2017-06-20

सफ़ेद दाग विटिलिगो ल्युकोडर्मा का होम्योपैथिक इलाज

   

    सफेद दाग को लेकर लोगों के मन में तरह-तरह की गलत धारणाएं हैं। सचाई यह है कि हमें-आपको यह बेशक कोई बीमारी लगती हो, डॉक्टरों की निगाह में महज कॉस्मेटिक प्रॉब्लम है। ऐसे में आप अपने मन से दाग निकालिए क्योंकि सफेद दाग वाला शख्स पूरी तरह नॉर्मल है। क्या है सफेद दाग? -एक ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर है। ऑटो-इम्यून डिसऑर्डर में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) उलटा असर यानी शरीर को ही नुकसान पहुंचाने लगती है। -सफेद दाग के मामले में खराब इम्यूनिटी की वजह से शरीर में स्किन का रंग बनाने वाली कोशिकाएं मेलानोसाइट(melanocyte)मरने लगती हैं। इससे शरीर में जगह-जगह उजले धब्बे बन जाते हैं। -सफेद दाग को वीटिलिगो, ल्यूकोडर्मा, फुलेरी और श्वेत पात नाम से भी जाना जाता है।
सफेद दाग के कारण
यह रोग त्वचा द्वार ‘मिलेनिन’ नामक पदार्थ (जो कि त्वचा का रंग निर्धारित करता है) का बनना बंद हो जाने के कारण होता है, लेकिन त्वचा ग्रंथियों एवं कोशिकाओं में ऐसी कौन-सी खराबी आ जाती है कि मिलेनिन का बनना रुक जाता है, यह अभी तक अबूझ पहेली ही है। यह अण्डाकार अथवा छितरे हए धब्बों के रूप में शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इसमें किसी प्रकार की खुजली अथवा अन्य कोई प्रतिक्रिया नहीं होती। अब वैज्ञानिक यह मानने लगे हैं कि संभवतया मानसिक दबाव के साथ-साथ थायराइड ग्रंथि से संबंधित बीमारियों में शरीर के ऊतकों में किसी वजह से कठोरता एवं सिकुड़ाव आ जाने के कारण,गंजापन होने के कारण एवं खून की कमी होने पर सफेद दाग के मरीजों की संख्या बढ़ जाती है। सिफिलिस रोग की वजह से भी सफेद दाग बन सकता है।
शरीर पर इन सफेद धब्बों के कुछ संभव कारण हैं-
1. खून में मेलेनिन नामक तत्व का कम हो जाना।
2. अत्यधिक कब्ज।
3. लीवर का ठीक से कार्य ना कर पाना या पीलिया।
4. पेट से संबंधित बीमारी या पेट में कीड़ों का होना।
5. टाइफाइड जैसी बीमारियाँ जिन से पेट या आंतों में संक्रमण होने का खतरा हो।
6. अत्याधिक तनाव
7. यह आनुवंशिक भी हो सकता है।
निवारण:
 
* कई बार ल्यूकोडर्मा के रोगी दवाइयां लेना शुरू तो करते हैं पर थोड़ा आराम मिलते ही बंद कर देते हैं। इससे फिर से तकलीफ बढ़ने का खतरा बना रहता है। ल्यूकोडर्मा के रोगियों को तब तक दवाइयां लेनी चाहिए जब तक पूरा कोर्स न ख़त्म हो जाए। 
*खट्टे खाद्य पदार्थों का सेवन करने से बचना चाहिए। इस तरह के पदार्थ शरीर में मेलेनिन की मात्रा को कम करते हैं।

* माँसाहारी भोजन भी हमारे शरीर में मौजूद सेल्स के लिए बाहरी तत्व की तरह होता है।
* खाद्य पदार्थों में उपयोग किए जाने वाले रंग भी हानिकारक साबित हो सकते हैं।
*पोषक तत्व जैसे बीटा कैरोटिन (गाजर में), लाइकोपिन (टमाटर में), विटामिन ई एवं सी (ग्रेप सीड एक्स्ट्रेक्ट में उच्च मात्रा में उपलब्ध) और अन्य खनिज तत्वों को आहार में शामिल करना चाहिये।
होम्योपैथिक इलाज-
   वैसे, व्यक्ति के हाव-भाव, आचार-विचार, पूर्व इतिहास, खान-पान आदि को देखते हुए समान लक्षणों के आधार पर कोई भी दवा दी जा सकती है, किन्तु निम्न दवाएं उपयोगी हैं – ‘एल्युमिना’, ‘आर्सेनिक एल्बम’, ‘नेट्रमम्यूर’, ‘सीपिया’, ‘साइलेशिया’, ‘सल्फर’, ‘कैल्केरिया कार्ब’, ‘काबोंएनीमेलिस’, ‘मरक्यूरियस’, ‘एसिडफास’, ‘माइका’, ‘हाइड्रोकोटाइल’, ‘क्यूप्रम आर्स’, ‘कालमेग’, ‘चेलीडोनियम’।
सम्पूर्ण बातें रोगी से जानने के बाद एक व्यवस्थित मानसिक एवं शारीरिक आधार पर खोजी गई दवा अत्यन्त उपयोगी है, जिसे होमियोपैथी की भाषा में कान्सटीट्यूशनल रेमेडी कहते हैं। फिर बीमारी के कारणों के आधार पर दवा देते हैं, जैसे किसी रोग में ताम्र धातु का अभाव परिलक्षित होने पर ‘क्यूप्रम आर्स’ 3 × दवा, यकृत संबंधी परेशानियों के साथ सफेद दाग होने पर ‘कालमेग’, ‘चेलीडोनियम’ दवाओं का अर्क, पेट की गड़बड़ी के साथ सफेद दाग होने पर ‘वेरवोनिया’ दवा का अर्क एवं ‘क्यूप्रम आक्स नाइग्रम’ दवा, सिफिलिस रोग होने पर ‘सिफिलाइनम’ नामक दवा दी जा सकती है।
त्वचा मोटी एवं पपड़ीदार होने पर ‘हाइड्रोकोटाइल’ दवा का अर्क अत्यंत कारगर है। बेचैनी, रात में डर, ठंड लगना, जाड़े में अधिकतर परेशानियों का बढ़ना, जल्दी-जल्दी ठंड का असर पड़ना, खुली हवा में घूमने से परेशानी बढ़ना, बहुत कमजोरी एवं हर वक्त लेटे रहने की इच्छा, सीधी करवट लेटने पर अन्य सभी परेशानियों का बढ़ जाना, जलन, सूखी त्वचा खुजलाने पर जलन बढ़ जाना, घुटने में पीड़ा, छाती में सुइयों की चुभन एवं सांस लेन में तकलीफ होने पर ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × अत्यधिक कारगर पाई गई है। लगभग 6 माह से लेकर तीन वर्ष तक लगातार दवा के सेवन से यह रोग पूर्णरूपेण ठीक हो जाता है। रात में परेशानियों का बढ़ जाना एवं शरीर में जगह-जगह घाव होने पर ‘सिफिलाइनम’ भी दी जा सकती है।
‘माइक-30′ 
नामक दवा भी सफेद दाग के रोगियों में अत्यंत कारगर पाई गई है। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में भी ‘अभ्रक’ के नाम से इस दवा के अनेकानेक गुण ‘भावप्रकाश’ नामक ग्रंथ में वर्णित हैं, किन्तु इसके साथ भी ‘ट्यूबरकुलाइनम’, ‘सोराइनम’, ‘बेसिलाइनम’ अथवा ‘सिफिलाइनम’ जैसी कान्सटीट्यूशनल दवाएं दिया जाना आवश्यक है।
  चिकित्सावधि में खट्टी वस्तुएं, खट्टे फल, विटामिन सी (एस्कार्विक एसिड), मैदा आदि पदार्थों का सेवन सीमित मात्रा में ही होना चाहिए। कुछ समय के लिए ऐसे खाद्य पदार्थ खाना बंद कर दें, तो ज्यादा बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।
   
उपचार के लिए होम्योपैथी में बहुत सी दवाएं हैं। कुछ खाने की, तो कुछ लगाने की। उपचार करने में दो तरह की औषधिया काम में लाई जाती है…एक वे जो रोग प्रति रोधक तंत्र में फेरबदल कर के व्याधी के बढने को रोकती है और दूसरी वे जो गये हुए रंग को वापिस बनाती है। किसी विशेषज्ञ से उपचार कराया जाए तो लगभग 50 प्रतिशत मामलों में दाग मिट जाते हैं, लेकिन यह सुधार धीरे-धीरे होता है। कुल मिलाकर यह एक ठीक होने लायक बीमारी है…लाईलाज नहीं है…और यदि सही समय पर उपचार प्रारंभ किया जाये तो इसमें अच्छे परिणाम मिलते हैं। होम्योपैथीक दवाएँ जो लक्षणागत ल्यूकोडर्मा में काम करती हैं वे इस प्रकार हैं: - आर्सेनिक एल्बम, नेट्रम म्यूर, इचिनेसिया, लाईकोपोडियम, आर्सेनिक-सल्फ़-फ़्लेवम, सोरिलिया, नेट्रम सल्फ, सिलिसिया, सल्फर आदि।
सफेद दाग ठीक हो सकता है
कुछ रोगी, जिनका शरीर 30 प्रतिशत से अधिक सफेद हो गया है या उनके होंठ, उंगलियों के पोर, हथेली, जननेन्द्रिय आदि से प्रभावित रोगियों का विशेष रक्त-परीक्षण करवाया गया है, जिसमें लोहा, तांबा, रांगा का प्रतिशत जरूरत से ज्यादा या कम पाया गया। रक्त की सफेद कोशिकाओं, जिसे ‘लिम्फोसाइट’ कहा जाता है, में टी और बी का प्रतिशत कम पाया गया।
यदि स्त्रियों में रोने की प्रवृत्ति हो, तो ‘नेट्रमम्यूर’ दवा 1000 शक्ति की एक खुराक देकर अगले दिन से ‘आर्ससल्फफ्लेवम’ 3 × में खिलानी चाहिए। पंद्रह दिन बाद ‘नेट्रमम्यूर’ की एक खुराक और ले लें इसके पंद्रह दिन बाद’बेसीलाइनम’ 1000 की एक खुराक लें।

2017-06-19

गुदा के रोग: भगंदर, बवासीर की होम्योपैथिक चिकित्सा

  
 भगन्दर गुद प्रदेश में होने वाला एक नालव्रण है जो भगन्दर पीड़िका  से उत्पन होता है। इसे इंग्लिश में फिस्टुला (Fistula-in-Ano) कहते है। यह गुद प्रदेश की त्वचा और आंत्र की पेशी के बीच एक संक्रमित सुरंग का निर्माण करता है जिस में से मवाद का स्राव होता रहता है। यह बवासीर से पीड़ित लोगों में अधिक पाया जाता है।
मलद्वार एवं गुदासे संबंधित बीमारियां कोई असाधारण बीमारियां नहीं हैं। हर तीसरा या चौथा व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, किसी-न-किसी रूप में इन बीमारियों से पीड़ित पाया जाता है।
बवासीर : 
मलद्वार के अन्दर अथवा बाहर हीमोरायडल नसों के अनावश्यक फैलाव की वजह से ही बवासीर होता है।
बवासीर का कारण
कब्ज बने रहने, पाखाने के लिए अत्यधिक जोर लगाने एवं अधिक देर तक पाखाने के लिए बैठे रहने के कारण नसों पर दबाव पड़ता है एवं खिंचाव उत्पन्न हो जाता है, जो अन्तत: रोग की उत्पत्ति का कारण बनता है।
बवासीर का लक्षण
गुदा में खुजली महसूस होना, कई बार मस्से जैसा मांसल भाग गुदा के बाहर आ जाता है। कभी-कभी बवासीर में दर्द नहीं होता, किन्तु बहुधा कष्टप्रद होते हैं। मलत्याग के बाद कुछ बूंदें साफ एवं ताजे रक्त की टपक जाती हैं। कई रोगियों में मांसल भाग के बाहर निकल आने से गुदाद्वार लगभग बंद हो जाता है।  ऐसे रोगियों में मलत्याग अत्यंत कष्टप्रद होता है।
भगन्दर : 
गुदा की पिछली भित्ति पर उथला घाव बन जाता है। दस प्रतिशत रोगियों में अगली भिति पर बन सकता है अर्थात् गुदाद्वार से लेकर थोड़ा ऊपर तक एक लम्बा घाव बन जाता है। यदि यही घाव और गहरा हो जाए एवं आर-पार खुल जाए, तो इसे ‘फिस्चुला’ कहते हैं। इस स्थिति में घाव से मवाद भी रिसने लगता है।
भगन्दर का लक्षण
अक्सर स्त्रियों में यह बीमारी अधिक पाई जाती है। वह भी युवा स्त्रियों में अधिक। इस बीमारी का मुख्य लक्षण है ‘दर्द’ मल त्याग करते समय यह पीड़ा अधिकतम होती है। दर्द की तीक्ष्णता की वजह से मरीज पाखाना जाने से घबराता है। यदि पाखाना सख्त होता है या कब्ज रहती है, तो दर्द अधिकतम होता है। कई बार पाखाने के साथ खून आता है और यह खून बवासीर के खून से भिन्न होता है। इसमें खून की एक लकीर बन जाती है, पाखाने के ऊपर तथा मलद्वार में तीव्र पीड़ा का अनुभव होता है।
भगन्दर की स्थिति अत्यंत तीक्ष्ण दर्द वाली होती है। इस स्थिति में प्राय: ‘प्राक्टोस्कोप’ से जांच नहीं करते। यदि किसी कारणवश प्राक्टोस्कोप का इस्तेमाल करना ही पड़े, तो मलद्वार को जाइलोकेन जेली लगाकर सुन कर देते हैं।
जांच के दौरान मरीज को जांच वाली टेबल पर करवट के बल लिटा देते हैं। नीचे की टांग सीधी व ऊपर की टांग को पेट से लगाकर लेटना होता है। मरीज को लम्बी सांस लेने को कहा जाता है। उंगली से जांच करते समय दस्ताने पहनना आवश्यक है। ‘प्राक्टोस्कोप’ से जांच के दौरान पहले यंत्र पर कोई चिकना पदार्थ लगा लेते हैं।
 
