2017-05-18

जन्म का महीना (बर्थ मंथ) से जाने आगंतुक रोग



पिछले कुछ समय से चल रहे शोध में यह सामने आया है कि एक व्यक्ति जिस महीने में जन्म लेता है इससे उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता लगता है। यानी कि आपका बर्थ मंथ आपको बताता है कि आप किन-किन बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
आप वर्ष के बारह महीनों में से किस माह में जन्म लेते हैं इसका आपके व्यक्तित्व पर गहरा असर होता है। ज्योतिष शास्त्र में मौजूद 12 राशियां हमें हमारे व्यक्तित्व, हमारे शौक तथा हमसे जुड़े सभी तथ्यों के बार में बताती हैं। लेकिन राशियों के अलावा प्रत्येक महीना भी हमारे बारे में कई राज़ खोलता है।
 भविष्य में होने वाली बीमारियां
पिछले कुछ समय से चल रहे शोध में यह सामने आया है कि एक व्यक्ति जिस महीने में जन्म लेता है इससे उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता लगता है। यानी कि आपका बर्थ मंथ आपको बताता है कि आप किन-किन बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
*कोलंबिया विश्वविद्यालय का शोध
 
कोलंबिया विश्वविद्यालय में हुए एक शोध के मुताबिक एक व्यक्ति के जन्म के महीने का उसकी सेहत से गहरा नाता होता है। इस शोध में यह सामने आया है कि यदि इसी व्यक्ति का जन्म मई या जुलाई के माह में हुआ है तो वह उम्र भर बीमारियों से बचा रहता है।
नवंबर या दिसंबर में जन्म
कुछ आम तथा कम नुकसान देने वाली बीमारियां भले ही उसे परेशान कर सकती हैं लेकिन किसी घातक बीमारी के होने की संभावना काफी कम है। लेकिन यदि आपका जन्म अक्टूबर या नवंबर के महीने में हुआ है तो आप हरदम बीमारियों से घिरे रहेंगे।
जून, अगस्त, जनवरी में जन्म
यदि पूरे बारह महीनों की बात करें तो रिसर्च के मुताबिक जून, अगस्त, जनवरी तथा दिसंबर में जन्म लेने वाले लोग बीमारियों से काफी हद तक बचे रहते हैं। उन्हें किसी बड़ी बीमारी के होने का खतरा नहीं रहता है।
अक्टूबर या नवंबर में जन्म
लेकिन अक्टूबर या नवंबर के माह में जन्म लेने वाले लोग अक्सर बीमारियों के जंजाल में फंसे रहते हैं। इसके अलावा फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई तथा जुलाई के माह में जन्म लेने वाले लोगों को भी बीमारियों के संदर्भ में चिंतामुक्त पाया गया है।
मार्च या अप्रैल में जन्म
यदि विशेष तौर पर विभिन्न बीमारियों की बात की जाए तो, मार्च या अप्रैल के महीने में जन्म लेने वाले लोग हृदय रोगों से ज्यादा पीड़ित होते हैं। इन्हें दिल से सम्बन्धित बीमारियां जकड़ लेती हैं, लेकिन यह कितनी नुकसानदेह होती हैं यह उस व्यक्ति की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करता है।
 
दिल की बीमारी
परन्तु सितंबर, अक्टूबर तथा नवंबर में जन्म लेने वाले लोगों को दिल की बीमारी होने की आशंका ना के बराबर रहती है। किन्तु सांस की दिक्कतें इन्हें जरूर परेशान कर सकती हैं।
सांस की तकलीफ
खासतौर पर अक्टूबर या फिर नवंबर के महीने में जन्म लेने वाले लोग सांस से सम्बन्धित तकलीफों का शिकार होते हैं। इन्हें थोड़ा सा ही काम करने पर सांस का फूलना या फिर अस्थमा जैसी बीमारी होने का भी खतरा रहता है।
मानसिक रोग
लेकिन यदि आपका जन्म जुलाई से सितंबर के बीच हुआ है तो आपको सांस की तकलीफें शायद ही कभी होंगी। इसके अलावा ऐसे लोगों से मानसिक रोग भी कुछ कदम की दूरी बनाए रखते हैं।
सर्दी के समय में जन्म
परन्तु सर्दी के समय में जन्म लेने वाले लोगों को मानसिक बीमारियां हो जाना आम पाया गया है। यही दिक्कत लोगों की प्रजनन शक्ति में भी पाया गया है। सर्दियों में जन्म लेने वाली महिलाओं को प्रजनन संबंधी कई तकलीफों का शिकार होना पड़ता है।
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इन्हें होते हैं सबसे ज्यादा रोग
कोलंबिया विश्विद्यालय में हुए इस शोध में एक बात और सामने आई है कि खासतौर पर सर्दी के समय जन्म लेने वाले लोग बीमारियों के ज्यादा शिकार होते हैं जबकि बाकी महीनों में जन्में लोग स्वस्थ रहते हैं।
दिल की बीमारी से सबसे अधिक मौतें
शोध का मानना है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा मौतें दिल की बीमारी से होती हैं। और दिल के रोग उन्हें ही अधिक होते हैं जिनका जन्म जनवरी से लकर जून माह के बीच हुआ हो। अन्य महीनों में जन्म लेने वाले लोगों को हृदय रोग परेशान नहीं करते।
ये जीते हैं लंबी उम्र
यह भी एक कारण है कि आमतौर पर एक लंबी आयु जीने वाले व्यक्ति का जन्म जुलाई से दिसंबर महीने के बीच ही पाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बता पाना मुश्किल है कि किसी विशेष महीने का एक बीमारी से क्या संबंध होता है।
मौसम का असर
लेकिन इन बीमारियों के आधार पर यह जरूर बताया जा सकता है कि बच्चे का जिस महीने में जन्म होता है, उस माह के मौसम का उस पर कम से कम तीन महीने तक असर रहता है। यही मौसम उसके लिए विभिन्न बीमारियों को न्यौता देता है।

2017-05-14

गर्मी मे दही खाने के लाजवाब फायदे



कहते हैं किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले दही खाने से उस काम के लिए जाने वाले को सफलता मिलती है।दही को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिसके कारण यह दूध की तुलना में जल्दी पच जाता है। जिन लोगों को पेट की परेशानियां, जैसे अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गर्मी दूर हो जाती है।डाइजेशन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है। दूध से बनने वाले दही का उपयोग खाने में हजारों सालों से हो रहा है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाने वाले कैल्शियम की मात्रा दूध की अपेक्षा दही में 18 गुणा ज्यादा होती है।पेट की गर्मी दूर करता है- दही की छाछ या लस्सी बनाकर पीने से पेट की गर्मी शांत हो जाती है।
आंतों के रोग- अमेरिकी आहार विशेषज्ञों के अनुसार दही का नियमित सेवन करने से आंतों के रोग और पेट संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
दिल के रोग में भी आता है काम- 
दही में दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की गजब की क्षमता है।
हड्डियों को दे मजबूती- 
दही में कैल्शियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह हड्डियों के विकास में सहायक होता है।
जोड़ों के दर्द करे ठीक- हींग का छौंक लगाकर दही खाने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी है।
प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन से भरपूर- 
दही सेहत और सौंदर्य के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इसमें दूध के मुकाबले कैल्श‍ियम अधि‍क होता है।
पाचन शक्ति बढ़ाता है- 
दही का नियमित सेवन शरीर के लिए अमृत के समान माना गया है। यह खून की कमी और कमजोरी दूर करता है।
आंतों के रोग
 
अमेरिकी आहार विशेषज्ञों के अनुसार दही का नियमित सेवन करने से आंतों के रोग और पेट संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
बवासीर रोग से पीड़ित रोगियों को दोपहर के भोजन के बाद एक गिलास छाछ में अजवायन डालकर पीने से फायदा मिलता है

वजन
दुबले-पतले व्यक्तियों को अगर दही में किशमिश, बादाम या छुहारा मिलाकर दिया जाए तो वजन बढ़ने लगता है, जबकि दही के सेवन से शरीर की फालतू चर्बी को भी हटाया जा सकता है
>दिल के रोग
दही में दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की गजब की क्षमता है। यह कोलेस्ट्रॉल को बढ़ने से रोकता है और दिल की धड़कन सही बनाए रखता है।
बालों की सुंदरता
बालों को सुंदर और आकर्षक बनाए रखने के लिए दही या छाछ से बालों को धोने से फायदा होता है। इसके लिए नहाने से पहले बालों में दही से अच्छी मालिश करनी चाहिए।कुछ समय बाद बालों को धो लेने से बालों की खुश्की या रूसी खत्म हो जाती है।
मुंह के छाले
दही की मलाई को मुंह के छालों पर दिन में दो-तीन बार लगाने से छाले दूर हो जाते हैं। दही और शहद को समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से भी मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
पसीना
दही और बेसन के मिश्रण से मालिश करें। कुछ देर बाद नहा लें। पसीने की दुर्गंध दूर हो जाएगी।
 बच्चों के दांत
दही के साथ शहद मिलाकर जिन बच्चों के दांत निकल रहे हों, उन्हें चटाना चाहिए। इससे दांत आसानी से निकल जाते हैं।
अनिद्रा
रात में नींद न आने की परेशानी से निपटने के लिए दही और छाछ का सेवन फायदेमंद होता

