी) में शल्य चिकित्सा सीखी और चिकित्सा कार्य किया. उन्होंने आयुर्वेद के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक सुश्रुत संहिता की रचना की जो शल्य चिकित्सा के मूल सिद्धांतों पर उपयोगी जानकारी देती है.
उन्होंने कई शल्य चिकित्साओं से जुड़ी कारगर विधि और तकनीक के बारे में विस्तार से लिखा है. क्षतिग्रस्त नाक को फिर से बनाना (राइनोप्लास्टी), कान की लौ को फिर से ठीक करना (लोबुलोप्लास्टी), मूत्र थैली की पथरी को निकालना, लैपरोटोमी और सिजेरियन सेक्शन, घाव का उपचार, जले, टूटी हड्डी जोडऩा, कोई आंतिरक फोड़ा, आंत और मूत्र थैली के छिद्रों से जुड़े उपचार, प्रोस्टेट का बढऩा, बवासीर, फिस्टुला आदि के उपचार की कारगर विधि की खोज, शल्य चिकित्सा में उनकी दक्षता को दर्शाते हैं. सुश्रुत के डिजाइन किए हुए सर्जिकल उपकरण
क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण उनके खोजे उपचार की अन्य विधियां हैं जो कई ऐसी बीमारियों को भी ठीक कर सकती हैं जिनके इलाज के लिए सर्जरी ही एकमात्र विकल्प समझा जाता है. उन्होंने छह विभिन्न श्रेणियों में 100 से अधिक विकसित चिकित्सीय औजार और विभिन्न शल्य क्रियाओं में इस्तेमाल होने वाले 20 प्रकार के धारदार सर्जिकल उपकरणों को विकसित किया.
इसके साथ-साथ विभिन्न सुइयां और टांके लगाने में काम आने वाले रेशम और लिनन के धागे, पौधों के रेशे और कोशिका ऊतक भी डिजाइन किया. उन्होंने आंत के छिद्र की सर्जरी में चींटे के जबड़े का प्राकृतिक रूप से गलकर नष्ट हो जाने वाले क्लिप के रूप में प्रयोग किया, जो नए-नए प्रयोगों और तकनीक के उपयोग में उनकी दूरदर्शिता का परिचय देता है.
वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने नेत्र रचना विज्ञान, नेत्र की व्याधियों और नेत्र चिकित्सा पर चर्चा की. नजर की कमजोरी, मोतियाबिंद की सर्जरी के सफेद भाग, नेत्रों के पलक से जुड़ी समस्याओं एवं अन्य कई नेत्र रोगों और उनके निदान का तरीका बताया.
उन्होंने कान, नाक और गले में होने वाली विभिन्न बीमारियों और उनकी चिकित्सा के बारे में भी विस्तार से वर्णन किया है.
शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान और आयुर्वेद के अन्य मूलभूत सिद्धांतों के क्षेत्र में उनके कार्य को देखते हुए उन्हें 'शल्य चिकित्सा का जनक' भी कहा जाता है.
हालांकि शल्य चिकित्सा के क्षेत्र में उनका योगदान सर्वाधिक है, पर उन्होंने स्त्रीरोग, प्रसूति चिकित्सा और शिशु चिकित्सा प्रबंधन में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है.
सुश्रुत के समय में आयुर्वेद में सर्जरी का बड़ा प्रचलन था. लेकिन समय के साथ शल्य चिकित्सा का प्रयोग कम होता चला गया.

