31.5.17

होम्योपैथिक औषधि बैराइटा कार्बोनिका ( Baryta Carbonica ) के गुण लक्षण उपयोग




मुख्य लक्षण
(1) शारीरिक तथा मानसिक विकास का अभाव (Dwarfishness)
(2) शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलता में बैराइटा, कैलकेरिया कार्ब तथा साइलीशिया की तुलना
(3) ग्रन्थियों का बढ़ जाना, टांसिल का सूजना
(4) वृद्ध-पुरुषों का बच्चों सा आचरण
(5) वृद्ध-पुरुषों की खांसी
(6) शीत-प्रधान रोगी
लक्षणों में कमी
(i) गर्मी से रोग में कमी
(ii) एकान्त में रोग में कमी
लक्षणों में वृद्धि
(i) सर्दी से लक्षणों में वृद्धि
(ii) रोग वाली करवट सोने से लक्षणों में वृद्धि
(iii) स्नान से परहेज

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ग्रन्थियों का बढ़ जाना, टांसिल का सूजना –


 इस रोगी की ‘ग्रन्थियां’ (Glands) बढ़ जाती हैं, सख्त हो जाती हैं, गले, जांघ, पेट में गिल्टियां पड़ जाती हैं। गिल्टियां बढ़ जायें और मांस-पेशियां सूख जायें-शरीर बौना और मन गावदी-यह मूर्त-चित्रण है रस रोगी को जिसे बैराइटा कार्ब ठीक कर देता है। गले पर, अर्थात् टांसिल पर इस औषधि का विशेष प्रभाव है। जरा-सी सर्दी लगने से टांसिल बढ़ जाता है, कभी-कभी पक जाता है।टांसिल में बैराइटा, बेलाडोना, हिपर तथा कैमोमिला की तुलना – बेलाडोना और हिपर में टांसिल का आक्रमण यकायक होता है, वेग से होता है, जिस रात सर्दी लगी उसी रात टांसिल सूज जाता है और पक भी जल्दी ही जाता है, परन्तु बैराइटा में एक रात की सर्दी में उसी दिन टांसिल नहीं सूजता, इसे कुछ दिन लग जाते हैं, पकता भी एकदम नहीं, धीरे-धीरे पकता है। कैमोमिला के टांसिल की सूजन में कान में भी दर्द होता है, गर्मी पहुंचाने से आराम मिलता है, रोगी बड़ा चिड़चिड़ा हो जाता है। दर्द इस वेग से आता है कि चिकित्सक इसे बेलाडोना का दर्द समझ सकता है।

शारीरिक तथा मानसिक विकास का अभाव – 

बैराइटा कार्बोनिका एक दीर्घकालिक तथा गंभीर क्रिया करने वाली औषधि है। शरीर तथा मन की अन्तरतम तह पर प्रभाव डालती है। कई बच्चे बड़े चतुर, प्रतिभाशाली होते हैं, यह ठीक उल्टी है। बच्चा हर काम देर से सीखता है। देर से चलना, देर से पढ़ना-लिखना, मानो उसका शारीरिक तथा मानसिक विकास रुका हुआ है। लड़कियां 18-19 साल की हो जाने पर भी बच्चों का-सा व्यवहार करती हैं, गुड़ियों से खेलती हैं। विवाह हो जाने पर भी घर-गृहस्थी के काम को समझ नहीं पातीं। शारीरिक तथा मानसिक विकास की वह प्रक्रिया जो व्यक्ति को पुरुष अथवा स्त्री बनाती है, वह इन रोगियों के लिये रुकी-सी रहती है। शारीरिक-विकास ही नहीं, मानसिक-विकास भी रुका रहता है कभी-कभी शरीर का एक अंग बढ़ना रुक जाता है, दूसरे अंग विकसित होते रहते हैं।

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शारीरिक तथा मानसिक दुर्बलता में बैराइटा, कैलकेरिया कार्ब तथा साइलीशिया की तुलना – 


कैलकेरिया कार्ब में भी बच्चे का शारीरिक तथा मानसिक विकास रुका रहता है। दोनों सूखे की बीमारी में काम आती है। कैलकेरिया का बच्चा देखने में मोटा-ताजा, थुलथुल होता है, बहुत जल्दी बढ़ जाता है, सिर और पेट बड़े, गर्दन और पैर पतले होते हैं; बैराइटा में बच्चा थुलथुल न होकर सब अंगों में सूखता जाता है। पेट में गिल्टियां नजर आती हैं। भूख-भूख चिल्लाता है परन्तु खाने से इन्कार करता है। साइलीशिया में भी बच्चा सूखता जाता है। बैराइटा तथा साइलीशिया दोनों में पांव से बदबूदार पसीना निकलता है, शरीर की अपेक्षा सिर बड़ा होता है, दोनों शीत-प्रधान हैं, परन्तु कैलकेरिया तथा साइलीशिया दोनों में सिर पर पसीना बहुत ज्यादा आता है, बैराइटा में नहीं। इसके अतिरिक्त साइलीशिया में बैराइटा की तरह मानसिक बौनापन नहीं होता। सूखे के रोग के विषय में हमने एब्रोटेनम में सूखे की बीमारी में अन्य औषधियों की आपसी तुलना की है।

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वृद्ध-पुरुषों की खांसी –

 बुढ़ापे में कई लोगों को ऐसी खांसी घेर लेती है जो उनका पीछा ही नहीं छोड़ती। छाती में घड़घड़ाहट हुआ करती है। इस प्रकार की खांसी के लिये कुछ इनी-गिनी औषधियां हैं जिनमें बैराइटा एक है। इसके अतिरिक्त सेनेगा, ऐसामेनियम कार्ब और बैराइटा म्यूर भी इस प्रकार की खांसी के लिये उपयोगी है।जब किसी 70 वर्ष की वृद्ध को हर समय छाती में खांसी की घड़घड़ाहट हो जो गर्मी के दिनों में ठीक रहे, सर्दी के दिनों में इस प्रकार की खांसी से परेशान हो जाये और इसके सिवाय दूसरा कोई लक्षण न हो, तो ऐमोनियम कार्ब बहुत उत्तम दवा है।

शीत-प्रधान रोग – 

होम्योपैथी में यह जानना आवश्यक है कि रोगी शीत-प्रधान है या ऊष्णता-प्रधान, उसे सर्दी अधिक सताती है या गर्मी। आयुर्वेद में इसे प्रकृति कहते हैं। कई लोग कफ-प्रकृति के होते हैं, कई वात-प्रकृति के-ये दोनों ‘शीत-प्रधान हैं। शीत-प्रधान रोगी के लिये शीत-प्रधान औषधि का ही निर्वाचन करना होता है, ऊष्णता-प्रधान रोगी के लिये ऊष्ण-औषधि का निर्वाचन करना होता है क्योंकि होम्योपैथी का सिद्धान्त ‘सम: सम शमयति’ का है। एलोपैथी, आयुर्वेद तथा यूनानी में ठंडे मिजाज के रोगी को गर्म दवा दी जायगी, गर्म मिजाज के रोगी को ठंडी दवा दी जायगी। होम्योपैथी में इससे उल्टा है। जैसे आयुर्वेद में यह जानना आवश्यक है कि रोगी वात-पित्त-कफ़ में से किस प्रकृति का है, वैसे होम्योपैथी में भी यह जानना आवश्यक है कि रोगी शीत-प्रधान है या ऊष्णता-प्रधान है। औषधि का निर्वाचन करते हुए यह मूल-सिद्धान्त है। इसीलिये होम्योपैथ रोगी से बड़ी बारीकियों से पूछा करते हैं कि तुम्हें ठंड पसन्द है या गर्मी पसन्द है, तुम कमरे में आते ही खिड़की-दरवाजें खोल देना चाहते हो या उन्हें बन्द कर देना चाहते हो। हमने यथासंभव प्रत्येक औषधि के विषय में औषधि की ‘प्रकृति’ के नीचे यह देने का यत्न किया है कि रोगी की शिकायतें ठंड से बढ़ती हैं या गर्मी से बढ़ती हैं। यह जानकर कि रोगी किस प्रकृति का है, होम्योपैथ को औषधि का निर्वाचन करने में सहायता मिलती है। अगर किसी रोग में दो औषधियों के सब लक्षण मिलते हों, परन्तु एक औषधि शीत-प्रधान हो और दूसरी ऊष्णता-प्रधान हो, तो औषधि का निर्वाचन करते हुए चिकित्सक को शीत-प्रधान रोगी के लिये शीत-प्रधान औषधि का निर्वाचन करना होगा, ऊष्णता-प्रधान रोगी के लिए ऊष्णता प्रधान औषधि का निर्वाचन करना होगा। जैसे आयुर्वेद में वात-पित्त-कफ प्रकृति को निदान तथा चिकित्सा में मुख्य माना गया है, वैसे होम्योपैथी में भी सर्दी-गर्मी को मुख्य माना गया है, फर्क यह है कि आयुर्वेद में प्रकृति के तीन भाग किये गये हैं-वात, पित्त, कफ़, और होम्योपैथी में ‘प्रकृति (Modality) के दो भाग किये गये हैं-सर्दी और गर्मी।

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वृद्ध-पुरुषों का बच्चों का-सा आचरण – 