2017-05-11

पेट के कीड़े का घरेलू आयुर्वेदिक उपचार



  गंदा और अशुद्ध भोजन के सेवन से आंत में कीड़े पड़ जाते हैं, इसके कारण पेट में गैस, बदहजमी, पेट में दर्द, बुखार जैसी समस्‍यायें होती हैं, इन कीड़ों को निकाने के लिए घरेलू उपचार आजमायें।
पेट में कीड़े पड़ जायें तो यह बहुत ही दुखदायी होता है। यह समस्‍या सबसे अधिक बच्‍चों में होती है लेकिन बड़ों की आंतों में भी कीड़े हो सकते हैं। ये कृमि लगभग 20 प्रकार के होते हैं जो अंतड़ियों में घाव पैदा कर सकते हैं। इसके कारण रोगी को बेचैनी, पेट में गैस बनना, दिल की धड़कन असामान्‍य होना, बदहजमी, पेट में दर्द, बुखार जैसी कई प्रकार की समस्‍यायें होती हैं। इसके कारण रोगी को खाने में रुचि नहीं होती और उसे चक्‍कर भी आते हैं। गंदगी के कारण ही पेट में कीड़े होते हैं। अशुद्ध और खुला भोजन करने वालों को यह समस्‍या अधिक होती है। घरेलू उपचार के जरिये इस समस्‍या का इलाज किया जा सकता है।बच्चों के पेट कीड़े होना आम बात है लेकिन यदि समय पर इसका इलाज नहीं किया गया तो बच्चों में विकास रुक जाता है | इसी बात को ध्यान में रखकर सरकार भी इसके लिए अभियान चला रही है और स्कूलों में कीड़े मारने की दवा मुफ्त में वितरित करवा रही हैं | यह वास्तव में एक ऐसी बीमारी है जो कि अन्दर ही अन्दर बच्चों को खा जाती है और पता ही नहीं चलता है, इसलिए इसके बारे में जानकारी और इलाज जरूरी है |
इसलिए आइये आज जानते हैं कि पेट में होने क्या – क्या कारण है और इनसे बचने के क्या-क्या घरेलु उपाय हैं
पेट में कीड़े होने का कारण Reasons For Worms In Stomach
गंदी मिट्टी में खेलने, मिट्टी खाने, फल व सब्जियों द्वारा बच्चों के पेट में कीड़े व कृमि पहुंच जाते हैं जो उनकी आंतों में वंश-वृद्धि करके जीवित रहते हैं। कई बार ज्यादा मीठे पदार्थों के सेवन से भी पेट में कीड़े हो जाते हैं। लेकिन कई in कारणों पर नियंत्रण करना संभव नहीं होता हैं |
पेट में कीड़े होने का लक्षण 
कैसे जाने कि बच्चों के पेट में कीड़े है और वो बच्चों को नुक्सान पंहुचा रहें है () | चुनचुने (पिनवर्म), केचुए, राउंड वर्म, टेप वर्म व अन्य अनेक कीड़े बच्चों के पेट में होते हैं। जब ये काटते हैं तो बच्चे को गुदा में तेज खुजली होती है। शरीर पीला पड़ने लगता है, बेचैनी बढ़ जाती है, निढाल हो जाते हैं तथा स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।
 
पेट में कीड़े होने का उपचार
* अरंड ककड़ीः अरंड ककड़ी का एक चम्मच दूध प्रातः पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। यह बच्चों के लिए उत्तम औषधि है।
* नीबूः आधे नीबू को काटकर उसमें काला नमक और काली मिर्च डालकर गरम करके बच्चे को चुसाएं। इससे पेट के कीडे नष्ट हो जाते हैं।6. शहतूतः शहतूत व खट्टे अनार के छिलकों को पानी में उबालकर पिलाने से कीड़ों का अंत हो जाता है |
* नारियलः बच्चों को नारियल का पानी पिलाने तथा कच्चा नारियल खिलाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। इसी प्रकार नारियल का गूदा चबाकर खाने व इसके तीन घंटे बाद 200 ग्राम दूध में दो चम्मच अरंडी का तेल मिलाकर पिलाएं इससे बच्चों के पेट के कीड़े मल के साथ बाहर निकल आते हैं।
* अनारः अनार के रस का रोजाना प्रयोग करते रहने से बच्चों के पेट के कीड़े आसानी से नष्ट हो जाते हैं।
*. ईसबगोलः यदि पेचिश में कीड़े निकलते हों तो ईसबगोल का उपयोग सहायक सिद्ध होता है। ईसबगोल की भूसी के साथ भुनी हुई सौंफ का चूर्ण मिलाकर खिलाएं। इससे बच्चों का पेट साफ हो जाएगा व कीड़े भी निकल जाएंगे।
*आधा चम्मच अजवायंन का चूरन एक कप छास के साथ दिन मे २ बार कुछ दीनो तक पिए. इसको सेवन करने से आपके पेट के कीड़े मर जाएँगे.
*बायविडंग का चूरन का काढ़ा देने से पेट के कीड़े मर जाते है. दूध मे बायविडंग मिलाकर पीने से बच्चो के पेट मे कीड़े नही होते है.
*सबेरे खाली पेट गुड खाये .और १५ मिनिट बाद चम्मच भर पीसी हुई अजवाइन पानी के साथ निगल ले. इस तरह गुड की मिठास से पेट के कीड़े एक जगह एकत्र होंगे. उपर से अजवाइन खा लेने से ये सब कीड़े मरके शौच के साथ बाहर निकल जाएँगे.
*काला नमक
चुटकी भर काला नमक और आधा ग्राम अजवायन चूर्ण मिला लीजिए, इस चूर्ण को रात के समय रोजाना गर्म पानी से लेने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं। अगर बड़ों को यह समस्‍या है तो काला नमक और अजवायन दोनों को बराबर मात्रा में लीजिए। सुबह-शाम इसका सेवन करने से पेट के कीड़े दूर हो जायेंगे।


*कच्‍चे आम की गुठली
बच्‍चों या बड़ों की आंत में कीड़े पड़ गये हों तो कच्‍चे आम की गुठली का सेवन करने से कीड़े मल के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। इसके लिए कच्चे आम की गुठली का चूर्ण दही या पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें। इसके नियमित सेवन से कुछ दिनों में ही आंत के कीड़े बाहर निकल जायेंगे।
*टमाटर के जरिये
टमाटर का प्रयोग खाने का स्‍वाद बढ़ाने के साथ-साथ पेट के कीड़ों को नष्‍ट करने के लिए कर सकते हैं। टमाटर को काटकर, उसमें सेंधा नमक और कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर इसका सेवन कीजिए। इस चूर्ण का सेवन करने के बाद पेट के कीड़े मर कर गुदामार्ग से बाहर निकल जाते हैं।
*लहसुन की चटनी
पेट की समस्‍या दूर करने के साथ आंतों को पूरी तरह से साफ करने के लिए लहसुन का प्रयोग करें। अगर बच्‍चे या बड़े किसी को भी पेट में कीड़े हैं तो उसे लहसुन की चटनी खिलायें। लहसुन की चटनी बनाकर उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम खाने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं।
*तुलसी के पत्‍ते
तुलसी भी एंटी-बैक्‍टीरियल होती है, किसी भी प्रकार के संक्रमण के उपचार के लिए इसका प्रयोग कर सकते हैं। पेट में कीड़े होने पर तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस दिन में दो बार पीने से पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। इसका सेवन करने से आंत पूरी तरह से साफ हो जाती है और पेट में गैस और कब्‍ज की भी शिकायत नहीं होती है।

2017-05-07

आम खाने के लाजवाब फायदे


*आम खाने से कैंसर से बचाव होता हैं, कैंसर के रोगियों के लिए आम बहुत लाभदायक हैं
*त्वचा को स्वस्थ बनाये रखता हैं, त्वचा में ताजगी बनाता हैं
*आँखों की रोशनी तेज करता हैं
*डायबिटीज के रोगियों के लिये भी लाभकारी होता है
*सेक्स लाइफ को सफल बनाता हैं
*पाचनशक्ति को मजबूत बनाता हैं, आम खाना हर तरह से बहुत फायदेमंद हैं
    क्‍या आपने कभी ये सोचा है कि आम को ही फलों का राजा क्यों कहा जाता है जबकि फल तो सभी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं? दरअसल, भारतीय आम अपने स्वाद के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. भारत में मुख्य रूप से 12 किस्म के आम होते हैं. आम का इस्तेमाल केवल फल के तौर पर नहीं बल्कि सब्जी, चटनी, पना, जूस, कैंडी, अचार, खटाई, शेक, अमावट (आम पापड़) और बहुत सी खाने-पीने की चीजों का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है.
ये एक सर्वसुलभ फल है वरना तो इस महंगाई के समय में कई फल ऐसे हैं जो आम आदमी की जेब का साथ छोड़ चुके हैं. अपने विशेष स्वाद, देश में इसकी भरपूर पैदावार और किफायती होने की वजह से इसे फलों का राजा कहा जाता है. इन सारी वजहों के साथ ही आम के औषधीय गुण और हेल्थ बेनेफिट भी इस फलों का राजा बनाते है
 
