2017-02-26

कटसरैया ( पियाबासा )जड़ी बुटी के गुण, उपयोग



 इसे कोरांटी या काटा कोरांटी भी कहते है.
यह अनेक रंगों में जैसे सफ़ेद , लाल , बैंगनी , पीला आदि में मिलता है.
इसे गमले में लगाने पर भी यह बहुत सुन्दर लगता है. यह आपके घर की शोभा को तो बढ़ाएगा ही साथ ही स्वास्थ्य भी देगा.
*दांतों और मसुढ़ों के लिए इसके पत्तों के साथ उबाले पानी से गरारे करें.
* दांतों में किसी भी तरह की समस्या के लिए इसके पत्तों को खूब चबा चबा कर या तो निगल ले या बाहर निकाल दें. इससे हिलते हुए दांत भी मज़बूत हो जाते है, दर्द मिट जाता है.
 

*गर्भवती नारियों को इसके जड़ के रस में दालचीनी, पिप्पली, लौंग का २-२ ग्राम चूर्ण और एक चौथाई ग्राम केसर मिलाकर खिलाने से अनेक रोगों और कष्टों से मुक्ति मिलती है, तन स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है, पैर सूजना, जी मिचलाना, मन खराब रहना, लीवर खराब हो जाना, खून की कमी, ब्लड प्रेशर, आदि तमामतर कष्ट दूर ही रहते हैं. बस सप्ताह में दो बार पी लिया करें.
*कुष्ठ रोग में इसके पत्तो का चटनी जैसा लेप बनाकर लगा लीजिये.
*मुंह में छले पड़े हों या दाँत में दर्द होता हो या दाँत में से खून आ रहा हो या मसूढ़े में सूजन /दर्द हो तो बस इसके पत्ते चबा लीजिये,उसका रस कुछ देर तक मुंह में रहने दीजिये फिर चाहें तो निगल लें, चाहें तो बाहर उगल दें. कटसरैया की दातुन भी कर सकते हैं.
*चेहरे पर रगड़ कर लगा कर सो जाएं, चार दिनों में ही असर दिखाई देगा. मुंहासे वाली फुंसियां भी इससे नष्ट होती हैं.
*शरीर में कहीं सूजन हो तो पूरे पौधे को मसल कर रस निकाल लीजिये और उसी रस का प्रयोग सूजन वाले स्थान पर बार-बार कीजिये.
 
*पत्तो का रस पीने से बुखार नष्ट होता है, पेट का दर्द भी ठीक हो जाता है. रस २५ ग्राम लीजियेगा .
*घाव पर पत्ते पीस कर लेप कीजिये. पत्तो की राख को देशी घी में मिलाकर जख्मों में भर देने से जख्म जल्दी भर जाते हैं,कीड़े भी नहीं पड़ते और दर्द भी नही होता.
* मुंह की दुर्गन्ध और कम या ज़्यादा लार की समस्या के लिए एक दो पत्तियां और अकरकरा का आधा फूल चबाएं इससे मुख शुद्धि हो जाती है.
*पीयाबासे का एक दो चम्मच रस और चुटकी भर सौंठ लेने से दस्त , खुनी दस्त भी रुक जाते है.
* खांसी विशेषकर सूखी खांसी में इसके पत्तों का क्वाथ लें. बच्चों को इसके पत्तों का २-३ चम्मच रस शहद के साथ पिला दें.
*सब कुछ सामान्य होने पर भी गर्भधारण ना हो पाने पर इसके १० ग्रा. पंचांग को गाय के दूध के साथ लेने से स्त्री पुरुष दोनों को लाभ होता है.
* इसके पत्तों का लेप सुजन , दर्द , दाद - खुजली आदि को दूर करता है.
दूसरा पीले फूलों वाला पौधा या झाडी होती है, इसकी ऊँचाई चार फिट के अन्दर ही देखी गई है. इसका एक नाम कटसरैया भी है. कहीं-कहीं पियावासा भी बोलते हैं. ये झाड़ियाँ कंटीली होती हैं. इसके पत्ते भी ऊपर वाले वासा से मिलते जुलते होते हैं. किन्तु इस पौधे के पत्ते और जड़ ही औषधीय उपयोग में लिए जाते हैं.
इसमें पोटेशियम की अधिकता होती है इसी कारण यह औषधि दाँत के रोगियों के लिए और गर्भवती नारियों के लिए अमृत मानी गयी है.

2017-02-23

डायस्टोलिक हृदय विफलता

   डायस्टोलिक हृदय विफलता तब होता है जब बांया वेंट्रिकल मे पूरी तरह से रक्त नहीं भर पाता और हृदय से शरीर में रक्त की पम्पिंग कम हो जाती है।
हृदय पर प्रभाव
   डायस्टोलिक, हृदय की एक ऐसी स्थिति है, जब हृदय आराम की स्थिति में होता है और रक्त से भर रहा होता है। वहीं जब डायस्टोलिक शिथिलता की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, तो उसमें हृदय सहज नहीं हो पाता और आराम नहीं कर पाता। नतीजा यह होता है कि वेंट्रिकल में रक्त नहीं भर पाता और इसी कारण आगे उचित मात्रा में रक्त भी नहीं पहुंच पाता। यदि डायस्टोलिक शिथिलता अत्यधिक मात्रा में बढ़ जाती है तो इसका नतीजा हृदय विफलता होता है।डायस्टोलिक हृदय विफलता तब होता है, जब बाएं वेंट्रिकल की पेशी कठोर या मोटी हो जाती है। इसके कारण हृदय को रक्त को वेंट्रिकल में भरने के लिए और ज्यादा ताकत लगानी पड़ती है। धीरे-धीरे यह स्थिति और ज्यादा बढ़ती जाती है, दायें वेंट्रिकल समेत फेफड़ों में रक्त इकठ्ठा होता चला जाता है जिसके कारण वेंट्रिक और फेफड़ों में तरल पदार्थ की भीड़ सी हो जाती है और इसका सीधा नतीजा हृदय विफलता होता है। हो सकता है कि डायस्टोलिक हृदय घात से इंजेक्शन फ्रैक्शन में कमी न आए। इंजेक्शन फ्रैक्शन उस पैमाने को कहा जाता है जिसमें हृदय के सामान्य तौर पर पम्पिंग करने या न करने की जांच की जाती है। सिस्टोलिक हृदयघात वाले लोगों में यह इंजेक्शन फ्रैक्शन कम होता है। हो सकता है कि सिस्टोलिक हृदय घात के दौरान बांया वेंट्रिकल ठीक से पम्प करें। लेकिन डायस्टोलिक की स्थिति में यह ठीक से काम नहीं करता। कारण
  डायस्टोलिक हृदय विफलता का सबसे सामान्य कारण उम्र का बढ़ना होता है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे वैसे हृदय की मांशपेशियां कठोर होना शुरू हो जाती हैं। जिसके कारण हृदय पूरी तरह से रक्त नही भर पाता और इसका नतीजा डायस्टोलिक हृदय विफलता होता है। लेकिन उम्र बढ़ने के अलावा और भी ऐसे कई कारण होते हैं जिनके कारण दांया वेंट्रिकल पूरी तरह से रक्त नहीं भर पाता।
हृदय विफलता के लिए कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स कैसे काम करती हैं ये दवाएं
कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, हृदय की दर को धीमी और रक्तचाप को कम करता है । हृदय की मांशपेशियों के संकुचन से, हृदय रक्त पंप करता है जिससे विद्युत संवेग उत्पन होते है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, इन विद्युत संवेग को ब्लॉक करके हृदय की दर को कम करता है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, रक्त वाहिकाओं की मांसपेशियों के ऊतकों को शिथिल करके रक्तचाप को कम करता है । इससे रक्त आसानी से वाहिकाओं में प्रवाहित होता है।
 
क्यों प्रयोग की जाती हैं ये दवाएं
   कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, डायस्टोलिक हृदय विफलता के इलाज में इस्तेमाल किया जाता है।डायस्टोलिक के चरण में, जब हृदय के निचले बायें कक्ष में पूरी तरह से रक्त न भरा हो तो डायस्टोलिक हृदय विफलता होती है। डायस्टोल, हृदय की दर का एक ऐसा चरण होता है जब हृदय शिथिल अवस्था में है और उसमे पूरी तरह रक्त भरा है।
कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स हृदय की दर और रक्तचाप को कम करके ह्रदय में अधिक आसानी से रक्त भरता हैं। जब हृदय की दर कम होती है तो हृदय में रक्त भरने के लिए ज्यादा समय मिल जाता है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, हृदय की मांसपेशियों को शिथिल करके, रक्त भरने में सहायता करता है। निम्न रक्तचाप, डायस्टोलिक हृदय विफलता के इलाज में मदद करता है क्योकि हृदय को रक्त पंप करने में ज्यादा कठिनाई नहीं होती है।
कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, सिस्टोलिक हृदय विफलता के लिए इस्तेमाल नहीं की जाती हैं क्योकि इसमें हृदय पर्याप्त बल के साथ रक्त को पंप नहीं कर पता है।
कितनी अच्छी तरह से काम करती हैं ये दवाएं
कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स, डायस्टोलिक हृदय विफलता के लक्षणों को कम करने में मदद करता हैं। यह अन्य स्वास्थ्य समस्याओं के इलाज में भी प्रयोग होता है जैसे उच्च रक्तचाप।
दुष्प्रभाव
सभी दवाओं के साइड इफेक्ट होते है। लेकिन कई लोगों को दुष्प्रभाव महसूस नहीं होता है या उनका शरीर उस दुष्प्रभाव को झेलने में सक्षम होता है। प्रत्येक दवा जो आप ले रहे है उसके साइड इफेक्ट के बारे में फार्मासिस्ट से पूछें। दवा के साथ मिलने वाली जानकारी में भी साइड इफेक्ट सूचीबद्ध होते हैं, जिनसे आपको उस दवा से होने वाले साइडइफ़ेक्ट के बारे में पता चल सकता हैं।
यहाँ कुछ ध्यान देने योग्य महत्वपूर्ण बातें हैं –
आमतौर पर दवा का लाभ, किसी भी मामूली दुष्प्रभाव से अधिक महत्वपूर्ण होता हैं। कुछ दिनों के लिए दवा लेने से दुष्प्रभाव को दूर किया जा सकता हैं।
 
