24.9.14

मेमोरी पावर बढाने के आयुर्वेदिक उपचार//Simple measures to increase memory power




  मानव शरीर अनंत रहस्यों का भण्डार है। मनुष्य का मस्तिष्क ईश्वर द्वारा प्रदत्त सबसे महत्वपूर्ण पूंजी और अंग है। यह सुपर कम्प्यूटर है, जो सारे शरीर की सूक्ष्म से सूक्ष्म नाड़ियों को व्यवस्थित रूप से संचालित करता है। इसकी कार्यशीलात पर ही सफलता और असफलता निर्भर करती है। साधारणतया मस्तिष्क का केवल 3 से 7 प्रतिशत भाग ही सक्रिय हो पाता है। शेष भाग सुप्त रहता है, जिसमें अनंत ज्ञान छिपा रहता है। ऐसी विलक्षण शक्ति को जाग्रत करने के कुछ उपाय यहां प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

* दोनों कानों के नीचे के भाग को अंगूठे और अंगुलियों से दबाकर नीचे की ओर खीचें। पूरे कान को ऊपर से नीचे करते हुए मरोड़ें। सुबह 4-5 मिनट और दिन में जब भी समय मिले, कान के नीचे के भाग को खींचे।
* सिर व गर्दन के पीछे बीच में मेडुला नाड़ी होती है। इस पर अंगुली से 3-4 मिनट मालिश करें। इससे एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ा हुआ याद रहता है।
* ज्ञान मुद्रा- प्रात: उठकर

पदमासन या सुखापन में बैठकर हाथों की तर्जनी अंगुली के अग्र भाग को अंगूठे से मिलाकर रखने से ज्ञान मुद्रा बनती है। शेष अंगुलियां सहज रूप से सीधी रखें, आंखें बंद, कमर व रीढ़ सीधी, यह अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्रा है। इसका हितकारी प्रभाव समस्त वायुमंडल और मस्तिष्क पर पड़ता है। ज्ञानमुद्रा पूरे स्नायुमंडल को सशक्त बनाती है। विशेषकर मानसिक तनाव से होने वाले दुष्प्रभावों को दूर कर मस्तिष्क के ज्ञान तंतुओं को सबल बनाती है।

ज्ञानमुद्रा के निरंतर अभ्यास से मस्तिष्क की सभी विकृतियां और रोग दूर होते हैं। जैसे पागलपन, उन्माद, विक्षिप्तता, चिड़चिड़ापन, अस्थिरता, अनिश्चितता क्रोध, आलस्य घबराहट, अनमनापन, व्याकुलता, भय आदि। मन शांत हो जाता है। और चेहरे पर प्रसन्नता झलकती है। ज्ञानमुद्रा विद्यार्थियों के लिए वरदान है। इसके अभ्यास से स्मरण शक्ति और बुध्दि तेज होती है।
* अकारण अंगुलियों को चटकाना, पंजा लड़ाना और अंगुलियों को अनुचित रूप से चलाना आदि आदतें मस्तिष्क और स्नायुमंडल बुरा प्रभाव डालती हैं। इससे प्राणशक्ति का ह्रास होता है और स्मरण शक्ति कमजोर होती हैं। अत: इनसे बचना चाहिए।



*आज्ञाचक्र ललाट पर दोनों भौंहों के मध्य स्थित होता है। इसका संबंध ब्रह्म शरीर से होता है। जिस व्यक्ति का आज्ञाचक्र जाग जाता है, वही विशुध्द ब्रह्मचारी हो सकता है। और उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं रहता। आज्ञाचक्र पर ध्यान केन्द्रित करने से आज्ञाचक्र जाग्रत होता है। सफेद रंग की ऊर्जा यहां से निकलती है। अत: सफेद रंग के ध्यान से आज्ञाचक्र के जागरण में सहायता मिलती है।
* देशी गाय के शुध्द घी में एक बादाम कुचलकर डाल दें और उसे गरम करके ठंडा कर लें। तत्पश्चात् छानकर रखें। रात को सोते समय यह घी दो-दो बूंद दोनों नासिका के छिद्रों में थोड़ गुनगुना करके डालें। घी ड्रोपर में रख लें, डालने से पहले ड्रोपर की शीशी गरम पानी में रखें और फिर गरज होने पर नाक में डालें। यही घी नाभि पर डालकर 4-5 बार घड़ी की दिशा में और 4-5 बार घड़ी की विपरीत दिशा में घुमाएं, फिर उस पर गीले कपड़े की पट्टी और फिर सूखे कपड़े की पट्टी रखें। ऐसा करीब 10-15 मिनट करें। दक्षिण दिशा में सिर रखकर सोएं। सोते वक्त दोनों पैरों की पदतलियों में अपने हाथ से घी से मालिश करें। इससे नींद अच्छी आती है, मस्तिष्क में शांति, प्रसन्नता और सक्रियता आती है। मनोबल बढ़ता है।