भगन्दर रोग की पहिचान 
बार-बार गुदा के पास फोड़े का निर्माण होता
मवाद का स्राव होना
मल त्याग करते समय दर्द होना
मलद्वार से खून का स्राव होना
मलद्वार के आसपास जलन होना
मलद्वार के आसपास सूजन
मलद्वार के आसपास दर्द
खूनी या दुर्गंधयुक्त स्राव निकलना
थकान महसूस होना
इन्फेक्शन (संक्रमण) के कारण बुखार होना और ठंड लगनाबचाव
कब्ज नहीं रहनी चाहिए, पाखाना करते समय अधिक जोर नहीं लगाना चाहिए।
उपचार
आधुनिक चिकित्सा पद्धति में बवासीर का इलाज आपरेशन एवं भगन्दर का इलाज यंत्रों द्वारा गुदाद्वार को चौड़ा करना है। होमियोपैथिक औषधियों का इन बीमारियों पर चमत्कारिक प्रभाव होता है।
‘एलो’, ‘एसिड नाइट्रिक’, ‘एस्कुलस’, ‘कोलोसिंथर’, ‘हेमेमिलिस’, ‘नवसवोमिका’, ‘सल्फर’, ‘थूजा’, ‘ग्रेफाइटिस’, ‘पेट्रोलियम’, ‘फ्लोरिक एसिड’, ‘साइलेशिया’, औषधियां हैं। कुछ प्रमुख दवाएं इस प्रकार हैं –
एलो : 
मलाशय में लगातार नीचे की ओर दबाव, खून जाना, दर्द, ठंडे पानी से धोने पर आराम मिलना, स्फिक्टर एनाई नामक मांसपेशी का शिथिल हो जाना, हवा खारिज करते समय पाखाने के निकलने का अहसास होना, मलत्याग के बाद मलाशय में दर्द, गुदा में जलन, कब्ज रहना, पाखाने के बाद म्यूकस स्राव, अंगूर के गुच्छे की शक्ल के बाहर को निकले हुए बवासीर के मस्से आदि लक्षण मिलने पर 6 एवं 30 शक्ति की कुछ खुराक लेना ही फायदेमंद रहता है।
एस्कुलस : 
गुदा में दर्द, ऐसा प्रतीत होना, जैसे मलाशय में छोटी-छोटी डंडिया भरी हों, जलन, मलत्याग के बाद अधिक दर्द, कांच निकलना, बवासीर, कमर में दर्द रहना, खून आना, कब्ज रहना, मलाशय की श्लेष्मा झिल्ली की सूजन आदि लक्षणों पर, खड़े होने से, चलने से परेशानी बढ़ती हो, 30 शक्ति में दवा लेनी चाहिए।
साइलेशिया :
 मलाशय चेतनाशून्य महसूस होना, भगन्दर, बवासीर, दर्द, ऐंठन, अत्यधिक जोर लगाने पर थोड़ा-सा पाखाना बाहर निकलता है, किन्तु पुन:अंदर मलाशय में चढ़ जाता है, स्त्रियों में हमेशा माहवारी के पहले कब्ज हो जाती है। फिस्चुला बन जाता है, मवाद आने लगता है, पानी से दर्द बढ़ जाता है। गर्मी में आराम मिलने पर साइलेशिया 6 से 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
दवाओं के साथ-साथ खान-पान पर भी उचित ध्यान देना आवश्यक है। गर्म वस्तुएं, तली वस्तुएं, खट्टी वस्तुएं नहीं खानी चाहिए। पानी अधिक पीना चाहिए। रेशेदार वस्तुएं – जैसे दलिया, फल – जैसे पपीता आदि का प्रयोग अधिक करना चाहिए।
कोलिन्सोनिया : 
महिलाओं के लिए विशेष उपयुक्त। गर्भावस्था में मस्से हों, योनिमार्ग में खुजली, प्रकृति ठण्डी हो, कब्ज रहे, गुदा सूखी व कठोर हो, खांसी चले, दिल की धड़कन अधिक हो।
हेमेमिलिस : 
नसों का खिंचाव, खून आना, गुदा में ऐसा महसूस होना, जैसे चोट लगी हो, गंदा रक्त टपकना, गुदा में दर्द, गर्मी में परेशानी बढ़ना, रक्तस्राव के बाद अत्यधिक कमजोरी महसूस करना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति की दवा कारगर है।
 
एसिड नाइट्रिक :
 कब्ज रहना, अत्यधिक जोर लगाने पर थोड़ा-सा पाखाना होना, मलाशय में ऐसा महसूस होना, जैसे फट गया हो, मलत्याग के दौरान तीक्ष्ण दर्द, मलत्याग के बाद अत्यधिक बेचैन करने वाला दर्द, जलन काफी देर तक रहती है। चिड़चिड़ापन, मलत्याग के बाद कमजोरी, बवासीर में खून आना, ठंड एवं गर्म दोनों ही मौसम में परेशानी महसूस करना एवं किसी कार आदि में सफर करने पर आराम मालूम देना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति एवं 6 शक्ति की दवा उपयोगी है।
थूजा : 
सख्त कब्ज, बड़े-बड़े सूखे मस्से, मल उंगली से निकालना पड़े, प्यास अधिक, भूख कम, मस्सों में तीव्र वेदना जो बैठने से बढ़ जाए, मूत्र विकार, प्रकृति ठण्डी, प्याज से परहेज करे, अधिक चाय पीने से रोग बढ़े, तो यह दवा लाभप्रद। बवासीर की श्रेष्ठ दवा।
रैटेन्हिया : 
मलद्वार में दर्द व भारीपन, हर वक्त ऐसा अहसास जैसे कटा हो, 6 अथवा 30 शक्ति में लें।
नक्सवोमिका : प्रकृति ठण्डी, तेज मिर्च-मसालों में रुचि, शराब का सेवन, क्रोधी स्वभाव, दस्त के बाद आराम मालूम देना, मल के साथ खून आना, पाचन शक्ति मन्द होना।
सल्फर : 
भयंकर जलन, खूनी व सूखे मस्से, प्रात: दर्द की अधिकता, पैर के तलवों में जलन, खड़े होने पर बेचैनी, त्वचा रोग रहे, भूख सहन न हो, रात को पैर रजाई से बाहर रखे, मैला-कुचैला रहे।
लगाने की दवा :
 बायोकेमिक दवा ‘कैल्केरिया फ्लोर’ 1 × शक्ति में पाउडर लेकर नारियल के तेल में इतनी मात्रा में मिलाएं कि मलहम बन जाए। इस मलहम को शौच जाने से पहले व बाद में और रात को सोते समय उंगली से गुदा में अन्दर तक व गुदा मुख पर लगाने से दर्द और जलन में आराम होता है। ‘केलेण्डुला आइंटमेंट’ से भी आराम मिलता है। लगाने के लिए ‘हेमेमिलिस’ एवं ‘एस्कुलस आइंटमेंट’ (मलहम) भी शौच जाने के बाद एवं रात में सोते समय, मलद्वार पर बाहर एवं थोड़ा-सा अंदर तक उंगली से लगा लेना चाहिए। बवासीर, भगन्दर के रोगियों के लिए ‘हॉट सिट्जबाथ’ अत्यधिक फायदेमंद रहता है। इसमें एक टब में कुनकुना पानी करके उसमें बिलकुल नंगा होकर इस प्रकार बैठना चाहिए कि मलद्वार पर पानी का गर्म सेंक बना रहे। 15-20 मिनट तक रोजाना 10-15 दिन ऐसा करने पर आशाजनक लाभ मिलता है।

उदर रोगों की होम्योपैथिक चिकित्सा



   उदर-विकार समय पर खाना न खाना, अधिक तली चीज़ें खाना, अत्यधिक खाना खाना अथवा भूखा रहना, मिर्च-मसालों का अधिक प्रयोग आदि उदर- विकारों को उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त हैं। प्रमुख परेशानियां, कारण और होमियोपैथिक चिकित्सा से निवारण निम्न प्रकार संभव है –
अग्निमान्ध्य 
अग्निमांद्य यानी जठराग्नि कमजोर हो जाने पर प्रमुख लक्षण होते हैं – भूखन लगना, भोजन से अरुचि होना, पेट भरा-भरा सा लगना। इसे अजीर्ण, बदहजमी और पेट भरा-भरा सा कहते हैं। अग्निमांद्य होने पर गैस की शिकायत रहना, कब्ज होना, पेट फूलना और भारी रहना, तबीयत में गिरावट, स्वभाव में चिड़चिड़ाहट और मन में खिन्नता रहना आदि अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इन व्याधियों की चिकित्सा के लिए लक्षणों के अनुसार दवा चुनकर सेवन करना फायदेमंद है। प्रमुख दवाएं इस प्रकार हैं –
लक्षण एवं उपचार
कार्बोवेज : 
पाचन शक्ति कमजोर हो जाए, खाना देर से हजम होता हो और पूरी तरह से पच न पाने के कारण सड़ने लगता हो, जिससे गैस बनती हो, पेट फूल जाता हो, अधोवायु निकलने पर राहत मालूम देती हो, खट्टी डकारें आती हों या खाली डकारें आएं, गैस ऊपर की तरफ चढ़ती हो, जिसका दबाव छाती पर पड़ता हो और भोजन के आधा-एक घटे बाद ही कष्ट होने लगे, तो समझें कि ये लक्षण ‘कार्बोवेज’ दवा के हैं। ऐसी स्थिति में 30 शक्ति एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है।
एण्टिमक्रूड : 
अग्निमांद्य के साथ-साथ जीभ पर दूध जैसी सफेद मैली परत चढ़ी होना, गर्मी के दिनों में उदर-विकार होने पर दस्त लग जाना, बदहजमी, भूख न लगना, एसिड एवं अचारों को खाने की प्रबल इच्छा, खट्टी डकरें, बच्चा दूध की उल्टी कर देता है, खाने के बाद पेट फूल जाना, खुली हवा में आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर एण्टिमक्रूड दवा 6 एवं 30 शक्ति अत्यधिक कारगर है।
नक्सवोमिका : 
खाना खाने के घटे दो-घटे बाद तकलीफ होना, पेट में भारीपन, जैसे कोई पत्थर पेट में रखा हो, पेट फूलना, पेट में जलन मालूम देना, गैस के दबाव के साथ सिर में भारीपन बढ़ना, रोगी दुबले शरीर वाला, क्रोधी एवं चिड़चिड़ा स्वभाव, ठंड के प्रति अधिक सहिष्णुता, रोगी अचार, चटनी, तले पदार्थ खाना पसंद करता है और पचा भी लेता है। इसके बाद परेशानी होने लगती है। बहुत मद्यपान करने, बहुत भोग-विलास करने, बहुत ज्यादा खाने, आलसी जीवन बिताने और गरिष्ठ पदार्थों के सेवन से जिनकी पाचन शक्ति कमजोर हो गई हो एवं पाखाना जाने की इच्छा होती हो, किन्तु पाखाना बहुत कम होता हो और थोड़ी देर बाद पुनः पाखाने जाने की जरूरत होने लगती है, ऐसी स्थिति में ‘नवसवोमिका’ 30 एवं 200 शक्ति की दवा अत्यन्त फायदेमंद होती है। यह दवा प्राय:रात में सोने से पूर्व ही सेवन करनी चाहिए।
पल्सेटिला :
 प्यास बिलकुल न लगना जबकि जीभ सूखी हुई हो, भोजन के घटे-दो घंटे बाद तकलीफ होना, पेट में बोझ-सा लगना, जलन होना, सुबह उठने पर बिना कुछ खाए-पिए भी पेट भरा हुआ और भारी लगना, रोगी स्वास्थ्य में ठीक होता है, मोटा होता है, ऊष्ण प्रकृति (गर्म-तासीर) वाला होता है, शांत और मधुर स्वभाव का होता है, अधीरता के कारण बात करते-करते रो देना एवं शांत कराने पर चुप हो जाना, चटपटे, तले एवं घी से बने भारी पदार्थ हजम नहीं कर पाना, ठंडी हवा में आराम मिलना, खाने में स्वाद कम हो जाना, गर्म कमरे में एवं दर्द से विपरीत दिशा में लेटने पर परेशानी महसूस करना, ठंडी चीजों से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर 30 एवं 200 शक्ति की दवा बेहद कारगर साबित रही है।
अम्लता (एसीडिटी) : 
पेट में अम्लता बढ़ जाए, तो पाचन-क्रिया बिगड़ जाती है, जिससे भोजन ठीक से पचने की अपेक्षा सड़ने लगता है और पेट व गले में जलन होती है, गले में खट्टा, तीखा, चटपटा पानी डकार के साथ आता है, छाती में जलन का अनुभव होता है,खट्टी व तीखी डकारें आती हैं। ये सब अम्लता के मुख्य लक्षण हैं। इसमें अपच के साथ-साथ कब्ज या दस्त होने की शिकायत बनी रहती है। कभी-कभी कड़वी और गर्म पानी के साथ उल्टी हो जाती है। लक्षणों के आधार पर प्रमुख औषधियां निम्न प्रकार है –
 