अगर दुष्प्रभाव से आपको बहुत परेशानी हो रही हैं और आप अपनी दवा आगे जारी रखना चाहते है तो अपने डॉक्टर से सलाह लें। वह आपकी खुराक कम या आपकी दवा को बदल सकता है। अचानक से अपनी दवा ना छोड़े जब तक की आपके डॉक्टर आपको ऐसा करने के लिए ना कहें।
कब आपातकालीन सेवाओं को कॉल करें –अगर-
साँस लेने में तकलीफ़।
चेहरे, होंठ, जीभ, या गले में सूजन।
अगर आपको लगे की हृदय विफलता, बदतर हो रही है तो तुरंत अपने डॉक्टर को बुलाएं। हृदय विफलता के बदतर होने के लक्षण हैं –
पैरों के नीचे के भागों , टखनों, या पैर में सूजन।
और अधिक सांस की तकलीफ।
अचानक वजन बढ़ाना।
अपने डॉक्टर को बुलायें अगर आपको लगे कि –
खराश
इन दवाओं के दुष्प्रभाव हैं –
हृदय की दर कम होना।
कब्ज या दस्त।चक्कर आना या हल्कापन लगना।
निस्तब्धता या गरमाहट महसूस होना।
ठीक से दवाइयाँ लें
दवाइयाँ, आपके इलाज के लिए एक महत्वपूर्ण तरीका होता है जिसे आपका चिकित्सक आपके स्वास्थ्य में सुधार और भविष्य की समस्याओं को रोकने के लिए प्रयोग करता हैं।अगर आप ठीक ढंग से अपनी दवाएं नहीं लेते हैं, तो आप अपने स्वास्थ को जोखिम में (और शायद अपने जीवन को भी ) डालते हैं।
 
कई वजहों से लोगों को दवाइयाँ लेने में परेशानी होती हैं। लेकिन ज्यादातर मामलों में, आप कुछ तरीको के द्वारा अपनी समस्याओं को दूर कर सकते है और डॉक्टर द्वारा दिए निर्देशों का पालन करके अपने इलाज को कारगार बना सकते है।
महिलाओं के लिए सुझाव
अगर आप गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं या गर्भधारण की कोशिश कर रही है, तो बिना अपने डॉक्टर के सलाह के, किसी भी दवाई का प्रयोग ना करें । कुछ दवायें आपके बच्चे को नुकसान पहुँचा सकती हैं, जैसे कुछ डॉक्टर द्वारा बताई हुईं दवायें , विटामिन की गोलियाँ, जड़ी बूटी, और पूरक आहार । यह सबसे ज्यादा जरूरी है की आप अपने डॉक्टर को यह बता दें की आप गर्भवती हैं, स्तनपान करा रही हैं या गर्भधारण की कोशिश कर रही है।
डॉक्टर से जाँच कराते रहें
अगर आप को सिस्टोलिक हृदय विफलता है और आप कैल्शियम चैनल ब्लॉकर ले रहे है तो डॉक्टर से जाँच करायें। कभी कभी इन दवाओं के कारण हृदय विफलता बदतर हो सकती है क्योकि इसमें हृदय पर्याप्त बल के साथ रक्त को पंप नहीं कर पता है। नियमित जाँच और अनुवर्ती देखभाल अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं।
अनुवर्ती देखभाल इलाज और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। नियमित रूप से डॉक्टर के पास अपनी जाँच के लिए जाएं और अगर कभी कोई समस्या लगे तो तुरंत अपने डॉक्टर से बात करें। अपने परीक्षण के परिणाम को जानने का, यह एक अच्छा तरीका हो सकता है। जो भी दवाइयाँ आप ले रहे है उनकी एक सूची बना कर रखें, तो यह आपकी सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।
उदाहरण
सामान्य नाम
ब्रांड नाम
amlodipine
Norvasc
diltiazem
Cardizem, Dilacor, Taztia, Tiazac
felodipine
nifedipine
Procardia
nisoldipine
Sular
verapamil
Calan, Verelan


2017-02-21

गुग्गुल के लाभ औषधीय प्रयोग


  कई तरह की बीमारियों को खत्म करने की सबसे बेहतर और कारगर औषघि है गुग्गुल। यह एक पेड़ की प्रजाती है। जिसके छाल से जो गोंद निकलता है उसे गुग्गुल कहा जाता है। इस गोंद के इस्तेमाल से आप कई तरह की बीमारियों से बच सकते हो। गुग्गुल एक तरह का छोटा पेड है इसकी कुल उंचाई 3 से 4 मीटर तक होती है। और इसके तने से सफेद रंग का दूध निकलता है जो सेहत के लिए बेहद उपयोगी होता है।गुग्गल एक वृक्ष है। गुग्गल ब्रूसेरेसी कुल का एक बहुशाकीय झाड़ीनुमा पौधा है। अग्रेंजी में इसे इण्डियन बेदेलिया भी कहते हैं। रेजिन का रंग हल्का पीला होता है परन्तु शुद्ध रेजिन पारदर्शी होता है। यह पेड़ पूरे भारत के सूखे क्षेत्रों में पाया जाता है। यह पौधा छोटा होता है एवं शीतकाल और गीष्मकाल में धीमी गति से बढ़ता है। इसके विकास के लिए वर्षा ऋतु उत्तम रहती है। इस पेड़ के गोंद को गुग्गुलु, गम गुग्गुलु या गुग्गल के नाम से जाना जाता है। गोंद को पेड़ के तने से चीरा लगा के निकाला जाता है। गुग्गुलु सुगंधित पीले-सुनहरे रंग का जमा हुआ लेटेक्स होता है। अधिक कटाई होने से यह आसानी से प्राप्त नहीं होता है। आयुर्वेद में दवा की तरह नए गोंद का ही प्रयोग होता है।
    गुग्‍गुल दिखने में काले और लाल रंग का होता है जिसका स्‍वाद कणुआ होता है। इसकी प्रवृत्‍ति गर्म होती है। इसके प्रयोग से आप पेट की गैस, सूजन, दर्द, पथरी, बवासीर पुरानी खांसी, यौन शक्‍ति में बढौत्‍तरी, दमा, जोडों का दर्द, फेफड़े की सूजन आदि रोगों को दूर कर सकते हैं।
    सुश्रुत संहिता, में गुग्गुलु का प्रयोग मेद रोग के उपचार (उच्च रक्त कोलेस्ट्रॉल, धमनियों का सख्त होना) के लिए निर्धारित किया गया है। यह वसा के स्तर को सामान्य रखने और शरीर में सूजन कम करने में लाभकारी है। इससे प्राप्त राल जैसे पदार्थ को भी ‘गुग्गल’ कहा जाता है। इसमें मीठी महक रहती है। इसको अग्नि में डालने पर स्थान सुंगध से भर जाता है। इसलिये इसका धूप में उपयोग किया जाता है। यह कटुतिक्त तथा उष्ण है और कफ, बात, कास, कृमि, क्लेद, शोथ और अर्शनाशक है।मुंह स्‍वास्‍थ्‍य के लिए बेहद उपयोगी
मुंह से संबंधित किसी भी प्रकार की समस्‍या में गुग्‍गुल का सेवन करना अच्‍छा रहता है। गुग्गुल को मुंह में रखने से या गर्म पानी में घोलकर दिन में 3 से 4 बार इससे कुल्ला व गरारे करने से मुंह के अन्दर के घाव, छाले व जलन ठीक हो जाते हैं।
  * थायराइड से छुटकारा 
यह थायराइड ग्रंथि के कार्य में सुधार करता है, शरीर में वसा को जलाने की गतिविधियों को बढ़ाता है और गर्मी की उत्‍पत्‍ति करता है।
 
*जोड़ों के दर्द में लाभकारी 
जब जोड़ों में विषाक्त अवशेषों का जमाव हो जाता है और उसकी वजह से जोड़ों में दर्द होने लगता है, तब गुग्‍गुल का सेवन करने से लाभ मिलता है। यह जोड़ों से उन अवशेषों को निकाल देता है और साथ ही जोड़ों के मूवमेंट को ठीक भी करता है।
*हड्डियों से जुड़ी समस्‍याओं का समाधान करें
हड्डियों में किसी भी प्रकार की परेशानी में गुग्गुल बहुत उपयोगी होता है। हड्डियों में सूजन, चोट के बाद होने वाले दर्द और टूटी हड्डियों को जोड़ने एवं रक्त के जमाव को दूर करने में बहुत लाभकारी होती है।
*कब्‍ज की शिकायत दूर करें
अगर आपको कब्‍ज की शिकायत रहती हैं तो आपके लिए गुग्‍गुल का चूर्ण फायदेमंद हो सकता है। इसके लिए लगभग 5 ग्राम गुग्गुल में सामान मात्रा में त्रिफला चूर्ण को मिलाकर रात में हल्का गर्म पानी के साथ सेवन करने से लम्बे समय से बनी हुई कब्ज की शिकायत दूर हो जाती है तथा शरीर में होने वाले सूजन भी दूर हो जाते हैं।
*कोलेस्‍ट्रॉल में सुधार यह कोलेस्‍ट्रॉल और ट्राइग्लिसराइड्स को कम करता है। यह तीन महीने में 30% तक कोलेस्‍ट्रॉल घटा सकता है।
*गर्भाशय में करें इसका गुड़ के साथ सेवन
गर्भाशय से जुड़ें रोगों के लिए गुग्‍गुल का सेवन बहुत फायदेमंद होता है। इसके लिए गुग्गुल को सुबह-शाम गुड़ के साथ सेवन करने से कई प्रकार के गर्भाशय के रोग ठीक हो जाते हैं। अगर रोग बहुत जटिल है तो 4 से 6 घंटे के अन्तर पर इसका सेवन करते रहना चाहिए।
दिल के लिये फायदेमंद यह खून में प्‍लेटलेट्स को चिपकने से रोकता है तथा दिल की बीमारी और स्‍ट्रोक से बचाता है|
*दर्द और सूजन से राहत दें
गुग्‍गुल में मौजूद इन्फ्लमेशन गुण दर्द और सूजन में राहत देने में मदद करता है। इसके अलावा यह शरीर के तंत्रिका तंत्र को मजबूत बनाने में भी बहुत मदद करता है।
त्‍वचा की समस्‍याओं में फायदेमंद गुग्‍गुल
 
