28.6.16

त्रिफला आयुर्वेद की महान औषधि



त्रिफला आयुर्वेद में कई रोगों का सटीक इलाज करता है। यह 3 औषधियों से बनता है। बेहड, आंवला और हरड इन तीनों के मिश्रण से बना चूर्ण त्रिफला कहा जाता है। ये प्रकृति का इंसान के लिए रोगनाशक और आरोग्य देने वाली महत्वपूर्ण दवाई है। जिसके बारे में हर इंसान को पता होना चाहिए। ये एक तरह की एन्टिबायोटिक है। त्रिफला आपको किसी भी आयुर्वेदिक दुकान पर मिल सकता है। लेकिन आपको त्रिफला का सेवन कैसे करना है और कितनी मात्रा में करना है ये भी आपको पता होना चाहिए। हाल में हुए एक नए शोध में इस बात का खुलासा हुआ है की त्रिफला के सेवन से कैंसर के सेल नहीं बढ़ते । त्रिफला के नियमित सेवन से चर्म रोग, मूत्र रोग और सिर से संबन्धित बीमारियां जड़ से ख़त्म करती है।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

 *संयमित आहार-विहार के साथ त्रिफला का सेवन करने वाले व्यक्तियों को ह्रदयरोग, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, नेत्ररोग, पेट के विकार, मोटापा आदि होने की संभावना नहीं होती। यह कोई 20 प्रकार के प्रमेह, विविध कुष्ठरोग, विषमज्वर व सूजन को नष्ट करता है। अस्थि, केश, दाँत व पाचन- संसथान को बलवान बनाता है। इसका नियमित सेवन शरीर को निरामय, सक्षम व फुर्तीला बनाता है।  गर्म पानी से सोते समय एक चम्मच लेने से क़ब्ज़ नही रहता!त्रिफला के फायदे-
*.रात को सोते वक्त 5 ग्राम (एक चम्मच भर) त्रिफला चुर्ण हल्के गर्म दूध अथवा गर्म पानी के साथ लेने से कब्ज दूर होती है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

*.त्रिफला व ईसबगोल की भूसी दो चम्मच मिलाकर शाम को गुनगुने पानी से लें इससे कब्ज दूर होती है।
*इसके सेवन से नेत्रज्योति में आश्चर्यजनक वृद्धि होती है।
सुबह पानी में 5 ग्राम त्रिफला चूर्ण साफ़ मिट्टी के बर्तन में भिगो कर रख दें, शाम को छानकर पी लें। शाम को उसी त्रिफला चूर्ण में पानी मिलाकर रखें, इसे सुबह पी लें। इस पानी से आँखें भी धो ले। मुँह के छाले व आँखों की जलन कुछ ही समय में ठीक हो जायेंगे।
*शाम को एक गिलास पानी में एक चम्मच त्रिफला भिगो दे सुबह मसल कर नितार कर इस जल से आँखों को धोने से नेत्रों की ज्योति बढती है।
*एक चम्मच बारीक़ त्रिफला चूर्ण, गाय का घी 10 ग्राम व शहद 5 ग्राम एक साथ मिलाकर नियमित सेवन करने से आँखों का मोतियाबिंद, काँचबिंदु, द्रष्टि दोष आदि नेत्ररोग दूर होते हैं। और बुढ़ापे तक आँखों की रोशनी अचल रहती है।

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

*त्रिफला के चूर्ण को गौमूत्र के साथ लेने से अफारा, उदर शूल, प्लीहा वृद्धि आदि अनेकों तरह के पेट के रोग दूर हो जाते हैं।
त्रिफला शरीर के आंतरिक अंगों की देखभाल कर सकता है, त्रिफला की तीनों जड़ीबूटियां आंतरिक सफाई को बढ़ावा देती हैं।
*चर्मरोगों में (दाद, खाज, खुजली, फोड़े-फुंसी आदि) सुबह-शाम 6 से 8 ग्राम त्रिफला चूर्ण लेना चाहिए।
*एक चम्मच त्रिफला को एक गिलास ताजे पानी में दो- तीन घंटे के लिए भिगो दे, इस पानी को घूंट भर मुंह में थोड़ी देर के लिए डाल कर अच्छे से कई बार घुमाये और इसे निकाल दे। कभी कभार त्रिफला चूर्ण से मंजन भी करें इससे मुँह आने की बीमारी, मुंह के छाले ठीक होंगे, अरूचि मिटेगी और मुख की दुर्गन्ध भी दूर होगी।
*त्रिफला, हल्दी, चिरायता, नीम के भीतर की छाल और गिलोय इन सबको मिला कर मिश्रण को आधा किलो पानी में जब तक पकाएँ कि पानी आधा रह जाए और इसे छानकर कुछ दिन तक सुबह शाम गुड या शक्कर के साथ सेवन करने से सिर दर्द कि समस्या दूर हो जाती है।

बवासीर  के  रामबाण  उपचार 

*त्रिफला एंटिसेप्टिक की तरह से भी काम करता है। इस का काढ़ा बनाकर घाव धोने से घाव जल्दी भर जाते है।
*त्रिफला पाचन और भूख को बढ़ाने वाला और लाल रक्त कोशिकाओं की संख्या में वृद्धि करने वाला है।
*मोटापा कम करने के लिए त्रिफला के गुनगुने काढ़े में शहद मिलाकर ले। त्रिफला चूर्ण पानी में उबालकर, शहद मिलाकर पीने से चरबी कम होती है।
*त्रिफला का सेवन मूत्र-संबंधी सभी विकारों व मधुमेह में बहुत लाभकारी है। प्रमेह आदि में शहद के साथ त्रिफला लेने से अत्यंत लाभ होता है।
*त्रिफला की राख शहद में मिलाकर गरमी से हुए त्वचा के चकतों पर लगाने से राहत मिलती है।
*5 ग्राम त्रिफला पानी के साथ लेने से जीर्ण ज्वर के रोग ठीक होते है।
*5 ग्राम त्रिफला चूर्ण गोमूत्र या शहद के साथ एक माह तक लेने से कामला रोग मिट जाता है।
*टॉन्सिल्स के रोगी त्रिफला के पानी से बार-बार गरारे करवायें।

