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31.1.17

जायफल (Nutmeg) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण// the herbal and medicinal properties of nutmeg

     

    जायफल या मीरीस्टिका फ्रेगरैन्स् एक सदाबहार वृक्ष है जो इन्डोनेशिया  मूल का  है। इस पेड़ के फल 2 अलग-अलग मसालों के स्रोत हैं- जायफल और जाविंत्री। जायफल के बीज एक पीले रंग के खाने योग्य फल के अंदर होते हैं, जिसका आकार लगभग छोटे आडू जैसा होता है। यह फल दो भाग में कटकर, जाल जैसा, लाल रंग का आकार दर्शाता है जिसके अंदर बीज बँधा रहता है। इस बीजचोल को जमा कर, सूखाकर जाविंत्री के रुप में बेचा जाता है। इस बीजचोल के बीच में गहरे रंग का चमकीला मेवे जैसा आकार होता है और इसके अंदर अंडे के आकार का बीज होता है, जिसे जायफल कहते हैं।
जायफल को अकसर जाविंत्री या कड़े परत के बिना बेचा जाता है। यह अंडाकार और लगभग 1″ लंबे होते, हल्के सिकुड़े हुए और बाहर से गहरे भुरे रंग और अंदर से हल्के भुरे रंग के होते हैं। जायफल और जाविंत्री का स्वाद लगभग समान होता है और समान गुण होते हैँ। जायफल थोड़ा मीठा होता है ओर वहीं जाविंत्री का स्वाद सौम्य होता है। जाविंत्री को अकसर हल्के व्यंजन में डाला जाता है, जहाँ यह व्यंजन को नारंगी, केसर जैसा रंग प्रदान करता है और वहीं जायफल ज़रुरी तेज़ स्वाद प्रदान करता है, जैसे चीज़ सॉस में। जायफल  को बहुधा  कद्दूकस कर के खाने में डाला जाता है।


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अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करने पर, जायफल द्रव्य पदार्थ के रुप में काम करता है और यह जहरीला भी हो सकता है। इसलिए, हर बार में एक या दो चुटकी से ज़्यादा प्रयोग ना करें।
जायफल यूं तो सर्दियों में उपयोगी है लेकिन इसकी औषधीय महत्ता आयुर्वेद में साल भर मानी गई है। यह वेदनानाशक, वातशामक और कृमिनाशक है। स्नायविक संस्थान के लिए उपयोगी होता है। यकृत को सक्रिय करने वाला और सुपाच्य होने से पाचन संस्थान के लिए उपयोगी होता है।
जायफल के गुण : 
यह स्वाद में चरपरा, कड़वा, कसैला, पचने पर कटु तथा हल्का, चिकना, तीक्ष्ण और गर्म है। इसका मुख्य प्रभाव पाचन-संस्थान पर ग्राही रूप में पड़ता है। यह शोथहर, पीड़ाशामक, दुर्गन्धनाशक, अग्निदीपक, वायुज्वरहर तथा कटु-पौष्टिक है।
अनिद्रा, खांसी, सांस, हिचकी, शीघ्रपतन और नपुंसकता आदि व्याधियां दूर करने में उपयोगी होता है। इसके चूर्ण और तेल को उपयोग में लिया जाता है।


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नपुंसकता : 
 
जायफल को घिस कर दूध में मिलाकर हफ्ते में तीन दिन पीने से नपुंसकता की बीमारी दूर होती है। यौन शक्ति बढ़ाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके चूर्ण और तेल को शीघ्रपतन दूर करने में उपयोग में लिया जाता है।
  * इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।
*यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।
यह कामेन्द्रिय की शक्ति भी बढाता है।
*जायफल  आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है।
*जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।


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*किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार।
*बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को चटा दीजिये। सुबह शाम चटायें।
*फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर Jayephal को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की 80%संभावना देखी गयी है।प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।
*पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है, इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।
 

*जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।
*अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो Jayephal को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये।

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*अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है, तो Jayephal को पानी में घिसकर उसे पिला दीजिये।
जी मिचलाने की बीमारी भी Jayephal को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।
*सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल  को पानी में घिस कर लगाएं।
*सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल  को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन हो जाए तो उसे मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये।
*आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल  की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।
*दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल  को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।


