21.10.10

चुंबक से करें रोगों का ईलाज// How to cure diseases with magnet therapy?








चुम्बक चिकित्सा क्या है?

विविध रोगों मे चुंबकीय शक्ति से रोग ग्रस्त अंगों एवं शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित करने की विधि को चुंबक चिकित्सा कहते हैं। चुंबक थिरेपी में चुंबक का प्रयोग दो तरह से किया जाता है।
१. सार्वदैहिक चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग हथेलियों और पैरों के तलवों पर किया जाता है।
२. स्थानीय चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग रोग ग्रस्त भाग पर किया जाता है।
सार्वदैहिक प्रयोग के अंतर्गत उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव वाले चुंबक का एक जोडा आवश्यक है। अब हमारे शरीर के विध्युतीय सह संबंध के आधार पर इनका उपयोग जरूरी है। लेकिन अधिकांश मामलों मे 



उत्तरी ध्रुव चुंबक का इस्तेमाल शरीर के दांये भाग पर ,आगे की तरफ़ और शरीर के ऊपरी भाग पर विशेषतौर पर किया जाता है। दक्छिणी ध्रुव चुंबक का प्रयोग शरीर के बांये भाग पर , पीठ पर और शरीर के निचले अंगों पर किया जाता है।
स्थानीय प्रयोग करते समय दर्द,सूजन ,रोग संक्रमण को अधिक महत्व देना होता है। सीधा नियम यह है कि जब रोग नाभि से ऊपर के हिस्सों में हो तो चुंबक हथेली पर लगावें। और अगर रोग नाभी से नीचे के भाग में हो तो चुंबक का प्रयोग तलवों पर करना चाहिये। रीढ की हड्डी की तकलीफ़ों, घुटना, पैर ,नाक और आंख के रोगों में जरूरत लगे तो दो तीन चुंबक एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अंगूठे में दर्द हो तो दो चुंबकों के बीच अंगूठा रखने से शीघ्र लाभ होता है।

चुंबक चिकित्सा के लाभ--

चुंबक चिकित्सा इतनी सरल है कि इसका प्रयोग किसी भी समय और शरीर के किसी भी भाग पर आसानी से किया जा सकता है।
चुंबकत्व से रक्त परिसंचरण तन्त्र को शक्ति प्राप्त होती है जिसके फ़लस्वरूप कई रोगों में उपकार होते देखा गया है। शरीर के अंगों की थकावट,सूजन और पीडा का निवारण होता है। चुंबक का असर कभी कभी तो तो इतना ज्यादा और तुरंत होता है कि एक बार के प्रयोग से रोग शमन हो जाता है,दूसरी बार चुंबक लगाने की आवश्यकता नहीं पडती। उदाहरण के लिये दांत में दर्द और मौच आने पर एक ही प्रयोग काफ़ी रहता है। हम एक ही चुंबक का कई रोगियों पर प्रयोग कर सकते हैं इसे पानी में उबालने या जंतु रहित करने की जरूरत नहीं पडती। फ़िर भी अगर चर्म विकृतियों पर चुंबक का इस्तेमाल करें तो चुंबक को महीन कपडे में लपेटकर प्रयोग करें। बाद में कपडे को धोलें। एक अच्छी बात यह है कि चुंबक उपचार की आदत नहीं पडती। चुंबक चिकित्सा कभी भी किसी भी समय बंद की जा सकती है।शारीरिक दर्दों को नष्ट करने की चुंबक में आश्चर्यजनक शक्ति है। पीडा किसी भी कारण से हो,चुंबक चिकित्सा अपना प्रभाव प्रदर्शित करती है। इससे शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होकर रोगमुक्ति में सहायता मिलती है।
शरीर के जिस भाग पर चुंबक लगानी है उसके मुताबिक अलग-अलग साईज के चुंबकों का प्रयोग ठीक रहता है। जैसे आंख पर छोटे और कम शक्ति के चुंबक लगाते हैं जबकि अगर शरीर के विस्तृत भाग में दर्द और सूजन हो तो बडे आकार के अधिक शक्ति वाले चुंबक लगाना उचित रहता है। आंख और हृदय जैसे कोमल अंगों पर शक्तिशाली चूबक नहीं लगाना चाहिये। बडे आकार की एवंकठोर मांसपेशियों जैसे एडी,घुटनों और कुल्हों पर अधिक शक्तिशाली और बडे चुंबक का प्रयोग उत्तम रहता है।

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10.9.10

कलर थेरेपि से करें रोगों का ईलाज.



