2017-07-26

होम्योपैथिक चिकत्सा के दोष, हानियाँ // Incompleteness of homeopathic medicine



आम तौर पर स्वास्थ्य समस्याओं के लिए होमि‍योपैथि‍क दवाईयों को सबसे सुरक्षि‍त और प्रभावकारी माना जाता है। हालांकि यह बात सही है कि एलोपैथी की तुलना में होमियोपैथी, बगैर केमिकल का एक प्राकृतिक विकल्प हैलेकिन इसके भी कुछ साइड इफेक्ट। यदि आप भी अनजान हैं इनसे तो जरूर जानिए -
*होमियाेपैथि‍क दवाओं का सबसे बड़ा नुकसान यह है, कि किसी आपातकाल स्थि‍ति के समय यह दवाएं आपके किसी काम की नहीं है, क्योंकि यह धीरे-धीरे असर करती हैं। सर्जरी या अन्य स्थि‍यों में, जब मरीज को तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है, तब होमियोपैथी आपकी कोई मदद नहीं कर सकती।
*होमियोपैथ‍िक दवाईयां पोषण संबंधी समस्या या पोषण की कमी होने की स्थि‍ति में बिल्कुल भी प्रभावकारी नहीं होती। उदाहरण के तौर पर एनिमिया या आयरन की कमी और अन्य तत्वों की कमी होने पर होमि‍योपैथी बेअसर साबि‍त होता है। इन कमियों को सिर्फ डाइट या सप्लीमेंट के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है।
*इन दवाईयों का एक साइड इफेक्ट यह भी है कि डॉक्टर द्वारा दीगई दवाईयों का सेवन अगर निश्चित समय सीमा से अधि‍क समय तक किया जाए, तो इसका ओवर डोज लेना आपके लिए हानिकारक भी हो सकता है। इससे पेट में इंफेक्शन और अन्य परेशानियां भी हो सकती हैं।
*होमियोपैथि‍क दवाईयों हर किसी पर उतनी ही प्रभावकारी साबित हो, यह जरूरी नहीं है। लंबे समय तक इसके सेवन से अगर आप लाभ महसूस नहीं करते, तो समस्या के गंभीर होने से पहले ही डॉक्टर की सलाह जरूर लें।
*कई बार होमियोपैथी दवाओं का परामर्श आपके चिकित्सकीय इतिहास और बीमारियों पर भी निर्भर करता है। ऐसा न होने की स्थि‍ति में यह दवाईयों आपको अपेक्षा अनुरूप लाभ नहीं पहुंचा पाएंगी।

2017-07-22

सूर्य किरण चिकित्सा // Sun ray therapy



प्रकाश भी चिकित्सा की एक विधि है। सूर्य किरणों एवं अन्य अनुकूल रश्मियों के माध्यम से किया गया उपचार प्रकाश उपचार कहलाता है। इसे फोटोथेरेपी भी कहा जाता है। जो रोग प्राकृतिक जीवन के अभाव में कृत्रिमता के आँचल में पलते-बढ़ते हैं, ऐसे रोगों को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ कहते हैं। फोटोथेरेपी द्वारा इनकी सफल चिकित्सा की जाती हैं। यह चिकित्सा पद्धति व्यक्ति को सूर्य के प्रकाश अर्थात् प्राकृतिक जीवन शैली अपनाने के लिए बल देती है। यही इसका मुख्य आधार है।
मेसाचुसेट्स के डॉ. एनी जेन के अनुसार जबसे मानव प्राकृतिक जीवन से विमुख होकर भौतिकता के कृत्रिम परिवेश में ढलने लगा है, तभी से उसके शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आयी है। वह विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार होने लगा है क्योंकि आज का आधुनिक जीवन बहुमञ्जिली इमारतों, अल्ट्रा मॉडर्न दफ्तरों तथा वातानुकूलित कारों में सिमट कर रह गया है। आगे वह स्पष्ट करते हैं कि इसमें तथाकथित सामाजिक प्रतिष्ठ तो मिलती है परन्तु जीवन की सहजता समाप्त हो जाती है। व्यक्ति प्रकृति से दूर चला जाता है, उससे कट जाता है। डॉ. जोसेफ ने इस कृत्रिम परिवेश को ‘सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर ‘ नामक रोग का मुख्य कारण माना है। लाइट थेरेपी इस रोग का सफल उपचार है। सूर्य विज्ञान के प्रणेता विशुद्धानन्द ने सूर्य को प्राणदाता कहा है। हमारा जीवन और पृथ्वी इसी के माध्यम से संचालित एवं नियंत्रित हो रहे हैं। सूर्य अपने प्रकाश के माध्यम से मानव शरीर का प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से पोषण करता है। प्रकृति की यह अद्भुत व्यवस्था है, जो किसी अन्य माध्यम से पूर्ण नहीं हो पाती है। सूर्य प्रकाश में प्रकाश की इतनी ही मात्रा होती है जिसे शरीर ग्रहण कर सके। भरी दुपहरी में सूर्य के प्रकाश की तीव्रता 100,000 लक्स होती है। लक्स प्रकाश को मापने की एक इकाई है। जाड़े की दुपहरी में इसकी तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश होती है।

जाड़े की सुबह के अलावा सूर्योदय होते ही हमें 10,000 लक्स प्रकाश मिलने लगता है। इतने ही प्रकाश को ब्राइट लाइट थेरेपी में प्रयोग किया जाता है जिससे तमाम तरह के रोगों को ठीक किया जा सके। अन्वेषणकर्त्ता जान बेस्ट के अनुसार व्यक्ति यदि प्रातःकाल उठकर सूर्य प्रकाश के संपर्क-सान्निध्य में आ सके तो उसे किसी प्रकार की लाइट थेरेपी की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। प्रातःकालीन सूर्य प्रकाश से वह इतनी ऊर्जा ग्रहण कर सकता है जितना कि उसे आवश्यकता है,और इस तरह शरीर की प्राकृतिक रूप से आवश्यकता की पूर्ति होती रहने से वह सदा निरोग एवं स्वस्थ रह सकता है।
एक दफ्तर को अच्छे से प्रकाशित करने के लिए 500 से 1000 लक्स प्रकाश की जरूरत पड़ती है। सामान्यतया घरों में 300 से 500 लक्स प्रकाश होता है। बेडरूम में 100 लक्स प्रकाश का होना ठीक माना जाता है। खिड़कियों के माध्यम से प्रकाश की व्यवस्था की जा सके तो घर के परिवेश को भी प्राकृतिक बनाया जा सकता है। इससे शरीर का जैविक चक्र (बॉडी क्लॉक) एवं मेलेटोनीन हार्मोन का नियंत्रण सामान्य एवं शरीर के अनुकूल बने रहता हैं। कृत्रिम प्रकाश से इसकी अनुकूलता समाप्त हो जाती है और शरीर में रोगों का आक्रमण होने लगता है। इसी कारण रात्रिकालीन ड्यूटी करने वाले धीमी रोशनी में रहने वाले व्यक्तियों में भय, थकान, उदासी, त्वचा सम्बन्धी रोग, अनिद्रा तथा प्रतिरोधी क्षमता में कमी आदि की समस्याएँ पायी जाती हैं। आर्कटिक क्षेत्र में प्रकाश का स्तर 50 लक्स होता है और वहाँ भी इसी तरह की परेशानी देखी गयी है।
होलिस्टिक ऑन लाइन नामक वेबसाइट पर प्रकाशित ‘लाइट थेरेपी’ नामक एक लेख के अनुसार प्राकृतिक प्रकाश की उपयोगिता एवं उपादेयता अपने आप में महत्त्वपूर्ण है। कृत्रिम प्रकाश में सारी विशेषताएँ नहीं होती हैं। इस शोध लेख के अनुसार घरों, दफ्तरों या अन्य किसी भी स्थान पर पर्याप्त प्रकाश की व्यवस्था करने में एक कठिनाई आ सकती है। क्योंकि जैसे-जैसे प्रकाश की तीव्रता बढ़ती है उसी अनुपात में अल्ट्रावायलेट किरणों के बढ़ने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। इन किरणों से आँखों में जलन, आँखों की अन्य बीमारी तथा त्वचा कैन्सर जैसे रोग पनपते हैं। अतः लाइट थेरेपी का मुख्य आधार भी सूर्य प्रकाश को माना जाता है। यही मुख्य एवं प्राकृतिक उपचार पद्धति है जो अत्यन्त प्राचीन एवं सफल है। हालाँकि कृत्रिम ब्राइट लाइट थैरेपी एवं अन्य प्रकाश थैरेपी का भी प्रयोग किया जाता है, परन्तु इनमें भी प्रकाश की तीव्रता 10,000 लक्स प्रकाश से आधिक नहीं होती।
सूर्य प्रकाश पर अन्वेषण-अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक एस. फैरो के अनुसार ‘सन लाइट थेरेपी’ (सूर्य प्रकाश उपचार) अत्यन्त प्रभावशाली है। सूर्य रश्मियों की महत्ता को रेखाँकित करते हुए फैरो ने उल्लेख किया है कि इसमें सभी प्रकार की किरणें होती हैं। इसमें इन्फ्रारेड से लेकर अल्ट्रावायलेट किरणें होती हैं तथा आँखों व शरीर के अनुकूल प्रभाव डालती हैं। सूर्य प्रकाश की इस विशेषता को फैरो ने अद्भुत एवं आश्चर्यजनक कहा है। इसी कारण सूर्य प्रकाश को ‘फुल-स्पेक्ट्रम ओरीजनल लाइट’ कहा जाता है।