वृद्ध-पुरुष बच्चों का-सा आचरण करने गलते हैं, स्मृति-शक्ति लुप्त हो जाती है, चलते हुए डगमगाते हैं, बच्चों का-सा स्वभाव हो जाता है। बैराइटा कार्ब का चरित्रगत-लक्षण यह है कि रोगी का सर्वांगीण विकास रुक जाता है – चाहे बच्चे का हो, युवा का हो, वृद्ध का हो। जब यह देखा जाय कि सत्तर वर्ष का व्यक्ति बच्चे की तरह आचरण कर रहा है, तब समझना चाहिये कि उसका विकास रुक गया है, उसे बैराइटा लाभ करेगा।
बैराइटा कार्ब शीत-प्रधान औषधि है। रोगी ठंडक सहन नहीं कर सकता। शरीर को ढके रखना चाहता है। कमरे के खिड़की-दरवाजे बन्द रखना पसन्द करता है। इतना ध्यान देने की बात है कि यद्यपि उसकी अन्य सब शिकायतें ठंड लगने से बढ़ जाती हैं, उसका सिर-दर्द ठंड से घटता है, सिर पर गर्मी गलने से तकलीफ़ होती है। संपूर्ण शरीर तथा सिर का एक-दूसरे से विपरीत भाव अन्य भी अनेक औषधियों में पाया जाता हैं। उदाहरणार्थ, फॉसफोरस, आर्सेनिक भी शीत प्रधान औषधियां हैं, शरीर को शीत ज्यादा सताता है, परन्तु सिर पर वे ठंडक ही पसन्द करती हैं। औषधियों के इस प्रकार के भेद जानने से ठीक दवा का चुनाव करना आसान हो जाता है।
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30.5.17

होम्योपैथिक औषधि एपिस मेलिफिका ( Apis Mellifica ) के गुण, लक्षण


लक्षण-

(1) किसी अंग में भी शोथ, सूजन गुर्दा, आँख आदि; शोथ दायीं से बायीं तरफ आती है।
(2) शहद की मक्खी के डंक मारने जैसा दर्द और जलन
(3) प्यास न होना
(4) मानसिक-आधात से उत्पन्न रोग
(5) पहले, दूसरे या तीसरे महीने गर्भपात की आशंका
(6) ज्वर में शीतावस्था में कपड़ा उतार फेंकना और शीतावस्था में प्यास होना
(7) ज्वर में 3 बजे दोपहर सर्दी लगकर बुखार आना
लक्षणों में कमी
(i) ठंडी हवा, ठन्डे पानी से स्नान से रोग का कम होना
(ii) कपड़ा उतार देने से रोगी को अच्छा लगना
लक्षणों में वृद्धि
*गर्म कमरे में रोग में वृद्धि
*आग के सेंक से रोग में वृद्धि होना
*सोने की बाद वृद्धि
*तीन से छ: बजे के बीच वृद्धि

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किसी अंग में शोथ, सूजन-गुर्दा, आँख आदि, शोथ दायीं से बायीं तरफ – 

एपिस मेल यह औषधि शहद की मक्खी के डंक से तैयार होती है। इसमें वे लक्षण पाये जाते हैं जो शहद की मक्खी के काटने से होते हैं। इस औषधि का पता 1847 में चला जब एक 12 वर्ष का बच्चा कई मास से शोथ-रोग से पीड़ित था और एलोपैथी तथा होम्योपैथी दोनों के इलाज से कोई लाभ न हुआ। जब इलाज से कोई फायदा न हुआ तब एक औरत ने कहा कि इसे शहद की मक्खियां मार कर उसका चूर्ण शहद में सुबह-शाम दो। ऐसा करने से उस लड़के का शोथ-रोग जाता रहा। इसके बाद डॉ० मारसी ने इस औषधि की परीक्षा होम्योपैथिक प्रणाली-प्रूविंग-से की, और इस औषधि का होम्योपैथी में प्रवेश हुआ। शोथ, सूजन इस औषधि का प्रमुख लक्षण है। यह शोथ संपूर्ण शरीर में भी हो सकती है, शरीर के भिन्न भिन्न अंगो में भी हो सकती है। सारे चेहरे की शोथ का लक्षण फॉस्फोरस में है।

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गुर्दे पर प्रभाव – 

वैसे तो एपिस की शोथ सब अंगों में हो सकती हैं, परन्तु मुख्य तौर पर इसका प्रभाव गुर्दे पर पड़ता है जिसके कारण शरीर में जहां जहां सेल्स हैं वहां-वहां पानी भर जाने के कारण शोथ हो जाती है। उदाहरणार्थ मुंह, जीभ, कनकौआ, आंख के पपोटे सब सूज जाते हैं।

आंख में निचली पलक एपिस में और ऊपर की पलक कैली कार्ब में सूजती है – 

आंख की सूजन में एपिस का विशेष लक्षण यह है कि आंख के नीचे की पलक सूज कर पानी के थैले जैसी हो जाती है। ऊपर की पलक के सूजन में कैली कार्ब दिया जाता हैं।

शोथ में एपिस, आर्सेनिक, ऐसेटिक ऐसिड और ऐपोसाइनम की तुलना – 

ऐपिस के शोथ में प्यास बिल्कुल नहीं रहतीं, आर्सेनिक में रोगी बार-बार, थोड़ा-थोड़ा पानी पीता है, और पानी की कय हो जाती है। यह कय एपिस में नहीं हैं। ऐपोसाइन में आर्सेनिक की तरह पानी और खाना उल्टी हो जाता है, परन्तु उसमें आर्सेनिक की बेचैनी और बार-बार प्यास की जगह अधिक होती है। ऐसेटिक ऐसिड में शोथ के साथ प्यास रहती है, परन्तु आर्सेनिक जैसी बार-बार की प्यास नहीं, साथ ही शोथ में दस्त और आंव की शिकायत रहती है। इस तुलना को इस प्रकार प्रकट किया जा सकता है।

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एपिस –

 प्यास नहीं, उल्टी नहीं, ठंडक से आराम, गर्मी से रोग बढ़ता है।
आर्सेनिक – बार-बार प्यास, पानी उल्टी हो जाता है, बेचैनी होती है, गर्म सेक से आराम मिलता है।
ऐसेटिक ऐसिड – प्यास साधारण, दस्त और आंव की शिकायत रहती है।
ऐपोसाइनम – प्यास बहुत, पानी और खाने का उल्टी हो जाता है।

शोथ दायें से बायें को जाती है – 

एपिस के शोथ की दिशा दायीं से बायीं तरफ जाने की होती है। अगर मुख पर लाल-लाल फुन्सियों के रूप में शोथ उभर आये तो वह चेहरे के दायीं तरफ़ शुरू होगा, नाक पर के ऊपर से होकर चेहरे के बायीं तरफ चला जायगा। पेट में शोथ होगी तो दायीं तरफ से शुरू होगी, बायीं तरफ जायगी। डिम्बकोष का शोथ भी दायीं तरफ़ प्रारंभ होगा, जरायु का शोथ भी ऐसे ही दायीं तरफ से चलेगा। जलन, डंक मारने की-सी पीड़ा का प्रारंभ दायीं तरफ से शुरू होगा। जीभ सूजेगी तो उसका भी दायां भाग बायें की अपेक्षा अधिक सूजेगा।

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*शहद की मक्खी के डंक मारने जैसा दर्द और जलन –

 शहद की मक्खी के काटने से जैसे शोथ हो जाता हैं, वैसे जहां काटा है वहां काटने का दर्द और जलन भी होती है। जलन में ठंडक से आराम मिलता ही है, इसलिये एपिस की शोथ में रोगी गर्मी सहन नहीं कर सकता, ठंडक चाहता है। आर्सेनिक की शोथ और जलन में रोगी गर्मी पसन्द करता है। एपिस की शोथ में रोगी ठंडा पानी लगाना पसन्द करता है।

डंक चुभने जैसा दर्द, सूजन, जलन और ठंडक से आराम-

ये व्यापक लक्षण यदि पित्ती उछलना (Urticaria), चेचक, खसरा (Measles), कॅन्सर, डिम्बकोष की सूजन आदि किसी भी बीमारी में क्यों न पाये जायें एपिस मेल औषधि से इन लक्षणों में लाभ होगा।

*पहले, दूसरे या तीसरे महीने गर्भपात की आशंका –

 गर्भवती स्त्री के पहले, दूसरे या तीसरे महीने अगर गर्भपात की आशंका हो, तो एपिस मेल औषधि इस खतरे को दूर कर देती है। कभी-कभी दुर्घटनावश या गर्भाशय की कमजोरी के कारण गर्भपात होने की आशंका उत्पन्न हो जाती है। यह औषधि ऐसे समयों में गर्भपात की प्रवृत्ति को रोक देती है।

रह-रह कर रोगी का चीख उठना –

 मस्तिष्क के रोग में रोगी बेहोशी में ऐसे चीख उठता है जैसे किसी ने डंक मार दिया हो। एपिस का जैसे शरीर की त्वचा पर शोथकारक प्रभाव है वैसे अन्त: शरीर की झिल्लियों पर जो मस्तिष्क, हृदय, पेट आदि का आवरण करती हैं उन पर भी शोथकारक प्रभाव है और इसीलिये इन अंगों के आन्तरिक-शोथ पर रोगी डंक मारने का-सा दर्द अनुभव कर चीख उठता है।

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*प्यास न होना – 
*एपिस के शोथ की बीमारी में प्यास नहीं लगती। जलन हो और प्यास न लगे-यह एक ‘विलक्षण-लक्षण’ है। शोथ की बीमारी में प्यास ऐसेटिक ऐसिड, आर्सेनिक तथा ऐपोसाइनम में लगती है और प्यास न लगने के कारण इन औषधियों से एपिस की पृथकता पहचानी जाती है।

*मानसिक-अघात से उत्पन्न रोग – 

भय, क्रोध, ईष्या, कुसमाचार आदि द्वारा मानसिक-आघात से उत्पन्न रोग में, विशेषकर इन मनोद्वेगों द्वारा शरीर के दायें भाग के पक्षाघात में इस औषधि का उपयोग होता है।