कलर थेरपी से हुई आसान चिकित्सा


कलर मानव और सृष्टि के हर चेतन जीव पर गहराई तक असर डालते है। इससे स्पन्दन पैदा होते हैं जो रोग निवारण का काम करते प्राचीन काल में भारत ,चीन और मिश्र में कलर थेरेपी का उपयोग होने के प्रमाण प्राचीन पुस्तकों में मिलते है।
रंगों कलर का हमारे मूड, सेहत और सोच पर गहरा असर पडता है।
कलर थेरेपी ७ प्रकार की होती हैं। पानी को अलग-अलग रंगों की बोतलों में भरकर धूप में रखा जाता है। इससे उस रंग का असर पानी में आ जाता है और उस पानी का प्रयोग रोग चिकित्सा में किया जाता है। होम्योपैथी वाले दवाईयों को विभिन्न रन्गों की बोतलों में ४५ दिन तक रखते हैं जिससे रंगों का पूरा असर दवा में आ जाता है।
रंगों का मनोवैज्ञानिक प्रभाव कैसे होता है और किन रोगों पर सकारात्मक प्रभाव होता है?

लाल रंग-

इसके मनोवैज्ञानिक प्रभाव के फ़लस्वरुप शरीर के रक्त संचार में वृद्धि होती है। एड्रिनल ग्रंथि अधिक सक्रिय हो जाती है फ़लत: शरीर ताकत बढती है। रेड कलर से नकारात्मक विचार समाप्त होते हैं लेकिन कुछ लोगों में चिड चिडापन भी पैदा हो जाता है।लाल रंग के दुष्प्रभाव से ब्लडप्रेशर बढ जाता है और हृदय की धडकन भी बढ जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि उच्च रक्त चाप के रोगी को लाल रंग पुते हुए कमरे से परहेज करना चाहिये।
मनोवैज्ञानिक असर
लाल रंग पसंद करने वाला व्यक्ति उर्जा से भरा, आशावादी, महत्वाकांक्षी होता है। ऐसा व्यक्ति आकर्षण का केन्द्र रहता है।

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नारंगी रंग :

यह रंग पाचन संस्थान को प्रभावित करता है। भूख बढाता है। स्त्री-पुरुषों की सेक्स शक्ति में बढोतरी करता है। यह रंग शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है। फ़ेफ़डे के रोगों में इसका अच्छा असर देखने में आता है।
इस रंग को पसन्द करने वाला व्यक्ति साहसी, द्रड प्रतिग्य, अच्छे स्वभाव का होता है। मिलनसार होता है लेकिन किसी के अपराध को माफ़ नहीं करना करेगा।
पीला रंग (यलो कलर)-
यह रंग मस्तिष्क की शक्ति बढाता है। यह व्यक्ति को अति सावधान बनाता है यहां तक कि वह किसी के साथ धोखा,छल करने से भी नहीं चूकता।
इस रंग को पसंद करने वाला व्यक्ति बुद्धिमान ,आदर्श वादी, उत्सुक,एकाकी और बेहद कल्पनाशील होता है।
हरा रंग:
हरा रंग हृदय के लिये उपकारी है। हृदय रोग के मरीजों में तनाव (टेंशन)दूर करता है। आदमी रिलेक्स अनुभव करता है। व्यक्ति ठंडे पेटे का याने शांत स्वभाव वाला होता है।
इस रंग को पसंद करने वाले व्यक्ति के स्वभाव में स्थिरता, और संतुलन बना रहता है। वह आदर योग्य होता है और किसी भी हालत में गलत निर्णय नहीं लेता है।


नीला रंग(ब्लु कलर)-

यह ब्लड प्रेशर घटाता है। स्निग्ध,शीतल गुण। पीयूष ग्रंथि को उत्तेजित कर नींद संबंधी व्याधियां दूर करता है। मन को शांत करने का गुण है।
इस रंग को पसंद करने वाला व्यक्ति टेंशन से मुक्त रहते हुए शांत स्वभाव का होता है। ऐसे व्यक्ति भरोसा करने योग्य होते हैं।रूढीवादी होते हैं।