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

त्रिफला दुर्बलता का नास करता है और स्मृति को बढाता है। दुर्बलता का नास करने के लिए हरड़, बहेडा, आँवला, घी और शक्कर मिला कर खाना चाहिए।
*त्रिफला, तिल का तेल और शहद समान मात्रा में मिलाकर इस मिश्रण कि 10 ग्राम मात्रा हर रोज गुनगुने पानी के साथ लेने से पेट, मासिक धर्म और दमे की तकलीफे दूर होती है इसे महीने भर लेने से शरीर का सुद्धिकरन हो जाता है और यदि 3 महीने तक नियमित सेवन करने से चेहरे पर कांती आ जाती है।
*त्रिफला, शहद और घृतकुमारी तीनो को मिला कर जो रसायन बनता है वह सप्त धातु पोषक होता है। त्रिफला रसायन कल्प त्रिदोषनाशक, इंद्रिय बलवर्धक विशेषकर नेत्रों के लिए हितकर, वृद्धावस्था को रोकने वाला व मेधाशक्ति बढ़ाने वाला है। दृष्टि दोष, रतौंधी (रात को दिखाई न देना), मोतियाबिंद, काँचबिंदु आदि नेत्ररोगों से रक्षा होती है और बाल काले, घने व मजबूत हो जाते हैं।
*डेढ़ माह तक इस रसायन का सेवन करने से स्मृति, बुद्धि, बल व वीर्य में वृद्धि होती है।

*किडनी फेल रोग का अचूक इलाज* 

त्रिफला के नुकसान-
यदि आप त्रिफला का प्रयोग बिना डाक्टर के परामर्श के करते हैं तो इससे डायरिया हो सकता है। क्योंकि यह शरीर में पानी की कमी करता है। और इंसान को डायरिया हो जाता है।
ब्लड प्रेशर-
त्रिफला का अधिक सेवन से ब्लड प्रेशर में उतार-चढ़ाव होने लगता है। और ब्लड प्रेशर के मरीजों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
कई बार कुछ लोग पेट साफ करने के लिए त्रिफला का सेवन करने लगते हैं लेकिन ऐसे में वे नियमित रूप से त्रिफला का सेवन करने लगते हैं जिस वजह से उन्हें अनिद्रा  और बेचैनी की समस्या हो सकती है।
*इसमें कोइे दो राय नहीं है कि त्रिफला सेहत के लिए बेहद असरकारी और फायदेमंद दवा है। 

पिपली के गुण प्रयोग लाभ 

23.6.16

माईग्रेन दर्द की आयुर्वेदिक चिकित्सा // Migraine home remedies




माईग्रेन (अर्धावभेदक-आधासीसी) क्या है?
सिरदर्द एक आम रोग है और प्रत्येक व्यक्ति को कभी न कभी इसे मेहसूस करता ही है।इस रोग के विशेषग्य इसके कारण के मामले में एकमत न होकर अलग-अलग राय रखते हैं। सभी की राय है कि माईग्रेन के विषय में और अनुसंधान की आवश्यकता है। अभी तक माईग्रेन की तीव्रता का कोइ वैज्ञानिक  माप नहीं है।
माईग्रेन एक रक्त परिसंचरण (vascular) तंत्र की व्याधि है। मस्तिष्क की रुधिर वाहिकाओं का आकार बढ जाने से याने खून की नलिकाएं फ़ैल जाने से इस रोग का संबंध माना जाता है। इन रुधिर वाहिकाओं पर नाडियां(नर्व्ज) लिपटी हुई होती हैं। जब रक्त वाहिकाएं फ़ैलकर आकार में बढती हैं तो नाडियों पर तनाव बढता है और फ़लस्वरूप नाडियां एक प्रकार का केमिकल निकालती हैं, जिससे दर्द और सूजन पैदा होते हैं, यही माईग्रेन है।
माईग्रेन अक्सर हमारे सिम्पेथेटिक नर्वस सिस्टम पर हमला करता है। इस नाडीमंडल की अति सक्रियता से आंतों में व्यवधान होकर अतिसार, वमन भी शिरोवेदना के साथ होने लगते हैं। इससे आमाशय स्थित भोजन भी देरी से आंतों में पहुंचता है। माईग्रेन की मुख मार्ग से ली गई दवा भी भली प्रकार अंगीकृत नहीं हो पाती है। प्रकाश और ध्वनि के प्रति असहनशीलता पैदा हो जाती है। रक्त परिवहन धीमा पडने से चर्म पीला पड जाता है और हाथ एवं पैर ठंडे मेहसूस होते हैं।
माईग्रेन का सिरदर्द गर्मी, मानसिक तनाव, अपर्याप्त नींद से बढ जाता है। करीब 70 प्रतिशत माईग्रेन रोगियों का पारिवारिक इतिहास देखें तो उनके नजदीकी रिश्तेदारों में इस रोग की मौजूदगी मिलती है। पुरुषों की बनिस्बत औरतों में यह रोग ज्यादा होता है। इस रोग को आधाशीशी भी कहते हैं ।यह ज्यादातर सिर के बांये अथवा दाहिने भाग में होता है। कभी-कभी यह दर्द ललाट और आंखों पर स्थिर हो जाता है। सिर के पिछले भाग में गर्दन तक भी माईग्रेन का दर्द मेहसूस होता है। माईग्रेन का सिरदर्द 4 घंटे से लेकर 3-4 दिन की अवधि तक बना रह सकता है। बहुत से माईग्रेने रोगियों में सिर के दोनों तरफ़ दर्द पाया जाता है। माईग्रेन एक बार बांयीं तरफ़ होगा तो दूसरी बार दांये भाग में हो सकता है। माईग्रेन का दर्द सुबह उठते ही प्रारंभ हो जाता है और सूरज के चढने के साथ रोग भी बढता जाता है। दोपहर बाद दर्द में कमी हो जाती है। ऐसा देखने में आया है कि 60 साल की उम्र के बाद यह रोग हमला नहीं करता है।
इस रोग के इलाज में माडर्न दवाएं ज्यादा सफ़ल नहीं हैं। साईड ईफ़ेक्ट ज्यादा होते हैं। निम्नलिखित उपाय निरापद और कारगर हैं--
1) बादाम 10-12 नग प्रतिदिन खाएं। यह माईग्रेन का बढिया उपचार है।
2) बन्द गोभी को कुचलकर एक सूती कपडे में बिछाकर मस्तक (ललाट) पर बांधें। रात को सोते वक्त या दिन में भी सुविधानुसार कर सकते हैं। जब गोभी का पेस्ट सूखने लगे तो नया पेस्ट बनाककर पट्टी बांधें। मेरे अनुभव में यह माईग्रेन का सफ़ल उपाय हैं।
3) अंगूर का रस 200 मिलि सुबह-शाम पीयें। बेहद कारगर नुस्खा है।
4) नींबू के छिलके कूट कर पेस्ट बनालें। इसे ललाट पर बांधें । जरूर फ़ायदा होगा।
5.अंगूर का रस और पालक का रस दोनों करीब 300 मिलि पीयें आधाशीशी में गुणकारी है।
6) गरम जलेबी 200 ग्राम नित्य सुबह खाने से भी कुछ रोगियों को लाभ हुआ है। 
7) आधा चम्मच सरसों के बीज का पावडर 3 चम्मच पानी में घोलक्रर नाक में रखें । माईग्रेन का सिरदर्द कम हो जाता है।
8) सिर को कपडे से मजबूती से बांधें। इससे खोपडी में रक्त का प्रवाह कम होकर सिरदर्द से राहत मिल जाती है।
9) माईग्रेन रोगी देर से पचने वाला और मसालेदार भोजन न करें।
10) विटामिन बी काम्प्लेक्स का एक घटक नियासीन है। यह विटामिन आधाशीशी रोग में उपकारी है। 100 मिलि ग्राम की मात्रा में रोज लेते रहें।
11) तनाव मुक्त जीवन शैली अपनाएं।
12) हरी सब्जियों और फ़लों को अपने भोजन में प्रचुरता से शामिल करें।
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  हर्बल चिकित्सा के अनमोल आलेख-
पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