लाइट थेरेपी में प्रकाश को आँखों के माध्यम से पीनियल ग्लैण्ड्स तक पहुँचाया जाता है, उसे सक्रिय एवं जागृत कराया जाता है। उसी ग्रंथि को थर्ड आई (तीसरा नेत्र) कहा जाता है जिसमें दूर दृष्टि की क्षमता होती है। सिग्रेटो के अनुसार इसे सक्रिय करने के लिए सूर्योदय की सुनहरी किरणों का प्रयोग किया जाता है। डॉ. नेन्सी ने गौघृत के दीपक को भी इसके लिए उपर्युक्त माना है। ये विधियाँ अत्यन्त सफल एवं सुगम हैं। इसके अलावा नाइट लाइट थेरेपी, आप्टिमम् थेरेपी आदि को भी प्रयोग में लाया जाता है।
लाइट थेरेपी से कई प्रकार के रोगों की चिकित्सा की जाती है। यह सेड (सिजनल एफेक्टिव डिसआर्डर) के लिए रामबाण का कार्य करता है। इससे अनिद्रा रोग को भी ठीक होता है। इसके लिए दक्षिण आस्ट्रेलिया में 9 लोगों पर अध्ययन किया गया। इन लोगों को नींद न आने की शिकायत थी। सोने के एक-दो घण्टे के पश्चात् इन्हें नींद नहीं आती थी। इन सभी व्यक्तियों को 2500 लक्स प्रकाश से उपचार किया गया। परिणाम बड़ा ही सुखद रहा। इन्हें अच्छी नींद आने लगी।
स्वस्थ जीवन के लिए 4 से 6 घण्टे की गहरी नींद की आवश्यकता पड़ती है। शराब तथा नींद की गोली लेने वाले व्यक्ति प्रायः ‘डिलेड स्लीप फेस सिण्ड्रोम’ से पीड़ित होते हैं एवं प्रातःकाल में एक-डेढ़ घण्टे ही सो पाते हैं। आमतौर पर यह बीमारी किशोरावस्था में पायी जाती है।
जरथुस्त्र बादशाह गुश्तास्य के दरबार में पहुँचे। उन्हें ईश्वरनिष्ठ जीवन जीने का संदेश दिया। राजा ने कहा, मैं तो सामान्य ज्ञान रखता हूँ, यदि आप हमारे दरबार के विद्वानों का समाधान कर दें, तो मैं आपके निर्देश पूरी तरह मानूँगा।
नेशनल कमीशन ऑफ स्लीप डिसआर्डर रिसर्च इंस्टीट्यूट के अनुसार इस रोग से पीड़ित पुलिस, अग्नि शामक कर्मचारी, ड्राइवर तथा पायलट अक्सर दुर्घटना के शिकार होते हैं और दुर्घटना का समय भी प्रातःकाल होता है। इन रोगियों के लिए ‘सन लाइट थैरेपी’ अत्यन्त कारगर सिद्ध हुई है। ब्राइट लाइट थैरेपी से भी इन्हें आराम मिला है।
प्रो. हैस्लाक के अनुसार युवाओं का बॉडी क्लॉक जल्दी प्रभावित हो जाता है। एक अध्ययन के मुताबिक इस प्रभाव से मुक्ति देने के लिए मेलेटेनीन का डोज दिया गया। इससे ऐसे रुग्ण युवाओं को नींद तो आयी पर उनकी कार्यक्षमता पर कोई असर नहीं पड़ा। ठीक इसी प्रकार का सर्वेक्षण बेटास्कीवीन, अल्वर्टा तथा कनाडा के कुछ मैनेजमेंट एवं प्रोफेशनल कॉलेजों में किया गया। यहाँ के विद्यार्थियों का फुल स्पेक्ट्रम लाइट से उपचार किया गया। इसमें इनका अनिद्रा रोग ठीक नहीं हुआ, बल्कि इनकी कार्य कुशलता तथा शैक्षणिक उपलब्धियों का स्तर भी बढ़ गया।
किशोरवय की लड़कियों में प्रायः खानपान सम्बन्धी गड़बड़ी पैदा हो जाती है। हालाँकि यह कोई गम्भीर समस्या नहीं है परन्तु यथासमय इसको नहीं सुधारा जाय तो बाद में गम्भीर शारीरिक और मानसिक परेशानियाँ खड़ी हो सकती हैं। इसके लिए सूर्य प्रकाश के संपर्क में आने तथा इसके उपचार का सुझाव दिया जाता है। इसमें सफलता भी मिली है।
महिलाओं में लुपस नामक बीमारी होती है। यह एक प्रकार का आटोइम्यून रोग है,जिससे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कमजोर एवं दुर्बल हो जाती है और शरीर में अनेक रोग घर कर जाते हैं। इस रोग का लक्षण है थकान, उतावलापन, जोड़ों में दर्द और किडनी की खराबी। ऐसे रोगियों को सूर्य प्रकाश से परहेज करने का दिशा-निर्देश दिया जाता है। परन्तु आधुनिक शोधकर्त्ताओं ने इसे अस्वीकार कर दिया है। इन्होंने सूर्य प्रकाश से ही VA-1 नामक विशिष्ट अल्ट्रावायलेट किरण को खोज निकाला है, जिससे इस रोग को ठीक करने में अभूतपूर्व सफलता मिली है। महिलाओं की मासिक चक्र सम्बन्धी समस्याओं के लिए लाइट थेरेपी कारगर सिद्ध हुई है।

अमेरिका में प्रति वर्ष 10 से 15 लाख लोग डिप्रेशन में चले जाते हैं। और इनमें से 30,000 लोग आत्म हत्या कर लेते हैं। ऐसे लोगों पर सूर्य प्रकाश चिकित्सा अत्यन्त प्रभावकारी सिद्ध हुई है।
अतः स्वस्थ, सुखी एवं निरोगी जीवन के लिए हमें सूर्य प्रकाश याने प्रकृति की ओर फिर लौटना होगा। जितना जल्दी हो सके हमें अपनी इस कृत्रिम जीवन को त्यागकर प्रकृति के सुरम्य आँचल में पनाह लेने के लिए तत्पर होना चाहिए। इसी में समाधान है, यही समझदारी है।

2017-07-19

बाल सफ़ेद होने से रोकने के होम्योपैथिक घरेलु उपचार / Homeopathic, Home Remedies To Prevent grey Hair