* चार-पांच बादाम की गिरी पीसकर गाय के दूध और मिश्री में मिलाकर पीने से मानसिक शक्ति बढ़ती है। आयुर्वेद के अनुसार ब्राह्मी, शंखपुष्पी, वच, असगंध, जटामांसी, तुलसी समान मात्रा में लेकर चूर्ण का प्रयोग नित्य प्रतिदिन दूध के साथ करने पर मानसिक शक्ति, स्मरण शक्ति में वृध्दि होती है।
* उत्तर दिशा में मुंह करके पिरामिड की आकृति की टोपी पहनकर पढ़ाई करने से पढ़ा हुआ बहुत शीघ्र याद होता है। टोपी, कागज, गत्ता या मोटे कपड़े की बनाई जा सकती है।
* देशी गाय का शुध्द घी, दूध, दही, गोमूत्र, गोबर का रस समान मात्रा में लेकर गरम करें। घी शेष रहने पर उतार कर ठंडा करके छानकर रख लें। यह घी ‘पंचगव्य घृत’ कहलाता है।
रात को सोते समय और प्रात: देशी गाय के दूध में 2-2 चम्मच पिघला हुआ पंचगव्य घृत, मिश्री, केशर, इलायची, हल्दी, जायफल, मिलाकर पिएं। इससे बल, बुध्दि, साहस, पराक्रम, उमंग और उत्साह बढ़ता है। हर काम को पूरी शक्ति से करने का मन होता है और मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है।
*पढ़ाई में सफलता प्राप्त करने हेतु मन लगाकर पढ़ना, रुचिपूर्वक पढ़ना अत्यंत आवश्यक है। असफलता का अर्थ है कि सफलता का प्रयास पूरे मन से नहीं किया गया।
* रात्रि को सोते समय अपने दिन भर के किए हुए कार्यों पर चिंतन-मनन करना, उनकी समीक्षा करना, गलतियों के प्रति खेद व्यक्त करना और उन्हें पुन: न दोहराने का संकल्प लेना चाहिए। प्रात: सो कर जागते समय ईश्वर को नया जन्म देने हेतु धन्यवाद देना चाहिए और पूरा दिन अच्छे कार्यों में व्यतीत करने का संकल्प लेकर पूरे दिन की योजना बनाकर बिस्तर छोड़ना चाहिए।


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23.9.14

डायबीटीज की प्राकृतिक चिकित्सा


    प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से मधुमेह की पूर्णरूप से चिकित्सा करने के लिए यह आवश्यक है की हम पूरे शरीर को एक इकाई मानकर उसकी सर्वंगीण चिकित्सा पर अपना ध्यान केन्द्रित करें । ऐसा देखा गया है की मधुमेह के अधिकांश रोगियों में अग्नाशय के साथ-साथ यकृत भी प्रभावित रहता है । गुर्दों की समस्या भी इसके साथ जुड़ी हुई रहती है । इसलिए मधुमेह की चिकित्सा करते समय हमें पाचन संस्थान को मजबूत बनाने पर ध्यान देना चाहिए ताकि कब्ज एवं पेट संबंधी अन्य विकार ठीक किए जा सकें । शरीर में स्थित ये सभी अंग-प्रत्यंग अग्नाशय को भली-भांति कार्य करने में सहायता पहुँचाते हैं । कहने का आशय यह है कि पूरा शरीर संतुलन की अवस्था में कार्य करना चाहिए

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    मधुमेह के रोगियों के लिए भोजन के कई प्रारूप बनाए गए हैं जिनके पालन का परामर्श चिकित्सकों द्वारा दिया जाता है । लेकिन इसके साथ ही रहन-सहन के स्वास्थ्यप्रद तरीकों को भी पर्याप्त प्रमुखता दिया जाना नितांत आवश्यक है । मात्र स्टार्च एवं शर्करा युक्त पदार्थों को भोजन में से कम करना ही पर्याप्त नहीं है । हमें पूरे शरीर के संतुलित पोषण पर ध्यान देना चाहिए । ऐसे बहूत कम ही लोग देखने में आते हैं जो केवल मधुमेह से ग्रस्त होते हैं तथा अन्य रोग नहीं होते ।

चिकित्सा के लक्ष्य-

मधुमेह की चिकित्सा का पहला लक्ष्य रक्त में शर्करा के स्तर को यथासम्भव समान्या या उसके आस-पास बनाए रखना है । दूसरा लक्ष्य मधुमेह की जटिलताओं को कम करना या उनसे यथासंभव बचना है । इस दुसरे लक्ष्य की प्राप्ति पहले लक्ष्य की प्राप्ति पर ही निर्भर करती है ।

अच्छा उपचार क्या है ?