22.6.16

सफ़ेद मूसली के गुण और उपयोग// The benefits of safed musli



सफ़ेद मूसली एक औषधीय शाकीय पौधा है | सफेद मूसली का उपयोग आयुर्वेदिक औषधी में किया जाता है। जड़ो का उपयोग टॅानिक के रूप में किया जाता है। इसमें समान्य दुर्बलता को दूर करने का गुण होता है। इसका उपयोग गाठिया वात, अस्थमा, अधिश्वेत रक्ता, बवासीर और मधुमेह के उपचार में किया जाता है। इसमें स्पर्मेटोनिक गुण होता है इसलिए नपुंसकता के उपचार में इसका उपयोग किया जाता है। जन्म संबंधी और जन्मोत्तर रोगों के उपचार में यह सहायक होती है। वियाग्रा के एक विकल्प के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है। सफ़ेद मूसली के सामने सब फ़ीके हैं, जिन्सेंग भी |वियाग्रा के बहुत सारे साइड इफेक्ट हैं किन्तु सफेद मूसली का कोई साइड इफेक्ट नहीं पाया गया है क्योकि यह आयुर्वेदिक औषधि है और सीधे वानस्पतिक रूप से ही उपयोग होता है |


शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 


*एक फार्मास्युटिकल्स कंपनी अपनी वेबसाइट पर ये दावा करते हैं कि मूसली पावर एक्स्ट्रा के कोई ज्ञात नकारात्मक साइड इफेक्ट नहीं हैं और क्योंकि यह पूरी तरह कार्बनिक हर्बल सामग्री से बनाया जाता है, इसलिये मानव उपभोग के लिए सुरक्षित है। कंपनी दावा करती है कि इस उत्पाद को उच्च रक्तचाप, रुमेटी गठिया वाले तथा स्तनपान कराने वाली माताओं के लिए भी इसका सेवन सुरक्षित है, हालांकि इस संबंध में उन्होंने कोई चिकित्सकीय प्रमाण नहीं दिया।
*आदिवासी अंचलों में आदिवासी हर्बल जानकार प्रतिदिन 2 से 4 ग्राम सफ़ेद मूसली की जडों के चूर्ण के सेवन की सलाह देते हैं। ऐसा माना जाता है कि ये चूर्ण पुरुषों में सेक्स से संबंधित कई विकारों को दुरुस्त कर देता है। 


हस्त  मेथुन जनित यौन दुर्बलता के उपचार 


*सफ़ेद मूसली को बतौर सेक्स मेडिसिन बहुत प्रचारित किया गया लेकिन इसके अन्य औषधीय गुणों पर कम ही चर्चा होती है। यदि जानकारों की माने तो यदि आपको पेशाब में जलन की शिकायत रहती है तो सफेद मूसली की जड़ों के चूर्ण के साथ इलायची मिलाकर दूध में उबालते हैं और पेशाब में जलन की शिकायत होने पर रोगियों को दिन में दो बार पीने की सलाह देते हैं। इन्द्रायण की सूखी जड़ का चूर्ण और सफेद मूसली की जड़ों के चूर्ण की समान मात्रा (1-1 ग्राम) लेकर इसे एक गिलास पानी में डालकर खूब मिलाया जाए और मरीज को प्रतिदिन सुबह दिया जाए। ऐसा सात दिनों तक लगातार करने से पथरी गलकर बाहर आ जाती है। अक्सर बदन दर्द की शिकायत करने वाले लोगों को प्रतिदिन इसकी जड़ों का सेवन करना चाहिए, फायदा होता है। 

