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2.2.17

तिल के औषधीय गुण,लाभ,उपचार // Sesame health benefits,


भारतीय खानपान में तिल का बहुत महत्वो है। सर्दियों के मौसम में तिल खाने से शरीर को ऊर्जा मिलती है और शरीर सक्रिय रहता है। तिल में कई प्रकार के प्रोटीन, कैल्शियम, बी काम्प्ल्रेक्स और कार्बोहाइट्रेड आदि तत्व पाये जाते हैं। तिल का सेवन करने से तनाव दूर होता है और मानसिक दुर्बलता नही होती। प्राचीन समय से खूबसूरती बनाये रखने के लिए तिल का प्रयोग किया जाता रहा है। तिल तीन प्रकार के होते हैं - काले, सफेद और लाल। लाल तिल का प्रयोग कम किया जाता है। तिल का तेल भी बहु फायदेमंद होता है।


गर्दन के दर्द के घरेलू उपाय


 तिल के औषधीय गुणों के बारे में बताते हैं।
तिल के गुण :
सर्दियों में तिल का सेवन शरीर में उर्जा का संचार करता है, और इसके तेल की मालिश से दर्द में राहत मिलती है।
तिल को कूटकर खाने से कब्ज की समस्या नहीं होती, साथ ही काले तिल को चबाकर खाने के बाद ठंडा पानी पीने से बवासीर में लाभ होता है। इससे पुराना बवासीर भी ठीक हो जाता है। 

मुहासे-
 मुहासो के लिए तिल की खली को जलाकर इसकी राख में गोमूत्र मिलाकर लेप करने से कुछ दिनों में मुहासे ठीक हो जाते है।

प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 

• नारू रोग-
 खली तिल की को काफी में पीसकर लेप करने से नारू रोग में लाभ होता है।
• बहुमूत्रता-
 जाड़े के दिनो में गुड़ तिल की गर्म ताजा गजक खाने से अधिक पेशाब आना और गले की खुजली ठीक हो जाती है।
बिस्तर पर पेशान आना-
बच्चा सोते समय पेशाब करता हो़ तो भुने काले तिलों को गुड़ के साथ मिलाकर उसका लड्डू बना लीजिए। बच्चेस को यह लड्डू हर रोज रात में सोने से पहले खिलाइए, बच्चान सोते वक्त पेशाब नही करेगा।
मोटापा- 
काले तिल एक चम्मच खाने के बाद चबा चबा कर खाए, चर्बी खत्म हो जाएगी

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 


मुंह के छाले -
 मुंह में छाले होने पर तिल के तेल में थोड़ा सा सेंधा नमक मिला कर मुंह के छालों में लगाइए, इससे मुंह के छाले ठीक हो जाएंगे।
• रक्त स्त्राव-
 प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
• रक्तार्श-
लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।
• पेट दर्द- 
20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

• सूजाक- 
15-15 ग्राम की मात्रा में काले तिल तथा देशी खाड बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध के साथ रोग की स्थिति के अनुसार सेवन करने से लाभ हो जाता है।
• बवासीर- 
1. काले तिल चबाकर उपर से ठंडा जल पीने से बादी बवासीर ठीक हो जाता है।
2. तिल पीसकर गर्म करके मस्सो पर लेप करने या बाधने से भी बवासीर में लाभ होता है। इसके साथ तिल के तेल का एनिमा (बासी) देने से आते चिकनी होकर शौच के गुच्छे निकल जाते है। जिससे धीरे धीरे रोग समाप्त हो जाने लगता है।
• खूनी दस्त रक्तातिसार- 
काले तिल एक भाग में मिश्री 5 भाग मिलाकर पीसकर बकरी के दूध के साथ देने से रक्तातिसार में लाभ हो जाता है।
• वात रक्त-
 तिलों भूनकर दूध में बुझाकर बारीक पीसकर लेप करने से वात रक्त का रोग दूर हो जाता है।
• भगन्दर- 
भयंकर व्याधि भगन्दर या वेदनायुक्त वातजन्य धावों में तिल या असली को भूनकर परन्तु गर्भ स्थिति में दूध में बुझाकर व उसी दूध में पीसकर लेप करना चाहिए। भगन्दर रोग मिट जायेगा।