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बेंगनी रंग( पर्पल कलर)-

यह रंग भूख को घटाता है। मेटाबोलिस्म(चयापचय) क्रिया सुधारता है। इसके प्रयोग से कुछ चर्म विकार भी ठीक होने के प्रमाण मिले हैं।
बेंगनी रंग पसंद करने वाले सृजनशील प्रवृत्ति के होते है। उनमें संवेदनशीलता होती है। खूबसूरत होते हैं। उच्च स्तर की कला में पारंगत होते हैं।


कलर थेरेपी के सरल ईलाज


प्राणियों का संपूर्ण शरीर रंगीन है। शरीर के समस्त अवयवों का रंग अलग-अलग है। शरीर की समस्त कोशिकाएँ भी रंगीन हैं। शरीर का कोई अंग बीमार होता है तो उसके रासायनिक द्रव्यों के साथ-साथ रंगों का भी असंतुलन हो जाता है। रंग चिकित्सा उन रंगों को संतुलित कर देती है जिसके कारण रोग का निवारण हो जाता है।
शरीर में जहाँ भी विजातीय द्रव्य एकत्रित होकर रोग उत्पन्न करता है, रंग चिकित्सा उसे दबाती नहीं अपितु शरीर के बाहर निकाल देती है। प्रकृति का यह नियम है कि जो चिकित्सा जितनी स्वाभाविक होगी, उतनी ही प्रभावशाली भी होगी और उसकी प्रतिक्रिया भी न्यूनतम होगी।सूर्य की रश्मियों में 7 रंग पाए जाते हैं-
1. लाल, 2. पीला, 3. नारंगी, 4. हरा, 5. नीला, 6.आसमानी, 7. बैंगनी

उपरोक्त रंगों के तीन समूह बनाए गए हैं -
1. लाल, पीला और नारंगी
2. हरा
3. नीला, आसमानी और बैंगनी
प्रयोग की सरलता के लिए पहले समूह में से केवल नारंगी रंग का ही प्रयोग होता है। दूसरे में हरे रंग का और तीसरे समूह में से केवल नीले रंग का। अतः नारंगी, हरे और नीले रंग का उपयोग प्रत्येक रोग की चिकित्सा में किया जा सकता है।
नारंगी रंग की दवा के प्रयोग
कफजनित खाँसी, बुखार, निमोनिया आदि में लाभदायक। श्वास प्रकोप, क्षय रोग, एसिडीटी, फेफड़े संबंधी रोग, स्नायु दुर्बलता, हृदय रोग, गठिया, पक्षाघात (लकवा) आदि में गुणकारी है। पाचन तंत्र को ठीक रखती है। भूख बढ़ाती है। स्त्रियों के मासिक स्राव की कमी संबंधी कठिनाइयों को दूर करती है।


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हरे रंग की दवा के प्रयोग
खासतौर पर चर्म रोग जैसे- चेचक, फोड़ा-फुंसी,दाद, खुजली आदि में गुणकारी साथ ही नेत्र रोगियों के लिए (दवा आँखों में डालना) मधुमेह, रक्तचाप सिरदर्द आदि में लाभदायक है।
नीले रंग की दवा के प्रयोग
शरीर में जलन होने पर, लू लगने पर, आंतरिक रक्तस्राव में आराम पहुँचाता है। तेज बुखार, सिरदर्द को कम करता है। नींद की कमी, उच्च रक्तचाप, हिस्टीरिया, मानसिक विक्षिप्तता में बहुत लाभदायक है। टांसिल, गले की बीमारियाँ, मसूड़े फूलना, दाँत दर्द, मुँह में छाले, पायरिया घाव आदि चर्म रोगों में अत्यंत प्रभावशाली है। डायरिया, डिसेन्टरी, वमन, जी मचलाना, हैजा आदि रोगों में आराम पहुँचाता है। जहरीले जीव-जंतु के काटने पर या फूड पॉयजनिंग में लाभ पहुँचाता है।




यह चिकित्सा जितनी सरल है उतनी ही कम खर्चीली भी है। संसार में जितनी प्रकार की चिकित्साएँ हैं, उनमें सबसे कम खर्च वाली चिकित्सा है।
दवाओं की निर्माण की विधि
जिस रंग की दवाएँ बनानी हों, उस रंग की काँच की बोतल लेकर शुद्ध पानी भरकर 8 घंटे धूप में रखने से दवा तैयार हो जाती है। बोतल थोड़ी खाली होनी चाहिए व ढक्कन बंद होना चाहिए। इस प्रकार बनी हुई दवा को चार या पाँच दिन सेवन कर सकते हैं। नारंगी रंग की दवा भोजन करने के बाद 15 से 30 मिनट के अंदर दी जानी चाहिए। हरे तथा नीले रंग की दवाएँ खाली पेट या भोजन से एक घंटा पहले दी जानी चाहिए।