*सफ़ेद मुसली पुरुषों को शारीरिक तौर पर पुष्ट बनाने के अलावा इनके वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बढाने में मददगार है। यही नहीं, कई शोध परिणाम ये भी बताते हैं कि डायबिटीस के बाद होने वाली नपुंसकता की शिकायतों में भी सफ़ेद मुसली क्लिनिकल तौर पर सकारात्मक असर करते दिखाई दी।
*सफेद मूसली शीघ्रपतन के देसी इलाज के काफी मशहूर है। कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बनाकर एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम एक कप दूध के साथ लेने से शीघ्रपतन और वीर्य की कमी जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं। 

*सालों से विभिन्न दवाइयो के निर्माण में भी सफेद मूसली का उपयोग किया जाता है। मूलतः यह एक ऐसी जडी-बूटी है जिससे किसी भी प्रकार की शारीरिक शिथिलता को दूर करने की क्षमता होती है। यही कारण है की कोई भी आयुर्वेदिक सत्व जैसे च्यवनप्राश आदि इसके बिना संम्पूर्ण नहीं माने जाते हैं।
*यह इतनी पौष्टिक तथा बलवर्धक होती है की इसे शिलाजीत की संज्ञा भी दी जाती है। चीन, उत्तरी अमेरिका में पाये जाने वाले इस पौधे, जिसका वानस्पतिक नाम पेनेक्स जिंन्सेग है का विदेशों में फलेक्स बनाये जाने पर भी काम कर रहे हैं। 

*सफेद मुसली पुरुषों को शारीरिक तौर पर पुष्ट बनाने के अलावा वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या बढ़ाने में भी मदद करती है। यही नहीं, कई शोध अपने परिणाम बताते हैं कि डायबिटीस के बाद होने वाली नपुंसकता में भी सफेद मुसली सकारात्मक असर करती पाई गई है।
*कामोत्तेजना बढ़ाने में भी मूसली काफी लाभदायक होती है। इसके लिये कौंचबीज चूर्ण, सफेद मूसली, तालमखाना, अश्वगंध चूर्ण को बराबर मात्रा में तैयार कर 10 ग्राम ठंडे दूध के साथ सेवन करना होता है। ये काफी कारगर नुस्खा माना जाता है।
*आदिकाल से इसे एक महत्वपूर्ण टोनिक और सेहत दुरुस्त करने वाली जडी के तौर पर इस्तमाल किया जाता रहा है। तमाम पौराणिक लेखों से लेकर कई अत्याधुनिक शोधों ने भी इसकी असर क्षमता को प्रमाणित किया है।

*कोरिया, चीन और भूटान जैसे देशों में पाए जाने वाले जिंसेंग ने भारतीय बाजार में पैठ जमाना शुरु कर दिया है, कई सेहत से जुडे उत्पादों में जिंसेंग को समाहित कर भारत देश में खूब प्रचारित करके बेचा भी जा रहा है। 
*इस चूर्ण का सेवन लम्बे समय तक करने पर भी किसी तरह की परेशानी नहीं। चाहे वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या कम हो, नपुंसकता की शिकायत हो या स्वप्नदोष, मूसली हमेशा हर्बल जानकारों द्वारा सुझाई जाती है

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

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पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 



20.6.16

आहार ही औषधि है // Make your diet a remedy

                      *भोजन द्वारा स्वास्थ्य * 

                                                                                                                                     

 


       

इस आलेख में दैनिक उपयोग में आने वाले फ़लों,सब्जियों और कतिपय अन्य पदार्थों में निहित रोग निवारक गुणो का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।
केला: ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता है,हड्डियों को मजबूत बनाता है,हृदय की सुरक्षा करता है,अतिसार में लाभदायक है, खांसी में हितकारी है।
जामुन: केन्सर की रोक थाम , हृदय की सुरक्षा,कब्ज मिटाता है,स्मरण शक्ति बढाता है,रक्त शर्करा नियंत्रित करता है।डायबीटीज में अति लाभदायक।

सेवफ़ल: हृदय की सुरक्षा करता है,दस्त रोकता है,कब्ज में फ़ायदेमंद है,फ़ेफ़डे की शक्ति बढाता है.


चुकंदर: वजन घटाता है,ब्लडप्रेशर नियंत्रित करता है,अस्थिक्षरण रोकता है,केंसर के विरुद्ध लडता है,हृदय की सुरक्षा करता है।



पत्ता गोभी: बवासीर में हितकारी है,हृदय रोगों में लाभदायक है,कब्ज मिटाता है, वजन घटाने में सहायक है।, केंसर में फ़ायदेमंद है।



गाजर:
नेत्र ज्योति वर्धक है, केंसर प्रतिरोधक है, वजन घटाने मं सहायक है, कब्ज मिटाता है, हृदय की सुरक्षा करता    है।


 फ़ूल गोभी-
हड्डियों को मजबूत बनाता है, स्तन केंसर से बचाव करता है, प्रोस्टेट ग्रंथि के केंसर में भी उपयोगी है, चोंट,खरोंच ठीक करता है।






लहसुन-
 कोलेस्टरोल घटाती है, रक्त चाप घटाती है, कीटाणुनाशक है,केंसर से लडती है।






शहद-घाव भरने में उपयोगे है, पाचन क्रिया सुधारती है, एलर्जी रोगों में उपकारी है, अल्सर से मुक्तिकारक है, तत्काल स्फ़ूर्ती देती है।





नींबू:
त्वचा को मुलायम बनाता है,केंसर अवरोधक है, हृदय की सुरक्षा करता है,,ब्लड प्रेशर नियंत्रित करता है, स्कर्वी रोग नाशक है।

अंगूर:
रक्त प्रवाह वर्धक है, हृदय की सुरक्षा करता है, केंसर से लडता है, गुर्दे की पथरी नष्ट करता है, नेत्र ज्योति वर्धक है।






आम:
 केंसर से बचाव करता है,थायराईड रोग में हितकारी है, पाचन शक्ति बढाता है, याददाश्त की कमजोरी में हितकर है।