एसीडिटी के लक्षण एवं उपचार
अर्जेण्टम नाइट्रिकम : 
डकार आए और साथ में पेट दर्द भी हो, मीठा खाने में रुचि हो, पर मीठा खाने से कष्ट बढ़े, डकार आने से आराम मालूम देना, जी मतली करे, गैस बढ़े, पेट में जलन हो, मीठे के साथ-साथ नमकीन खाने की भी इच्छा रहती हो, गमीं से, मिठाई से, ठंडे खाने से परेशानी बढ़ना, खुली हवा में, डकार आने से आराम मिलना आदि लक्षण हो, तो 30 शक्ति की दवा उपयोगी है।
खाने के बाद जी मतली करे, गले में कड़वा खट्टा पानी डकार के साथ आए, रोगी शीत प्रकृति का हो, तो ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
यदि डकार में खाए हुए अन्न का स्वाद आए, रोगी ऊष्ण प्रकृति का हो, मुंह सूखा रहे और प्यास न लगे, तो ‘पल्सेटिला’ 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
ब्रायोनिया : 
खाने के बाद कड़वी और खट्टी डकारें आएं, पेट में भारीपन हो, डकार में खाए हुए पदार्थ की गंध या स्वाद हो, अधिक प्यास, मुंह व होंठ सूखना, सुबह मतली आना, गर्म चीज खाने से कष्ट बढ़े, खाना खाते ही तबीयत बिगड़े, हिलने-डुलने से कष्ट बढ़े, ठंड एव् ठंडी हवा से आराम हो, पेट को छूने से अथवा खांसी आने पर परेशानी बढ़ जाना, दर्द वाली सतह पर लेटने, कसकर दबाने से, आराम करने से परेशानियां कम हो जाती हों, तो ब्रायोनिया 30 शक्ति की दवा फायदेमंद है।
नेट्रमफॉस : 
परेशानियां जो अत्यधिक अम्लता के कारण पैदा हो जाती हैं, पीली, चिकनी परत, जीभ के पिछले भाग पर, मुंह में घाव, जीभ की नोक पर घाव, गले की (टॉन्सिल) झिल्ली भी मोटी और चिकनी हो जाना, खाना निगलने में परेशानी महसूस करना, खट्टी डकारें, कड़वी उल्टी, हरा दस्त आदि लक्षण मिलने पर 12 × एवं 30 शक्ति की दवा अत्यन्त लाभदायक है।
चाइना : 
अम्लता के रोगी को ऐसा अनुभव हो कि पूरा पेट हवा से भरा हुआ है, डकार आने पर हलकापन और राहत अनुभव हो, डकरें खट्टी व बदबूदार हों या खाली डकारें ही आती हों, मुंह का स्वाद कड़वा रहे, मुंह में कड़वा पानी आता हो, ऐसा लगे कि खाना छाती पर ही अड़ा हुआ है, छाती में जलन होती हो, तो चाइना 30 शक्ति फायदेमंद होती है।
कब्ज (कांस्टिपेशन) :
 खाने में अनियमितता, जल्दी-जल्दी खाने, ठीक से चबा-चबाकर न खाने, भारी, तले हुए और मांसाहारी पदार्थों का सेवन करने, पाचन शक्ति कमजोर होने आदि कारणों से अधिकांश स्त्री-पुरुष कब्ज के शिकार बने रहते हैं। कब्ज होने से कई और रोग भी उत्पन्न हुआ करते हैं। जैसे-शरीर को पर्याप्त पोषण नहीं मिल पाता, जिससे शरीर में सुस्ती व कमजोरी आती है। गैस एवं वातरोग उत्पन्न होते हैं। स्वस्थ रहने के लिए कब्ज का न होना पहली शर्त है।
कब्ज का लक्षण एवं उपचार
हाइड्रेस्टिस : 
अगर रोगी सिर्फ कब्ज का ही रोगी हो, तो हाइड्रेस्टिस बहुत अक्सीर दवा है। पेट खाली-खाली-सा लगे, मीठा-मीठा हलका-सा दर्द हो और कब्ज के सिवाय अन्य कोई लक्षण न हो, तो हाइड्रेस्टिस दवा के मूल अर्क (मदर टिंचर) की 5-5 बूंद 2 चम्मच पानी में सुबह खाली पेट लगातार कई दिन लेने से कब्ज दूर हो जाती है।
नक्सवोमिका : 
उक्त दवा के मुख्य लक्षण ऊपर वर्णित किए जा चुके हैं। कब्ज की अवस्था में, जो लोग बैठक का काम ज्यादा करते हैं, बार-बार शौच के लिए जाते हैं, पर पेट ठीक से साफ नहीं होता, हर बार थोड़ा-थोड़ा पाखाना हो और शौच के बाद भी हाजत बनी रहे, तो नक्सवोमिका 200 शक्ति की तीन खुराकें 15 मिनट के अंतर पर रात में सोने से एक घंटा पहले ले लेनी चाहिए। दस्त के बाद पेट में मरोड़ होना भी इसका एक लक्षण है।
कुछ रोगियों को टट्टी की हाजत ही नहीं होती और वे 2-3 दिन तक हाजत का अनुभव नहीं करते। शौच के लिए बैठते हैं, तब बड़ी मुश्किल से सूखी काली तथा बकरी की मेंगनी जैसी गोलियों की शक्ल में टट्टी होती है, आलू खाने से कष्ट बढ़ जाता है, मलाशय की पेशियां इतनी शिथिल हो जाती है कि स्वयं मल बाहर नहीं फेंक पातीं। यहां तक कि पतले मल को निकालने के लिए भी जोर लगाना पड़ता है। पेशाब करने में जोर लगाना पड़े, पीठ में दर्द हो, तो इन लक्षणों के आधार पर ‘एलुमिना’ 30 एवं 200 शक्ति की कुछ खुराक ही कारगर असर दिखाती है।
मैग्नेशिया म्यूर : 
यह दवा शिशुओं के लिए उपयोगी है। खास कर दांत-दाढ़ निकलते समय हो, दूध न पचता हो, उन्हें उक्त दवा 30 शक्ति की देना फायदेमंद है। इसके अलावा ‘साइलेशिया’ दवा भी अत्यंत फायदेमंद है।
अतिसार (डायेरिया) : 
उदर-विकार में जहां अपच के कारण कब्ज हो जाने से शौच नहीं आता, वहीं अपच के कारण अतिसार होने से बार-बार शौच आता है, जिसे दस्त लगना कहते हैं। कभी-कभी निर्जलन की स्थिति (डिहाइड्रेशन) बन जाती है, यानी शरीर में पानी की कमी हो जाती है, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मल निकलता है। फिर भी पेट साफ और हलका नहीं लगता।
डायरिया का लक्षण एवं उपचार
 
मैग्नेशिया कार्ब : 
शिशुओं के लिए उत्तम दवा है। दूध पीता बच्चा, हरे-पीले और झागदार दस्त बार-बार करे, मल से और शरीर से खट्टी दुर्गन्ध आए, दस्त में अपना दूध निकाले, तो उक्त दवा 30 शक्ति कारगर है।
कैमोमिला :
 बेचैनी, चिड़चिड़ापन, बच्चा एक वस्तु मांगता है, मिलने पर लेने से मना कर देता है, जिद्दी स्वभाव, गर्म-हरा पानी जैसा बदबूदार दस्त (जैसे किसी ने पालक में अंडा फेंट दिया हो), पेशाब के रास्ते में जलन, मां के गुस्सा करने के समय बच्चे को दूध पिलाने के बाद बच्चे को दस्त होना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
एलोस : 
रोगी को मांस के प्रति घृणा रहती है। जूस एवं तरल पदार्थों की इच्छा बनी रहती है, किंतु पीते ही पेट फूलने लगता है। पेट में भारीपन, फूला हुआ, शौच से पूर्व एवं बाद में भी पेट दर्द, रोगी कुछ भी खाता है, फौरन पाखाने जाना पड़ता है। पाखाने में श्लेष्मायुक्त स्राव अधिक निकलता है। साथ ही गैस भी अधिक निकलती है। ऐसी स्थिति में उक्त औषधि 30 शक्ति में नियमित सेवन करानी चाहिए।
पोडोफाइलम : 
उल्टी के साथ दस्त, अधिक प्यास, पेट फूला हुआ, पेट के बल ही रोगी लेट सकता है, यकृत की जगह पर दर्द, रगड़ने पर आराम, कालरा रोग होने पर, बच्चों में सुबह के वक्त, दांत निकलने के दौरान हरा दस्त, पानीदार, बदबूदार पाखाना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में औषधि का प्रयोग हितकारी रहता है।
• नाक बहने एवं फेफड़ों की गड़बड़ी के साथ – ‘सैंग्युनेरिया’।
• मौसम-परिवर्तन के साथ – ‘एकोनाइट’, ‘ब्रायोनिया’, ‘नेट्रम सल्फ’, ‘केप्सिकम’, ‘डल्कामारा’, ‘मरक्यूरियस’।
• आइसक्रीम व अन्य ठंडी वस्तुओं के कारण – ‘पल्सेटिला’, ‘एकोनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’।
• कॉफी के कारण – ‘साइक्लामेन’, ‘थूजा’ ।
• जुकाम दब जाने से – ‘सैंग्युनेरिया’ ।
• अंडे खाने के बाद – ‘चिनिनम आर्स’।
• उत्तेजना अथवा व्यग्रता के कारण – ‘एकोनाइट’, ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘जेलसीमियम’, ‘इग्नेशिया’, ‘ओपियम’, ‘फॉस्फोरिक एसिड’।
• त्वचा रोग हो जाने पर – ‘ब्रायोनिया’, ‘सल्फर’।
• चिकनी एवं तैलीय वस्तुएं खाने के बाद – ‘पल्सेटिला’।
• फल खाने के बाद – ‘आसेंनिक’, ‘ब्रायोनिया’, ‘चाइना’, ‘पोडोफाइलम’, ‘पल्सेटिला’, ‘क्रोटनटिंग’।
• पेट की गड़बड़ियों के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘नक्सवोमिका’, ‘पल्सेटिला’ ।
• गर्मी के कारण – ‘एण्टिमकूड’, ‘ब्रायोनिया’, ‘कैमोमिला’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूफिया’, ‘इपिकॉक’, ‘पीडोफाइलम’।
• अम्लता (हाइपर एसिडिटी) के कारण – ‘कैमोमिला’, ‘रयूम’, ‘रोविनिया’ ।
• अांतों की कमजोरी के कारण – ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘सिनकोना’, ‘सिकेल’।
• पीलिया के कारण – ‘चिओनेंथस’।
• मांस खाने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘क्रोटनटिंग’।
• दूध पीने के कारण – ‘एथूजा’, ‘मैगकार्ब’, ‘नक्समॉश’, ‘मैगमूर’, ‘सीपिया’।
• चलने-फिरने से – ‘ब्रायोनिया’।
• ऊपर से नीचे उतरने (सीढ़ियां उतरने) के कारण – ‘बोरैक्स’, ‘सैनीक्यूला’ ।
• गुर्दो के संक्रमण के कारण – ‘टेरेबिंथ’ ।
• प्याज खाने से – ‘थूजा’ ।
• सूअर का मांस खाने से – ‘एकोनाइट’, ‘पल्सेटिला’ ।
• मिठाई खाने के कारण – ‘अर्जेण्टम नाइट्रिकम’, ‘गेम्बोजिया’।
• तम्बाकू खाने से – ‘टेबेकम’, ‘कैमोमिला’।
• क्षयरोग के साथ दस्त – ‘आर्निका’, ‘बेप्टिशिया’, ‘सिनकोना’, ‘क्यूप्रमआस’, ‘फॉस्फोरस’ आदि।
• सन्निपात ज्वर के साथ – ‘आर्सेनिक’, ‘बेप्टिशिया’, ‘हायोसाइमस’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’।
• आंतों में घाव हो जाने के कारण – ‘मर्ककॉर’, ‘कालीबाई’।
• पेशाब के साथ दस्त – ‘एलोस’, ‘एलूमिना’, ‘एपिस’।
• खांसने पर पाखाना निकल जाना – ‘कॉस्टिकम’।
• टीके वगैरह लगने के बाद (बच्चों में) दस्त होना – ‘साइलेशिया’, ‘थूजा’ ।
• सब्जियां (तरबूज वगैरह) खाने के बाद – ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’ ।
• प्रदूषित जल पीने के कारण – ‘जिंजिबर’, ‘एल्सटोनिया’, ‘कैम्फर’ ।
• बच्चों में दस्त होना – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘अर्जेण्टमनाइट’, ‘आर्सेनिक’, ‘बेलाडोना’, ‘बोरैक्स’, ‘कैल्केरिया कार्ब’, ‘कैल्केरियाफॉस’, ‘कैमोमिला’, ‘कोलोसिंथ’, ‘क्रोटनटिंग’, ‘सल्फर’, ‘वेरेट्रम एल्बम’।
• बच्चों में दांत निकलने के दौरान दस्त – ‘एकोनाइट’, ‘एथूजा’, ‘बेलाडोना’, ‘कैल्केरिया आदि।
• बूढ़े व्यक्तियों को दस्त होने पर – ‘एण्टिमकूड’, ‘कार्बोवेज’, ‘सिनकोना’, ‘सल्फर’ ।
• स्त्रियों में मासिक ऋतु स्राव से पहले व बाद में दस्त – ‘अमोनब्रोम’, ‘बोविस्टा’।
• लेटे रहने पर स्त्रियों को दस्त की हाजत होना – ‘कैमोमिला’, ‘हायोसाइमस’, ‘सिकेलकॉर’।
कैल्केरिया कार्ब : जरा-सा दबाव भी (बच्चे चाक खड़िया खाते हैं) पेट पर बर्दाश्त नहीं कर पाता, पीला बदबूदार पाखाना, अधपचा खाना निकलता है, किंतु अधिक भूख लगती है, पहले पाखाना कड़ा होता है, बाद में दस्त होते हैं, 200 शक्ति में लें।
• पहले सिरदर्द, फिर दस्त – ‘एलो’, ‘पोडोफाइलम’।
• खट्टी वस्तुओं से – ‘एलो’, ‘एण्टिमकूड’।
• किसी आकस्मिक बीमारी के कारण – ‘चाइना’, ‘कार्बोवेज’।
• शराब पीने के कारण – ‘आर्सेनिक’, ‘लेकेसिस’, ‘नक्सवोमिका’।
• बुखार के कारण – ‘कैमोमिला’ ।
• नहानेके बाद – ‘एण्टिमक्रूड’।
• बियरपीने के कारण – ‘कालीबाई’, ‘सल्फर’, ‘इपिकॉक’, ‘म्यूरियाटिक एसिड’ आदि।
• गोभी खाने से – ‘ब्रायोनिया’, ‘पेट्रोलियम’।


