2016-08-22

प्याज की चाय के फायदे



प्याज़ की चाय प्याज़ के छिलके से बनती है। इसके बाहरी स्तर में उच्च मात्रा में क्वेरसेटिन नाम का पिग्मेंट होता है जिसके कई तरह के औषधीय गुण होते हैं। ये धमनी में रक्त का थक्का बनने से रोककर हाइपरटेंशन के खतरे को कम करने के साथ अनिद्रा की बीमारी से भी कुछ हद तक राहत दिलाता है। प्याज में बाहरी छिलके में एन्टी ऑक्सिडेंट, एन्टी फंगल और एन्टी कैंसरकारी गुण भी होता है।
• क्वेरसेटिन में एन्टी कैंसरकारी गुण होने के कारण ये फ्री रैडिकल्स को नष्ट करने में मदद करता है। अध्ययन में ये पाया गया है कि कैसर के सेल्स को बढ़ने से रोककर ये कोलोन कैंसर को ठीक करने में सहायता करता है।
• प्याज के छिलकर में घुलनशील फाइबर होने के कारण ये कोलोन को साफ रखने में बहुत मदद करता है। ये घुलनशील फाइबर स्किन और आंत से टॉक्सिन को बाहर निकालकर कैंसर सेल्स के उत्पादन को रोकता है।
• 2011 के अध्ययन के अनुसार प्याज का छिलका ग्लूकोज़ रेसपोन्स को बेहतर करके इन्सूलिन रेजिटेंट को बढ़ाकर टाइप-2 डाइबिटीज़ में राहत दिलाने में सहायता करता है।
प्याज के छिलके को अपने डायट में शामिल करने पर आप इन बीमारियों के राहत पा सकते हैं –
• टाइप-2 डाइबिटीज़
• कार्डियोवसकुलर डिज़ीज
• गैस्ट्रोइंटेसटिनल प्रॉबल्म
• कोलोन कैंसर
• वज़न का बढ़ना
प्याज की चाय बनाने की विधि
• एक प्याज को अच्छी तरह से धो लें। उसके बाद उसके छिलकों को अच्छी तरह से निकाल लें।
• एक ग्लास के जार में छिलकों को रख दें और उसके ऊपर से उबलता हुआ पानी डालकर 15 मिनट के लिए जार को बंद कर दें।
• अब प्याज की चाय को छानकर पी लें।
नोट- ये चाय प्रेगनेंट महिला और दूध पिलानेवाली मां को न दें।

2016-08-21

कनेर के पौधे के उपयोग ,उपचार









कनेर का पौधा भारत में हर स्थान पर पाया जाता है | इसका पौधा भारत के मंदिरों में , उद्यान में और घर में उपस्थित वाटिकाओं में लगायें जाते है | कनेर के पौधे की मुख्य रूप से तीन प्रजाति पाई जाती है | जैसे :- लाल कनेर , सफेद कनेर और पीले कनेर | इन प्रजाति पर सारा साल फूल आते रहते है | जंहा पर सफेद और पीली कनेर के पौधे होते है वह स्थान हरा – भरा बसंत के मौसम की तरह लगता है |
कनेर का पौधा एक झाड़ीनुमा होता है | इसकी ऊंचाई 10 से 12 फुट की होती है | कनेर के पौधे की शखाओं पर तीन – तीन के जोड़ें में पत्ते लगे हुए होते है | ये पत्ते 6 से ९ इंच लम्बे एक इंच चौड़े और नोकदार होते है | पीले कनेर के पौधे के पत्ते हरे चिकने चमकीले और छोटे होते है | लेकिन लाल कनेर और सफेद कनेर के पौधे के पत्ते रूखे होते है
कनेर के पौधे को अलग – अलग स्थान पर अलग अलग नाम से जाना जाता है | जैसे :-
१. संस्कृत में :- अश्वमारक , शतकुम्भ , हयमार ,करवीर
२. हिंदी में :- कनेर , कनैल
३. मराठी में :- कणहेर
४. बंगाली में :- करवी
५. अरबी में :- दिफ्ली
६. पंजाबी में :- कनिर
७. तेलगु में :- कस्तूरीपिटे
आदि नमो से जाना जाता है |
कनेर के पौधे में पाए जाने वाले रासायनिक घटक :- कनेर का पौधा पूरा विषेला होता है | इस पौधे में नेरीओडोरिन और कैरोबिन स्कोपोलिन पाया जाता है | इसकी पत्तियों में हृदय पदार्थ ओलिएन्डरन पाया जाता है | पीले कनेर में पेरुबोसाइड नामक तत्व पाया जाता है | इसकी भस्म में पोटाशियम लवण की मात्रा पाई जाती है |