युवा का बच्चों की तरह बेमतलब बोलते जाना – 

गर्भवती स्त्री का गर्भ की अवस्था बढ़ जाने के बाद बच्चों की तरह बेमतलब निरर्थक बातें बोलते जाना, कभी-कभी कई स्त्रियों या कई रोगी यूं ही बेमतलब बड़बड़ाते हैं, जैसे बच्चे अकेले यूं ही कुछ-न-कुछ बड़बड़ाया करते हैं, वैसे निरर्थक बात बोलते जाने में एपिस मेल औषधि के विषय में सोचना चाहिये क्योंकि इसका भी मानसिक-कारण हो सकता है।

बाहरी त्वचा पर छोटी-छोटी फुन्सियां – 

हम अभी शरीर की आन्तरिक झिल्लियों के प्रदाह के कारण रोगी के बार-बार चीख उठने का जिक्र करेंगे, परन्तु शरीर की बहारी त्वचा पर भी एपिस का प्रभाव है। शरीर पर छोटी-छोटी फुन्सियां हो जाती हैं जिन्हें अंग्रेजी में “रैश” कहते हैं। दीखने को न भी दीखें परन्तु त्वचा पर अंगुली फेरने से उन्हें अनुभव किया जा सकता है। शरीर में यहां-वहां गांटें पड़ जाती हैं, जो कभी प्रकट होती हैं कभी चली जाती हैं। मुख पर की त्वचा पर लाल-लाल पित्ती-सी उभर आती है और कभी-कभी शोथ का उग्र रूप धारण कर लेती हैं। इन लक्षणों में एपिस उपयोगी हैं। त्वचा के शोथ में जब अंगुली से दबाया जाता है तब त्वचा पर दबाने से गढ़ा पड़ जाता है।

*ज्वर में शीतावस्था में कपड़ा उतार फेंकना और शीतावस्था में प्यास लगना – 

इस औषधि का ‘विलक्षण-लक्षण’ यह हैं कि ज्वर में शीतावस्था में जब रोगी को कपड़ा से ढक लेना अच्छा लगना चाहिये तब वह सब कपड़े उतार फेंकता है, और शीतावस्था में जब उसे प्यास नहीं लगनी चाहिये तब प्यास लगती है।

*दोहपर 3 बजे सर्दी लगकर बुखार आना – 

ज्वर के संबंध में यह भी स्मरण रखने योग्य है कि रोगी को दोहपर 3 बजे सर्दी लगकर बुखार चढ़ता है। इस बुखार में ज्वर के जिस विलक्षण-लक्षण का हमने अभी उल्लेख किया उसे भी ध्यान में रखना उचित हैं। 3 से या 4 से 6 बजे तक ज्वर उग्र रूप धारण करता है। इस समय रोग की वृद्धि होती है।

अन्य लक्षण

*गर्मी से रोग में वृद्धि और ठंड से रोग को शान्ति इसके हर शोथ में पायी जाती है।
*ज्वर में एपिस में शीतावस्था में हाथ-पैर गर्म रहते हैं, बेलाडोना में शीतावस्था में हाथ-पैर ठंडे रहते हैं।
* नवजात-शिशु के मूत्र रुकने में एकोनाइट की तरह यह भी उपयोगी है।
*एपिस में मल-द्वार जरा-सी हरकत करने से निकल पड़ता है, चुप पड़े रहने पर नहीं निकलता, फॉसफोरस में मल-द्वार से मल धीरे-धीरे चूता रहता है।
*अगर मधु-मक्खी काट ले तो उसका प्रतिकार एपिस से नहीं होता, कार्बोलिक ऐसिड से होता है। जब मधुमक्खियों के डसने पर रोगी जलन से और दर्द से छटपटा रहा हो, तब कार्बोलिक ऐसिड की एक मात्रा से वह कहने लगता है कि उसकी जलती हुई नस-नस में ठंडक का संचार हो गया। ततैय्ये के काटने पर आर्निका का मूल-अर्क लगा देने से सूजन नहीं होती, दो-तीन घंटे में दर्द भी जाता रहता है; मच्छरों के काटने पर कैन्थरिस 200 की एक मात्रा दे देने से जलन आदि कष्ट नहीं होते।

शक्ति व प्रकृति –

शोथ-रोग में निम्न शक्ति 6 तक, अतिसार और आखों की बीमारी में 30 तथा ज्वर में 200 शक्ति। इसकी क्रिया धीरे-धीरे होती है इसलिये दवा जल्दी बदलनी नहीं चाहिये। औषधि ‘गर्म’ प्रकृति के लिये हैं।
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किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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25.5.17

गर्भपात के कारण लक्षण और बचने के उपाय


    मातृत्व ग्रहण करना किसी भी स्त्री के लिए एक खुशनुमा अनुभव होता है। वैसे तो शादी को ही महिला का दूसरा जन्म माना जाता है लेकिन जब वो एक पत्नी, एक बेटी, एक बहु के दायरे से बाहर आकर एक मां बनती है तो उसका जीवन पूरी तरह बदल जाता है।
गर्भधारण करते ही महिला अपने होने वाले बच्चे के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ जाती है। साथ ही उसका परिवार भी आने वाली खुशियों की राह देखने लगता है। लेकिन अगर इन खुशियों की राह में कोई बाधा आ जाए तो उसे सहन करना किसी के लिए भी आसान नहीं होता।
  कई महिलाओं का गर्भावस्था धारण करने के कुछ हफ्तों के बाद गर्भपात हो जाता हैं. जिससे बच्चों से जुडी उनकी सारी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं. 
गर्भपात- 

गर्भावस्था के 24 हफ्तों के अंदर शिशु का पेट में ही समाप्त हो जाना कहलाता हैं. एक महिला जब गर्भावस्था में होती हैं. तो उसके परिवार की सारी उम्मीदें उससे जुड़ जाती हैं. लेकिन जैसे ही उसका अनचाहा गर्भपात हो जाता हैं. तो उससे जुडी लोगों की उमीदें तो खत्म होती ही हैं. साथ ही साथ गर्भपात के कारण महिला के शरीर में कुछ ऐसी समस्याएं हो जाती हैं. जिससे वह बहुत ही बहुत ही परेशान हो जाती हैं. कुछ ऐसी भी महिलाएं होती हैं. जिनका का बार – बार गर्भपात हो जाता हैं. जिसका असर उनके शरीर के साथ साथ मस्तिष्क पर भी पड़ता हैं. अगर किसी महिला को गर्भावस्था के शुरूआती दिनों में गर्भपात हो जाये तो गर्भपात होना आम हैं. शुरूआती दिनों में गर्भपात होने का कारण महिला के गर्भ में भूर्ण का पूर्ण विकसित न होना हो सकता हैं. लेकिन अगर किसी महिला का बार – बार गर्भपात हो रहा हैं. तो इसकी कोई गम्भीर वजह हो सकती हैं.

गर्भपात होने के कारण-

* गर्भावस्था के शुरूआती दिनों में गर्भपात होने का कारण क्रोमोजोम की समस्या हो सकती हैं. यह कोई खास समस्या नहीं हैं. क्रोमोजोम की समस्या बिना किसी वजह के ही उत्पन्न हो जाती हैं. इस समस्या के होने पर महिला के गर्भ में भूर्ण पूरी से विकसित नहीं हो पाता.
* महिला की अधिक उम्र भी गर्भपात की एक वजह हो सकती हैं. महिला की अधिक आयु होने पर उसके गर्भ के शिशु में कुछ असामान्य गुणसूत्रों की संख्या अधिक पाई जाती हैं. जिसके कारण महिला का गर्भपात हो जाता हैं.
*गर्भपात होने का एक कारण ह्यूस सिंड्रोम भी हो सकता हैं. यह सिंड्रोम अक्सर लूपुस जैसी बीमारी के होने पर प्रकट हो जाता हैं. जो की गर्भपात होने की एक बहुत ही बड़ी समस्या हैं.
* गर्भपात होने की वजह लिस्तिरेइओसिस और टोक्सोप्लाजमोसिज नामक संक्रमण भी हो सकते हैं.
* गर्भपात होने का एक कारण महिला की जीवनशैली भी हो सकती हैं. गर्भपात अधिक मात्रा में कैफीन का सेवन करने से भी हो सकता हैं. गर्भपात अगर किसी महिला को शराब पीने की आदत हो या ध्रूमपान करने की आदत हो तो भी हो सकता हैं.
* महिला का गर्भपात होने की एक वजह महिला को किसी प्रकार की बीमारी होना भी हो सकता हैं. यह सम्भावना उन महिलओं में अधिक होती हैं जिनका वजन लगातार बढ़ता जाता हैं. वजन बढने से परेशान महिलाओं में से अधिकतर को मधुमेह या थायराइड की बिमारी होती हैं. इन दोनों रोगों में से किसी एक रोग से ग्रस्त महिला में यह रोग अनियंत्रित हो जाता हैं. तो गर्भपात की सम्भावना बढ़ जाती हैं.
*गर्भपात होने के कारण एंटी फोस्फो लिपिड सिंड्रोम या स्टिकी रक्त सिंड्रोम (चिपचिपा रक्त) हो सकते हैं. इन दोनों सिंड्रोम की वजह से रक्त के थक्के रक्त वाहिकाओं में जम जाते हैं. जिसके कारण गर्भपात हो जाता हैं.
* यौन संचारित संक्रमण होने पर भी गर्भपात हो सकता हैं. महिला को यौन संचारित संक्रमण होने पर पोलिसिस्टिक या फिर क्लैमाइडिया नामक दो अंडाशय से सम्बन्धित दोष उत्पन्न हो जाते हैं. ये दोनों महिला के हार्मोन्स को प्रभावित करते हैं. जिससे गर्भपात होने की सम्भावना महिला में बढ़ जाती हैं.

गर्भपात होने के लक्षण-

* गर्भपात होने की स्थिति में मासिक धर्म के दौरान अधिक रक्त स्त्राव होता हैं. अधिक रक्त स्त्राव के होने पर खून के थक्के की भी समस्या उत्पन्न हो जाती हैं.
* गर्भपात होने की स्थिति में महिला के शरीर के हार्मोन्स का स्तर कम होने लगता हैं. ऐसे में महिला को अधिक कमजोरी महसूस होती हैं.
* गर्भपात होने पर डॉक्टर द्वारा जाँच करने पर शिशु की धड़कन को नहीं सूना जा सकता हैं.