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दवा की मात्रा -
प्रत्येक रंग की दवा की साधारण खुराक 12 वर्ष से ऊपर की उम्र वाले व्यक्ति के लिए 2 औंस यानी 5 तोला होती है। कम आयु वाले बच्चों को कम मात्रा देनी चाहिए। आमतौर पर रोगी को एक दिन में तीन खुराक देना लाभदायक है।
सफेद बोतल के पानी पर किरणों का प्रभाव
सफेद बोतल में पीने का पानी 4-6 घंटे धूप में रखने से वह पानी कीटाणुमुक्त हो जाता है तथा कैल्शियमयुक्त हो जाता है। अगर बच्चों के दाँत निकलते समय वही पानी पिलाया जाए तो दाँत निकलने में आसानी होती है।




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29.7.10

वाटर थिरेपी से करें रोगों का ईलाज

                                                       à¤µà¤¾à¤Ÿà¤° थेरेपी से करें रोगों का इलाज के लिए इमेज परिणाम



वाटर थिरेपी (water therapy)चिकित्सा विधि रोगों का ईलाज करने में बेहद चमत्कारी साबित हुई है।बिना दवाई लिये रोगी को रोग मुक्त करने की पानी में असीम शक्ति है। इसके नियम पूर्वक प्रयोग से अनेकों कष्ट साध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

वाटर थेरेपी कैसे करें?


सुबह जल्दी उठें। बिस्तर छोडते ही करीब डेढ लिटर पानी पी जाएं। बाद में मुहं धोना और ब्रश ईत्यादि करें। ध्यान रखें कि पानी पीने के ४५ मिनिट बाद तक कुछ न खाएं कुछ न पीयें। संक्षेप में यही वाटर थिरेपी कहलाती है। अगर आपको लगे कि उपलब्ध पानी निर्मल नहीं है तो पानी को उबालकर ठंडा करलें। क्या यह संभव है कि व्यक्ति एक ही बार में १.५० लिटर पानी पी सकता है। हां,शुरू में थोडी दिक्कत मेहसूस होगी लेकिन कुछ समय बाद में आदत पड जाएगी। बासी मुहं पानी पीने में क्या तुक है? दर असल रात भर की लार(सेलिवा) पानी के जरिये पेट में पहुंचाना इसका उद्देश्य हो सकता है। जहां तक मुहं में मौजूद जीवाणुओं का सवाल है तो इनके पेट में उतरने से कोइ नुकसान नहीं होता है। हमारी जठराग्नी इन जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।
अगर आप १.५ लिटर पानी एक दफ़ा में नहीं पी सकें तो पहिले एक लिटर पानी पीयें। ५ मिनिट बाद आधा लिटर पीयें। इसका भी वही प्रभाव होगा। वाटर थिरेपी का प्रभाव बढाने के लिये यह प्रक्रिया दिन में दो या तीन बार भी की जा सकती है।जहां तक इस चिकित्सा से होने वाले लाभ का सवाल है मेरा मानना है कि आप जब तक इसे खुद व्यवहार में नहीं लाएंगे आपको विश्वास होगा ही नहीं कि वाटर थिरेपी इतना जबर्दस्त प्रभाव रखती है।
वाटर थिरेपी के दौरान दिन भर में याने २४ घंटे में मौसम के मुताबिक ४से ६ लिटर पानी पीना उत्तम है।