कनेर के पौधे के गुण :- इसके उपयोग से कुष्टघन , व्रण , व्रण रोपण आदि बीमारियाँ ठीक की जाती है | इसके आलावा यह कफवात का शामक होता है | इसके उपयोग से विदाही , दीपन और पेट की जुडी हुई समस्या ठीक हो जाती है | यदि कनेर को उचित मात्रा मे प्रयोग किया जाता है तो यह अमृत के समान होती है लेकिन यदि इसका प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है तो यह जहर बन जाता है | कनेर का उपयोग रक्त की शुद्धी के लिए भी किया जाता है | यह एक तीव्र विष है जिसका उपयोग मुत्रक्रिछ और अश्मरी आदि रोगों को दूर करने के लिए किया जाता है |
कनेर का औषधि के रूप में प्रयोग:-
दूब घास(Cynodon
dactylon) के पंचाग (फल,
फूल, जड़, तना, पत्ती) तथा
कनेर के पत्तोँ को पीस कर
कपड़े मेँ रखकर रस निकालेँ
और सिर के गंजे स्थान पर
लगायेँ तो सिर्फ 15 दिनोँ मेँ
ही उस स्थान पर नये बाल
दिखाई देने शुरू हो जाते हैँ।
तथा पूरे सिर मेँ तेल की
तरह इस रस का प्रयोग करेँ
तब सफेद बाल काले होने
लगते हैँ ।
नेत्र रोग :- आँखों के रोग को दूर करने के लिए पीले कनेर के पौधे की जड़ को सौंफ और करंज के साथ मिलाकर बारीक़ पीसकर एक लेप बनाएं | इस लेप को आँखों पर लगाने से पलकों की मुटाई जाला फूली और नजला आदि बीमारी ठीक हो जाती है |
हृदय शूल :- कनेर के पौधे की जड़ की छाल की 100 से 200 मिलीग्राम की मात्रा को भोजन के बाद खाने से हृदय की वेदना कम हो जाती है |
दातुन :- सफेद कनेर की पौधे की डाली से दातुन करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते है | इस पौधे का दातुन करने से अधिक लाभ मिलता है |
सिर दर्द :- कनेर के फूल और आंवले को कांजी में पीसकर लेप बनाएं | इस लेप को अपने सिर पर लगायें | इस प्रयोग से सिर का दर्द ठीक हो जाता है |
अर्श :- कनेर की जड़ को ठन्डे पानी में पीसकर लेप बनाएं | दस्त होने के बाद जो अर्श बाहर निकलता है उस पर यह लेप लगा लें | अर्श रोग का प्रभाव समाप्त हो जाता है |
*कनेर के 60-70 ग्राम पत्ते (लाल या पीली दोनों में से कोई भी या दोनों ही एक साथ ) ले के उन्हें पहले अच्छे से सूखे कपडे से साफ़ कर लें ताकि उनपे जो मिटटी है वो निकल जाये.,. अब एक लीटर सरसों का तेल या नारियल का तेल या जेतून का तेल ले के उसमे पत्ते काट काट के डाल दें. अब तेल को गरम करने के लिए रख दें. जब सारे पत्ते जल कर काले पड़ जाएँ तो उन्हें निकाल कर फेंक दें और तेल को ठण्डा कर के छान लें और किसी बोटल में भर के रख लें.....
पर्योग विधि :- रोज़ जहाँ जहाँ पर भी बाल नहीं हैं वहां वहां थोडा सा तेल ले के बस 2 मिनट मालिश करनी है और बस फिर भूल जाएँ अगले दिन तक. ये आप रात को सोते हुए भी लगा सकते हैं और दिन में काम पे जाने से पहले भी... बस एक महीने में आपको असर दिखना शुरू हो जायेगा.. सिर्फ 10 दिन के अन्दर अन्दर बाल झड़ने बंद हो जायेंगे या बहुत ही कम... और नए बाल भी एक महीने तक आने शुरू हो जायेंगे......
नोट : ये उपाय पूरी तरह से tested है.. हमने कम से कम भी 10 लोगो पे इसका सफल परीक्षण किया है. एक औरत के 14 साल से बाल झड़ने बंद नहीं हो रहे थे. इस तेल से मात्र 6 दिन में बाल झड़ने बंद हो गये. 65 साल तक के आदमियों के बाल आते देखे हैं इस प्रयोग से जिनका के हमारे पास data भी पड़ा है.. आप भी लाभ उठायें और अगर किसी को फरक पड़े तो कृपया हमे जरुर बताये...
चेतावनी: कनेर के पौधे में जो रस होता है वो बहुत ज़हरीला होता है. तो ये सिर्फ बाहरी प्रयोग के लिए है 
 सफेद कनेर के पौधे के पीले पत्तों को अच्छी तरह सुखाकर बारीक़ पीस लें | इस पिसे हुए पत्ते को नाक से सूंघे | इससे आपको छीक आने लगेगी जिससे आपका सिर का दर्द ठीक हो जायेगा |
कनेर के ताजा फूल की ५० ग्राम की मात्रा को 100 ग्राम मीठे तेल में पीसकर कम से कम एक सप्ताह तक रख दें | एक सप्ताह के बाद इसमें 200 ग्राम जैतून का तेल मिलाकर एक अच्छा सा मिश्रण तैयार करें | इस तेल की नियमित रूप से तीन बार मालिश करने से कामेन्द्रिय पर उभरी हुई नस की कमजोरी दूर हो जाती है इसके साथ पीठ दर्द और बदन दर्द को भी राहत मिलती है |
सफेद कनेर :
सफेद कनेर की जड़ की छाल बारीक पीसकर भटकटैया के रस में खरल करके 21 दिन इन्द्री की सुपारी छोड़कर लेप करने से तेजी आ जाती है।
पक्षघात के रोग में :- सफेद कनेर के पौधे की जड़ की छाल , सफेद गूंजा की दाल तथा काले धतूरे के पौधे के पत्ते आदि को एक समान मात्रा में लेकर इनका कल्क तैयार कर लें | इसके बाद चार गुना पानी में कल्क के बराबर तेल मिलाकर किसी बर्तन में धीमी आंच पर पकाएं | जब केवल तेल रह जाये तो किसी सूती कपड़े से छानकर मालिश करें | इससे पक्षाघात का रोग ठीक हो जाता है |
चर्म रोग :- सफेद कनेर के पौधे की जड़ का क्वाथ बनाकर राई के तेल में उबालकर त्वचा पर लगाने से त्वचा सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है |
कुष्ठ रोग :- कनेर के पौधे की छाल का लेप बनाकर लगाने से चर्म कुष्ठ रोग दूर होता है |
अफीम की आदत से छुटकारे के लिए :- कनेर के पौधे की जड़ का बारीक़ चूर्ण तैयार कर लें | इस चूर्ण को 100 मिलीग्राम की मात्रा में दूध के साथ दें | इससे कुछ हफ्तों में ही अफीम की आदत छुट जाएगी |
कृमि की बीमारी :- कनेर के पत्तों को तेल में पकाकर घाव पर बांधने से घाव के कीड़े मर जाते है |
कनेर के पौधे के पत्तों का क्वाथ से नियमित रूप से नहाने से कुष्ठ रोग काफी कम हो जाता है |
कनेर के पौधे के पत्तों को बारीक़ पीस लें | अब इसमें तेल मिलाकर लेप तैयार कर लें | शरीर में जंहा पर भी जोड़ों का दर्द है उस स्थान पर लेप लगा लें | इससे दर्द कम हो जाता है |
खुजली के लिए :- कनेर के पौधे के पत्तों को तेल में पका लें | इस तेल को खुजली वाले स्थान पर लगाने से एक घंटे के अंदर खुजली का प्रभाव कम हो जाता है |
पीले कनेर के पौधे की पत्तियां या जैतून का तेल में बनाया हुआ महलम को खुजली वाले स्थान पर लगायें | इससे हर तरह की खुजली ठीक हो जाती है |
सर्पदंश के लिए :- कनेर की जड़ की छाल को 125 से 250 मिलीग्राम की मात्रा में रोगी को देते रहे इसके आलावा आप कनेर के पौधे की पत्ती को थोड़ी – थोड़ी देर के अंतर पे दे सकते है | इस उपयोग से उल्टी के सहारे विष उतर जाता है |
दाद के रोग के लिए :- सफेद कनेर के पौधे की जड़ की छाल का तेल बनाकर लगाने से कुष्ट रोग और दाद का रोग ठीक होता है |

2016-07-17

विधारा के गुण लाभ उपचार:Healing properties of elephant creeper



विधारा को घाव बेल भी कहते हैं . यह बेल सर्दी में भी हरी भरी रहती है . वर्षा ऋतु में इसके फूल आते हैं . इसके अन्दर एक बड़ा ही अनोखा गुण है . यह मांस को जल्दी भर देता है या कहें कि जोड़ देता है . आदिवासी लोग विधारा के पत्तों में मांस के टुकड़ों को रख देते थे कि अगले दिन पकाएंगे . अगले दिन वे पाते थे कि मांस के टुकड़े जुड़ गए हैं . यह बड़ी ही रहस्यभरी घटना है . यह सच है कि किसी भी प्रकार के घाव पर इसके ताज़े पत्तों को गर्म करके बांधें तो घाव बहुत जल्दी भर जाता है .
सबसे अधिक मदद ये gangrene में करता है . शुगर की बीमारी में कोई भी घाव आराम से नहीं भरता है . gangrene होने पर तो पैर गल जाते हैं और अंगुलियाँ भी गल जाती हैं . अगर pus भी पड़ जाए तो भी चिंता न करें . इसकी पत्तियों को कूटकर उसके रस में रुई डुबोकर घावों पर अच्छी तरह लगायें . उसके बाद ताज़े विधारा के पत्ते गर्म करके घावों पर रखें और पत्ते बाँधें . हर 12 घंटे में पत्ते बदलते रहें . बहुत जल्द घाव ठीक हो जायेंगे . ये बहुत पुराने घाव भी भर देता है. Varicose veins की बीमारी भी इससे ठीक होती है .