गर्भपात रोकने के लिए उपचार-

* गर्भपात की समस्या से बचने के लिए महिलाएं पीपल की बड़ी कंटकारी की जड एवं भैंस के दूध का उपयोग कर सकते हैं. गर्भपात को रोकने के लिए पीपल की बड़ी कंटकारी की जड को अच्छी तरह से पीस लें. अब एक गिलास भैंस का दूध लें और उसके साथ पीपल की बड़ी कंटकारी की जड़ के चुर्ण को फांक लें. रोजाना दूध के साथ इस चुर्ण का सेवन करने से गर्भपात होने की सम्भावना कम हो जाती हैं.
एक गिलास दूध में एक गाजर का रस मिलाकर उबालें। जब दूध आधा रह जाए तो इसका सेवन कर लीजिए। ऐसा प्रतिदिन करना फायदेमंद होगा। जिन्हें बार-बार गर्भपात होता है वे अभी से इसका सेवन प्रारंभ कर दें।
* गर्भपात को रोकने के लिए आप हरी दूब के पंचांग का भी प्रयोग कर सकते हैं. इसके लिए हरी दूब के पंचांग(जड़, तना, पत्ती, फूल तथा फल) को लें. अब दूब के पंचांग को अच्छी तरह से पीस लें. पिसने के बाद दूब के पंचांग में थोड़ी मिश्री और दूध को मिला लें. मिलाने के बाद इस मिश्रण से बना हुआ 250 से 300 ग्राम शर्बत का सेवन गर्भावस्था के दौरान करें. आपको लाभ होगा.
*अनार के ताजा पत्तों (100 ग्राम) को पीसकर उसे पानी में छान लें। उस पानी को गर्भवती महिला को पिला दीजिए और बचे हुए लेप को पेट के निचले भाग यानि पेडू पर लगा दें। ऐसा करने से रक्तस्राव रुक जाएगा।
* गर्भपात को रोकने के लिए आप मूली के बीजों का तथा भीमसेनी की कपूर का भी प्रयोग कर सकते हैं. इसके लिए मूली के बीजों को अच्छी तरह से पीस लें. अब मूली के बीजों के चुर्ण को भीमसेनी कपूर तथा गुलाब के अर्क में मिला लें. अब इस चुर्ण को अपनी योनी में मलें. इस चुर्ण का प्रयोग गर्भावस्था में करने से महिला को बहुत ही फायदा होता हैं. अगर किसी महिला को गर्भा स्त्राव की समस्या हैं. तो वह इस चुर्ण का प्रयोग करके अपनी इस समय से छुटकारा पा सकती हैं.
*ऐसी स्त्री जिसके गर्भपात का खतरा बना रहता है उसे गर्भधारण करते ही रोजाना 250 ग्राम दूध में आधी चम्मच सोंठ, चौथाई चम्मच मुलहठी मिलाकर पिलाना चाहिए।
* गर्भपात को रोकने के लिए महिलाएं गाय के दूध और जेठीमधु का भी इस्तेमाल कर सकती हैं. गर्भपात को रोकने के लिए गाय का दूध लें और जेठीमधु लें. अब इन दोनों को मिलाकर काढ़ा तैयार कर लें. अब इस को पी लें. आप इस काढ़े को अपनी नाभि के निचे के भाग पर भी लगा सकते हैं. काढ़े का सेवन करने से तथा काढ़े को नाभि के निचेले भाग पर लगाने से महिला को गर्भावस्था के दौरान किसी प्रकार की दिक्कत नहीं होगी.
शिवलिंगी के बीज और पुत्र जीवक की गिरी का चूर्ण बनाकर गाय के दूध के साथ रोज सुबह शौच के बाद और नाश्ते से पहले एक चम्मच लें। इसके अलावा रात में सोने से पहले एक चम्मच दूध के साथ अवश्य लें।
* गर्भपात की समस्या से बचने के लिए महिलाएं नागकेसर, वंशलोचन तथा मिश्री का भो प्रयोग कर सकती हैं. इस समस्या से निदान पाने के लिए इन तीनों को मिलाकर खूब महीन चुर्ण पीस लें. अब एक गिलास दूध लें और उसके साथ 4 ग्राम चुर्ण रोजाना खाएं. आपको लाभ होगा.
*अगर आपको ये अंदजा होने लगता है कि गर्भपात होने वाला है तो तुरंत एक चम्मच फिटकरी को कच्चे दूध के साथ पानी में मिलाकर लेने से गर्भपात रुक जाता है।
* महिलाएं गर्भपात होने से रोकने के लिए पके हुए केले का भी सेवन कर सकती हैं. गर्भावस्था के दौरान महिलाओं को रोजाना एक पके हुए केले को मथकर उसमें शहद मिलाकर खाना चाहिए. इससे गर्भाशय को लाभ होता हैं. तथा गर्भपात होने का भय भीं नहीं रहता.
*अंकुरित भोजन में विटामिन ई प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है, इसके अलावा सूखे मेवों का सेवन भी अवश्य किया जाना चाहिए। गर्भास्था में नींबू और नमक वाली शिकंजी बहुत फायदेमंद होती है।
* अगर किसी महिला को गर्भ तारने के बाद गर्भ स्त्राव होने की समस्या से परेशान हैं. तो वह अशोक के पेड़ की छाल का उपयोग कर इस समस्या से निजात प् सकती हैं. इसके लिए अशोक के पेड़ की छाल को लें और उसका क्वाथ बना लें. अब इस क्वाथ का सेवन रोजाना करें. आपको गर्भ स्त्राव की समस्या से छुटकारा मिल जायेगा.
*गर्भपात का भय अगर लगातार बना रहता है तो ऐसे हालात में काले चने का काढ़ा बहुत लाभप्रद है।
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18.5.17

जन्म का महीना (बर्थ मंथ) से जाने आगंतुक रोग



पिछले कुछ समय से चल रहे शोध में यह सामने आया है कि एक व्यक्ति जिस महीने में जन्म लेता है इससे उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता लगता है। यानी कि आपका बर्थ मंथ आपको बताता है कि आप किन-किन बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।
आप वर्ष के बारह महीनों में से किस माह में जन्म लेते हैं इसका आपके व्यक्तित्व पर गहरा असर होता है। ज्योतिष शास्त्र में मौजूद 12 राशियां हमें हमारे व्यक्तित्व, हमारे शौक तथा हमसे जुड़े सभी तथ्यों के बार में बताती हैं। लेकिन राशियों के अलावा प्रत्येक महीना भी हमारे बारे में कई राज़ खोलता है।
  भविष्य में होने वाली बीमारियां

पिछले कुछ समय से चल रहे शोध में यह सामने आया है कि एक व्यक्ति जिस महीने में जन्म लेता है इससे उसे भविष्य में होने वाली बीमारियों का पता लगता है। यानी कि आपका बर्थ मंथ आपको बताता है कि आप किन-किन बीमारियों का शिकार हो सकते हैं।

*कोलंबिया विश्वविद्यालय का शोध
 
कोलंबिया विश्वविद्यालय में हुए एक शोध के मुताबिक एक व्यक्ति के जन्म के महीने का उसकी सेहत से गहरा नाता होता है। इस शोध में यह सामने आया है कि यदि इसी व्यक्ति का जन्म मई या जुलाई के माह में हुआ है तो वह उम्र भर बीमारियों से बचा रहता है।

नवंबर या दिसंबर में जन्म

कुछ आम तथा कम नुकसान देने वाली बीमारियां भले ही उसे परेशान कर सकती हैं लेकिन किसी घातक बीमारी के होने की संभावना काफी कम है। लेकिन यदि आपका जन्म अक्टूबर या नवंबर के महीने में हुआ है तो आप हरदम बीमारियों से घिरे रहेंगे।

जून, अगस्त, जनवरी में जन्म

यदि पूरे बारह महीनों की बात करें तो रिसर्च के मुताबिक जून, अगस्त, जनवरी तथा दिसंबर में जन्म लेने वाले लोग बीमारियों से काफी हद तक बचे रहते हैं। उन्हें किसी बड़ी बीमारी के होने का खतरा नहीं रहता है।

अक्टूबर या नवंबर में जन्म

लेकिन अक्टूबर या नवंबर के माह में जन्म लेने वाले लोग अक्सर बीमारियों के जंजाल में फंसे रहते हैं। इसके अलावा फरवरी, मार्च, अप्रैल, मई तथा जुलाई के माह में जन्म लेने वाले लोगों को भी बीमारियों के संदर्भ में चिंतामुक्त पाया गया है।

मार्च या अप्रैल में जन्म

यदि विशेष तौर पर विभिन्न बीमारियों की बात की जाए तो, मार्च या अप्रैल के महीने में जन्म लेने वाले लोग हृदय रोगों से ज्यादा पीड़ित होते हैं। इन्हें दिल से सम्बन्धित बीमारियां जकड़ लेती हैं, लेकिन यह कितनी नुकसानदेह होती हैं यह उस व्यक्ति की आंतरिक रोग प्रतिरोधक क्षमता पर निर्भर करता है।
 
दिल की बीमारी

परन्तु सितंबर, अक्टूबर तथा नवंबर में जन्म लेने वाले लोगों को दिल की बीमारी होने की आशंका ना के बराबर रहती है। किन्तु सांस की दिक्कतें इन्हें जरूर परेशान कर सकती हैं।

सांस की तकलीफ

खासतौर पर अक्टूबर या फिर नवंबर के महीने में जन्म लेने वाले लोग सांस से सम्बन्धित तकलीफों का शिकार होते हैं। इन्हें थोड़ा सा ही काम करने पर सांस का फूलना या फिर अस्थमा जैसी बीमारी होने का भी खतरा रहता है।
मानसिक रोग