खून की खराबी के कारण शरीर में होने वाले फोड़े, फुंसी व चकत्ते आदि के कारण गुग्‍गुल बहुत लाभकारी होता है। क्‍योंकि इसके सेवन से खून साफ होता है। त्‍वचा संबंधी समस्‍या होने पर इसके चूर्ण को सुबह-शाम गुनगुने पानी के साथ लें।
आमतौर पर उल्‍टा-सीधा या अधिक मिर्च मसाले युक्त आहार लेने से अम्‍लपित्त यानि खट्टी डकारों की समस्‍या हो जाती है। इस समस्‍या से बचने के लिए आप गुग्‍गुल का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए 1 चम्मच गुग्गुल का चूर्ण एक कप पानी में मिलाकर रख दें। लगभग एक घंटे के बाद छान लें। भोजन के बाद दोनों समय इस मिश्रण का सेवन करने से अम्लपित्त की समस्‍या से छुटकारा मिल जाता है।
मोटापा दूर करे 
इसके प्रयोग से शरीर का मेटाबॉलिज्‍म तेज होता है और मोटापा दूर होता है। इसके साथ ही अगर गैस बनने की बीमारी है तो वह भी ठीक हो जाती है।
*. फोड़ा-फुन्सी
फोड़ा-फुन्सी में जब सड़न और पीव हो, तो त्रिफला के काढ़े के साथ 4 रत्ती गुग्गुल लेना चाहिए। अथवा सायं 5 तोला पानी में त्रिफलाचूर्ण 6 माशा भिगोकर प्रात: गर्म कर छानकर पीने से लाभ होता है।
*घुटने का दर्द
घुटने के दर्द को दूर करने के लिए 20 ग्राम गुड़ में 10 ग्राम गुग्गुल को मिलाकर अच्छे से पीस लें और इसकी छोटी-छोटी गोलियां बना लें। कुछ दिनों तक 1-1 गोली सुबह शाम घी के साथ लें।
*गंजापन दूर करें
आधुनिक जीवनशैली और गलत खान-पान के कारण आजकल बढ़ी उम्र के लोग हीं नहीं बल्कि युवा भी गंजेपन का शिकार हो रहे हैं। अगर आपकी भी यहीं समस्‍या हैं तो आप गुग्गुल को सिरके में मिलाकर सुबह-शाम नियमित रूप से सिर पर गंजेपन वाले स्थान पर लगाएं इससे आपको लाभ मिलेगा।


*हाई ब्‍लड प्रेशर को कम करें
रक्तचाप के स्तर को कम और सामान्य स्तर पर बनाए रखने में गुग्‍गुल बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसके अलावा गुग्‍गुल दिल को मजबूत रखता है और दिल के टॉनिक के रूप में जाना जाता है।
*दमा रोग में
दमा से परेशान लोगों को घी के साथ एक ग्राम गुग्गुल को मिलाकर सुबह-शाम लेने से फायदा मिलता है।
*पेट की सूजन
गुड़ के साथ गुग्गुल मिलाकर दिन में तीन बार रोज खाएं। एैसा नियमित करने से पेट की सूजन ठीक होने लगती है।
*गर्भ संबंधी फायदे
गुड के साथ गुग्गुल को खाने से गर्भ से संबंधित समस्याएं जैसे गर्भशाय के रोग ठीक होते हैं।
सावधानी
गुग्‍गुल की प्रकृति गर्म होने के कारण इसका ज्‍यादा इस्‍तेमाल करने पर इसे गाय के दूध या घी के साथ सेवन करे। साथ ही इसका प्रयोग करते समय तेज और मसालेदार भोजन, अत्याधिक भोजन, या खट्टे खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
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शतावर के गुण ,फायदे ,औषधीय उपयोग

 
  सतावर का वानस्पतिक नाम ऐस्पेरेगस रेसीमोसस है यह लिलिएसी कुल का एक औषधीय गुणों वाला पादप है। इसे 'शतावर', 'शतावरी', 'सतावरी', 'सतमूल' और 'सतमूली' के नाम से भी जाना जाता है। यह भारत, श्रीलंका तथा पूरे हिमालयी क्षेत्र में उगता है। इसका पौधा अनेक शाखाओं से युक्त काँटेदार लता के रूप में एक मीटर से दो मीटर तक लम्बा होता है। इसकी जड़ें गुच्छों के रूप में होतीं हैं। वर्तमान समय में इस पौधे पर लुप्त होने का खतरा है।सतावर अथवा शतावरी भारतवर्ष के विभिन्न भागों में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली बहुवर्षीय आरोही लता है। नोकदार पत्तियों वाली इस लता को घरों तथा बगीचों में शोभा हेतु भी लगाया जाता है। जिससे अधिकांश लोग इसे अच्छी तरह पहचानते हैं। सतावर के औषधीय उपयोगों से भी भारतवासी काफी पूर्व से परिचित हैं तथा विभिन्न भारतीय चिकित्सा पद्धतियों में इसका सदियों से उपयोग किया जाता रहा है। विभिन्न वैज्ञानिक परीक्षणों में भी विभिन्न विकारों के निवारण में इसकी औषधीय उपयोगिता सिद्ध हो चुकी है तथा वर्तमान में इसे एक महत्वपूर्ण औषधीय पौधा होने का गौरव प्राप्त है।
   शतावरी एक चमत्कारी औषधि है जिसका उपयोग कई रोगों के इलाज में किया जाता है। शतावरी की खूबसूरत लता के रूप में घरों और बंगलों में भी लगाई जाती है। यह पौधा झाड़ीनुमा होता है, जिसमें फूल मंजरियों में एक से दो इंच लम्बे एक या गुच्छे में लगे होते हैं और फल मटर के समान पकने पर लाल रंग के होते हैं। इसके पत्ते हरे रंग के धागे जैसे सोया सब्जी की तरह खूबसूरत, उठल में शेर के नखों की तरह मुड़े हुए मजबूत कांटे, जड़ों में सैकड़ों की संख्या में हरी भूरी जड़ें जो इसका प्रमुख गुणकारी अंग शतावरी है मिलती है। इन जड़ों को ही ऊपर का पतला छिलका उतार सुखा कर औषधि रूप में प्रयोग करते हैं।
   सतावर की पूर्ण विकसित लता 30 से 35 फुट तक ऊँची हो सकती है। प्रायः मूल से इसकी कई लताएं अथवा शाखाएं एक साथ निकलती हैं। यद्यपि यह लता की तरह बढ़ती है परन्तु इसकी शाखाएं काफी कठोर और लकड़ी के जैसी होती हैं। इसके पत्ते काफी पतले तथा सुइयों जैसे नुकीले होते हैं। इनके साथ-साथ इनमें छोटे-छोटे कांटे भी लगते हैं। जो किन्हीं प्रजातियों में ज्यादा तथा किन्हीं में कम आते हैं ग्रीष्म ऋतु में प्रायः इसकी लता का ≈परी भाग सूख जाता है तथा वर्षा ऋतु में पुनः नवीन शाखाएं निकलती हैं। सितंबर-अक्टूबर माह में इसमें गुच्छों में पुष्प आते हैं तथा तदुपरान्त उन पर मटर के दाने जैसे हरे फल लगते हैं।
   आयुर्वेद के आचार्यों के अनुसार , शतावर पुराने से पुराने रोगी के शरीर को रोगों से लड़ने क़ी क्षमता प्रदान करता है । इसे शुक्रजनन, शीतल , मधुर एवं दिव्य रसायन माना गया है । महर्षि चरक ने भी शतावर को बल्य और वयः स्थापक ( चिर यौवन को बरकार रखने वाला) माना है । आधुनिक शोध भी शतावरी क़ी जड़ को हृदय रोगों में प्रभावी मान चुके हैं।