   मधुमेह पर नियंत्रण रखना ही इसका सबसे अच्छा उपचार है । प्राकृतिक उपचार, नियंत्रित आहार तथा संतुलित व्यायाम का अनुशासित ढंग से पालन करते हुए हम न केवल इस रोग को नियंत्रित अवस्था में रख सकते हैं बल्कि इसकी जटिलताओं से भी स्वंय को काफी हद तक बचा सकते हैं । मधुमेह का उपचार वस्तुतः तीन प्रकार से किया जा सकता है ।
- केवल आहार पर नियंत्रण एवं प्राकृतिक उपचार द्वारा
- आहार नियंत्रण एवं रक्त में शर्करा का स्तर घटाने वाली औषधियों के प्रयोग द्वारा
- आहार नियंत्रण तथा इन्सुलिन द्वारा
मधुमेह नियंत्रण का सर्वोत्तम तरीका है –संतुलित एवं नियंत्रित भोजन,
नियमित व्यायाम एवं योगाभ्यास,
नियमित प्राकृतिक स्वास्थ्यप्रद दिनचर्या तथा
यदि आवश्यक हो तो दवाएँ ।
प्राय: नियंत्रित भोजन, व्यायाम, नियमित ववं तनाव रहित दिनचर्या इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं ।


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प्राकृतिक चिकित्सा की भूमिका-

    प्राकृतिक चिकित्सा स्वस्थ जीवन जीने की कला एवं स्वस्थ रहने का विज्ञान है । प्राकृतिक चिकित्सा का उद्देश्य है रोगी को पुन: प्रकृति के नजदीक लाकर उसे स्वास्थ के प्रति जागरूक आत्मनिर्भर बनाता ।
प्राकृतिक उपचारों के समुचित परिपालन, पूर्णत: प्राकृतिक खाद्यों या यथासम्भव प्राकृतिक खाद्यों के नियमित सेवन तथा व्यवस्थित अनूशासित एवं तनाव मुक्त रहन-सहन के पालन से रोग को दूर करके रोगी को पुन: प्राकृति के सान्निध्य में लाने का प्रयास किया जाता है ।


एलोवेरा जूस  अच्छे स्वास्थ्य की कुंजी

जहाँ तक मधुमेह का प्रश्न है प्राय: विशेषज्ञ इसे कोई रोग नहीं मानते । यह पाचनतंत्र के एक भाग की कमजोरी के कारण होता है और इस कमजोरी को सुधारा जा सकता है । इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा मधुमेह के रोगी का उपचार करते समय उसके सामान्य स्वास्थ्य को सुधारने पर विशेष ध्यान देते हैं । रोगी के शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाकर उसके पाचनतंत्र को शक्तिशाली बनाने का प्रयास किया जाता है । इन सब कामों में विभिन्न प्राकृतिक उपचार बेहतर ढंग से मदद करते हैं । इसके साथ ही रोगी को मानसिक स्थिति में सकरात्मक सुधार लाकर शारीरिक श्रम एवं व्यायाम करने के लिए प्रेरित किया जाता है ।

प्राकृतिक चिकित्सा के दृष्टिकोण से मधुमेह के कारण-

प्राकृतिक चिकित्सा का मानना है कि सभी रोग प्राकृति के नियमों के उल्लंघन का परिणाम हैं । मधुमेह भी इनमें से एक है । प्राकृतिक चिकित्सा के आचार्य डॉ. हेनरी लिंडलार ने इसे प्रकार से व्यक्त किया है |

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विशिष्ट प्राकृतिक उपचार-

प्राकृतिक उपचारों को साधारणत: दो वर्गों में विभाजित किया जाता कहलाते हैं । इनमें पेट पर गरम ठंडा सेंक, पेट पर मिट्टी की पट्टी, आश्याकतानूसार एनिमा का प्रयोग तथा कटिस्नान आदि हैं। इसके अतिरिक्त कुछ विशिष्ट उपचार होते हैं जो रोग की विशेष स्थिति को देखकर किए जाते हैं। जैसे मिट्टी का लेप तथा किसी विशेष स्थान की लपेट आदि ।

मधुमेह रोग में

कटिस्नान, पेट की लपेट, अग्नाशय के स्थान पर मीट्टी की पट्टी तथा वहाँ के रक्त संचारण को उन्नत बनाने के लिए बाईब्रेटर के प्रयोग आदि को विशिष्ट उपचारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। कटिस्नान प्रात:एवं सांय दस- दस मिनट का तथा सप्ताह में एक – दो बार गरम-ठंडा कटिस्नान लेना चाहिए। 

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यदि कब्ज हो तो शरीर के बराबर तापक्रम के जल से रात में पेट की ठंडी-गरम लपेट देनी चाहिए नित्य प्रात: काल मौसम एवं शारीरिक शक्ति के अनुसार 15 मिनट से आधा घंटे तक नंगे बदन धुप ठंडे जल से स्नान करना चाहिए ।
  इसके अतिरिक्त योगासनों का अभ्यास तथा प्रात:कालीन भ्रमण आदि भी विशिष्ट उपचारों की श्रेणी में आते हैं । दिन में कई बार 100 बार तक गहरी साँस लेने का अभ्यास उपयुर्क्त होगा । यह आवश्यक है की चिकित्सा की सलाह के अनुसार या उनकी देख- रेख में इन सब उपचारों का प्रयोग किया जाए ।