* गर्मी से बचाव
गर्मियों में अगर आपको दोपहर में घर से बाहर निकलना है तो एक गिलास आम का पना पीकर निकलिए. न तो आपको धूप लगेगी और न ही लू. आम का पना शरीर में पानी के स्तर को संतुलित बनाए रखता है जिसकी वजह से ये गर्मियों का बेस्ट पेय है.
*कैंसर से बचाव
आम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट कोलोन कैंसर, ल्यूकेमिया और प्रोस्टेट कैंसर से बचाव में फायदेमंद है. इसमें क्यूर्सेटिन, एस्ट्रागालिन और फिसेटिन जैसे ऐसे कई तत्व होते हैं जो कैंसर से बचाव करने में मददगार होते हैं.
*आंखें रहती हैं चमकदार
आम में विटामिन ए भरपूर होता है, जो आंखों के लिए वरदान है. इससे आंखों की रौशनी बनी रहती है.
* त्वचा के लिए है फायदेमंद
आम के गुदे का पैक लगाने या फिर उसे चेहरे पर मलने से चेहरे पर निखार आता है और विटामिन सी संक्रमण से भी बचाव करता है.
* मोटापा कम करने में
मोटापा कम करने के लिए भी आम एक अच्छा उपाय है. आम की गुठली में मौजूद रेशे शरीर की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में बहुत फायदेमंद होते हैं. आम खाने के बाद भूख कम लगती है, जिससे ओवर ईटिंग का खतरा कम हो जाता है.
* रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में


आम खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी इजाफा होता है.
* सेक्स क्षमता बढ़ाने में
आम में विटामिन ई अधिक पाया जाता है और इससे सेक्स क्षमता बढ़ती है. साथ ही ये पौरुष बढाने वाला फल भी माना गया है.
* स्मरण शक्ति में मददगार
जिन लोगों को भूलने की बीमारी हो उन्हें आम का सेवन करना चाहिए. इसमें पाया जाने वाला ग्लूटामिन एसिड नामक एक तत्व स्मरण शक्ति को बढ़ाने में उत्प्रेरक की तरह काम करता है. साथ ही इससे रक्त कोशिकाएं भी सक्रिय होती हैं. इसीलिए गर्भवती महिलाओं को आम खाने की सलाह दी जाती है.
* पाचन क्रिया को ठीक रखने में
आम में ऐसे कई एंजाइम्स होते हैं जो प्रोटीन को तोड़ने का काम करते हैं. इससे भोजन जल्दी पच जाता है. साथ ही इसमें उपस्थित साइर्टिक एसिड, टरटैरिक एसिड शरीर के भीतर क्षारीय तत्वों को संतुलित बनाए रखता है.
कोलेस्ट्रॉल नियमित रखने में
आम में फाइबर और विटामिन सी खूब होता है. इससे बैड कोलेस्ट्रॉल संतुलन बनाने में मदद मिलती है.

2017-05-06

थैलेसीमिया रोग की जानकारी और उपचार


थैलेसीमिया क्या है?
यह आनुवांशिक रोग जितना घातक है, इसके बारे में जागरूकता का उतना ही अभाव है। सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, परंतु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है। इसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित हीमोग्लोबीन पर पड़ता है।   
थैलेसीमिया रक्त सम्बन्धी वंशानुगत रोग है जिसमें आपके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम और लाल रक्त कणिकाएँ केवल थोड़ी मात्रा में ही होती हैं। हीमोग्लोबिन आपकी लाल रक्त कणिकाओं में उपस्थित प्रोटीन है जो उन्हें ऑक्सीजन ले जाने में मदद करता है। यह रोग वंशानुगत है, अर्थात आपके माता-पिता में कम से कम कोई एक इस रोग का वाहक रहा है। यदि वे दोनों थैलेसीमिया के वाहक हैं तो आपको इस रोग का 25% अधिक गंभीर रूप प्राप्त होता है। थैलेसीमिया के कारण उत्पन्न हीमोग्लोबिन की कम मात्रा और केवल कुछ लाल रक्त कणिकाओं की उपस्थिति, रक्ताल्पता उत्पन्न करती है और इस कारण आपको थकावट होती है।
थैलेसीमिया के कई प्रकार होते हैं, जिनमें अल्फा-थैलेसीमिया, बीटा-थैलेसीमिया, कूलेस एनीमिया, और भूमध्यसागरीय एनीमिया हैं।
रोग अवधि
हम ठीक होने में लगने वाले समय का अंदाजा नहीं लगा सकते।
जाँच और परीक्षण रक्त परीक्षण
कम्पलीट ब्लड काउंट
रेटिक्यूलोसाईट काउंट
आयरन
अनुवांशिकता जाँच
प्रसव पूर्व परीक्षण
कोरिओनिक विलस सैंपलिंग
एम्नियोसेंटेसिस
डॉक्टर द्वारा आम सवालों के जवाबQ1.थैलेसीमिया क्या है?थैलेसीमिया वंशानुगत विकार है जिसमें हीमोग्लोबिन का संश्लेषण दोषयुक्त होता है। यह रक्ताल्पता के रूप में प्रकट होता है।
Q2. मुझे थैलेसीमिया कैसे हो सकता है?
यदि आपके माता-पिता में से किसी एक अथवा दोनों को थैलेसीमिया रोग है, या वे इसके वाहक हैं, तो आपको भी ये रोग हो सकता है।
 
Q3.मुझे थैलेसीमिया है, ये कैसे पता चलेगा? थैलेसीमिया रक्ताल्पता के रूप में प्रकट होता है। रक्त का आयरन परीक्षण इसे रक्ताल्पता के अन्य रूपों से अलग बताता है। हीमोग्लोबिन के इलेक्ट्रोफोरेसिस से रोग निश्चित पता चलता है।
Q4.थैलेसीमिया का उपचार क्या है?थैलेसीमिया के रोगियों को, रोग की गम्भीरता के आधार पर, बार-बार रक्त चढ़वाना पड़ता है। उन्हें आयरन की अधिक मात्रा को घटाने के लिए औषधियां भी लेनी होती हैं।
यदि तिल्ली (स्प्लीन) आकार में अत्यंत बढ़ गई है तो रक्त कणिकाओं के नष्ट होने को कम करने के लिए तिल्ली को शल्यक्रिया द्वारा हटाया जाता है।
थैलेसीमिया की नई उपचार पद्धति में, रोगी के किसी भाई-बहन के गर्भनाल में उपस्थित, रक्त कोशिका का प्रयोग होता है, जिसका लक्ष्य थैलेसीमिया का इलाज करना है।
Q5. क्या मैं थैलेसीमिया के साथ सामान्य जीवन जी सकता हूँ?मंद थैलेसीमिया के रोगी बिना किसी उपचार के सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन गंभीर थैलेसीमिया रोगियों को बार-बार रक्त चढ़वाना होता है और आयरन चेलेशान थेरेपी लेनी होती है, जो जीवन की गुणवत्ता को कम करते हैं।
Q6.थैलेसीमिया की अन्य समस्याएँ क्या हैं? थैलेसीमिया के रोगियों को बार-बार संक्रमण की संभावना होती है और अस्थि-मज्जा के विस्तार के कारण उनकी हड्डियाँ कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं। यह बच्चों में विकास को धीमा करता है और उनकी वयःसंधि भी विलंबित होती है।
यदि चेलेशान थेरेपी पर्याप्त और उचित नहीं है तो आयरन की अधिकता से ह्रदय, लिवर और भीतरी अंगों पर आयरन इकठ्ठा होने लगता है।
Q7.मैं थैलेसीमिया को कैसे रोक सकता हूँ?
विवाह पूर्व जीन सम्बन्धी उचित सलाह द्वारा बच्चों में थैलेसीमिया को रोका जा सकता है। थैलेसीमिया वाहक व्यक्तियों के आपसी वैवाहिक सम्बन्ध को रोका जाना चाहिए।
परहेज और आहार
लेने योग्य आहारकैल्शियम युक्त आहार अधिक मात्रा में लें। यह हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत रखने के लिए अत्यंत जरूरी है। डेरी उत्पाद कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं। एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि डेरी उत्पाद शरीर के आयरन अवशोषण की क्षमता को कम करते हैं।
कैल्शियम के अवशोषण के लिए शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता होती है। विटामिन डी अण्डों, डेरी उत्पादों और मछली में मिलता है।


