24.4.17

उपदंश सिफलिस के उपचार होम्योपैथी से // Syphilis Treatment In Homeopathy



  इस रोग में रोगी के लिंग पर फुसी हो जाती है जो धीरे-धीरे बढ़कर घाव का रूप ले लेती है । इस घाव में से मवाद आती है, खुजली मचती है और जलन होती है । यह घाव ठीक नहीं हो पाता, जिससे लिंग नष्ट होने लगता है । इस रोग में सविराम ज्वर आना, गले में घाव, सिर में भारीपन, होठों पर फुन्सियाँ हो जाना, सिर के बाल उड़ना, हड्डियों में दर्द रहना आदि लक्षण प्रकटते हैं । रोग की अन्तिम अवस्था में पूरे शरीर पर चकते से निकल आते हैं ।

काली आयोड 200-

यह रोग की तीसरी अवस्था में लाभप्रद है ।

सिफिलिनम 200-

यह अन्य दवाओं के साथ में सहायक दवा के रूप में प्रयोग की जाती है। रोग की तीनों अवस्थाओं में इसे देना चाहिये । पहले तीन माह तक प्रति सप्ताह एक बार के हिसाब से दें और फिर प्रत्येक पन्द्रह दिनों में एक बार के हिसाब से रोग के ठीक होने तक दें ।

मर्ककॉर 3- 

कठिन उपदंश में लाभकर है जबकि मुँह व गले में घाव, मुँह से लार गिरना आदि लक्षण प्रकट हों ।

ऑरम मेट 30, 6x-

उपदंश के कारण हड्डियों की बीमारी हो जाना, नाक व तालु की हड्डी में घाव हो जाना और उनसे सड़ा हुआ मवाद आना, रोगाक्रान्त स्थान पर दर्द, दर्द का रात को बढ़ जाना- इन लक्षणों में यह दवा लाभ करती है ।

स्टैफिसेग्रिया 3x-

लिंग पर तर दाने हो गये हों, दर्द हो, सूजन भी रहे, पारे का अपव्यवहार हुआ हो- इन लक्षणों में देवें ।

साइलीशिया 30-

लिंग के जख्मों में मवाद पड़ जाये और वह ठीक न हो पा रहे हों तो यह दवा दें ।

हिपर सल्फर 30-

उपदंश में मसूढ़े के रोग, हड्डियों में दर्द, घाव से बदबूदार मवाद आना, कभी-कभी खून भी आना, खुजली मचना, रोगग्रस्त अंग को छू न पाना, सुबह-शाम तकलीफ बढ़ना आदि लक्षण होने पर देनी चाहिये । यह पारे के अपव्यवहार के कारण रोग-विकृति में भी अत्यन्त लाभकर सिद्ध हुई है ।

कूप्रम सल्फ 6x-

डॉ० मार्टिन का विचार था कि- यह दवा धातुगत उपदंश में अत्यन्त उपयोगी है ।
कैलोट्रोपिस जाइगैण्टिया 30- पारे के अपव्यवहार से उत्पन्न विकृतियों में लाभप्रद है । उपदंश की रक्तहीनता में भी उपयोगी है ।

मर्कसॉल 3x, 6- 

यह इस रोग की पहली व दूसरी अवस्था में लाभकर है। जैसे ही मालूम चले कि उपदंश हुआ है, रोगी को तुरन्त इस दवा को देना आरंभ कर देना चाहिये । इस दवा से रोग बढ़ नहीं पायेगा और आराम महसूस होने लगेगा । यह इस रोग मे अत्यंत उपयोगी औषधि  होम्योपैथी से  हैं ।

मर्क प्रोटो आयोड 3x- 

यह रोग की दूसरी अवस्था में लाभप्रद है । अगर रोग भयानक मालूम पड़े तो मर्कसॉल के स्थान पर इसी दवा का सेवन कराना चाहिये ।
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20.4.17

स्त्रियॉं की माहवारी(पीरियड्स) की समस्याओं के होम्योपैथिक उपचार





:   मासिक धर्म होना महिला के शरीर के लिए बहुत ही आवश्यक होता हैं. मासिक धर्म का पूरा चक्र 28 दिनों का होता हैं. कई महिलाओं को मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत रहती हैं. मासिक धर्म की अनियमितता का मतलब हैं. मासिक धर्म का समय पर न होना. किसी – किसी महिला को मासिक धर्म दो महीने में एक बार होते हैं तो किसी को एक महीने में दो तीन बार होते हैं. मसिक धर्म का अपने समय पर होना बहुत ही आवश्यक होता हैं. मासिक धर्म के शुरू होने की जैसे एक उम्र होती हैं. ठीक उसी प्रकार इसके समाप्त होने की भी उम्र होती हैं. किसी भी महिला को मासिक धर्म 32 साल तक होता हैं. जबसे महिला को मासिक धर्म होने शुरु होते तब से ही उसमे 32 साल जोड़ देने चाहिए. अर्थार्त इसके समाप्त होने तक महिला की उम्र 48, 49 या 50 हो सकती हैं. इससे पहले या बाद में मासिक धर्म के समाप्त होना मासिक धर्म की अनियमितता का सूचक होता हैं. यह अनियमितता महिला को कुछ शारीरिक व मानसिक कारणों से हो सकती हैं. तो चलिए इसके कारणों व लक्षणों के बारे में थोडा जान लेते हैं.
मासिक धर्म की अनियमितता के कारण
1. मासिक धर्म की अनियमितता महिला की किसी प्रकार की बिमारी के कारण भी हो सकती हैं. अगर कोई महिला एक महीने से अधिक समय तक बीमार हो तो उसे मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत हो सकती हैं.
2. अगर किसी महिला को थायराइड की बीमारी हैं. तो उसे भी मासिक धर्म की अनियमितता की समस्या हो सकती हैं.
3. मासिक धर्म की अनियमितता गर्भावस्था की शुरुआत के कारण भी हो सकती हैं.

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5. कभी – कभी अधिक व्यायाम करने के कारण भी महिला को मासिक धर्म की अनियमितता की शिकायत हो जाती हैं. अधिक व्यायाम करने से महिला के शरीर में उपस्थित एस्ट्रोजन हार्मोन की संख्या में वृद्धि हो जाती हैं. जिससे मासिक धर्म रुक जाते हैं और महिला को मासिक धर्म की अनियमितता की समस्या का सामना करना पड़ता हैं.4. अधिकतर स्त्रियां हमेशा परेशान रहती हैं. जिससे उनके उपर मानसिक दबाव व तनाव बढ़ जाता हैं. प्रत्येक महिला के शरीर में तिन प्रकार के हार्मोन होते हैं. एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन तथा टेस्टोंस्टेरोन आदि. इन तीनों में से अगर महिला अधिक तनाव में रहती हैं तो पहले दो हार्मोन पर सीधा असर पड़ता हैं. जिसके कारण महिला के मासिक धर्म में अनियमितता होनी शुरू हो जाती हैं.

6. मासिक धर्म की अनियमितता महिला के खानपान में असंतुलन के कारण भी हो जाती हैं. 
7. मासिक धर्म की अनियमितता महिला के शरीर का वजन बढने या घटने के कारण भी हो जाती है.
मासिक धर्म की अनियमितता के लक्षण
1. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला के गर्भाशय में दर्द होता हैं.
2. मासिक धर्म की अनियमितता से महिला को भूख कम लगती हैं.
3. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला के शरीर में दर्द रहता हैं. खासतौर महिला के स्तनों में, पेट में, हाथ – पैर में तथा कमर में.
4. मासिक धर्म की अनियमितता के होने पर महिला को अधिक थकान भी महसूस होती हैं.
5. मासिक धर्म के ठीक समय पर न होने के कारण महिला को पेट में कब्ज तथा दस्त की भी शिकायत हो जाती हैं.
6. मासिक धर्म की अनियमितता होने से महिला के शरीर में स्थित गर्भाशय में रक्त का थक्का बन जाता हैं.

मासिक धर्म की समस्याओं की होम्योपैथिक  दवा
 : 
नक्स वोमिका :इसके कुछ लक्षण पल्स के लक्षणों के विपरीत हैं। दुबला-पतला शरीर, क्रोधी, झगड़ालू, उग्र स्वाभाव, चिड़चिड़ापन, मेहनती, काम में लगी रहने वाली, तनाव से ग्रस्त रहने वाली महिला को मासिक स्राव जल्दी-जल्दी होता हो, देर तक होता रहे, ज्यादा मात्रा में हो, ठण्ड या ठण्डी हवा से रोग बढ़ता हो, तो ‘नक्सवोमिका’ 30 शक्ति की 5-6 गोली दिन में 3 बार लेनी चाहिए।
सीपिया : यह दवा दुबले-पतले शरीर वाली, लम्बे कद की, नाक और गालों पर झाई के दाग हों, कामकाज में रुचि न हो, उदासीन, विरक्त, दु:खी, अधीर, निराश, हतोत्साह, किसी से भी मोह न हो, गर्भाशय खिसकता-सा अनुभव करें, जैसे बाहर निकल पड़ेगा, गुदाद्वार में कुछ अड़ा हुआ-सा लगे, कब्ज हो, ठण्ड से रोग बढ़े, मासिक धर्म में रुकावट हो, मात्रा में कमी हो या देरी से हो, तो ‘सीपिया’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसनी चाहिए।
मैगफॉस : ऋतु स्राव के समय दर्द होता हो और पेट दबाने से या सेंक करने से आराम मिलता हो, तो मैगफॉस 30 शक्ति की 5-6 गोलियां चूसनी चाहिए। दर्द में लाभ न हो, तो दो घण्टे बाद फिर एक खुराक ले सकते हैं। दर्द दूर करने वाली यह श्रेष्ठ दवा है।
कैमोमिला : स्त्री का स्वभाव चिड़चिड़ा, क्रोधी और रूखा हो, बच्चों को डांटती-डपटती रहती हो, जरा-सी बात पर भड़क उठती हो और ऐसे स्वभाव की महिला को काले रंग का, थक्केदार टुकड़ों वाला ऋतु स्राव भारी मात्रा में होता हो, ऋतु स्राव के समय दर्द भी होता हो, तो ‘कैमोमिला’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार लेनी चाहिए।
थ्लेस्पी बसf पेस्टोरिस :
जब किसी महिला को भारी मात्रा में रक्त स्राव हो, रुक-रुक कर हो, पर बन्द न होता हो, बहुत कष्ट और शूल के साथ हो, महिला की हालत संभल न रही हो, कमजोरी बढ़ रही हो, पेट में काट-सी चलती हो, तो ‘थ्लेस्पी बसf पेस्टोरिस’ के मूल अर्क की 10-10 बूंद आधा कप पानी में घोलकर दिन में 3 बार देने से आराम होता है।
हेमेमिलिस : बहत ज्यादा मात्रा में रक्त स्राव होना, स्राव का रंग काला होना, स्राव के साथ टुकड़े गिरना आदि लक्षणों पर किसी भी प्रकृति की महिला को ‘हेमेमिलिस’ के मदर टिंचर (मूल अर्क) या 6 शक्ति के टिंचर की 5-6 बूंद 2 बड़े चम्मच भर पानी में घोल कर 15-15 मिनट से 3-4 बार देने पर रक्त स्राव पर नियंत्रण हो जाता है। ग्रेफाइटिस : यदि महिला मोटी-ताजी और चर्बीयुक्त शरीर वाली हो, पल्सेटिला के गुण वाली हो, पर किसी त्वचा रोग से भी ग्रस्त हो, शीत प्रकृति वाली हो, शंकाग्रस्त रहती हो और अनियमित मासिक धर्म होता हो, देर से तथा कम मात्रा में होता हो, नियत समय पर न होता हो, पीले रंग वाला, पतला और हल्का पानी जैसा होता हो, तो ‘ग्रेफाइटिस’ 30 शक्ति की 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसकर सेवन करनी चाहिए।
पल्सेटिला : यह दवा महिलाओं की मित्र-औषधि मानी जाती है, क्योंकि इस दवा के अधिकांश लक्षण नारियों के गुणों से मिलते-जुलते हैं। इसलिए जिन पुरुषों में भी ये गुण पाये जाते हैं, उनके लिए भी पल्सेटिला उपयोगी सिद्ध होती है। लज्जा, नम्रता, सौम्यता, कोमलता, मृदुलता, अधीरता, व्याकुलता आदि पल्सेटिला के मानसिक गुण हैं। मोटापा, मांसलता, गुदगुदापन इसके शारीरिक लक्षण हैं। खुली हवा पसन्द करना, बन्द कमरे में परेशानी अनुभव करना, गर्मी से परेशानी और शीतलता से राहत होना, भूख-प्यास कम लगना, सहानुभूति मिलने या रो लेने से अच्छा अदूभव करता आदि पल्सेटिल के स्वभावगत लक्षण हैं। जो युवती या महिला मानसिक, शारीरिक और स्वभाव की दृष्टि से ऐसे लक्षणों वाली हो और उसका मासिक ऋतु स्राव अनियमित हो, ऋतु साव के समय दर्द हो, दर्द के समय ठण्ड लगे, दर्द का स्थान बदलता रहता हो और ऋतु स्राव के प्रारंभ मध्यकाल या अन्त में दर्द होता हो, कभी कम व कभी ज्यादा मात्रा में होता हो, कभी जल्दी व कभी देर से होता हो यानी हर दृष्टि से जब मासिक ऋतु स्राव अनियमित हो और दर्द भी हो, तो ‘पल्सेटिला’ 30 शक्ति में 5-6 गोलियां सुबह-दोपहर-शाम चूस लेनी चाहिए।
इपिकॉक : मासिक स्राव ज्यादा मात्रा में हो रहा हो और स्राव का रंग चमकीला लाल रंग वाला हो, जी मतली करता हो, सांस में भारीपन हो (या महिला दमा रोग से ग्रस्त हो), रहर-हकर ऋतु स्राव बढ़ जाता हो, गर्मी से रोग बढ़े और ठण्डी खुली हवा से आराम मालूम दे, तो ‘इपिकॉक’ 30 शक्ति 5-6 गोलियां दिन में 3 बार चूसनी चाहिए।
साइक्लामेन : पल्सेटिला के लक्षणों वाली महिला को यदि प्यास खूब लगती हो, खुली हवा पसन्द न हो, रोने से जी हल्का होता हो, एकान्त पसन्द करती हो, आत्मग्लानि का अनुभव करती हो, ऋतु स्राव के समय चक्कर आते हों, दुःखी, निराश और उदास रहे, मासिक धर्म के समय दर्द होता हो, तो इन लक्षणों वाली महिला को मासिक धर्म की अनियमितता दूर करने के लिए साइक्लामेन 30 दिन में 3 बार लेनी चाहिए।

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15.4.17

सूजाक(Gonorrhoea) की होम्योपैथिक चिकित्सा


   होमियोपैथिक चिकित्सा विज्ञान के जनक डॉ. हैनीमैन ने तीन प्रकार के विषों को सभी प्रकार के रोगों को उत्पन्न करनेवाला बताया है। इन तीन विषों के नाम हैं – ‘सोरा’, सिफिलिस’ और ‘साइकोसिस’।
इस सूजाक रोग का संबंध ‘साइकोसिस’ से होता है। इस रोग की उत्पत्ति संक्रामक कारणों से छूत लगने पर होती है। सूजाक रोग से ग्रस्त स्त्री या पुरुष से सहवास करने वाले स्त्री या पुरुष को यह रोग हो जाता है। ‘निसेरिया गोनोरियाई’ नामक जीवाणु द्वारा यह रोग होता है। जननांगों की उचित सफाई न होने पर इस रोग की सम्भावना बढ़ जाती है। इस रोग की तीन अवस्थाएं होती हैं –


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

इस रोग में रोगी के लिंग के अन्दर मूत्र-नली में से मवाद आता है । मूत्र-नली में जलन, सुरसुराहट, खुजली, मूत्र-त्याग के समय जलन एवं दर्द होना आदि लक्षण प्रकट होते हैं ।
थूजा 30, 200- रोग की द्वितीयावस्था में लाभकर है जबकि मूत्र-मार्ग में जलन हो और पीला मवाद आये । वैसे सूजाक की सभी अवस्थाओं में लाभकारी है । डॉ० ई० जोन्स का कहना है कि चाहे सूजाक में कोई भी दवा क्यों न दी जाये परन्तु रात को सोने से पहले रोगी को थूजा 30 की पाँच बूंद अवश्य दे देनी चाहिये- इससे सूजाक का विष शरीर से बाहर निकल जाता है ।

एकोनाइट 1x, 30- रोग की प्रथमावस्था में लाभकर है । मूत्र-मार्ग में लाली, सूजन, मूत्र-त्याग में जलन, बूंद-बूंद पेशाब आना आदि लक्षणों में उपयोगी हैं ।
सीपिया 200– मूत्र-त्याग में जलन, मूत्रेन्द्रिय में टनक जैसा दर्द- इन लक्षणों में दें ।
कोपेवा 3x, 30-
मूत्र-नली तथा मूत्राशय में सुरसुराहट हो, पतला-दूधिया स्राव आये, मूत्र बूंद-बूंद करके आये, मूत्र रक्त मिला और दर्द व जलन के साथ हो- इन लक्षणों में लाभप्रद है ।
कोपेवा : जब मवाद ज्यादा गाढ़ा न होकर दूध जैसा पतला आता हो, जलन के साथ पेशाब हो, पेशाब के साथ गोंद जैसा लसदार व चिकना स्राव निकलता हो, पेशाब का वेग मालूम होने पर भी पेशाब न होता हो, बूंद-बूंद करके पेशाब होना, हरा पेशाब, तीखी बदबू आना आदि लक्षणों पर 30 शक्ति में दवा का सेवन फायदेमंद है।
क्यूबेवा : पहली अवस्था में जब अन्य दवाओं के सेवन से जलन में कुछ कमी हो जाए, पेशाब के अंत में जलन न होती हो, मवाद गाढ़ा होने लगे, तब क्यूबेवा का प्रयोग उत्तम है। पेशाब के बाद जलन होने और मूत्र नली में सिकुड़न-सी मालूम देने और स्राव पतला हो जाने पर इस दवा का 30 शक्ति में प्रयोग करना हितकर होता है।
अर्जेण्टमनाइट्रिकम : मूत्र-विसर्जन के अन्त में पुरुषेंद्रिय से लेकर गुदा-द्वार तक असहनीय पीड़ा होना, इस दवा का मुख्य लक्षण है। मूत्रनली में तेज जलन होना, अकड़न और सूजन होना, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, आंखों से ज्यादा कीचड़ आना इसके मुख्य लक्षण हैं। ज्यादा मीठा खाना और शरीर का दुबला-पतला होना आदि लक्षणों के आधार पर यह दवा अत्यंत उपयोगी है।


पेट मे गेस के अनुपम नुस्खे 

केप्सिकम : जब पेशाब की हाजत लगातार मालूम दे, पर पेशाब न हो, बड़ी मुश्किल से और जलन के साथ पेशाब हो, पेशाब में छाछ जैसा सफेद मवाद आए और पुरुषेंद्रिय के तनाव से दर्द मालूम दे, तब केप्सिकम का प्रयोग करना गुणकारी होता है। बात-बात पर क्रोधित होना और मोटापा बढ़ते जाना भी इसका लक्षण है। 6 शक्ति से 30 शक्ति तक दवा लेनी चाहिए।
दूसरी अवस्था : यदि प्राथमिक स्थिति में ही इलाज न किया जाए, तो रोग बढ़ने लगता है। बड़ी तकलीफ के साथ बूंद-बूंद करके पेशाब होता है, पेशाब निकलते समय तीव्र जलन होती है, शिश्न-मुण्ड (पुरुष जननेंद्रीय का अग्रभाग) पर सूजन आ जाती है, वह लाल हो जाता है और मूत्र-मार्ग से लगातार मवाद आने लगता है। यह अवस्था बहुत कष्टपूर्ण होती है।
उपचार-
रोग की द्वितीय अवस्था में यह दवा महान औषधि की तरह काम करती है। मूत्रनली में इतना दर्द हो कि सहन न किया जा सके और दोनों पैर चौड़े करके चलना पड़े, ये इस दवा के मुख्य दो लक्षण हैं। कमर में दर्द रहना, गाढ़ा पीले रंग का मवाद आना, ऐसा लगे कि मूत्रनली ही बंद है। अत: पेशाब नहीं आ रहा है, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, मूत्र मार्ग से खून आना, पुरुषेंद्रिय के तनाव से दर्द होना आदि प्रमुख लक्षण हैं। ठंडे पानी से आराम मिलता है। दवा अर्क अथवा 6 × से 30 शक्ति तक दवा श्रेष्ठ है।


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केंथेरिस : अधिकतर लक्षण ‘कैनाबिस इण्डिका’ के लक्षणों जैसे ही हैं। इसमें पेशाब के वेग का और चुभन का अनुभव कैनाबिस इण्डिका की अपेक्षा ज्यादा मात्रा में होता है। पेशाब बूंद-बूंद करके, कष्टप्रद हो। पेशाब से पहले, पेशाब के दौरान और पेशाब करने के बाद जलन हो, पुरुषेंद्रिय में खिंचाव होने पर अधिक दर्द हो, कभी-कभी पेशाब में खून भी आने लगे, तो 6 से 30 शक्ति तक की दवा की कुछ खुराकें जल्दी-जल्दी लेने पर फायदा होता है।
पल्सेटिला : जांघों और टांगों में दर्द होना, रोग शुरू हुए कई दिन बीत गए हों, मूत्र-मार्ग से गाढ़ा, पीला या नीला मवाद आने लगे और मवाद का दाग न लगता हो, अण्डकोषों पर सूजन आ गई हो, मरीज अपनी परेशानी बताते-बताते रोने लगे और चुप कराने पर थोड़ी देर में शांत हो जाए, पेशाब बूंद-बूंद हो, प्रोस्टेटाइटिस हो, पेशाब करते समय दर्द एवं चुभन महसूस हो, गर्मी में परेशानी बढ़े, मूत्र द्वार ठंडे पानी से धोने पर कुछ आराम मिले, तो 30 शक्ति में दवा उपयोगी है।


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तृतीय अवस्था :
इस अवस्था में पहुंचने पर रोग को पुराना माना जाता है। इस अवस्था में रोगी को ऐसा लगता है कि रोग चला गया है, क्योंकि सूजन मिट जाती है, जलन बंद हो जाती है और पेशाब आसानी से होने लगता है। ज्यादा जोर देकर पेशाब करने पर मूत्र-मार्ग से गाढ़ा चिकना मवाद निकलता है। इसे ही सूजाक होना कहते हैं। इस अवस्था में कुछ समय बीत जाने पर नाना प्रकार के उपद्रव होने लगते हैं। इन उपद्रवों में मूत्राशय प्रदाह (सिस्टाइटिस), बाधी (ब्यूबो), पौरुषग्रंथी प्रदाह (प्रोस्टेटाइटिस), लसिकाओं का प्रदाह (लिम्फेजांइटिस), प्रमेहजन्य संधिवात (गोनोरियल आर्थराइटिस), स्त्रियों में जरायु-प्रदाह (मेट्राइटिस), डिम्ब प्रणाली प्रदाह (सालपिंजाइटिस), वस्ति आवरण प्रदाह (पेल्विक पेरीटोनाइटिस) आदि प्रमुख उपद्रव हैं।
लक्षणों की समानता (सिमिलिमम) के आधार पर, अलग-अलग अवस्थाओं के लिए अलग-अलग औषधियां हैं। रोगी एवं अवस्थाओं की भिन्नता के आधार पर लगभग चालीस (40) औषधियां इस रोग हेतु प्रयुक्त की जा सकती हैं। कुछ विशेष लक्षणों के आधार पर निम्न औषधियों का प्रमुख रूप से प्रयोग किया जाता है। लक्षणों के अनुसार दवा का चुनाव करके नियमित रूप से दवा का सेवन करने पर जरूर लाभ होगा।


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उपचार-

थूजा : पुराने (क्रॉनिक) सूजाक और साइकोटिक विष के लिए थूजा श्रेष्ठ औषधि है। जब मवाद पतला आने लगे, पेशाब करते समय ऐसा लगे, जैसे उबलता हुआ पानी निकल रहा हो, तीव्र कष्ट व जलन हो, बूंद-बूंद पेशाब हो, लगातार पेशाब की हाजत बनी रहे, अण्डकोष कठोर हो गए हों और ‘सूजाक जन्य वात रोग’ (गोनोरियल रयुमेटिजम) की स्थिति बन जाए, प्रोस्टेटिक ग्रंथियों में सूजन हो जाए, सिरदर्द, बालों का झड़ना, ऐसा महसूस होना जैसे पैर शीशे के बने हुए हैं और टूट जाएंगे, जैसे पेट में कोई जीवित वस्तु है, जैसे आत्मा और शरीर अलग हो गए हैं, शरीर के विभिन्न हिस्सों पर मस्से निकलने लगते हैं, तब 30 शक्ति से 200 शक्ति तक की दवा की कुछ खुराकें ही कारगर होती हैं।
फ्लोरिक एसिड : यह भी पुराने सूजाक की अच्छी दवा है। दिन में प्राय: स्राव नहीं होता, पर रात में होता रहता है। कपड़ों में दाग लगते हैं, पेशाब में जलन होती है और अत्यधिक कामोत्तेजना रहती है। रोगी कमजोर होते हुए भी दिन भर परिश्रम करता है। गर्मी-सर्दी में कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन रात के लक्षणों से प्रभावित होता है। 30 शक्ति में एवं तत्पश्चात् 200 शक्ति में दवा लेनी चाहिए।

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क्लीमेटिस : पल्सेटिला नामक दवा के बाद जो लक्षण बचे रहते हैं, उनके लिए ‘क्लीमेटिस’ उपयोगी है। इस रोग की तीसरी अवस्था में जब मूत्रनली सिकुड़ जाए, मवाद आना बंद हो चुका हो, अण्डकोषों पर सूजन हो और वे कठोर हो गए हों, विशेषकर अण्डकोषों के दाएं हिस्से पर सूजन होती है, तब ‘क्लीमेटिस’ 30 शक्ति में प्रयोग करनी चाहिए। इसमें भी पेशाब रुक-रुक कर होता है।

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12.4.17

स्वर्ण भस्म (Gold Ash) निर्माण और आयुर्वेदिक गुण और कर्म


स्वर्ण भस्म को आयुर्वेद में हजारों सालों से दवाई के रूप में प्रयोग किया जा रहा है आयुर्वेद में स्वर्ण भस्म का अपना एक विशेष स्थान है. यह शरीर में ताक़त देने के साथ साथ मानसिक शक्ति में सुधार करने वाली औषधी कहलाती है. यह हृदय (Heart) और मस्तिष्क (Mind) को विशेष रूप से ताक़त प्रदान करती है. आयुर्वेद में हृदय रोगों और मस्तिष्क की निर्बलता जैसे रोगों में स्वर्ण भस्म को सर्वोत्तम माना गया है.स्वर्ण भस्म कैसे बनायी जाती है

थकान दूर करने के उपाय

स्वर्ण को आभूषण बनाने के साथ साथ औषधी की तरह भी प्रयोग किया जाता रहा हैं. आयुर्वेद में स्वर्ण जैसी मूल्यवान धातु की रासयनिक विधि से भस्म बनाई जाती है जो की सोने की ही तरह बहुत मूल्यवान है. सोने की भस्म को स्वर्ण भस्म कहते हैं.
स्वर्ण भस्म को आयुर्वेद (रसतरंगिणी) में बताये विस्तृत विवरण अनुसार ही बनाया जाता है. स्वर्ण भस्म को बनाने के लिए शुद्ध सोने को शोधन और मारण प्रक्रिया से गुजारा जाता है तब कही जा कर स्वर्ण भस्म बनती है
.स्वर्ण के शोधन के लिए : तिल तेल, तक्र, कांजी, गो मूत्र और कुल्थी के काढ़े का प्रयोग किया जाता है.
स्वर्ण के मारण के लिए : पारद, गंधक अथवा मल्ल, कचनार और तुलसी को मर्दन के लिए प्रयोग किया जाता है.
स्वर्ण भस्म में सोने की कितनी मात्रा होती है
सोने को जब विभिन्न रासायनिक प्रक्रिया से गुजारा जाता है तो स्वर्ण की भस्म बनती है इसमें सोना बहुत ही सूक्ष्म रूप में (नैनो मीटर 10-9) विभक्त होता है. इसके अतिरिक्त इसके शोधन और मारण में बहुत सी वनस्पतियाँ का भी प्रयोग किया जाता हैं. जिस कारणों से स्वर्ण भस्म शरीर की कोशिकायों में सरलता से प्रवेश कर जाती हैं और बहुत से रोगों में लाभ भी देती है क्योंकि वनस्पतियाँ के गुण धर्म मिलने का बाद यह शरीर का हिस्सा बन जाती हैं.


नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

चरक, शुश्रुत, कश्यप सभी ने स्वर्ण भस्म के लिए अत्यंत हितकर बताया है. छोटे बच्चों को स्वर्ण प्राशन , Swarna Bindu Prashana कराने की भी परम्परा रही है जो की आज भी जारी है. महाराष्ट्र, गोवा, कर्णाटक में नवजात शिशु से लेकर 16 वर्ष की आयु के बच्चों को स्वर्ण का प्राशन कराया जाता है.
स्वर्ण भस्म शरीर में क्या काम करता है
स्वर्ण भस्म को बल (शारीरिक, मानसिक, यौन) बढ़ाने के लिए एक टॉनिक की तरह दिया जाता रहा है. यह रसायन, बल्य, ओजवर्धक, और जीर्ण व्याधि को दूर करने में उपयोगी है. स्वर्ण भस्म का सेवन पुराने रोगों को दूर करता है. यह जीर्ण ज्वर(Fever) , खांसी (Cough), दमा (Asthma) , मूत्र विकार (Urinary disorders), अनिद्रा (insomnia), कमजोर पाचन (poor digestion) , मांसपेशियों की कमजोरी (muscle weakness), तपेदिक (tuberculosis), प्रमेह (gonorrhea), रक्ताल्पता (anemia), सूजन (inflammation), अपस्मार(epilepsy),त्वचा रोग(skin disease), सामान्य दुर्बलता(general debility), जैसे अनेक रोगों में उपयोगी है.


पिपली  के गुण प्रयोग लाभ 

स्वर्ण भस्म एक स्वस्थ विकल्प है जोकि आप को यों शक्ति प्रदान करता है इसका आयुर्वेदिक चिकित्सा में सेक्स समस्यों के इलाज के लियें सर्वोपरी स्थान है तथा यह बेहद कमजोर व्यक्ति को भी मज़बूत सेक्स शक्ति प्रदान करता है. यह विशेष रूप से सेक्स कमजोरी और लिंग में बिलकुल भी उतेजना न आने कि समस्या में बहुत अधिक लाभदायक होता है स्वर्ण भस्म भी कार्डियक टॉनिक है जो रक्त शुद्धता और दिल को मजबूत करता है. यह बुद्धि में सुधार, यौन शक्ति बढ़ाने के लिए, और पेट, त्वचा और गुर्दे की गतिविधि को उत्तेजित करता है.
यह एक टॉनिक है जिसका सेवन यौन शक्ति (Sexual power) को बढ़ाता है. स्वर्ण भस्म शरीर से खून की कमी (Anemic) को दूर करता है, पित्त की अधिकता (Excess bile) को कम करता है, हृदय और मस्तिष्क को बल देता है और पुराने रोगों को नष्ट करता है.

स्वर्ण भस्म का वृद्धावस्था में प्रयोग शरीर के सभी अंगों को ताकत देता है.
स्वर्ण भस्म आयुष्य है और बुढ़ापे को दूर करती है. यह भय(Fear) , शोक(Grief), चिंता(anxiety), मानसिक क्षोभ (mental anguish) के कारण हुई वातिक दुर्बलता (pneumatic weakness) को दूर करती है. बुढ़ापे के प्रभाव को दूर करने के लिए स्वर्ण भस्म को मकरध्वज के साथ दिया जाता है.
हृदय की दुर्बलता (Weakness of the heart) में स्वर्ण भस्म का सेवन आंवले के रस अथवा आंवले और अर्जुन की छाल के काढ़े अथवा मक्खन दूध के साथ किया जाता है.
स्वर्ण भस्म से बनी दवाएं पुराने अतिसार(Chronic diarrhea), ग्रहणी (duodenum) , खून की कमी (Blood loss) में बहुत लाभदायक है. शरीर में बहुत तेज बुखार और संक्रामक ज्वरों के बाद होने वाली विकृति को इसके सेवन से नष्ट किया जा सकता है. यदि शरीर में किसी भी प्रकार का विष चला गया हो तो स्वर्ण भस्म को को मधु अथवा आंवले के साथ दिया जाना चाहिए.

प्रमुख उपयोग: यौन दुर्बलता, धातुक्षीणता, नपुंसकता, प्रमेह, स्नायु दुर्बलता, यक्ष्मा/तपेदिक, जीर्ण ज्वर, जीर्ण कास-श्वास, मस्तिष्क दुर्बलता, उन्माद, त्रिदोषज रोग, पित्त रोग
स्वर्ण भस्म के आयुर्वेदिक गुण और कर्म
स्वर्ण भस्म, स्वाद में यह मधुर, तिक्त, कषाय , गुण में लघु और स्निग्ध है. बहुत से लोग समझते हैं की स्वर्ण भस्म स्वभाव से गर्म है. लेकिन यह सत्य नहीं है. स्वभाव से स्वर्ण भस्म शीतल है और मधुर विपाक है. विपाक का अर्थ है जठराग्नि के संयोग से पाचन के समय उत्पन्न रस. इस प्रकार पदार्थ के पाचन के बाद जो रस बना वह पदार्थ का विपाक है. शरीर के पाचक रस जब पदार्थ से मिलते हैं तो उसमें कई परिवर्तन आते है और पूरी पची अवस्था में जब द्रव्य का सार और मल अलग हो जाते है, और जो रस बनता है, वही रस उसका विपाक है.
मधुर विपाक, भारी, मल-मूत्र को साफ़ करने वाला होता है. यह कफ या चिकनाई का पोषक है. शरीर में शुक्र धातु, जिसमें पुरुष का वीर्य और स्त्री का आर्तव आता को बढ़ाता है. इसके सेवन से शरीर में निर्माण होते हैं.
रस (taste on tongue): मधुर, तिक्त, कषाय

गुण (Pharmacological Action): लघु, स्निग्ध
वीर्य (Potency): शीत
विपाक (transformed state aft मधुर
कर्म:
वाजीकारक aphrodisiac
वीर्यवर्धक improves semen
हृदय cardiac stimulant
रसायन immunomodulator
कान्तिकारक complexion improving
आयुषकर longevity
मेद्य intellect promoting
विष नाशना antidote

स्वर्ण भस्म के फायदेस्वर्ण की भस्म, स्निग्ध, मेद्य, विषविकारहर और उत्तम वृष्य है. यह तपेदिक, उन्माद शिजोफ्रेनिया, मस्तिष्क की कमजोरी, व शारीरिक बल की कमी में विशेष लाभप्रद है. आयुर्वेद में इसे शरीर के सभी रोगों को नष्ट करने वाली औषधि बताया गया है.
स्वर्ण भस्म बुद्धि, मेधा, स्मरण शक्ति को पुष्ट करती है. यह शीतल, सुखदायक, तथा त्रिदोष के कारण उत्पन्न रोगों को नष्ट करती है. यह रुचिकारक, अग्निदीपक, वात पीड़ा शामक और विषहर है.
यह खून की कमी को दूर करती है और शरीर में खून की कमी से होने वाले प्रभावों को नष्ट करती है.
यह शरीर में हार्मोनल संतुलन करती है .
यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की कोशिकाओं के दोषों को दूर करती है.
यह शरीर की सहज शरीर प्रतिक्रियाओं में सुधार लाती है.
यह शरीर से दूषित पदार्थों को दूर करती है.
यह प्रक्रियाओं को उत्तेजित करती है.
यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को ठीक करती है.
यह एनीमिया और जीर्ण ज्वर के इलाज में उत्कृष्ट है.
यह त्वचा की रंगत में सुधार लाती है.
पुराने रोगों में इसका सेवन विशेष लाभप्रद है.
यह क्षय रोग के इलाज के लिए उत्कृष्ट है.
यह यौन शक्ति को बढ़ाती है.
यह एंटीएजिंग है और बुढ़ापा दूर रखती है.
यह झुर्रियों, त्वचा के ढीलेपन, सुस्ती, दुर्बलता, थकान , आदि में फायेमंद है.
यह जोश, ऊर्जा और शक्ति को बनाए रखने में अत्यधिक प्रभावी है.
स्वर्ण भस्म के चिकित्सीय उपयोग
अवसाद
अस्थमा, श्वास, कास
अस्थिक्षय, अस्थि शोथ, अस्थि विकृति
असाध्य रोग
अरुचि
कृमि रोग
बढ़ती उम्र के प्रभाव को कम करने के लिए
विष का प्रभाव
तंत्रिका तंत्र के रोग
मनोवैज्ञानिक विकार, उन्माद, शिजोफ्रेनिया
मिर्गी
शरीर में कमजोरी कम करने के लिए
रुमेटी गठिया
यौन दुर्बलता, वीर्य की कमी, इरेक्टाइल डिसफंक्शन
यक्ष्मा / तपेदिक
स्वर्ण भस्म के सेवन विधि और मात्रा
स्वर्ण भस्म को बहुत ही कम मात्रा में चिकित्सक की देख-रेख में लिया जाना चाहिए. सेवन की मात्रा 15-30 मिली ग्राम, दिन में दो बार है. इसे दूध, शहद, घी, आंवले के चूर्ण, वच के चूर्ण या रोग के अनुसार बताये अनुपान के साथ लेना चाहिए.

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि






11.4.17

द्राक्षासव के गुण फायदे उपयोग



द्राक्षासव के शास्त्रोक्त गुण धर्म


इसे यथोचित मात्रा के अनुसार सेवन करने से अर्श,शोथ,अरुचि,ह्रदयरोग,पाण्डु,रक्तपित्त,
भगन्दर,गुल्म उदररोग,कृमि,ग्रंथिरोग,क्षत,शॉष,ज्वर,और वात पित्त रोग नष्ट होते है।
द्राक्षासव मधुर विपाकी ,वात ,पित्त, कफ,नाशक मूत्रल ,पाचक, तथा रक्तवर्धक कोष्ठ शोधक,और वृष्य है।
शास्त्र में जिन 2 रोगों पर इसको हितकर बताया गया है वे अधिकतर वात कफ प्रधान है। रक्त हीनता के कारण उत्तपन्न होते है।


और उदर विकृति उनका मूल है।
ताकत और ताजगी से भरा सुमधुर टॉनिक है। यह भूख बढ़ाता है। दस्त साफ लाता है, खून में तेजी लाता है, काम की थकावट दूर करता है तथा नींद लाता है। दिल व दिमाग में ताजगी पैदा करता है। बल, वीर्य, रक्त मांस बढ़ाता है|कफ, खांसी, सर्दी-जुकाम, क्षय की खांसी, कमजोरी में लाभदायक। सब ऋतुओं में बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी सेवन कर सकते हैं।
द्राक्षासव वात पित्त कफ नाशक है। रक्तवर्धक ,अन्त्रकला दोष नाशक, कोष्ठ शोधक ,है।


इसके सेवन से आंत्र के दोष नष्ट होते है।
एवं आंत्र की शोषित कलायें सक्रिय हो जाती है।
इसके सेवन से दीर्घ काल से सञ्चित दोष नष्ट हो जाते है।
रक्त के अभाव से होने वाले जीर्ण में इसका सेवन लाभ प्रद है।

मात्रा


20ml से 25ml खाना खाने के बाद