पिपली  के गुण प्रयोग लाभ 

• बहुमूत्र- 
प्रातः साय तिल मोदक (तिल के लड्डू) खाने से अधिक पेशाब आना बन्द हो जाता है।
• कब्ज-
 लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।
• बालों में रूसी होना- 
बालो में तिल के तेल की मालिश कर लगभग 30 मिनट के पश्चात गर्म पानी में भीगी एंव निचोडी हुई तौलिया सिर पर लपेंटें। तौलिया के ठंडे होने पर पुनः तौलिया गर्म जल में भिगोकर निचोड़कर सिर पर लपेटे। यह क्रिया लगभग 5 मिनट तक करे। फिर कुछ देर के बाद शीतल जल से सिर धो लेने पर रूसी दूर हो जायेगी ।
• सुखी खासी- 
यदि सर्दी के कारण सूखी खासी हो तो 4-5 चम्मच मिश्री एंव इतने ही तिल मिश्रित कर ले। इन्हे एक गिलास मे आधा पानी रहने तक उबाले। इसे प्रतिदिन प्रातः साय एंव रात्री के समय पीये।

बिदारीकन्द के औषधीय उपयोग 

• आग से जलना-
 तिल जल में चटनी की भाती पीस लें। इस का दग्ध जले स्थान पर मोटा लेप करने से जलन शान्त हो जाती है।
• मोच आना-
 तिल की खल लेकर उसे पीसे एंव पानी मे गर्म करे फिर उतारकर गर्म ही मोच आये स्थान पर बाधने से मोच के दर्द में लाभ होता है।
बवासीर- 
1. काले तिल चबाकर उपर से ठंडा जल पीने से बादी बवासीर ठीक हो जाता है।
2. तिल पीसकर गर्म करके मस्सो पर लेप करने या बाधने से भी बवासीर में लाभ होता है। इसके साथ तिल के तेल का एनिमा  देने से आते चिकनी होकर शौच के गुच्छे निकल जाते है। जिससे धीरे धीरे रोग समाप्त हो जाने लगता है।
खूनी दस्त रक्तातिसार- 
काले तिल एक भाग में मिश्री 5 भाग मिलाकर पीसकर बकरी के दूध के साथ देने से रक्तातिसार में लाभ हो जाता है।

*किडनी फेल रोग का अचूक इलाज* 

वात रक्त- 
तिलों भूनकर दूध में बुझाकर बारीक पीसकर लेप करने से वात रक्त का रोग दूर हो जाता है।
भगन्दर- 
भयंकर व्याधि भगन्दर या वेदनायुक्त वातजन्य घावों में तिल या अलसी को भूनकर परन्तु गरम स्थिति में दूध में बुझाकर व उसी दूध में पीसकर लेप करना चाहिए। भगन्दर रोग मिट जायेगा।
बहुमूत्र-
प्रातः साय तिल मोदक (तिल के लड्डू) खाने से अधिक पेशाब आना बन्द हो जाता है।
कब्ज- लगभग 60 ग्राम तिल लेकर उन्हे कूट लें फिर उनमें कोई मिष्ठान मिला लें। इसे खाने से कब्ज का नाश होता है।
बालों में रूसी होना-
 बालो में तिल के तेल की मालिश कर लगभग 30 मिनट के पश्चात गर्म पानी में भीगी एंव निचोडी हुई तौलिया सिर पर लपेंटें। तौलिया के ठंडे होने पर पुनः तौलिया गर्म जल में भिगोकर निचोड़कर सिर पर लपेटे। यह क्रिया लगभग 5 मिनट तक करे। फिर कुछ देर के बाद शीतल जल से सिर धो लेने पर रूसी दूर हो जायेगी ।
• मानसिक दुर्बलता- 
तिल गुड दोनो सममात्रा में लेकर मिला लें।उसके लड्डू बना ले। प्रतिदिन 2 बार 1-1 लड्डू दूध के साथ खाने से मानसिक दुर्बलता एंव तनाव दूर होते है। शक्ति मिलती है। कठिन शारीरिक श्रम करने पर सांस फूलना जल्दी बुढ़ापा आना बन्द हो जाता है।