प्याज:
फ़ंगस रोधी गुण हैं, हार्ट अटेक की रिस्क को कम करता है। जीवाणु नाशक है,केंसर विरोधी है। खराब कोलेस्टरोल को घटाता है।





अलसी के बीज-
मानसिक शक्ति वर्धक है, रोग प्रतिकारक शक्ति को ताकत देता है, डायबीटीज में उपकारी है, हृदय की सुरक्षा करता है, डायजेशन को ठीक करता है।





संतरा:
हृदय की सुरक्षा करता है, रोग प्रतिकारक शक्ति उन्नत करता है,, श्वसन पथ के विकारों में लाभकारी है, केंसर में हितकारी है।



टमाटर:
कोलेस्टरोल कम करता है, प्रोस्टेट ग्रंथि के स्वास्थ्य के लिये उपकारी है,केंसर से बचाव करता है, हृदय की सुरक्षा करता है।.



पानी:

गुर्दे की पथरी नाशक है, वजन घटाने में सहायक है, केसर के विरुद्ध लडता है, त्वचा के चमक बढाता है।
अखरोट:


मूड उन्नत करन में सहायक है, मेमोरी पावर बढाता है,केंसर से लडता है, हृदय रोगों से बचाव करता है,कोलेस्टरोल घटाने मं मददगार है।



तरबूज:
स्ट्रोक रोकने में उपयोगी है, प्रोस्टेट के स्वास्थ्य के लिये हितकारी है, रक्तचाप घटाता है, वजन कम करने में सहायक है।



अंकुरित गेहूं:

बडी आंत की केंसर से लडता है, कब्ज प्रतिकारक है, स्ट्रोक से रक्षा करता है, कोलेस्टरोल
कम करता है, पाचन सुधारता है।





चावल:
किडनी स्टोन में हितकारी है, डायबीटीज में लाभदायक है,स्ट्रोक से बचाव करता है, केंसर से लडता है, हृदय की सुरक्षा करता है।





आलू बुखारा:

हृदय रोगों से बचाव करता है, बुढापा जल्द आने से रोकता है, याददाश्त बढाता है,












कोलेस्टरोल घटाता है, कब्ज प्रतिकारक है।




पाएनेपल:




अतिसार(दस्त) रोकता है, वार्ट्स(मस्से) ठीक करता है, सर्दी,ठंड से बचाव करता है, अस्थिक्षरण रोकता है। पाचन सुधारता है।




जौ,जई:


कोलेस्टरोल घटाता है,केंसर से लडता है, डायबीटीज में उपकारी है,,कब्ज प्रतिकारक् है ,त्वचा पर शाईनिंग लाता है।

*किडनी में क्रिएटिनिन और यूरिया की समस्या के घरेलू उपचार* 


अंजीर:



रक्त चाप


नियंत्रित करता है, स्ट्रोक्स से बचाता है, कोलेस्टरोल कम करता है, केंसर से लडता है,वजन घटाने में सहायक है।

शकरकंद:

आंखों की रोशनी बढाता है,मूड उन्नत करता है, हड्डिया बलवान बनाता है, केंसर से लडता है।

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि


मस्से के आयुर्वेदिक उपचार // Wart removal home remedies


             


       
मस्से वैसे तो कोई तकलीफ़ नहीं देते लेकिन खासकर चेहरे के मस्से रंग रूप को विकृत कर देते है। ये त्वचा पर उगते उभरते हैं और अवांछित
प्रतीत होते हैं। मस्से गर्दन,हाथ,पीठ ,चिन,पैर आदि किसी भी जगह हो सकते हैं।
मस्से पिगमेंट कोषिकाओं के समूह होते हैं। ये काले भूरे रंग के होते हैं। कुछ मस्से आनुवांशिक होते हैं लेकिन अधिक धूप में रहने से भी मस्से पनप सकते हैं। अधिकतर मस्से केंसर रहित होते हैं।


मस्से का उपचार ऐसे करें-


१) मस्से पर आलू काटकर उसकी फ़ांक रगडनी चाहिये। कुछ रोज में मस्से झडने लगेगे।
२) जलती हुई अगरबत्ती का गुल मस्से को छुआएं और तुरंत हटालें। लगातार कुछ दिन ऐसा उपचार करने से मस्से सूखकर झड जाते हैं।
३) केले के छिलके का भीतरी हिस्सा मस्से पर रगडें। हितकारी उपचार है।
४) प्याज का रस नियमित रूप से मस्से पर लगाते रहने से मस्से दूर होते हैं।


५) एक लहसुन की कली चाकू से काटकर उसे मस्से पर रगडें। धीरे-धीरे मस्से सूखकर झडने लगते हैं।
६) खट्टे सेवफ़ल का रस मस्से पर दिन में तीन बार लगाने और ऊंगली से मालिश करने से मस्से समाप्त होते हैं।
७) मीठा सोडा अरंडी के तेल में मिलाकर पेस्ट जैसा बनाकर रोज रात को सोते वक्त मस्सों पर ऊंगली से लगाने और उस पर पट्टी बांधने और सुबह में पट्टी खोलने के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
 




९) रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
१०) विटामिन सी,विटामिन ए और विटामिन ई का नियमित सेवन करने से मस्सों से निजात मिल जाती है और स्वास्थ्य भी उन्नत हो जाता है।
११) पोटेशियम युक्त सेव,केला,अंगूर,आलू,,पालक ,टमाटर का प्रचुर मात्रा में उपयोग करने से मस्से नष्ट होते हैं।

१२) थूहर का दूध या कार्बोलिक एसीड मस्सों पर लगाना कारगर चिक्त्सा मानी गई है।
१३) नागरवेल के पान के डंठल का रस मस्से पर लगाना परम हितक्री उपचार है।
१४) ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएँगे|
१६) मस्से वाले भाग को पाईनेपल जूस में रखें। इसमें मस्से नष्ट करने वाले एन्जाईम होते है।