वाटर थिरेपी के लाभ--

दिन भर तरो ताजा उत्साहित मेहसूस होना, शरीर की कांति में वृद्धि ,मोटापा से मुक्ति,तनाव से मुक्ति , हाजमा अच्छा होना।
जल-चिकित्सा भारत और जापान में बहुत समय पहिले से ही अस्तित्व में है। भारत में तांबे के पात्र में रात भर रखे पानी को पीने का निर्देश दिया गया है।
जापान की मेडिकल सोसायटी ने अपने शोध में निम्न रोगों का १०० प्रतिशत सफ़ल इलाज वाटर थिरेपी के जरिये बताया है-
सिर दर्द,
बदन का दर्द,
दमा,
मिर्गी,
मोटापा,
संधिवात,
बवासीर,
कब्ज,
हृदय के विकार,
गुर्दे के विकार,
गुर्दे की पथरी,
मस्तिष्क ज्वर,
टी बी
औरतों के मासिक धर्म के विकार,
अतिसार,
उल्टी होना,(vomiting)
आंखों के सभी रोग,
कान के रोग,
गले की बीमारियां,
कितने दिनो में दूर होगी बीमारी?
जापान की मेडिकल सोसायटी ने रोग मुक्ति के लिये निम्न अवधि उल्लेखित की है--
हाई ब्लड प्रेशर (high blood pressure) ३० दिन
पेट के रोग १० दिन
कब्ज (constipation)१० दिन
टी बी ९० दिन
मधुमेह ३० दिन
अंत में सलाह देना चाहूगा कि आप अपने जीवन में पानी को विशेष महत्व दें। स्वस्थ्य व्यक्ति भी वाटर थिरेपी से लाभान्वित हो सकते हैं। यह बिना खर्चे का प्रभावशाली ईलाज है।

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12.7.10

मिट्टी के प्रयोग से रहें निरोग (मड थिरेपि)

                                                     (मड थेरेपी के लिए इमेज परिणाम
   प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैग्यानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

    नंगे पैर जमीन पर चलना स्वास्थ्य के लिये उपकारी है। इस प्रक्रिया में धरती की उर्जा शरीर को प्राप्त होती है। धरती-चिकित्सा करने वाले अपने शरीर को मिट्टी के घोल में डुबा देते हैं केवल सिर बाहर रखा जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने से हमारा शरीर चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी खनिज तत्व गृहण कर लेता है। जमीन में जो चुम्बकत्व होता है उसका आवश्यक अंश भी शरीर को उपलब्ध हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में माटी चिकित्सा के कई रूप है। गीली मिटी के घोल में स्नान, सूती कपडे पर गीली मिट्टी रखकर मड पेक से चिकित्सा करना आदि। मड पेक का प्रयोग घावों,गूमडे-गांठ,शरीर में पुरानी सूजन, वेदना निवारण के लिये किया जाता है। यह चिकित्सा विधान उचित खान-पान के नियमों को व्यवहार में लाते हुए किया जाता है। गीली मिट्टी का प्रयोग जल चिकित्सा की बनिस्बत ज्यादा लम्बे समय तक शरीर में नमी और ठंडाई बनाये रखता है। मड पेक चिकित्सा से शरीर के रोम कूप शिथिल हो जाते हैं,रक्त खिंचकर चमडी की सतह पर आ जाता है, शरीर के अंदरूनी अवरोध हट जाते हैं,शरीर में उष्मा संचरण संतुलित हो जाता है,और शरीर में मौजूद विष तत्व का निष्कासन हो जाता है


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कैसे बनाएं मड पेक-जमीन के ऊपर की करीब आधा इंच मिट्टी हटाकर नीचे की मिट्टी इकट्ठा करें। यह मिट्टी एकदम शुद्ध होनी चाहिये ,याने इसमें कंकड,पत्थर वगैरह नहीं होना चाहिये। अब इस मिट्टी में गरम पानी डालते जाएं और घोल बनाते जाएं। इसे ठंडा होने दें। अब जरूरत के मुताबिक आकार का कपडे का टुकडा बिछाकर उस पर यह गीली मिट्टी एकरस फ़ैला दें। यह हुई मड पेक तैयार करने की विधि। इसे रोग प्रभावित स्थान पर आधे से एक घंटा रखना चाहिये। इस चिकित्सा से सामान्य कमजोरी और नाडी मंडल के रोग दूर किये जा सकते हैं। यह प्रयोग ज्वर उतारने में सफ़ल है,फ़्लू का ज्वर और खसरा रोग में भी इसके चमत्कारी परिणाम आते हैं। इस चिकित्सा से गठिया रोग सूजन,आंख और कान के रोग, वात विकार, लिवर और गुर्दे की कार्य प्रणाली में व्यवधान, पेट के रोग,कब्ज, यौन रोग, शरीर के दर्द, सिर दर्द और दांत के दर्द आदि रोगों शमन होता है।
मिट्टी को गीला कर घोल बनाकर उससे स्नान करना मिट्टी चिकित्सा का दूसरा रूप है। पूरे शरीर पर यह कीचड चुपडा जाता है। इसे बनाने के लिये मिट्टी को गरम पानी डालते हुए घोला जाता है। यह घोल शरीर पर भली प्रकार लगाकर ऊपर से एक -दो कंबल भी लपेट दिये जाते हैं। आधा-एक घंटे बाद गरम जल से नहालें। बाद में थोडे समय ठंडा पानी से स्नान करें। इस प्रकार के कीचड स्नान से त्वचा रोगों मे आशातीत लाभ होता है। चमडी मे रौनक आ जाती है। रंग रूप में निखार आता है। नियमित रूप से कीचड स्नान करने से सोरियासिस,सफ़ेद दाग और यहां तक कि कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाते हैं। जोडों के दर्द,गठिया रोग में यह बेहद फ़ायदेमंद उपचार है।