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Bedsore हो गए हों तो रुई से इसका रस लगायें . किसी भी तरह की ब्लीडिंग हो ; periods की, अल्सर की , आँतों के घाव हों , बाहर या अंदर के कोई भी घाव हों तो इसके 2-3 पत्तों का रस एक कप पानी में मिलाकर प्रात:काल पी लें . हर तरह का रक्तस्राव रुक जाएगा . कहीं भी सूजन या दर्द हो तो इसका पत्ता बाँधें .
इसके बीज भूनकर उसका पावडर गर्म पानी या शहद के साथ लें तो बलगम और खांसी खत्म होती है . लक्ष्मी विलास रस में भी इसे डालते हैं . लक्ष्मी विलास रस की दो-दो गोली सवेरे शाम लेने से सर्दी दूर होती है . शरीर में दर्द हो या arthritis की समस्या हो तो इसकी 10 ग्राम जड़ का काढा पीयें .

 वानस्पतिक नाम : Argyreia nervosa.

· प्रचलित नाम:Elephant Creeper, अधोगुडा, घाव बेल, समुद्र सोख, Hawaiian Baby Woodrose, Woolly Morning Glory.




आयुर्वेद में गुण:
· रस (Taste) – कटु (Pungent), तिक्त (Bitter), कषाय (Astringent)
· गुण (Characteristics) - लघु (Light); स्निग्ध (Unctuous)
· वीर्य (Potency) - उष्ण (Hot)
· विपाका (Post digestion effect) - मधुर (Sweet) 

आयुर्वेद में प्रभाव:
· त्रिदोषों पर प्रभाव (Effect on Tridosha): विधारा मूल का प्रभाव प्रमुखतः कफ़ और वात दोषों पर होता है अतः इसका उपयोग वात, कफ़ और वात-कफ़ प्रधान/कारक रोगों में प्रभावी/लाभकारी होता है Vidhara mool pacifies Kapha and Vata Doshas in the body so it can be used effectively in management of all the diseases which originate from aggravation of Kapha/ Vata or both.).
· रसायन: विधारा मूल शरीर की प्रत्येक कोशिका तक कार्य करती है और उन्हें बल प्रदान करती है. यह एक उच्च कोटि का वाजीकरण रसायन है.
· वृष्य: यौन उत्तेजना वर्धक, वीर्य के गुण बढ़ता है, शुक्राणुओं कि संख्या बढ़ाता है, गर्भाशय की जलन/सूजन लाभकारी है.
· आमवातहर: वात जनित रोगों एवं गठिया आदि रोगों में विशेष लाभकारी है.
· अर्शहारा: बवासीर/अर्श/हैमोरोइड में लाभकारी
· शोथहर: विधारा मूल सभी प्रकार की सूजन या दर्द में राहत प्रदान करता है.
· मेहाप्रनुत: विधारा मूल सभी प्रकार के मूत्र रोगों में लाभकारी होता है. यह मूत्र विसर्जन के द्वारा शरीर से शर्करा का निष्कासन करता 

है, अतः मधुमेह में लाभकारी होता है.

· आयुष्कर: शरीर के सभी दोषों को दूर कर मनुष्य की आयु वर्धन करता है.
· मेधावर्धक: मस्तिष्क को बल प्रदान करता है तथा तर्क एवं स्मरण शक्ति को बढ़ाता है.
· कान्तिकर: त्वचा को कांतिमय तथा निर्दोष करता है.
यह घाव को जल्दी भर देता है या मांस को जोड़ देता है। जब पत्ती के निचली बालों वाली या रोंएदार सतह को सूजन या घाव वाले हिस्से पर लगाते हैं तो यह उसे पका कर मवाद या पीप निकालने में मददगार होता है, जबकि ऊपरी चिकनी सतह घाव भरने में मदद करता है|
विधारा मूल गैंग्रीन/कोथ/मांस के सड़ने के इलाज में सर्वाधिक उपयोगी है. गैंग्रीन/कोथ होने पर पैर गल जाते हैं और अंगुलियाँ भी गल जाती हैं पस भी पड़ जाए तो भी चिंता न करें. ये गैंग्रीन/कोथ के पुराने से पुराने घावों को ठीक कर देता है.
रक्त वाहिनियों/सिराओं में सूजन व नसों में खिंचाव (Varicose veins) या चिक चढ़ जाने की बीमारी भी इससे ठीक होती है.
शय्या व्रण या शय्या क्षत (Bedsore) के फोड़े/घाव में यह अत्यंत लाभकारी होता है.
माहवारी/मासिक धर्म में, अल्सर में, आँतों के घाव में, शरीर के बाहर या अंदर के कोई भी घाव में इसके प्रयोग से रक्तस्राव रुक जाता है.
किसी भी प्रकार सूजन या दर्द हो तो इसका पत्ता बाँधें, आराम मिलता है.
इसके प्रयोग से बलगम और खांसी खत्म होती है.
शीतकाल में उपयोगी शक्तिवर्धक चूर्ण बनाने की विधि बता रहा हूँ | इस चूर्ण का उपयोग करने से पहले 3 दिनों तक एक कप गुनगुने दूध में 2 चम्मच अरंड का तेल मिलाकर सुबह-शाम लेने से पेट साफ़ कर लें. यह चूर्ण बनाने के लिए 50 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण, 50 ग्राम विधारा चूर्ण, 50 ग्राम मुलैठी चूर्ण, 25 ग्राम सौंठ चूर्ण, 25 ग्राम गिलोय सत्व, 50 ग्राम सफ़ेद मूसली चूर्ण और 50 ग्राम सतावर चूर्ण को एक साथ मिलाकर रखे. इस 1 चम्मच चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम लेना शीतकाल में लाभदायक है|