आँख के रोग के होम्योपैथिक इलाज



अांखें आना : 
आंख का दुखना या आंखें आना, आंखों का एक छूत का रोग है। यह एक प्रकार के बैक्टीरिया, फफूंद या वायरस (विषाणु) के कारण होता है। इसमें आंख का सफेद भाग (दृष्टिपटल) और पलकों की भीतरी सतह को ढकने वाली पतली पारदर्शी झिल्ली लाल हो जाती है। यह रोग प्रायः खतरनाक नहीं होता, किन्तु ठीक प्रकार से इलाज करवाने में देरी करने से नेत्र-ज्योति पर असर पड़ सकता है।
लक्षण
यह रोग एक आंख या दोनों आंखों में खुजलाहट के साथ शुरू होता है। आंखें लाल हो जाती हैं और पलकें सूज जाती हैं, शुरू में आंखों से पानी या पतली कीच-सी निकलती है। इसके बाद आंखों की कोरों में गाढ़ी-सी सफेद या पीलापन लिये सफेद कीच-सी इकट्टी हो जाती है, आंख खोलना मुश्किल हो जाता है और रोगी प्रकाश सहन नहीं कर सकता। यदि इलाज न करवाया जाए, तो आंखों की पुतली में फोड़ा हो जाता है और आंख की पुतली पर सफेदा, माड़ा या फूला बन जाता है। इससे सदा के लिए नेत्रज्योति नष्ट भी हो सकती है।
रोग कैसे फैलता है : 
यह रोग दूषित हाथ या उंगलियां आंखों पर लगाने से, दूषित तौलिया, रूमाल आदि से आंखें पॉछने से और रोगी की अन्य दूषित चीजों के प्रयोग से भी फैलता है। मक्खियां भी इस रोग को एक रोगी से दूसरे रोगी तक पहुँचा देती हैं। यह रोग धूल, धुआं, गंदे पानी में नहाने या रोगी की सुरमा डालने की सलाई का इस्तेमाल करने से या एक ही उंगली द्वारा एक से अधिक बच्चों को काजल लगाने से भी हो जाता है।
रोकथाम
इस रोग की रोकथाम का सबसे उत्तम उपाय साफ रहना, सफाई के प्रति सावधानी बरतना और पास-पड़ोस को साफ-सुथरा रखना है। रोगी के प्रतिदिन काम आने वाले के लिए रूमाल और वस्त्रों को जब तक अच्छी तरह साफ न कर लें, दूसरों के कपड़ों के साथ न मिलाएं, भीड़-भाड़ से बचकर रहें। घर में सभी के लिए एक सुरमा-सलाई का उपयोग न करें। आंखों में काजल न डालें, आंखें नित्य ठण्डे और साफ पानी से धोएं।
रोहे : 
आंखों का दुखना (कंजक्टीवाइटिस) से मिलती-जुलती एक और आंखों की बीमारी होती है। इस बीमारी में पलकों की भीतरी सतह पर दाने निकल आते हैं और आंखें दुखने लगती हैं। यह भी एक छूत की बीमारी होती है और अधिकतर शिशुओं एवं छोटे बच्चों को यह बीमारी जल्दी लगती है। इस बीमारी की रोकथाम एवं बचाव भी उसी तरह सम्भव है, जिस प्रकार आंखों का दुखना (कंजक्टीवाइटिस) में उपाय बताए गए हैं।
आँख के रोग का होमियोपैथिक उपचार
लक्षणों की समानता के आधार पर होमियोपैथिक औषधियों से न सिर्फ आंखों का दुखना व रोहे बीमारियां ठीक हो जाती हैं, वरन् यदि किसी क्षेत्र विशेष में उक्त बीमारियां फैली हों, तो इनसे बचाव के लिए भी होमियोपैथिक औषधियां अत्यन्त फायदेमंद एवं कारगर साबित होती हैं।
ग्वारिया : 
आंख के भीतरी भाग की झिल्ली (कंजवटाइवा) की आंख के अंदर से निकले पानी के भर जाने की वजह से सूजन (कीमोसिस), कंजक्टाइवा से बाहर की ओर निकला पंखनुमा उभार, कंजवटाइव की सूजन, लाली, जलन, आंखों में अत्यधिक दर्द, जैसे आखें बाहर निकल आएंगी। अधिकतर वस्तुएं स्लेटी (ग्रे) रंग की लगने लगती हैं, आंखों के लक्षण ठीक होने पर सुनाई कम पड़ने लगता है और सुनाई ठीक पड़ने पर पुन: आंखों में पूर्ववर्ती लक्षण प्रकट होने लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में दवा का मूल अर्क (मदर टिंचर) की 5-5 बूंदें सुबह-दोपहर-शाम लेने से कुछ दिनों में फायदा हो जाता है।
अर्जेण्टम नाइट्रिकम : 
आंखों में अंदरूनी कोण (कैंथस) पर सूजन, लाली, आंखों के आगे धब्बे दिखाई पड़ना, साफ दिखाई न पड़ना, गर्म कमरे में रोशनी में दिखाई न पड़ना, आंखों में अत्यधिक जलन, लाली, सूजन, कीच आना, कंजक्टाइवा की सूजन, आंखों की पलकों के किनारों में घाव, सूजन, सिलाई-कढ़ाई करने से आंखों की रोशनी कम पड़ना, गर्म कमरे में अथवा गर्मी से आंखों में अधिक जलन महसूस होना, आंखों से अधिक कार्य करने पर ऐसा महसूस होना, जैसे चोट लगने के बाद दर्द होता है, आंखें बंद करने और दबाने पर आराम मिलना, आंखों की मांसपेशियां कमजोर पड़ जाती हैं, कंजक्टाइबा-परदाने पड़ जाते हैं (रोहे हो जाना), कार्निया (आंखों के सामने की पारदशीं झिल्ली) पर घाव हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा की कुछ खुराकें 30 शक्ति की अत्यंतं फायदेमंद साबित हो रही हैं।
बेलाडोना :
 लेटने पर आंखों में अंदर तक कड़कड़ महसूस होना, पुतली फैल जाना, आंखों में सूजन एवं बाहर की तरफ को खिंचाव, ऐसा महसूस होना, जैसे आंखें बाहर निकल आएगी, कंजक्टाइवा लाल, सूखापन, जलन, आंखों में चुभन, अनावश्यक रूप से अांखों का बाहर की तरफ निकल जाना, ऐसा महसूस होना, जैसे आंखें आधी बंद हैं और आधी खुली हुई, पलकों में सूजन आदि लक्षण होने पर, छूने से परेशानी बंढ़ने पर बेलाडोना दवा 30 एवं 200 शक्ति में जल्दी-जल्दी दो-तीन दिन खाने से तुरंत आराम मिल जाता है।
यूफ्रेशिया :
 कंजवटाइवा में सूजन, जलन, लाली, कीच, आंखों से गाढ़ा पानी, जो चेहरे पर चिपक जाता है एवं उसकी वजह से गालों पर भी जलन एवं खुजली रहती है। साथ ही नाक से भी पानी बहता है (जुकाम), किन्तु वह न तो चिपकता है और न ही उससे खुजली होती है, पलकों में जलन एवं सूजन, पलकें जल्दी-जल्दी खोलना-बंद करना, आंखों में भारीपन महसूस करना, धुंधलापन, कार्नियापर हलके फफोले महसूस होना, गर्मी में रोशनी से परेशानी महसूस करना एवं अंधकार में बेहतर महसूस करना आदि लक्षण मिलने पर 6x से 30 शक्ति तक की दवा की 2-3 खुराकें 2-3 दिन लेने से आराम मिलता है। साथ ही, इसके मूल अर्क, जो कि आंखों में डालने के लिए अलग से आता है, की एक-एक बूंद सुबह-दोपहर-शाम डालने से एक-दो दिनों में ही आराम हो जाता है।
आंखों में गुहेरी होना : 
आंखों में बार-बार गुहेरी निकलने पर ‘स्टेफिसेग्रिया‘ अत्यन्त उत्तम औषधि है। 30 शक्ति में औषधि सेवन करना चाहिए। यदि रोग काफी दिनों से परेशान कर रहा हो, तो सप्ताह में एक बार तीन खुराक 200 शक्ति की, एक माह तक सेवन करना लाभप्रद रहता है। यदि गुहेरी कभी दाई आंख में, कभी बाईं आंख में निकले और आंख से पीला-हरा गाढ़ा स्राव भी निकले, तो ‘पल्सेटिला‘ 30 शक्ति में दो-तीन दिन खाएं। फिर 200 शक्ति की तीन खुराक खाकर बंद कर दें, फायदा हो जाएगा। ‘सल्फर‘ औषधियां भी लक्षणों के आधार पर प्रयुक्त की जा सकती हैं
एपिस :
 पलकों की सूजन, लाली, जैसे पानी भरा हो, बाहर की तरफ जलन, ऐसा महसूस होना, जैसे किसी जानवर (मधुमक्खी) ने डंक मार दिया हो, कंजक्टाइवा हलका लाल, सूजन, आंखों से कीच, गर्म कीच, रोशनी से आंखों में परेशानी व दिखाई न देना, कार्निया की सूजन (आंखों की आगे की पारदर्शी झिल्ली) कंजक्टाइवा में पानी भरने से सूजन, आंखों में गुहेरी (स्टाई) हो जाना, गर्मी में अधिक परेशानी महसूस करना, छूने से परेशानी होना, ठंडे पानी से एवं खुली हवा में राहत महसूस करना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति की दवा की कुछ खुराकें दो-तीन दिन तक खाने से फायदा होता है।

2017-06-18

उच्च रक्तचाप का होम्योपैथिक व घरेलू उपचार (High Blood Pressure Homeopathy Treatment)



  ह्रदय की प्रत्येक धड़कन के समय जो अधिकतम दबाव (प्रेशर) होता है, उसे ‘सिस्टोलिक प्रेशर’ कहते हैं, जिसमें हृदय के निचले भाग के कोष में आकुंचन होता है। दो धड़कनों के मध्य काल का जो समय होता है, उस वक्त कम-से-कम जो दबाव होता है, उसे ‘डायस्टोलिक प्रेशर’ कहते हैं। इन दोनों के संतुलित दबाव को ‘ब्लड-प्रेशर’ कहते हैं। 
   आम तौर से शिशु का रक्तचाप 80/50 मिमी. मरकरी, युवकों का 120/80 मिमी. मरकरी और प्रौढ़ों का 140/90 मिमी.मरकरी होना सामान्य स्थिति होती है। इसमें पहली बड़ी संख्या सिस्टोलिक और दूसरी छोटी संख्या डायस्टोलिक प्रेशर की सूचक होती है। एक सामान्य फार्मूला यह भी माना जाता है कि अपनी आयु के वर्षों में 90 जोड़ लीजिए।योगफल के आस-पास ही आपका सामान्य सिस्टोलिक प्रेशर होना चाहिए।
    इस रोग में शरीर में रक्त का दबाव अस्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। इस रोग में सिर-दर्द, चक्कर आना, आलस्य, अनिद्रा, हृदय-शूल आदि लक्षण प्रकटते हैं । यह रोग मुख्यतः अधिक मानसिक श्रम, चिंता, उदररोग, नशा करना, मधुमेह, मोटापा, अधिक भोग आदि कारणों से होता है।उच्च रक्तचाप क्यों होता है : ‘शारीरिक कारण’ एवं*मानसिक कारण’।
शारीरिक कारण : 
च्च रक्तचाप अथवा हाई ब्लड प्रेशर अथवा हाइपरटेंशन के विषय में निम्न शारीरिक कारण मिल सकते हैं-
1. रक्तवाहिनी शिराओं का मार्ग संकीर्ण हो जाए अथवा शिराएं कठोर हो जाएं।
2. गुर्दे में कोई विकार या किसी व्याधि का होना।
3. लिवर के माध्यम से होने वाले रक्त प्रवाह में बाधा उपस्थित होने से पोर्टल वेन में दबावं उत्पन्न होने के कारण।
   रक्त में कोलेस्ट्राल नामक तत्त्व की मात्रा सामान्य स्तर से ज्यादा हो जाने पर या शरीर में चर्बी ज्यादा बढ़ने से (मोटापा होने से), पैतृक प्रभाव से, वृद्धावस्था के कारण आई निर्बलता से, गुदे या जिगर की खराबी होने आदि कारणों से उच्च रक्तचाप होने की स्थिति बनती है। ये सब शारीरिक कारण होते हैं।
मानसिक कारण : 
मनुष्य का मन बड़ा संवेदनशील होता है, उस पर जो व्यक्ति स्वभाव से भावुक भी होते हैं, उनकी संवेदनशीलता और भी ज्यादा बढ़ी हुई रहती है। ऐसे में यदि उनको कोई चिंता, शोक, क्रोध, ईष्र्या या भय का मानसिक आघात लगे, तो उनके दिल की धड़कन बढ़ जाती है, स्नायविक संस्थान तनाव से भर उठता है। अत:इस प्रकार के अनेकों मानसिक वेगों से बचना आवश्यक है।
उच्च रक्तचाप का लक्षण
सिरदर्द, सिर में भारीपन, तनाव एवं चक्कर आना, थकावट होना, चेहरे पर तनाव मालूम देना, हृदय की धड़कन बढ़ना, सांस लेने में असुविधा होना, स्वभाव में चिड़चिड़ापन होना, अनिद्रा, घबराहट, बेचैनी होना आदि लक्षण उच्च रक्तचाप के कारण हो सकते हैं।
बचाव
शारीरिक कारण उत्पन्न करने वाला गलत आहा रविहार न करके उचित और निश्चित समय पर सादा सुपाच्य आहार लें, पाचन शक्ति ठीक रखें, शरीर पर मोटापा न चढ़ने दें, ऐसे पदार्थों का सेवन न करें, जो रक्त में कोलेस्ट्राल और मोटापा बढ़ाते हों। श्रम के कार्य किया करें या व्यायाम अथवा योगासनों का नियमित अभ्यास किया करें। वजन घटाने के लिए फल, सलाद आदि का प्रयोग अधिक करें।
  मानसिक कारण उत्पन्न करने वाले कारणों से बचकर रहें। चिन्ता न करके ‘चिन्तन’ करना चाहिए। ‘चिन्ता’ और ‘चिन्तन’ में बहुत फर्क होता है। मन की इच्छा के विपरीत और पीड़ादायक सोच-विचार करने को चिन्ता करना कहते हैं। योगासनों में ‘शवासन’ सर्वोत्तम रहता है।

एनाकार्डियम 30, 3x- 
यह दवा भी उक्त रोग को बहुत ही आसानी से दूर कर देती है । अधिकांश चिकित्सक 3x शक्ति दिये जाने के पक्ष में हैं लेकिन मैंने 30 शक्ति को भी उपयोगी पाया है ।
एकोनाइट 30— 
रोगी का मन घबराया हो, बेचैनी हो, मृत्यु या समाज डर, चेहरा पीला पड़ जाये, नब्ज तेज चले, त्वचा गर्म और सूखी, सिर मानो फट जायेगा, सिर चकराये जिससे सिर को हिला भी न सके तो इन लक्षणों में देनी चाहिये ।
बेलाडोना 30, 200–
 सिर-दर्द, चक्कर आना, कनपटियों में दर्द, त्वचा गर्म, नाड़ी तेज तो यह दवा आश्चर्यजनक लाभ पहुँचाती है। रोगी का चेहरा और नेत्र लाल रहते हैं ।
क्रेटेगस Q-
यह दवा भी उच्च रक्तचाप को नियन्त्रित करती है । कमजोरी आ जाये, हाथ-पैर ठण्डे पड़ जायें, नब्ज तेज चले, साँस भी अनियमित हो जाये, निराशा हो तो प्रयोग करनी चाहिये ।
कोनियम मैकुलेटम 6, 200–
 बड़ी आयु के अविवाहित स्त्री-पुरुषों को उच्च रक्तचाप, मस्तिष्क में कमजोरी, स्मरणशक्ति दुर्बल, हृदय धड़कना तेज हो जाये, पैर कॉपने लगें जिससे खड़ा होना कठिन हो जाये, सिर में भारीपन के साथ दर्द, चक्कर आना, शरीर की ग्रन्थियों में सूजन, कामेच्छा को दबाने या अति भोग से रोग का होना- इन लक्षणों में दें ।
सँगुनेरिया Q, 200– 
नाड़ियों का फूल जाना, हथेलियों और पैरों में जलन, सिर-दर्द जो सूर्य के अनुसार बढ़े व घटे, दर्द का दाँयी ओर अधिक होना, लेटने से दर्द में आराम हो, रजोनिवृत्ति के समय स्त्रियों को उच्च रक्तचापइन लक्षणों में देनी चाहिये ।
रोवोल्फिया सपॅन्टिना Q-
 यह उच्च रक्तचाप की अत्युत्तम दवा है । यह दवा मूत्र-वृद्धि करके रक्तचाप को नियन्त्रित करती है । इस दवा का नियमित सेवन करने से यह रोग निश्चित रूप से नष्ट हो जाता है । प्रायः प्रत्येक लक्षण में यह दवा दी जा सकती है ।
जेल्सीमियम 1M- 
रोगी को सिर में तनाव का दर्द, सिर भारी होना, घबराहट, सदैव तन्द्रा बनी रहे, हताशा, दु:खद समाचार सुनकर रोग बढ़नाइन लक्षणों में देनी चाहिये ।
उच्च रक्तचाप के घरेलू उपचार
प्राकृतिक चिकित्सा में तुलसी की पत्ती, नीम की पांच पत्ती एवं तीन काली मिर्च आपस में मिलाकर गोली बनाकर नित्य सेवन करें।
 