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21.8.16

कनेर के पौधे के उपयोग ,उपचार




















कनेर का पौधा भारत में हर स्थान पर पाया जाता है | इसका पौधा भारत के मंदिरों में , उद्यान में और घर में उपस्थित वाटिकाओं में लगायें जाते है | कनेर के पौधे की मुख्य रूप से तीन प्रजाति पाई जाती है | जैसे :- लाल कनेर , सफेद कनेर और पीले कनेर | इन प्रजाति पर सारा साल फूल आते रहते है | जंहा पर सफेद और पीली कनेर के पौधे होते है वह स्थान हरा – भरा बसंत के मौसम की तरह लगता है |
कनेर का पौधा एक झाड़ीनुमा होता है | इसकी ऊंचाई 10 से 12 फुट की होती है | कनेर के पौधे की शखाओं पर तीन – तीन के जोड़ें में पत्ते लगे हुए होते है | ये पत्ते 6 से ९ इंच लम्बे एक इंच चौड़े और नोकदार होते है | पीले कनेर के पौधे के पत्ते हरे चिकने चमकीले और छोटे होते है | लेकिन लाल कनेर और सफेद कनेर के पौधे के पत्ते रूखे होते है
कनेर के पौधे को अलग – अलग स्थान पर अलग अलग नाम से जाना जाता है | जैसे :-
१. संस्कृत में :- अश्वमारक , शतकुम्भ , हयमार ,करवीर
२. हिंदी में :- कनेर , कनैल
३. मराठी में :- कणहेर
४. बंगाली में :- करवी
५. अरबी में :- दिफ्ली
६. पंजाबी में :- कनिर
७. तेलगु में :- कस्तूरीपिटे
आदि नमो से जाना जाता है |
कनेर के पौधे में पाए जाने वाले रासायनिक घटक :- कनेर का पौधा पूरा विषेला होता है | इस पौधे में नेरीओडोरिन और कैरोबिन स्कोपोलिन पाया जाता है | इसकी पत्तियों में हृदय पदार्थ ओलिएन्डरन पाया जाता है | पीले कनेर में पेरुबोसाइड नामक तत्व पाया जाता है | इसकी भस्म में पोटाशियम लवण की मात्रा पाई जाती है |

कनेर के पौधे के गुण :- 
इसके उपयोग से कुष्टघन , व्रण , व्रण रोपण आदि बीमारियाँ ठीक की जाती है | इसके आलावा यह कफवात का शामक होता है | इसके उपयोग से विदाही , दीपन और पेट की जुडी हुई समस्या ठीक हो जाती है | यदि कनेर को उचित मात्रा मे प्रयोग किया जाता है तो यह अमृत के समान होती है लेकिन यदि इसका प्रयोग अधिक मात्रा में किया जाता है तो यह जहर बन जाता है | कनेर का उपयोग रक्त की शुद्धी के लिए भी किया जाता है | यह एक तीव्र विष है जिसका उपयोग मुत्रक्रिछ और अश्मरी आदि रोगों को दूर करने के लिए किया जाता है |
कनेर का औषधि के रूप में प्रयोग:-
दूब घास(Cynodon
dactylon) के पंचाग (फल,
फूल, जड़, तना, पत्ती) तथा
कनेर के पत्तोँ को पीस कर
कपड़े मेँ रखकर रस निकालेँ
और सिर के गंजे स्थान पर
लगायेँ तो सिर्फ 15 दिनोँ मेँ
ही उस स्थान पर नये बाल
दिखाई देने शुरू हो जाते हैँ।
तथा पूरे सिर मेँ तेल की
तरह इस रस का प्रयोग करेँ
तब सफेद बाल काले होने
लगते हैँ ।
नेत्र रोग :- 
आँखों के रोग को दूर करने के लिए पीले कनेर के पौधे की जड़ को सौंफ और करंज के साथ मिलाकर बारीक़ पीसकर एक लेप बनाएं | इस लेप को आँखों पर लगाने से पलकों की मुटाई जाला फूली और नजला आदि बीमारी ठीक हो जाती है |
हृदय शूल :- 
कनेर के पौधे की जड़ की छाल की 100 से 200 मिलीग्राम की मात्रा को भोजन के बाद खाने से हृदय की वेदना कम हो जाती है |
दातुन :- 
सफेद कनेर की पौधे की डाली से दातुन करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते है | इस पौधे का दातुन करने से अधिक लाभ मिलता है |
सिर दर्द :- 
कनेर के फूल और आंवले को कांजी में पीसकर लेप बनाएं | इस लेप को अपने सिर पर लगायें | इस प्रयोग से सिर का दर्द ठीक हो जाता है |
अर्श :-
 कनेर की जड़ को ठन्डे पानी में पीसकर लेप बनाएं | दस्त होने के बाद जो अर्श बाहर निकलता है उस पर यह लेप लगा लें | अर्श रोग का प्रभाव समाप्त हो जाता है |
*कनेर के 60-70 ग्राम पत्ते (लाल या पीली दोनों में से कोई भी या दोनों ही एक साथ ) लेकर उन्हें पहले अच्छे से सूखे कपडे से साफ़ कर लें ताकि उनपे जो मिटटी है वो निकल जाये,अब एक लीटर सरसों का तेल या नारियल का तेल या जेतून का तेल ले के उसमे पत्ते काट काट के डाल दें. अब तेल को गरम करने के लिए रख दें. जब सारे पत्ते जल कर काले पड़ जाएँ तो उन्हें निकाल कर फेंक दें और तेल को ठण्डा कर के छान लें और किसी बोतल में भर के रख लें|
प्रयोग विधि :- 
रोज़ जहाँ जहाँ पर भी बाल नहीं हैं वहां वहां थोडा सा तेल लेकर बस 2 मिनट मालिश करनी है और बस फिर भूल जाएँ अगले दिन तक| ये आप रात को सोते हुए भी लगा सकते हैं और दिन में काम पे जाने से पहले भी| बस एक महीने में आपको असर दिखना शुरू हो जायेगा|सिर्फ 10 दिन के अन्दर अन्दर बाल झड़ने बंद हो जायेंगे या बहुत ही कम|और नए बाल भी एक महीने मे आने शुरू हो जायेंगे|
नोट : ये उपाय पूरी तरह से अनुभूत है| कम से कम भी 10 लोगो पर इसका सफल परीक्षण किया है| एक औरत के 14 साल से बाल झड़ने बंद नहीं हो रहे थे, इस तेल से मात्र 6 दिन में बाल झड़ने बंद हो गये. 65 साल तक के आदमियों के बाल आते देखे हैं इस प्रयोग से जिनका के हमारे पास data भी पड़ा है|आप भी लाभ उठायें और अगर किसी को फरक पड़े तो कृपया हमे जरुर बताये|
चेतावनी: कनेर के पौधे में जो रस होता है वो बहुत ज़हरीला होता है. तो ये सिर्फ बाहरी प्रयोग के लिए है 
 *सफेद कनेर के पौधे के पीले पत्तों को अच्छी तरह सुखाकर बारीक़ पीस लें | इस पिसे हुए पत्ते को नाक से सूंघे | इससे आपको छीक आने लगेगी जिससे आपका सिर का दर्द ठीक हो जायेगा |
कनेर के ताजा फूल की ५० ग्राम की मात्रा को 100 ग्राम मीठे तेल में पीसकर कम से कम एक सप्ताह तक रख दें | एक सप्ताह के बाद इसमें 200 ग्राम जैतून का तेल मिलाकर एक अच्छा सा मिश्रण तैयार करें | इस तेल की नियमित रूप से तीन बार मालिश करने से कामेन्द्रिय पर उभरी हुई नस की कमजोरी दूर हो जाती है इसके साथ पीठ दर्द और बदन दर्द को भी राहत मिलती है |
सफेद कनेर -