  परंपरागत रूप से शतावरी को महिलाओं की जड़ी बूटी माना गया है, हांलाकि यह पौधा पुरुषों के हार्मोन लेवल को बढ़ा कर उनकी कामुकता में भी इजाफा कर सकता है।
ब्रेस्‍ट मिल्‍क बढ़ाए
*यदि रोगी खांसते-खांसते परेशान हो तो शतावरी चूर्ण - 1.5 ग्राम, वसा के पत्ते का स्वरस 2.5 मिली, मिश्री के साथ लें और लाभ देखें।
*प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने की समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण -पांच ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है।
*पुरुष यौन शिथिलता से परेशान हो तो शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है।
*यदि रोगी को मूत्र से सम्बंधित विकृति हो तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है।
*शतावरी मूल का चूर्ण -2.5 ग्राम, मिश्री -2.5 ग्राम को एक साथ मिलाकर पांच ग्राम क़ी मात्रा में रोगी को सुबह शाम गाय के दूध के साथ देने से प्रमेह, प्री -मैच्योरइजेकुलेशन (स्वप्न-दोष ) में लाभ मिलता है।
*शतावरी के जड़ के चूर्ण को पांच से दस ग्राम की मात्रा में दूध के साथ नियमित रूप से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है।
*वातज ज्वर में शतावरी के रस एवं गिलोय के रस का सेवन करने से ज्वर (बुखार) से मुक्ति मिलती है।
*शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन, दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारियों में लाभ मिलता है
*शतावरी को चिर यौवन को बरकार रखने वाला माना है। आधुनिक शोध भी शतावरी की जड़ को हृदय रोगों में प्रभावी मान चुके हैं। अब हम आपको शतावरी के कुछ आयुर्वेदिक योग की जानकारी देंगे, जिनका औषधीय प्रयोग चिकित्सक के निर्देशन में करना अत्यंत लाभकारी होगा।
शक्‍तिवर्धक 
अगर इसमें पत्‍तो के रस 2 चम्‍मच दूध में मिला कर दिन में 2 बार लें, तो यह शक्‍ती प्रदान करता है।
* यदि आप नींद न आने की समस्या से परेशान हैं तो बस शतावरी की जड़ को खीर के रूप में पका लें उसमें थोड़ा गाय का घी डालें और ग्रहण करें। इससे आप तनाव से मुक्त होकर अच्छी नींद ले पाएंगे।
*शतावरी की ताजी जड़ को मोटा-मोटा कुट लें, इसका स्वरस निकालें और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें। इस तेल को माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लगाएं और लाभ देखें।
मधुमेह 
कहा जाता है कि शतावरी की जड़ों के चूर्ण का सेवन बगैर शक्‍करयुक्‍त दूध के साथ नियमित लिया जाए तो यह काफी फायदेमंद होगा।
स्वप्न दोष, प्री -मेच्युर -इजेकुलेशन : 
यदि रोगी स्वप्न दोष से पीड़ित हो तो शतावरी मूल का चूर्ण -2.5 ग्राम ,मिश्री -2.5 ग्राम को एक साथ मिलाकर, पांच ग्राम क़ी मात्रा में रोगी को सुबह शाम गाय के दूध के साथ देने से प्रमेह , प्री -मेच्युर -इजेकुलेशन (स्वप्न-दोष ) में लाभ मिलता है। शतावरी के जड के चूर्ण को पांच से दस ग्राम क़ी मात्रा में दूध से नियमित से सेवन करने से धातु वृद्धि होती है ।
यौन शिथिलता :
 यदि पुरुष यौन शिथिलता से परेशान हो तो शतावरी पाक या केवल इसके चूर्ण को दूध के साथ लेने से लाभ मिलता है । घी में चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम चाटकर दूध पीने से शारीरिक थकान, कमजोरी, अनिद्रा, पेशाब में रुकावट, धातुक्षीणता आदि विकार नष्ट होते हैं।
माइग्रेन : 
सतावर की  ताज़ी जड़ को यवकूट करें ,इसका स्वरस निकालें और इसमें बराबर मात्रा में तिल का तेल मिलाकर पका लें,हो गया मालिश का तेल तैयार, इसे माइग्रेन जैसे सिरदर्द में लगायें और लाभ देखें ।
प्रदर रोग :
 सुबह-शाम शतावरी चूर्ण 5 ग्राम से 10 ग्राम की मात्रा में थोड़े से शुद्ध घी में मिलाकर चाटने व कुनकुना गर्म मीठा दूध पीने से प्रदर रोग से जल्दी से छुटकारा मिलता है।
गर्भवती स्त्री के लिए : नवमास चिकित्सा का विवरण बताया है। शतावरी के चूर्ण का उपयोग दूसरे, छठे और सातवें मास में दूध के साथ करने और नवम मास में शतावरी साधित तेल का एनीमा लेने तथा इसमें भिगोए हुए रूई के फाहे को सोते समय योनि में रखने के बारे में बताया गया है। इससे योनि-प्रदेश लचीला, पुष्ट और स्निग्ध रहता है, जिससे प्रसव के समय प्रसूता को अधिक प्रसव पीड़ा नहीं होती।
पित्त प्रकोप और अजीर्ण :
 पित्त प्रकोप और अजीर्ण होने पर इसका 5 ग्राम चूर्ण शहद में मिलाकर सुबह-शाम चाटना चाहिए। शतावरी के रस को शहद के साथ लेने से जलन , दर्द एवं अन्य पित्त से सम्बंधित बीमारीयों में लाभ मिलता है।
कफ प्रकोप और खाँसी : 
कफ प्रकोप और खाँसी में शतावरी पाक स्त्री-पुरुष दोनों के लिए बलपुष्टिदायक होता है, अतः इस पाक का सेवन आवश्यकता के अनुसार ही करना चाहिए।यदि रोगी खांसते-खांसते परेशान हो तो शतावरी चूर्ण – 1.5 ग्राम ,वासा के पत्ते का स्वरस 2.5 मिली ,मिश्री के साथ लें और लाभ देखें ।
मूत्र विकृति :
 यदि रोगी को मूत्र या मूत्रवह संस्थान से सम्बंधित विकृति हो तो शतावरी को गोखरू के साथ लेने से लाभ मिलता है ।
घाव : 
शतावरी के पत्तियों का कल्क बनाकर घाव पर लगाने से भी घाव भर जाता है ।
प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने क़ी समस्या : प्रसूता स्त्रियों में दूध न आने क़ी समस्या होने पर शतावरी का चूर्ण -पांच ग्राम गाय के दूध के साथ देने से लाभ मिलता है। गाँव के लोग इसकी जड़ का प्रयोग गाय या भैंसों को खिलाते हैं, तो उनकी दूध न आने क़ी समस्या में लाभ मिलता पाया गया है । अतः इसके ऐसे ही प्रभाव प्रसूता स्त्रियों में भी देखे गए हैं ।
जच्चा-बच्चा में सूखी खाँसी : 
जच्चा-बच्चा को यदि खाँसी हो तो शतावरी चूर्ण, अडूसा के पत्ते और मिश्री समान मात्रा में कूट-पीसकर मिला लें। 10 ग्राम चूर्ण को एक गिलास पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इसे दिन में 3-4 बार 2-2 चम्मच प्रसूता पिए और 5-5 बूंद शिशु को अपने दूध में मिलकार पिलाएँ। इससे सूखी खाँसी में आराम होता है।
वातज ज्वर : 
वातज ज्वर में शतावरी के रस एवं गिलोय के रस का प्रयोग या इनके क्वाथ का सेवन ज्वर (बुखार ) से मुक्ति प्रदान करता है। वात प्रकोप होने पर शतावरी चूर्ण और पीपर का चूर्ण सम भाग मिलाकर 5 ग्राम मात्रा में शहद के साथ सुबह-शाम चाटने से लाभ होता है।
यदि रोगी खांसते-खांसते परेशान हो तो शतावरी चूर्ण - 1.5 ग्राम ,वासा के पत्ते का स्वरस 2.5 मिली ,मिश्री के साथ लें और लाभ देखें।
*शारीरिक दर्दों के उपचार हेतु आंतरिक हैमरेज, गठिया, पेट के दर्दों, पेशाब एवं मूत्र संस्थान से संबंधित रोगों, गर्दन के अकड़ जाने (स्टिफनेस), पाक्षाघात, अर्धपाक्षाघात, पैरों के तलवों में जलन, साइटिका, हाथों तथा घुटने आदि के दर्द तथा सरदर्द आदि के निवारण हेतु बनाई जाने वाली विभिन्न औषधियों में भी इसे उपयोग में लाया जाता है। उपरोक्त के साथ-साथ विभिन्न प्रकार के बुखारों ह्मलेरिया, टायफाइड, पीलिया तथा स्नायु तंत्र से संबंधित विकारों के उपचार हेतु भी इसका उपयोग किया जाता है।    *ल्यूकोरिया के उपचार हेतु इसकी जड़ों को गाय के दूध के साथ उबाल करके देने पर लाभ होता है। सतावर काफी अधिक औषधीय उपयोग का पौधा है। यूं तो अभी तक इसकी बहुतायत में उपलब्धता जंगलों से ही है परन्तु इसकी उपयोगिता तथा मांग को देखते हुए इसके कृषिकरण की आवश्यकता महसूस होने लगी है तथा कई क्षेत्रों में बड़े स्तर पर इसकी खेती प्रारंभ हो चुकी है जो न केवल कृषिकरण की दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी काफी लाभकारी सिद्ध हो रही है।
*शतावरी के पेड़ों के नियमित सेवन से बालको की बुद्धि, और निश्चय-शक्ति बढ़ती है और अच्छा विकास होता है। रूपरंग निखरता है। त्वचा मजबूत और स्वस्थ होती है।
*शरीर भरा-भरा पुष्ट और संतुलित होता है। पफेपफड़े रोग रहित और मजबूत बनते हैं। आँखों में चमक और ज्योति बढ़ती है। शरीर की सब प्रकार की कमजोरियां नष्ट होकर अपार वीर्य वृद्धि और शुक्र वृद्धि होती है। इसके सेवन से वृद्धावस्था दूर रहती है और मनुष्य दीर्घायु होता है।
*जो बच्चे रात को चैंक कर और डर कर अचानक नींद से जाग उठते हों उनके सिरहाने, तकिये के नीचे या जेब में शतावरी के पौधे की एक छोटी सी डंठल रख दें अथवा बच्चे के गले में बांध दें तो बच्चा रात में नींद में डरकर या चैंककर नहीं उठेगा।