     स्वस्थ सुन्दर काले, लंबे घने केशों की तुलना सावन के मौसम में घटाओं से की गई है। वास्तव में स्वस्थ सुन्दर बाल खुबसूरती को एक विशेष आयाम प्रदान करते हैं। साथ ही हमारे अन्दर आत्मविश्वास भी पैदा होता है और हम जवानी में ही बुढ़ापा महसूस नहीं करने लगते हैं।
   आजकल हम देखते हैं कि प्राय: हर तीसरा व्यक्ति बालों के झड़ने, सफेद होने या गंजापन से पीड़ित है। सिर की ऊपरी त्वचा पर जो बाल होते हैं, उनकी जड़ें अन्दर गहराई तक जाती हैं। हर बाल की जड़ के सिरे पर एक गोल थैली होती है, जिसे ‘हेयर पैपिला’ कहते हैं। प्रत्येक बाल को पोषक तत्त्व यहीं से मिलता है। बालों का बढ़ना, उनका सौन्दर्य, चमक-दमक और स्वास्थ्य शरीर की आंतरिक क्रिया प्रणाली से अनुशासित होते हैं। इसलिए वे आपके सामान्य शारीरिक स्वास्थ्य पर निर्भर करते हैं। इसलिए पौष्टिक भोजन, शुद्ध व ताजा हवा तो इसके लिए जरूरी है ही, बालों की उचित देखभाल भी सुन्दर केशराशि के लिए अत्यन्त आवश्यक है।
बाल सफेद होने के कारण
बालों का झड़ना, सफेद होना, गंजापन के लिए हमारा रहन-सहन एवं खान-पान ही अधिक उत्तरदायी है। कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-
मानसिक तनाव: 
जिन्दगी की भाग-दौड़ एवं चकाचौंध में आज हर व्यक्ति मानसिक तनाव से ग्रस्त है।
प्रसाधन: अपने को अधिक युवा दिखाने के उत्साह में लगभग सभी लोग कृत्रिम प्रसाधनों पर निर्भर हैं। हर व्यक्ति की आकांक्षा होती है कि वह अधिक युवा और खूबसूरत दिखाई दे। हम व्यायाम से अपने शरीर को चुस्त व आकर्षक बनाए रखने की कोशिश करते हैं और क्रीमीफेसियल आदि से चेहरे को संवारते हैं। इसी तरह यदि बाल सफेद हो रहे हों, तो उन्हें रंगने की इच्छा होना भी स्वाभाविक है। फलत:शुरू में जो एक-दो बाल सफेद होते हैं, रंजको के इस्तेमाल से, उनका रंग हटने पर, लगभग सारे बाल सफेद ही दिखाई देने लगते हैं। साथ ही अन्य घातक परिणाम भी सामने आ सकते हैं, जैसे अंधापन।
    इसी प्रकार बालों को नरम, रेशमी और मुलायम बनाने का दावा करने वाले लगभग समस्त शैम्पू और साबुन बालों को सूखा-सूखा और सफेद ही करते हैं। विटामिनों की कमी के कारण भी बाल झड़ने लगते हैं। कुछ अंग्रेजी दवाओं के ‘साइड एफैक्ट्स’ (प्रभाव) स्वरूप बाल झड़ने एवं सफेद होने लगते हैं। रक्ताल्पता (एनीमिया) के कारण भी बाल झड़ने लगते हैं। कुछ बीमारियों (जैसे सेकेण्डरी सिफिलिस) के परिणामस्वरूप भी बाल झड़ने व सफेद होने लगते हैं। हारमोन असंतुलन के कारण भी बाल झड़ने व सफेद होने लगते हैं।
बाल सफेद होने से कैसे रोके
बालों के झड़ने एवं सफेद होने की स्थिति में उपचार के साथ-साथ रोकथाम एवं बचाव के उपाय अपनाना भी आवश्यक है। खान-पान का उचित ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है। विटामिन एवं प्रोटीनयुक्त भोजन पर अधिक ध्यान देना चाहिए, दूध-दही, हरी सब्जियां, अंकुरित अनाज, सलाद आदि खूब खाना चाहिए। कृत्रिम रंजको (डाई) एवं शैम्पू, साबुन् का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। बाल काले करने की वस्तु में मिले हुए अनेक पदार्थों से कोई भी एलर्जी एवं जलन पैदा कर सकता है।
बाल धोने के लिए रात में आंवला, रीठा और शिकाकाई भिगो दें। सुबह कड़ाही में इस मिश्रण को उबाल लें। ठंडा होने के बाद इसे कपड़े में छान लें। फिर बाल धोएं । इससे बालों व प्राकृतिक चमक बनी रहती है। इससे न तो बाल रूखे होते हैं और न ही बालों के झड़ने का भय रहता है। बालों को रंगने के लिए शुद्ध काली मेहंदी में थोड़ी-सी कॉफी और अंडे का पीला जर्दा मिलाकर लगाएं लगभग एक घण्टा लगा रहने दें। तब ऊपर बताए मिश्रण से बाल धो लें। बालों की छटा निराली बनी रहेगी। बालों की देखभाल के अंतर्गत सिर्फ उनका सफाई ही नहीं, बल्कि मालिश भी शामिल है।
मालिश करते समय हथेलियों के बजाय सिर्फ उंगलियों को ही प्रयोग में लाना चाहिए। उंगलियों की गति और लय भी इस प्रकार होनी चाहिए कि सिर की कम्पन अन्दर तक महसूस हो और मालिश करने के बाद आप हलकापन और आराम महसूस करें।
 
आजकल मशीनों से भी मालिश की जाती है। ये ‘मशीन मसाजक’ (मर्दक) हाथों की अपेक्षा सिर में अधिक कंपन पैदा करते हैं, जिससे नाड़ियों का तनाव खत्म होता है। साथ ही सिर की पेशियां, तंतु व ग्रंथियों में रक्तसंचार अधिक उत्तेजित होकर बालों को शीघ्र लाभ पहुंचाते हैं।
मालिश करने के लिए नारियल, सरसों, जैतून या बादाम के तेल का प्रयोग करना चाहिए। महंगे तेल ही बालों को अधिक लाभ पहुंचाते हों, यह सही नहीं है। बस, मालिश का तरीका सही होना चाहिए, फिर तेल चाहे सरसों का ही क्यों न हो।
बाल सफ़ेद का होमियोपैथिक उपचार
सिर पर फोड़ा बन जाना, चलने पर चक्कर आना, बाल अत्यधिक तेजी से बढ़ते हैं एवं गिर जाते हैं और पुनः उगने लगते हैं। दुबारा उगे बाल पहले की अपेक्षा अधिक काले होते हैं, किन्तु रूखे, कठोर एवं मुंह फटे हुए होते हैं। यह सिलसिला चलता रहता है। सिर में अधिक खुजली होती है। साथ ही गठिया एवं जोड़ों की सूजन भी रहने लगती है। ‘विसबेडन’ 200 शक्ति में एक हफ्ते में एक दिन (एक बूंद सुबह, एक बूंद शाम) प्रयोग करनी चाहिए।
‘हाइड्रेस्टिस’, ‘आर्निका’, ‘केंथेरिस’ सभी दवाओं के मदर टिंचर और ‘हिपरसल्फ’ दवा 200 शक्ति में, एक-एक ड्राम मात्रा में लेकर, 200 ग्राम नारियल के तेल में मिला लें और बालों की जड़ों में उंगलियों से लगाएं।
साथ ही ‘एब्रोटेनस’ 30 शक्ति में, ‘लाइकोपोडियम’ 30 शक्ति में, रोसामेराइनस 30 शक्ति में एवं ‘सियोनेथस’ 30 शक्ति में खरीद लें और सभी दवाएं एक-एक घण्टे के अन्तर पर दिन में दो बार, 4-4 गोलियां खाएं (‘लाइकोपोडियम’ कुछ दिन बाद बंद कर दें)। जब तक फायदा न हो, दवा खाते व लगाते रहें। बालों का झड़ना एवं गंजापन दूर हो जाएगा।