इनसे परहेज करें
तरबूज, पालक, खुबानी, हरी पत्तेदार, एस्पार्गस, आलू, खजूर, किशिमिस, ब्रोकोली, फलियाँ, मटर, सूखी फलियाँ, दालें
आयरन की अधिक मात्रा
दलिया
चाय, कॉफ़ी
मसाले
योग और व्यायाम
व्यायाम नियमित करें और डॉक्टर से अपने लिए उचित व्यायाम कार्यक्रम की जानकारी लें।
घरेलू उपाय (उपचार)
अधिक मात्रा में रक्त चढ़वाने वाले लोगों को चेलेशान थेरेपी नामक उपचार की आवश्यकता होती है, ताकि शरीर के अधिक आयरन को हटाया जा सके।
यदि आप रक्त चढ़वा रहे हैं तो आपको आयरन के पूरक नहीं लेने चाहिए।
स्वास्थ्यवर्धक आहार लें।
संक्रमण ना होने दें।  
रोकथाम (बचाव)
अधिकतर मामलों में थैलेसीमिया को रोका नहीं जा सकता।
यदि आपको थैलेसीमिया है, या आप थैलेसीमिया जीन के वाहक हैं, तो पिता बनने के पूर्व जीन सम्बन्धी सलाहकार से मार्गदर्शन लें।
ध्यान देने की बातें
चेहरे की हड्डियों में विकृति आना।
शारीरिक विकास में कमी।
साँस लेने में कमी।
पीली त्वचा (पीलिया)।
डॉक्टर को कब दिखाएँ
यदि आपको या आपके बच्चे को थैलेसीमिया के निम्न में कोई लक्षण हैं तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें:
अत्यंत थकावट।
साँस लेने में कमी।
मुरझाये हुए से दिखाई देना।
चिड़चिड़ापन
त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया)।
चेहरे की हड्डियों में विकृति।
इस बीमारी में रोगी का शरीर पीला पड़ जाता है,
रोगी के शरीर में शुद्ध खून बनना बंद हो जाता है,
हड्डियों का विकास रूक जाता है,
सोचने विचारने की क्षमता कम हो जाती है,
बच्चों में शरीर के विकास की दर कम हो जाती है,
बड़ो में थकावट अधिक होने लगती है,
थोड़ी बहुत मेहनत के बाद चक्कर आने लगते है,


सर्वकल्प क्वाथ (sarvkalp kawath) :- ३०० ग्राम
बनाने की विधि :- एक बर्तन में लगभग ४०० मिलीलीटर पानी लें | इस पानी में एक चम्मच सर्वकल्प क्वाथ की मिलाकर इसे मन्द अग्नि पर पकाएं | थोड़ी देर पकने के बाद जब इसका पानी १०० मिलीलीटर रह जाए तो पानी को छानकर सुबह के समय और शाम के समय खाली पेट पीये |
सामग्री : -
कुमारकल्याण रस (kumar kalyan rasa) :- १- २ ग्राम
प्रवाल पिष्टी (praval pisti) :- ५ ग्राम
कहरवा पिष्टी (kaharva pisti) :- ५ ग्राम
मुक्ता पिष्टी (mukta pisti) :- ५ ग्राम
गिलोय सत (giloy sat) :- १० ग्राम
प्रवाल पंचामृत (praval panchamrit) :- ५ ग्राम
इन सभी आयुर्वेदिक औषधियों को आपस में मिलाकर एक मिश्रण बनाए | अब इस मिश्रण की बराबर मात्रा में ६० पुड़ियाँ बना लें और किसी डिब्बे में बंद करके रख दें | रोजाना एक – एक पुड़ियाँ और शाम के समय खाना खाने से आधा घंटा पहले ताज़े पानी के साथ या शहद के साथ खाएं |
सामग्री : -
कैशोर गुगुल (Kaishor guggal ) :- ४० ग्राम
आरोग्यवर्धिनी वटी(aarogaya vardhini vati):- २० ग्राम
इन दोनों औषधीयों की एक – एक गोली रोजाना सुबह और शाम के खाना खाने के बाद लें | इस औषधि को हल्के गर्म पानी के साथ लें |
सामग्री : -
धृतकुमारी स्वरस(Dhritkumari Savrasa) : - १० मिलीलीटर
गिलोय स्वरस (giloye Savrasa) :- १० मिलीलीटर
इन दोनों औषधियों में से किसी एक रस में गेहूँ के ज्वारे का रस मिलाकर पीये | इस उपचार को रोजाना सुबह और शाम खाली पेट पीये | बहुत लाभ मिलेगा |


2017-05-05

आपकी हर सुबह तरोताज़ा होगी,करें ये उपाय





    एक कहावत है, सुबह सुबह न जाने किसका मुह देख लिया पूरा दिन ख़राब चल रहा है. अगर आपने भी यह वाक्य कभी दोहराया होतो याद करिए, कभी ऐसा भी हुआ होगा कि सुबह सुबह आपने खुद का चेहरा ही आईने में देखा होगा. आपका दिन आपके हाथ में है. सुबह अच्छी होगी तो दिन भी अच्छा गुजरेगा.
    ऐसे 9 उपाय जो आपकी हर सुबह को तरोताजा बनायेंगे :
    सोने का स्थान : अच्छी सुबह के लिए सबसे जरुरी चीज़ ये है कि, आप की रात की नींद अच्छी हो. अच्छी नींद के लिए आपको कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए. सोने का कमरा साफ़, हवादार होना चाहिए. चूंकि साफ और ताज़ी हवा में सांस लेने से शरीर हल्का महसूस होता है, इससे नींद भी अच्छी आती है और शरीर सही प्रकार से थकान दूर कर पाता है, पाचन भी सुचारू रूप से सक्रिय दिनचर्या रखें : हमें नींद की आवश्यकता इसलिए होती है क्योकि हम दिन भर के मानसिक-शारीरिक तनाव से मुक्ति चाहते है, पर अगर आप दिन भर कोई शारीरिक गतिविधि नहीं करेंगे तो पाचन तंत्र सही काम नहीं करेगा फलस्वरूप नींद अच्छी नहीं आएगी. सोते समय कोई किताब पढना एक अच्छी आदत है पर समय का ख्याल भी रखना चाहिए. सस्पेंस, जासूसी या सस्ते साहिउठने के बाद : सुबह उठने पर पानी पीकर किसी खुली जगह या छत पर ही थोड़ी देर घूमें. पेट आसानी से साफ़ होगा, ताज़ी हवा से सुस्ती भागेगी और ताजगी मिलेगी. उठते ही न्यूज़पेपर पढना आँखों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है, साथ ही दुनिया भर के क्राईम, राजनीतिक, वैश्विक उथल-पुथल आदि की ख़बरें पढना नकारात्मक मूड ही देता है. थोडा रुक कर चाय नाश्ते के बाद पढ़ सकते हैमॉर्निंग वाक बहुत थकाऊ नहीं होना चाहिए. 1-2 किलोमीटर भी घूमना पर्याप्त है. सुबह की ताज़ी ठंडी हवा में सांस लेते हुए तेज क़दमों से चलना दिमाग को समुचित मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचा कर एकदम फ़्रेश कर देता है. तेज चलने से रक्त-संचार भी तेज होकर मनो-मस्तिष्क को दिन भर के कार्यइसके अलावा बाज़ार में कुछ अच्छी हर्बल टी भी मिलती है, जैसे कि पतंजलि योगपीठ की हर्बल टी. ऐसी चाय में चायपत्ती के बजाय कुछ स्वास्थ्यप्रद जड़ी-बूटियां होती है. इस प्रकार के चाय की महक और स्वाद बड़ा ही अलग पर लाजवाब होता है. ठंडियो में सुबह मसाला चाय पीना ठंडी भगाने और सुस्ती दूर करने का अचूक तरीका है.
    सुबह के नाश्ते में दलिया, अंकुरित चना-मूंग, फल के जूस, कटे फल, ब्राउन ब्रेड सैंडविच, सूखे मेवे, दही, बनाना शेक या अन्य कोई भी शेक जिसमे मीठे के लिए शहद प्रयोग किया जाये, निम्बू पानी लेना बहुत ही अच्छे विकल्प है. ऐसा नाश्ता आपको शक्ति के साथ सही पोषण और सक्रिय मन-स्थिति भी प्रदान करता हैकलाप के लिए सक्रिय कर देता है.
    सुबह का नाश्ता : सुबह उठते ही 2-3 गिलास पानी पियें. हलके गर्म पानी में निम्बू रस और एक चम्मच शहद डाल कर पिए. यह उपाय मोटापा घटाता है और विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकालता है. यह उपाय लगातार एक महीने से ज्यादा नहीं करना चाहिए. एक महीने के बाद कुछ दिनों के अन्तराल पर पुनः शुरू करना चाहिये.


