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11.4.17

द्राक्षासव के गुण फायदे उपयोग



द्राक्षासव के शास्त्रोक्त गुण धर्म


इसे यथोचित मात्रा के अनुसार सेवन करने से अर्श,शोथ,अरुचि,ह्रदयरोग,पाण्डु,रक्तपित्त,
भगन्दर,गुल्म उदररोग,कृमि,ग्रंथिरोग,क्षत,शॉष,ज्वर,और वात पित्त रोग नष्ट होते है।
द्राक्षासव मधुर विपाकी ,वात ,पित्त, कफ,नाशक मूत्रल ,पाचक, तथा रक्तवर्धक कोष्ठ शोधक,और वृष्य है।
शास्त्र में जिन 2 रोगों पर इसको हितकर बताया गया है वे अधिकतर वात कफ प्रधान है। रक्त हीनता के कारण उत्तपन्न होते है।


और उदर विकृति उनका मूल है।
ताकत और ताजगी से भरा सुमधुर टॉनिक है। यह भूख बढ़ाता है। दस्त साफ लाता है, खून में तेजी लाता है, काम की थकावट दूर करता है तथा नींद लाता है। दिल व दिमाग में ताजगी पैदा करता है। बल, वीर्य, रक्त मांस बढ़ाता है|कफ, खांसी, सर्दी-जुकाम, क्षय की खांसी, कमजोरी में लाभदायक। सब ऋतुओं में बाल, वृद्ध, स्त्री, पुरुष सभी सेवन कर सकते हैं।
द्राक्षासव वात पित्त कफ नाशक है। रक्तवर्धक ,अन्त्रकला दोष नाशक, कोष्ठ शोधक ,है।


इसके सेवन से आंत्र के दोष नष्ट होते है।
एवं आंत्र की शोषित कलायें सक्रिय हो जाती है।
इसके सेवन से दीर्घ काल से सञ्चित दोष नष्ट हो जाते है।
रक्त के अभाव से होने वाले जीर्ण में इसका सेवन लाभ प्रद है।

मात्रा


20ml से 25ml खाना खाने के बाद