जेबोरेंडी’, ‘आर्निका’, ‘सियोनेथस’ एवं ‘एब्रटेनम’ दवाओं के मदर टिंचर एक-एक ड्राम मात्रा में लेकर, 200 ग्राम नारियल के तेल में मिलाकर, बालों की जड़ों में उंगलियों से लगाएं साथ ही ‘साइलेशिया’ दवा 12 × शक्ति में प्रतिदिन 4-4 गोलियां दिन में तीन बार खाने से बाल खूब घने, लम्बे और काले बने रहते हैं। इसे 6 माह तक प्रयोग करें।
सिर में फ्यास (रूसी) हो, बाल असमय पकते और झड़ते हों,
 तो निम्न फार्मूला लाभदायक है ‘काली फीस’ 12x, ‘कालीम्यूर’ 3 ×, ‘कैल्केरिया फॉस’ 3x, ‘काली सल्फ 3x, ‘नेट्रमम्यूर’ 3 ×, ‘साइलेशिया’ 12 x, सभी दवाओं को 2 ग्रेन मात्रा में 3 बार प्रतिदिन, तीन माह तक कुनकुने गर्म पानी के साथ सेवन करने से आशातीत लाभ होगा।
प्रसव के बाद बाल झड़ने पर ‘
फॉस्फोरिक एसिड 200 शक्ति में, 4 दिन तक, दिन में 3 बार 4-4 गोलियां लें। हाथ लगाते ही बाल हाथ में आ जाएं या कंधी में बाल बहुत आएं, तो ‘फॉस्फोरस’ 30 शक्ति में 4-4 गोलियां दिन में तीन बार लें।
सिर की चमड़ी में कोई रोग न हो, तो बाल झड़ने एवं गंजेपन के लिए, ‘
यूस्टिलेगो’ 200 शक्ति में दिन में 2 बार एवं ‘आर्निका’ 200 शक्ति में दिन में एक बार कुछ दिन तक सवन करने पर लाभ मिलता है।
यदि बालों में खुश्की या फ्यास हो,
 तो ‘यूस्टिलेगो’ 200 शक्ति में, ‘हिपरसल्फ’ 200 शक्ति में एवं ‘बेडिआगा’ 30 शक्ति में दिन में दो बार, कुछ दिन लेने पर खुश्की ठीक हो जाती है। एसिडफॉस 6 शक्ति में कुछ दिन नियमित सेवन करने से भी गंजापन दूर होता है।

एक्जीमा , छाजन , आकौता की होम्योपथिक औषधियां



    एक्जीमा, कार्न, कील-मुहांसे, झाइयां आदि त्वचा के सामान्य रोग हैं। होमियोपैथिक फिलॉसफी के कारण यह रोग सोरा दोष के कारण होते हैं। यदि मनुष्य की प्रकृति में ‘सोरा’ दोष के तत्त्व नहीं होंगे, तो एक्जीमा होगा ही नहीं। वास्तव में ‘सोरा’ हमारी भौतिकवादी प्रवृत्ति एवं मानसिक और वैचारिक विषाक्तता का ही परिणाम है। वैसे भी ‘सोरा’ शब्द का उदभव ‘सोरेट’ से हुआ है जिसका हिंदी रूपान्तर ‘खुजली’ होता है।
एक्जीमा : इसे हिन्दी में अकौता, छाजन और पामा कहते हैं। यह रोग ज्यादातर पैर के टखनों के पास या पिण्डलियों में, जोड़ों में, कान के पीछे गर्दन पर, हाथों में और जननांग प्रदेश में होता पाया जाता है। वैसे, यह शरीर के किसी भी हिस्से में हो सकता है। इस रोग में तीव्र खुजली होती है। जननांग प्रदेश में इस रोग का होना सबसे ज्यादा कष्टदायक होता है।
एक्जिमा के कारण
यह रोग अनुचित आहार-विहार करने, अजीर्ण बने रहने, मांसाहार करने, डायबिटीज रोग होने और त्वचा को ज्यादा रगड़ लगने आदि कारणों से भी होता है।
 
• होमियोपैथिक फिलॉसफी के अनुसार ‘सोरा’ दोष का होना आवश्यक है।
• जीवाणुओं, फफूंद एवं परजीवी (जैसे साटकोप्ट्स-स्केबियाई) आदि सूक्षम जीवों द्वारा भी यह रोग होता है।
प्रकार
एक्जीमा मुख्यतः तीन प्रकार का होता है – 
• गीला यानी बहने वाला एक्जीमा
• सूखा एक्जीमा

• स्थान विशेष पर होने वाला एक्जीमा
एक्जिमा के लक्षण एवं उपचार
सूखा एक्जीमा – सूखा एक्जीमा होने पर निम्नलिखित औषधियों में से,जिस औषधि के सर्वाधिक लक्षण रोगी में पाए जाएं, उस औषधि का सेवन रोगी को करना चाहिए।
एलुमिना : 
त्वचा का बेहद खुश्क, रूखा, सूखा और सख्त हो जाना, दरारें पड़ जाना और बेहद तेज खुजली होना और खुजाने पर फुसियां उठ आना विशेष लक्षण है। कब्ज रहना, बिस्तर में पहुंचकर गरमाई मिलने के बाद अत्यधिक खुजलाहट, सुबह उठने पर और गर्मी से परेशानी बढ़ना और खुली हवा में एवं ठंडे पानी से आराम मिलना आदि लक्षणों के आधार पर उक्त दवा 30 एवं 200 शक्ति में अत्यंत कारगर है।
सल्फर : 
रोगी मैला और गंदा हो, शरीर से दुर्गध आती हो, फिर भी अपने को राजा महसूस करें, रोगी शरीर में गर्मी का अनुभव करता हो, पैरों में जलन होती हो, मीठा खाने की प्रबल इच्छा, अत्यधिक खुजली, किन्तु खुजाने पर आराम मिलता है और अधिक खुजाने पर खून निकलने लगे, बिस्तर की गर्मी से परेशानी बढ़ना, खड़े रहना दुष्कर, सुबह के वक्त अधिक परेशानी, किन्तु सूखे एवं गर्म मौसम में बेहतर महसूस करें। इन लक्षणों के आधार पर ‘सल्फर’ की 30 एवं 200 शक्ति की दवा की एक-दो खुराक ही चमत्कारिक असर दिखाती हैं। इस दवा के रोगी की एक अन्य विशेषता यह है कि शरीर के सारे छिद्र-यथा नाक, कान, गुदा अत्यधिक लाल रहते हैं, अत्यधिक खुजली एवं जलन रहती है। साथ ही पहले कभी एक्जीमा वगैरह होने पर अंग्रेजी दवाओं के लेप से उन्हें ठीक कर लेना और उसके बाद कोई अंदरूनी परेशानी लगातार महसूस करते रहना इसका मुख्य लक्षण है।
रसवेनेनेटा : 


किसी भी प्रकार का खुश्क एक्जीमा, जिसमें त्वचा पर दाने की पुंसियां हों और तेज खुजली होती हो ,श्रेष्ठ दवा है। रात में अधिक खुजली, गर्म पानी से धोने पर आराम मिलना, त्वचा में लाली, त्वचा की ऊपरी सतह (एपिडर्मिस) में ‘वेसाइकिल’ बन जाना आदि लक्षणों के आधार पर 200 एवं 1000 शक्ति की दवा की दो-तीन खुराकें ही पर्याप्त होती हैं।
कैल्केरिया सल्फ
यह बच्चों के खुश्क एक्जीमा की उत्तम औषधिहै। सिर पर छोटी-छोटी पुंसियां हो जाएं, जिन्हें खुजाने पर खून निकलने लगे, मुख्य लक्षण हैं। 3 × से 12 x शक्ति की दवा फायदेमंद रहती है।
गीला एक्जीमा (वीपिंग एक्जीमा) –
ग्रेफाइटिस :
 गीले एक्जीमा को ठीक करने के लिए यह दवा बहुत कारगर रही है। अस्वस्थ त्वचा, जरा-से घाव से मवाद का स्राव, गाढ़ा, शहद जैसा मवाद, गर्मी में तथा रात के समय कष्ट बढ़ना, रगड़ने से दर्द होना, ग्रंथियों की सूजन, त्वचा अत्यंत खुश्क, खुश्की की वजह से स्तनों पर, हाथ-पैरों पर, गर्दन की त्वचा में दरारें पड़ जाना आदि लक्षणों के मिलने पर 30 शक्ति में एवं रोग अधिक पुराना हो, तो 200 शक्ति में अत्यंत लाभप्रद है।
स्थान विशेष का एक्जीमा –
पेट्रोलियम : 
स्थान विशेष पर बार-बार एक्जीमा हो, गीला, जलन, रात में अधिक खुजली, जरा-सी खरोंच लगने के बाद मवाद पड़ जाना, लाली, माथे पर, कानों के पीछे, अण्डकोषों की त्वचा पर, गुदा पर, हाथ-पैरों पर इस प्रकार का एक्जीमा होना एवं मुख्य बात यह है कि एक्जीमा के लक्षण जाड़े के मौसम में ही प्रकट होते हैं। सिर्फ इसी लक्षण के आधार पर ‘पेट्रोलियम’ 200 शक्ति में दी जाए, तो मरीज दो-तीन खुराक खाने के बाद ही ठीक हो जाता है।
मेजेरियम : 
यह सिर के एक्जीमा की खास औषधि है। सिर पर, हाथों पर, पैरों पर पपड़ी जमे एवं उसके नीचे से बदबूदार मवाद निकले, जिसमें कृमि हों, सिर पर बालों के गुच्छे बन जाएं, ‘वेसाइकिल’ बन जाएं, हड्डियां भी प्रभावित हों, छूने से एवं रात्रि में अधिक दर्द एवं खुजली, जलन, खुली हवा में आराम मिलने पर उक्त दवा की 5-6 खुराक 30 अथवा 200 शक्ति में फायदेमंद रहती है।