रोगी की दैनिक उपचार तालिका-

प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा डॉ.खुशी राम शर्मा “दिलकश” ने अपने पुस्तक “रोगों की प्राकृतिक चिकित्सा” में मधुमेह के रोगी की दैनिक उपचार तालिका निम्न प्रकार से दी है–
प्रात: काल शौच जाने के बाद यदि पेट साफ न हूआ हो तो ताजे पानी का

एनिमा लेना चाहिए । पेट पर मिट्टी की पट्टी 20 मिनट तक लेने के पश्चात् 5 से 10 मिनट तक का कटिस्नान लेकर तेजी से टहलना चाहिए । शाम को पुन: कटिस्नान लें । थोड़े दिनों के बाद प्रात: मेहन स्नान और शाम को कटिस्नान लेना जारी रखें । मेहन स्नान ठंडे जल से लें और कटिस्नान गर्मियों में ताजे जल से तथा सर्दियों में हल्के गूनगूने जल से लें । गर्म –ठंडा स्नान सप्ताह में एक दो बार लें ।

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मालिश और सैर विशेष रूप से लाभप्रद रहते हैं। मालिश लगभग 1 घंटे की होनी चाहिए । तत्पश्चात हल्के गर्म पानी से नहाना चाहिए।प्रात: 2-3 मील की सैर की जा सकती है । स्नान करते समय रीढ़ पर 5 मिनट तक ठंडा पानी डालें। स्नान उपरांत पूरे शरीर की सूखी मालिश करके शरीर का जल सूखा दें । पेट पर गरम–ठंडा सेंक सप्ताह में एक – दो बार तथा रात को सोते समय पेडू पर गीली लपेट लेनी चाहिए। नारंगी रंग की बोतल का सूर्यतप्त जल भाग मिलाकर 50 मि. ली. मात्रा में सुबह, शाम भोजन के बाद लें ।

रक्त में बढ़ी हुई शर्करा को कम करने के लिये सारे शरीर की गीली लपेट या सूर्य स्नान जिससे पसीना निकल तथा गर्म तब स्नान या बिजली का सूखा स्नान रामबाण है । यदि रोगी अधिक दुबला हो गया हो तो गीली चादर की लपेट नहीं देनी चाहिए ।
रात को सोने से पहले सम्पूर्ण शरीर का स्पंज देने के बाद रोगी को हल्के गर्म पानी का टब स्नान देने से नींद अच्छी आ जाएगी और बेचैनी भी दूर होगी। सम्पूर्ण शरीर का स्नान 92 डिग्री फारेनहाइट का लगभग 20 से 30 मिनट का अधिक लाभ पहुँचाता है।

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13.9.14

रेकी (reiki) एक असरदार चिकित्सा पद्धति है.


 
रेकी चिकित्सा का उपयोग तनाव मुक्त जीवन और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए किया जाता है\ व्यवसायिक अभ्यास के लिए। तन, मन और आत्मा के उत्थान के लिए। पुरातन भारतीय संस्कृति में मन के साथ शरीर के स्वास्थ्य को भी काफी महत्व दिया गया है। मन का स्वास्थ्य उŸाम रखने एवं मनोशांति प्राप्त करने के लिए शरीर का व्याधि-मुक्त होना अनिवार्य है।


   रेकी मनुष्य के मन एवं शरीर का संतुलन प्रस्थापित करने और मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्ति का एक नैसर्गिक एवं सरल उपाय है। रेकी का अर्थ रेकी एक जापानी शब्द है। इसमें ‘रे’ का अर्थ है विश्व व्यापी यानी संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली तथा ‘की’ अर्थ है ‘‘प्राण अथवा जीवन शक्ति’’ अर्थात




रेकी का अर्थ ‘‘संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली प्राण अथवा जीवन शक्ति’’। यह एक निसर्ग शक्ति है। जो सभी प्राणी मात्र में निवास करती है तथा मनुष्य, प्राणी, पेड़, जलचर आदि सभी को गतिमान करती है। मनुष्य में यह शक्ति जन्मतः विद्यमान है। शरीर में इसकी मात्रा कम होने से शरीर में रोगों का निर्माण होता है। इस कम हुई शक्ति को रेकी के माध्यम से पुनः जागृत करके हम अपने रोगों का इलाज स्वयं कर सकते हैं।
रेकी न तो कोई धर्म है और न ही कोई पंथ है। रेकी का तंत्र, मंत्र आदि के साथ कोई संबंध नहीं है। रेकी हिप्नोटिज्म (सम्मोहन) या पारसम्मोहन न होकर केवल एक योग उपचार विधि है।



 रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य प्रमुख सावधानियां-

प्रत्येक बिंदु पर कम से कम 3 मिनट रेकी देना चाहिए। रेकी कभी सहस्रार चक्र और नाभि चक्र पर न दें। ये ऊर्जा के आगमन के द्वार हंै। रेकी देते समय अंगूठे को अंगुलियों से अलग न रखें। अंगूठा और अंगुलियां मिली हुई हों।