लेकिन यदि आपका जन्म जुलाई से सितंबर के बीच हुआ है तो आपको सांस की तकलीफें शायद ही कभी होंगी। इसके अलावा ऐसे लोगों से मानसिक रोग भी कुछ कदम की दूरी बनाए रखते हैं।

सर्दी के समय में जन्म

परन्तु सर्दी के समय में जन्म लेने वाले लोगों को मानसिक बीमारियां हो जाना आम पाया गया है। यही दिक्कत लोगों की प्रजनन शक्ति में भी पाया गया है। सर्दियों में जन्म लेने वाली महिलाओं को प्रजनन संबंधी कई तकलीफों का शिकार होना पड़ता है।
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इन्हें होते हैं सबसे ज्यादा रोग

कोलंबिया विश्विद्यालय में हुए इस शोध में एक बात और सामने आई है कि खासतौर पर सर्दी के समय जन्म लेने वाले लोग बीमारियों के ज्यादा शिकार होते हैं जबकि बाकी महीनों में जन्में लोग स्वस्थ रहते हैं।

दिल की बीमारी से सबसे अधिक मौतें

शोध का मानना है कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा मौतें दिल की बीमारी से होती हैं। और दिल के रोग उन्हें ही अधिक होते हैं जिनका जन्म जनवरी से लेकर जून माह के बीच हुआ हो। अन्य महीनों में जन्म लेने वाले लोगों को हृदय रोग परेशान नहीं करते।

ये जीते हैं लंबी उम्र

यह भी एक कारण है कि आमतौर पर एक लंबी आयु जीने वाले व्यक्ति का जन्म जुलाई से दिसंबर महीने के बीच ही पाया गया है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह बता पाना मुश्किल है कि किसी विशेष महीने का एक बीमारी से क्या संबंध होता है।

मौसम का असर

लेकिन इन बीमारियों के आधार पर यह जरूर बताया जा सकता है कि बच्चे का जिस महीने में जन्म होता है, उस माह के मौसम का उस पर कम से कम तीन महीने तक असर रहता है। यही मौसम उसके लिए विभिन्न बीमारियों को न्यौता देता है।

14.5.17

गर्मी मे दही खाने के लाजवाब फायदे



    कहते हैं किसी भी शुभ काम की शुरुआत से पहले दही खाने से उस काम के लिए जाने वाले को सफलता मिलती है।दही को सेहत के लिए बहुत अच्छा माना जाता है। इसमें कुछ ऐसे रासायनिक पदार्थ होते हैं, जिसके कारण यह दूध की तुलना में जल्दी पच जाता है। जिन लोगों को पेट की परेशानियां, जैसे अपच, कब्ज, गैस बीमारियां घेरे रहती हैं, उनके लिए दही या उससे बनी लस्सी, छाछ का उपयोग करने से आंतों की गर्मी दूर हो जाती है।डाइजेशन अच्छी तरह से होने लगता है और भूख खुलकर लगती है। दूध से बनने वाले दही का उपयोग खाने में हजारों सालों से हो रहा है। इसमें प्रोटीन, कैल्शियम, राइबोफ्लेविन, विटामिन बी जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। दांतों और हड्डियों को मजबूत बनाने वाले कैल्शियम की मात्रा दूध की अपेक्षा दही में 18 गुणा ज्यादा होती है।पेट की गर्मी दूर करता है- दही की छाछ या लस्सी बनाकर पीने से पेट की गर्मी शांत हो जाती है।
आंतों के रोग- अमेरिकी आहार विशेषज्ञों के अनुसार दही का नियमित सेवन करने से आंतों के रोग और पेट संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
दिल के रोग में भी आता है काम- 
दही में दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की गजब की क्षमता है।
हड्डियों को दे मजबूती- 
दही में कैल्शियम अधिक मात्रा में पाया जाता है। यह हड्डियों के विकास में सहायक होता है।

जोड़ों के दर्द करे ठीक- हींग का छौंक लगाकर दही खाने से जोड़ों के दर्द में लाभ मिलता है। यह स्वादिष्ट होने के साथ-साथ पौष्टिक भी है।
प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन से भरपूर- 
दही सेहत और सौंदर्य के लिए बेहद फायदेमंद होता है। इसमें दूध के मुकाबले कैल्श‍ियम अधि‍क होता है।
पाचन शक्ति बढ़ाता है- 
दही का नियमित सेवन शरीर के लिए अमृत के समान माना गया है। यह खून की कमी और कमजोरी दूर करता है।
आंतों के रोग
अमेरिकी आहार विशेषज्ञों के अनुसार दही का नियमित सेवन करने से आंतों के रोग और पेट संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं।
बवासीर रोग से पीड़ित रोगियों को दोपहर के भोजन के बाद एक गिलास छाछ में अजवायन डालकर पीने से फायदा मिलता है
वजन
दुबले-पतले व्यक्तियों को अगर दही में किशमिश, बादाम या छुहारा मिलाकर दिया जाए तो वजन बढ़ने लगता है, जबकि दही के सेवन से शरीर की फालतू चर्बी को भी हटाया जा सकता है
दिल के रोग
दही में दिल के रोग, हाई ब्लड प्रेशर और गुर्दों की बीमारियों को रोकने की गजब की क्षमता है। यह कोलेस्ट्रॉल को बढ़ने से रोकता है और दिल की धड़कन सही बनाए रखता है।
बालों की सुंदरता
बालों को सुंदर और आकर्षक बनाए रखने के लिए दही या छाछ से बालों को धोने से फायदा होता है। इसके लिए नहाने से पहले बालों में दही से अच्छी मालिश करनी चाहिए।कुछ समय बाद बालों को धो लेने से बालों की खुश्की या रूसी खत्म हो जाती है।
मुंह के छाले
दही की मलाई को मुंह के छालों पर दिन में दो-तीन बार लगाने से छाले दूर हो जाते हैं। दही और शहद को समान मात्रा में मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से भी मुंह के छाले दूर हो जाते हैं।
पसीना
दही और बेसन के मिश्रण से मालिश करें। कुछ देर बाद नहा लें। पसीने की दुर्गंध दूर हो जाएगी।
 बच्चों के दांत
दही के साथ शहद मिलाकर जिन बच्चों के दांत निकल रहे हों, उन्हें चटाना चाहिए। इससे दांत आसानी से निकल जाते हैं।
अनिद्रा
रात में नींद न आने की परेशानी से निपटने के लिए दही और छाछ का सेवन फायदेमंद होता

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11.5.17

पेट के कीड़े का घरेलू आयुर्वेदिक उपचार




  गंदा और अशुद्ध भोजन के सेवन से आंत में कीड़े पड़ जाते हैं, इसके कारण पेट में गैस, बदहजमी, पेट में दर्द, बुखार जैसी समस्‍यायें होती हैं, इन कीड़ों को निकाने के लिए घरेलू उपचार आजमायें।
पेट में कीड़े पड़ जायें तो यह बहुत ही दुखदायी होता है। यह समस्‍या सबसे अधिक बच्‍चों में होती है लेकिन बड़ों की आंतों में भी कीड़े हो सकते हैं। ये कृमि लगभग 20 प्रकार के होते हैं जो अंतड़ियों में घाव पैदा कर सकते हैं। इसके कारण रोगी को बेचैनी, पेट में गैस बनना, दिल की धड़कन असामान्‍य होना, बदहजमी, पेट में दर्द, बुखार जैसी कई प्रकार की समस्‍यायें होती हैं। इसके कारण रोगी को खाने में रुचि नहीं होती और उसे चक्‍कर भी आते हैं। गंदगी के कारण ही पेट में कीड़े होते हैं। अशुद्ध और खुला भोजन करने वालों को यह समस्‍या अधिक होती है। घरेलू उपचार के जरिये इस समस्‍या का इलाज किया जा सकता है।बच्चों के पेट कीड़े होना आम बात है लेकिन यदि समय पर इसका इलाज नहीं किया गया तो बच्चों में विकास रुक जाता है | इसी बात को ध्यान में रखकर सरकार भी इसके लिए अभियान चला रही है और स्कूलों में कीड़े मारने की दवा मुफ्त में वितरित करवा रही हैं | यह वास्तव में एक ऐसी बीमारी है जो कि अन्दर ही अन्दर बच्चों को खा जाती है और पता ही नहीं चलता है, इसलिए इसके बारे में जानकारी और इलाज जरूरी है |

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इसलिए आइये आज जानते हैं कि पेट में होने क्या – क्या कारण है और इनसे बचने के क्या-क्या घरेलु उपाय हैं
पेट में कीड़े होने का कारण Reasons For Worms In Stomach
गंदी मिट्टी में खेलने, मिट्टी खाने, फल व सब्जियों द्वारा बच्चों के पेट में कीड़े व कृमि पहुंच जाते हैं जो उनकी आंतों में वंश-वृद्धि करके जीवित रहते हैं। कई बार ज्यादा मीठे पदार्थों के सेवन से भी पेट में कीड़े हो जाते हैं। लेकिन कई in कारणों पर नियंत्रण करना संभव नहीं होता हैं |
पेट में कीड़े होने का लक्षण 
कैसे जाने कि बच्चों के पेट में कीड़े है और वो बच्चों को नुक्सान पंहुचा रहें है () | चुनचुने (पिनवर्म), केचुए, राउंड वर्म, टेप वर्म व अन्य अनेक कीड़े बच्चों के पेट में होते हैं। जब ये काटते हैं तो बच्चे को गुदा में तेज खुजली होती है। शरीर पीला पड़ने लगता है, बेचैनी बढ़ जाती है, निढाल हो जाते हैं तथा स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।

