21.10.10

चुंबक से करें रोगों का ईलाज// How to cure diseases with magnet therapy?








चुम्बक चिकित्सा क्या है?

विविध रोगों मे चुंबकीय शक्ति से रोग ग्रस्त अंगों एवं शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित करने की विधि को चुंबक चिकित्सा कहते हैं। चुंबक थिरेपी में चुंबक का प्रयोग दो तरह से किया जाता है।
१. सार्वदैहिक चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग हथेलियों और पैरों के तलवों पर किया जाता है।
२. स्थानीय चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग रोग ग्रस्त भाग पर किया जाता है।
सार्वदैहिक प्रयोग के अंतर्गत उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव वाले चुंबक का एक जोडा आवश्यक है। अब हमारे शरीर के विध्युतीय सह संबंध के आधार पर इनका उपयोग जरूरी है। लेकिन अधिकांश मामलों मे 



उत्तरी ध्रुव चुंबक का इस्तेमाल शरीर के दांये भाग पर ,आगे की तरफ़ और शरीर के ऊपरी भाग पर विशेषतौर पर किया जाता है। दक्छिणी ध्रुव चुंबक का प्रयोग शरीर के बांये भाग पर , पीठ पर और शरीर के निचले अंगों पर किया जाता है।
स्थानीय प्रयोग करते समय दर्द,सूजन ,रोग संक्रमण को अधिक महत्व देना होता है। सीधा नियम यह है कि जब रोग नाभि से ऊपर के हिस्सों में हो तो चुंबक हथेली पर लगावें। और अगर रोग नाभी से नीचे के भाग में हो तो चुंबक का प्रयोग तलवों पर करना चाहिये। रीढ की हड्डी की तकलीफ़ों, घुटना, पैर ,नाक और आंख के रोगों में जरूरत लगे तो दो तीन चुंबक एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अंगूठे में दर्द हो तो दो चुंबकों के बीच अंगूठा रखने से शीघ्र लाभ होता है।

चुंबक चिकित्सा के लाभ--

चुंबक चिकित्सा इतनी सरल है कि इसका प्रयोग किसी भी समय और शरीर के किसी भी भाग पर आसानी से किया जा सकता है।
चुंबकत्व से रक्त परिसंचरण तन्त्र को शक्ति प्राप्त होती है जिसके फ़लस्वरूप कई रोगों में उपकार होते देखा गया है। शरीर के अंगों की थकावट,सूजन और पीडा का निवारण होता है। चुंबक का असर कभी कभी तो तो इतना ज्यादा और तुरंत होता है कि एक बार के प्रयोग से रोग शमन हो जाता है,दूसरी बार चुंबक लगाने की आवश्यकता नहीं पडती। उदाहरण के लिये दांत में दर्द और मौच आने पर एक ही प्रयोग काफ़ी रहता है। हम एक ही चुंबक का कई रोगियों पर प्रयोग कर सकते हैं इसे पानी में उबालने या जंतु रहित करने की जरूरत नहीं पडती। फ़िर भी अगर चर्म विकृतियों पर चुंबक का इस्तेमाल करें तो चुंबक को महीन कपडे में लपेटकर प्रयोग करें। बाद में कपडे को धोलें। एक अच्छी बात यह है कि चुंबक उपचार की आदत नहीं पडती। चुंबक चिकित्सा कभी भी किसी भी समय बंद की जा सकती है।शारीरिक दर्दों को नष्ट करने की चुंबक में आश्चर्यजनक शक्ति है। पीडा किसी भी कारण से हो,चुंबक चिकित्सा अपना प्रभाव प्रदर्शित करती है। इससे शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होकर रोगमुक्ति में सहायता मिलती है।
शरीर के जिस भाग पर चुंबक लगानी है उसके मुताबिक अलग-अलग साईज के चुंबकों का प्रयोग ठीक रहता है। जैसे आंख पर छोटे और कम शक्ति के चुंबक लगाते हैं जबकि अगर शरीर के विस्तृत भाग में दर्द और सूजन हो तो बडे आकार के अधिक शक्ति वाले चुंबक लगाना उचित रहता है। आंख और हृदय जैसे कोमल अंगों पर शक्तिशाली चूबक नहीं लगाना चाहिये। बडे आकार की एवंकठोर मांसपेशियों जैसे एडी,घुटनों और कुल्हों पर अधिक शक्तिशाली और बडे चुंबक का प्रयोग उत्तम रहता है।