हाथों को कप की शेप में बनाए रखें, ताकि ऊर्जा का प्रवाह अधिक गतिमान हो सके। स्त्रियों को हृदय चक्र पर रेकी देते समय हाथों को 2-3 इंच दूर की स्थिति में रखना चाहिए। रोगी और चिकित्सक दोनों के पैर क्राॅस की स्थिति में नहीं होने चाहिए।


   

उपचार देने से पहले हाथों को धो लेना आवश्यक है। पूरे शरीर में रेकी देते समय शरीर के अंगों का क्रम नहीं बदलना चाहिए। दूसरों को रेकी देते समय लेटने के लिए रोगी से कहें, जो अपेक्षाकृत ज्यादा लाभप्रद है, किंतु बैठाकर, खड़ा करके, सिर अथवा मुंह झुकाकर भी रेकी दी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि स्पर्श करके ही रेकी की जाए। स्त्री के बायीं ओर पुरुष के दायीं ओर बैठकर रेकी दें|। आप हाथों को 1 से 4 इंच दूर रखकर भी रेकी दे सकते हैं। हृदय चक्र को ऊर्जा देते समय ध्यान रहे कि दाहिना हाथ बायें हाथ के नीचे रहे तथा दाहिना हाथ शरीर को स्पर्श करे।
    अन्य स्थितियों में जैसा चाहे रखें। छोटे बच्चे को गोद में लेकर रेकी देना अच्छा होता है। रेकी देते समय आगे सिर झुकाकर न बैठें अन्यथा ऊर्जा खोने लगेगी। रेकी देने से पूर्व इनर्जी बाॅडी को स्वीप कर लें। इससे शरीर में ऊर्जा की ग्रहणशीलता बढ़ जाएगी। रेकी देने के पश्चात् दाहिना हाथ सामने हृदय-चक्र पर रखकर लेट जाएं। बायां हाथ सामने ‘हारा’ पर रखें। इससे आप की नेगेटिव एनर्जी बायें हाथ के माध्यम से ‘पेडू’ से निष्क्रमित होगी तथा दायें हाथ से आप हृदय को ऊर्जा दे सकेंगे।

    रेकी सिद्धहस्त व्यक्ति की हथेलियों में यह प्राण ऊर्जा वायुमंडल में सब जगह व्याप्त भंडार से प्राप्त होती है। यह प्राण ऊर्जा व्यक्ति के ऊपरी चार चक्रों के माध्यम से होकर पहंुचती है। अतः व्यक्ति के लिए स्वीकार भाव और ग्रहण शीलता दोनों बहुत जरूरी है। एक बार रेकी शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति में यह आजीवन बनी रहती है। यह आवश्यक नहीं कि केवल रोग ग्रस्त व्यक्ति ही रेकी उपचार प्राप्त करे। स्वस्थ व्यक्ति भी रेकी की ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आँखों  का चश्मा  हटाने का अचूक  घरेलू उपाय


    किसी भी वैकल्पिक उपचार के साथ-साथ रेकी की भूमिका सहायक रूप में व्याधि दूर करने में दु्रत गति से सहायक होती है। रेकी स्टेज 1 में 20 प्रतिशत रेकी शक्ति प्राप्त होती है। तत्पश्चात किसी भी व्यक्ति का उपचार किया जा सकता है। रेकी स्टेज 1 प्राप्त करने के करीब तीन माह के उपरांत रेकी 2 का प्रशिक्षण लिया जा सकता हैे। रेकी स्टेज 2 में रेकी स्टेज 1 से 4 गुनी शक्ति अधिक बढ़ जाती है क्योंकि स्टेज 2 में तीन सिंबल के साथ शक्ति प्रदान की जाती है।


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     रेकी अत्यंत सुरक्षित उपचार पद्धति है। इससे किसी भी प्रकार की क्षति होने की संभावना नहीं रहती है। रेकी का उपचार व्यक्ति, पशु, कुŸो, पेड़-पौधों, बीज, फूल आदि सभी पर समान रूप से किया जा सकता है। रेकी चिकित्सा पद्धति में किसी दूरस्थ व्यक्ति का भी उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार का उपचार स्टेज 2 रेकी के सिद्धहस्त व्यक्ति ही अपने स्थान पर रहकर कर सकते हैं। रेकी की शक्ति रेकी मास्टर द्वारा ही किसी भी व्यक्ति को प्रदान की जा सकती है। ध्यान रहे कि रेकी केवल उस अंग तक ही सीमित नहीं रहती जिस पर आप हाथ रखते हैं। यह शरीर के अन्य भागों तक भी स्वयं भी जा पहुंचती है। उदाहरणार्थ- यदि आप सिर पर हाथ रखेंगे, तो उसकी ऊर्जा पेट तक भी पहुंचेगी। रेकी की ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा है, अतः रेकी चिकित्सक को अपनी ऊर्जा में कोई कमी नहीं होने पाती है।