अमेरिका की एक महिला डाक्टर ए. विगमोर ने गेहूं के छोटे-छोटे पौधों का रस पिलाकर असाध्य से असाध्य उच्च रक्तचाप के रोगियों को ठीक करने का दावा किया है।
प्रात: काल मौन होकर भ्रमण करना फायदेमंद रहता है, किन्तु अधिक तेजी से न घूमें, वरना उच्च रक्तचाप बना रहेगा। उच्च रक्तचाप के रोगियों के लिए ‘शवासन ‘बहुपयोगी है।
कारपुरावल्‍ली -
कोलियस फोर्सखेल्‍ली, कारपुरवावल्‍ली पौधा है, जो दक्षिण भारत के कई घरों के बगीचों में पाया जाता है। शोध अध्‍ययन में पाया गया है कि धमनियों की नाजुक मांसपेशियों को इससे आराम मिलता है और इससे ब्‍लड़ प्रेशर भी कम होता है। यह भी कहा जाता है कि दिल को मजबूत बनाने में और धड़कन को कम करने में भी यह लाभकारी होता है।
लहसुन -
लहसुन उन रोगियों के लिए लाभकारी होता है जिनका ब्‍लड़प्रेशर हल्‍का सा बढ़ा रहता है। ऐसा माना जाता है कि लहसुन में एलिसीन होता है, जो नाइट्रिक ऑक्‍साइड के उत्‍पादन हो बढ़ाता है और मांसपेशियों की धमनियों को आराम पहुंचाता है और ब्‍लड़प्रेशर के डायलोस्टिक और सिस्‍टोलिक सिस्‍टम में भी राहत पहुंचाता है।
सहजन - 
सहजन का एक नाम ड्रम स्‍टीक भी होता है। इसमें भारी मात्रा में प्रोटीन और गुणकारी विटामिन और खनिज लवण पाएं जाते है। अध्‍ययन से पता चला है कि इस पेड़ के पत्‍तों के अर्क को पीने से ब्‍लड़प्रेशर के सिस्‍टोलिक और डायलोस्टिक पर सकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है। इसे खाने का सबसे अच्‍छा तरीका इसे मसूर की दाल के साथ पकाकर खाना है।
आंवला - 
परम्‍परागत तौर पर माना जाता है कि आंवला से ब्‍लड़प्रेशर घटता है। वैसे आंवला में विटामिन सी होता है जो रक्‍तवहिकाओं यानि ब्‍लड़ वैसेल्‍स को फैलाने में मदद करता है और इससे ब्‍लड़प्रेशर कम करने में मदद मिलती है। आवंला, त्रिफला का महत्‍वपूर्ण घटक है जो व्‍यवसायिक रूप से उपलब्‍ध है।
फ्लैक्‍ससीड या अलसी - 
फ्लैक्‍ससीड या लाइनसीड में एल्‍फा लिनोनेलिक एसिड बहुतायत में पाया जाता है जो कि एक प्रकार का महत्‍वपूर्ण ओमेगा - 3 फैटी एसिड है। कई अध्‍ययनों में भी पता चला है कि जिन लोगों को हाइपरटेंशन की शिकायत होती है उन्‍हे अपने भोजन में अलसी का इस्‍तेमाल शुरू करना चाहिए। इसमें कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा भी बहुत ज्‍यादा नहीं होती है और ब्‍लड़प्रेशर भी कम हो जाता है।
मूली - 
यह एक साधारण सब्‍जी है जो हर भारतीय घर के किचेन में मिलती है। इसे खाने से ब्‍लड़प्रेशर की बढ़ने वाली समस्‍या का निदान संभव है। इसे पकाकर या कच्‍चा खाने से बॉडी में उच्‍च मात्रा में मिनरल पौटेशियम पहुंचता है जो हाई - सोडियम डाईट के कारण बढ़ने वाले ब्‍लड़प्रेशर पर असर ड़ालता है।
 
इलायची - 
बायोकैमिस्‍ट्री और बायोफिजिक्‍स के एक भारतीय जर्नल में एक अध्‍ययन प्रकाशित किया गया जिसमें बताया गया कि बेसिक हाइपरटेंशन के 20 लोग शामिल थे, जिन्‍हे 3 ग्राम इलायची पाउडर दिया गया। तीन महीने खत्‍म होने के बाद, उन सभी लोगों को अच्‍छा फील हुआ और इलायची के 3 ग्राम सेवन से उनको कोई साइडइफेक्‍ट भी नहीं हुआ। इसके अलावा, अध्‍ययन में यह भी बताया गया कि इससे ब्‍लड़प्रेशर भी प्रभावी ढंग से कम होता है। इससे एंटी ऑक्‍सीडेंट की स्थिति में भी सुधार होता है जबकि इसके सेवन से फाइब्रिनोजेन के स्‍तर में बिना फेरबदल हुए रक्‍त के थक्‍के भी टूट जाते है।
दालचीनी - 
दालचीनी केवल इंसान को केवल दिल की बीमारियों से नहीं बल्कि डायबटीज से बचाता है। ओहाई के एप्‍लाईड हेल्‍थ सेंटर में 22 लोगों पर अध्‍ययन किया गया, जिनमें से आधे लोगों को 250 ग्राम पानी में दालचीनी को दिया गया जबकि आधे लोगों को कुछ और दिया गया। बाद में यह पता चला कि जिन लोगों ने दालचीनी का घोल पिया था, उनके शरीर में एंटीऑक्‍सीडेंट की मात्रा ज्‍यादा अच्‍छी थी और ब्‍लड सुगर भी कम थी।
निम्न रक्तचाप : कारण और लक्षण
जब हृदय से धमनियों में प्रवाहित रक्त का दबाव कम होता है (सामान्य से कम), तो इसे निम्न रक्तचाप कहते हैं। इसके लक्षण हैं कमजोरी महसूस होना, मिचली आना और कभी-कभी जब रक्तचाप बहुत कम हो जाए, तो बेहोश मरीज को कम्पन भी महसूस होती है। निम्न रक्तचाप चोट के कारण रक्त बहने, पेट में अल्सर के फट जाने, नाक से गम्भीर रक्तस्राव हो जाने, विषाक्त भोजन खा लेने, रक्तक्षीणता होने आदि कारणों से हो सकता है।
निम्न रक्तचाप का उपचार
निम्न रक्तचाप के उपचार का पहला कदम उसका मूल कारण पता लगाना है। अगर रक्तचाप अचानक घट जाता है, तो इसका कारण रक्तस्राव होगा, जैसा कि जख्मी होने पर होता है। ऐसी हालत में सर्वश्रेष्ठ यही है कि मरीज को अस्पताल ले जाया जाए और वहां उसे खून चढ़ाया जाए। अगर यह रक्तक्षीणता के कारण है, तो इसका उपचार रक्तक्षीणता दूर करके ही हो सकता है। 15-15 मिलि. ब्रांडी में गर्म जल मिलाकर लेने से तात्कालिक रूप से रक्तचाप बढ़ जाता है।
   निम्न रक्तचाप के मरीज को संतुलित पौष्टिक आहार देना चाहिए, जिसमें प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त हों। सूखे फल, पनीर, काला चना, आम, केला, सेब, अंगूर जैसे फल और सब्जियां, सभी प्रकार की फलियां मरीज को देना उत्तम रहता है। निम्न रक्तचाप के मरीज को कठोर श्रम वाले व्यायाम से बचना चाहिए।
होमियोपैथिक औषधियों में ‘विस्कम एल्बम’, ‘डिजिटेलिस’ आदि औषधियां लाभदायक एवं प्रभावी हैं।
बाई करवट लेटने पर दम घुटता है, सांस फूलना, धीमी नाड़ी, रक्तचाप कम, जोड़ों में दर्द, दोनों टांगों एवं नितम्बों में ऐंठन, दर्द, पूरा शरीर आग में जल रहा है ऐसा महसूस होना, बिस्तर में अधिक परेशानी (लेटने पर, मुख्य रूप से बाईं तरफ), जाड़े का मौसम अधिक कष्टप्रद आदि लक्षण मिलने पर ‘विस्कम एल्बम’ दवा का मूल अर्क 5-10 बूंद दिन में दो-तीन बार लेना चाहिए।
   हिलने-डुलने पर हृदयगति रुक जाएगी, तो निम्न रक्तचाप के रोगी को ‘डिजिटेलिस’ औषधि निम्नशक्ति में प्रयोग करनी चाहिए। एड्रीनेलीन 6 निम्न रक्तचाप की उत्तम औषधि है।

2017-06-15

रीढ़ की हड्डी की बीमारियों का होम्योपैथिक इलाज



रीढ़ की हड्डी की बीमारियों में मणके का अपनी जगह से हिल जाना, मणके का भुर जाना, मणके की हड्डी का बढ़ जाना एवं डिस्क का अपनी जगह से सरकना मुख्य हैं। डिस्क हमारी रीढ़ की हड्डी के मणके में एक छोटा सा हिस्सा होता है जो रीढ़ की हड्डी में शॉकर का काम करता है। यह किसी भी प्रकार के आकस्मिक आघात से रीढ़ की हड्डी की रक्षा करता है और अपने साथ जुड़े हुए दो मणकों को हिलने डुलने में मदद करता है। जब यह डिस्क किसी भी कारण से अपनी जगह से हिल जाती है तब यह स्पाइनल कॉर्ड पर दबाव डालती है जिसको स्लिप डिस्क की बीमारी कहा जाता है। यह बीमारी गर्दन से लेकर कमर किसी भी मणके में हो सकती है।
 
लक्षणः
सर्वाइकल गर्दन दर्द में दर्द गर्दन के पिछले हिस्से से शुरू होकर गर्दन, कंधे, बाजू और हाथों में जाता है। इस बीमारी में दर्द के साथ साथ मरीज को चक्कर आते हैं और हाथ का 'सुन्नपन' पाया जाता है। कमरदर्द में दर्द रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से कमर से शुरू होकर टांगों में जाता है। टांगों में और पैरों की उंगलियों में सुन्नपन आ जाता है। दर्द घुटनों एवं एड़ियों में भी आ जाता है। टांगों में कमजोरी महसूस होना या चलने में परेशानी इसके मुख्य लक्षण है।
होम्योपैथिक इलाज

अन्य चिकित्सा पद्धतियों में इलाज के लिए दर्द कम करने के लिए मरहम, तेल, दर्द निवारक दवाइयों का प्रयोग किया जाता है, जिनसे मरीज का दर्द सिर्फ कुछ घंटों के लिए कम होता है। परंतु डाक्टरों के अनुसार, रीढ़ की हड्डी के मणकों का सम्पूर्ण इलाज नहीं किया जा सकता और यह बीमारी लाइलाज है। कुछ देर के लिए दर्द कम हो सकता है लेकिन बीमारी नहीं। वहीं होम्योपैथी इसके बिल्कुल विपरीत सिद्घात पर काम करती है, जिसमें रोगी का इलाज किया जाता है रोग का नहीं अर्थात होम्योपैथिक इलाज रोगी को तंदरूस्त करता है। तंदरूस्त मनुष्य की बढ़ी हुई प्रतिरक्षा-प्रणाली अपने आप रीढ़ की हड्डी में आई हुई तबदीलियों को सही करके मरीज की बीमारी को सही कर सकती है। इस प्रकार होम्योपैथी रीढ़ की हड्डी की बीमारियों के मरीज को तंदरूस्त करने की पूरी क्षमता रखती है।
   रीढ़ की हड्डी के रोगों मे निम्न होम्योपैथिक औषधिया लक्षणानुसार  बेहद उपयोगी पायी गई हैं-
* सिमिसीफ़ुगा
*नेटरम म्यूर
*अगेरिकस
*जिंकम
*काकुलस
*नक्स वोम
*Physostigma
*Tarentula