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29.7.10

वाटर थिरेपी से करें रोगों का ईलाज

                                                       à¤µà¤¾à¤Ÿà¤° थेरेपी से करें रोगों का इलाज के लिए इमेज परिणाम



वाटर थिरेपी (water therapy)चिकित्सा विधि रोगों का ईलाज करने में बेहद चमत्कारी साबित हुई है।बिना दवाई लिये रोगी को रोग मुक्त करने की पानी में असीम शक्ति है। इसके नियम पूर्वक प्रयोग से अनेकों कष्ट साध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

वाटर थेरेपी कैसे करें?


सुबह जल्दी उठें। बिस्तर छोडते ही करीब डेढ लिटर पानी पी जाएं। बाद में मुहं धोना और ब्रश ईत्यादि करें। ध्यान रखें कि पानी पीने के ४५ मिनिट बाद तक कुछ न खाएं कुछ न पीयें। संक्षेप में यही वाटर थिरेपी कहलाती है। अगर आपको लगे कि उपलब्ध पानी निर्मल नहीं है तो पानी को उबालकर ठंडा करलें। क्या यह संभव है कि व्यक्ति एक ही बार में १.५० लिटर पानी पी सकता है। हां,शुरू में थोडी दिक्कत मेहसूस होगी लेकिन कुछ समय बाद में आदत पड जाएगी। बासी मुहं पानी पीने में क्या तुक है? दर असल रात भर की लार(सेलिवा) पानी के जरिये पेट में पहुंचाना इसका उद्देश्य हो सकता है। जहां तक मुहं में मौजूद जीवाणुओं का सवाल है तो इनके पेट में उतरने से कोइ नुकसान नहीं होता है। हमारी जठराग्नी इन जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।
अगर आप १.५ लिटर पानी एक दफ़ा में नहीं पी सकें तो पहिले एक लिटर पानी पीयें। ५ मिनिट बाद आधा लिटर पीयें। इसका भी वही प्रभाव होगा। वाटर थिरेपी का प्रभाव बढाने के लिये यह प्रक्रिया दिन में दो या तीन बार भी की जा सकती है।जहां तक इस चिकित्सा से होने वाले लाभ का सवाल है मेरा मानना है कि आप जब तक इसे खुद व्यवहार में नहीं लाएंगे आपको विश्वास होगा ही नहीं कि वाटर थिरेपी इतना जबर्दस्त प्रभाव रखती है।
वाटर थिरेपी के दौरान दिन भर में याने २४ घंटे में मौसम के मुताबिक ४से ६ लिटर पानी पीना उत्तम है।

वाटर थिरेपी के लाभ--

दिन भर तरो ताजा उत्साहित मेहसूस होना, शरीर की कांति में वृद्धि ,मोटापा से मुक्ति,तनाव से मुक्ति , हाजमा अच्छा होना।
जल-चिकित्सा भारत और जापान में बहुत समय पहिले से ही अस्तित्व में है। भारत में तांबे के पात्र में रात भर रखे पानी को पीने का निर्देश दिया गया है।
जापान की मेडिकल सोसायटी ने अपने शोध में निम्न रोगों का १०० प्रतिशत सफ़ल इलाज वाटर थिरेपी के जरिये बताया है-
सिर दर्द,
बदन का दर्द,
दमा,
मिर्गी,
मोटापा,
संधिवात,
बवासीर,
कब्ज,
हृदय के विकार,
गुर्दे के विकार,
गुर्दे की पथरी,
मस्तिष्क ज्वर,
टी बी
औरतों के मासिक धर्म के विकार,
अतिसार,
उल्टी होना,(vomiting)
आंखों के सभी रोग,
कान के रोग,
गले की बीमारियां,
कितने दिनो में दूर होगी बीमारी?
जापान की मेडिकल सोसायटी ने रोग मुक्ति के लिये निम्न अवधि उल्लेखित की है--
हाई ब्लड प्रेशर (high blood pressure) ३० दिन
पेट के रोग १० दिन
कब्ज (constipation)१० दिन
टी बी ९० दिन
मधुमेह ३० दिन
अंत में सलाह देना चाहूगा कि आप अपने जीवन में पानी को विशेष महत्व दें। स्वस्थ्य व्यक्ति भी वाटर थिरेपी से लाभान्वित हो सकते हैं। यह बिना खर्चे का प्रभावशाली ईलाज है।