१७) ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे।
१८) बरगद के पेड़ के पत्तों का दूध मस्सों के उपचार के लिए बहुत ही असरदार होता है। इस प्रयोग से त्वचा सौम्य हो जाती है और मस्से अपने आप गिर जाते हैं।
19) केले के छिलके को अंदर की तरफ से मस्से पर रखकर उसे एक पट्टी से बांध लें। और ऐसा दिन में दो बार करें और लगातार करते रहें जब तक कि मस्से ख़तम नहीं हो जाते।



एक्ज़ीमा के घरेलु उपचार 

२०) अरंडी का तेल नियमित रूप से मस्सों पर लगायें। इससे मस्से नरम पड़ जायेंगे, और धीरे धीरे गायब हो जायेंगे। अरंडी के तेल के बदले कपूर के तेल का भी प्रयोग कर सकते हैं।
२१) एक बूँद ताजे मौसमी का रस मस्से पर लगा दें, और इसे भी पट्टी से बांध लें। ऐसा दिन में लगभग 3 या 4 बार करें। ऐसा करने से मस्से गायब हो जायेंगे।कसीसादी तेल मस्सों पर रखकर पट्टी से बांध लें।
२२) होम्योपैथी में मस्से नष्ट करने की कई कारगर औषधियां हैं जो लक्षणों की समानता के आधार पर व्यवहार में लाई जाती हैं। नीचे कुछ होम्योपैथिक दवाएं लिख रहा हूं जो मस्से के ईलाज में प्रयुक्त होती हैं :-
थूजा 1m ,कास्टिकम 1m, कल्केरिया कार्ब 1m, डल्कामारा 1m, फ़ेरम पिक्रिकम 30, एसिड नाईट्रिक1m, नेट्रम कार्ब6, नेट्रम म्युरियेटिकम6, एन्टिमोनियम6, सीपिया 200

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि



शहद और दाल चीनी से रोगों की चिकित्सा : Benefits of Honey and Cinnamon


     
शहद इस धरती पर एक ऐसा पदार्थ है जो कभी सडता या खराब नहीं होता है। शहद को कभी उबालना नहीं चाहिये , वर्ना इसमें  मौजूद एन्जाईम्स नष्ट हो जाएंगे। लेकिन कुछ उपचार ऐसे हैं जिनमें शहद को गर्म करना पड सकता  है। बहुत दिनों तक ठंडे और अंध्रेरे की जगह में रखा रहने पर शहद जम जाता है और क्रिस्टल्स बन जाते हैं । इसके लिये किसी बर्तन में पानी गर्म करके उसमे शहद का पात्र कुछ समय रख दें । शहद पिघल जाएगा।




          अनुसंधान में यह प्रदशित हुआ है कि शहद और दाल चीनी के मिश्रण में मानव शरीर के अनेकों रोगों का निवारण करने की अद्भुत  शक्ति  है। दुनियां के करीब सभी देशों में शहद पैदा होता है। आज के वैग्यानिक इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं कि शहद कई बीमारियों की अचूक औषधि है। पश्चिम के वैग्यानिक कहते हैं कि शहद मीठा जरूर है लेकिन अगर इसे सही मात्रा में सेवन किया जावे तो मधुमेह रोगी भी इससे लाभान्वित सकते हैं।



 हृदय रोगों में उपयोगी है---

 शहद और दालचीनी के पावडर का पेस्ट बनाएं और इसे रोटी पर चुपडकर खाएं। घी या जेली के स्थान पर यह पेस्ट इस्तेमाल करें। इससे आपकी धमनियों में कोलेस्टरोल जमा नहीं होगा और हार्ट अटेक से बचाव होगा। जिन लोगों को एक बार हार्ट अटेक का दौरा पड चुका है वे अगर इस उपचार को करेंगे तो अगले हार्ट अटेक से बचे रहेंगे। इसका नियमित उपयोग करने से    द्रुत श्वास की कठिनाई दूर होगी । हृदय की धडकन में शक्ति का समावेश होगा। अमेरिका और कनाडा के कई नर्सिंग होम में प्रयोग किये गये हैं और यह निष्कर्ष आया है कि जैसे-जैसे मनुष्य बूढा होता है, उसकी धमनियां और शिराएं कठोर हो जाती हैं। शहद और दालचीने के मिश्रण से धमनी काठिन्य रोग में हितकारी प्रभाव देखा गया है


संधिवात रोग--

      संधिवात रोगी दो बडे चम्मच  शहद और एक छोटा चम्मच दालचीनी का पावडर एक गिलास मामूली गर्म जल से लें। सुबह और शाम को लेना चाहिये। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के वैग्यानिकों ने अपने शौध में कहा है कि चिकित्सकों ने नाश्ते से पूर्व एक बडा चम्मच शहद और आधा छोटा चम्मच दालचीनी के पावडर का मिश्रण गरम पानी के साथ दिया। इस प्रयोग से केवल एक हफ़्ते में ३० प्रतिशत रोगी संधिवात के दर्द से मुक्त हो गये। एक महीने के प्रयोग से जो रोगी संधिवात की वजह से चलने फ़िरने में असमर्थ हो गये थे वे भी चलने फ़िरने लायक हो गये।





   मूत्राषय का संक्रमण--

         ब्लाडर इन्फ़ेक्शन होने पर दो बडे चम्मच दालचीनी का पावडर और एक बडा चम्मच शहद मिलाकर गरम पानी के साथ देने से मूत्रपथ के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।


 






  कोलेस्टरोल घटाने के लिये--

         बढे हुए कोलेस्टरोल में दो बडे चम्मच शहद और तीन चाय चम्मच दालचीनी पावडर मिलाकर आधा लिटर मामूली गरम जल के साथ लें। इससे सिर्फ़ २ घंटे में खून का कोलेस्टरोल लेविल १० प्रतिशत नीचे आ जाता है। और दिन मे तीन बार लेते रहने से कोलेस्टरोल बढे हुए पुराने  रोगी भी ठीक हो जाते हैं।