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6.7.10

स्टोन थिरेपि से करें रोगों का ईलाज.

                                         

     स्टोन थिरेपी में बेसाल्ट किस्म के पत्थरों को गरम करके शरीर निर्धारित बिंदुओं पर रखा जाता है।पत्थरों की गर्माहट से रक्त शिराएं फ़ैलती हैं जिससे रक्त परिसंचरण तेज हो जाता है बाद में उन्हीं स्थानों पर संगमरमर का ठंडा पत्थर रखा जाता है जिससे शिराएं पुन: पूर्व स्थिति में आ जाती हैं

यह गरम_ठंडा पत्थर रखने की प्रक्रिया कई बार दोहराई जाती है। इससे शिराएं चुस्त-दुरुस्त बनती हैं।पुराने जमाने में भी पत्थर चिकित्सा का उल्लेख चिकित्सा साहित्य में पाया जाता है। इस चिकित्सा का कोइ दुष्प्रभाव भी नहीं होता है। इस पुरानी रोगोपचार की पद्धति को पुन: नये नियम सिद्दांत के साथ प्रचलित करने वाले तूकसान नामक एक फ़िजीयो थेरेपिस्ट हैं।
स्टोन थिरेपी किन रोगों में फ़ायदेमंद है?
संधिवात,पीठ दर्द,नींद नहीं आना, मांस पेशियों का दर्द,अवसाद के अलावा उच्च रक्त चाप और निम्न रक्त चाप में स्टोन थिरेपी आशातीत लाभकारी साबित हो चुकी है। इस चिकित्सा प्रणाली का उपयोग रोग के लक्षण मौजूद नहीं हों तब भी किया जा सकता है। यह चिकित्सा रोग को शरीर में प्रवेश करने से प्रतिबंधित कर देती है
ज की भाग दौड भरी और तनाव की जीवन शैली में हमारे हृदय और मांसपेशियों पर अतिरिक्त दवाब आ जाता है। इसका उपचार स्टोन थिरेपी से 

स्टोन थिरेपी का व्यावहारिक पहलू-

इस चिकित्सा पद्धति में ४६ प्रकार के बेसाल्ट और ६ प्रकार के संगमरमर पत्थरों का प्रयोग किया जाता है। बेसाल्ट पत्थरों को करीब १२५ से १३५ डीग्री के तापमान पर गर्म किया जाता है। फ़िर इन पत्थरों को शरीर के विभिन्न ४६ बिन्दुओं पर रखा जाताहै।
पत्थर रखने से पहिले शरीर पर एक खास औशधि युक्त तैल की मालिश की जाती है। इसके बाद पैरों की ऊंगलियों से शुरु करते हुए पिंडलियों जांघों ,कमर रीध,कंधा,हाथ और हाथ की ऊंगलियों के बीच अलग-अलग आकार के पत्थर रखे जाते हैं,ज्यादा संवेदन शील स्थानों पर गरम पत्थरों को कपडे में लपेटकर रखा जाता है।ये पत्थर शरीर के ७ चक्रों को दुरुस्त करते हैं जिससे शरीर का रक्त संचार तीव्र हो जाता है। 
    इन पत्थरों की खासियत ये है कि ये लंबे समय तक गरम रहते हैं।करीब एक से सवा घंटे तक इन पत्थरों से सिकाई होती है ,इसके बाद ६ संगमरमर के पत्थरों को बर्फ़ के सम्मान ठंडा करके (आइस कूल बेग में रखकर)रीढ के बीचों बीच और कुछ विशेष बिन्दुओं पर रखते हैं। हर पत्थर का प्रयोग किसी विशेष अंग के लिये निर्धारित रहता है। विदेशों में कामयाबी हासिल करनेके बाद यह चिकित्सा पद्दति अब भारत में भी आहिस्ता-आहिस्ता प्रचलित हो रही है।

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