2016-07-16

चिरोंजी के फायदे The advantages of Chironji


चिरौंजी को भला कौन नहीं जानता। यह हर घर में एक सूखे मेवे की तरह प्रयोग की जाती है। इसका प्रयोग भारतीय पकवानों, मिठाइयों और खीर व सेंवई इत्यादि में किया जाता है। चिरौंजी को चारोली के नाम से भी जाना जाता है। चारोली का वृक्ष अधिकतर सूखे पर्वतीय प्रदेशों में पाया जाता है। दक्षिण भारत, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश, मध्यप्रदेश, छोटा नागपुर आदि स्थानों पर यह वृक्ष विशेष रूप से पैदा होता है।
चारोली का उपयोग अधिकतर मिठाई में जैसे हलवा, लड्डू, खीर, पाक आदि में सूखे मेवों के रूप में किया जाता है।
मीठी चीजों में खासतौर पर इस्तेमाल होने वाली चिरौंजी में कई ऐसे पोषक तत्व पाए जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं. चिरौंजी में प्रोटीन की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है. इसके अलावा इसमें विटामिन सी और बी भी पर्याप्त मात्रा में होता है. वहीं इससे निर्मित तेल में अमीनो एसि‍ड और स्टीएरिक एसि‍ड भी पाया जाता है.
हालांकि यह एक महंगा ड्राई फ्रूट है पर इससे होने वाले स्वास्थ्य लाभ वाकई बेजोड़ हैं.
चिरौंजी स्‍वास्‍थ्‍य और सौंदर्य दोनों के लिहाज से बहुत अच्‍छी मानी जाती है
चिरौंजी का लेप लगाने से चेहरे के मुंहासे, फुंसी और अन्‍य चर्म रोग दूर होते हैं। चिरौंजी को खाने से ताकत मिलती है, पेट में गैस नहीं बनती एंव शिरःशूल को मिटाने वाली होती है। चिरौंजी का पका हुआ फल मधुर, स्निग्ध, शीतवीर्य तथा दस्तावार और वात पित्त, जलन, प्यास और ज्वर का शमन करने वाला होता है।
खूनी दस्‍त रोके-
5-10 ग्राम चारोली को पीसकर दूध के साथ लेने से खूनी दस्त में लाभ होता है।
खांसी में-
खांसी में चिरौंजी का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है।
चिरौंजी पौष्टिक भी होती है, इसे पौष्टिकता के लिहाज से बादाम के स्थान पर इस्तेमाल कर सकते हैं।
किसी को शारीरिक कमजोरी हो तो उसके लिए चिरौंजी खाना बहुत फायदेमंद होता है. यह शारीरिक कमजोरी को दूर करने के साथ ही क्षमता का विकास भी करता है.
बालों को काला करे
चिरौंजी का तेल बालों को काला करने के लिए उपयोगी है
चेहरे को सुंदर बनाने के लिये
चिरौंजी को गुलाब जल के साथ पीस कर चेहरे पर लेप लगाएं। फिर जब यह सूख जाए तब इसे मसल कर धो लें। इससे चेहरा चिकना, सुंदर और चमकदार बन जाएगा।
सर्दी-जुकाम में भी इसका सेवन फायदेमंद होता है. इसे दूध के साथ पकाकर प्रयोग में लाने से इस तकलीफ में फायदा होता है|.
चमकती त्वचा - चारोली को गुलाब जल के साथ सिलबट्टे पर महीन पीस कर लेप तैयार कर चेहरे पर लगाएँ। लेप जब सूखने लगे तब उसे अच्छी तरह मसलें और बाद में चेहरा धो लें। इससे आपका चेहरा चिकना, सुंदर और चमकदार हो जाएगा। इसे एक सप्ताह तक हर रोज प्रयोग में लाए। बाद में सप्ताह में दो बार लगाते रहें। इससे आपका चेहरा लगेगा हमेशा चमकदार।
गीली खुजली - अगर आप गीली खुजली की बीमारी से पीड़ित हैं तो 10 ग्राम सुहागा पिसा हुआ, 100 ग्राम चारोली, 10 ग्राम गुलाब जल इन तीनों को साथ में पीसकर इसका पतला लेप तैयार करें और खुजली वाले सभी स्थानों पर लगाते रहें। ऐसा करीबन 4-5 दिन करें। इससे खुजली में काफी आराम मिलेगा व आप ठीक हो जाएँगे।


मुंहासों को दूर करे
संतरे के छिलके और चिरौंजी को दूध के साथ पीस कर चेहरे पर लेप लगाएं। जब लेप सूख जाए तब चेहरे को धो लें। एक हफ्ते तक प्रयोग के बाद भी असर न दिखाई दे तो लाभ होने तक इसका प्रयोग जारी रखें।
चिरौंजी में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. कुछ मात्रा में इसके सेवन से शरीर की प्रोटीन की आवश्यकता पूरी हो जाती है. आप चाहें तो इसे कच्चे रूप में भी खा सकते हैं या फिर किसी भी स्वीट डिश के साथ पकाकर ले सकते हैं.


*चिरौंजी बीज, कैलोरी में अपेक्षाकृत कम होते हैं। यह प्रोटीन और वसा का एक अच्छा स्रोत हैं। इनमे फाइबर की भी अच्छी मात्रा होती हैं।इसके अतिरिक्त इसके विटामिंस जैसे की, विटामिन सी , विटामिन बी 1, विटामिन बी 2 और नियासिन आदि भी होते है। खनिज जैसे की, कैल्शियम, फास्फोरस और लोहे भी इन बीजों में उच्च मात्रा में पाए जाते हैं।
*चिरौंजी (मेवे के रूप में), एक टॉनिक है। यह मदुर, बलवर्धक, वीर्यवर्धक, वाट और पित्त को कम करने वाली, दिल के लिए अच्छी, विष को नष्ट करने वाली और आम्वर्धक है

  1. *शीत पित्ती - शरीर पर शीत पित्ती के ददोड़े या फुंसियाँ होने पर दिन में एक बार 20 ग्राम चिरौंजी को खूब चबा 
    कर खाएँ। साथ ही दूध में चारोली को पीसकर इसका लेप करें। इससे बहुत फायदा होगा। यह नुस्खा शीत पित्ती में बहुत उपयोगी है।
    *सांस की समस्याओं respiratory ailments के उपचार में भी किया जाता है। यह श्लेष्मा phlegm/mucous को ढीला करने में भी मदद करता है और नाक और छाती की जकडन में राहत देता है। यह एंटीऑक्सिडेंट antioxidant है। चिरौंजी की बर्फी खाने से शरीर में बल की वृध्धि होती है और दुर्बलता जाती है ।
    चिरौंजी पित्त, कफ तथा रक्त विकार नाशक है ।
    *चिरौंजी भारी, चिकनी, दस्तावर, जलन, बुखार और अधिक प्यास को दूर करती है ।
    चिरौंजी को खाने से शरीर में गरमी कम होती और ठंडक मिलती है। It is cooling in nature. इसके १०-२० ग्राम दाने चबाने से शीत-पित्त या छपाकी में राहत मिलती है।

2016-07-15

जायफल के फायदे Benefits of nutmeg


अखरोट की तरह दिखने वाला जायफल एक स्‍पाइसी मसाला है, जिसके प्रयोग से खाने का स्‍वाद और ज्‍यादा बढ़ जाता है। जायफल को स्‍वास्‍थ्‍य के लिहाज से भी गुणकारी माना जाता है। ये स्किन और सेक्‍स से जुड़ी समस्‍याओं में अहम भूमिका निभाता है। आइए जानते हैं क‍ि जायफल के और क्‍या-क्‍या स्‍वास्‍थ्‍य लाभ हैं।
*सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल को पानी में घिस कर लगाएं।
* सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन को मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये। यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।
*आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।
* दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।
* फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर जायफल को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की संभावना देखी गयी है।

  • * प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।
    *फटी एडियों के लिए इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।
    *जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।
    * अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो जायफल को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये।
    *अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है, तो जायफल को पानी में घिसकर उसे पिला दीजिये।
    *जी मिचलाने की बीमारी भी जायफल को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।
    *इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।
    *जायफल के लेप के बजाय जायफल के तेल का भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
    * दांत में दर्द होने पर जायफल का तेल रुई पर लगाकर दर्द वाले दांत या दाढ़ पर रखें, दर्द तुरंत ठीक हो जाएगा। अगर दांत में कीड़े लगे हैं तो वे भी मर जाएंगे।
    - पेट में दर्द हो तो जायफल के तेल की 2-3 बूंदें एक बताशे में टपकाएं और खा लें। जल्द ही आराम आजाएगा। जायफल को पानी में पकाकर उस पानी से गरारे करें। मुंह के छाले ठीक होंगे, गले की सूजन भी जाती रहेगी।
    * जायफल को कच्चे दूध में घिसकर चेहरें पर सुबह और रात में लगाएं। मुंहासे ठीक हो जाएंगे और चेहरे निखारेगा।
    *एक चुटकी जायफल पाउडर दूध में मिला कर लेने से सर्दी का असर ठीक हो जाता है। इसे सर्दी में प्रयोग करने से सर्दी नहीं लगती।
    * सरसों का तेल और जायफल का तेल 4:1 की मात्रा में मिलाकर रख लें। इस तेल से दिन में 2-3 बार शरीर की मालिश करें। जोड़ों का दर्द, सूजन, मोच आदि में राहत मिलेगी। इसकी मालिश से शरीर में गर्मी आती है, चुस्ती फुर्ती आती है और पसीने के रूप में विकार निकल जाता है।
    *जायफल, सौंठ और जीरे को पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को भोजन करने से पहले पानी के साथ लें। गैस और अफारा की परेशानी नहीं होगी।
    * दस जायफल लेकर देशी घी में अच्छी तरह सेंक लें। उसे पीसकर छान लें। अब इसमें दो कप गेहूं का आटा मिलाकर घी में फिर सेकें। इसमें शक्कर मिलाकर रख लें। रोजाना सुबह खाली पेट इस मिश्रण को एक चम्मच खाएं, बवासीर से छुटकारा मिल जाएगा।
    * नीबू के रस में जायफल घिसकर सुबह-शाम भोजन के बाद सेवन करने से गैस और कब्ज की तकलीफ 