विश्वविद्यालयों में आयुर्वेदिक चिकित्सा प्रणाली को पढ़ाए जाने की शुरुआत 1927 में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से हुई थी.
फिर 1964 में आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई की शुरुआत हुई तो आधुनिक युग में आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के प्रयोग का दौर आरंभ हुआ.
कई प्रसिद्ध आयुर्वेदिक सर्जन विश्वविद्यालय से जुड़े और आयुर्वेद में शल्य प्रणाली के शिक्षण, प्रशिक्षण, शोध एवं उपयोग के क्षेत्र में सराहनीय योगदान दिया. उनमें से बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के संस्थापक निदेशक प्रोफेसर के.एन. उडुपा का विशेष योगदान रहा है. प्रोफेसर उडुपा 1959 में बीएचयू के साथ आयुर्वेद कॉलेज के प्रिंसिपल और सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में जुड़े.
प्रोफेसर के.एन. उडुपा के योग्य नेतृत्व में 1970 के दशक में आयुर्वेद और आधुनिक मेडिसिन, दोनों का ही भरपूर विकास हुआ. आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के पुनरुद्धार की इस प्रक्रिया में कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए.
-कई प्राचीन शल्य चिकित्सा सिद्धांत एवं दर्शन को स्थापित करना
-सुश्रुत संहिता जैसे आयुर्वेद के प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ में वर्णित शल्य प्रक्रिया और तकनीक को प्रयोग में लाना
-शल्य कर्म के जरिए ठीक होने वाले रोगों में आयुर्वेद की विशिष्ट चिकित्सा कर्म और औषधि से चिकित्सा करना
-जिन बीमारियों के लिए शल्य क्रिया की जरूरत होती है, उनके स्थान पर क्षारकर्म, अग्निकर्म और जलौका अवचरण जैसे उपचार, जो बस आयुर्वेद में ही हैं और इनके प्रयोग से शल्य क्रिया से बचा जा सकता है.
आयुर्वेद में प्रचलित विभिन्न शल्य क्रियाओं में से कुछ की तो विश्वस्तर पर मान्यता है और क्षारसूत्र से फिस्टुला जैसी बीमारी का उपचार तो इसके सबसे उत्तम और कारगर उदाहरणों में से एक है.
भगंदर का क्षारसूत्र उपचार
गुदामार्ग और गुदाद्वार की बाहरी सतह के बीच एक पुरानी सूजन के कारण एक असामान्य सुराख बन जाने को गुदा का भगंदर कहते हैं. इस बीमारी का सबसे प्रचलित उपाय है—शल्य चिकित्सा. गुदा के भगंदर के उपचार के लिए आधुनिक सर्जरी में कई उपकरण और नई तकनीक के आने से इलाज ज्यादा आधुनिक तो हो गया है लेकिन इसका अंतिम परिणाम अब भी बहुत संतोषप्रद नहीं है, क्योंकि सर्जरी के बाद भी बीमारी फिर से उभर आती है.
साथ ही, मल द्वार के सिकुड़ जाने, सर्जरी के दौरान हुई क्षति के कारण मल को रोकने पर नियंत्रण में कमी जैसी बड़ी परेशानियां आ खड़ी होती हैं. कई बार तो ये परेशानियां मूल बीमारी से ज्यादा गंभीर हो जाती हैं.
आयुर्वेद में गुदा के फिस्टुला के लिए एक अनूठी उपचार पद्धति बताई गई है. एक औषधियुक्त धागा—क्षारसूत्र को भगंदर क्षेत्र में बांधा जाता है. धीरे-धीरे यह पूरे भगंदर क्षेत्र को काटकर अलग कर देता है और गुदा मार्ग की संकुचक मांसपेशियों को बिना कोई नुक्सान पहुंचाए बीमारी को ठीक कर देता है.
उपचार की इस तकनीक को बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के शल्य तंत्र विभाग ने फिर से स्थापित किया और इसे केंद्रीय आयुर्वेद शोध परिषद (सीसीआरएएस) एवं भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) द्वारा विधिवत मान्यता प्रदान की गई.
क्षारसूत्र एक औषधियुक्त धागा (रासायनिक बत्ती) है जिसे अपामार्ग, कदली, पलाश, नीम आदि वनस्पतियों के अवयव को गुग्गलु और हरिद्रा जैसे अन्य पौधों के साथ मिलाकर बनाया जाता है. शल्य कार्य में प्रयुक्त होने वाले लिनेन के धागे पर इन अवयवों को बार-बार लपेटकर इसे उपचार में प्रयोग के योग्य बनाया जाता है.
सामान्य और छोटे भगंदर की स्थिति में उपचार की सफलता दर शत-प्रतिशत है और जटिल, पुराने और दोबारा उभरे भगंदर के उपचार में इसकी सफलता का दर 93 से 97 प्रतिशत तक रहता है. इस विधि से 40,000 से ज्यादा रोगियों का सफलतापूर्वक उपचार बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एस.एस. अस्पताल के गुदा व मलाशय रोग विभाग में किया जा चुका है.