2017-02-19

अमरूद के गुण ,फायदे औषधीय प्रयोग


अमरूद हमारे देश का एक प्रमुख फल है. हल्के हरे रंग का अमरूद खाने में मीठा होता है. इसके अंदर सौकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे बीज होते हैं. अमरूद बेहद आसानी से मिल जाने वाला फल है. लोग घरों में भी इसका पेड़ लगाते हैं. पर बेहद सामान्य फल होने के कारण ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं होता है कि ये स्वास्थ्य के लिहाज से कितना फायदेमंद होता है.
अमरूद की तासीर ठंडी होती है. ये पेट की बहुत सी बीमारियों को दूर करने का रामबाण इलाज है. अमरूद के सेवन से कब्ज की समस्या दूर हो जाती है. इसके बीजों का सेवन करना भी स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद होता है. अमरूद में विटामिन सी की पर्याप्त मात्रा होती है जिससे अनेक बीमारियों में फायदा होता है.
अमरूद के औषधीय प्रयोग : 
*बवासीर (पाइल्स) :- 
*सुबह खाली पेट 200-300 ग्राम अमरूद नियमित रूप से सेवन करने से बवासीर में लाभ मिलता है।
*पके अमरुद खाने से पेट का कब्ज खत्म होता है, जिससे बवासीर रोग दूर हो जाता है।
*कुछ दिनों तक रोजाना सुबह खाली पेट 250 ग्राम अमरूद खाने से बवासीर ठीक हो जाती है। बवासीर को दूर करने के लिए सुबह खाली पेट अमरूद खाना उत्तम है। *मल-त्याग करते समय बांयें पैर पर जोर देकर बैठें। इस प्रयोग से बवासीर नहीं होती है और मल साफ आता है।"
*सूखी खांसी :-
 *गर्म रेत में अमरूद को भूनकर खाने से सूखी, कफयुक्त और काली खांसी में आराम मिलता है। यह प्रयोग दिन में तीन बार करें।
*एक बड़ा अमरूद लेकर उसके गूदे को निकालकर अमरूद के अंदर थोड़ी-सी जगह बनाकर अमरूद में पिसी हुई अजवायन तथा पिसा हुआ कालानमक 6-6 ग्राम की मात्रा में भर देते हैं। इसके बाद अमरूद में कपड़ा भरकर ऊपर से मिट्टी चढ़ाकर तेज गर्म उपले की राख में भूने, अमरूद के भुन जाने पर मिट्टी और कपड़ा हटाकर अमरूद पीसकर छान लेते हैं। इसे आधा-आधा ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम मिलाकर चाटने से सूखी खांसी में लाभ होता है।"
* दांतों का दर्द :- 
*अमरूद की कोमल पत्तियों को चबाने से दांतों की पीड़ा (दर्द) नष्ट हो जाती है।
*अमरूद के पत्तों को दांतों से चबाने से आराम मिलेगा।
*अमरूद के पत्तों को जल में उबाल लें। इसे जल में फिटकरी घोलकर कुल्ले करने से दांतों की पीड़ा (दर्द) नष्ट हो जाती है।
*अमरूद के पत्तों को चबाने से दांतों की पीड़ा दूर होती है। मसूढ़ों में दर्द, सूजन और आंतों में दर्द होने पर अमरूद के पत्तों को उबालकर गुनगुने पानी से कुल्ले करें।"
*आधाशीशी (आधे सिर का दर्द) :- 
*आधे सिर के दर्द में कच्चे अमरूद को सुबह पीसकर लेप बनाएं और उसे मस्तक पर लगाएं।
*सूर्योदय के पूर्व ही सवेरे हरे कच्चे अमरूद को पत्थर पर घिसकर जहां दर्द होता है, वहां खूब अच्छी तरह लेप कर देने से सिर दर्द नहीं उठने पाता, अगर दर्द शुरू हो गया हो तो शांत हो जाता है। यह प्रयोग दिन में 3-4 बार करना चाहिए।"
* जुकाम :- रुके हुए जुकाम को दूर करने के लिए बीज निकला हुआ अमरूद खाएं और ऊपर से नाक बंदकर 1 गिलास पानी पी लें। जब 2-3 दिन के प्रयोग से स्राव (बहाव) बढ़ जाए, तो उसे रोकने के लिए 50-100 ग्राम गुड़ खा लें। ध्यान रहे- कि बाद में पानी न पिएं। सिर्फ 3 दिन तक लगातार अमरूद खाने से पुरानी सर्दी और जुकाम दूर हो जाती है।
लंबे समय से रुके हुए जुकाम में रोगी को एक अच्छा बड़ा अमरूद के अंदर से बीजों को निकालकर रोगी को खिला दें और ऊपर से ताजा पानी नाक बंद करके पीने को दें। 2-3 दिन में ही रुका हुआ जुकाम बहार साफ हो जायेगा। 2-3 दिन बाद अगर नाक का बहना रोकना हो तो 50 ग्राम गुड़ रात में बिना पानी पीयें खा लें"
*रक्तविकार के कारण फोड़े-फुन्सियों का होना :-
 4 सप्ताह तक नित्य प्रति दोपहर में 250 ग्राम अमरूद खाएं। इससे पेट साफ होगा, बढ़ी हुई गर्मी दूर होगी, रक्त साफ होगा और फोड़े-फुन्सी, खाज-खुजली ठीक हो जाएगी।

* पुरानी सर्दी :-
3 दिनों तक केवल अमरूद खाकर रहने से बहुत पुरानी सर्दी की शिकायत दूर हो जाती है।
*शक्ति (ताकत) और वीर्य की वृद्धि के लिए :- अच्छी तरह पके नरम, मीठे अमरूदों को मसलकर दूध में फेंट लें और फिर छानकर इनके बीज निकाल लें। आवश्यकतानुसार शक्कर मिलाकर सुबह नियमित रूप से 21 दिन सेवन करना धातुवर्द्धक होता है।
* पेट दर्द :- 
*नमक के साथ पके अमरूद खाने से आराम मिलता है।
*अमरूद के पेड़ के कोमल 50 ग्राम पत्तों को पीसकर पानी में मिलाकर छानकर पीने से लाभ होगा।
*अमरूद के पेड़ की पत्तियों को बारीक पीसकर काले नमक के साथ चाटने से लाभ होता है।
*अमरूद के फल की फुगनी (अमरूद के फल के नीचे वाले छोटे पत्ते) में थोड़ा-सी मात्रा में सेंधानमक को मिलाकर गुनगुने पानी के साथ पीने से पेट में दर्द समाप्त होता है।
*यदि पेट दर्द की शिकायत हो तो अमरूद की कोमल पित्तयों को पीसकर पानी में मिलाकर पीने से आराम होता है। अपच, अग्निमान्द्य और अफारा के लिए अमरूद बहुत ही उत्तम औषधि है। इन रोगों से पीड़ित व्यक्तियों को 250 ग्राम अमरूद भोजन करने के बाद खाना चाहिए। जिन लोगों को कब्ज न हो तो उन्हें खाना खाने से पहले खाना चाहिए।"
* पुराने दस्त :-
 अमरूद की कोमल पित्तयां उबालकर पीने से पुराने दस्तों का रोग ठीक हो जाता है। दस्तों में आंव आती रहे, आंतों में सूजन आ जाए, घाव हो जाए तो 2-3 महीने लगातार 250 ग्राम अमरूद रोजाना खाते रहने से दस्तों में लाभ होता है। अमरूद में-टैनिक एसिड होता है, जिसका प्रधान काम घाव भरना है। इससे आंतों के घाव भरकर आंते स्वस्थ हो जाती हैं।
* मलेरिया :- 
*मलेरिया बुखार में अमरूद का सेवन लाभकारी है। नियमित सेवन से तिजारा और चौथिया ज्वर में भी आराम मिलता है।
*अमरूद और सेब का रस पीने से बुखार उतर जाता है।
*अमरूद को खाने से मलेरिया में लाभ होता है।"
*भांग का नशा :-
 2-4 अमरूद खाने से अथवा अमरूद के पत्तों का 25 ग्राम रस पीने से भांग का नशा उतर जाता है।
*मानसिक उन्माद (पागलपन) :- 
*सुबह खाली पेट पके अमरूद चबा-चबाकर खाने से मानसिक चिंताओं का भार कम होकर धीरे-धीरे पागलपन के लक्षण दूर हो जाते हैं और शरीर की गर्मी निकल जाती है।
*250 ग्राम इलाहाबादी मीठे अमरूद को रोजाना सुबह और शाम को 5 बजे नींबू, कालीमिर्च और नमक स्वाद के अनुसार अमरूद पर डालकर खा सकते हैं। इस तरह खाने से दिमाग की मांस-पेशियों को शक्ति मिलती है, गर्मी निकल जाती है, और पागलपन दूर हो जाता है। दिमागी चिंताएं अमरूद खाने से खत्म हो जाती हैं।"
*पेट में गड़-बड़ी होने पर :-
 अमरूद की कोंपलों को पीसकर पिलाना चाहिए।
* अमरूद का मुरब्बा :-
 अच्छी किस्म के तरोताजा बड़े-बड़े अमरूद लेकर उसके छिलकों को निकालकर टुकड़े कर लें और धीमी आग पर पानी में उबालें। जब अमरूद आधे पककर नरम हो जाएं, तब नीचे उतारकर कपड़े में डालकर पानी निकाल लें। उसके बाद उससे 3 गुना शक्कर लेकर उसकी चासनी बनायें और अमरूद के टुकड़े उसमें डाल दें। फिर उसमें इलायची के दानों का चूर्ण और केसर इच्छानुसार डालकर मुरब्बा बनायें। ठंडा होने पर इस मुरब्बे को चीनी-मिट्टी के बर्तन में भरकर, उसका मुंह बंद करके थोड़े दिन तक रख छोड़े। यह मुरब्बा 20-25 ग्राम की मात्रा में रोजाना खाने से कोष्ठबद्धता (कब्जियत) दूर होती है।
*आंखों के लिए :- *अमरूद के पत्तों की पोटली बनाकर रात को सोते समय आंख पर बांधने से आंखों का दर्द ठीक हो जाता है। आंखों की लालिमा, आंख की सूजन और वेदना तुरंत मिट जाती है।
*अमरूद के पत्तों की पुल्टिस (पोटली) बनाकर आंखों पर बांधने से आंखों की सूजन, आंखे लाल होना और आंखों में दर्द करना आदि रोग दूर होते हैं।"
*कब्ज :- 
*250 ग्राम अमरूद खाकर ऊपर से गर्म दूध पीने से कब्ज दूर होती है।
*अमरूद के कोमल पत्तों के 10 ग्राम रस में थोड़ी शक्कर मिलाकर प्रतिदिन केवल एक बार सुबह सेवन करने से 7 दिन में अजीर्ण (पुरानी कब्ज) में लाभ होता है।
*अमरूद को नाश्ते के समय कालीमिर्च, कालानमक, अदरक के साथ खाने से अजीर्ण, गैस, अफारा (पेट फूलना) की तकलीफ दूर होकर भूख बढ़ जाएगी। नाश्ते में अमरूद का सेवन करें। सख्त कब्ज में सुबह-शाम अमरूद खाएं।
*अमरूद को कुछ दिनों तक नियमित सेवन करने से 3-4 दिन में ही मलशुद्धि होने लग जाती है। कोष्ठबद्धता मिटती है एवं कब्जियत के कारण होने वाला आंखों की जलन और सिर दर्द भी दूर होता है।
*अमरूद खाने से आंतों में तरावट आती है और कब्ज दूर हो जाता है। इसे खाना खाने से पहले ही खाना चाहिए, क्योंकि खाना खाने के बाद खाने से कब्ज करता है। कब्ज वालों को सुबह के समय नाश्ते में अमरूद लेना चाहिए। पुरानी कब्ज के रोगियों को सुबह और शाम अमरूद खाना चाहिए। इससे पेट साफ हो जाता है।
*अमरूद खाने से या अमरूद के साथ किशमिश के खाने से कब्ज़ की शिकायत नहीं रहती है।"
* कफयुक्त खांसी :- 
एक अमरूद को आग में भूनकर खाने से कफयुक्त खांसी में लाभ होता है।
* मस्तिष्क विकार :-
 अमरूद के पत्तों का फांट मस्तिष्क विकार, वृक्क प्रवाह और शारीरिक एवं मानसिक विकारों में प्रयोग किया जाता है।
*आक्षेपरोग :- 
अमरूद के पत्तों के रस या टिंचर को बच्चों की रीढ़ की हड्डी पर मालिश करने से उनका आक्षेप का रोग दूर हो जाता है।
* हृदय :-
 अमरूद के फलों के बीज निकालकर बारीक-बारीक काटकर शक्कर के साथ धीमी आंच पर बनाई हुई चटनी हृदय के लिए अत्यंत हितकारी होती है तथा कब्ज को भी दूर करती है।
*कुकर खांसी, काली खांसी (हूपिंग कफ) :- 
*एक अमरूद को भूभल (गर्म रेत या राख) में सेंककर खाने से कुकर खांसी में लाभ होता है। छोटे बच्चों को अमरूद पीसकर अथवा पानी में घोलकर पिलाना चाहिए। अमरूद पर नमक और कालीमिर्च लगाकर खाने से कफ निकल जाती है। 100 ग्राम अमरूद में विटामिन-सी लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग से लगभग आधा ग्राम तक होता है। यह हृदय को बल देता है। अमरूद खाने से आंतों में तरावट आती है। कब्ज से ग्रस्त रोगियों को नाश्ते में अमरूद लेना चाहिए। पुरानी कब्ज के रोगियों को सुबह-शाम अमरूद खाना चाहिए। इससे दस्त साफ आएगा, अजीर्ण और गैस दूर होगी। अमरूद को सेंधानमक के साथ खाने से पाचन शक्ति बढ़ती है।
*एक कच्चे अमरूद को लेकर चाकू से कुरेदकर उसका थोड़ा-सा गूदा निकाल लेते हैं। फिर इस अमरूद में पिसी हुई अजवायन तथा पिसा हुआ कालानमक 6-6 ग्राम की मात्रा में लेकर भर देते हैं। इसके बाद अमरूद पर कपड़ा लपेटकर उसमें गीली मिट्टी का लेप चढ़ाकर आग में भून लेते हैं पकने के बाद इसके ऊपर से मिट्टी और कपड़ा हटाकर अमरूद को पीस लेते हैं। इसे आधा-आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम रोगी को चटाने से काली खांसी में लाभ होता है।
*एक अमरूद को गर्म बालू या राख में सेंककर सुबह-शाम 2 बार खाने से काली खांसी ठीक हो जाती है।"