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• दंत चिकित्सा-
 प्रातः काल तथा साय काल लगभग 50-50 ग्राम की मात्रा में (बिना मिठा मिलाये) धीरे धीरे काले तिल चबाकर उपर से पानी पीने से दात मजबूत मल रहित हो जाते है। और हिलते हुए दात भी पुनः जम जाते है।
• पथरी-
 तिल क्षार को रोग की दशानुसार देशी शहद में मिलाकर दूध के साथ सेवन करने से पथरी रोग में लाभ होता है।
• मकड़ी का विष-
 तिलो को पिलवाकर तेल निकाल लेने के उपरान्त बचे भाग खली में थोड़ी हल्दी मिलाकर पानी में पीसकर रोग स्थान पर लेप कर देने से मकड़ी का विष समाप्त हो जाता है।
तिल से घरेलू ईलाज::

घाव होना- 
पानी में तिलों को पीसकर पुल्टिस बांधने से अशुद्ध घाव साफ होकर शीघ्र भर जाता है।

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गर्भाशय की पीड़ा-
 तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।
मधुमेह के दवाईयों को प्रभावकारी बनाता है(Makes effective medicines for diabetes)
डिपार्टमेंट ऑफ बायोथेक्सनॉलॉजी विनायक मिशन यूनवर्सिटी, तमिलनाडु (Department of Biothechnology at the Vinayaka Missions University, Tamil Nadu) के अध्ययन के अनुसार यह उच्च रक्तचाप को कम करने के साथ-साथ इसका एन्टी ग्लिसेमिक प्रभाव रक्त में ग्लूकोज़ के स्तर को 36% कम करने में मदद करता है जब यह मधुमेह विरोधी दवा ग्लिबेक्लेमाइड (glibenclamide) से मिलकर काम करता है। इसलिए टाइप-2 मधुमेह (type 2 diabetic) रोगी के लिए यह मददगार साबित होता है।
अस्थि-सुषिरता (osteoporosis) से लड़ने में मदद करता है-
तिल में जिन्क और कैल्सियम होता है जो अस्थि-सुषिरता से संभावना को कम करने में मदद करता है।
शीघ्र प्रसव-
 शीघ्र प्रसव हो सके इसके लिये 70 ग्राम की मात्रा मे काले तिल कूटकर 24 घन्टें के लिये जल में भिगों दे। सुबह उन्हें छानकर प्रसव महिला को पीला दें। बच्चा शीघ्र हो जायेगा।
रक्त स्त्राव- प्रसूती या गर्भवती महिला के योनी मार्ग से रक्त निकलना बन्द नही हो तो तिल व जौ को कुटकर शक्कर मिलाकर शहद के साथ चाटना चाहिए।
रक्तार्श- लगभग 50 ग्राम काले तिलों को सोखने योग्य पानी में भिगोये। लगभग 30 मिनट जल में भीगे रहने के बाद उन्हें पीसकर उसमें लगभग एक चम्मच मक्खन एंव दो चम्मच मिश्री मिला दें। इसका प्रतिदिन दो बार सेवन करने से खूनी बवासीर (रक्तार्श) में लाभ होता है।



गर्भाशय की पीड़ा(Uterine Pain)-
तिलों को बारीक पीसकर तिल के ही तेल में मिला किंचित् गर्म करके नाभि के भाग में धीरे धीरे लेप करने या मलने (मर्दन करने) से शीत जन्यपीड़ा शान्त हो जाती है।
प्रमेह- तिल तथा अजवायन को दो एक के अनुपात में मिलाकर पीस लें और समान मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करवायें
पेट दर्द- 
 20-25 ग्राम साफ तिल चबाकर उपर से गर्म पानी पिलाने से पेट का दर्द ठीक हो जाता है। साथ ही तिलों को पीसकर लम्बा सा गोला बनाकर उसे तवे पर सहन करने योग्य करके पेट के उपर फिराने से अत्यन्त से अत्यन्त कष्टदायी पेट का दर्द (उदर शूल) भी शान्त हो जाता है।
सूजाक- 
15-15 ग्राम की मात्रा में काले तिल तथा देशी खाड बारीक पीसकर गाय के कच्चे दूध के साथ रोग की स्थिति के अनुसार सेवन करने से लाभ हो जाता है।