*किडनी में क्रिएटिनिन और यूरिया की समस्या के घरेलू उपचार* 

वस्तुतः तथ्य यह है कि ऊर्जा देने से घटती नहीं वरन् बढ़ती है। रेकी उपचारक मात्र एक Ÿाा माध्यम होता है। वस्तुतः वह स्वयं अपने को कर्Ÿाा भाव से पृथक रखता है। रेकी देने के समय यह नियम याद रखें कि रेकी तभी दी जाए जब कोई इसे मांगे। इसे किसी को जबरदस्ती देने का प्रयास न करें। रेकी चिकित्सक को अधिक परिणामोन्मुखी नहीं होना चाहिए। परिणाम को परमात्मा के हाथों में ही मानना चाहिए। रेकी प्राप्त करने वाले व्यक्ति को गर्मी, ठंडक, दबाव, कंपकंपी आदि की अनुभूतियां हो सकती है, अतः इससे घबराएं नहीं। रेकी किसी भी धर्म या देवी-देवता से संबंधित नहीं है। किसी भी धर्म को मानने वाला व्यक्ति रेकी शक्ति प्राप्त कर सकता है। रेकी के लिए पूजा-पाठ भी आवश्यक नहीं है। रेकी निर्जीव पदार्थांे पर भी प्रभाव डालती है। रेकी कहीं भी तथा किसी भी परिस्थिति में दी जा सकती है। वस, ट्रेन अथवा वायुयान में यात्रा करते समय भी रेकी दे सकते हैं।
    रेकी देने वालों को लहसुन, प्याज, तंबाकू, मदिरा तथा तेज किस्म की सुगंधियों से बचना चाहिए। रेकी देते समय धूम्रपान कदापि न करें। रेकी देने वाले व्यक्ति को शांतचित होना चाहिए तथा रेकी देने के पूर्व और पश्चात मैत्री भाव भरे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। रेकी देते समय मध्यम स्वर का संगीत बजाया जाय, तो परिणाम और भी अच्छे आयेंगे। क्लासिकल संगीत भी उपयोगी है। स्थान की स्वच्छता का ध्यान भी रखना आवश्यक है। कमरे का तापमान 210 से अधिक न हो। अधिक ठंडे तापमान का कमरा भी उपयुक्त नहीं होता है। रेकी प्रेम का ही दूसरा नाम है। अतः रेकी देते समय हमारा व्यवहार प्रेमपूर्ण एवं करुणामय होना चाहिए। रेकी लेने वाले और देने वाले दोनों को ही ढीले एवं आरामदायक वस्त्र पहनने चाहिए। उपचार के समय घड़ी, चश्मा, बैल्ट, जूते, टाई आदि उतार दें।

नीम के पत्ते खाने के फायदे 

साधारण व्याधियों के लिए तीन दिन का रेकी उपचार करना चाहिए, जबकि पुरानी बीमारियों में इसका उपचार कम से कम 21 दिन तक अनिवार्य है। शरीर के सभी अंगों पर कम से कम 3 मिनट तक हथेलियां रखें। पहले संपूर्ण शरीर का उपचार करें| तत्पश्चात् जिस अंग में तकलीफ हो, वहां पर 20 से 30 मिनट तक उपचार करें। अगर समय के अभाव के कारण पूर्ण रेकी उपचार संभव न हो, तो मात्र तलवों व पैरों पर रेकी का उपचार करें।
अन्य चिकित्सा प्रणालियों के साथ रेकी का उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता है जैसे मालिश, प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक होम्योपैथिक आदि के साथ भी कर सकते हैं। प्रत्येक उपचार में यह काफी सहायक हो सकती है। इसे आप्रेशन, हड्डी के प्लास्टर, चोट आदि में भी प्रयोग कर सकते हैं। एलोपैथिक दवाओं के साथ रेकी का उपचार उसकी गुणवŸाा को और बढ़ा देगा। रेकी में अब क्रिस्टल, डाउसिंग, पेंडुलम और स्केनिंग का प्रयोग भी किया जाने लगा है। तथापि रेकी कोई जादुई करिश्मा नहीं है। रेकी से मनुष्य अमर नहीं होता। रेकी जन्म एवं मृत्यु को नहीं रोकती। यह तो जीवन-काल को केवल आसान बनाने में मदद करती है|

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पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि

गुर्दे के रोगों की घरेलू,हर्बल चिकित्सा





गुर्दा शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है इसे अंग्रेजी में किडनी कहा जाता है। गुर्दे का वजन लगभग 150 ग्राम होता है| इसका आकार सेम के बीज या काजू की भांति होता है। यह शरीर में पीछे कमर की ओर रीढ़ के ढांचे के ठीक नीचे के दोनों सिरों पर स्थित होते हैं। शरीर में दो गुर्दे होते हैं। गुर्दे लाखों छलनियों तथा लगभग 140 मील लंबी नलिकाओं से बने होते हैं। गुर्दों में उपस्थित नलिकाएं छने हुए द्रव्य में से जरूरी चीजों जैसे सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम आदि को दोबारा सोख लेती हैं और बाकी अनावश्यक पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती हैं। 