मोटापे के लिए होम्योपैथी और घरेलू उपचार


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मोटापा कई बीमारियों की जड़ है, यह सभी जानते है। लेकिन इससे मुक्ति पाना इतना आसान भी नहीं होता। यहां वजन कम करने यानी मोटापा घटाने से संबंधित कुछ आसान उपाय दिए गए है जिन्हें रोजाना अपनाकर आप सिर्फ एक हफ्ते यानी सात दिन में वजन कम कर सुडौल काया एक बार फिर से पा सकते है।
  होम्योपैथिक चिकित्सा मोटापा एवं उसके विभिन्न पहलुओं का उपचार करता है। इन दवाओं से पाचन क्रिया सुदृढ़ होती है, चयापचय की क्रिया अच्छी होती है, जिसकी वजह से मोटापा कम होता है।
वजन घटाने के लिए कई लोग होम्योपैथी उपचार का सहारा लेते हैं।
वजन घटाने के लिए होम्योपैथिक उपचार को सुरक्षित माना गया है एवं यह सभी उम्र के लोगों के लिए कारगर एवं उपयुक्त होता है, क्योकि ये बहुत ही कोमल और पतले होते हैं और आमतौर पर इनका शरीर पर कुप्रभाव नहीं होता।
   आप वजन घटाने के लिए यदि कोई अन्य प्राकृतिक पूरक या उपचार ले रहे हैं तो भी आप होम्योपैथिक दवाइयां ले सकते हैं, क्योंकि यह दूसरे उपचार में न तो अवरोध पैदा करता है न हीं बुरा प्रभाव डालता है।
वजन घटाने के लिए होम्योपैथी में कई प्रभावी उपचार उपलब्ध हैं। वजन घटाने से पूर्व एक महत्वपूर्ण बात पर विचार अवश्य कर लेना चाहिए कि आप कितने मोटे हैं तथा आपको कितना वजन घटाने की जरूरत है। इसके लिए आपको होम्योपैथिक चिकित्सक से मिलकर वजन कम करने के सबसे अच्छे विकल्प का परामर्श लेना चाहिए साथ ही उपचार शुरू करने से पूर्व आपको यह भी जान लेना चाहिए कि आपको अपने जीवन शैली में क्या-क्या बदलाव लाना है।
कैलोट्रोपिस जाइगैन्टिया Q – 
इस दवा की 5-5 बूंदें आधा कप पानी में मिलाकर प्रतिदिन तीन बार लेने से कुछ ही दिनों में मोटापा कम होने लगता हैं |
फाइटोलक्का बेरी O, 3x –
 यह मोटापा घटाने की अत्यन्त प्रसिद्ध दवा है । इस दवा का नियमित सेवन करने से मोटापा कम होने लगता है । इसके साथ नैट्रम सल्फ 200 भी लेने से अधिक लाभ होता है ।
फ्युकस वेसिक्यूलॉसस Q – डॉ० यदुवीर सिन्हा कहते हैं कि यह दवा मोटापा घटाने की सर्वोत्तम औषधि है क्योंकि इसमें आयोडीन प्रचुर मात्रा में होता है । इसका सेवन लम्बे समय तक करना चाहिये ।
ग्रेफाइटिस 200 –
 ऐसे व्यक्ति जिनका मोटापा बेढंगा है जैसे- पेट, कूल्हे आदि पर चर्वी एकत्र होकर बेडौल मोटापा बढ़ता हो तो व्यक्ति को यह दवा अवश्य देनी चाहिये । अगर रोगी गोरे रंग का है तो यह दवा अधिक लाभप्रद सिद्ध होगी ।
पीडोफाइलम 30 – 
यदि मोटापे के कारण केवल पेट बढ़ रहा हो तो यह दवा देनी चाहिये । साथ ही, नैट्रम सल्फ 12x देना भी उपयोगी है ।
एसकुलेन्टाइन Q – 
यह दवा निरापद रूप से अतिशीघ्र चर्वी को घटाकर शरीर को सुडौल बनाती है। यह कलेजे को मजबूत बनाती है और सर्वांगीण स्वास्थ्य को सुधारती है । मोटे व्यक्तियों के वातज रोगों और ददों को दूर करने की इसमें अमोघ शक्ति है ।
सोपिया 200 – 
यदि कोई स्पष्ट कारण न हो और स्त्रियों का पेट अनावश्यक रूप से बढ़ रहा हो तो इस दवा की एक मात्रा प्रति सप्ताह देने से पेट नहीं बढ़ता है और अपनी स्वाभाविक अवस्था में रहता है ।
क्रोकस सैटाइवा 30 – यदि प्रसव के बाद स्त्रियों का पेट लटक जाये या बड़ा हो जाये तो यह दवा प्रतिदिन तीन बार देने से कुछ ही दिनों में लाभ होता है ।
सल्फर 30 – 
बच्चों का पेट विना स्पष्ट कारण के बढ़ने पर उन्हें यह दवा देनी चाहिये ।
कल्केरिया कार्ब 200 – 


डॉ० सत्यव्रत सिद्धान्तालंकार ने कहा है कि जिन व्यक्तियों की शारीरिक बनावट इस दवा के लक्षणों से मिलती-जुलती है उन्हें यह दवा देने से उनकी शारीरिक बनावट बदल जाती है और उनका मोटापा कम होने लगता है ।घरेलु नुस्खे
*मूली के रस में थोडा नमक और निम्बू का रस मिलाकर रोजाना पी लेने से मोटापा कम हो जाता है और body सुडौल हो जाता है।
*गेहूं, चावल,बाजरा और साबुत मूंग को समान मात्रा में लेकर सेककर इसका दलिया बना लिजिएं। इस दलिये में अजवायन 20 grams तथा सफ़ेद तिल 50 grams भी मिला दें। 50 grams दलिये को 400 मि.ली.जल में पकाएं। स्वादानुसार सब्जियां और हल्का नमक मिला लिजिएं। रोजाना एक महीनें तक इस दलिये के सेवन से मोटापा और मधुमेह में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
*अश्वगंधा के एक पत्ते को हाथ से मसलकर गोली बनाकर Daily सुबह-दोपहर-शाम को भोजन से एक घंटा पहले या खाली पेट जल के साथ निगल लिजिएं। एक सप्ताह के daily सेवन के साथ फल,सब्जियों,दूध,छाछ और जूस पर रहते हुए कई किलो weight कम हो सकता है।
* एरण्ड की जड़ का काढ़ा बनाकर उसको छाले और 1-1 spoon की मात्रा में शहद के साथ दिन में तीन time नियमित लेने करने से मोटापा दूर होता है।
* चित्रक कि जड़ का चूर्ण (Powder) 1 gram की मात्रा में शहद के साथ सुबह-शाम नियमित रूप से सेवन करने और खानपान का परहेज करनें से भी मोटापा दूर हो सकता है। 4.आहार में गेहूं के आटे और मैदा से बने सभी भोजनों का सेवन एक महिने तक बिलकुल बंद रखें। इसमें रोटी भी शामिल है। अपना पेट पहले के 4-6 दिन तक केवल दाल,सब्जियां और मौसमी फल खाकर ही भरें। दालों में आप सिर्फ छिलके वाली मूंग कि दाल, अरहर या मसूर कि दाल ही ले सकतें हैं चनें या उडद कि दाल नहीं। सब्जियों में जो इच्छा करें वही ले सकते हैं। गाजर,मूली,ककड़ी,पालक,पतागोभी,पके टमाटर और हरी मिर्च लेकर सलाद बना लिजिएं। सलाद पर मनचाही मात्रा में कालीमिर्च,सैंधा नमक,जीरा बुरककर और निम्बू निचोड़कर खाएं। बस गेहूं कि बनी रोटी छोडकर दाल,सब्जी,सलाद और एक गिलास छाछ का भोजन करते हुए घूंट घूंट करके पीते हुए पेट भरना चाहिए। इसमें मात्रा अधिक भी हो जाए तो चिंता कि कोई बात नहीं। इस प्रकार 6-7 दिन तक खाते रहें। इसके बाद गेहूं कि बनी रोटी कि जगह चना और जौ के बने आटे कि रोटी खाना शुरू कीजिए। 5 किलो देशी चना और 1 kg जौ को मिलकर साफ़ करके पिसवा लिजिएं। 6-7 दिन तक इस आटे से बनी रोटी आधी मात्रा में और आधी मात्रा में दाल,सब्जी,सलाद और छाछ लेना शुरू कीजिए। एक महीने बाद गेहूं कि रोटी खाना शुरू कर सकते हैं but शुरुआत एक रोटी से करते हुए धीरे धीरे बढाते जाएँ। भादों के महीने में छाछ का प्रयोग नहीं किया जाता है इसलिये इस महीनें में छाछ का प्रयोग नां कीजिए।

     
बेक्ड फूड बिल्कुल नहीं खाए। इसका मतलब यह हुआ कि आप केक, कुकीज, मफिंस, ब्रेड आदि खाने से परहेज करे। यहीं नहीं आप इस दौरान बेक्ड चिप्स ,बेक्ड स्नैक आदि भी खाने से बचे। किसी भी तरह की मिठाई को आप हर्गिज नहीं खाए। अगर आप कुछ मीठा खाना ही चाहते है तो सिर्फ ताजा फल खाए।
तला हुआ भोजन
तले हुए भोजन में कैलोरी और नमक बहुत ज्यादा होता है। इसलिए आप मछली, पॉल्टी फॉर्म प्रोडक्ट या कोई भी वैसा मीट नहीं खाए जो तला हुआ हो। साथ ही फ्रेंच फ्राईज, पोटैटो चिप्स,ब्रेड पकौड़ा,समोसा, फ्राइड वेजिटेबल खाने से भी आप बचे। आप वैसी चीजें खाए जो कम प्रोटीन वाली हो और तली हुई नहीं हो।
हाई कैलोरी वाले ड्रिंक्स
जो भी पेय पदार्थ यानी ड्रिंक्स मीठा होता है उसमें कैलोरी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। आपको इनसे बचना होगा। साथ ही आप पानी की भरपूर मात्रा ले। एल्कोहल (शराब, बीयर और कॉकटेल), स्पोर्ट्स ड्रिंक, मीठी चाय ,फ्लेवर्ड कॉफी, सोडा, फ्लेवर्ड पानी ,विटामिन पानी आदि से आप तौबा कर लें। अगर आपको फ्लेवर्ड पानी पीने की इच्छा हो तो आप उसे घर पर बनाकर पीए।
अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों को बढ़ाएं
इन सात दिनों तक आपको मेहनत करने के लिए कमर कस लेनी चाहिए। आपको टोटल वेट लॉस वर्कआउट प्रोग्राम पर जमकर काम करने की जरूरत है। इसलिए आपको सात दिनों तक रोजमर्रा की अपनी शारीरिक गतिविधियों को तेज करना होगा यानी बढ़ाना होगा। आपको फैट गलाने वाली कसरत यानी वर्कआउट को करना चाहिए ताकी आपका वजन कम हो सके। अगर आपको अपना वजन कम करना है तो आपको रोजाना फैट बर्निंग वर्कआउट करना चाहिए। इसमें कसरत के अलावा ,पैदल चलना, जॉगिंग आदि शामिल होते है।
10 हजार कदमों की चहलकदमी
अगर आप किसी वजह से वर्कआउट नहीं कर पा रहे तो आपको कम-से-कम रोजाना 10 हजार कदम चलना चाहिए। इसलिए आपको रोजाना 10 हजार कदमों की चहलकदमी करनी होगी। अगर आप रोजाना पंद्रह या बीस हजार कदम चलते है तो फिर आपको एक्टिविटी मॉनिटर या फिर एप्प डाउनलोड कर अपने कदमों को रोजाना आकलन करना होगा।
इस तरह से आप इन उपायों को करके फैट बर्न कर अपने वजन में कमी ला सकते है और मोटापा घटा सकते है। लेकिन एक बात ध्यान रहे कि आपको इस रूटीन को हमेशा के लिए अपनाना होगा। अपनी जीवनचर्या को उस मुताबिक ढालना होगा जिससे फैट आगे नहीं बने और जो शरीर में जो मौजूदा फैट है वो बर्न हो जाए।

2017-06-14

सायटिका रोग का होम्योपैथिक इलाज




    आमतौर पर यह समस्या 50 वर्ष की उम्र के बाद ही देखी जाती है। व्यक्ति के शरीर में जहां-जहां भी हड्डियों का जोड़ होता है, वहां एक चिकनी सतह होती है जो हड्डियों को जोड़े रखती है। जब यह चिकनी सतह घिसने लगती है तब हड्डियों पर इसका बुरा असर होता है जो असहनीय दर्द का कारण बनता है।
सायटिका की समस्या मुख्य रूप से रीढ़ की हड्डी व कमर की नसों से जुड़ी हुई है जिसका सीधा संबंध पैर से होता है। इसीलिए सायटिका में पैरों में तीव्र दर्द उठने लगता है।
   सायटिका को वैद्यकीय भाषा में गृध्रसी एवं बोलचाल की भाषा में अर्कुलनिसा कहते हैं। सायटिका आजकल एक सामान्य समस्या बन गई है और इस रोग की सम्भावना 40 से 50 वर्ष की उम्र में ज्यादा होती है। इसका दर्द बहुत ही परेशान करने वाला होता है और दैनिक जीवन को काफी कष्टदायी बना देता है।
सायटिका क्या है ?
नितम्ब से लेकर जांघ के पिछले भाग से होकर पैर की एड़ी तक जाती है। यह नर्व कूल्हे से पैर तक के दर्द का एहसास स्पाइनल कार्ड के माध्यम से मस्तिष्क तक पहुंचाती है।
क्या हैं सायटिका रोग के कारण
सायटिका रोग के अनेक कारण है-
गठिया
वायु
उपदंश
चोट लगना
सियाटिक नर्व पर लगातार दबाव पड़ना
अस्थि मज्जा के कुछ रोग हो जाना
स्लिप डिस्क हो जाना
अधिक देर तक बैठना
अर्बुद लेम्बासेक्रल फाइब्रोसाइटिस आदि के कारण होता है।
क्या हैं सायटिका रोग के लक्षण
सायटिका रोग में नितम्बों से लेकर घुटनों के पिछले हिस्से तक और कभी-कभी एड़ी तक दर्द की एक लकीर जैसी खींची हुई मालूम पड़ती है और यह दर्द कभी-कभी हल्का एवं कभी-कभी असहनीय हो जाता है। कुछ देर बैठे रहने के बाद फिर उठने एवं चलने-फिरने पर बहुत ही तकलीफदेय एवं सुई चुभने जैसा दर्द होता है। इसी के साथ पैर में कभी-कभी झंझनाहट भी महसूस होती है। इस दर्द के कारण रोगी को बेचैनी महसूस होती है और रात 
में उसकी नींद भी खुल जाती है।
 
नसों पर दबाव का मुख्य कारण प्रौढ़ावस्था में हड्डियों तथा चिकनी सतह का घिस जाना होता है। मुख्य रूप से इस परेशानी का सीधा संबंध उम्र के साथ जुड़ा है। अधिक मेहनत करने वाले या भारी वजन उठाने वाले व्यक्तियों में यह परेशानी अधिकतर देखी जाती है क्योंकि ऐसा करने से चिकनी सतह में स्थित पदार्थ पीछे की तरफ खिसकता है। ऐसा बार-बार होने से अंतत: उस हिस्से में सूखापन आ जाता है और वह हिस्सा घिस जाता है। क्या होता है?
   सायटिका में पैरों में झनझनाहट होती है तथा खाल चढ़ने लगती है। पैर के अंगूठे व अंगुलियां सुन्न हो जाती हैं। कभी-कभी कुछ पलों के लिए पैर बिल्कुल निर्जीव से लगने लगते हैं। इस समस्या के लगातार बढ़ते रहने पर यह आंतरिक नसों पर भी बुरा असर डालना प्रारंभ कर देती है।