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12.11.15

अजवायन के रोग नाशक प्रयोग // Uses of Thyme to cure diseases


भारतीय खानपान में अजवाइन का प्रयोग सदियों से होता आया है। आयुर्वेद के अनुसार अजवाइन पाचन को दुरुस्त रखती है। यह कफ, पेट तथा छाती का दर्द और कृमि रोग में फायदेमंद होती है। साथ ही हिचकी, जी मचलाना, डकार, बदहजमी, मूत्र का रुकना और पथरी आदि बीमारी में भी लाभप्रद होती है।
सामान्य परिचय -
अजवाईंन की खेती सारे भारतवर्ष में होती है लेकिन पश्चिम बंगाल, दक्षिणी प्रदेश और पंजाब में अधिकता से पैदा होता है। इसके पौधे एक दो फुट ऊंचे और पत्ते छोटे आकार में कुछ कंटीले होते हैं। डालियों पर सफेद फूल गुच्छे के रूप में लगते हैं, जो पककर एवं सूख जाने पर अजवाइन के दानों में परिवर्तित हो जाते हैं। ये दाने ही हमारे घरों में मसाले के रूप में और औषधियों में उपयोग किए जाते हैं।
जरूरी सावधानियाँ -
1. अजवाइन पित्त प्रकृति वालों में सिर दर्द पैदा करती है और दूध कम करती है।
2. अजवाइन ताजी ही लेनी चाहिए क्योंकि पुरानी हो जाने पर इसका तैलीय अंश नष्ट हो जाता है जिससे यह वीर्यहीन हो जाती है। काढ़े के स्थान पर रस या फांट का प्रयोग बेहतर है।
3. अजवाइन का अधिक सेवन सिर में दर्द उत्पन्न करता है।
मात्रा (खुराक) : अजवाइन 2 से 5 ग्राम, तेल 1 से 3 बूंद तक ले सकते हैं।
गुण -
अजवाइन की प्रशंसा में आयुर्वेद में कहा गया है-“एका यमानी शतमन्न पाचिका” अर्थात इसमें सौ प्रकार के अन्न पचाने की ताकत होती है।
आयुर्वेदिक मतानुसार-
अजवाइन पाचक, तीखी, रुचिकारक (इच्छा को बढ़ाने वाली), गर्म, कड़वी, शुक्राणुओं के दोषों को दूर करने वाली, वीर्यजनक (धातु को बढ़ाने वाला), हृदय के लिए हितकारी, कफ को हरने वाली, गर्भाशय को उत्तेजना देने वाली, बुखारनाशक, सूजननाशक, मूत्रकारक (पेशाब को लाने वाला), कृमिनाशक (कीड़ों को नष्ट करने वाला), वमन (उल्टी), शूल, पेट के रोग, जोड़ों के दर्द में, वादी बवासीर (अर्श), प्लीहा (तिल्ली) के रोगों का नाश करने वाली गर्म प्रकृति की औषधि है।