  • * दूध पाचन : शिशु का दूध छुड़ाकर ऊपर का दूध पिलाने पर यदि दूध पचता न हो तो दूध में आधा पानी मिलाकर, इसमें एक जायफल डालकर उबालें। इस दूध को थोडा ठण्डा करके कुनकुना गर्म, चम्मच कटोरी से शिशु को पिलाएँ, यह दूध शिशु को हजम हो जाएगा।
    * यह शक्ति भी बढाता है।
    * जायफल आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है।
    *जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।
    किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार। *बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को सुबह शाम चटायें।
    * चेहरे पर या फिर त्वचा पर पड़ी झाईयों को हटाने के लिए आपको जायफल को पानी के साथ पत्थर पर घिसना चाहिए। घिसने के बाद इसका लेप बना लें और इस लेप का झाईयों की जगह पर इस्तेमाल करें, इससे आपकी त्वचा में निखार भी आएगा और झाईयों से भी निजात मिलेगी।
    * चेहरे की झुर्रियां मिटाने के लिए आप जायफल को पीस कर उसका लेप बनाकर झुर्रियों पर एक महीने तक लगाएंगे तो आपको जल्द ही झुर्रियों से निजात मिलेगी।
    * आंखों के नीचे काले घेरे हटाने के लिए रात को सोते समय रोजाना जायफल का लेप लगाएं और सूखने पर इसे धो लें। कुछ समय बाद काले घेरे हट जाएंगे।
    *अनिंद्रा का स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है और इसका त्वचा पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है। त्वचा को तरोताजा रखने के लिए भी जायफल का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके लिए आपको रोजाना जायफल का लेप अपनी त्वचा पर लगाना होगा। इससे अनिंद्रा की शिकायत भी दूर होगी और त्वचा भी तरोजाता रहेगी।
    *कई बार त्वचा पर कुछ चोट के निशान रह जाते हैं तो कई बार त्वचा पर नील और इसी तरह के घाव पड़ जाते हैं। जायफल में सरसों का तेल मिलाकर मालिश करें। जहां भी आपकी त्वचा पर पुराने निशान हैं रोजाना मालिश से कुछ ही समय में वे हल्के होने लगेंगे। जायफल से मालिश से रक्त का संचार भी होगा और शरीर में चुस्ती-फुर्ती भी बनी रहेगी।
    *अनिद्रा के लिए सही- जायफल सेरोटोनिन (serotonin) का उत्‍पादन बढ़ाकर अच्‍छी नींद में मदद करता है। इसमें मौजूद मायरिस्टिसिन ( myristicin) गुण तनाव के लिए जिम्‍मेदार कारक एंजाइम्‍स (enzymes) को बढ़ने से रोकते हैं। अनिद्रा से निपटने के लिए सोने से पहले दूध के गिलास में जायफल का पाउडर ज़रूर मिलाएं।
    *दिमाग के लिए सही- जायफल में मौजूद मायरिस्टिसिन ( myristicin) अल्जाइमर रोग के लिए जिम्मेदार कारक एंजाइम (enzyme) के खिलाफ काम करता है। इसके अलावा ये तनाव को कम करता है और यादाशत को बढ़ाता है। 

*इम्‍यूनिटी बढ़ाएगा- इसमें मौजूद पोषक तत्‍व इम्‍यूनिटी को बढ़ाकर स्‍वास्‍थ्‍य को सही रखते हैं। जायफल में पाए जाने वाले मिनरल्‍स और विटामिन एंटी-इन्फ्लैमटोरी और एंटीऑक्सीडेंट के प्रभाव को रोकने में सहायक हैं, जिससे आपका स्‍वास्‍थ्‍य दुरुस्‍त रहता है।
*पाचन क्रिया के लिए सही- इसमें मौजूद फाइबर पेट में दर्द, कब्‍ज और एसिडिटी होने से रोकते हैं। इसके पाउडर को सलाद, कस्‍टर्ड और आइसक्रीम पर छिड़कर खाने से इन परेशानियों से बचा जा सकता है।
सेक्‍स क्षमता बढ़ाएगा- जायफल के पाउडर को चाय और दूध में मिलाकर पीने से सेक्‍स लाइफ बेहतर बनेगी। ये नेचुरल ऐफ्रोडीज़ीएक (aphrodisiac) की तरह काम करता है जिससे हार्मोन सेरोटोनिन पर प्रभाव पड़ता है और सेक्‍स उत्‍तेजना बढ़ती है।
*स्किन प्रॉब्‍लम्‍स करेगा दूर- धब्बे, मुँहासे और झुर्रियों से छुटकारा पाने के लिए अपने खाने में जायफल शामिल करें। इसमें एंटीसेप्टिक और एंटी-इनफ्लमेटरी गुण होते हैं जो स्किन को साफ रखते हैं। इसका पाउडर दूध के साथ मिलाकर स्किन पर लगाएं
*दांतों को बनाएगा मजबूत- इसमें मौजूद एंटी बैक्टीरियल गुण से दांतों के दर्द, सांस की गंध और मसूड़ों की समस्‍या से छुटकारा मिलता है। इसके लिए आप जायफल के तेल को कॉटन की सहायता से मुंह के प्रभावित हिस्‍से पर लगा सकते हैं। 




2016-07-13

खून की कमी(रक्ताल्पता)के उपचार


अक्सर थकान, कमजोरी रहना, त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, हाथ-पैरों में सूजन आदि एनीमिया के लक्षण हैं। इस समस्या से पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं ज्यादा परेशान रहती हैं। जिन लोगों के खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा बहुत कम हो जाती है, वो लोग एनीमिया के शिकार हो जाते हैं।

*एनीमिया के रोगी को लौह तत्व, विटामिन बी, फोलिक एसिड की कमी होती है। कभी-कभी अनुवांशिक कारणों से भी यह रोग हो सकता है। यदि आपके शरीर में भी खून की कमी है तो अपने आहार पर खास ध्यान दें। चलिए, जानते हैं किन चीजों को खाने से खून बढ़ जाता है और एनीमिया दूर हो जाता है।

*भुट्टे एनीमिया के रोगियों के लिए पौष्टिक होते हैं। इन्हें सेंककर खाने से इसके दाने बड़े स्वादिष्ट लगते हैं। मक्के के दाने उबाल कर खाने से खून बढ़ता है।

* मूंगफली के दाने गुड़ के साथ चबा-चबा कर खाएं।
*शरपुंखा की पत्तियों और फलियों से लगभग 20 मिली रस में 2 चम्मच शहद मिला लें। इस मिश्रण को सुबह-शाम लें। इससे खून साफ होता है और बढ़ता है।

*एक गिलास सेब का जूस लें। उसमें एक गिलास चुकंदर का रस और स्वादानुसार शहद मिलाएं। इसे रोजाना पिएं। इस जूस में लौह तत्व अधिक मात्रा में होता है।

*चम्मच तिल 2 घंटों के लिए पानी में भिगो दें। पानी छान कर तिल को पीसकर पेस्ट बना लें। इसमें 1 चम्मच शहद मिलाएं और दिन में दो बार इसे खाएं।

पके हुए आम के गूदे को अगर मीठे दूध के साथ लिया जाए तो आपका खून बढ़ जाता है।

*दिन में दो बार ठंडे पानी से नहाएं। सुबह के समय सूरज की रोशनी में बैठें।
* चाय और कॉफी पीना थोड़ा कम कर दें, क्योंकि यह शरीर को आयरन सोखने से रोकता है।

* अनंतमूल, दालचीनी और सौंफ की समान मात्रा लेकर चाय बनाकर पिएं। दिन में एक बार लें। खून की कमी दूर हो जाएगी।

2016-06-29

एज स्पॉट(उम्र के धब्बे) हटाने के उपचार : How to remove age spot ?