 सायटिका का होम्योपैथिक उपचार-
एलोपैथी में जहां सायटिका दर्द का उपचार केवल दर्द निवारक दवाइयां एवं ट्रेक्शन है वहीं पर होम्यापैथी में रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर दवाईयों का चयन किया जाता है जिससे इस समस्या का स्थाई समाधान हो जाता है। सायटिका रोग के उपचार में प्रयुक्त होने वाली औषधियां इस प्रकार हैं।
कोलोसिन्थ
रोगी के चिड़चिड़े स्वभाव के कारण क्रोध आ जाता हो, गृध्रसी बायी ओर का पेशियों में खिंचाव व चिरने-फाड़ने जैसा दर्द विशेषकर दबाने या गर्मी पहुंचाने से राहत मालूम हो।
नेफाइलियम
पुरानी गृध्रसी वात आराम करने से पैरों की पिंडलियों मं ऐंठन होने की अनुभूति के साथ सुन्नपन व दर्द अंगों को ऊपर की ओर खींचने एवं जांघ को उदर तक मोड़ने से राहत हो।
रसटॉक्स
ठंड व सर्द मैसम में रोग बढ़ने की प्रवृत्ति, अत्यधिक बेचैनी के साथ निरन्तर स्थिति बदलते रहने का स्वभाव, गृध्रसी वात का जो दर्द चलने-फिरने से आराम होता है एवं आराम करने से ज्यादा, साथ ही सन्धियों एवं कमर में सूजन के साथ दर्द होता हो।
ब्रायोनिया
अत्यधिक चिड़चिड़ापन, बार-बार गुस्सा आने की प्रवृत्ति, पुराने गृध्रसी वात, दोनों पैर में सूई की चुभन तथा चीड़फाड़ किए जाने जैसा दर्द हो जो चलने फिरने से बढ़ता हो एवं आराम करने से घटता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, लाल व गर्म हो, जिसमें टीस मारने जैसा जलन युक्त दर्द हो।
गुएकम
सभी तरह के वात जैसे गठिया व आमवाती दर्द जो खिंचाव के साथ फाड़ती हुई महसूस हो, टखनों मे दर्द जो ऊपर की ओर पूरे पैरों में फैल जाया करता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, दर्दनाक व दबाव के प्रति असहनीय, गर्मी बर्दास्त न हो।
लाइकोपोडियम
सायटिका जो विशेषकर दायें पैर में हो, दर्द कमर से लेकर नीचे पैर तक हो एवं पैरों में सुन्नपन व खिंचाव के साथ दर्द महसूस हो, साथ ही साथ रोगी को बहुत पुरानी वात व गैस हो व भूख की कमी महसूस हो।
आर्निका माॅन्ट
बहुत पुरानी चोट जिनके वजह से रोग प्रार्दुभाव स्थान में लाल सूजन व कुचलने जैसा दर्द हो साथ ही रोग ठंड व बरसात से बढ़े, आराम व गर्माहट से घटे।
कॉसटिकम
दाहिने पैर में रोग की शुरुआत, रोग वाली जगह का सुन्न व कड़ा होना, ऐसा मालूम होता हो कि जैसे वहां की मांसपेशियां एक साथ बंधी हुई हो साथ ही नोच-फेंकने जैसा दर्द होता रहे।
ट्यूबरकुलिनम
जिन रोगियों के वंश में टी.बी. का इतिहास हो, साथ ही उनको सायटिका दर्द भी पुराना हो। इसके अतिरिक्त बेलाडोना, जिंकमेट, लीडमपाल, फेरमफॅास, आर्सेनिक एल्बम, कैमोमिला, कैल्मिया, अमोनियम मेयोर, कॉली बाइक्रोम, नेट्रसल्फ आदि औषधियों का प्रयोग रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है।
सावधानियां
सायटिका रोग के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां व्याप्त हैं। कुछ तथाकथित चिकित्सक चीरा लगाकर गन्दा खून निकालकर सायटिका के इलाज का दावा करते हैं जो कि गलत है क्योंकि इस रोग का खून के गन्द होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के इलाज से आपकी समस्या बढ़ सकती है। सायटिका रोगी को निम्न सावधानियां अपनानी चाहिए।
रोगी को बिस्तर पर आराम करना चाहिए।
रोगी को नियमित रूप से व्यायाम एवं टहलना चाहिए।
रोगी को हल्का भेजन लेना चाहिए।
अस्वास्थ्यप्रद वातावरण एव सीलनभरे गन्दे मकान में नहीं रहना चाहिए।

विशिष्ट परामर्श-
साईटिका रोग मे वैध्य श्री दामोदर 98267-95656 निर्मित हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल साबित होती है| जड़ी बूटियों की औषधि से पुराना साईटिका रोग भी समाप्त हो जाता है स्नायुशूल,संधिवात,कमर दर्द घुटनो की पीड़ा मे भी यह रामबाण औषधि है| गठियावात के बिस्तर पकड़े रोगी भी दर्द-मुक्त गतिशीलता प्राप्त करते हैं|

शीघ्रपतन का होमियोपैथिक इलाज



होमियोपैथिक  एक लक्षण चिकित्सा-पद्धति है । इस पद्धति में रोग के नाम के अनुसार नहीं, अपितु रोगों के लक्षण के आधार पर चिकित्सा की जाती है । शीघ्रपतन के लक्षणों में निम्नलिखित होम्योपैथिक औषधियाँ लाभकारी होती हैं –
लाइकोपोडियम –
 ये ध्वजभंग की मुख्य औषध है । जननेन्द्रिय की कमजोरी, जिन युवकों ने अधिक गुप्त-पाप (व्यभिचार) किये हो तथा उनकी जननेद्रिय क्लान्त हो गयी हो, अत्यधिक मैथुन तथा अप्राकृतिक मैथुन के कारण लिंगेन्द्रिय में उत्तेजना या कड़ापन न आना अथवा थोड़ी देर के लिए आना, शीघ्रपतन आदि लक्षणों में उपयोगी है । विशेषकर वृद्धों के लिए बहुत लाभकारी है ।
ग्रैफाइटिस –
 प्रचण्ड कामोत्तेजना, रात्रिकालीन स्वप्नदोष, लिंगोतेजना इतनी कड़ी होना कि लिंग-प्रवेश के तुरन्त बाद ही वीर्य-स्खलन हो जाए अथवा संगमेच्छा का अभाव एवं लिंग में कड़ापन न आना । कमजोर लिंगोद्रेक के साथ स्वप्नदोष, गुप्त-दुराचार (हस्तमैथुन) आदि तथा अतिरिक्त काम-तृप्ति के कारण ध्वजभंग, लिंगमुण्ड पर कटे घाव तथा खाल उधड़ जाना, लिंग की शोथ (सूजन) तथा पुराने सुजाक के लसदार-चिपचिपे स्राव आदि लक्षणों में।
फास्फोरस 6, 30 –
 प्रचण्ड कामेच्छा, बार-बार, लिंगोद्रेक होना, दिन-रात लिंग में दर्द होना, बिना अश्लील स्वप्न देखे ही रात में स्वप्नदोष हो जाना, नमक के अत्यधिक व्यवहार के कारण इन्द्रिय दौर्बल्य, अत्यधिक उत्तेजना तथा गुप्त व्यभिचार के बाद ध्वजभंग, दिन-रात बारम्बार पतले, लसदार वर्णहीन तरल पदार्थ का मूत्र-मार्ग से स्राव, मेरुदण्ड के रोग के साथ अत्यधिक कामोत्तेजना, मैथुन के समय वीर्य का शीघ्र स्खलित हो जाना आदि लक्षणों में ।
सेलिनियम 30 – 
लिंगेन्द्रिय की असीम दुर्बलता, प्रबल कामेच्छा होने पर भी लिंग में कड़ापन न आना अथवा लैंगिक-क्रिया का असन्तोषपूर्ण अथवा सम्पूर्ण न होना, बार-बार वीर्य-स्राव, बिना कामेच्छा के ही प्रात:काल लिंगोतेजना, परन्तु सहवास की चेष्टा करने पर लिंगेन्द्रिय का शिथिल हो जाना, जननेन्द्रिय में खुजली तथा सुरसुरी, नींद में चलते समय, पाखाने के समय अथवा अनजाने में लिंग से गोंद जैसा लसदार पदार्थ निकलना आदि लक्षणों में ।
सीपिया – 
पुरुषों का इन्जेक्शन के कारण रुके हुए पुराने प्रमेह का, मूत्र-नली से अत्यधिक पीला अथवा दूध जैसा स्राव अथवा अन्तिम बूंद दर्द रहित होना, मूत्रेन्द्रिय से रात के समय स्राव तथा प्रात:काल मूत्र-नली का मुख आपस में सट जाना, बहुत दिनों तक बीमारी बने रहना अथवा बारम्बार वीर्यस्राव के कारण कामेद्रिय का दुर्बल हो जाना । कामेच्छा का घट जाना अथवा कामेच्छा के प्रति अरुचि आदि लक्षणों में ।
फास्फोरिक एसिड – 
युवको की अत्यधिक कामलिप्सा तथा गुप्त-पाप (हस्तमैथुन, व्यभिचार आदि) के कारण कमजोरी, ध्वजभंग के साथ अचैतन्यता जैसी अवस्था, मानसिक अवसन्नता, शारीरिक रूप से स्वस्थ्य होने पर भी मानसिक क्षीणता, सम्पूर्ण शरीर में अत्यधिक क्लान्ति, इन्द्रिय-शैथिल्य, लिंगोद्रेक न होना, संगम से अनिच्छा, काम-वासना का नाश, आलिंगन काल में ही लिंगेन्द्रिय का शिथिल हो जाना तथा सम्पूर्ण क्रिया न कर पाना आदि लक्षणों में यह औषधि हितकर सिद्ध होती हैं ।
सल्फर –
 जननेन्द्रिय पर उदभेद, खुजली, जननेन्द्रिय के पास बहुत पसीना होना, जननेन्द्रिय की ठण्डक, पुरुषों में ध्वजभंग, कामेच्छा के समय जबरदस्त खाँसी उठना, लिंग में भरपूर कड़ापन न आना व योनि प्रवेश के पूर्व ही अथवा प्रवेश करते ही बहुत जल्दी वीर्य स्खलित हो जाना, जननेन्द्रिय से बहुत दुर्गन्ध आना आदि लक्षणों में 
जिंकम मेटालिकम – बहुत अधिक काम के कारण रोगी का क्लान्त तथा उत्तेजनाशील होना तथा इसी कारण शीघ्रपतन के कारण होने पर इस औषध का सेवन करें ।
 
बर्बेरिस –
 गठिया प्रकृति वाली स्त्री के लिए यह औषध सर्वोत्तम है, जिसे सहवास-काल में वेदना होती है और पुरुष-संग की इच्छा नहीं होती । कामोत्तेजना या तो देर से होती है अथवा होती ही नहीं, इससे उसे अवसन्नता भी आ जाती है । स्त्री की मूत्र-नली में जलन, योनि-पथ में जलन का दर्द आदि लक्षणों में।
कैलेडियम – 
स्त्रियों की जननेन्द्रिय में खुजली, जिसके साथ अस्वाभाविक उत्तेजना भी जाती रहती है । पुरुषों में, शिथिल लिंग के साथ भयानक कामेच्छा, प्रात:काल अर्द्ध-निद्रित अवस्था में लिंगोतेजना, जो जगते ही चली जाती हो, कामवासना के खूब जाग्रत होने पर भी शक्ति का न रहना, बिना इच्छा के स्वतः ही लिंगोतेजना, कड़ापन व नपुन्सकता तथा शीघ्रपतन के लक्षणों में।
कार्बोबेजिटेबिलस –
 पुरुष तथा स्त्री दोनों की जननेन्द्रिय में कमजोरी तथा शिथिलता, पुरुष-लिंग का झूल पड़ना, स्त्री-योनि की शिथिलता, ठण्डी तथा पसीने से भरी स्त्री-जननेन्द्रिय, जिससे अपने आप तरल रस रिसता रहता हो । यह औषध स्त्रियों के लिए अधिक उपयोगी है ।
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम – 
मूत्रनली से पुराने सूजाक जैसा स्राव, मूत्राशय के कष्ट, मूत्रनली में वेदना, सम्पूर्ण ध्वजभंग, लिंगमुण्ड का प्रदाह, अण्डकोष में दर्द, जननेन्द्रिय में खुजली, जननेन्द्रिय की शिथिलता, सहवास के समय अतिशीघ्र स्खलित हो जाना, रात में स्वप्नदोष, कामेन्द्रियों का सिकुड़ जाना, कामेच्छा का अभाव आदि लक्षणों में इस औषधि का सेवन करें ।
कोनियम मेकुलेटम 3 – 
पुरुषों की रमणशक्ति का दुर्बल पड़ जाना, ध्वजभंग, प्रचण्ड कामेच्छा रहने पर भी लिंग का उत्तेजित न होना, रात्रि में बिना स्वप्न के ही वीर्यम्राव, अत्यधिक रमणइच्छा होने पर भी सम्पूर्ण अथवा आंशिक, ध्वजभंग, दर्द भरा वीर्यस्राव तथा भारी वेदनापूर्ण लिंगोद्रेक, लिंगोद्रेक होने पर छुरी से काटने जैसा दर्द, विधुर तथा स्त्री प्रसंग के अनभ्यस्त पुरुषों की दबी हुई कामेच्छा का दुष्परिणाम, लिंग में के बाद दुर्बलता, शीघ्रपतन के लक्षण में दें ।
ऐग्नस कैक्टस Q –
 लिंग में कमजोरी, परन्तु कामेच्छा का अधिक होना, मल-त्याग के समय जोर लगाने से अथवा नींद में वीर्य स्खलन, एकदम मानसिक अवसन्नता, कमजोर तथा अनमनेपन का भाव आदि लक्षणों में इसके मूल अर्क को 5 से 10 बूंद तक की मात्रा में सेवन करें ।
नूफर लूटिया –
 कामूक वार्तालाप एवं सामान्य उत्तेजना से ही वीर्य स्खलित हो जाना तथा स्वप्नदोष के साथ कमजोरी आने के लक्षणों में ।
कैल्केरिया कार्ब 6 –
 अत्यधिक मैथुनेच्छा – परन्तु लिंग में कड़ापन आने से पूर्व ही वीर्य का शीघ्र स्खलित हो जाना, सम्पूर्ण शरीर में दर्द तथा कमजोरी के लक्षणों में।
प्लैटिना 6 – 
 