यूनानी मतानुसार -
अजवाइन आमाशय, यकृत, वृक्क को ऊष्णता और शक्ति देने वाली, आर्द्रतानाशक, वातनाशक, कामोद्वीपक (संभोग शक्ति को बढ़ाने वाली), कब्ज दूर करने वाली, पसीना, मूत्र, दुग्धवर्द्धक, मासिक धर्म लाने वाली, तीसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है।
विभिन्न रोगों में अजवाइन से उपचार:-
1 पेट में कृमि (पेट के कीड़े) होने पर -
1) अजवायन के लगभग आधा ग्राम चूर्ण में इसी के बराबर मात्रा में कालानमक मिलाकर सोते समय गर्म पानी से बच्चों को देना चाहिए। इससे बच्चों के पेट के कीड़े मर जाते हैं। कृमिरोग में पत्तों का 5 मिलीलीटर अजवाइन का रस भी लाभकारी है।
2) अजवाइन को पीसकर प्राप्त हुए चूर्ण की 1 से 2 ग्राम को खुराक के रूप में छाछ के साथ पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
3) अजवाइन के बारीक चूर्ण 4 ग्राम को 1 गिलास छाछ के साथ पीने या अजवाइन के तेल की लगभग 7 बूंदों को प्रयोग करने से लाभ होता है।
4) अजवाइन को पीसकर प्राप्त रस की 4 से 5 बूंदों को पानी में डालकर सेवन करने आराम मिलता है।
5) आधे से एक ग्राम अजवाइन का बारीक चूर्ण करके गुड़ के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इसे दिन में 3 बार खिलाने से छोटे बच्चों (3 से लेकर 5 साल तक) के पेट में मौजूद कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
6) अजवाइन का आधा ग्राम बारीक चूर्ण और चुटकी भर कालानमक मिलाकर सोने से पहले 2 गाम की मात्रा में पिलाने से पेट में मौजूद कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
7) अजवाइन का चूर्ण आधा ग्राम, 60 ग्राम छाछ के साथ और बड़ों को 2 ग्राम चूर्ण और 125 मिलीलीटर छाछ में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। अजवाइन का तेल 3 से 7 बूंद तक देने से हैजा तथा पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
8) 25 ग्राम पिसी हुई अजवाइन आधा किलो पानी में डालकर रात को रख दें। सुबह इसे उबालें। जब चौथाई पानी रह जाये तब उतार कर छान लें। ठंडा होने पर पिलायें। यह बड़ों के लिए एक खुराक है। बच्चों को इसकी दो खुराक बना दें। इस तरह सुबह, शाम दो बार पीते रहने से पेट के छोटे-छोटे कृमि मर जाते हैं।
9) अजवाइन के 2 ग्राम चूर्ण को बराबर मात्रा में नमक के साथ सुबह-सुबह सेवन करने से अजीर्ण (पुरानी कब्ज), जोड़ों के दर्द तथा पेट के कीड़ों के कारण उत्पन्न विभिन्न रोग, आध्मान (पेट का फूलना और पेट में दर्द आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
10) पेट में जो हुकवर्म नामक कीडे़ होते हैं, उनका नाश करने के लिए अजवाइन का बारीक चूर्ण लगभग आधा ग्राम तक खाली पेट 1-1 घंटे के अंतर से 3 बार देने से और मामूली जुलाब (अरंडी तैल नही दें) देने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं। यह प्रयोग, पीलिया के रोगी और निर्बल पर नहीं करना चाहिए।