इस उपचार विधि के लाभ को पहचानते हुए आयुष मंत्रालय ने 2013 में क्षारसूत्र उपचार पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के सर सुंदरलाल अस्पताल (एस.एस. हॉस्पिटल) में नेशनल रिसोर्स सेंटर की स्थापना की है. यह केंद्र गुदामार्ग और मलाशय में आमतौर पर होने वाली बीमारियों, जिसमें भगंदर भी शामिल है, के उपचार से संबंधित सभी मूलभूत और आधुनिक सुविधाओं से लैस है.
बवासीर भी एक अन्य आम समस्या है और 10 करोड़ से अधिक भारतीय इस रोग के शिकार हैं. आयुर्वेद में कब्ज और आंतों से जुड़ी परेशानियों को जड़ से मिटाने के लिए बहुत-सी औषधीय वनस्पतियां बताई गई हैं. क्षारसूत्र का प्रयोग और अथवा क्षार (औषधीय वनस्पतियों से प्राप्त लेई) का प्रभावित क्षेत्र पर लेप करके बवासीर के मस्से को अलग कर देना इस रोग को ठीक करने के बड़े कारगर उपाय हैं.
शल्य क्रिया में घाव का उपचार भी एक अन्य क्षेत्र है जिसमें आयुर्वेद का योगदान असाधारण है. 100 से ऊपर विधियां और पाउडर, पेस्ट, पत्तों के ताजा रस, मरहम, एवं औषधीय तेल तथा घी से बनी सामग्रियों के रूप में अनेक प्रकार की दवाएं उपलब्ध हैं जिनका प्रयोग करके पुराने और आसानी से नहीं भरने वाले घावों को ठीक किया जा रहा है. आसानी से नहीं सूखने वाले घाव के उपचार का आयुर्वेद का मूलभूत सिद्धांत है- दुष्ट व्रण (घाव) को शुद्ध व्रण में परिवर्तित कर दिया जाए.
इसके लिए विभिन्न स्तरों पर अनेक प्रकार की दवाइयों की जरूरत होती है. दुष्ट व्रण या खराब घाव आमतौर पर निर्जीव उत्तकों से भरे ऐसे संक्रमित घाव होते हैं जिससे दुर्गंध और मवाद आती है. नीम, करंज, पपीता, दारुहरिद्रा आदि वनस्पतियां दुष्ट व्रण को शुद्ध व्रण में बदल देती हैं इसलिए इन्हें व्रण शोधन दवाएं भी कहा जाता है. जबकि चमेली, हरिद्रा, मंजिष्ठा, दूर्वा, चंदन घावों को तीव्रता से भरने में सहयोगी होते हैं इसलिए इन्हें व्रण रोपण दवाएं कहा जाता है.
कुछ दवाएं ऐसी भी हैं जो घावों की चिकित्सा के दोनों चरणों में उपयोगी होती हैं. पंचवल्कल (पंच-पांच, वल्कल-छाल) जो आयुर्वेद में घाव भरने हेतु लाभकारी प्रभाव के लिए वर्णित है, में वट, उदुबंर, पीपल, पारीष और पलक्ष जैसे पांच पौधों की छाल शामिल हैं. ये पौधे पूरे देश में सामान्य रूप से और प्रचुरता से उपलब्ध हैं.
इस यौगिक दवा का वैज्ञानिक मानकों पर मूल्यांकन किया गया और पाया गया कि दवा सूक्ष्मजीवों की वृद्धि को रोकती है, नई रक्त वाहिका के गठन को बढ़ाती है, कोलेजन संश्लेषण में वृद्धि करती है और घाव के त्वरित उपचार के लिए जरूरी कारकों को बढ़ाती है. चूंकि तकनीक और दवाएं, दोनों ही हमारे देश में भरपूर मात्रा में उपलब्ध हैं इसलिए इस विधि से उपचार विदेशों से ड्रेसिंग मटेरियल आयात करने के मुकाबले बहुत सस्ता हो गया है.
जोंक का प्रयोग एक अन्य पैरा सर्जिकल तकनीक है जिसका आयुर्वेदिक सर्जन नहीं सूखने वाले घावों को ठीक करने के साथ ही साथ प्लास्टिक सर्जरी में त्वचा को जोडऩे में प्रयोग करते हैं. जोकों की विशेष प्रजातियां हैं जो विषाक्त प्रकृति की नहीं होतीं.
इनका प्रयोग संक्रमित घाव के चारों तरफ से आवश्यकता अनुसार रक्त को चूसकर निकालने के लिए किया जाता है. इससे रक्त का संचरण बढ़ता है और घाव को तेजी से भरने में मदद मिलती है. जोंक का प्रयोग एग्जिमा और गंजेपन जैसी बीमारियों को ठीक करने में भी बहुत कारगर है.
आयुर्वेद में कई अन्य गैर-शल्य क्रिया वाले प्रयोगों का वर्णन है जिनका वैज्ञानिक रूप से आकलन हुआ है. प्रोस्टेट बढ़ जाए तो इसके उपचार के लिए सर्जरी ही एकमात्र रास्ता बताया जाता था. इसके स्थान पर प्रयोग से प्रमाणित हुआ है कि औषधीय एनिमा के साथ-साथ गोक्षुरादि गुग्गुल और वरुण प्रोस्टेट को ठीक करने में उपयोगी होते हैं जो पीकर सेवन करने वाली औषधियां हैं.
वरुण, गोक्षुर, पाषाणभेद मूत्राशय की पथरी को ठीक करने में बड़े कारगर बताए जाते हैं. ये दवाइयां मूत्र की थैली में पथरी का बनना रोकती हैं और शल्य चिकित्सा के बाद फिर से पथरी बनने की संभावना को समाप्त करती हैं. मूत्र स्टेंट मूत्रवाहिनी में रखा पतला ट्यूब होता है. ये आयुर्वेदिक दवाएं मूत्र स्टेंट को लंबे समय तक कारगर रखने और स्टेंट के मूत्राशय में रखे जाने के बाद उसके भीतर लवण के जमा होने से रोकने में सहायक होती हैं.