2017-07-14

सामान्य ज्वर (बुखार) की होम्योपैथिक औषधियाँ

वर्षा या पानी में भीगने, अत्यधिक शारीरिक परिश्रम करने, तेज धूप में अधिक देर रहने, सर्दी लगने अथवा अन्य कारणों से बुखार आ जाता है। इसे ही सामान्य ज्वर कहते हैं ।
एकोनाइट 30- ज्वर की प्रथमावस्था में दें । खासकर ठण्डी व सूखी प्यास लगे, बेचैनी हो- तब इस दवा का प्रयोग करना चाहिये ।
बेलाडोना 6, 30- सर्दी लग जाना, ऑख-मुंह लाल व चेहरे पर तमतमाहट आदि लक्षणों में इसका प्रयोग करना चाहिये ।
डल्कामारा 6, 30– बरसात के पानी में भीगने की वजह से अथवा तर (नम) हवा लगने के कारण आने वाले ज्वर में इससे लाभ होता है ।
रसटॉक्स 3, 30– वर्षा-पानी में भीगने की वजह से, ठण्डी हवा लगने के कारण होने वाले ज्वर में इसका प्रयोग करना चाहिये ।
पल्सेटिला 200– तेल-धी से बनी वस्तुओं को ज्यादा खाना, स्नान के बाद ज्वर आ जाना, ज्वर में प्यास बिल्कुल न हो- इन लक्षणों में यह दवा लाभप्रद सिद्ध होती है |

2017-07-11

नपुंसकता का इलाज होम्योपैथी से // Treatment of Impotence with Homeopathy



   यह एक अच्छी तरह से ज्ञात तथ्य है कि हमारे अंदर प्यार करने और अंतरंगता क्षमता है जो हमें तंदरुस्त और स्वस्थ रखता है। अकेलेपन से बिमारियो के बढ़ने का जोखिम होता है, और रिलेशनशिप समस्त स्वास्थ्य के लिए सही पर एक सकारात्मक प्रभाव डालती है दिल के स्वास्थ्य का संबंध उम्र से संबंधित स्वास्थ्य मुद्दों से है। हमारे वयस्क जीवन में हम में से ज्यादातर के लिए एक पति-पत्नी या साथी के लिए सबसे महत्वपूर्ण संबंध है। एक संतोषजनक और स्वस्थ सेक्स जीवन एक अच्छी रिलेशनशिप के लिए महत्वपूर्ण है। यौन विकारों जैसे कम यौन इच्छा, नपुंसकता, पुरुष ओरगास्मिक(कामोन्माद संबंधी) रोग, महिला ओरगास्मिक(कामोन्माद संबंधी) रोग, और समय से पहले वीर्य स्त्राव यौन प्रतिक्रिया में गड़बड़ी करते है। होम्योपैथिक उपचार द्वारा रक्त की आपूर्ति और उत्तेजक तंत्रिकाओं को बढ़ाने के काम करते हैं। इन उपचारो की विधि एक रोगी के मनोवैज्ञानिक समस्याओं के इलाज के लिए भी अच्छा है। होम्योपैथिक औषधियों तंदरुस्ती का एक सामान्य एहसास देता है और इस तरह रोगी ताक़त(जोश) को पुनः प्राप्त करता है।
कामेच्छा में कमी के उपचार के लिए होम्योपैथी
पुरुषों और महिलाओं को किसी भी उम्र कामेच्छा मे कमी की एक भयावह समस्या हो सकती है। कामप्रवृति मे कमी और यौन अंतरंगता के लिए इच्छा की कमी के कई प्रमुख कारण हो सकते हैं। होम्योपैथिक उपचार कामप्रवृति की कमी के उपचार के लिए प्रभावी रहे हैं।
कामप्रवृति मे कमी के उपचार के लिए कुछ सामान्य और प्रभावी होम्योपैथिक उपचार Iodium,Plumbum,metalicum, urgenticum है।
आयोडियम: 
 पुरुषो में यौन शक्ति की हानि के साथ कृष वीर्यकोष के लिए एक उपयोगी उपाय है।
प्लुम्बुम मेतालिच्चुमः यह यौन इच्छा की कमी के साथ अंडकोष का संकीर्ण लगने में और यौन इच्छा की कमी के साथ प्रगतिशील मांसपेशी मे क्षीणता पुरुषों में मूल्यवान उपाय रहा है।
अर्जेंटम नाईट्रिकम- 
कामप्रवृति मे पूर्ण हानि के साथ नर्वस और उत्सुक पुरुषों में उपयोगी उपाय है या जो वीर्य स्राव मे निर्माण में विफल रहते है जब संभोग करने का प्रयास करते है।
आमतौर पर अन्य प्रयुक्त उपचार फास्फोरस, चाइना , फास्फोरिकम एसीडम, एगनस कास्ट, लायकोपोडीयम, कोनियम , स्टेफीसेगरिया शामिल है। ये उपचार आमतौर पर आपके लक्षणो और सहज प्रकार के आधार पर निर्धारित होते हैं। आपके सहज प्रकार आपके शारीरिक, भावनात्मक, और मनोवैज्ञानिक श्रृंगार के द्वारा परिभाषित है। एक अनुभवी होम्योपैथिक चिकित्सक आपके लिए सबसे उपयुक्त उपचार निर्धारित करने से पहले इन सभी कारकों का मूल्यांकन करते है। यह महत्वपूर्ण है कि कामप्रवृति मे कमी और अन्य यौन विकारों के उपचार के लिए एक पेशेवर होम्योपैथिक चिकित्सक से परामर्श करें।
नपुंसकता के उपचार के लिए होम्योपैथी
नपुंसकता पुरूषो के सम्मुख एक सामान्य समस्या है। नपुंसकता में जहाँ लंबे समय के लिए वीर्य स्त्राव करने, पर्याप्त सामान्य यौन संबंध बनाए रख पाने में अक्षमता है। होम्योपैथिक नपुंसकता के इलाज के लिए प्रयुक्त उपचार के सर्वाधिक प्रभावी हैं और प्रायः गंभीर दुष्प्रभाव का कारण ज्ञात नही होते है।
होम्योपैथिक उपचार के साथ स्व इलाज करने की कोशिश कर सकते है, लेकिन यदि आपकी समस्या निरंतर या आवर्ती है, एक डॉक्टर को शारीरिक, हार्मोन, या तंत्रिका तंत्र की समस्या के लिए जांच इलाज से पहले की जानी चाहिए। एक अनुभवी चिकित्सक के मार्गदर्शन में होम्योपैथिक उपचार में मदद मिल सकती है। एक व्यक्ति की शारिरीक प्रणाली में संतुलन लाना, भावनात्मक और शारीरिक दोनो रूप से और नपुंसकता का इलाज करने के लिए है।
नपुंसकता के इलाज के कुछ सामान्य दवाओं का प्रयोग किया जाता है फास्फोरस, चाइना , फास्फोरिकम एसीडम, एगनस कास्ट, लायकोपोडीयम, कोनियम , स्टेफीसेगरिया हैं।
अग्नुस कास्तुसः यदि नपुंसकता के विकास के बाद आप कई वर्षों के लिए अधिक जीवन और लगातार यौन गतिविधि के लिए अग्नुस कास्तुस उपयोगी हो सकता है। यदि आप जननांगों मे एक ठंडा सनसनी का एहसास एगनस कास्ट संकेत करते है।
अर्जेंटम नाएट्रिकम पुरुषों जिसके वीर्य स्राव मे कमी या विफल रहते है जब यौन अंतरंगता का प्रयास, विशेष रूप से यदि समस्या के बारे में मानसिकता इसे बदतर बनाता है।
नपुंसकता मे केलेडीयम  का स्थान भी महत्वपूर्ण माना गया है|