    सुबह चाय पीना पसंद हो तो ग्रीन-टी पियें या बिना दूध की चाय में नींबू-रस डाल कर पियें. अगर भारतीय स्टाइल के चाय पीना पसंद होतो, अदरक डाल कर, हलकी मीठी, कम चायपत्ती वाली चाय पियें..
    मार्निंग वाक या योग करें : सुबह जल्दी उठना ही पहाड़ लगता है उसपर घूमने कौन जाये. यह सवाल सालों से मार्निंग वाक करने वाले व्यक्ति के मन में भी कई बार सुबह-सुबह आता है.
    सुबह घूमने जाना या नहा-धो कर योग करने का असली मज़ा इन्हें पूरा करने के बाद अता है. एक बार अगर आप कुछ दिनों तक नियमित रूप से इनका पालन करते है तो आप भी पाएंगे कि जो कोई इन बातों के गुण रटते रहते हैं वो झूठ नहीं बोलते.त्य पढने से आपको ख्याल भी वैसे आयेंगे और सपने भी.
    चाय-काफी, कोल्ड ड्रिंक का कम उपयोग : दिन में चाय-काफी कम पिए. ज्यादा पीने से गैस व एसिडिटी होती है और पेट भरा भरा सा लगता है और भूख भी नहीं लगती. सोते समय या रात में भूल के भी इन्हें न पिए. इन्हें पीने से दिमाग सक्रिय हो जाता है और नींद तो आपसे दूर ही भागेगी. खाना खाते समय बीच में और बाद में अगर पानी पीना हो तो हल्का गर्म पानी ही पिए. यह छोटा सा उपाय पाचन प्रक्रिया को तेज करता है और आपको बड़ा हल्का महसूस होगा.
    सोते समय ध्यान दें : ऐसा सबके साथ होता है कि सोते समय दिमाग में दिन भर की घटनाओ की फिल्म चलनी शुरू हो जाती है और साथ ही उसकी समीक्षा भी. दिमाग को रोकना तो मुश्किल है पर कंट्रोल करना भी अपने हाथ में है.
    जो बीत गया वो बस आपके दिमाग में है. इसके बजाय आने वाले दिन की कुछ प्लानिंग कर लें. भगवान का स्मरण करें, अच्छे सकारात्मक, आशावादी विचारो को मन में लायें और गहरी सांस हुए तन-मन को विश्राम दें.होता है.

    अगर संभव होतो बिस्तर पर हलके रंग की (सफ़ेद रंग हो तो सर्वोत्तम) सूती चद्दर बिछाएं. यह प्रयोग बहुत ही सुकून देता है, मन-मस्तिष्क को आराम पहुंचाता है. तकिये पर थोडा सा कोई अच्छा, हलकी खुशबु वाला इत्र जैसे गुलाब, लेवेंडर आदि का छिड़क दें. अगर आप अलार्म लगाते है तो इस बात का ध्यान रखे कि अलार्म की आवाज़ बहुत तेज, कर्कश न हो
    ऐसे लोग जब सुबह गहरी नींद सो रहे होते है और अचानक से अलार्म चीखना शुरु करता है, जिससे वो एकदम चौंक कर उठते हैं. उनका दिल इतना तेजी से धडकता है जैसे हार्ट-अटैक आ गया हो. ऐसा करने से आप सुबह सुबह ही चिडचिडा उठते हैं. संभव हो तो खिड़की के पास सोये या जहाँ से सुबह का प्राकृतिक प्रकाश आये.
    ये सुबह उठने का बेहतरीन तरीका है. अगर आपको अलार्म लगाना ही है तो ऐसी रिंगटोन लगाइए जो कि धीमे से तेज होती हुई हो या कोई मधुर गाना, प्राकृतिक आवाज़ जैसे चिडियों की चहचहाहट या कोई भजन आदि भी लगा सकते हैं. कमरे में समुचित अँधेरा हो जिससे कि दिमाग सोने की मानसिक स्थिति में आ सके. कमरा बहुत ठंडा या गर्म न हो.


    रात का खाना : इस बात का सदैव ख्याल रखें कि रात का खाना हल्का हो. खाना जल्दी खा लिया जाये जिससे कि खाने और सोने के बीच 2-3 घंटे का फासला हो. खाने बहुत ज्यादा तला-भुना न हो. सोने के पहले हल्का गर्म दूध पीना अच्छी नींद लाने में बढ़िया सहायक माना गया है.

    2017-05-03

    गुर्दे की सूजन के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार / Household Ayurvedic Treatment of Swelling of Kidneys


    किडनी (kidney / गुर्दा ) हमारे शरीर का एक बेहद ही महत्वपूर्ण अंग होता है जिसकी नियमित देखरेख से हम इसको स्वस्थ रख सकते हैं | |पेट की खराबी, प्रदूषित भोजन तथा अम्लीय पदार्थों का अधिक सेवन नहीं करना चाहिए| इससे गुर्दों से शोथ हो जाता है| इसी बात को चिकित्सक यूं कहते हैं कि गुर्दे में जब क्षारीय तत्त्व बढ़ जाते हैं तो उसमें सूजन आ जाती है| फलस्वरूप वहां दर्द होने लगता है|
    गुर्दे में दर्द-सूजन का कारण
    जब गुर्दों द्वारा रक्त की शुद्धि भली प्रकार नहीं होती तो पानी का अंश पेशाब द्वारा कम निकलता है| इसके फलस्वरूप मूत्रवाहक संस्थान की शुद्धि ठीक से नहीं हो पाती| मूत्र के साथ तरह-तरह के पदार्थों के बारीक कण बाहर निकलने लगते हैं| इससे गुर्दों में सूजन आ जाती है| और बुखार रहने लगता है|
    गुर्दे में दर्द-सूजन की पहचान
    पेशाब करते समय दर्द का आभास होना |
    कभी-कभी पेशाब रुक-रुककर आना |
    पीठ में दर्द एवं बेचैनी होना |
    मूत्र से तीव्र दुर्गंध आना |
    पेशाब द्वारा विषैले पदार्थ का स्राव |
    सिर दर्द होना |
    मन न लगना |
    व्याकुलता होना |
    बदन में दर्द रहना आदि |

    पेशाब करते समय दर्द महसूस होता है| कभी-कभी पेशाब रुक-रुककर आने लगता है| पीठ में दर्द एवं बेचैनी होती है| मूत्र से तीव्र दुर्गंध आती है| पेशाब द्वारा तरह-तरह के पदार्थ निकलने लगते हैं| ऐसे में सिर दर्द, मन न लगना, व्याकुलता, बदन में दर्द आदि लक्षण भी प्रकट होते हैं|
     
    गुर्दे की सूजन के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार 
    लौकी का नियमित सेवन करें :- लौकी में श्रेष्ठ किस्म का पोटेशियम प्रचुर मात्रा में मिलता है इसलिए यह गुर्दे के रोगों में बहुत उपयोगी है और इससे पेशाब खुलकर आता है |
    अंगूर की बेल, सेंधा नमक, पानी
    50 ग्राम अंगूर की बेल के पत्ते पानी में पीसकर छान लें| उसमें थोड़ा-सा सेंधा नमक मिलाकर रोगी को पिलाएं| गुर्दे के दर्द से तड़पता मरीज भी ठीक हो जाएगा|
    खीरे का नियमित सेवन करें :- किडनी तथा लीवर की समस्या को दूर करने के लिए खीरे का नियमित रूप से सेवन करने से समस्या से मुक्ति मिल जाती है |
    आंवले का सेवन करें :- आंवले का नियमित सेवन हमारे गुर्दों को स्वस्थ रखता है |
    तरबूज तथा आलू का रस इस्तेमाल करे :- तरबूज तथा आलू का रस भी गुर्दे के रोग को ठीक करने के लिए सही होता है इसलिए पीड़ित रोगी को सुबह शाम इसके रस का सेवन करना चाहिए।
    नियमित पानी का सेवन करें :- गुर्दों की समस्या से दूर रहने के लिए दिन में कम से कम दो बार गुनगुना पानी पीना चाहिए | यदि गुनगुना पानी ना मिले तो सादा पानी तो अवश्य पीना चाहिए |

     
    त्रिफला और पानी
    एक बड़ा चम्मच त्रिफला चूर्ण रात को सोने से पूर्व हल्के गरम पानी के साथ लेने से कुछ ही दिनों में गुर्दे की सूजन ठीक हो जाती है|
    पानी और पुनर्नवा
    दो प्याले पानी में एक तोला पुनर्नवा डालकर खूब उबालें| जब पानी आधा रह जाए तो छानकर सुबह-शाम पीने से गुर्दे की सूजन में लाभ होता है|
    तुलसी, अजवायन, सेंधा नमक और पानी
    तुलसी की पत्तियां 20 ग्राम, अजवायन 20 ग्राम, सेंधा नमक 10 ग्राम और तुलसी के पत्ती 10 ग्राम - इन सबको छांव में सुखा लें| फिर उन्हें कूट-पीसकर चूर्ण बना लें| प्रात: और सांयकाल गुनगुने पानी से 2-2 ग्राम चूर्ण खिलाएं| एक ही खुराक में गुर्दे के दर्द-सूजन में आराम आ जाएगा|
    गुर्दे में दर्द-सूजन में क्या खाएं क्या नहीं
    शुद्ध जल अधिक मात्रा में पिएं| पानी को अच्छी तरह उबालने और छानने के बाद रोगी को देना चाहिए| भोजन में जौ, परवल, करेला एवं सहिजन की फली दें| इसके अतिरिक्त नारियल का पानी, गन्ने का रस, जामुन तथा तरबूज विशेष लाभ पहुंचाते हैं|
    इस रोग में नमक का सेवन बिलकुल बंद कर देना चाहिए| मांस-मछली, अंडा, तंबाकू, बीड़ी-सिगरेट एवं शराब का भी उपयोग न करें| दही, दही से बनी चीजें, टमाटर, नीबू आदि खट्टी चीजों का इस्तेमाल करने से भी रोगी को हानि हो सकती है, अत: इनके सेवन से दूर रहें|