हड्डी से जुड़ी बीमारियों को ठीक करने में आयुर्वेदिक सर्जनों का योगदान सराहनीय है. कुछ ऐसे शिक्षण संस्थान साथ ही साथ निजी प्रेक्टिशनर भी हैं जो हड्डियों से जुड़े मामलों खासतौर से हड्डी की टूट-फूट से जुड़े मामलों, पीठ के निचले हिस्से में दर्द, डिस्क का खिसकना एवं अन्य पुरानी बीमारियों का इलाज करते हैं. इसके अलावा, कुछ विशेष उपकरणों द्वारा अग्निकर्म और रक्तमोक्षण कुछ दूसरे उपाय हैं जो मांसपेशियों के पुराने दर्द का निवारण करने में बड़े प्रभावी हैं.
आयुर्वेद की शल्य क्रिया में प्रशिक्षित स्त्रीरोग एवं नेत्ररोग के आयुर्वेदिक सर्जन अपने-अपने क्षेत्र में शल्य चिकित्सा भी करते हैं. वे आयुर्वेद में वर्णित उपचार की कुछ विशेष तकनीक के अलावा सामान्य स्त्रीरोगों और प्रसवोत्तर सर्जरी करने में सक्षम हैं.
नेत्र सर्जन आंखों की सामान्य सर्जरी जैसे मोतियाबिंद निकालना आदि के साथ-साथ दूसरी नेत्र संबंधी सर्जरी में सक्षम हैं. आयुर्वेद में नेत्ररोग से जुड़ी विशेष क्रियाओं को क्रियाकल्प के रूप में जाना जाता है. क्रियाकल्प एक विशेष प्रक्रिया है जिसके द्वारा रेटिना से जुड़ी विभिन्न समस्याओं और अन्य पुराने नेत्र रोगों का सफल उपचार किया जाता है.
हालांकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की शुरुआत आजादी के बाद के दौर में बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में शल्य तंत्र की पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई और प्रशिक्षण के द्वारा शुरू की गई लेकिन बाद में इसे कई अन्य शिक्षण संस्थानों में भी शुरू किया गया. अब आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन शिक्षण का संचालन सीसीआइएम और भारत सरकार के आयुष मंत्रालय द्वारा होता है, कई अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों ने भी शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन यानी एमएस (आयुर्वेद) की पढ़ाई शुरू कराई है.
शल्य तंत्र में पोस्ट ग्रेजुएशन प्रशिक्षण तीन साल का होता है जो कि आयुर्वेद में ग्रेजुएशन के बाद किया जा सकता है. आज बिना सुरक्षित एनेस्थेसिया और लाइफ सपोर्ट सिस्टम के सर्जरी की बात सोची भी नहीं जा सकती और यह बात आयुर्वेदिक सर्जरी पर भी लागू होती है. इसे बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में समझा गया और आयुर्वेद में एनेस्थेसिया की शुरुआत की गई और बाद में सीसीआइएम ने आयुर्वेद विभाग में भी एनेस्थेसियोलॉजी में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स शुरू किया.
ये आयुर्वेदिक संस्थानों और निजी संस्थानों में आयुर्वेदिक सर्जनों की जरूरतों को पूरा कर रहे थे लेकिन एनेस्थेसिया पर आयुर्वेद में पोस्ट ग्रेजुएशन कोर्स (संज्ञाहरण) को अचानक बंद कर देने से आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा की विशेषज्ञता की दिशा में हो रहे कार्यों को धक्का पहुंचा है और इस विषय पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है.
संक्षेप में यही कहा जा सकता है कि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का प्रयोग प्राचीन काल में बहुत लोकप्रिय था. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के प्रख्यात विद्वानों ने 1960 के दशक में आयुर्वेद में सर्जरी का मार्ग पुनः प्रशस्त किया लेकिन अनेक कारणों से यह अब तक अपनी उच्च क्षमता को प्राप्त नहीं कर सका है.
आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के विकास के लिए आधुनिक तकनीक एवं सुविधाओं के भरपूर समर्थन के साथ-साथ निरंतर अन्वेषण व शोध की आवश्यकता है ताकि आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा के धूमिल पड़े गौरव को पुनः स्थापित किया जा सके और मानव कल्याण में इसका बेहतर प्रयोग संभव हो सके.
आचार्य सुश्रुत
आयुर्वेद के महत्वपूर्ण ग्रंथ सुश्रुत संहिता के लेखक ने कई विधियों का विस्तार से वर्णन किया है
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी
आयुर्वेद चिकित्सा प्रणाली की पढ़ाई 1927 में शुरू हुई और आजादी के बाद 1964 में पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई शुरू हुई. अब देश के कई विश्वविद्यालयों में इसकी व्यवस्था है
सहज इलाज
आयुर्वेद में शल्य क्रिया से भगंदर और कई गुदा रोगों का इलाज किया जाता है. मॉडर्न मेडिसिन के विदेशी डॉक्टर भी भारत में विकसित इस विधि का प्रशिक्षण ले रहे हैं
प्रकृति की मदद
जोंक की कुछ प्रजातियों की मदद से गंभीर बीमारियों का इलाज

1.11.18

प्रोस्टेट केन्सर के प्रमुख लक्षण और होम्योपैथिक मेडिसिन्स

                                       

कैंसर एक बीमारी है जिसमें शरीर में कोशिकाएं नियंत्रण से बाहर निकलती हैं। जब कैंसर प्रोस्टेट में शुरू होता है, इसे प्रोस्टेट कैंसर कहा जाता है। त्वचा के कैंसर के अलावा, अमेरिकी पुरुषों में प्रोस्टेट कैंसर सबसे आम कैंसर है।प्रोस्टेट पुरुष प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है, जिसमें लिंग, प्रोस्टेट और अंडकोष शामिल हैं। प्रोस्टेट मूत्राशय के नीचे और मलाशय के सामने स्थित है। यह एक अखरोट के आकार के बारे में है और मूत्रमार्ग (ट्यूब जो मूत्राशय से मूत्र को खाली करता है) के आसपास है। यह द्रव पैदा करता है जो वीर्य का एक हिस्सा बना देता है।प्रोस्‍टेट कैंसर केवल पुरुषों को होता है, क्‍योंकि प्रोस्‍टेट ग्रंथि पुरुषों में होती है। 
   उम्र बढ़ने के साथ प्रोस्‍टेट कैंसर के होने की संभावना बढ़ जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में प्रोस्‍टेट कैंसर के मामले भारत सहित पूरे देश में बढ़ रहे हैं। कैंसर का यह प्रकार 60 से अधिक उम्र वाले पुरुषों के प्रोस्टेट ग्रंथि में होने की संभावना अधिक होती है। प्रोस्टेट ग्रंथि अखरोट के आकार की एक ऐसी होती है जो युरेथरा (पेशाब की नली) के चारों ओर होती है। इसका काम काम वीर्य में मौजूद एक द्रव पदार्थ का निर्माण करना है। अगर इसके लक्षण शुरूआती दौर में पता चल जाये तो इसे गंभीर होने से बचाया जा सकता है।

प्रोस्टेट कैंसर क्या है?

प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट की कोशिकाओं में बनने वाला एक प्रकार का कैंसर है। यद्यपि पौरूष ग्रंथि में कई प्राकर की कोशिकाएँ पाई जाती है, लगभग सभी प्रोस्टेट कैंसर, ग्रंथि कोशिकाओं से विकसित करते है (एडिनोकार्सिनोमा)। अन्य प्रकार के प्रोस्टेट कैंसर कम पाये जाते हैं।
प्रोस्टेट कैंसर आमतौर पर बहुत ही धीमी गति से बढ़ता है। ज्यादातर रोगियों में तब तक लक्षण नही दिखाई देते जब तक कि कैसर उन्नत अवस्था में नही पहुँचता। प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में से अधिकांश अन्य कारणों से मरते हैं। कई मरीजों को तो ज्ञात ही नहीं होता कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर हैं। लेकिन एक बार प्रोस्टेट कैंसर विकसित हो जाता है और बाहर की तरफ फैलने लगता है तो यह खतरनाक हो जाता है।

टेस्टिकल्‍स में बदलाव

हालांकि टेस्टिकल्‍स में बदलाव टेस्टिकुलर कैंसर का संकेत हो सकता है। लेकिन प्रोस्‍टेट ग्रंथि में ही टेस्टिक्‍स होते हैं जो प्रोस्‍टेट कैंसर के कारण बदल सकते हैं। अगर आपके टेस्टिकल्‍स का आकार बढ़ रहा है तो इसे नजरअंदाज न करें। इसके आलाव टेस्टिकल्‍स में किसी भी तरह का बदलाव प्रोस्‍टेट कैंसर से संबंधित हो सकता है। अपने टेस्टिकल्‍स की नियमित रूप से जांच कीजिए, टेस्टिकल्‍स की जांच आप स्‍वयं कर सकते हैं। अगर आपको किसी भी प्रकार का बदलाव दिखे तो इसकी जांच करायें।