  आमाषय के रोग--

            शहद और दालचीनी के पावडर का मिश्रण लेने से पेट दर्द और पेट के अल्सर जड से ठीक हो जाते हैं। जापान और भारत में किये गये रिसर्च में साबित हुआ है कि दालचीनी और शहद के प्रयोग से उदर की गैस का भी समाधान हो जाता है।






मुहासे---

      तीन बडे चम्मच शहद और एक चाय चम्मच दालचीनी पावडर का पेस्ट बनाएं। रात को सोते वक्त चेहरे पर लगाएं। सुबह गरम जल से धोलें ।  दो हफ़्ते के प्रयोग से मुहासे समाप्त होकर चेहरा कांतिमान दिखेगा।




त्वचा विकार--


    दालचीनी और शहद समाना भाग लेकर मिश्रित कर एक्ज़ीमा,दाद  जैसे चर्म उद्भेद  पर लगाने से अनुकूल परिणाम आते हैं।



  मोटापा निवारण--

         एक चाय चम्मच दाल चीनी पावडर  एक गिलास जल में उबालें  फ़िर आंच से उतारकर  इसमें दो बडे चम्मच शहद  मिलाकर सुबह नाश्ते से ३० मिनिट पूर्व   सुहाता गरम पीयें।   ऐसा ही रात को सोने के पहिले करना है। यह उपचार नियमित लेने से शरीर  की अनावश्यक चर्बी समाप्त होती है और अधिक केलोरी वाला भोजन लेने पर भी शरीर में चर्बी नहीं बढती है।












केन्सर---

    जापान और आस्ट्रेलिया के वैग्यानिकों ने  आमाषय और  अस्थि  केंसर की बढी हुई स्थिति  को दालचीनी और शहद का उपयोग  से  पूरी तरह काबू  में किया है। ऐसे रोगियों को एक बडा चम्मच शहद और एक चाय  चम्मच  दालचीनी के पावडर  गरम जल के साथ एक माह तक लेना चाहिये।

  बेहरापन--

      कम सुनने के रोग में दालचीनी और शहद बराबर मात्रा मे लेने से फ़यदा होता है।  दिन में दो बार लेना हितकर है।


  दीर्घ जीवन ---

   लंबी उम्र के लिये  दालचीनी और शहद की चाय नियमित उपयोग करें।  तीन गिलास पानी उबालें । इसमें चार  चाय चम्मच  शहद और एक चाय चम्मच दालचीनी का पावडर मिलाएं। एक चौथाई गिलास चाय हर तीसरे घंटे पीयें।  इससे त्वचा स्वच्छ और झुर्री रहित बनाने में मदद मिलती है। बुढापे को दूर रखने का सर्वोत्तम उपाय है। दीर्घ जीवन की कामना रखने वाले  लोग १०० की उम्र में भी थिरकते दिखेंगे।



   प्रतिरक्षा तंत्र  शक्तिशाली बनाता है-- 

    शहद और दालचीनी के उपयोग से इम्युन सिस्टम ताकतवर बनता है।  खून मे सफ़ेद कणों की   वृद्धि होती  है जो रोगाणु  और वायरस  के हमले से शरीर की सुरक्षा करते  है। जीवाणु और वायरल बीमारियों से लडने की ताकत बढती है।


पिपली के गुण प्रयोग लाभ 

13.6.16

मेथी दाना के फायदे





       

मेथी दाना 5 से 10 ग्राम  रोजाना प्रात:खाली पेट ,धीरे धीरे चबा चबा कर खाते रहे तो व्यक्ति सदा निरोग और चुस्त बना रहेगा और मधुमेह,जोड़ो के दर्द,शोथ,रक्तचाप,बलगमी बीमारियों,अपचन आदि अनेकानेक रोगों से बचाव होगा।वृद्धावस्था की व्याधिया यथा सायिटका ,घुटनों का दर्द,हाथ पैरो का सुन्न पड़ जाना,मांसपेशियों मे खिचाव,भूख न लगना,बार बार मूत्र आना,चक्कर आना इत्यादि उसके पास नहीं फटकेगी।ओज,कान्ति और स्फ्रुती में वृदि होकर व्यक्ति दीर्घायु होगा।

नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

यधपि अलग अलग बीमारियों इलाज के लिए मेथीदाना का प्रयोग कई प्रकार से किया जाता हैं जैसे -मेथीदाना भिगोकर उसका पानी पीना या भिगोये मेथीदाना को घोटकर पीना,उसे अंकुरित करके चबाना या रस निकालकर पीना,उसे उबालकर उसका पानी पीना या सब्जी बनाकर खाना,खिचड़ी या कड़ी पकाते समय उसे डालकर सेवन करना,साबुत मेथीदाना प्रात चबाकर खाना और रात्रि में पानी संग निगलना,भूनकर या वैसे हे उसका दलिया या चूर्ण बनाकर ताज़ा पानी के साथ फक्की लेना,मेथीदाना के लड्डू बनाकर खाना आदि परन्तु मेथी का सेवन का निरापद और अच्छा तरीका हैं -उसका काढा या चाय बनाकर पीना।
मेथी का काढा या चाय बनाने की विधि -
पाँच ग्राम एक डेढ़ चमच मेथीदाना (दरदरा मोटा कूटा हुआ )200 ग्राम पानी में डाल कर धीमी आंच उबलने रख दे।लगभग दस मिनट उबलने के बाद जब पानी 150 ग्राम रह जाए तब बर्तन को आग पर से नीचे उतार ले।पीने लायक गर्म रहने पर इसे स्वच्छ कपडे से छानकर चाय की भांति घुट घुट कर गरम गरम पी ले।यदि कोई व्यक्ति कड़वा काढ़ा न पी सके तो तो वह इसमें थोड़ा गरम दूध और गुड या खांड मिला कर चाय के रूप में भी ले सकता हैं।बलगमी खांसी,छाती के दर्द और पुराने हृदय रोग में थोड़े गरम मेथी के काढ़े में एक दो चमच शहद मिलकर लेना विशेष लाभप्रद रहता हैं,परन्तु शहद मिलाते समय काढ़ा गुनगुना रहना चाहिए न की गरम।