2017-02-18

अड़ूसा के गुण लाभ उपयोग

 
परिचय :
सारे भारत में अडूसा के झाड़ीदार पौधे आसानी से मिल जाते हैं। ये 120 से 240 सेमी ऊंचे होते हैं। अडूसा के पत्ते 7.5 से 20 सेमी तक लंबे और 4 से साढ़े 6 सेमी चौडे़ अमरूद के पत्तों जैसे होते हैं। ये नोकदार, तेज गंधयुक्त, कुछ खुरदरे, हरे रंग केअडूसा एक आयुर्वेदिक औषधी है जो 120 से 240 सेमी ऊंचे होते हैं। अडूसा के पत्तों, अमरूद के पत्ते के समान 7.5 से 20 सेमी तक लंबे और 4 से साढ़े 6 सेमी चौडे़ होते हैं। होते हैं। अडूसा के पत्तों को कपड़ों और पुस्तकों में रखने पर कीड़ों से नुकसान नहीं पहुंचता। इसके फूल सफेद रंग के 5 से 7.5 सेमी लंबे और हमेशा गुच्छों में लगते हैं। लगभग 2.5 सेमी लंबी इसकी फली रोम सहित कुछ चपटी होती है, जिसमें चार बीज होते हैं। तने पर पीले रंग की छाल होती है। अडूसा की लकड़ी में पानी नहीं घुसने के कारण वह सड़ती नहीं है।
• संस्कृत : वासा, वासक, अडूसा, विसौटा, अरूष।
• हिंदी : अडूसा, विसौटा, अरूष।
• मराठी : अडूलसा, आडुसोगे।
• गुजराती : अरडूसों, अडूसा, अल्डुसो।
• बंगाली : वासक, बसाका, बासक।
• तेलगू : पैद्यामानु, अद्दासारामू।
• तमिल : एधाडड।
• अरबी : हूफारीन, कून।
• पंजाबी : वांसा।
• अंग्रेजी : मलाबार नट।
• लैटिन : अधाटोडा वासिका
• रंग : अडूसा के फूल का रंग सफेद तथा पत्ते हरे रंग के होते हैं।
• स्वाद : अडूसा के फूल का स्वाद कुछ-कुछ मीठा और फीका होता है। पत्ते और जड़ का स्वाद कडुवा होता है।
स्वरूप :
• पेड़ : अडूसा के पौधे भारतवर्ष में कंकरीली भूमि में स्वयं ही झाड़ियों के समूह में उगते हैं। अडूसा का पेड़ मनुष्य की ऊंचाई के बराबर का होता है।
• पत्ते : पत्ते 7.5 से 20 सेमी लम्बे रोमश, अभिमुखी, दोनों और से नोकदार होते हैं।
• फूल : श्वेतवर्ण 5 से 7.5 सेमी लंबे लम्बी मंजरियों में फरवरी-मार्च में आते हैं।
• फली : लगभग 2.5 सेमी लम्बी, रोमश, प्रत्येक फली में चार बीज होते है।
• स्वभाव : अडूसा खुश्क तथा गर्म प्रकृति का होता है। परन्तु फूल शीतल प्रकृति का होता है।
• मात्रा : फूल और पत्तों का ताजा रस 10 से 20 मिलीलीटर (2 से 4 चम्मच), जड़ का काढ़ा 30 से 60 मिलीलीटर तक तथा पत्तों, फूलों और जड़ों का चूर्ण 10 से 20 ग्राम तक ले सकते हैं।
*आयुर्वेद चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार अडूसा पेड़ के फल, फूल, पत्ते तथा जड़ को रोग-विकारों के निवारण के लिए इस्तेमाल किया जाता है। अडूसा ने केवल खांसी श्वास, रक्तपित्त और कफ के लिए गुणकारी है बल्कि इसके पत्ते से बना काढ़ा कब्ज और शारीरिक निर्बलता के लिए एक दवा का काम करता है।
अडूसा का गुणकारी औषधि के रूप में प्रयोग
*अडूसा का प्रयोग अधिकतर औषधि के रूप ही किया जाता है. यूनानी और आयुर्वेदिक चिकित्सा की पद्धतियों में अडूसा का उल्लेख एक प्रसिद्ध औषधि के रूप में किया गया है. अडूसा का प्रयोग खासतौर पर ख़ासी और साँस से सम्बंधित रोगों के ईलाज के लिए किया जाता है.रोगों को नष्ट करने की दृष्टि से अडूसा एक बेहद ही उपयोगी औषधि है.
* टीबी रोग की खांसी में पचीस ग्राम अडूसा की जड़ और पचीस ग्राम गिलोय को दो सौ मिली लीटर पानी में देर तक उबालें और इसका काढ़ा बना लें। प्रतिदिन पचास ग्राम काढ़े में शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से टीबी रोग की खांसी नष्ट होती है और कफ सरलता से निकल जाता है।
* अडूसा की जड़ को पानी में उबालकर, छानकर उस पानी से कुल्ले करने पर मुंह के छाले दूर होते हैं।
* अडूसा के पत्तों के पांच ग्राम रस में शहद मिलाकर चाटकर खाने से गुर्दे का शूल नष्ट होता है।
* अडूसा के सूखे पत्ते चिलम में जलाकर हुक्का पीने से अस्थमा रोगी को आराम मिलता है। इसके अलावा श्वास में होने वाली समस्या को भी दूर किया जा सकता है।
* प्रदर रोग की समस्या में अडूसा के जड़ को कूटकर उसका रस निकालकर शहद के साथ रोजाना लेने से प्रदर रोग दूर होता है।
*मासिक धर्म में अधिक खून निकलने की समस्या होने पर स्त्रियों को अडूसा के हरे पत्तों का दस ग्राम रस मिश्री मिलाकर सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
प्रदर : अडूसा के स्वरस का मधु के साथ शर्बत बनाकर देने से प्रदर ठीक होता है।
* यदि घर में किसी को पैत्तिक ज्वर की समस्या है तो अडूसा के पत्ते और आंवला बराबर मात्रा में लेकर पानी में डालकर रखें और सुबह दोनों को पीसकर रस निकालें तथा उसमें दस ग्राम मिश्री मिलाकर पीलाने से लाभ मिलता है।
*. अडूसा के दस ग्राम पत्तों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें और शहद और मिश्री मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से जुकाम के कारण उत्पन्न सिरदर्द तुरंत दूर होता है।
* अडूसा और शहद मिलाकर दिन में तीन-चार बार चाटने से अस्थमा रोग से उत्पन्न खांसी से निजात पाया जा सकता है। इससे कफ को रोका जा सकता है।
रक्तपित्त-श्वास-कास :
अडूसा के पत्ते अथवा फूलों का स्वरस 1 पाव लेकर 3 पाव चीनी की चाशनी कर शर्बत बना लें। इसके सेवन से श्वास और रक्तपित्त में लाभ होता है
*अडूसा के पत्तों को पीसकर, किसी कपड़े में बांधकर निचोड़कर रस निकालें। बीस-बीस ग्राम रस दिन में दो-तीन बार पीने से नाक, मुंह और मलद्वार से होने वाली ब्लीडिंग बंद हो जाती है।
पित्तकफ-ज्वर :
अडूसा के पत्ते और पुष्पों का स्वरस मिश्री और शहद मिलाकर देने से पित्तकफ-ज्वर तथा अम्लपित्त में लाभ करता है।
* अडूसा के पत्तों में हल्दी मिलाकर गोमूत्र के साथ पीसकर शरीर पर लेप करने से खाज-खुजली शीघ्र नष्ट होती है।
बिच्छू का जहर : काले अडूसा की जड़ को पानी में घिसकर बिच्छू द्वारा काटे हुए स्थान पर लगाने से जहर बेअसर हो जाता है।
खून रोकने के लिए :
अडूसा की जड़ और फूलों का काढ़ा करके घी में पका शहद मिलाकर खाने से यदि कहीं से रक्त आता हो, तो वह बन्द हो जाता है।
*अडूसा के पत्ते और सफेद चन्दन का चूर्ण मिलाकर रखें। प्रतिदिन पानी के साथ तीन ग्राम चूर्ण सेवन करने से अर्श में ब्लीडिंग की समस्या से निजात मिलता है।
* अडूसा के पत्तों का रस निकालकर उसमें तुलसी और अदरक का रस तथा मुलहठी का चूर्ण और शहद मिलाकर सेवन करने से टाइफस ज्वर से निजात मिलता है।
सिर दर्द में आराम : अडूसा के फूलों को सुखाकर उसे कूट-पीस लें। उसके साथ थोड़ी सी मात्रा में गुड़ मिलाकर उसकी छोटी छोटी गोलियाँ बना लें। रोजाना एक गोली के सेवन से सिर दर्द की समस्या खत्म हो जाती है।
ज्वर : अडूसा के मूल का क्वाथ देने से ज्वर को लाभ होता है
*लड़कियों को मासिक धर्म में अवरोध होने पर अडूसा के पत्ते दस ग्राम और मूली के बीज तीन ग्राम, गाजर के बीज तीन ग्राम मिलाकर पानी में उबालकर काढ़ा बनाकर छानकर कुछ दिन तक सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
जोड़ों का दर्द : अडूसा के पत्तियों को गर्म करके दर्द वाले स्थान पर लगाने से दर्द फ़ौरन चला जाता है।