खून निकला

प्रोस्‍टेट कैंसर के कारण पेशाब के साथ खून भी आयेगा, इसके अलावा मल के साथ भी खून निकल सकता है। प्रोस्‍टेट कैंसर के अलावा कोलेन, किडनी, ब्‍लैडर कैंसर में भी खून निकलता है। लगातार खून का निकलना भी कैंसर का लक्षण हो सकता है। अगर कैंसर है तो इसके कारण खून मलाशय के द्वारा बाहर निकलता है। हालांकि यह समस्‍या 50 की उम्र के बाद होती है, लेकिन वर्तमान लाइफस्‍टाइल के कारण यह किसी भी उम्र में हो सकती है।

पेशाब करने में समस्‍या

पेशाब करने में समस्‍या ही प्रोस्‍टेट कैंसर के प्रमुख लक्षण है। प्रोस्‍टेट ग्रंथि बढ़ने के कारण पेशाब करने में परेशानी होती है। रात में बार-बार पेशाब जाना, अचानक से पेशाब निकल आना, पेशाब रोकने में समस्‍या, आदि लक्षण प्रोस्‍टेट कैंसर में दिखाई पड़ते हैं। अगर पेशाब करने में समस्‍या कई दिनों तक बनी रहे तो इसे बिलकुल भी नजरअंदाज न करें, यह कैंसर हो सकता है।

त्‍वचा में बदलाव

अगर शरीर के किसी भी हिस्‍से की त्‍वचा में किसी भी प्रकार का बदलाव हो तो चिकित्‍सक से संपर्क कीजिए। त्‍वचा में असामान्य रूप से परिवर्तन होना कैंसर का शुरुआती लक्षण हो सकता है। अगर किसी व्यक्ति की त्वचा बेवजह सांवली या काली पड़ने लगी हो तो इसे नजअंदाज न करें। त्वचा का पीला पड़ना भी प्रोस्‍टेट कैंसर का शुरुआती लक्षण हो सकता है।

वजन कम होना

अगर बिना किसी कारण के आपका वजन कम हो रहा है तो कैंसर का शुरूआती लक्षण हो सकता है। वजन कम करने वाले किसी प्रयास के बिना ही शरीर का वजन 10 पौंड से ज्यादा कम हो जाये तो इसे कैंसर के प्राथमिक लक्षण के रूप में देखा जा सकता है। कैंसर होने के बाद खाना अच्‍छे से नहीं पचता और पाचन क्रिया भी सही तरीके से काम नहीं करती है, जिसके कारण शरीर का वजन कम होने लगता है।

दर्द होना

अगर आप बहुत काम करते हैं और देर तक कुर्सी पर बैठते हैं तो कमर, पीठ आदि जगह दर्द होना सामान्‍य है। लेकिन बिना किसी समस्‍या के शरीर के किसी भी हिस्‍से में लगातार दर्द होना कैंसर का लक्षण हो सकता है। अगर लगातार पीठ में दर्द हो रहा हो तो यह कोलोरेक्‍टल या प्रोस्‍टेट कैंसर का कारण हो सकता है। इसके अलावा कमर के आसपास की मांसपेशियों में भी दर्द होता है। इससे नजरअंदाज न करें।

थकान और बुखार

प्रोस्‍टेट कैंसर होने पर व्‍यक्ति के शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो जाती है, जिसके कारण शरीर बीमारियों के होने की संभावना बढ़ जाती है। सामान्‍य से फ्लू का भी बचाव शरीर नहीं कर पाता है। लगातार खांसी आना, बुखार होना, थकान की समस्‍या बने रहना, आदि प्रोस्‍टेट कैंसर के शुरूआती लक्षण हैं। इसके अलावा व्‍यक्ति के मुंह में भी बदलाव होता है।

पीएसए के जरिए होती है पहचान

प्रोस्टेट स्पेसीफिक एंटीजेन (पीएसए) ब्लड टेस्ट होता है। इसके जरिए प्रोस्टेट कैंसर की शुरुआती पहचान की जाती है। ब्लड में पीएसए की मात्रा शून्य-चार तक सामान्य मानी जाती है। यह मात्रा चार-दस के बीच हो तो इसका कारण संक्रमण माना जाता है जो दवाओं से ठीक हो सकता है। पीएसए 10-20 के बीच होने पर इसे कैंसर से संभावित लक्षण माना जाता है। वहीं पीएसए के मात्रा अगर 20 से अधिक है तो कैंसर की पुष्टि होती है। पीएसए जांच के बाद बायोप्सी और एमआरआइ के जरिए कैंसर की स्थिति और स्टेज का सही आंकलन किया जाता है।