बवासीर  के  रामबाण  उपचार 

काढ़ा बनाने के लिए यदि रात में एक कांच के गिलास में पानी में मेथीदाना भिगोने को रखने के बाद सवेरे उसी पानी में भिगोया मेथीदाना उबाल कर उसका काढ़ा बनाया जाये तो वह जल्दी भी बनेगा तथा मेथीदाना का सत्व ज्यादा आने के कारण वह काढ़ा ज्यादा गुण कारी भी रहेगा।यह मेथीदाना का काढ़ा (बिना इसमें कुछ मिलाये)दिन में दो बार,प्रथम सवेरे नाश्ते से लगभग आधा घंटे पहले और रात्रि में सोने से पहले पीना चाहिए।इसे निरन्तर पीते रहने से आंव नहीं बन पायेगी, क्योकि मेथीदाना विशेष रूप से आँव नाशक और पाचन क्रिया सुधारक हैं।
विशेष-
1) मेथी उष्ण रूक्ष लघु गुणों से युक्त होने के कारण आँव नाषक,कफ निस्सारक और वातनाशक हैं।मेथी पाचन अंगों,श्वसन संस्थान,रक्त वाहनियो,आंतो एवं भीतरी त्वचा (झिल्ली )से चिपकी हुईआँव या चिकनाई और संचित गंदंगी और विषो को देह से बाहर कर देती हैं।और भीतरी अवव्यो की शुद्दि प्रदान करके अंगो की सूजन,जलन और पीड़ा मिटाकर उन्हें पुनः आरोग्य प्रदान कर कार्यक्षम बनाती हैं।

मेथी के प्रयोग से पाचन-क्रिया सुधरने से शरीर में रस आदि का निर्माण ठीक से होने लगता लगता हैं। मल बंध कर आता हैं,पेट ठीक प्रकार से साफ़ होने लगता हैं,यकृत आदि अंग सशक्त बनते हैं और उनकी शिथिलिता दूर होती हैं,जिससे शरीर मे स्फूर्ति, ताकत का अनुभव होने लगता हैं।

2) .मेथी के बीज की रासायनिक बनावट कांड-लीवर आयल के सामान हैं,अतः शाकाहारियो के लिए मेथी मछली के तेल का अच्छा विकल्प हैं और उसी की तरह यह खून की कमी (अनीमिया )दुर्बलता,स्नायु -रोग घुटनों का दर्द-संधिवात सूखा रोग छूत के रोग पश्चात् बनने कमजोरी,बहुमुत्रता,मधुमेह आदि रोगों में बहुत लाभदायक हैं।
3) पाचन संस्थान के रोगों यथा-शूल,अफारा अग्निमाध्य अरुचि,आमातिसार(पेचिश),तिल्ली व जिगर की बढ़ोतरी ,अल्सर,कोलोटिएस आदि के अतरिक्त श्वसन संस्थान के रोग यथा -बलगमी खांसी,दमा,श्वसन अंगो में सूजन,ब्रांकाईटीज़ ,छाती के पुराने रोगों आदि में मेथी का सेवन लाभकारी हैं।अंगो में प्रदाह एवं सूजन मिटाकर उन्हें पुनः कार्यक्षम बनाने का गुण होने के कारण मेथी आंत्र -पुच्छ प्रदाह ,टॉन्सिल एवं सिनासिटेस आदि रोगों को दूर करने में सहायता करती व उससे बचाव भी।

महिलाओं की पीरियड्स की गड़बड़ियो,लिकोरिया,गर्भाशय में सूजन में लाभ करती हैं तथा आर्तव संबंधी अंगों की शुद्दि कर उनकी सूजन मिटाकर महिलाओ को आरोग्य प्रदान करती हैं।प्रसूति में शिथिल बने हुए अंगो को शुद्द करती हैं और मां के दूध के प्रवाह की रूकावटो को दूर करती हैं।मेथी पौषक तत्वों से भरपूर होने के कारण सामान्य शक्तिवर्धक (टॉनिक )का कार्य करती हैं।
4).आधुनिक खोजो से सिद्द हो चूका हैं की मेथी के प्रयोग से मूत्र और रक्त की शर्करा में कमी आती हैं,रक्त में  कोलेस्ट्रॉल  का स्तर घट जाता हैं और उच्च रक्त चाप संतुलित होता हैं।अंकुरित मेथीदाना में कैंसर को नियंत्रित करने वाली विशेष विटामिन बी-17 भी विशिष्ट मात्रा में पाया जाता हैं तथा अंकुरित मेथी का रस अमाशय के अल्सर,आंतो की सूजन आदि रोगियों के अत्यधिक लाभकारी सिद्द हुआ हैं।





5.) कफ और वात प्रकृति वाले व्यक्तियों के लिए मेथी के बीज किसी वरदान से कम नहीं हैं फिर भी मेथी का सेवन करते समय निमंलिखित सावधानिया रखना जरूरी हैं।


सावधानिया -


*पित्त पृकृति वालो को या जिन्हें रक्तपित,रक्त प्रदर,खुनी बवासीर,नकसीर,मूत्र में रक्त आना या शारीर में कही से भी खून गिरने की शिकायत हो उन्हें मेथी का प्रयोग नहीं करना चाहिए,क्योकि मेथी उष्ण और खुश्क होती हैं।तेज गर्मी के मौसम में भी मेथी का प्रयोग करना उचित नहीं हैं।
*जिन्हें गरम तासीर की वस्तुए अनुकूल नहीं पडती हो तथा जिनके शारीर में दाह अथवा आग की लपटों जैसी जलन महसूस होती हो।

*जो रोगी अंत्यंत दुर्बल व कृशकाय हो,चक्कर आने की बीमारी से पीड़ित हो तथा लगातार धातु क्षय के कारण जिनका शारीर सूखकर मात्र हड्डियों का पिंजर रह गया हो।

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि