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31.1.17

पुनर्नवा के गुण,लाभ,उपचार //Punarnava benefits and treatment


    पुनर्नवा का संस्कृत पर्याय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरनेवाली) है। पुनर्नवा (साटी) या विषखपरा के नाम से विख्यात यह वनस्पति वर्षा ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की आँतरिक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।
पुनर्नवा का अभिप्राय यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त (खून) जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। पुनर्नवा का कांड (तना), पत्ते, फूल सभी रक्त (खून या लाल) रंग के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है। परंतु भूमि में पड़ी रहती है, जो बारिश के मौसम में फिर से उग आती है।


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 पुनर्नवा की तीन जातियां होती हैं। सफेद फूल वाली को विषखपरा, लाल फूल वाली को साठी और नीली फूल वाली को पुनर्नवा कहते हैं। सफेद पुनर्नवा की जड़ को पीस घी में मिलाकर आंख में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। आंखों में अगर खुजली हो रही हो तो इसे लगाने से फायदा होता है। रतौंधी के मरीज अगर गाय के गोबर के रस में पीपल के साथ उबालकर आंख में लगायें तो रतौंधी में लाभ होता है। लाल पुनर्नवा यानी साठी कड़वी और ठंडी होती है जो कि सांस की समस्‍या, कफ, पित्‍त और खून के विकार को समाप्‍त करती है।
गुण : श्वेत पुनर्नवा भारी, वातकारक और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार पुनर्नवा दूसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है। यह गुर्दे के कार्यो में वृधि करके पेशाब की मात्रा बढ़ाती है, खून साफ करती है, सूजन दूर करती है, भूख को बढ़ाती है और हृदय के रोगों को दूर करती है। इसके साथ ही यह बलवर्द्धक, खून में वृद्धि करने वाला, पेट साफ करने वाला, खांसी और मोटापा को कम करने वाला होता है।
दमा के मरीजों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद है। दमा के मरीज चंदन के साथ मिलाकर इसका सेवन करें। इससे कफ आना बंद होता है और दमे से श्‍वांस की नली में हुई सूजन भी समाप्‍त होती है। अपच होने पर पुनर्नवा का सेवन करने से फायदा होता है। गोनोरिया होने पुनर्नवा का प्रयोग करना चाहिए। इससे पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है और गोनोरिया के घाव पेशाब के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। गोनोरिया के रोगी को पुनर्नवा की जड़ पीसकर देना चाहिए।
कफ की समस्‍या होने पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार नीला पुनर्नवा देने से फायदा होता है। ऐसा करने से उल्‍टी के साथ कफ निकल जाता है और मरीज को आराम मिलता है। पुनर्नवा का प्रयोग करने से दिल पर खून का दबाव बढ़ता है जिसके कारण ब्‍लड सर्कुलेशन तेजी से होता है और खून से होने वाले वाले विकार नही होते हैं।

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किडनी पर इसका प्रभाव पड़ता है और किडनी संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है। हर रोज पुनर्नवा का रस 1 से 4 ग्राम देने पर गुर्दे के संक्रमण होने की कम संभावना होती है। इसमें पाया जाने वाला पोटैशियम नाइट्रेट और अन्‍य पोटैशियम के यौगिक विद्यमान होते हैं। जोड़ो में हो रहे दर्द को दूर करने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। यह गठिया के मरीजों के लिए फायदेमंद है। 
चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
विद्राधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।

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योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
*इसके पत्‍तों को पीसकर लें, उसे गरम करके जोड़ों पर लगाने से फायदा होता है।
*पुनर्नवा के पत्‍ते विषनाशक होते हैं। सांप के काटने पर पुनर्नवा के पत्‍तों को पीसकर उसका रस निकाल सांप के कटे वाली जगह पर लगाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। यह बिच्‍छू का विष भी कम करता है। बिच्‍छू का डंक लगने पर इसकी जड़ को पानी में घिसकर लगाने से फायदा होता है।
मात्रा : पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।

और भी-

 *पेट के रोगः 

गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पियें।

*श्लीपद (हाथीरोग) :

 50 मि.ली. पुनर्नवा का रस और उतना ही गोमूत्र मिलाकर सुबह शाम पियें।

*वृषण शोथः

पुनर्नवा का मूल दूध में घिसकर लेप करने से वृषण की सूजन मिटती है। यह हाड्रोसील में भी फायदेमंद है।

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*हृदयरोगः 

हृदयरोग के कारण सर्वांगसूजन हो गयी हो तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पियें।

*श्वास (दमा) : 

10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 200 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें। जब 50 मि.ली. बचे तब उसमें आधा ग्राम श्रृंगभस्म डालकर सुबह-शाम पियें।

*रसायन प्रयोगः 

हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए रोज सुबह पुनर्नवा के मूल का या पत्ते का 2 चम्मच (10 मि.ली.) रस पियें अथवा पुनर्नवा के मूल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में दूध या पानी से लें या सप्ताह में 2 दिन पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायें।

*गैसः

2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग तथा 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।

स्थूलता-मेदवृद्धिः 

पुनर्नवा के 5 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम लें। पुनर्नवा की सब्जी बना कर खायें।

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*मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पियें। पुनर्नवा के पान बाफकर पेड़ू पर बाँधें। 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गरम पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।

*खूनी बवासीरः

पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पियें।

*चूहे का विषः 

सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।

*पागल कुत्ते का विषः 

सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।

*विद्रधि (फोड़ा) : 

पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।

*अनिद्राः 

पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।

*संधिवातः 

पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

*वातकंटकः 

वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
*योनिशूलः 

पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
*विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः 

पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
*नेत्रों की फूलीः 

पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
*नेत्रों की खुजलीः

पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिसकर आँजने से लाभ होता है।
*नेत्रों से पानी गिरनाः 

पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
*रतौंधीः 

पुनर्नवा की जड़ को काँजी में घिसकर आँखों में आँजें।
*खूनी बवासीरः 

पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े में देने से लाभ होता है।
*पीलियाः 

पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पियें।
*मस्तक रोग व ज्वर रोगः 

पुनर्नवा के पंचांग का 2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम घी एवं 20 ग्राम शहद में सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
*जलोदरः 

पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खायें।

*सूजनः 

पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
*पथरीः 

पुनर्नवामूल को दूध में उबालकर सुबह-शाम पियें।

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