    2017-04-24

    उपदंश सिफलिस के उपचार होम्योपैथी से / Syphilis Treatment In Homeopathy


      इस रोग में रोगी के लिंग पर फुसी हो जाती है जो धीरे-धीरे बढ़कर घाव का रूप ले लेती है । इस घाव में से मवाद आती है, खुजली मचती है और जलन होती है । यह घाव ठीक नहीं हो पाता, जिससे लिंग नष्ट होने लगता है । इस रोग में सविराम ज्वर आना, गले में घाव, सिर में भारीपन, होठों पर फुन्सियाँ हो जाना, सिर के बाल उड़ना, हड्डियों में दर्द रहना आदि लक्षण प्रकटते हैं । रोग की अन्तिम अवस्था में पूरे शरीर पर चकते से निकल आते हैं ।
    काली आयोड 200- यह रोग की तीसरी अवस्था में लाभप्रद है ।
    सिफिलिनम 200- यह अन्य दवाओं के साथ में सहायक दवा के रूप में प्रयोग की जाती है। रोग की तीनों अवस्थाओं में इसे देना चाहिये । पहले तीन माह तक प्रति सप्ताह एक बार के हिसाब से दें और फिर प्रत्येक पन्द्रह दिनों में एक बार के हिसाब से रोग के ठीक होने तक दें ।


    मर्ककॉर 3- कठिन उपदंश में लाभकर है जबकि मुँह व गले में घाव, मुँह से लार गिरना आदि लक्षण प्रकट हों ।
    ऑरम मेट 30, 6x- उपदंश के कारण हड्डियों की बीमारी हो जाना, नाक व तालु की हड्डी में घाव हो जाना और उनसे सड़ा हुआ मवाद आना, रोगाक्रान्त स्थान पर दर्द, दर्द का रात को बढ़ जाना- इन लक्षणों में यह दवा लाभ करती है ।
    स्टैफिसेग्रिया 3x- लिंग पर तर दाने हो गये हों, दर्द हो, सूजन भी रहे, पारे का अपव्यवहार हुआ हो- इन लक्षणों में देवें ।
    साइलीशिया 30- लिंग के जख्मों में मवाद पड़ जाये और वह ठीक न हो पा रहे हों तो यह दवा दें ।

    हिपर सल्फर 30- उपदंश में मसूढ़े के रोग, हड्डियों में दर्द, घाव से बदबूदार मवाद आना, कभी-कभी खून भी आना, खुजली मचना, रोगग्रस्त अंग को छू न पाना, सुबह-शाम तकलीफ बढ़ना आदि लक्षण होने पर देनी चाहिये । यह पारे के अपव्यवहार के कारण रोग-विकृति में भी अत्यन्त लाभकर सिद्ध हुई है ।
    कूप्रम सल्फ 6x- डॉ० मार्टिन का विचार था कि- यह दवा धातुगत उपदंश में अत्यन्त उपयोगी है ।
    कैलोट्रोपिस जाइगैण्टिया 30- पारे के अपव्यवहार से उत्पन्न विकृतियों में लाभप्रद है । उपदंश की रक्तहीनता में भी उपयोगी है ।
    मर्कसॉल 3x, 6- यह इस रोग की पहली व दूसरी अवस्था में लाभकर है। जैसे ही मालूम चले कि उपदंश हुआ है, रोगी को तुरन्त इस दवा को देना आरंभ कर देना चाहिये । इस दवा से रोग बढ़ नहीं पायेगा और आराम महसूस होने लगेगा । यह इस रोग मे अत्यंत उपयोगी औषधि  होम्योपैथी से  हैं ।
    मर्क प्रोटो आयोड 3x- यह रोग की दूसरी अवस्था में लाभप्रद है । अगर रोग भयानक मालूम पड़े तो मर्कसॉल के स्थान पर इसी दवा का सेवन कराना चाहिये ।

    2017-04-20

    स्त्रियॉं की माहवारी(पीरियड्स) की समस्याओं के होम्योपैथिक उपचार




    :   मासिक धर्म होना महिला के शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक होता हैं. मासिक धर्म का पूरा चक्र 28 दिनों का होता हैं. कई महिलाओं को मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत रहती हैं. मासिक धर्म की अनियमितता का मतलब हैं. मासिक धर्म का समय पर न होना. किसी – किसी महिला को मासिक धर्म दो महीने में एक बार होते हैं तो किसी को एक महीने में दो तीन बार होते हैं. मसिक धर्म का अपने समय पर होना बहुत ही आवश्यक होता हैं. मासिक धर्म के शुरू होने की जैसे एक उम्र होती हैं. ठीक उसी प्रकार इसके समाप्त होने की भी उम्र होती हैं. किसी भी महिला को मासिक धर्म 32 साल तक होता हैं. जबसे महिला को मासिक धर्म होने शुरु होते तब से ही उसमे 32 साल जोड़ देने चाहिए. अर्थार्त इसके समाप्त होने तक महिला की उम्र 48, 49 या 50 हो सकती हैं. इससे पहले या बाद में मासिक धर्म के समाप्त होना मासिक धर्म की अनियमितता का सूचक होता हैं. यह अनियमितता महिला को कुछ शारीरिक व मानसिक कारणों से हो सकती हैं. तो चलिए इसके कारणों व लक्षणों के बारे में थोडा जान लेते हैं.
    मासिक धर्म की अनियमितता के कारण
    1. मासिक धर्म की अनियमितता महिला की किसी प्रकार की बिमारी के कारण भी हो सकती हैं. अगर कोई महिला एक महीने से अधिक समय तक बीमार हो तो उसे मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत हो सकती हैं.
    2. अगर किसी महिला को थायराइड की बीमारी हैं. तो उसे भी मासिक धर्म की अनियमितता की समस्या हो सकती हैं.
    3. मासिक धर्म की अनियमितता गर्भावस्था की शुरुआत के कारण भी हो सकती हैं.
    4. अधिकतर स्त्रियां हमेशा परेशान रहती हैं. जिससे उनके उपर मानसिक दबाव व तनाव बढ़ जाता हैं. प्रत्येक महिला के शरीर में तिन प्रकार के हार्मोन होते हैं. एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोंस्टेरोन आदि. इन तीनों में से अगर महिला अधिक तनाव में रहती हैं तो पहले दो हार्मोन पर सीधा असर पड़ता हैं. जिसके कारण महिला के मासिक धर्म में अनियमितता होनी शुरू हो जाती हैं.
    5. कभी – कभी अधिक व्यायाम करने के कारण भी महिला को मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत हो जाती हैं. अधिक व्यायाम करने से महिला के शरीर में उपस्थित एस्ट्रोजन हार्मोन की संख्या में वृद्धि हो जाती हैं. जिससे मासिक धर्म रुक जाते हैं और महिला को मासिक धर्म की अनियमितता की समस्या का सामना करना पड़ता हैं.
    6. मासिक धर्म की अनियमितता महिला के खानपान में असंतुलन के कारण भी हो जाती हैं. 
    7. मासिक धर्म की अनियमितता महिला के शरीर का वजन बढने या घटने के कारण भी हो जाती है.
    मासिक धर्म की अनियमितता के लक्षण
    1. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला के गर्भाशय में दर्द होता हैं.
    2. मासिक धर्म की अनियमितता से महिला को भूख कम लगती हैं.
    3. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला के शरीर में दर्द रहता हैं. खासतौर महिला के स्तनों में, पेट में, हाथ – पैर में तथा कमर में.
    4. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला को अधिक थकान भी महसूस होती हैं.
    5. मासिक धर्म के ठीक समय पर न होने के कारण महिला को पेट में कब्ज तथा दस्त की भी शिकायत हो जाती हैं.
    6. मासिक धर्म की अनियमितता होने से महिला के शरीर में स्थित गर्भाशय में रक्त का थक्का बन जाता हैं.
     