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पेट में कीड़े होने का उपचार

* अरंड ककड़ीः अरंड ककड़ी का एक चम्मच दूध प्रातः पीने से पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं। यह बच्चों के लिए उत्तम औषधि है।
* नीबूः आधे नीबू को काटकर उसमें काला नमक और काली मिर्च डालकर गरम करके बच्चे को चुसाएं। इससे पेट के कीडे नष्ट हो जाते हैं।6. शहतूतः शहतूत व खट्टे अनार के छिलकों को पानी में उबालकर पिलाने से कीड़ों का अंत हो जाता है |
* नारियलः बच्चों को नारियल का पानी पिलाने तथा कच्चा नारियल खिलाने से पेट के कीड़े मर जाते हैं। इसी प्रकार नारियल का गूदा चबाकर खाने व इसके तीन घंटे बाद 200 ग्राम दूध में दो चम्मच अरंडी का तेल मिलाकर पिलाएं इससे बच्चों के पेट के कीड़े मल के साथ बाहर निकल आते हैं।

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* अनारः अनार के रस का रोजाना प्रयोग करते रहने से बच्चों के पेट के कीड़े आसानी से नष्ट हो जाते हैं।
*. ईसबगोलः यदि पेचिश में कीड़े निकलते हों तो ईसबगोल का उपयोग सहायक सिद्ध होता है। ईसबगोल की भूसी के साथ भुनी हुई सौंफ का चूर्ण मिलाकर खिलाएं। इससे बच्चों का पेट साफ हो जाएगा व कीड़े भी निकल जाएंगे।
*आधा चम्मच अजवायंन का चूरन एक कप छास के साथ दिन मे २ बार कुछ दीनो तक पिए. इसको सेवन करने से आपके पेट के कीड़े मर जाएँगे.
*बायविडंग का चूरन का काढ़ा देने से पेट के कीड़े मर जाते है. दूध मे बायविडंग मिलाकर पीने से बच्चो के पेट मे कीड़े नही होते है.
*सबेरे खाली पेट गुड खाये .और १५ मिनिट बाद चम्मच भर पीसी हुई अजवाइन पानी के साथ निगल ले. इस तरह गुड की मिठास से पेट के कीड़े एक जगह एकत्र होंगे. उपर से अजवाइन खा लेने से ये सब कीड़े मरके शौच के साथ बाहर निकल जाएँगे.

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*काला नमक
चुटकी भर काला नमक और आधा ग्राम अजवायन चूर्ण मिला लीजिए, इस चूर्ण को रात के समय रोजाना गर्म पानी से लेने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं। अगर बड़ों को यह समस्‍या है तो काला नमक और अजवायन दोनों को बराबर मात्रा में लीजिए। सुबह-शाम इसका सेवन करने से पेट के कीड़े दूर हो जायेंगे।
*कच्‍चे आम की गुठली
बच्‍चों या बड़ों की आंत में कीड़े पड़ गये हों तो कच्‍चे आम की गुठली का सेवन करने से कीड़े मल के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। इसके लिए कच्चे आम की गुठली का चूर्ण दही या पानी के साथ सुबह-शाम सेवन करें। इसके नियमित सेवन से कुछ दिनों में ही आंत के कीड़े बाहर निकल जायेंगे।
*टमाटर के जरिये
टमाटर का प्रयोग खाने का स्‍वाद बढ़ाने के साथ-साथ पेट के कीड़ों को नष्‍ट करने के लिए कर सकते हैं। टमाटर को काटकर, उसमें सेंधा नमक और कालीमिर्च का चूर्ण मिलाकर इसका सेवन कीजिए। इस चूर्ण का सेवन करने के बाद पेट के कीड़े मर कर गुदामार्ग से बाहर निकल जाते हैं।

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*लहसुन की चटनी
पेट की समस्‍या दूर करने के साथ आंतों को पूरी तरह से साफ करने के लिए लहसुन का प्रयोग करें। अगर बच्‍चे या बड़े किसी को भी पेट में कीड़े हैं तो उसे लहसुन की चटनी खिलायें। लहसुन की चटनी बनाकर उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम खाने से पेट के कीड़े नष्ट होते हैं।
*तुलसी के पत्‍ते
तुलसी भी एंटी-बैक्‍टीरियल होती है, किसी भी प्रकार के संक्रमण के उपचार के लिए इसका प्रयोग कर सकते हैं। पेट में कीड़े होने पर तुलसी के पत्तों का एक चम्मच रस दिन में दो बार पीने से पेट के कीड़े मरकर मल के साथ बाहर निकल जाते हैं। इसका सेवन करने से आंत पूरी तरह से साफ हो जाती है और पेट में गैस और कब्‍ज की भी शिकायत नहीं होती है।
  इस पोस्ट में दी गयी जानकारी आपको अच्छी और लाभकारी लगी हो तो कृपया लाईक,कमेन्ट और शेयर जरूर कीजियेगा । आपके एक शेयर से किसी जरूरतमंद तक सही जानकारी पहुँच सकती है और हमको भी आपके लिये और अच्छे लेख लिखने की प्रेरणा मिलती है|





7.5.17

आम खाने के लाजवाब फायदे


*आम खाने से कैंसर से बचाव होता हैं, कैंसर के रोगियों के लिए आम बहुत लाभदायक हैं
*त्वचा को स्वस्थ बनाये रखता हैं, त्वचा में ताजगी बनाता हैं
*आँखों की रोशनी तेज करता हैं
*डायबिटीज के रोगियों के लिये भी लाभकारी होता है
*सेक्स लाइफ को सफल बनाता हैं
*पाचनशक्ति को मजबूत बनाता हैं, आम खाना हर तरह से बहुत फायदेमंद हैं

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

    क्‍या आपने कभी ये सोचा है कि आम को ही फलों का राजा क्यों कहा जाता है जबकि फल तो सभी स्वास्थ्यवर्धक होते हैं? दरअसल, भारतीय आम अपने स्वाद के लिए पूरी दुनिया में मशहूर हैं. भारत में मुख्य रूप से 12 किस्म के आम होते हैं. आम का इस्तेमाल केवल फल के तौर पर नहीं बल्कि सब्जी, चटनी, पना, जूस, कैंडी, अचार, खटाई, शेक, अमावट (आम पापड़) और बहुत सी खाने-पीने की चीजों का स्वाद बढ़ाने के लिए किया जाता है.
ये एक सर्वसुलभ फल है वरना तो इस महंगाई के समय में कई फल ऐसे हैं जो आम आदमी की जेब का साथ छोड़ चुके हैं. अपने विशेष स्वाद, देश में इसकी भरपूर पैदावार और किफायती होने की वजह से इसे फलों का राजा कहा जाता है. इन सारी वजहों के साथ ही आम के औषधीय गुण और हेल्थ बेनेफिट भी इस फलों का राजा बनाते है

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* गर्मी से बचाव

गर्मियों में अगर आपको दोपहर में घर से बाहर निकलना है तो एक गिलास आम का पना पीकर निकलिए. न तो आपको धूप लगेगी और न ही लू. आम का पना शरीर में पानी के स्तर को संतुलित बनाए रखता है जिसकी वजह से ये गर्मियों का बेस्ट पेय है.

*कैंसर से बचाव

आम में मौजूद एंटीऑक्सीडेंट कोलोन कैंसर, ल्यूकेमिया और प्रोस्टेट कैंसर से बचाव में फायदेमंद है. इसमें क्यूर्सेटिन, एस्ट्रागालिन और फिसेटिन जैसे ऐसे कई तत्व होते हैं जो कैंसर से बचाव करने में मददगार होते हैं.

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*आंखें रहती हैं चमकदार

आम में विटामिन ए भरपूर होता है, जो आंखों के लिए वरदान है. इससे आंखों की रौशनी बनी रहती है.

* त्वचा के लिए है फायदेमंद

आम के गुदे का पैक लगाने या फिर उसे चेहरे पर मलने से चेहरे पर निखार आता है और विटामिन सी संक्रमण से भी बचाव करता है.

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* मोटापा कम करने में

मोटापा कम करने के लिए भी आम एक अच्छा उपाय है. आम की गुठली में मौजूद रेशे शरीर की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में बहुत फायदेमंद होते हैं. आम खाने के बाद भूख कम लगती है, जिससे ओवर ईटिंग का खतरा कम हो जाता है.

* रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में

आम खाने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता में भी इजाफा होता है.

* सेक्स क्षमता बढ़ाने में

आम में विटामिन ई अधिक पाया जाता है और इससे सेक्स क्षमता बढ़ती है. साथ ही ये पौरुष बढाने वाला फल भी माना गया है.

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* स्मरण शक्ति में मददगार

जिन लोगों को भूलने की बीमारी हो उन्हें आम का सेवन करना चाहिए. इसमें पाया जाने वाला ग्लूटामिन एसिड नामक एक तत्व स्मरण शक्ति को बढ़ाने में उत्प्रेरक की तरह काम करता है. साथ ही इससे रक्त कोशिकाएं भी सक्रिय होती हैं. इसीलिए गर्भवती महिलाओं को आम खाने की सलाह दी जाती है.

* पाचन क्रिया को ठीक रखने में

आम में ऐसे कई एंजाइम्स होते हैं जो प्रोटीन को तोड़ने का काम करते हैं. इससे भोजन जल्दी पच जाता है. साथ ही इसमें उपस्थित साइर्टिक एसिड, टरटैरिक एसिड शरीर के भीतर क्षारीय तत्वों को संतुलित बनाए रखता है.

हर प्रकार की खांसी और कफ की समस्या के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

कोलेस्ट्रॉल नियमित रखने में

आम में फाइबर और विटामिन सी खूब होता है. इससे बैड कोलेस्ट्रॉल संतुलन बनाने में मदद मिलती है.