किसी ख़राबी की वजह से यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर देता है तो उस स्थिति में दूसरा गुर्दा पूरा कार्य संभाल सकता है।


गुर्दे शरीर को विषाक्‍त होने से बचाते हैं और स्वस्थ रखते हैं। गुर्दों का विशेष संबंध हृदय, फेफड़ों, यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं। जब गुर्दे ख़राब होते हैं तो रोगी का रक्‍तचाप बढ़ जाता है और वह धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है।



गुर्दे के कार्य -
• गुर्दा रक्त में से जल और बेकार पदार्थो को अलग करता है।
• शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।
• यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है।
• इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो मनुष्य की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है।

• गुर्दे रक्‍त में मौजूद विकारों को छान कर साफ़ करते हैं और शरीर को स्वच्छ रखते हैं।
• खून को साफ कर मूत्र बनाने का कार्य भी गुर्दों के द्वारा ही पूरा होता है।
• गुर्दे खून में उपस्थित अनावश्यक कचरे को मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल देते हैं।
• गुर्दों के सही से काम न करने पर शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है।


गुर्दे के रोग के कारण : -

• लगातार दूषित पदार्थ खाने, दूषित जल पीने और नेफ्रॉन्स के टूटने से गुर्दे के रोग उत्पन्न होते हैं।
• किडनी के लिए मधुमेह, पथरी और हाईपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) बडे़ जोखिम कारक हैं।
• गंदा मांस, मछली, अंडा, फल और भोजन और गंदे पानी का सेवन गुर्दे की बीमारी का कारण बन सकते हैं।• भोजन और पेय पदार्थों में भी कीटाणुनाशकों, रासायनिक खादों, डिटरजेंट, साबुन, औद्योगिक रसायनों के अंश पाएं जाते हैं। ऐसे में फेफड़े और जिगर के साथ ही गुर्दे भी सुरक्षित नहीं हैं।
• शरीर में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण गुर्दे शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में अक्षम हो जाते हैं |

• गुर्दे के रोग का बहुत समय तक पता नहीं चलता, लेकिन जब भी कमर के पीछे दर्द उत्पन्न हो तो इसकी जांच करा लेनी चाहिए।


गुर्दे के रोग -



गुर्दे के गंभीर रोगों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
1. एक्यूट रीनल फेल्योर -
इसमें गुर्दे आंशिक अथवा पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देते हैं परंतु लगातार उपचार द्वारा यह धीरे-धीरे पुन: कार्यशील हो जाते हैं।
2. क्रोनिक रीनल फेल्योर-
यह तब होती है जब किडनी ख़राब हो या तीन माह या इससे अधिक समय से काम नहीं कर रही हो। इसका यदि ठीक प्रकार से इलाज न हो तो क्रोनिक किडनी समस्या बढ़ती जाती है। वृक्क (गुर्दा) रोग में क्रोनिक किडनी रोग के पांच चरण होते हैं। किडनी समस्या के अंतिम चरण में गुर्दे केवल पंद्रह प्रतिशत ही कार्य कर पाते हैं। इसमें नेफ्रॉन्स की अत्यधिक मात्रा में क्षति हो जाती है जिसके कारण गुर्दो की कार्य क्षमता लगातार कम होती चली जाती है।

गुर्दे की जांच -

उपर्युक्त दोनों तरह के रोगों के निदान के लिए सबसे पहले रक्त यूरिया, नाइट्रोजन तथा क्रीएटनिन का रक्त परीक्षण करवाना चाहिए।
मूत्र जांच भी करा लेना चाहिए क्योंकि इससे यह पता चलता है कि गुर्दो की कार्यशीलता और कार्य क्षमता कैसी है।



लक्षण -

• जब गुर्दा किसी रोग से रोगग्रस्त हो जाता है तो मूत्र सम्बन्धी तकलीफ शुरू हो सकती है।
• आंखों के ‍नीचे सूजन या पैरों के पंजों में सूजन हो सकती है।
• पाचन क्रिया भी कमजोर पड़ जाती है।


प्राकृतिक चिकित्सा :



1- किडनी पैक -

प्राकृतिक चिकित्सा में साधारण सी दिखने वाली क्रियाएं शरीर पर अपना रोग निवारक प्रभाव छोडती हैं | किसी सूती या खादी के कपडे की पट्टी को सामान्य ठंडे जल में भिगोकर , निचोड़कर अंग विशेष पर लपेटने के पश्चात् उसके ऊपर से ऊनी कपडे की सूखी पट्टी इस तरह लपेटी जाती है कि अन्दर वाली सूती/खादी पट्टी पूर्ण रूप से ढक जाये |