2017-07-09

प्रोटीन का महत्व और आवश्यकता // Protein Importance and Requirement



    प्रोटीन हमारे लिए बेहद जरूरी होता है। यह कोशिकाओं के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। बच्‍चे, बूढ़े और जवान सबसे लिए प्रोटीन जरूरी होता है। गर्भवती महिलाओं के लिए भी प्रोटीन बहुत जरूरी होता है।
प्रोटीन भोजन का अहम अंग है। समुचित प्रोटीन के बिना किसी भी भोजन को सम्‍पूर्ण नहीं माना जा सकता। प्रोटीन के बिना हम अपने रोजमर्रा के काम भी पूरे नहीं कर सकते। बच्‍चों से लेकर बूढ़ों तक हर उम्र के लोगों के लिए बेहद जरूरी होता है प्रोटीन।
    प्रोटीन की भूमिका शरीर की टूट-फूट की मरम्‍मत करना होता है। यह शरीर में कोशिकाओं बनाने में मदद करता है साथ ही हससे टूटे हुए तन्तुओं का पुनर्निर्माण होता है। शरीर के निर्माण में यह अपनी अहम भूमिका निभाता है व पाचक रसों का निर्माण करता है।
    प्रोटीन में नाइट्रोजन अधिक मात्रा में रहता है। इसमें कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, गंधक तथा फास्फोरस भी होता है। प्रोटीन दो प्रकार का होता है एक वह जो पशुओं से प्राप्त किया जाता है दूसरा वह जो फल, सब्जियों तथा अनाज आदि से मिलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक प्रति किलोग्राम वजन के अनुपात से मनुष्य को एक ग्राम प्रोटीन की आवश्कता होती हैं अर्थात् यदि वजन 50 किलो है तो रोज 50 ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है।
सर्दियों में लें ज्यादा प्रोटीन
सर्दियों के मौसम में पाचन तंत्र ठीक रहता है इसलिए आप प्रोटीन की अधिक मात्रा ले सकते हैं। गर्मी के मौसम में प्रोटीन की मात्रा कम लेनी चाहिए क्योंकि प्रोटीन में कार्बोज-कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है। कार्बोज और कार्बोहाइड्रेट की मात्रा से शरीर को गर्मी मिलती है जिससे समस्या हो सकती है। इसके अलावा बरसात के मौसम में भी प्रोटीन का प्रयोग सीमित मात्रा में करना चाहिए।
 
गर्भावस्था में
गर्भावस्था में प्रोटीन की ज्यादा जरूरत होती है। मां के साथ-साथ गर्भ में पल रहे बच्चे को भी प्रोटीन की अत्यधिक आवश्यकता होती है। प्रोटीन से बच्चे की शरीरिक रचना का विकास होता है। प्रोटीन की कमी इस अवस्था में मां और गर्भ में पल रहे बच्चे के स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकती है।
बुढापे में
बुढ़ापे में शरीर में कई तरह के रोग उभरने लगते हैं। ऐसे में शरीर को प्रोटीन की अत्यधिक आवश्यकता होती है क्योंकि यह एक ऐसी अवस्था होती है जब प्रोटीन जल्दी हजम हो जाता है।इसलिए इस अवस्था में खाद्य पदार्थों में प्रोटीन की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए।
बच्चों के विकास
बच्चों के विकास में प्रोटीन काफी महत्वपूर्ण होता है। उनके शारीरिक विकास के लिए उन्हें खाने में प्रोटीन लेना जरूरी है। प्रोटीन के अभाव में छोटे बच्चों को सूखा रोग न हो, इसके लिए बच्चे को फलों का रस देना चाहिए।
 
रोगियों के लिए
किसी बीमारी से लड़ने के बाद रोगी का शरीर काफी कमजोर हो जाता है। रोगी के शरीर के तंतु, कोशिकाओं आदि को काफी नुकसान होता है उन्हें स्वस्थ करने के लिए प्रोटीन की जरूरत होती है। अगर रोगी का खानपान सही नहीं हुआ तो वो फिर से बीमार हो सकता है।
प्रोटीन के स्रोत
दूध, दही, अंडे की सफेदी, पनीर, मांस, मछली, इडली-डोसा, दाल, चावल, सोयाबीन, मटर, चना, मूंगफली, अंकुरित पदार्थों में प्रोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है।

2017-07-06

कैल्शियम की कमी को दूर करने के 10 आयुर्वेदिक घरेलू उपचार



   क्या आपको कभी बिना किसी कारण के हड्डियों और मांसपेशियों में दर्द महसूस होता है? आप बाम और स्प्रे लगाकर दर्द ठीक करने का प्रयत्न करते हैं परन्तु दर्द फिर भी बना रहता है और आपको रोज़मर्रा के सामान्य कामों को करने में भी समस्या महसूस होने लगती है।
   कैल्शियम शरीर के लिए एक महत्वपूर्ण खनिज है। हमारे दांतों और हड्डियों में 99% कैल्शियम होता है।
यदि शरीर में कैल्शियम की कमी हो जाती है तो हड्डियां कमज़ोर और नाज़ुक हो जाती हैं। इससे हड्डी टूटने का खतरा (फ्रेक्चर) अधिक रहता है।
शरीर के लिए कैल्शियम की आवश्यक मात्रा-
वयस्क तथा बुजुर्गों के लिए प्रतिदिन 1000-1300 मिग्रा., किशोरों के लिए प्रतिदिन 1300 मिग्रा., बच्चों के लिए प्रतिदिन 700-1000 मिग्रा, तथा एक वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए 250-300 मिग्रा. प्रतिदिन।
सभी उपलब्ध उपचारों के अलावा प्राकृतिक घरेलू उत्पाद भी अच्छे उपचार हैं जो शरीर में कैल्शियम का स्तर बढ़ाने के लिए उत्तम होते हैं तथा ये कृत्रिम स्त्रोतों की तुलना में अधिक अच्छे माने जाते हैं।
    घरेलू उपचारों का एक लाभ यह है कि इसमें जडी बूटियों को प्राकृतिक रूप में उपयोग में लाया जाता है जिसमें कोई मिलावट नहीं होती तथा इन उपचारों का कोई दुष्परिणाम भी नहीं होता। यहाँ कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए घरेलू उपचारों के बारे में बताया गया है।
दूध:
दूध कैल्शियम का सबसे उत्तम स्त्रोत है। एक कप गर्म दूध लें तथा उसमें एक चम्मच भुने हुए तिल का पाउडर मिलाएं। इसे अच्छे से मिलाएं तथा पीयें। इसे दिन में तीन बार पीने से अच्छे परिणाम मिलेंगे।
अदरक:
एक गिलास पानी उबालें। इसमें अदरक के 1-2 टुकड़े डाले तथा कुछ देर तक उबालें। इसे छान लें तथा इसका स्वाद अच्छा बनाने के लिए इसमें अपने स्वाद के अनुसार शहद मिलाएं
तिल:
कैल्शियम की कमी को दूर करने के लिए कैल्शियम एक अच्छा उपचार है। एक टेबल स्पून में लगभग 88 मिग्रा. कैल्शियम होता है। इसे पीसकर पाउडर के रूप में भी खाया जा सकता है या इसे सूप, सीरियल्स या सलाद में मिलाकर भी खाया जा सकता है।
आंवला (अम्लाक्की):
आंवला में एंटीऑक्सीडेंट के गुण पाए जाते हैं। आंवले में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसे फल के रूप में भी खाया जा सकता है या पानी में उबालकर भी इसका सेवन किया जा सकता है।
जीरा:
एक गिलास पानी उबालें तथा इसमें एक टीस्पून जीरा मिलाएं। इसे ठंडा होने के बाद अच्छे से मिलाएं। इस पानी को दिन में कम से कम दो बार पीयें। इससे शरीर में कैल्शियम की कमी दूर होगी
. अश्वगंधा:
अश्वगंधा एक प्राचीन जडी बूटी है। यह अपने एंटीऑक्सीडेंट और प्रदह्नाशे गुणों के लिए जानी जाती है तथा शरीर में कैल्शियम की कमी को दूर करने में सहायक है।
दही: दही में कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। प्रतिदिन एक कप दही का सेवन करने से शरीर के लिए आवश्यक कैल्शियम की पूर्ति हो जाती है। एक कप दही में 250-300 मिग्रा. कैल्शियम होता है।
गुग्गुल:
गुग्गुल एक आयुर्वेदिक हर्बल घटक है जो शरीर में कैल्शियम की कमी को दूर करता है। नियमित तौर पर लगभग 250 मिग्रा. से 2 ग्राम तक गुग्गुल का सेवन करने से शरीर में कैल्शियम की कमी दूर होती है।
रागी: रागी एक प्रकार का अनाज होता है जिसमें कैल्शियम प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। इसे अनाज के रूप में या इसके आटे का सेवन किया जा सकता है। प्रतिदिन एक कप रागी का सेवन करने से शरीर में कैल्शियम की कमी नहीं होती।
गुडूची (गिलोय, अमृतवल्ली):
इसकी पत्तियों का सेवन किया जा सकता है या पत्तियों को सुखाकर इसके पाउडर का उपयोग भी किया जा सकता है। केवल पत्तियां ही नहीं बल्कि इसकी जड़ और तने को भी सुखाकर पाउडर के रूप में इसका उपयोग किया जा सकता है।