6.5.17

थैलेसीमिया रोग की जानकारी और उपचार


थैलेसीमिया क्या है?
यह आनुवांशिक रोग जितना घातक है, इसके बारे में जागरूकता का उतना ही अभाव है। सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है, परंतु थैलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर मात्र 20 दिनों की हो जाती है। इसका सीधा प्रभाव शरीर में स्थित हीमोग्लोबीन पर पड़ता है।   
थैलेसीमिया रक्त सम्बन्धी वंशानुगत रोग है जिसमें आपके शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा सामान्य से कम और लाल रक्त कणिकाएँ केवल थोड़ी मात्रा में ही होती हैं। हीमोग्लोबिन आपकी लाल रक्त कणिकाओं में उपस्थित प्रोटीन है जो उन्हें ऑक्सीजन ले जाने में मदद करता है। यह रोग वंशानुगत है, अर्थात आपके माता-पिता में कम से कम कोई एक इस रोग का वाहक रहा है। यदि वे दोनों थैलेसीमिया के वाहक हैं तो आपको इस रोग का 25% अधिक गंभीर रूप प्राप्त होता है। थैलेसीमिया के कारण उत्पन्न हीमोग्लोबिन की कम मात्रा और केवल कुछ लाल रक्त कणिकाओं की उपस्थिति, रक्ताल्पता उत्पन्न करती है और इस कारण आपको थकावट होती है।

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

थैलेसीमिया के कई प्रकार होते हैं, जिनमें अल्फा-थैलेसीमिया, बीटा-थैलेसीमिया, कूलेस एनीमिया, और भूमध्यसागरीय एनीमिया हैं।
रोग अवधि
हम ठीक होने में लगने वाले समय का अंदाजा नहीं लगा सकते।
जाँच और परीक्षण रक्त परीक्षण
कम्पलीट ब्लड काउंट
रेटिक्यूलोसाईट काउंट
आयरन
अनुवांशिकता जाँच
प्रसव पूर्व परीक्षण
कोरिओनिक विलस सैंपलिंग
एम्नियोसेंटेसिस
डॉक्टर द्वारा आम सवालों के जवाबQ1.थैलेसीमिया क्या है?थैलेसीमिया वंशानुगत विकार है जिसमें हीमोग्लोबिन का संश्लेषण दोषयुक्त होता है। यह रक्ताल्पता के रूप में प्रकट होता है।
Q2. मुझे थैलेसीमिया कैसे हो सकता है?
यदि आपके माता-पिता में से किसी एक अथवा दोनों को थैलेसीमिया रोग है, या वे इसके वाहक हैं, तो आपको भी ये रोग हो सकता है।
Q3.मुझे थैलेसीमिया है, ये कैसे पता चलेगा? थैलेसीमिया रक्ताल्पता के रूप में प्रकट होता है। रक्त का आयरन परीक्षण इसे रक्ताल्पता के अन्य रूपों से अलग बताता है। हीमोग्लोबिन के इलेक्ट्रोफोरेसिस से रोग निश्चित पता चलता है।

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Q4.थैलेसीमिया का उपचार क्या है?थैलेसीमिया के रोगियों को, रोग की गम्भीरता के आधार पर, बार-बार रक्त चढ़वाना पड़ता है। उन्हें आयरन की अधिक मात्रा को घटाने के लिए औषधियां भी लेनी होती हैं।
यदि तिल्ली (स्प्लीन) आकार में अत्यंत बढ़ गई है तो रक्त कणिकाओं के नष्ट होने को कम करने के लिए तिल्ली को शल्यक्रिया द्वारा हटाया जाता है।
थैलेसीमिया की नई उपचार पद्धति में, रोगी के किसी भाई-बहन के गर्भनाल में उपस्थित, रक्त कोशिका का प्रयोग होता है, जिसका लक्ष्य थैलेसीमिया का इलाज करना है।
Q5. क्या मैं थैलेसीमिया के साथ सामान्य जीवन जी सकता हूँ?मंद थैलेसीमिया के रोगी बिना किसी उपचार के सामान्य जीवन जी सकते हैं। लेकिन गंभीर थैलेसीमिया रोगियों को बार-बार रक्त चढ़वाना होता है और आयरन चेलेशान थेरेपी लेनी होती है, जो जीवन की गुणवत्ता को कम करते हैं।
Q6.थैलेसीमिया की अन्य समस्याएँ क्या हैं? थैलेसीमिया के रोगियों को बार-बार संक्रमण की संभावना होती है और अस्थि-मज्जा के विस्तार के कारण उनकी हड्डियाँ कमजोर और भुरभुरी हो जाती हैं। यह बच्चों में विकास को धीमा करता है और उनकी वयःसंधि भी विलंबित होती है।
यदि चेलेशान थेरेपी पर्याप्त और उचित नहीं है तो आयरन की अधिकता से ह्रदय, लिवर और भीतरी अंगों पर आयरन इकठ्ठा होने लगता है।

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Q7.मैं थैलेसीमिया को कैसे रोक सकता हूँ?
विवाह पूर्व जीन सम्बन्धी उचित सलाह द्वारा बच्चों में थैलेसीमिया को रोका जा सकता है। थैलेसीमिया वाहक व्यक्तियों के आपसी वैवाहिक सम्बन्ध को रोका जाना चाहिए। परहेज और आहार
लेने योग्य आहारकैल्शियम युक्त आहार अधिक मात्रा में लें। यह हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत रखने के लिए अत्यंत जरूरी है। डेरी उत्पाद कैल्शियम का अच्छा स्रोत हैं। एक अतिरिक्त लाभ यह भी है कि डेरी उत्पाद शरीर के आयरन अवशोषण की क्षमता को कम करते हैं।
कैल्शियम के अवशोषण के लिए शरीर को विटामिन डी की आवश्यकता होती है। विटामिन डी अण्डों, डेरी उत्पादों और मछली में मिलता है।
इनसे परहेज करें तरबूज, पालक, खुबानी, हरी पत्तेदार, एस्पार्गस, आलू, खजूर, किशिमिस, ब्रोकोली, फलियाँ, मटर, सूखी फलियाँ, दालें
आयरन की अधिक मात्रा
दलिया
चाय, कॉफ़ी
मसाले

*प्रोस्टेट बढ़ने से मूत्र रुकावट की अचूक  औषधि*

योग और व्यायाम
व्यायाम नियमित करें और डॉक्टर से अपने लिए उचित व्यायाम कार्यक्रम की जानकारी लें।
घरेलू उपाय (उपचार)
अधिक मात्रा में रक्त चढ़वाने वाले लोगों को चेलेशान थेरेपी नामक उपचार की आवश्यकता होती है, ताकि शरीर के अधिक आयरन को हटाया जा सके।
यदि आप रक्त चढ़वा रहे हैं तो आपको आयरन के पूरक नहीं लेने चाहिए।
स्वास्थ्यवर्धक आहार लें।
संक्रमण ना होने दें। रोकथाम (बचाव)
अधिकतर मामलों में थैलेसीमिया को रोका नहीं जा सकता।
यदि आपको थैलेसीमिया है, या आप थैलेसीमिया जीन के वाहक हैं, तो पिता बनने के पूर्व जीन सम्बन्धी सलाहकार से मार्गदर्शन लें।
ध्यान देने की बातें
चेहरे की हड्डियों में विकृति आना।
शारीरिक विकास में कमी।
साँस लेने में कमी।
पीली त्वचा (पीलिया)।
डॉक्टर को कब दिखाएँ
यदि आपको या आपके बच्चे को थैलेसीमिया के निम्न में कोई लक्षण हैं तो अपने डॉक्टर से संपर्क करें:

वात रोग (जोड़ों का दर्द ,कमर दर्द,गठिया,सूजन,लकवा) को दूर करने के उपाय* 

अत्यंत थकावट।
साँस लेने में कमी।
मुरझाये हुए से दिखाई देना।
चिड़चिड़ापन
त्वचा का पीला पड़ना (पीलिया)।
चेहरे की हड्डियों में विकृति। इस बीमारी में रोगी का शरीर पीला पड़ जाता है,
रोगी के शरीर में शुद्ध खून बनना बंद हो जाता है,
हड्डियों का विकास रूक जाता है,
सोचने विचारने की क्षमता कम हो जाती है,
बच्चों में शरीर के विकास की दर कम हो जाती है,
बड़ो में थकावट अधिक होने लगती है,
थोड़ी बहुत मेहनत के बाद चक्कर आने लगते है,

सर्वकल्प क्वाथ (sarvkalp kawath) :- ३०० ग्राम

दन्तशूल, दांत का दर्द toothache) के घरेलू उपचार

बनाने की विधि :- एक बर्तन में लगभग ४०० मिलीलीटर पानी लें | इस पानी में एक चम्मच सर्वकल्प क्वाथ की मिलाकर इसे मन्द अग्नि पर पकाएं | थोड़ी देर पकने के बाद जब इसका पानी १०० मिलीलीटर रह जाए तो पानी को छानकर सुबह के समय और शाम के समय खाली पेट पीये |
सामग्री : -
कुमारकल्याण रस (kumar kalyan rasa) :- १- २ ग्राम
प्रवाल पिष्टी (praval pisti) :- ५ ग्राम
कहरवा पिष्टी (kaharva pisti) :- ५ ग्राम
मुक्ता पिष्टी (mukta pisti) :- ५ ग्राम
गिलोय सत (giloy sat) :- १० ग्राम
प्रवाल पंचामृत (praval panchamrit) :- ५ ग्राम
इन सभी आयुर्वेदिक औषधियों को आपस में मिलाकर एक मिश्रण बनाए | अब इस मिश्रण की बराबर मात्रा में ६० पुड़ियाँ बना लें और किसी डिब्बे में बंद करके रख दें | रोजाना एक – एक पुड़ियाँ और शाम के समय खाना खाने से आधा घंटा पहले ताज़े पानी के साथ या शहद के साथ खाएं |
सामग्री : -
कैशोर गुगुल (Kaishor guggal ) :- ४० ग्राम
आरोग्यवर्धिनी वटी(aarogaya vardhini vati):- २० ग्राम
इन दोनों औषधीयों की एक – एक गोली रोजाना सुबह और शाम के खाना खाने के बाद लें | इस औषधि को हल्के गर्म पानी के साथ लें |