गुदा के मस्सों का दर्द : वासा के पत्तों को पुटपाक की रीति से उबालकर सेंक करने से गुदा के मस्सों का दर्द मिट जाता है।

ग्‍वार फली के गुण,फायदे उपयोग




औषधीय गुणों से भरपूर है ग्‍वार
ग्‍वार की फली का नाम सुनते ही हम नाक सिकोड़ने लगते हैं लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि ये फलियां स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक गुणों से भरपूर होती हैं। इन फलियों में आपको हेल्‍दी बनाने के सारे गुण होते हैं। ग्वार फली में प्रोटीन, घुलनशील फाइबर, अनेक प्रकार के विटामिन, जैसे विटामिन के, सी और ए और भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं। इनके अलावा इसमें फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन और पोटेशियम भी पाए जाते हैं। सबसे अच्‍छी बात तो यह है कि इसमें किसी तरह का कोलेस्ट्रॉल या वसा नहीं पाया जाता है। इसे जबरदस्त टॉनिक माना जा सकता है। आइए ग्‍वार की फली के औषधीय गुणों के बारे में जानकारी लेते हैं।
डायबिटीज को करें कंट्रोल
ग्वार में ग्लाइकोनुट्रीन्ट्स तत्व होते हैं, जो बॉडी में ब्लड शुगर लेवल कंट्रोल करने में सहायक हैं। इसमें कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स होता है। साथ ही यह इंसुलिन की मात्रा में इजाफा होता है। इसके आहार फाइबर भोजन को पचाने में बेहद मददगार होते हैं। कच्ची फलियों को चबाना डायबिटीज रोगियों के लिए काफी फायदेमंद भी है।
पाचन तंत्र को रखें फिट
इस फली में फाइबर अधिक मात्रा में पाए जाने के कारण ये पाचन संबंधी समस्याओं से आपको बचा सकता है। इसका सेवन करने से यह शरीर के सभी प्रकार के विषैले तत्‍व बाहर निकल जाते हैं और पाचन संबंधी समस्‍याओं का निदान हो जाता है।
ब्‍लड सर्कुलेशन बढ़ाएं
ग्वार में मौजूद आयरन से हीमोग्लोबिन उत्पादन बढ़ता है, जिससे शरीर में खून की उचित आपूर्ति होती है। इसमें मौजूद फाइटोकेमिकल्स से भी ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद मिलती है।
ब्लड प्रेशर को रखें कंट्रोल में
हाइपोग्लाइसेमिक और हाइपोलिपिड़ेमिक तत्वों की वजह से ये सब्जी हाइपरटेंशन से पीड़ित लोगों के लिए बेहतर विकल्प है। इसमें पाए जाने वाले यौगिक ब्लड प्रेशर लेवल कंट्रोल करने में सहायक हैं।
दिल को रखें स्वास्थ्य
यह फली आपके दिल को भी हेल्दी रखती है, क्योंकि इसमें कोलेस्ट्राल घटाने के गुण होते है। साथ ही इसमें फाइबर और पौटेशियम अघिक पाया जाता है। जो कि आपके दिल के लिए फाय़देमंद होता है।
गर्भवती महिलाओं के लिए फायदेमंद
इन फली का सेवन गर्भवती महिलाओं के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसके सेवन से शरीर में सभी पोषक तत्‍वों की कमी पूरी हो जाती है। विटामिन के की पर्याप्‍त मात्रा, इसमें होने के कारण यह हड्डियों को मजबूत करने और भ्रूण के विकास में सहायक होता है। इसमे फॉलिक एसिड भी भरपूर मात्रा में होता है जो शरीर को स्‍वस्‍थ बनाये रखने में मदद करता है
हड्डियों को मजबूत बनाये
ग्‍वार की फलियों में कैल्शियम, मिनरल और अनेक पोषक तत्‍व मौजूद होने के कारण यह हड्डियों को बहुत मजबूत बनाने में बहुत मददगार होता हैं। इसके अलावा इस सब्‍जी में फास्‍फोरस भी होता है जिससे हड्डियों में मजबूती आती है। इसलिए हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए इस सब्‍जी का इस्‍तेमाल जरूर करें। शारीरिक रूप से कमजोर व्यक्तियों को ग्वार फली का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए।

2017-02-16

मुनक्का के गुण,उपयोग,फायदे


    सूखे मेवे बहुत शक्तिवर्द्धक होते हैं। प्रोटीन से भरपूर सूखे मेवों में फाइबर, फाइटो न्यूट्रियंट्स एवं एन्टी ऑक्सीडेण्ट्स जैसे विटामिन ई एवं सेलेनियम की बहुलता होती है। मुनक्के, बादाम, किशमिश, काजू, मूंगफली, अखरोठ आदि मेवे नॉन वेज फूड का एक अच्छा ऑप्शन भी माने जाते हैं। मुनक्का खाने में जितना स्वादिष्ट है। उतना ही सेहत के लिए फायदेमंद भी है। साथ ही ये शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढाता है। इसमें फाइबर के गुण अधिक पाये जाते हैं।
मुनक्का ( Raisin )
   मुनक्का जिसको हम बड़ी दाख के नाम से भी जानते हैं. किशमिश को पानी में कुछ देर भिगोकर रखने और फिर उसे सुखाने के बाद किशमिश की स्थिति को ही मुनक्का का नाम दिया गया है. इसकी प्रकृति या तासीर गर्म होती है किन्तु ये कई रोगों की दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इसीलिए इसका औषध में विशेष स्थान माना जाता है. इसमें पाए जाने वाले अनेक गुण हमें बिमारियों से दूर रखने और शरीर को रोगमुक्त बनाने में लाभकारी सिद्ध होते है. मुन्नका के लाभ ( Benefits of Raisins ) :
सर्दी जुकाम में ( Cure Cold )
जिन व्यक्तियों को लगातार सर्दी और जुकाम बना रहता है, वे 3 से 4 मुनक्का ठंडे पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उठकर अच्छे से चबाकर खायें. रोगी का पुराना जुकाम दूर हो जाएगा और इस तरह सर्दी भी नही लगती है. इस उपाय को दिन में दो से तीन बार अपनाएँ.
 
खून बढ़ाने में ( Increase Blood ) : 
   रात को सोने से पहले 10 मुनक्का पानी में भिगोकर रख दें. सुबह इसको दूध के साथ मुनक्का उबाल लें. हल्का ठंडा करके पियें खून बढ़ जाता है. मुनक्का को अच्छे से चबा चबाकर खायें इससे खून बढ़ने लगता है. अच्छा परिणाम पाने के लिए एक से दो हफ्ते तक खायें.
. कब्ज :
   प्रतिदिन सोने से एक घंटा पहले दूध में उबाली गई 11 मुनक्का खूब चबा-चबाकर खाएं और दूध को भी पी लें। इस प्रयोग से कब्ज की समस्या में तत्काल फायदा होता है।
शरीर पुष्ट बनाने के लिए ( For Healthy Body ) : दिन में 8 से 10 मुनक्का का सेवन रोज़ करें. ऐसा करने से शरीर हष्ट पुष्ट बना रहता है और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है.
शरीर बलवान, ब्लड प्रेशर :
    12 मुनक्का, 5 छुहारे, 6 फूलमखाने दूध में मिलाकर खीर बनाकर सेवन करने से शरीर पुष्ट होता है।
जिनका ब्लडप्रेशर कम रहता है, उन्हें हमेशा अपने पास नमक वाले मुनक्का रखना चाहिए। यह ब्लडप्रेशर को सामान्य करने का सबसे आसान उपाय है।
गले के लिए ( Good For Throat ) :
 8 से 10 मुनक्का रात को पानी में भिगोकर रख दें. अगले दिन सुबह भीगे हुए मुनक्का को नाश्ते में लें. इसके अलावा सुबह और शाम 5 से 6 मुनक्का खायें. इसके लगातार प्रयोग से गले की खराश और नजले से आराम मिलता है. इस उपाय को आप हफ्ते में दो से तीन दिन अवश्य अपनाएँ.
 
पेट के विकार ( For Stomach Diseases 
   मुनक्का को सुबह दूध में अच्छे से उबालकर दूध को पीजिये. मुनक्का में उपस्थित फाइबर पेट में उपस्थित ज़हरीले पदार्थो को शरीर से बाहर निकालने में मदद करता है. इसके अलावा मुनक्का खाने से कब्ज़ की समस्या से भी छुटकारा मिलता है. एक हफ्ते तक सेवन करके देखें. जल्द ही आराम मिलेगा.