2. गठिया का दर्द -


1) जोड़ों के दर्द में पीड़ित स्थानों पर अजवाइन के तेल की मालिश करने से राहत मिलेगी।
2) गठिया के रोगी को अजवाइन के चूर्ण की पोटली बनाकर सेंकने से रोगी को दर्द में आराम पहुंचता है।
3) जंगली अजावयन को अरंड के तेल के साथ पीसकर लगाने से गठिया का दर्द  ठीक होता है।
4) अजवाइन का रस आधा कप में पानी मिलाकर आधा चम्मच पिसी सोंठ लेकर
ऊपर से इसे पीलें। इससे गठिया का रोग ठीक हो जाता है।
5) 2-3 ग्राम दालचीनी पिसी हुई में 3 बूंद अजवाइन का तेल डालकर सुबह-शाम
सेवन करें। इससे गठिया- दर्द् ठीक होता है।
3. मिट्टी या कोयला खाने की आदत -
एक चम्मच अजवाइन का चूर्ण रात में सोते समय नियमित रूप से 3 हफ्ते तक खिलाएं। इससे बच्चों की मिट्टी खाने की आदत छूट जाती है।
4. पेट में दर्द -
एक ग्राम काला नमक और 2 ग्राम अजवाइन गर्म पानी के साथ सेवन कराएं।
5. स्त्री रोगों में -
प्रसूता (जो स्त्री बच्चे को जन्म दे चुकी हो) को 1 चम्मच अजवाइन और 2 चम्मच गुड़ मिलाकर दिन में 3 बार खिलाने से कमर का दर्द दूर हो जाता है और गर्भाशय की शुद्धि होती है। साथ ही साथ भूख लगती है व शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है तथा मासिक धर्म की अनेक परेशानियां इसी प्रयोग से दूर हो जाती हैं। नोट : प्रसूति (डिलीवरी) के पश्चात योनिमार्ग में अजवाइन की पोटली रखने से गर्भाशय में जीवाणुओं का प्रवेश नहीं हो पाता और जो जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं वे नष्ट हो जाते है। जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए योनि-मार्ग से अजवाइन का धुंआ भी दिया जाता है तथा अजवाइन का तेल सूजन पर लगाया जाता है।
6. खांसी -
1) एक चम्मच अजवाइन को अच्छी तरह चबाकर गर्म पानी का सेवन करने से लाभ होता है।
2) रात में चलने वाली खांसी को दूर करने के लिए पान के पत्ते में आधा चम्मच अजवाइन लपेटकर चबाने और चूस-चूसकर खाने से लाभ होगा। 1 ग्राम साफ की हुई अजवाइन को लेकर रोजाना रात को सोते समय पान के बीडे़ में रखकर खाने से खांसी में लाभ मिलता है।
3) जंगली अजवाइन का रस, सिरका तथा शहद को एक साथ मिलाकर रोगी को रोजाना दिन में 3 बार देने से पुरानी खांसी, श्वास, दमा एवं कुक्कुर खांसी (हूपिंग कफ) के रोग में लाभ होता है।
4) अजवाइन के रस में एक चुटकी कालानमक मिलाकर सेवन करें। और ऊपर से गर्म पानी पी लें। इससे खांसी बंद हो जाती है।
5) अजवाइन के चूर्ण की 2 से 3 ग्राम मात्रा को गर्म पानी या गर्म दूध के साथ दिन में 2 या 3 बार लेने से भी जुकाम सिर दर्द, नजला, मस्तकशूल (माथे में दर्द होना) और कृमि (कीड़ों) पर लाभ होता है।
6) कफ अधिक गिरता हो, बार-बार खांसी चलती हो, ऐसी दशा में अजवाइन का बारीक पिसा हुआ चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, घी 2 ग्राम और शहद 5 ग्राम में मिलाकर दिन में 3 बार खाने से कफोत्पित्त कम होकर खांसी में लाभ होता है।
7) खांसी तथा कफ ज्वर यानि बुखार में अजवाइन 2 ग्राम और छोटी पिप्पली आधा ग्राम का काढ़ा बनाकर 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में सेवन करने से लाभ होता है।
8) 1 ग्राम अजवाइन रात में सोते समय मुलेठी 2 ग्राम, चित्रकमूल 1 ग्राम से बने काढ़े को गर्म पानी के साथ सेवन करें।
9) 5 ग्राम अजवाइन को 250 मिलीलीटर पानी में पकायें, आधा शेष रहने पर, छानकर नमक मिलाकर रात को सोते समय पी लें।
10) खांसी पुरानी हो गई हो, पीला दुर्गन्धमय कफ गिरता हो और पाचन क्रिया मन्द पड़ गई हो तो अजवाइन का जूस दिन में 3 बार पिलाने से लाभ होता है।
7. बिस्तर में पेशाब करना -
सोने से पूर्व 1 ग्राम अजवाइन का चूर्ण कुछ दिनों तक नियमित रूप से खिलाएं।
8. बार पेशाब आना-
1) 2 ग्राम अजवाइन को 2 ग्राम गुड़ के साथ कूट-पीसकर, 4 गोली बना लें, 3-3 घंटे के अंतर से 1-1 गोली पानी से लें। इससे बहुमूत्र रोग दूर होता है।
2) अजवाइन और तिल मिलाकर खाने से बहुमूत्र रोग ठीक हो जाता है।
3) गुड़ और पिसी हुई कच्ची अजवाइन समान मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच रोजाना 4 बार खायें। इससे गुर्दे का दर्द भी ठीक हो जाता है।
4) जिन बच्चे को रात में पेशाब करने की आदत होती है उन्हें रात में लगभग आधा ग्राम अजवाइन खिलायें।

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

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