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12.7.10

मिट्टी के प्रयोग से रहें निरोग (मड थिरेपि)

                                                     (मड थेरेपी के लिए इमेज परिणाम
   प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैग्यानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

    नंगे पैर जमीन पर चलना स्वास्थ्य के लिये उपकारी है। इस प्रक्रिया में धरती की उर्जा शरीर को प्राप्त होती है। धरती-चिकित्सा करने वाले अपने शरीर को मिट्टी के घोल में डुबा देते हैं केवल सिर बाहर रखा जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने से हमारा शरीर चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी खनिज तत्व गृहण कर लेता है। जमीन में जो चुम्बकत्व होता है उसका आवश्यक अंश भी शरीर को उपलब्ध हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में माटी चिकित्सा के कई रूप है। गीली मिटी के घोल में स्नान, सूती कपडे पर गीली मिट्टी रखकर मड पेक से चिकित्सा करना आदि। मड पेक का प्रयोग घावों,गूमडे-गांठ,शरीर में पुरानी सूजन, वेदना निवारण के लिये किया जाता है। यह चिकित्सा विधान उचित खान-पान के नियमों को व्यवहार में लाते हुए किया जाता है। गीली मिट्टी का प्रयोग जल चिकित्सा की बनिस्बत ज्यादा लम्बे समय तक शरीर में नमी और ठंडाई बनाये रखता है। मड पेक चिकित्सा से शरीर के रोम कूप शिथिल हो जाते हैं,रक्त खिंचकर चमडी की सतह पर आ जाता है, शरीर के अंदरूनी अवरोध हट जाते हैं,शरीर में उष्मा संचरण संतुलित हो जाता है,और शरीर में मौजूद विष तत्व का निष्कासन हो जाता है


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कैसे बनाएं मड पेक-जमीन के ऊपर की करीब आधा इंच मिट्टी हटाकर नीचे की मिट्टी इकट्ठा करें। यह मिट्टी एकदम शुद्ध होनी चाहिये ,याने इसमें कंकड,पत्थर वगैरह नहीं होना चाहिये। अब इस मिट्टी में गरम पानी डालते जाएं और घोल बनाते जाएं। इसे ठंडा होने दें। अब जरूरत के मुताबिक आकार का कपडे का टुकडा बिछाकर उस पर यह गीली मिट्टी एकरस फ़ैला दें। यह हुई मड पेक तैयार करने की विधि। इसे रोग प्रभावित स्थान पर आधे से एक घंटा रखना चाहिये। इस चिकित्सा से सामान्य कमजोरी और नाडी मंडल के रोग दूर किये जा सकते हैं। यह प्रयोग ज्वर उतारने में सफ़ल है,फ़्लू का ज्वर और खसरा रोग में भी इसके चमत्कारी परिणाम आते हैं। इस चिकित्सा से गठिया रोग सूजन,आंख और कान के रोग, वात विकार, लिवर और गुर्दे की कार्य प्रणाली में व्यवधान, पेट के रोग,कब्ज, यौन रोग, शरीर के दर्द, सिर दर्द और दांत के दर्द आदि रोगों शमन होता है।
मिट्टी को गीला कर घोल बनाकर उससे स्नान करना मिट्टी चिकित्सा का दूसरा रूप है। पूरे शरीर पर यह कीचड चुपडा जाता है। इसे बनाने के लिये मिट्टी को गरम पानी डालते हुए घोला जाता है। यह घोल शरीर पर भली प्रकार लगाकर ऊपर से एक -दो कंबल भी लपेट दिये जाते हैं। आधा-एक घंटे बाद गरम जल से नहालें। बाद में थोडे समय ठंडा पानी से स्नान करें। इस प्रकार के कीचड स्नान से त्वचा रोगों मे आशातीत लाभ होता है। चमडी मे रौनक आ जाती है। रंग रूप में निखार आता है। नियमित रूप से कीचड स्नान करने से सोरियासिस,सफ़ेद दाग और यहां तक कि कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाते हैं। जोडों के दर्द,गठिया रोग में यह बेहद फ़ायदेमंद उपचार है।

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