2017-07-05

दालचीनी के अद्भुत फायदे //The wonderful benefits of cinnamon




दालचीनी का परिचय :-

दालचीनी को हम सब गर्म मसाले के रूप में जानते हैं.दालचीनी पेड़ के अंदर की छाल होती हैं.दालचीनी का प्रयोग खाना और मिठाई में किया जाता हैं. दालचीनी आसानी से उपलब्ध एवं औषधीय गुणों से भरपूर एक मसाला है जो सामान्यतः सभी रसोइयों में उपलब्ध होता है.
दालचीनी को हम एक तरीके से औषधी का भी रूप दे सकते हैं | क्यूंकि एकेली दालचीनी से न जाने हमारे कितने रोग ठीक होते हैं | दालचीनी को ज्यादातर हम अपने घरों में मसाले के रूप मैं प्रयोग करते है | ये दालचीनी पंसारी की दुकान पर आसानी से मिल जाती है | दालचीनी ज्यादातर हमारे वायु के रोगों जेसे कब्जियत,उच्च रक्त चाप, कफ के रोग इत्यादि मैं बहुत काम आती है |
दालचीनी के फायदे :-
दालचीनी के आयुर्वेद मैं बहुत फायदे है | अगर हमारे कोई बीमारी है और उसका इलाज दालचीनी से सम्भव है तो दालचीनी से ही उसका उपचार करें न की एलोपेथी से |
गैस ,बद्हाज़मी से छुटकारा दिलाता हैं : 
 गैस की समस्या हो तो दालचीनी का उपयोग फायदेमंद हैं.इसके लिए १ चम्मच दालचीनी के पाउडर में १ चम्मच शहद मिला कर गर्म पानी के साथ इसका सेवन लाभप्रद होता हैं . इससे पेट की समस्यायों में निजात मिलता हैं.
दम्मा ,अश्थमा, वात के रोग के लिए : 
जिनको दम्मा ,या अश्थमा (Asthama) हो तो उनको दालचीनी का उपयोग करना चाहिए.दालचीनी के पाउडर को गुड के साथ अच्छे से मर्दन कर के गर्म पानी के साथ लेना चाहिए.. आराम मिलता हैं.
 
सर्दी और खांसी मैं फायदेमंद :-
जिन  व्यक्तियों को सर्दी खांसी हो जाती है | उनके लिए सबसे अच्छा इलाज है दालचीनी | करना क्या है की आपको दालचीनी पाउडर के साथ थोडा सा गुड मिलाकर सुबह-सुबह खाली पेट मसल कर लो | फिर इसके आधे घंटे बाद आधा कप गौ मूत्र पी लें अगर आपको मधुमेह या शूगर है तो आप दालचीनी का सेवन सुबह-सुबह गर्म पानी से करें |
लेने का समय :– 2-3 महीने सुबह-सुबह खाली पेट |
कैंसर के लिए उपयोगी : 
दालचीनी का तेल कैंसर में होने वाले प्रभाव को कम करता हैं दालचीनी ट्यूमर ,गैस्ट्रिक कैंसर की रोकथाम के लिए दालचीनी का उपयोग किया जाता हैं.दालचीनी के पाउडर में शहद को मिला कर खाते रहने से भी कैंसर में होनेवाले प्रभाव को कम किया जा सकता हैं.
कैलेस्ट्रोल को नियंत्रित करता हैं :
 जिनको  कोलेस्ट्रोल की अनियमिता हैं उनको दिल के दौरे पड़ने की संभावना ज्यादा हो जाती हैं.शरीर में रक्त वाहिनिया ,धमनियों में रुकावट आ जाती हैं जिससे दिल तक खून सही से नहीं पहुँच पाता और ह्रदय घात का ख़तरा बना रहता हैं. जब हम एंटी ऑक्सीडेंट की मात्रा बहुत कम लेते हैं तो कोलेस्ट्रोल बढ़ जाता हैं.दालचीनी कैलेस्ट्रोल के लेवल को नियंत्रित करता हैं.एक उपाय भी हैं. २ चम्मच शहद ,३ चम्मच दालचीनी पाउडर १/२ लीटर गर्म पानी के साथ ले .इससे  कोलेस्ट्रोल का ख़तरा कम हो जाता हैं.
घाव व् सूजन के लिए :-
 जिन व्यक्तियों के शरीर पर किसी भी कारण सूजन व् घाव हो जाता है | उनके लिए सबसे अच्छी दवा है दालचीनी का तेल | ये तेल आपको किसी भी दुकान पर मिल जाएगा पंसारी पर भी मिल जाएगा | फिर इस तेल को घाव या सुजन पर धीरे से लगायें | घाव व् सूजन एक दम सही हो जाएँगे |
उल्टी,दस्त होने पे : 
दालचीनी का उपयोग उल्टी ,दस्त में भी किया जाता हैं.इसके लिए १ गिलास पानी में दालचीनी पाउडर को उबालें फिर उसमे शहद मिलाएं और इसको पी ले, फायदा होता हैं
गोरा होने के लिए :-
 कुछ व्यक्तियों का रंग सांवला होता है वो दालचीनी का प्रयोग करें | करना कैसे है कि आपको थोड़े से दालचीनी पाउडर मैं थोडा सा दूध मिलाएं | फिर इसे अपने चेहरे पर लगायें अहिस्ता-अहिस्ता | फिर 8-10 मिनट बाद ठंडे पानी से अपना चेहरा धो लें | जल्द ही दिनों मैं चेहरा निखरने के साथ-साथ दाग-धब्बे भी खत्म हो जाते हैं |
पेस्ट लगाने का समय :- शाम को लगायें |
 
मुहं की बदबू के लिए :
जिन भी व्यक्तियों के मुहं में से बदबू आती है वो लोग पर्तिदिन थोड़ी सी इसकी लकड़ी को चुसे | इससे एक दम मुहं मैं से बदबू गायब हो जाती है |
कान के दर्द के लिए : 
 अगर कान में तेज दर्द हो रहा हो या फिर कम सुनाइ पड़ता हो तो दालचीनी के तेल की कुछ बुँदे कान में लेने से बहुत फायदा होता हैं.दालचीनी सुनने की शक्ति को बढाती हैं.
मानसिक शक्ति के लिए :- 
जिन लोगो को  मानसिक तनाव ज्यादा रहता है वो लोग रात को सोते समय नियमित रूप से एक चुटकी दालचीनी पाउडर शहद के साथ मिलाकर लेने से मानसिक तनाव में राहत मिलती है और स्मरण शक्ति बढ़ती है।

लेने का समय :- रात को सोने से पहले |
मोटापा से मुक्ति पाने के लिए :-
कुछ व्यक्ति अपने बजन के कारण बहुत निरास रहते हैं तो वो लोग पर्तिदिन एक कफ गर्म पानी मैं सहद और दालचीनी पाउडर मिलाएं फिर उसको सुबह-सुबह खाली पेट पियें | एसा करने से मोटे से मोटा व्यक्ति भी दुबला-पतला हो जाता है |
सर दर्द के लिए :-
कुछ व्यक्ति इसे होते हैं जिनको ज्यादा ठंडी हवा लगने से उनके सर मैं दर्द होने लगता है ऐसे मैं उन लोगो को डाल चीनी का प्रयोग करना चाहिए करना कैसे है की आपको दालचीनी पाउडर मैं थोडा सा पानी मिलाकर पेस्ट बना लें फिर इसे धीरे-धीरे माथे पर लगायें | सर दर्द एक दम ठीक हो जाता है |
दांतों मैं दर्द होने पर :- 
कुछ कारण वस दांतों मैं दर्द होने पर एक चम्मच दालचीनी पाउडर और 4-5 चम्मच शहद मिलाकर इसका पेस्ट बना लें और फिर इसको दांत के दर्द वाली जगह पर लगाएं | एसा करने से दर्द मैं एक साथ राहत मिलती है | अल्झाइमर एवं पार्किन्सन की बीमारी में : 
अल्झाइमर एवं पार्किन्सन की बीमारी में दालचीनी का उपयोग किया जाता हैं.दालचीनी के पाउडर का पेस्ट बना कर लगाने से फयदा होता हैं.