सफेद कनेर की जड़ की छाल बारीक पीसकर भटकटैया के रस में खरल करके 21 दिन इन्द्री की सुपारी छोड़कर लेप करने से तेजी आ जाती है।
पक्षघात के रोग में :-
सफेद कनेर के पौधे की जड़ की छाल , सफेद गूंजा की दाल तथा काले धतूरे के पौधे के पत्ते आदि को एक समान मात्रा में लेकर इनका कल्क तैयार कर लें | इसके बाद चार गुना पानी में कल्क के बराबर तेल मिलाकर किसी बर्तन में धीमी आंच पर पकाएं | जब केवल तेल रह जाये तो किसी सूती कपड़े से छानकर मालिश करें | इससे पक्षाघात का रोग ठीक हो जाता है |
चर्म रोग :- 
सफेद कनेर के पौधे की जड़ का क्वाथ बनाकर राई के तेल में उबालकर त्वचा पर लगाने से त्वचा सम्बन्धी रोग दूर हो जाते है |
कुष्ठ रोग :-
कनेर के पौधे की छाल का लेप बनाकर लगाने से चर्म कुष्ठ रोग दूर होता है |
अफीम की आदत से छुटकारे के लिए :-
कनेर के पौधे की जड़ का बारीक़ चूर्ण तैयार कर लें | इस चूर्ण को 100 मिलीग्राम की मात्रा में दूध के साथ दें | इससे कुछ हफ्तों में ही अफीम की आदत छुट जाएगी |
कृमि की बीमारी :- 
कनेर के पत्तों को तेल में पकाकर घाव पर बांधने से घाव के कीड़े मर जाते है |
कनेर के पौधे के पत्तों का क्वाथ से नियमित रूप से नहाने से कुष्ठ रोग काफी कम हो जाता है |
कनेर के पौधे के पत्तों को बारीक़ पीस लें | अब इसमें तेल मिलाकर लेप तैयार कर लें | शरीर में जंहा पर भी जोड़ों का दर्द है उस स्थान पर लेप लगा लें | इससे दर्द कम हो जाता है |
खुजली के लिए :
कनेर के पौधे के पत्तों को तेल में पका लें | इस तेल को खुजली वाले स्थान पर लगाने से एक घंटे के अंदर खुजली का प्रभाव कम हो जाता है |
पीले कनेर के पौधे की पत्तियां या जैतून का तेल में बनाया हुआ महलम को खुजली वाले स्थान पर लगायें | इससे हर तरह की खुजली ठीक हो जाती है |
सर्पदंश के लिए :-
 कनेर की जड़ की छाल को 125 से 250 मिलीग्राम की मात्रा में रोगी को देते रहे इसके आलावा आप कनेर के पौधे की पत्ती को थोड़ी – थोड़ी देर के अंतर पे दे सकते है | इस उपयोग से उल्टी के सहारे विष उतर जाता है |
दाद के रोग के लिए :
सफेद कनेर के पौधे की जड़ की छाल का तेल बनाकर लगाने से कुष्ट रोग और दाद का रोग ठीक होता है |

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