किडनी पैक के लाभ -


    गुर्दों के अतिरिक्त पेट के समस्त रोगों,पुरानी पेचिस, कोलायिटिस,पेट की नयी-पुरानी सूजन,अनिद्रा,बुखार एवं स्त्रियों के गुप्त रोगों की रामबाण चिकित्सा है | इसे रात्रि भोजन के दो घंटे बाद पूरी रात तक लपेटा जा सकता है |

किडनी पैक के लिए आवश्यक साधन -


* खद्दर या सूती कपडे की पट्टी इतनी चौड़ी जो पेडू सहित नाभि के तीन-चार अंगुल ऊपर तक आ जाये एवं इतनी लम्बी कि पेट के तीन-चार लपेट लग सकें |
* सूती कपडे से दो इंच चौड़ी एवं इतनी ही लम्बी ऊनी पट्टी |


विधि -

     खद्दर या सूती पट्टी को ठन्डे पानी में भिगोकर अच्छी तरह से निचोड़ लें तत्पश्चात पेडू से नाभि के तीन – चार अंगुल ऊपर तक लपेट दें ,इसके ऊपर से ऊनी पट्टी इस तरह से लपेट दें कि नीचे वाली गीली पट्टी पूरी तरह से ढक जाये |एक से दो घंटा या सारी रात इसे लपेट कर रखें |


2- कमर (पीठ पर) की गर्म – ठंडी सेंक :-

     प्रातः कमर पर गर्म-ठंडी सेंक गुर्दों के लिए अत्यंत लाभदायक है | गर्म-ठंडी सेंक के लिए एक रबड़ की थैली में गर्म पानी भरें | एक बर्तन में खूब ठंडा पानी रख लें | गर्म सेंक रबड़ की थैली से एवं ठंडी सेंक पानी में एक छोटा तौलिया भिगोकर निम्नलिखित क्रम से करें -
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 3 मिनट
   यदि गर्म सेंक के लिए रबड़ की थैली उपलब्ध न हो तो ठंडी सेंक की तरह गर्म पानी में छोटा तौलिया भिगोकर, हल्का निचोड़कर सेंक की जा सकती है | सेंक के दौरान तौलिया प्रति मिनट पुनः पानी में भिगोकर बदलते रहें |


आहार चिकित्सा एवं परहेज -

नियंत्रित आहार से खराब किडनी को ठीक किया जा सकता है।
• नियमित नींबू, आलू का रस और हमेशा शुद्ध जल का अधिक से अधिक सेवन करें।
• गुर्दे की सूजन से पीड़ित रोगी को भोजन करने के तुरंत बाद मूत्र त्याग करना चाहिए। इससे न सिर्फ गुर्दे की बीमारी से बचे रहेंगे बल्कि कमर दर्द, लिवर के रोग, गठिया, पौरुष ग्रंथि की वृद्धि आदि अनेक बीमारियों से भी बचाव होगा।
• गुर्दे के रोग में बथुआ फायदेमन्द होता है। पेशाब कतरा-कतरा सा आता हो या पेशाब रुक-रुककर आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।
• गुर्दे के रोगी को आलू खाना चाहिए। इसमें सोडियम की मात्रा बहुत पायी जाती है और पोटेशियम की मात्रा कम होती है।
• गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बन्द हो गया हो तो मूली का रस 20-40 मिलीलीटर दिन में 2 से 3 बार पीना चाहिए।
• पुनर्नवा के 10 से 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा सेवन करने से गुर्दे के रोगों में बेहद लाभकारी होता है।
• गाजर और ककड़ी या गाजर और शलजम का रस पीने से गुर्दे की सूजन, दर्द व अन्य रोग ठीक होते हैं। यह मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी होता है।

परहेज -

• ज्यादा मात्रा में दूध, दही, पनीर व दूध से बनी कोई भी वस्तु न खाएं।
• इस रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली, मुर्गा, चॉकलेट, काफी, दूध, चूर्ण, बीयर, वाइन आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

• गुर्दा रोग में सूखे फल(ड्राई फ्रूट), केक, पेस्ट्री, नमकीन, मक्खन नहीं खाना चाहिए।
• भोजन में मसालेदार भोज्य पदार्थ का सदा के लिए त्याग कर दें।
• नमक का प्रयोग कम से कम करें |
• तनाव और प्रदूषण से दूर रहें।

योग चिकित्सा :-

1. खड़े होकर किए जाने वाले आसन :
वृक्षासन, ताड़ासन,अंर्धचंद्रासन, 

त्रिकोणासन




और पश्चिमोत्तनासन।

2. बैठकर किए जाने वाले आसन :

उष्ट्रासन
और योगमुद्रा ।

3. लेटकर किए जाने वाले आसन : 


धनुरासन  और 
हलासन 
यदि उपरोक्त आसन न कर सकें तो सूर्यनमस्कार और खड़े रहकर किए जाने वाले अंग संचालन को नियमित करें। 




विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -







इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl








जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 




 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट






दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 
mg/dl

urea 22  mg/dl