चेहरे पर भूरे धब्‍बों के लिए मुख्‍यतौर पर सूरज की अल्‍ट्रावायलेट किरणें जिम्‍मेदार होती हैं। सूर्य की इन पराबैगनी किरणों से चेहरे पर पड़ने से त्‍वचा पर मेलानोसाइट्स नामक कोशिकाओं का उत्‍पादन होता है। इसी सेल्‍स के ज्‍यादा उत्‍पादन होने से चेहरे पर ब्राउन स्‍पॉट यानी भूरे रंग के धब्‍बे बनते हैं। इन धब्‍बों को कई अन्‍य नामों से भी जाना जाता है - ब्‍लैक स्‍पॉट, लिवर स्‍पॉट, एज (उम्र) स्‍पॉट, सन स्‍पॉट आदि।

ब्राउन स्‍पॉट को हटाने के तरीके -
एलोवेरा -
एलोवेरा यानी घृतकुमारी में रोग-निवारक गुण कूट-कूटकर भरे हैं। इसका सेवन जहां कई बीमारियों से बचाने में मदद करता है, वहीं चेहरे पर इसे लगाने से दाग-धब्‍बे दूर करने में मदद मिलती है। एलोवेरा जैल लेकर धब्‍बों वाली जगह पर लगाइए, चेहरे पर लगभग आधे घंटे तक जेल को लगा रहने दीजिए और उसके बाद सामान्‍य पानी से अपना चेहरा धो लीजिए। नियमित रूप से एक महीने तक इस क्रिया को दिन में दो बार दोहराइए। सुबह खाली पेट 3-4 चम्मच एलोवेरा का रस पीने से दिन-भर शरीर में शक्ति व चुस्ती-स्फूर्ति बनी रहती है।



छाछ -
छाछ में मौजूद लैक्टि एसिड त्‍वचा के लिए बहुत फायेदमंद होता है। बटरमिल्‍क का प्रयोग करके चेहरे के ब्राउन धब्‍बों से निजात पायी जा सकती है। कॉटन का एक छोटा टुकड़ा लेकर उसमें छाछ की कुछ बूंदें गिरा लीजिए, उसके बाद कॉटन की सहायता से धब्‍बों वाली जगह पर छाछ लगाइए। लगभग 10‍ मिनट बाद सामान्‍य पानी से चेहरा धो लीजिए। वे लोग जिनकी त्‍वचा तैलीय है अथवा जो लोग मुंहासों की समस्‍या से परेशान हैं, तो बटरमिल्‍क में नींबू का रस मिलाकर भी चेहरे के दाग-धब्‍बों पर लगा सकते हैं। एक-एक चम्‍मच छाछ और टमाटर का रस मिलाकर भूरे धाग वाले हिस्‍से पर लगाने से धब्‍बे हट जाते हैं।
नींबू का रस -
नींबू विटामिन-सी का सबसे अच्‍छा स्रोत माना जाता है। यह चेहरे से भूरे धब्‍बों को हटाने में बहुत मदद करता है। ताजे नींबू के जूस को धब्‍बे वाली जगह पर लगाइए। इसे लगभग एक घंटे तक लगा रहने दीजिए, उसके बाद ठंडे पानी से चेहरे को साफ कर लीजिए। दो महीने तक धब्‍बों वाली जगह पर नींबू का रस नियमित रूप से लगाने से धब्‍बे हट जाते हैं। जिसकी त्‍वचा संवेदनशील हो वह नींबू के रस के साथ गुलाबजल या शहद को मिलाकर प्रयोग करे। इसके अलावा आप नींबू के रस के साथ चीनी मिलाकर भी प्रभावित क्षेत्र पर लगाया जा सकता है।




दही -
दही दूध के मुकाबले दही सेहत के लिए ज्यादा फायदेमंद है। दही में कैल्शियम, प्रोटीन, लैक्टोज, आयरन, फास्फोरस पाया जाता है। चेहरे से भूरे धब्‍बों को हटाने में भी दही फायदेमंद होता है। रात को सोने से पहले दही लेकर धब्‍बे वाली जगहों पर लगाइए, लगभग 20 मिनट बाद चेहरे को ठंडे पानी से धो लीजिए। सकारात्‍मक परिणाम पाने के लिए इस क्रिया को नियमित रूप से एक-दो महीने प्रयोग कीजिए।

चेहरे से धब्‍बे हटाने के लिए इन उपायों को अपनाने के अलावा धूप में टहलना कम कीजिए, ज्‍यादा मात्रा में पानी पीजिए, नियमित योग और व्‍यायाम कीजिए। धूप में बाहर जाने से पहले अच्‍छी क्‍वालिटी की सनस्‍क्रीम का प्रयोग अवश्‍य करें। इसके अलावा भी आपके धब्‍बे नही हट रहे हों तो एक बार चिकित्‍सक से संपर्क अवश्‍य कीजिए।

2016-06-28

त्रिफला आयुर्वेद की महान औषधि



त्रिफला आयुर्वेद में कई रोगों का सटीक इलाज करता है। यह 3 औषधियों से बनता है। बेहड, आंवला और हरड इन तीनों के मिश्रण से बना चूर्ण त्रिफला कहा जाता है। ये प्रकृति का इंसान के लिए रोगनाशक और आरोग्य देने वाली महत्वपूर्ण दवाई है। जिसके बारे में हर इंसान को पता होना चाहिए। ये एक तरह की एन्टिबायोटिक है। त्रिफला आपको किसी भी आयुर्वेदिक दुकान पर मिल सकता है। लेकिन आपको त्रिफला का सेवन कैसे करना है और कितनी मात्रा में करना है ये भी आपको पता होना चाहिए। हाल में हुए एक नए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है की त्रिफला के सेवन से कैंसर के सेल नहीं बढ़ते । त्रिफला के नियमित सेवन से चर्म रोग, मूत्र रोग और सिर से संबन्धित बीमारियां जड़ से ख़त्म करती है।
 *संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को ह्रदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती। यह कोई 20 प्रकार के प्रमेह, विविध कुष्ठरोग, विषमज्वर व सूजन को नष्ट करता है। अस्थि, केश, दाँत व पाचन- संसथान को बलवान बनाता है। इसका नियमित सेवन शरीर को निरामय, सक्षम व फुर्तीला बनाता है।  गर्म पानी से सोते समय एक चम्मच लेने से क़ब्ज़ नही रहता!त्रिफला के फायदे-





*.रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होती है।
*.त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होती है।
*इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।
सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी लें। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंगे।
*शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।
*एक चम्मच बारीक़ त्रिफला चूर्ण, गाय का घी 10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते हैं। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।
*त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते हैं।
त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।



*चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए।
*एक चम्मच त्रिफला को एक गिलास ताजे पानी में दो- तीन घंटे के लिए भिगो दे, इस पानी को घूंट भर मुंह में थोड़ी देर के लिए डाल कर अच्छे से कई बार घुमाये और इसे निकाल दे। कभी कभार त्रिफला चूर्ण से मंजन भी करें इससे मुँह आने की बीमारी, मुंह के छाले ठीक होंगे, अरूचि मिटेगी और मुख की दुर्गन्ध भी दूर होगी।
*त्रिफला, हल्दी, चिरायता, नीम के भीतर की छाल और गिलोय इन सबको मिला कर मिश्रण को आधा किलो पानी में जब तक पकाएँ कि पानी आधा रह जाए और इसे छानकर कुछ दिन तक सुबह शाम गुड या शक्कर के साथ सेवन करने से सिर दर्द कि समस्या दूर हो जाती है।
*त्रिफला एंटिसेप्टिक की तरह से भी काम करता है। इस का काढ़ा बनाकर घाव धोने से घाव जल्दी भर जाते है।
*त्रिफला पाचन और भूख को बढ़ाने वाला और लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने वाला है।
*मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले। त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।
*त्रिफला का सेवन मूत्र-संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में बहुत लाभकारी है। प्रमेह आदि में शहद के साथ त्रिफला लेने से अत्यंत लाभ होता है।
*त्रिफला की राख शहद में मिलाकर गरमी से हुए त्वचा के चकतों पर लगाने से राहत मिलती है।
*5 ग्राम त्रिफला पानी के साथ लेने से जीर्ण ज्वर के रोग ठीक होते है।
*5 ग्राम त्रिफला चूर्ण गोमूत्र या शहद के साथ एक माह तक लेने से कामला रोग मिट जाता है।
*टॉन्सिल्स के रोगी त्रिफला के पानी से बार-बार गरारे करवायें।
त्रिफला दुर्बलता का नास करता है और स्मृति को बढाता है। दुर्बलता का नास करने के लिए हरड़, बहेडा, आँवला, घी और शक्कर मिला कर खाना चाहिए।
*त्रिफला, तिल का तेल और शहद समान मात्रा में मिलाकर इस मिश्रण कि 10 ग्राम मात्रा हर रोज गुनगुने पानी के साथ लेने से पेट, मासिक धर्म और दमे की तकलीफे दूर होती है इसे महीने भर लेने से शरीर का सुद्धिकरन हो जाता है और यदि 3 महीने तक नियमित सेवन करने से चेहरे पर कांती आ जाती है।



*त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।
*डेढ़ माह तक इस रसायन का सेवन करने से स्मृति, बुद्धि, बल व वीर्य में वृद्धि होती है।

त्रिफला के नुकसान-
यदि आप त्रिफला का प्रयोग बिना डाक्टर के परामर्श के करते हैं तो इससे डायरिया हो सकता है। क्योंकि यह शरीर में पानी की कमी करता है। और इंसान को डायरिया हो जाता है।
ब्लड प्रेशर-
त्रिफला का अधिक सेवन से ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव होने लगता है। और ब्लड प्रेशर के मरीजों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
कई बार कुछ लोग पेट साफ करने के लिए त्रिफला का सेवन करने लगते हैं लेकिन ऐसे में वे नियमित रूप से त्रिफला का सेवन करने लगते हैं जिस वजह से उन्हें अनिद्रा  और बेचैनी की समस्या हो सकती है।
*इसमें कोइे दो राय नहीं है कि त्रिफला सेहत के लिए बेहद असरकारी और फायदेमंद दवा है। 

2016-06-23

माईग्रेन (आधासीसी ) के दर्द की सरल चिकित्सा migraine home remedies




माईग्रेन (अर्धावभेदक-आधासीसी) क्या है?
सिरदर्द एक आम रोग है और प्रत्येक व्यक्ति को कभी न कभी इसे मेहसूस करता ही है।इस रोग के विशेषग्य इसके कारण के मामले में एकमत न होकर अलग-अलग राय रखते हैं। सभी की राय है कि माईग्रेन के विषय में और अनुसंधान की आवश्यकता है। अभी तक माईग्रेन की तीव्रता का कोइ वैज्ञानिक  माप नहीं है।

माईग्रेन एक रक्त परिसंचरण (vascular) तंत्र की व्याधि है। मस्तिष्क की रुधिर वाहिकाओं का आकार बढ जाने से याने खून की नलिकाएं फ़ैल जाने से इस रोग का संबंध माना जाता है। इन रुधिर वाहिकाओं पर नाडियां(नर्व्ज) लिपटी हुई होती हैं। जब रक्त वाहिकाएं फ़ैलकर आकार में बढती हैं तो नाडियों पर तनाव बढता है और फ़लस्वरूप नाडियां एक प्रकार का केमिकल निकालती हैं, जिससे दर्द और सूजन पैदा होते हैं, यही माईग्रेन है।

माईग्रेन अक्सर हमारे सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इस नाडीमंडल की अति सक्रियता से आंतों में व्यवधान होकर अतिसार, वमन भी शिरोवेदना के साथ होने लगते हैं। इससे आमाशय स्थित भोजन भी देरी से आंतों में पहुंचता है। माईग्रेन की मुख मार्ग से ली गई दवा भी भली प्रकार अंगीकृत नहीं हो पाती है। प्रकाश और ध्वनि के प्रति असहनशीलता पैदा हो जाती है। रक्त परिवहन धीमा पडने से चर्म पीला पड जाता है और हाथ एवं पैर ठंडे मेहसूस होते हैं।

 

माईग्रेन का सिरदर्द गर्मी, मानसिक तनाव, अपर्याप्त नींद से बढ जाता है। करीब 70 प्रतिशत माईग्रेन रोगियों का पारिवारिक इतिहास देखें तो उनके नजदीकी रिश्तेदारों में इस रोग की मौजूदगी मिलती है। पुरुषों की बनिस्बत औरतों में यह रोग ज्यादा होता है। इस रोग को आधाशीशी भी कहते हैं ।यह ज्यादातर सिर के बांये अथवा दाहिने भाग में होता है। कभी-कभी यह दर्द ललाट और आंखों पर स्थिर हो जाता है। सिर के पिछले भाग में गर्दन तक भी माईग्रेन का दर्द मेहसूस होता है। माईग्रेन का सिरदर्द 4 घंटे से लेकर 3-4 दिन की अवधि तक बना रह सकता है। बहुत से माईग्रेने रोगियों में सिर के दोनों तरफ़ दर्द पाया जाता है। माईग्रेन एक बार बांयीं तरफ़ होगा तो दूसरी बार दांये भाग में हो सकता है। माईग्रेन का दर्द सुबह उठते ही प्रारंभ हो जाता है और सूरज के चढने के साथ रोग भी बढता जाता है। दोपहर बाद दर्द में कमी हो जाती है। ऐसा देखने में आया है कि 60 साल की उम्र के बाद यह रोग हमला नहीं करता है।

इस रोग के इलाज में माडर्न दवाएं ज्यादा सफ़ल नहीं हैं। साईड ईफ़ेक्ट ज्यादा होते हैं। निम्नलिखित उपाय निरापद और कारगर हैं--

1) बादाम 10-12 नग प्रतिदिन खाएं। यह माईग्रेन का बढिया उपचार है।

2) बन्द गोभी को कुचलकर एक सूती कपडे में बिछाकर मस्तक (ललाट) पर बांधें। रात को सोते वक्त या दिन में भी सुविधानुसार कर सकते हैं। जब गोभी का पेस्ट सूखने लगे तो नया पेस्ट बनाककर पट्टी बांधें। मेरे अनुभव में यह माईग्रेन का सफ़ल उपाय हैं।