2017-07-03

कमल ककड़ी और फूल के अद्भुत फायदे // Wonderful Benefits of Lotus Flowers




     कमल का फूल भारतीय परंपरा में बहुत पवित्र माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसके पौधे की जड़, जिसे कमल ककड़ी भी कहते हैं, के कई स्वास्थ्य लाभ हैं। यह कई बीमारियों में आपको राहत प्रदान करती है। हालांकि कमल कीचड़ में पैदा होता है, लेकिन इसकी जड़ अपनी शुद्धता बनाए रखती है। कमलककड़ी से खुशबू आती है, जो आपके मन को लुभाती है। स्वाद में यह कुरकुरी और मीठी होती है। भारत के कई प्रांतों में कमलककड़ी का सब्जी के रूप में उपयोग होता है। आइए जानते हैं, क्या हैं इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ।

बहुतायत में है एंटी-ऑक्सीडेंट
कमलककड़ी में एंटी-ऑक्सीजेंट बहुतायत में उपलब्ध हैं। फ्री रेडिकल्स के कारण, कैंसर या इस जैसी और भी घातक बीमारियां हो सकती हैं, लेकिन इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट हमें इनसे बचाते हैं। कमलककड़ी खाने से हमारे शरीर को भरपूर एंटी-ऑक्सीडेंट उपलब्ध होता है, जो कि स्वास्थ्य के लिए काफी फायदेमंद है।
 
चर्म रोग
जिन लोगों को त्वचा से संबंधित समस्याएं है जिसे हम चर्म रोग के नाम से जानते हैं जो किसी बाहरी संक्रमण के कारण ज्यादा फैल जाती है और आगे चलकर काफी भयानक रूप ले लेती है। इस समस्या को दूर करने में कमल का पौधा काफी अच्छा उपचार है। इसके लिये पानी में से कमल की जड़ निकालकर उसे घिस लें और उससे निकलने वाले सार को संक्रमित जगह पर लगाये। ऐसा करने से चर्म रोग की समस्या काफी हद तक दूर हो जाएगी।
बुखार में प्रभावी दवा
कमलककड़ी बुखार में प्रभावी दवा के रूप में उपयोग में लाई जाती है। यह शरीर को ठंडक पहुंचाती है और बुखार के कारण बढ़े हुए शरीर के तापमान को कम करती है। कमलककड़ी का सूप बनाकर रोगी को पिलाएं, लाभ होगा।
शीध्रपतन की समस्या
शीध्रपतन एक ऐसी समस्या जो आज के समय में महामारी के रूप में फैलती ज्यादा नजर आ रही है। बीर्य का ना बनना या समय से पहले ही बीर्यपात हो जाना नव दंपती के जीवन की खुशहाली को दूर कर देता है । इस समस्या से मुक्ति दिलाने में कमल की जड़ से बना चूर्ण काफी फायदेमंद साबित हुआ है। इसके लिये आप गर्म गुनगुने किये हुए पानी में कमल की जड़ का चूर्ण कम से कम चार ग्राम मिलाकर पीएं। ऐसा करते रहने से आप जल्द ही वीर्यपात जैसी समस्या से छुटकारा पा सकते है।
एन्टीडायरियल गुण हैं कमल ककड़ी में
रिसर्च में यह साबित हो चुका है कि कमल के पौधे की जड़ में डायरिया को रोकने वाले गुण पाए गए हैं। तो जब भी आपको डायरिया की समस्या हो, आप कमलककड़ी का इस्तेमाल करें, जो कि फायदा पहुंचाता है।बवासीर
बवासीर से परेशान लोगों के लिये कमल का फूल सबसे बढ़िया औषधीय उपचार माना गया है। इस समस्या से परेशान लोग कमल केसर का उपयोग कर इस समस्या से मुक्ति पा सकते है। ये आपको आसानी से आस पास के नदी तलाबों में मिल सकता है। आप आधा ग्राम मक्खन और चीनी में कमल केसर को मिलाकर एक सप्ताह तक लगातार खायें। आपको इस बीमारी से जल्द ही राहत मिलगी ।
लीवर के लिए फायदेमंद
कमलककड़ी में जो दो रसायनिक तत्व बहुतायत में पाए जाते हैं, वे हैं टैनिन और टीसुरुता एट। ये दोनों तत्व आपके लीवर को शक्ति प्रदान करते हैं, और लीवर संबंधी बीमारियों को दूर रखते हैं।
दिल की बीमारी
कमल के गट्टे की सब्जी नियमित रूप से रोज खाने से दिल संबंधी रोग दूर होते है। यह शरीर के रक्त चाप को सूचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाता है।
गर्भपात 
बार बार हो रहे गर्भपात को रोकने के लिये आप नागकेसर और कमल की नाल को बराबर मात्रा में मिलाकर पीस लें पीसे गये पेस्ट को गाय के दूध के साथ सिर्फ एक ग्राम लें। आपकी मिसकैरिज जैसी होने वाली समस्या खत्म हो जायेगी। 
डायबिटीज में है लाभदायक
कमलककड़ी खून में शर्करा के स्तर को नियंत्रित करता है। इसमें मौजूद इथेनॉल का अर्क, खून में शक्कर को नियंत्रित करता है और ग्लूकोज टॉलरेंस को बढ़ाता है। इस तरह यदि डायबिटीज यानि मधुमेह के रोगी इसका नियमित सेवन करें, तो उन्हें लाभ होगा।
 
ब्रेस्ट टाइट के लिए
बढ़ती उम्र के साथ या फिर शरीर में पौषक तत्वों की कमा होने से जिन महिलाओं के ब्रेस्ट ढीले होने लगते है। वे महिलाये कमल के बीजों का उपयोग करें। इसके लिये आप कमल के बीजों के पीसकर पाउड़र बना लें और उस पाउडर को गाय के दूध के साथ करीब दो माह तक पीते रहें। इसके फायदे आपको जल्द ही देखने को मिल जायेगे।
इंफ्लेमेशन को रोकता है इसका सेवन
जानकारों के अनुसार, यह एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर है, जिस कारण, शरीर में कहीं भी दाह या इंफ्लेमेशन होता है, यह उसकी रोकथाम करता है। तो जब भी आपको जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों का दर्द या फिर सूजन हो, इसका इस्तेमाल करें।
उल्टी होने पर
बार बार जी मचलाना या फिर उल्टी के आने वाली समस्या को दूर करने के लिये आप कमल के कुछ बीजों को तवे पर भून लें और उसे छीलकर उसके अंदर के सफेद भाग को पीसकर इसमें शहद मिला लें और जब भी आपको उल्टी की समस्या आये इस तरह पेस्ट बनाकर खा लें। जल्द ही राहत देने वाला सबसे अच्छा औषधीय उपचार है।
बालों को काला करने के लिए
बालों की समस्या के लिये कमल का फूल एक वरदान के समान साबित हुआ है। इसके फूल का प्रयोग करने से बाल काले घने लंबे होते है। इसका उपयोग करने के लिये आप एक कटोरे में गाय के कच्चे दूध में कमल के फूल को डालकर किसी गढ्ढे में एक महीने के लिये दबाकर रख दें फिर इसे निकालकर उस सार को अपने बालों पर लगाएं इससे आपके बालों की सुदंरता बढ़ जाएगी।