    मासिक धर्म की समस्याओं की होम्योपैथिक  दवा  : 
    नक्स वोमिका :इसके कुछ लक्षण पल्स के लक्षणों के विपरीत हैं। दुबला-पतला शरीर, क्रोधी, झगड़ालू, उग्र स्वाभाव, चिड़चिड़ापन, मेहनती, काम में लगी रहने वाली, तनाव से ग्रस्त रहने वाली महिला को मासिक स्राव जल्दी-जल्दी होता हो, देर तक होता रहे, ज्यादा मात्रा में हो, ठण्ड या ठण्डी हवा से रोग बढ़ता हो, तो ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति की 5-6 गोली दिन में 3 बार लेनी चाहिए।
    सीपिया : यह दवा दुबले-पतले शरीर वाली, लम्बे कद की, नाक और गालों पर झाई के दाग हों, कामकाज में रुचि न हो, उदासीन, विरक्त, दु:खी, अधीर, निराश, हतोत्साह, किसी से भी मोह न हो, गर्भाशय खिसकता-सा अनुभव करें, जैसे बाहर निकल पड़ेगा, गुदाद्वार में कुछ अड़ा हुआ-सा लगे, कब्ज हो, ठण्ड से रोग बढ़े, मासिक धर्म में रुकावट हो, मात्रा में कमी हो या देरी से हो, तो ‘सीपिया’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसनी चाहिए।
    मैगफॉस : ऋतु स्राव के समय दर्द होता हो और पेट दबाने से या सेंक करने से आराम मिलता हो, तो मैगफॉस 30 शक्ति की 5-6 गोलियां चूसनी चाहिए। दर्द में लाभ न हो, तो दो घण्टे बाद फिर एक खुराक ले सकते हैं। दर्द दूर करने वाली यह श्रेष्ठ दवा है।
    कैमोमिला : स्त्री का स्वभाव चिड़चिड़ा, क्रोधी और रूखा हो, बच्चों को डांटती-डपटती रहती हो, जरा-सी बात पर भड़क उठती हो और ऐसे स्वभाव की महिला को काले रंग का, थक्केदार टुकड़ों वाला ऋतु स्राव भारी मात्रा में होता हो, ऋतु स्राव के समय दर्द भी होता हो, तो ‘कैमोमिला’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार लेनी चाहिए।
    थ्लेस्पी बसf पेस्टोरिस : जब किसी महिला को भारी मात्रा में रक्त स्राव हो, रुक-रुक कर हो, पर बन्द न होता हो, बहुत कष्ट और शूल के साथ हो, महिला की हालत संभल न रही हो, कमजोरी बढ़ रही हो, पेट में काट-सी चलती हो, तो ‘थ्लेस्पी बसf पेस्टोरिस’ के मूल अर्क की 10-10 बूंद आधा कप पानी में घोलकर दिन में 3 बार देने से आराम होता है।
    हेमेमिलिस : बहत ज्यादा मात्रा में रक्त स्राव होना, स्राव का रंग काला होना, स्राव के साथ टुकड़े गिरना आदि लक्षणों पर किसी भी प्रकृति की महिला को ‘हेमेमिलिस’ के मदर टिंचर (मूल अर्क) या 6 शक्ति के टिंचर की 5-6 बूंद 2 बड़े चम्मच भर पानी में घोल कर 15-15 मिनट से 3-4 बार देने पर रक्त स्राव पर नियंत्रण हो जाता है। ग्रेफाइटिस : यदि महिला मोटी-ताजी और चर्बीयुक्त शरीर वाली हो, पल्सेटिला के गुण वाली हो, पर किसी त्वचा रोग से भी ग्रस्त हो, शीत प्रकृति वाली हो, शंकाग्रस्त रहती हो और अनियमित मासिक धर्म होता हो, देर से तथा कम मात्रा में होता हो, नियत समय पर न होता हो, पीले रंग वाला, पतला और हल्का पानी जैसा होता हो, तो ‘ग्रेफाइटिस’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसकर सेवन करनी चाहिए।
    पल्सेटिला : यह दवा महिलाओं की मित्र-औषधि मानी जाती है, क्योंकि इस दवा के अधिकांश लक्षण नारियों के गुणों से मिलते-जुलते हैं। इसलिए जिन पुरुषों में भी ये गुण पाये जाते हैं, उनके लिए भी पल्सेटिला उपयोगी सिद्ध होती है। लज्जा, नम्रता, सौम्यता, कोमलता, मृदुलता, अधीरता, व्याकुलता आदि पल्सेटिला के मानसिक गुण हैं। मोटापा, मांसलता, गुदगुदापन इसके शारीरिक लक्षण हैं। खुली हवा पसन्द करना, बन्द कमरे में परेशानी अनुभव करना, गर्मी से परेशानी और शीतलता से राहत होना, भूख-प्यास कम लगना, सहानुभूति मिलने या रो लेने से अच्छा अदूभव करता आदि पल्सेटिल के स्वभावगत लक्षण हैं। जो युवती या महिला मानसिक, शारीरिक और स्वभाव की दृष्टि से ऐसे लक्षणों वाली हो और उसका मासिक ऋतु स्राव अनियमित हो, ऋतु साव के समय दर्द हो, दर्द के समय ठण्ड लगे, दर्द का स्थान बदलता रहता हो और ऋतु स्राव के प्रारंभ मध्यकाल या अन्त में दर्द होता हो, कभी कम व कभी ज्यादा मात्रा में होता हो, कभी जल्दी व कभी देर से होता हो यानी हर दृष्टि से जब मासिक ऋतु स्राव अनियमित हो और दर्द भी हो, तो ‘पल्सेटिला’ 30 शक्ति में 5-6 गोलियां सुबह-दोपहर-शाम चूस लेनी चाहिए।
    इपिकॉक : मासिक स्राव ज्यादा मात्रा में हो रहा हो और स्राव का रंग चमकीला लाल रंग वाला हो, जी मतली करता हो, सांस में भारीपन हो (या महिला दमा रोग से ग्रस्त हो), रहर-हकर ऋतु स्राव बढ़ जाता हो, गर्मी से रोग बढ़े और ठण्डी खुली हवा से आराम मालूम दे, तो ‘इपिकॉक’ 30 शक्ति 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसनी चाहिए।
    साइक्लामेन : पल्सेटिला के लक्षणों वाली महिला को यदि प्यास खूब लगती हो, खुली हवा पसन्द न हो, रोने से जी हल्का होता हो, एकान्त पसन्द करती हो, आत्मग्लानि का अनुभव करती हो, ऋतु स्राव के समय चक्कर आते हों, दुःखी, निराश और उदास रहे, मासिक धर्म के समय दर्द होता हो, तो इन लक्षणों वाली महिला को मासिक धर्म की अनियमितता दूर करने के लिए साइक्लामेन 30 दिन में 3 बार लेनी चाहिए।

    2017-04-15

    सूजाक(Gonorrhoea) की होम्योपैथिक चिकित्सा


       होमियोपैथिक चिकित्सा विज्ञान के जनक डॉ. हैनीमैन ने तीन प्रकार के विषों को सभी प्रकार के रोगों को उत्पन्न करनेवाला बताया है। इन तीन विषों के नाम हैं – ‘सोरा’, सिफिलिस’ और ‘साइकोसिस’।
    इस सूजाक रोग का संबंध ‘साइकोसिस’ से होता है। इस रोग की उत्पत्ति संक्रामक कारणों से छूत लगने पर होती है। सूजाक रोग से ग्रस्त स्त्री या पुरुष से सहवास करने वाले स्त्री या पुरुष को यह रोग हो जाता है। ‘निसेरिया गोनोरियाई’ नामक जीवाणु द्वारा यह रोग होता है। जननांगों की उचित सफाई न होने पर इस रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इस रोग की तीन अवस्थाएं होती हैं –
    इस रोग में रोगी के लिंग के अन्दर मूत्र-नली में से मवाद आता है । मूत्र-नली में जलन, सुरसुराहट, खुजली, मूत्र-त्याग के समय जलन एवं दर्द होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं ।
    थूजा 30, 200- रोग की द्वितीयावस्था में लाभकर है जबकि मूत्र-मार्ग में जलन हो और पीला मवाद आये । वैसे सूजाक की सभी अवस्थाओं में लाभकारी है । डॉ० ई० जोन्स का कहना है कि चाहे सूजाक में कोई भी दवा क्यों न दी जाये परन्तु रात को सोने से पहले रोगी को थूजा 30 की पाँच बूंद अवश्य दे देनी चाहिये- इससे सूजाक का विष शरीर से बाहर निकल जाता है ।
    एकोनाइट 1x, 30- रोग की प्रथमावस्था में लाभकर है । मूत्र-मार्ग में लाली, सूजन, मूत्र-त्याग में जलन, बूंद-बूंद पेशाब आना आदि लक्षणों में उपयोगी हैं ।
    सीपिया 200– मूत्र-त्याग में जलन, मूत्रेन्द्रिय में टनक जैसा दर्द- इन लक्षणों में दें ।
    कोपेवा 3x, 30-
    मूत्र-नली तथा मूत्राशय में सुरसुराहट हो, पतला-दूधिया स्राव आये, मूत्र बूंद-बूंद करके आये, मूत्र रक्त मिला और दर्द व जलन के साथ हो- इन लक्षणों में लाभप्रद है ।
     