3) अंगूर का रस 200 मिलि सुबह-शाम पीयें। बेहद कारगर नुस्खा है।

4) नींबू के छिलके कूट कर पेस्ट बनालें। इसे ललाट पर बांधें । जरूर फ़ायदा होगा।

5) गाजर का रस और पालक का रस दोनों करीब 300 मिलि पीयें आधाशीशी में गुणकारी है।

6) गरम जलेबी 200 ग्राम नित्य सुबह खाने से भी कुछ रोगियों को लाभ हुआ है।

7) आधा चम्मच सरसों के बीज का पावडर 3 चम्मच पानी में घोलक्रर नाक में रखें । माईग्रेन का सिरदर्द कम हो जाता है।





7) सिर को कपडे से मजबूती से बांधें। इससे खोपडी में रक्त का प्रवाह कम होकर सिरदर्द से राहत मिल जाती है।

8) माईग्रेन रोगी देर से पचने वाला और मसालेदार भोजन न करें।

9) विटामिन बी काम्प्लेक्स का एक घटक नियासीन है। यह विटामिन आधाशीशी रोग में उपकारी है। 100 मिलि ग्राम की मात्रा में रोज लेते रहें।

10) तनाव मुक्त जीवन शैली अपनाएं।

11) हरी सब्जियों और फ़लों को अपने भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।

माईग्रेन के उपाय -




  माईग्रेन के उपचार का विडियो-

मधुमेह (डायबिटीज)की सरल चिकित्सा How to fight against diabities.

डायबिटीज (मधुमेह) की सरल चिकित्सा.. how to fight against diabeties?

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  अनुवाद द्वारा पॉवर्ड

                                                                                              

मधुमेह रोग में खून में शर्करा स्तर बढ जाता है| भारत में शुगर रोगियों की संख्या में बडी तेजी से वृद्धि देखने में आ रही है।इस रोग का कारण प्रमुख रूप से इन्सूलिन हार्मोन की है।की गड्बडी को माना जाता है।तनाव और अनियंत्रित जीवन शैली से इस रोग को बढावा मिलता है |

डायबिटीज के कारण
1. व्यायाम का अभाव
2. मानसिक तनाव
3. अत्यधिक नींद
4. मोटापा
5. चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट के अत्यधिक सेवन
6. वंशानुगत कारक
लक्षण-मधुमेह होने के कई लक्षण रोगी को स्वयं अनुभव होते हैं।
1. बार-बार रात के समय पेशाब आते रहना।
2. आंखों से धुंधला दिखना।
3. थकान और कमजोरी महसूस करना।
4. पैरों का सुन्न होना।
5. प्यास अधिक लगना।
 



6. घाव भरने में समय लगना।
7. हमेशा भूख महसूस करना।
8. वजन कम होना।
9. त्वचा में होना।
10. मूत्र बार-बार एवं अधिक मात्रा में होना तथा मूत्र त्यागने के स्थान पर मूत्र की मिठास के कारण चीटियां लगना।
11. शरीर में फोड़े-फुंसी होने पर उसका घाव जल्दी न भरना।
12. शरीर पर फोड़े-फुंसियां बार-बार निकलना।
13. शरीर में निरन्तर खुजली रहना एवं दूरस्थ अंगों का सुन्न पड़ना।
इस लेख में मैं कुछ घरेलू सरल उपचार प्रस्तुत कर रहा हूं जो इस रोग को नियन्त्रित करने मे कारगर साबित हुए हैं।
१) मधुमेह रोग नाशक निम्न उपचार आशातीत हितकारी सिद्ध हुआ है।-
घटक सामग्री:- गेहूं का आटा १०० ग्राम, जौ का आटा १०० ग्राम,कलौंजी (पिसी हुई) १०० ग्राम, बबूल या अन्य वृक्ष का गौंद १०० ग्राम बारीक किया हुआ|
चारों घटक पदार्थ डेढ लिटर पानी में डालकर लगभग १० मिनिट उबालें। फ़िर आंच से उतारकर स्वत: ठंडा होने दें। दवा तैयार है। किसी साफ़ बोतल में भरकर रखें।
प्रयोग विधि:- रोज सुबह करीब १०० मिलि दवा खाली पेट सात दिन तक लें। दवा लेने के बाद एक घंटे तक कुछ न खाएं। बाद में याने अगले हफ़्ते एक दिन छोडकर दवा ४ बार और लेना है। ईलाज कम्पलीट है। शुगर की जांच करालें।
2) आंवला और हल्दी का चूर्ण बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम ५ ग्राम की मात्रा में पानी के साथ लें। बढे हुए रोग में भी अच्छे परिणाम मिलते हैं।
3) मैथी के बीज ५ ग्राम रात भर पानी में भिगो दें ,फ़िर मिक्सर में चलाकर छानकर पियें। अवश्य लाभ होगा।
4) करेला का ५० ग्राम रस नित्य पीना अति गुणकारी माना गया है।




5)  दाल चीनी ४० ग्राम एक लिटर पानी में रात भर भिगो दें , फ़िर मिक्सर में चलाकर छानकर दिन में पियें। यह नुस्खा शुगर कम करने की महौषधि है। जरूर आजमाएं।



6)  जामुन के ताजा ५ पत्ते पानी में पीसकर छानकर सुबह-शाम पीने से मधुमेह में बेहद फ़ायदा होता है।
7)  तुलसी,नीम और बेल के सूखे पत्ते बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बनालें और शीशी में भर लें  यह चूर्ण ५ ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम पानी के साथ लेने से अधिकांश रोगियों को लाभ मिलता है।
8)   पके टमाटर का रस नियमित लेने से मधुमेह में लाभ होताहै।
9)  सोयाबीन,जौ और चने के मिश्रित आटे की रोटी खावें,इससे शुगर का स्तर कम करने में काफ़ी मदद मिलती है।
10)  मांस और वसायुक्त भोजन हानिकारक है।

11)  प्रतिदिन २४ घन्टे में ३-४ लिटर पानी पीने की आदत डालें।
12) हरी सब्जीयां,फ़ल और रेशे वाली चीजें भोजन में प्रचुर मात्रा में लें। शकर, मीठे फ़ल से परहेज करें।
१३)  गरम पानी भरे बर्तन में १०-१५ आम के पत्ते डाल कर   रात भर  रखें  सुबह छानकर  पियें\  मधुमेह का कारगर नुस्खा है|
१४) आकडा (मदार) के पत्ते से शूगर की चिकित्सा-

इस पौधे की पत्ती को उल्टा ( उल्टा का मतलब पत्ते का खुरदरा भाग )
कर के पैर के तलवे से सटा कर मोजा पहन लें !
ऐसा सुबह करें और पूरा दिन रहने दे रात में सोते समय निकाल दें !
एक सप्ताह में आपका शुगर सामान्य् हो जायेगा !
बाहर निकला पेट भी कम हो जाता है !
ये पेड़ हर जगह मिलता है और इसकी कई जातीय है जो भी मिले ले लें
और हा एक बात पर ध्यान दे इसका दूध आँख में ना जाये नहीं तो आप की आखे खराब हो सकती है और २ पत्ते से ज्यादा न ले| मदार एक अनमोल पेड़ है|
१५) अपनी आयु के हिसाब से २ से ४ किलोमिटर नित्य घूमना जरूरी है।