दुष्प्रभावों को नियंत्रित करने के लिए होम्योपैथी चिकित्सा

रेडिएशन थैरेपी, कीमोथैरेपी और हॉर्मोन थैरेपी जैसे परंपरागत कैंसर के उपचार से अनेकों दुष्प्रभाव पैदा होते हैं। ये दुष्प्रभाव हैं – संक्रमण, उल्टी होना, जी मितलाना, मुंह में छाले होना, बालों का झड़ना, अवसाद (डिप्रेशन), और कमज़ोरी महसूस होना। होम्योपैथी उपचार से इन लक्षणों और दुष्प्रभावों को नियंत्रण में लाया जा सकता है। रेडियोथेरिपी के दौरान अत्यधिक त्वचा शोध (डर्मटाइटिस) के लिए ‘टॉपिकल केलेंडुला’ जैसा होम्योपैथी उपचार और केमोथेरेपी-इंडुस्ड स्टोमाटिटिस के उपचार में ‘ट्राउमील एस माऊथवाश’ का प्रयोग असरकारक पाया जाता है। कैंसर के उपचार के लिए वनस्पति, जानवर, खनिज पदार्थ और धातुओं से प्राप्त 200 से भी अधिक होम्योपैथी दवाईयां उपयोग में लाई जाती हैं। कैंसर के उपचार के लिए उपयोग में आने वाली कुछ सामान्य औषधियों में एम्मोमिआ कार्ब, आस्टाकस फ़्लुविएटिलिस, एनाकरडिअम ओरिएंटेल, एंट्रसिनम, सिन्नामोमम, सिस्टक कैन, क़ाल्क आओड, क्यूबेबा, कोपैवा, कैम्फ़र, सिना, गैस्टिन, ग्रिंडेलिआ, हेडेरा हेलिक्स, हेलोडेर्मा, जबोरांडी, जुगलन रेजिआ, लेसर्टा, म्यूरेक्स, मायरिस्टिका सेब, मायरिका सेरि, नेट आर्स, नक्स मोस्चाटा, फ़ायसोस्टिग्मा, राफ़ागस, रयूटा, सिनापिस, स्क्रोहुलारिआ, टेयुरिनम, टेरेबिंथिना, यूरिआ, वेरेट एल्ब, विंका माइनोर शामिल हैं।
कैंसर नाम सुनते ही मन में डर बैठ जाता हैं, क्योकि कैंसर एक घातक रोग हैं। लाखों लोग हर वर्ष कैंसर के कारण मौत के मुंह में चले जाते हैं। कुछ इलाज न होने के कारण तो कुछ गलत इलाज के कारण, लेकिन सही समय पर इलाज से इसे ठीक किया जा सकता हैं। आईये जानने की कोशिश करते हैं कि कैंसर क्या हैं और किसको और कब होता है और इससे कैसे बचा जा सकता है.

क्या है कैंसर?

सामान्यत: हमारे शरीर में नई-नई कोशिकाओं (cells) का हमेशा निर्माण होता रहता है, परन्तु कभी-कभी इन कोशिकाओं की अनियंत्रित गति से वृद्धि होने लगती है और यही सेल्स जो अधिक मात्रा में होती हैं एक ट्यूमर के रूप में बन जाती हैं जो कैंसर कहलाता है। इसे कार्सिनोमा (carcinoma),नियोप्लास्म (neoplasm) और मेलेगनंसी (malignancy) भी कहते हैं। लगभग 100 प्रकार के कैंसर होते हैं, और सभी के लक्षण अलग-अलग होते हैं। एक अंग में कैंसर होने पर ये दूसरे अंगो में भी फैलने लगता हैं। सभी ट्यूमर कैंसर नहीं होते।
किसको होता हैं कैंसर
कैंसर किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है। स्त्री, पुरुष, बच्चे किसी को भी हो सकता हैं।
कैंसर की ग्रेड
ग्रेड द्वारा पता किया जाता हैं कि ट्यूमर सेल्स नॉर्मल सेल्स से कितनी अलग हैं। कैंसर की ग्रेड निम्न प्रकार की होती हैं,
ग्रेड 1- इसमें कैंसर सेल नार्मल सेल के समान दिखती है, और यह धीरे-धीरे बढ़ता है।
ग्रेड 2- इसमें भी नॉर्मल सेल के समान होता है, परन्तु यह बहुत तेजी से बढ़ती हैं।
ग्रेड 3…इसमें कैंसर सेल बहुत तेजी से बढती हैं, और एब्नार्मल दिखती हैं।

होम्योपैथिक दवाएं

होम्योपथी से कैंसर को काफी हद तक ठीक किया जा सकता है। यदि कैंसर जल्दी डायग्नोसिस हो जाए तो पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। यह एक सस्ता और बिना किसी तकलीफ के रोग को ठीक करने वाला उपचार होता है। होम्योपथी में कैंसर के लिए बहुत सारी दवाए हैं, परन्तु जानकारी के लिए यहां पर कुछ दवाओं के बारे में लिखा है जो कैंसर के लिए उपयोगी हैं। चूंकि कैंसर एक घातक रोग होता हैं, अत: स्वयं चिकित्सा न करें, किसी कुशल होम्योपैथ से ही इलाज कराएं।