    कोपेवा : जब मवाद ज्यादा गाढ़ा न होकर दूध जैसा पतला आता हो, जलन के साथ पेशाब हो, पेशाब के साथ गोंद जैसा लसदार व चिकना स्राव निकलता हो, पेशाब का वेग मालूम होने पर भी पेशाब न होता हो, बूंद-बूंद करके पेशाब होना, हरा पेशाब, तीखी बदबू आना आदि लक्षणों पर 30 शक्ति में दवा का सेवन फायदेमंद है।
    क्यूबेवा : पहली अवस्था में जब अन्य दवाओं के सेवन से जलन में कुछ कमी हो जाए, पेशाब के अंत में जलन न होती हो, मवाद गाढ़ा होने लगे, तब क्यूबेवा का प्रयोग उत्तम है। पेशाब के बाद जलन होने और मूत्र नली में सिकुड़न-सी मालूम देने और स्राव पतला हो जाने पर इस दवा का 30 शक्ति में प्रयोग करना हितकर होता है।
    अर्जेण्टमनाइट्रिकम : मूत्र-विसर्जन के अन्त में पुरुषेंद्रिय से लेकर गुदा-द्वार तक असहनीय पीड़ा होना, इस दवा का मुख्य लक्षण है। मूत्रनली में तेज जलन होना, अकड़न और सूजन होना, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, आंखों से ज्यादा कीचड़ आना इसके मुख्य लक्षण हैं। ज्यादा मीठा खाना और शरीर का दुबला-पतला होना आदि लक्षणों के आधार पर यह दवा अत्यंत उपयोगी है।
    केप्सिकम : जब पेशाब की हाजत लगातार मालूम दे, पर पेशाब न हो, बड़ी मुश्किल से और जलन के साथ पेशाब हो, पेशाब में छाछ जैसा सफेद मवाद आए और पुरुषेंद्रिय के तनाव से दर्द मालूम दे, तब केप्सिकम का प्रयोग करना गुणकारी होता है। बात-बात पर क्रोधित होना और मोटापा बढ़ते जाना भी इसका लक्षण है। 6 शक्ति से 30 शक्ति तक दवा लेनी चाहिए।
    दूसरी अवस्था : यदि प्राथमिक स्थिति में ही इलाज न किया जाए, तो रोग बढ़ने लगता है। बड़ी तकलीफ के साथ बूंद-बूंद करके पेशाब होता है, पेशाब निकलते समय तीव्र जलन होती है, शिश्न-मुण्ड (पुरुष जननेंद्रीय का अग्रभाग) पर सूजन आ जाती है, वह लाल हो जाता है और मूत्र-मार्ग से लगातार मवाद आने लगता है। यह अवस्था बहुत कष्टपूर्ण होती है।

    उपचार-

     

    कैनाबिस इण्डिका : रोग की द्वितीय अवस्था में यह दवा महान औषधि की तरह काम करती है। मूत्रनली में इतना दर्द हो कि सहन न किया जा सके और दोनों पैर चौड़े करके चलना पड़े, ये इस दवा के मुख्य दो लक्षण हैं। कमर में दर्द रहना, गाढ़ा पीले रंग का मवाद आना, ऐसा लगे कि मूत्रनली ही बंद है। अत: पेशाब नहीं आ रहा है, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, मूत्र मार्ग से खून आना, पुरुषेंद्रिय के तनाव से दर्द होना आदि प्रमुख लक्षण हैं। ठंडे पानी से आराम मिलता है। दवा अर्क अथवा 6 × से 30 शक्ति तक दवा श्रेष्ठ है।

    केंथेरिस : अधिकतर लक्षण ‘कैनाबिस इण्डिका’ के लक्षणों जैसे ही हैं। इसमें पेशाब के वेग का और चुभन का अनुभव कैनाबिस इण्डिका की अपेक्षा ज्यादा मात्रा में होता है। पेशाब बूंद-बूंद करके, कष्टप्रद हो। पेशाब से पहले, पेशाब के दौरान और पेशाब करने के बाद जलन हो, पुरुषेंद्रिय में खिंचाव होने पर अधिक दर्द हो, कभी-कभी पेशाब में खून भी आने लगे, तो 6 से 30 शक्ति तक की दवा की कुछ खुराकें जल्दी-जल्दी लेने पर फायदा होता है।
    पल्सेटिला : जांघों और टांगों में दर्द होना, रोग शुरू हुए कई दिन बीत गए हों, मूत्र-मार्ग से गाढ़ा, पीला या नीला मवाद आने लगे और मवाद का दाग न लगता हो, अण्डकोषों पर सूजन आ गई हो, मरीज अपनी परेशानी बताते-बताते रोने लगे और चुप कराने पर थोड़ी देर में शांत हो जाए, पेशाब बूंद-बूंद हो, प्रोस्टेटाइटिस हो, पेशाब करते समय दर्द एवं चुभन महसूस हो, गर्मी में परेशानी बढ़े, मूत्र द्वार ठंडे पानी से धोने पर कुछ आराम मिले, तो 30 शक्ति में दवा उपयोगी है।
    तृतीय अवस्था :
    इस अवस्था में पहुंचने पर रोग को पुराना माना जाता है। इस अवस्था में रोगी को ऐसा लगता है कि रोग चला गया है, क्योंकि सूजन मिट जाती है, जलन बंद हो जाती है और पेशाब आसानी से होने लगता है। ज्यादा जोर देकर पेशाब करने पर मूत्र-मार्ग से गाढ़ा चिकना मवाद निकलता है। इसे ही सूजाक होना कहते हैं। इस अवस्था में कुछ समय बीत जाने पर नाना प्रकार के उपद्रव होने लगते हैं। इन उपद्रवों में मूत्राशय प्रदाह (सिस्टाइटिस), बाधी (ब्यूबो), पौरुषग्रंथी प्रदाह (प्रोस्टेटाइटिस), लसिकाओं का प्रदाह (लिम्फेजांइटिस), प्रमेहजन्य संधिवात (गोनोरियल आर्थराइटिस), स्त्रियों में जरायु-प्रदाह (मेट्राइटिस), डिम्ब प्रणाली प्रदाह (सालपिंजाइटिस), वस्ति आवरण प्रदाह (पेल्विक पेरीटोनाइटिस) आदि प्रमुख उपद्रव हैं।
    लक्षणों की समानता (सिमिलिमम) के आधार पर, अलग-अलग अवस्थाओं के लिए अलग-अलग औषधियां हैं। रोगी एवं अवस्थाओं की भिन्नता के आधार पर लगभग चालीस (40) औषधियां इस रोग हेतु प्रयुक्त की जा सकती हैं। कुछ विशेष लक्षणों के आधार पर निम्न औषधियों का प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। लक्षणों के अनुसार दवा का चुनाव करके नियमित रूप से दवा का सेवन करने पर जरूर लाभ होगा।

    उपचार-


    थूजा : पुराने (क्रॉनिक) सूजाक और साइकोटिक विष के लिए थूजा श्रेष्ठ औषधि है। जब मवाद पतला आने लगे, पेशाब करते समय ऐसा लगे, जैसे उबलता हुआ पानी निकल रहा हो, तीव्र कष्ट व जलन हो, बूंद-बूंद पेशाब हो, लगातार पेशाब की हाजत बनी रहे, अण्डकोष कठोर हो गए हों और ‘सूजाक जन्य वात रोग’ (गोनोरियल रयुमेटिजम) की स्थिति बन जाए, प्रोस्टेटिक ग्रंथियों में सूजन हो जाए, सिरदर्द, बालों का झड़ना, ऐसा महसूस होना जैसे पैर शीशे के बने हुए हैं और टूट जाएंगे, जैसे पेट में कोई जीवित वस्तु है, जैसे आत्मा और शरीर अलग हो गए हैं, शरीर के विभिन्न हिस्सों पर मस्से निकलने लगते हैं, तब 30 शक्ति से 200 शक्ति तक की दवा की कुछ खुराकें ही कारगर होती हैं।फ्लोरिक एसिड : यह भी पुराने सूजाक की अच्छी दवा है। दिन में प्राय: स्राव नहीं होता, पर रात में होता रहता है। कपड़ों में दाग लगते हैं, पेशाब में जलन होती है और अत्यधिक कामोत्तेजना रहती है। रोगी कमजोर होते हुए भी दिन भर परिश्रम करता है। गर्मी-सर्दी में कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन रात के लक्षणों से प्रभावित होता है। 30 शक्ति में एवं तत्पश्चात् 200 शक्ति में दवा लेनी चाहिए।
    क्लीमेटिस : पल्सेटिला नामक दवा के बाद जो लक्षण बचे रहते हैं, उनके लिए ‘क्लीमेटिस’ उपयोगी है। इस रोग की तीसरी अवस्था में जब मूत्रनली सिकुड़ जाए, मवाद आना बंद हो चुका हो, अण्डकोषों पर सूजन हो और वे कठोर हो गए हों, विशेषकर अण्डकोषों के दाएं हिस्से पर सूजन होती है, तब ‘क्लीमेटिस’ 30 शक्ति में प्रयोग करनी चाहिए। इसमें भी पेशाब रुक-रुक कर होता है।