युवावस्था के आरम्भ में ही अत्यधिक शुक्रक्षय तथा हस्तमैथुन के दुष्परिणाम स्वरूप कामेच्छा न होने पर भी लिंग में कड़ापन होना तथा वीर्य का शीघ्र स्खलित हो जाना आदि लक्षणों में इस औषधि का सेवन करें ।
नक्सवोमिका 3x, 30 – 
थोड़े ही कारण से कामोत्तेजना । प्रातः नींद खुलने पर अस्वाभाविक लिंगोद्रेक, अश्लील स्वप्न देखने के बाद स्वप्नदोष, कमजोरी, बेचैनी, मेरुदण्ड में जलन आदि लक्षण प्रतीत होने पर दें ।
थूजा Q –
 अत्यधिक शुक्र-क्षरण की यह उत्तम औषधि है । विशेषकर सूजाक के कारण उत्पन्न हुए उपसर्गों में लाभप्रद है । मात्रा 4 बूद ।
बैल्लिस पेरेनिस Q –
 धातु-दौर्बल्य की यह उत्तम औषध है । हस्तमैथुन के कारण उत्पन्न हुए इस रोग में यह औषध विशेष लाभ करती है । मात्रा-5 बूंद, दिन में दो बार नित्य सेवन करें ।
उक्त औषधियो के अतिरिक्त लक्षणानुसार निम्नलिखित औषधियाँ भी उपयोगी सिद्ध होती हैं –
बैराइटा-कार्ब, पिक्रिक-
एसिड, स्टैफिसेग्रिया, डिजिटेलिस, आर्निका, कैनाबिस-सैट, एसिड फास्फोरिक, चायना, कैन्थरिस, पल्स, इग्नेशिया, आर्जेण्ट-मेट, सिलिका, व्यूफो, कैल्के-फॉस, लैकेसिस, नेटूम, साइना आदि ।
आरम मेटालिकम 3x, 200 – 
शरीर में भयंकर कामोत्तेजना का भाव, चंचलता, परन्तु फिर शीघ्र ही एक निश्चिलता की स्थिति लिंगेन्द्रिय की अत्यधिक शिथिलता, मैथुन करते ही लिंग का ढीला पड़ जाना, हस्तमैथुन के परिणाम आदि लक्षणों में । यह औषध स्त्रियों के लिए बहुत उपयोगी है ।
प्लाटिनम –
 अत्यधिक उत्तेजना, जिसके कारण हस्तमैथुन आदि करने पड़ें, कामोत्तेजना के कारण उत्पन्न अपस्मार, असह्य कामोत्तेजना तथा जननेन्द्रिय में लगातार सुरसुरी, अत्यधिक कामोत्तेजना के कारण शीघ्रपतन के लक्षण में।
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पेचिश (डिसेंटरी) का होम्योपैथिक ,घरेलू इलाज



  एक बार शरीर में पहुंच जाने के बाद शिजैला डिसेन्ट्री वहां हाइड्रोक्लोरिक एसिड के प्रभाव से बचा रहता है, छोटी आंत को पार कर अंत में बड़ी आंत में पहुंचकर बस जाता है। कोलन (बड़ी आंत) के नाजुक, उपसंरिक स्तर से चिपके रहकर यह बैक्टीरिया विभाजन और पुनः विभाजन द्वारा अपनी वंशवृद्धि कर देता है और शीघ्र ही इसकी संख्या में बहुत अधिक वृद्धि हो जाती है।
  शिजैला डिसेन्ट्री बड़ी आंत में अनेक विषैले रसायन उत्पन्न करता है। इन विषैले रसायनों में से एक बहुत अधिक सूजन उत्पन्न करता है और अन्ततः आंत की पूरी लंबाई में असंख्य घाव उत्पन्न कर देता है। अांत की दीवार की रक्तवाहिकाएं क्षतिग्रस्त हो जाती हैं और उनमें से रक्त निकलने लगता है। शिजैला डिसेन्ट्री द्वारा अन्य विषैला पदार्थ सामान्य आंत कोशिकाओं से चिपक जाता है और उन्हें बहुत अधिक मात्रा में पानी और नमक निष्कर्षित करने के लिए मजबूर कर देता है। इन सब क्रियाओं के फलस्वरूप बैसिलरी पेचिश के विशिष्ट लक्षण, पेट में भयंकर जकड़ने वाली पीड़ा तथा खूनी पतले दस्त होने लगते हैं। शरीर से तरल पदार्थ, नमक और रक्त बाहर निकल जाते हैं। परिणामस्वरूप रोगी का रक्तचाप अत्यधिक कम हो सकता है उसे आघात पहुंचता है और उसके गुर्दे काम करना बंद कर सकते हैं। ऐसा भी हो सकता है कि इस पेचिश से पीड़ित होने पर बड़ी आंत के आवरण फट जाएं और उसके सब पदार्थ उदर-गुहा में आ जाएं। यह स्थिति बहुत खतरनाक होती है।
बचाव
इस महामारी से बचने के लिए निम्न सावधानियां बरतनी चाहिए –
मल का उचित विसर्जन : बीमारी से पीड़ित लोगों के मल को गांव से दूर विसर्जित करना चाहिए। मल को किसी गड्ढे में दबा देना चाहिए। बच्चों को इन स्थानों के नजदीक नहीं आने देना चाहिए। बच्चे इस बीमारी का शिकार बहुत जल्दी हो जाते हैं। शौच के बाद हाथों को अच्छी तरह से साबुन से साफ करें। खाना खाने से पहले भी उन्हें साबुन से धो लें। पके हुए भोजन को जितना जल्दी हो सके, उपयोग कर लेना चाहिए। इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि मक्खियां इसके नजदीक न जाएं। जितना संभव हो, खुले बर्तनों, घड़ों, नांद आदि में पीने का पानी नहीं रखना चाहिए। फल तथा सब्जियों को खाने तथा पकाने से पहले अच्छी तरह धो लें। बेहतर होगा कि बीमारियों के फैलने की स्थिति में बाजार में बने खाद्यों का इस्तेमाल कम-से-कम करें। बीमारी के फैलने की अवस्था में उबले हुए पानी का उपयोग अत्यन्त आवश्यक है। गर्मी और बरसात में पेचिश लगभग हर वर्ष फैलती है।
पेचिस का इलाज
होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति में ‘सिमिलिमस’ के आधार पर अनेक औषधियां इस घातक बीमारी से रोगियों को रोगमुक्त कराने में कारगर हैं।
मरक्यूरियस कोर : पेचिशनुमा पाखाना, शौच करते समय पेट में दर्द, शौच के बाद भी बेचैनी एवं पेट में दर्द बने रहना, पाखाना गर्म, खूनी, श्लेष्मायुक्त, बदबूदार, चिकना, पेशाब में एल्मिवुन (सफेदी)। साथ ही गले में भी दर्द एवं सूजन रहती है, खट्टे पदार्थ खाने पर परेशानी बढ़ जाती है, तो उक्त दवा 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
कोलोसिंथ : मुंह का स्वाद बहुत कड़वा, जीभ खुरदरी, अत्यधिक भूख, पेट में भयंकर दर्द जिसकी वजह से मरीज दोहरा हो जाता है एवं पेट पर दबाव डालता है, अांतों में दवा उपयोगी रहती है। 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
एस्क्लेरियॉस ट्यूर्बोसा : पेट में भारीपन, खाने के बाद गैस बनना, केटेरहल (श्लेष्मायुक्त) पेचिश, साथ ही मांसपेशियों एवं जोड़ों में दर्द, पाखाने में से सड़े अंडे जैसी बदबू आती है। इन लक्षणों के आधार पर दवा का मूल अर्क 5-5 बूंद सुबह-दोपहर-शाम लेना फायदेमंद रहता है।
एलो : 
पेय पदार्थों की इच्छा, खाने के बाद गैस बनना, मलाशय में दर्द, गुदा से खून आना, बवासीर रहना, ठंडे पानी से धोने पर आराम मिलना, पाखाने एवं गैस के खारिज होने में अंतर न कर पाना, पाखाने के साथ अत्यधिक श्लेष्मायुक्त (म्यूकस), गुदा में जलन रहना, खाना खाने-पीने पर फौरन पाखाने की हाजत होना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति में दवा की कुछ खुराक लेनी चाहिए। इसके अलावा अनेक दवाएं लक्षणों की समानता पर दी जा सकती हैं।
कॉल्विकम : 
गैस की वजस से पेट फूल जाना, पेट में आवाजें होना, मुंह सूखा हुआ, जीभ, दांत, मसूड़ों में भी दर्द, खाने की महक से ही उल्टी हो जाना, पेट में ठंडक महसूस होना, पाखाना कम मात्रा में, पारदर्शी, जेलीनुमा श्लेष्मायुक्त पाखाने में सफेद-सफेद कण अत्यधिक मात्रा में छितरे हुए, कांच निकलना, सोचने पर परेशानी बढ़ना आदि लक्षणों के आधार पर 30 शक्ति में दवा लेना उपयोगी रहता है।
टाम्बिडियम : 
खाना खाने एवं पानी पीने पर परेशानी बढ़ जाना, टट्टी से पहले एवं बाद में अधिक दर्द, पेट के हाचपोकॉट्रियम भाग में दर्द, सुबह उठते ही पतले पाखाने होना, भूरे रंग की खूनी पेचिश दर्द के साथ, गुदा में जलन आदि लक्षण मिलने पर 6 से 30 शक्ति तक दवा लेना हितकर है।
पेचिश आंवयुक्त नई या पुरानी का रामबाण घरेलु इलाज.
पेचिश को आमतिसार और रक्तातिसार के नाम से भी जाना जाता है. इसके रोगी को भूख कम लगती है और दुर्बलता प्रतीत होती है. पेचिश रोग में शुरू शुरू में बार बार थोड़ी थोड़ी मात्रा में दस्त, पेट में ऐंठन की पीड़ा, मल के साथ सफ़ेद चिकना पदार्थ (Mucus) निकलता है, परन्तु धीरे धीरे दस्तों की संख्या बढती जाती है और रक्त भी साथ में आने लग जाता है. दस्त के समय पेट में असहनीय दर्द होता है. पेचिश का मुख्य कारण इलियम के निचले हिस्से व् बड़ी आंत में प्रदाह होता है. पेचिश दो प्रकार की होती है.
दण्डाणुका पेचिश.
अमीबिक पेचिश.
1. दण्डाणुका पेचिश – दण्डाणुका पेचिश में रोगी को बार बार दस्त जाने की इच्छा होती है. दस्त में रक्त का अंश अधिक होता है. कभी कभी ऐसा लगता है मानो केवल रक्त ही रह गया है. दिन में 20 – 30 दस्त तक हो जाते हैं. और कभी कभी ज्वर भी हो जाता है. यह शीघ्र ठीक हो जाती है. इसके लिए होम्योपैथिक की मर्क कोर 30 एक ड्राम गोलियां लेकर दस दस गोली, पांच बार चूसने से शीघ्र ही रोगी ठीक हो जाता है.
2. अमीबिक पेचिश – अमीबिक पेचिश Entamoeba Histolytia नामक कीटाणु से होती है. गंदे खान पान से यह कीटाणु आंतड़ियों में चला जाता है और वहां प्रदाह पैदा करता है. इसमें दस्त लगते हैं. 24 घंटे में 2 – 4 से लेकर 8 – 10 दस्त आ जाते हैं, दस्त मात्रा में बड़ा, ढीला सा, और तुरंत मल त्याग की इच्छा वाला होता है. दस्त में आंव और रक्त दोनों मिश्रित रहते हैं. रक्त मिश्रित दस्त पतला और ढीला हो जाता है. कुछ में रक्तातिसार (Melaena) का ही लक्षण विशेष होता है और कुछ में कब्ज. दस्तों के अलावा भोजन से अरुचि, आफरा, पेट दर्द या बेचैनी सी रहती है. श्रम करने से थकान, चक्कर आते हैं. इस रोग के कारण श्वांस रोग, पामा (Eczema), यकृत में शोथ (Fatty liver), घाव भी हो सकता है. यह जितना पुरानी होती जाती है उतना इसको दवाओं से ठीक करना कठिन रहता है, लेकिन भोजन और घरेलु चिकित्सा से इसको आसानी से ठीक किया जा सकता है.
 
आवश्यक सामग्री.
सौंफ – 300 ग्राम.
मिश्री – 300 ग्राम.
पेचिश की घरेलु दवा बनाने की विधि.
सबसे पहले सौंफ के दो बराबर हिस्से कर ले। एक हिस्सा तवे पर भून ले। भुनी हुई सौंफ और बची हुई सोंफ दोनों को लेकर बारीक़ पीस ले और मिश्री (मिश्री को पहले पीस लीजिये) को मिला लें। इस चूर्ण को छ; ग्राम (दो चम्मच) की मात्रा से दिन में चार बार खाएं। ऊपर से दो घुट पानी पी सकते है। आंवयुक्त पेचिश ( मरोड़ देकर थोड़ा-थोड़ा मल तथा आंव आना ) के लिए रामबाण है। सोंफ खाने से बस्ती-शूल या पीड़ा सहित आंव आना मिटता है।
पेचिश का सहायक उपचार
दही- भात(चावल) मिश्री के साथ खाने से आंव-मरोड़ो के दस्तो में आराम आता है।
1. दाना मेथी
मैथी (शुष्क दाना) का साग बनाकर रोजाना खाएं अथवा मैथी दाना का चूर्ण तीन ग्राम दही मिलाकर सेवन करे। आंव की बीमारी में लाभ के अतिरिक्त इससे मूत्र का अधिक आना भी बंद होता है। मैथी के बीजो को डा.पि. बलम ने काड लिवर ऑयल के समान लाभकारी बताया है।
2. चंदरोई (चोलाई) का साग
चंदलिया (चोलाई) का साग (बिना मिर्च या तेल में पका हुआ) लगभग १५० ग्राम प्रतिदिन ११ दिन तक खाने से पुराने से पुराना आंव का रोग जड़ से दूर होता है। गूदे की पथरी में भी चोलाई का साग लाभकारी है। यह साग राजस्थान और मध्य प्रदेश  में खूब होता है।
3. छोटी हरड़ तथा पीपर का चूर्ण-
हरड़ छोटी दो बाग़ और पीपर छोटी एक भाग दोनों का बारीक़ चूर्ण कर ले। एक से डेढ़ ग्राम चूर्ण गर्म पानी से दोनों समय भोजन के बाद आवश्यकता अनुसार तीन दिन एक सप्ताह तक नियमित ले। इससे आंव और शुलसहित दस्त शांत होते है। यह अमीबिक पेचिश में विशेष लाभप्रद है।