कोनियम-मैक (CONIUM-MAC)

ट्यूमर पत्थर जैसा कठोर होता हैं। रात के समय सुई चुभने जैसा दर्द होता हैं। ब्रैस्ट कैंसर और ब्रैस्ट ट्यूमर दोनों में उपयोगी हैं। टेस्टिकल (Testicle) और यूट्रस(uterus) बढ़ जाते हैं।

आर्सेनिक-एल्बम (ARSENIC-ALBUM)

यह होम्योपैथिक दवा कैंसर के लिए बहुत अच्छी होती है। यह सीधे कैंसर की cells पर असर करती है। यह कैंसर को आगे बढ़ने से रोकती है। रोगी को हमेशा डर लगता है। कभी मरने का डर लगता है, कभी अकेले रहने का डर, कभी बीमारी का डर। पेशंट सोचता है की दवा खाना बेकार है। आत्महत्या करने के विचार आते हैं। अपने परिवार की बहुत ज्यादा चिंता रहती है। उसे हर वक्त यही चिंता लगी रहती है, कि उसके बच्चों और परिवार को कुछ हो न जाए। आर्स-अल्ब कैंसर रोगी के मन से डर को दूर करता है। तम्बाकू, शराब से होने वाले नुकसान को आर्स-अल्ब ठीक करता है। रोगी को बहुत बेचैनी रहती है। शरीर में जलन बहुत होती हैं। ठंड से तकलीफ होती है। शरीर में सुई चुभने जैसा दर्द होता हैं। सांस की तकलीफ, खून की उल्टी होना। अल्सर से बदबूदार स्त्राव होता है। घाव सड़ने से आर्स-अल्ब बचाती है।

थूजा (THUJA)

किसी भी प्रकार के ट्यूमर के लिए थूजा बहुत ही उपयोगी दवा हैं। यह वेक्सिन से होने वाले दुश्प्रभावो को दूर करती है। पेशेंट का बहुत तेजी से वजन कम होता जाता हैं। पेशेंट बहुत ज्यादा इमोशनल होता हैं, यहाँ तक की म्यूजिक सुन कर ही रोने लगता हैं। ट्यूमर में ऐसा दर्द होता है जैसे नाखून से नोचा जा रहा हो।ट्यूमर से पस और ब्लड आता रहता हैं। मस्से ,कारबंकल ,अल्सर,पोलिप ,सार्कोमा आदि में उपयोगी।

फ़ायटोलक्का (PHYTOLACCA)

यह ब्रेस्ट कैंसर या ब्रेस्ट ट्यूमर के लिए बहुत ही उपयोगी है। ट्यूमर बहुत ही कठोर और बैंगनी रंग का होता है और दर्द होता रहता हैं। यूट्रस के फिब्रोइड के लिए भी बहुत उपयोगी दवा है। दाईं ओवरी में दर्द होता है। निप्पल पर दरारें (CRACKS)और अल्सर हो जाते हैं। पीरियड्स के पहले ब्रेस्ट में तकलीफ होना।

कोनडूरेनगो (CUNDURANGO)

यह पेट के कैंसर के लिए उपयोगी दवा है। मुंह के चारों ओर दर्द भरी दरारें (CRACKS)हो जाती है। उल्टियां होती रहती हैं। पेट में अल्सर हो जाते हैं। जलन के साथ दर्द होता है। कैंसर और ट्यूमर हो जाते हैं।

साइलीसिया (SILICEA)

यह किसी भी प्रकार के फिब्रोइड, ट्यूमर या स्कार (SCAR) को ठीक करती है। यह धीरे-धीरे अपना काम करती है। ट्यूमर से गाढ़ा बदबूदार पस बहता रहता है। पेशेंट बहुत ही ज्यादा नर्वस होता है। नींद में चलने की आदत होती है। यह कैंसर के दर्द को कम करती है।

हेक्ला-लावा (HECLA-LAVA)

बोन कैंसर (OSTEOSARCOMA) में उपयोगी है। जबड़े की हड्डी में तकलीफ। सड़े दांत के कारण पूरे चेहरे में दर्द होना।

कैल्कैरिया-फ्लोर (CALCARIA-FLOR)

ब्रेस्ट में होने वाली कठोर गांठे या ट्यूमर में उपयोगी। यह दवा ट्यूमर को कैंसर में परिवर्तित होने से बचाती है।

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प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट ग्रंथि के अन्य विकारों (मूत्र    जलन , बूंद बूंद पेशाब टपकना, रात को बार -बार  पेशाब आना,पेशाब दो फाड़)  मे रामबाण औषधि है| प्रोस्टेट  केंसर की नोबत  नहीं आती| आपरेशन  से बचाने वाली औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|