आंखों की रौशनी, नाख़ून, सफ़ेद दाग, गर्भाशय :
  आंखों की ज्योति बढाने, नाखूनों की बीमारी होने पर, सफेद दाग, महिलाओं में गर्भाशय की समस्या में मुनक्का को दूध में उबालकर थोड़ा घी व मिश्री मिलाकर पीने से लाभ होता है।
   जितना पच सके उतने मुनक्का रोज खाने से सातों धातुओं का पोषण होता है|मुनक्का को नमक के पानी में भिगोकर रखें और फिर सुखा लें. जिनका ब्लडप्रेशर कम होता है उनको लाभ मिलेगा.
· एलर्जी ( Remove Allergy ) : 
  जो व्यक्ति जुकाम से पीड़ित रहते है, गले में खराश या खुश्की बनी रहती है और गले में खुजली होती रहती है, उन रोगियों को मुनक्का का नित्य रूप से सेवन करना चाहिए. मुनक्का खाने से गले का हर रोग दूर होता है साथ ही मुनक्का कब्ज़ भगाने में भी लाभकारी सिद्ध होता है.
बच्चों की बिस्तर गिला करने की समस्या :
जो बच्चे रात्रि में बिस्तर गीला करते हों, उन्हें दो मुनक्का बीज निकालकर रात को एक सप्ताह तक खिलाएं।
 
पुराना बुखार ( Fever ) :
दस मुनक्का एक अंजीर के साथ सुबह पानी में भिगोकर रख दें।रात में सोने से पहले मुनक्का और अंजीर को दूध के साथ उबालकर इसका सेवन करें। ऐसा तीन दिन करें। कितना भी पुराना बुखार हो, ठीक हो जाएगा
·पोषण ( As a Nutrition ) :
 मुनक्का के अन्दर सातों धातुओं का पोषण होता है इसलिए मुनक्का का सेवन करना चाहिए. इससे शरीर को भरपूर पोषण प्रदान होता है और शरीर रोगों से दूर रहता है.
· आँखों की रौशनी ( Improve Eyesight ) : 
मुनक्का खाने से आँखों की रौशनी तेज़ होती है. मुनक्का को पानी में भिगोकर रख दें और सुबह उठकर अच्छे से चबायें. आँखों की रौशनी को तेज़ करता है और जलन भी दूर होती है.
वीर्य, ह्रदय और आंतो के विकार, नजला एलर्जी :
250 ग्राम दूध में 10 मुनक्का उबालें फिर दूध में एक चम्मच घी व खांड मिलाकर सुबह पीएं। इससे वीर्य के विकार दूर होते हैं। इसके उपयोग से हृदय, आंतों और खून के विकार दूर हो जाते हैं। यह कब्जनाशक है।
जिन व्यक्तियों के गले में निरंतर खराश रहती है या नजला एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, उन्हें सुबह-शाम दोनों वक्त चार-पांच मुनक्का बीजों को खूब चबाकर खा ला लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएं। दस दिनों तक निरंतर ऐसा करें।

2017-02-15

यौनशक्ति(सेक्स पावर) बढाने के जबर्दस्त उपाय

    

  आज की व्यस्ततम जीवनशैली ,तनावभरी दिनचर्या और भौतिक सुख सुविधायें जुटाने की लालसा ने इस पवित्र कर्म के मूल में निहित भाव एवं उद्देश्य को समाप्त कर दिया है। काम आज दाम्पत्य जीवन की औपचारिकता भर रह गया है ,इन्ही कारणों से यौन संबंधों को लेकर असंतुष्ट युगलों की संख्या में निरंतर इजाफा हो रहा है, ऐसी स्थिति में आयुर्वेद एवं आयुर्वेदिक औषधियां मददगार हो सकती है जिनका प्रयोग वैद्यकीय निरीक्षण में होना चाहिए-
*दालचीनी ,अकरकरा ,मुनक्का और श्वेतगुंजा को एक साथ पीसकर इन्द्रिय पर लेप करें तथा सम्भोग के समय कपडे से पोछ डालें ,यह योग इन्द्रियों में रक्त के संचरण को बढाता है।
*शीघ्रपतन की शिकायत हो तो धाय के फूल ,मुलेठी ,नागकेशर ,बबूलफली इनको बराबर मात्रा में लेकर इसमें आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर ,इस योग को 5-5 ग्राम की मात्रा में सेवन लगातार एक माह तक करें ,इससे शीघ्रपतन में लाभ मिलता है।
* शुद्ध शिलाजीत 500 मिलीग्राम की मात्रा में ठन्डे दूध में घोलकर सुबह शाम पीने से भी लाभ मिलता है।
*असगंध ,विधारा,शतावर ,सफ़ेद मूसली ,तालमखाना के बीज ,कौंच बीज प्रत्येक 50-50 ग्राम की मात्रा में लेकर दरदरा कर कपडे से छान लें तथा 350 ग्राम मिश्री मिला लें, इस नुस्खे को 5-10 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम ठन्डे दूध से लें ,लगातार एक माह तक लेने से यौनशक्ति में जबर्दस्त वृद्धि  होगी।
* कामोत्तेजना का बढाने के लिए कौंचबीज चूर्ण ,सफ़ेद मूसली ,तालमखाना ,अश्वगंधा चूर्ण को बराबर मात्रा में तैयार कर 10-10 ग्राम की मात्रा में ठन्डे दूध से सेवन करें निश्चित लाभ मिलेगा।
ये चंद उपचार  हैं, जिनका प्रयोग यौनशक्ति,यौनऊर्जा एवं पुरुषार्थ को बढाने में मददगार है।

2017-02-14

तैराकी है सबसे अच्‍छा व्‍यायाम स्वास्थ्य के लिए

   

    तैरना एक कला के साथ ही व्‍यायाम भी है, यह सेहत के लिए बहुत ही फायदेमंद है। तैरने से कई प्रकार की बीमारियों का खतरा तो कम होता ही है, साथ ही आपका शरीर भी मजबूत बनता है।
तैरना - यह व्यायाम का एक उत्कृष्ट रूप है।यह काम सभी मांसपेशी समूहों में आता है।वसा पेशी से बदला गया है जब इस वजह से, खोने वजन सही ढंग से किया जाता है।एक घंटे के लिए तैराकी की मदद से, आप गहन चलाने निर्माण के दौरान 100 से अधिक है, जो 500 कैलोरी, अप करने के लिए खो सकते हैं।
गठिया रोग से बचाव-
नियमित तैरने से आपके शरीर के जोड़ मजबूत होते हैं। जोड़ मजबूत होने से आपको भविष्‍य में गठिया संबंधी परेशानी होने का खतरा कम होता है। गठिया से बचाव के लिए अन्‍य प्रकार की एरोबिक एक्‍सरसाइज करने की भी सलाह दी जाती है। गर्म पानी से सिकाई करने पर भी गठिया के दर्द में राहत मिलती है।
दिल और फेफड़ों के लिये लाभकारी स्‍विमिंग एक ऐसी एक्‍सरसाइज है जिसको करने से सांस बार बार अंदर बाहर खींचनी पड़ती है। इसलिये यह दिल और फेफड़े के लिये अच्‍छी मानी जाती है। इसे रेगुलर करने से हार्ट अच्‍छे से काम करता है।
दिल मजबूत होता है-
स्‍वीमिंग एक प्रकार की एरोबिक एक्‍सरसाइज है और इससे आपके दिल की मांशपेशियां मजबूत होती हैं। इससे आपके पूरे शरीर में रक्‍त संचार अच्‍छा रहता है। कई शोधों से यह भी सामने आया है कि प्रतिदिन आधे घंटे तक स्‍वीमिंग करने से महिलाओं को कोरोनरी हार्ट डिजीज होने का खतरा 30 से 40 फीसदी तक कम हो जाता है।
मासपेशियां रेगुलर तैराकी करने से मासपेशियां मजबूत बनती हैं और उनमें शक्‍ती आती है। आपकी पूरी बॉडी टोन्‍ड लगने लगती है।
मसल्‍स बढ़ाने में कारगर-
यदि आप नियमित रूप से स्‍वीमिंग करते हैं तो आपको कोई और व्‍यायाम करने की जरूरत नहीं होती। स्‍वीमिंग आपकी मांसपेशियां बढ़ती हैं और मजबूत भी होती हैं। तैरने के दौरान जमीन पर व्‍यायाम की तुलना में 12 गुना अधिक मेहनत करनी पड़ती है। तैरने से आपके शरीर के जोड़ मजबूत होते हैं।
गुड कोलेस्‍ट्रॉल बढ़ता है-
स्‍वस्‍थ रहने के लिए जरूरी है कि आपके शरीर में बैड कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा कम हो। शरीर में गुड कोलेस्‍ट्रॉल यानी एचडीएल ज्‍यादा है तो यह आपके लिए फायदेमंद साबित होता है। हफ्ते में पांच दिन तैरने से शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा बैलेंस रहती है। कोलेस्‍ट्रॉल की मात्रा सही रहने से आपको हृदय रोग की आशंका भी कम होती है।
रक्‍त संचार बढ़ता है-
तैरने से शरीर का रक्‍त संचार बढ़ता है और आपको तनाव व दर्द से राहत मिलती है। रक्‍त संचार बढ़ने से आप चुस्‍त रहते हैं और किसी भी काम को ज्‍यादा मन लगाकर करते हैं।
वजन कम करने में सहायक-
कई बार लोग यह सोचते हैं क‍ि पानी का तापमान शरीर से कम होता है, इसलिए स्‍वीमिंग से वजन कम नहीं हो सकता। जबकि हकीकत यह है कि स्‍वीमिंग को कैलोरी बर्न वाले बेहतर व्‍यायामों में से माना जाता है। तैरने से वजन नियंत्रण में रहता है और मोटापा भी कम होता है। हर रोज 30 मिनट तैरने से शरीर से लगभग 440 कैलोरी कम हो जाती है।
शरीर में लचीलापन बढ़ता है-
बॉडी में ज्‍यादा से ज्‍यादा लचीलापन लाने के लिए काफी लोग जिम और अन्‍य प्रकार के व्‍यायामों का सहारा लेते हैं। तैरना एक ऐसा व्‍यायाम है जिससे आपके शरीर के हर हिस्‍से में लचीलापन बना रहता है।
तनाव दूर करे-
 स्विमिंग आपके दिल के लिए अच्छा है और यह शरीर पर तनाव के प्रभाव को भी कम करता है। अगर आपको अपने कार्यस्‍थल पर तनाव महसूस होता है तो पूल पर जाना ना भूलें।