प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 

सामग्री : -
धृतकुमारी स्वरस(Dhritkumari Savrasa) : - १० मिलीलीटर
गिलोय स्वरस (giloye Savrasa) :- १० मिलीलीटर
इन दोनों औषधियों में से किसी एक रस में गेहूँ के ज्वारे का रस मिलाकर पीये | इस उपचार को रोजाना सुबह और शाम खाली पेट पीये | बहुत लाभ मिलेगा |

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5.5.17

आपकी हर सुबह तरोताज़ा होगी,करें ये उपाय





    एक कहावत है, सुबह सुबह न जाने किसका मुह देख लिया पूरा दिन ख़राब चल रहा है. अगर आपने भी यह वाक्य कभी दोहराया होतो याद करिए, कभी ऐसा भी हुआ होगा कि सुबह सुबह आपने खुद का चेहरा ही आईने में देखा होगा. आपका दिन आपके हाथ में है. सुबह अच्छी होगी तो दिन भी अच्छा गुजरेगा.
    ऐसे 9 उपाय जो आपकी हर सुबह को तरोताजा बनायेंगे :


    सोने का स्थान : 


    अच्छी सुबह के लिए सबसे जरुरी चीज़ ये है कि, आप की रात की नींद अच्छी हो. अच्छी नींद के लिए आपको कुछ बातों का खास ख्याल रखना चाहिए. सोने का कमरा साफ़, हवादार होना चाहिए. चूंकि साफ और ताज़ी हवा में सांस लेने से शरीर हल्का महसूस होता है, इससे नींद भी अच्छी आती है और शरीर सही प्रकार से थकान दूर कर पाता है, पाचन भी सुचारू रूप से सक्रिय दिनचर्या रखें : हमें नींद की आवश्यकता इसलिए होती है क्योकि हम दिन भर के मानसिक-शारीरिक तनाव से मुक्ति चाहते है, पर अगर आप दिन भर कोई शारीरिक गतिविधि नहीं करेंगे तो पाचन तंत्र सही काम नहीं करेगा फलस्वरूप नींद अच्छी नहीं आएगी. सोते समय कोई किताब पढना एक अच्छी आदत है पर समय का ख्याल भी रखना चाहिए. सस्पेंस, जासूसी या सस्ते साहिउठने के बाद : सुबह उठने पर पानी पीकर किसी खुली जगह या छत पर ही थोड़ी देर घूमें. पेट आसानी से साफ़ होगा, ताज़ी हवा से सुस्ती भागेगी और ताजगी मिलेगी. उठते ही न्यूज़पेपर पढना आँखों के लिए अच्छा नहीं माना जाता है, साथ ही दुनिया भर के क्राईम, राजनीतिक, वैश्विक उथल-पुथल आदि की ख़बरें पढना नकारात्मक मूड ही देता है. थोडा रुक कर चाय नाश्ते के बाद पढ़ सकते हैमॉर्निंग वाक बहुत थकाऊ नहीं होना चाहिए. 1-2 किलोमीटर भी घूमना पर्याप्त है. सुबह की ताज़ी ठंडी हवा में सांस लेते हुए तेज क़दमों से चलना दिमाग को समुचित मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचा कर एकदम फ़्रेश कर देता है. तेज चलने से रक्त-संचार भी तेज होकर मनो-मस्तिष्क को दिन भर के कार्यइसके अलावा बाज़ार में कुछ अच्छी हर्बल टी भी मिलती है, जैसे कि पतंजलि योगपीठ की हर्बल टी. ऐसी चाय में चायपत्ती के बजाय कुछ स्वास्थ्यप्रद जड़ी-बूटियां होती है. इस प्रकार के चाय की महक और स्वाद बड़ा ही अलग पर लाजवाब होता है. ठंडियो में सुबह मसाला चाय पीना ठंडी भगाने और सुस्ती दूर करने का अचूक तरीका है.

    पथरी की चमत्कारी औषधि से डॉक्टर की बोलती बंद!


    सुबह के नाश्ते में दलिया, अंकुरित चना-मूंग, फल के जूस, कटे फल, ब्राउन ब्रेड सैंडविच, सूखे मेवे, दही, बनाना शेक या अन्य कोई भी शेक जिसमे मीठे के लिए शहद प्रयोग किया जाये, निम्बू पानी लेना बहुत ही अच्छे विकल्प है. ऐसा नाश्ता आपको शक्ति के साथ सही पोषण और सक्रिय मन-स्थिति भी प्रदान करता हैकलाप के लिए सक्रिय कर देता है.

    सुबह का नाश्ता : 


    सुबह उठते ही 2-3 गिलास पानी पियें. हलके गर्म पानी में निम्बू रस और एक चम्मच शहद डाल कर पिए. यह उपाय मोटापा घटाता है और विषैले तत्वों को शरीर से बाहर निकालता है. यह उपाय लगातार एक महीने से ज्यादा नहीं करना चाहिए. एक महीने के बाद कुछ दिनों के अन्तराल पर पुनः शुरू करना चाहिये.


    सुबह चाय पीना पसंद हो तो ग्रीन-टी पियें या बिना दूध की चाय में नींबू-रस डाल कर पियें. अगर भारतीय स्टाइल के चाय पीना पसंद होतो, अदरक डाल कर, हलकी मीठी, कम चायपत्ती वाली चाय पियें..

    मार्निंग वाक या योग करें : 


    सुबह जल्दी उठना ही पहाड़ लगता है उसपर घूमने कौन जाये. यह सवाल सालों से मार्निंग वाक करने वाले व्यक्ति के मन में भी कई बार सुबह-सुबह आता है.
    सुबह घूमने जाना या नहा-धो कर योग करने का असली मज़ा इन्हें पूरा करने के बाद अता है. एक बार अगर आप कुछ दिनों तक नियमित रूप से इनका पालन करते है तो आप भी पाएंगे कि जो कोई इन बातों के गुण रटते रहते हैं वो झूठ नहीं बोलते.त्य पढने से आपको ख्याल भी वैसे आयेंगे और सपने भी.


    चाय-काफी, कोल्ड ड्रिंक का कम उपयोग : 


    दिन में चाय-काफी कम पिए. ज्यादा पीने से गैस व एसिडिटी होती है और पेट भरा भरा सा लगता है और भूख भी नहीं लगती. सोते समय या रात में भूल के भी इन्हें न पिए. इन्हें पीने से दिमाग सक्रिय हो जाता है और नींद तो आपसे दूर ही भागेगी. खाना खाते समय बीच में और बाद में अगर पानी पीना हो तो हल्का गर्म पानी ही पिए. यह छोटा सा उपाय पाचन प्रक्रिया को तेज करता है और आपको बड़ा हल्का महसूस होगा.

    सोते समय ध्यान दें


     ऐसा सबके साथ होता है कि सोते समय दिमाग में दिन भर की घटनाओ की फिल्म चलनी शुरू हो जाती है और साथ ही उसकी समीक्षा भी. दिमाग को रोकना तो मुश्किल है पर कंट्रोल करना भी अपने हाथ में है.

    पेट मे गेस के अनुपम नुस्खे 

    जो बीत गया वो बस आपके दिमाग में है. इसके बजाय आने वाले दिन की कुछ प्लानिंग कर लें. भगवान का स्मरण करें, अच्छे सकारात्मक, आशावादी विचारो को मन में लायें और गहरी सांस हुए तन-मन को विश्राम दें.

    अगर संभव होतो बिस्तर पर हलके रंग की (सफ़ेद रंग हो तो सर्वोत्तम) सूती चद्दर बिछाएं. यह प्रयोग बहुत ही सुकून देता है, मन-मस्तिष्क को आराम पहुंचाता है. तकिये पर थोडा सा कोई अच्छा, हलकी खुशबु वाला इत्र जैसे गुलाब, लेवेंडर आदि का छिड़क दें. अगर आप अलार्म लगाते है तो इस बात का ध्यान रखे कि अलार्म की आवाज़ बहुत तेज, कर्कश न हो
    ऐसे लोग जब सुबह गहरी नींद सो रहे होते है और अचानक से अलार्म चीखना शुरु करता है, जिससे वो एकदम चौंक कर उठते हैं. उनका दिल इतना तेजी से धडकता है जैसे हार्ट-अटैक आ गया हो. ऐसा करने से आप सुबह सुबह ही चिडचिडा उठते हैं. संभव हो तो खिड़की के पास सोये या जहाँ से सुबह का प्राकृतिक प्रकाश आये.
    ये सुबह उठने का बेहतरीन तरीका है. अगर आपको अलार्म लगाना ही है तो ऐसी रिंगटोन लगाइए जो कि धीमे से तेज होती हुई हो या कोई मधुर गाना, प्राकृतिक आवाज़ जैसे चिडियों की चहचहाहट या कोई भजन आदि भी लगा सकते हैं. कमरे में समुचित अँधेरा हो जिससे कि दिमाग सोने की मानसिक स्थिति में आ सके. कमरा बहुत ठंडा या गर्म न हो.


    रात का खाना : 

    इस बात का सदैव ख्याल रखें कि रात का खाना हल्का हो. खाना जल्दी खा लिया जाये जिससे कि खाने और सोने के बीच 2-3 घंटे का फासला हो. खाने बहुत ज्यादा तला-भुना न हो. सोने के पहले हल्का गर्म दूध पीना अच्छी नींद लाने में बढ़िया सहायक माना गया है.


    गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

    गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

    पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि

    सेक्स का महारथी बनाने और मर्दानगी बढ़ाने वाले अचूक नुस्खे