19.9.15

तुलसी कई रोगों में उपकारी// Basil beneficial in many diseases




     हिन्दू धर्म में तुलसी  एक पूजनीय पौधा है। परन्तु पूजा के अलावा तुलसी के पत्तों में काफी सारे औषधीय गुण  समाहित है | यहाँ हम तुलसी की उपयोगिता पर विवेचना  कर रहे हैं| 
      तुलसी का पौधा काफी तेजी से उग जाता है, लेकिन कभी पेड़ नहीं बनता। अमूमन इसकी ऊंचाई २-३  फीट ही रहती है। लेकिन इतना छोटा सा यह पौधा हमें बड़ी-बड़ी बीमारियों से बचाता है, जैसे कि किडनी के रोग से बचाव, दिल की बीमारी से बचाव, और भी कई सारे रोगों की एक दवा है ‘तुलसी’।
किडनी की पथरी-
लेकिन इसे भिन्न-भिन्न रोगों का इलाज करने के लिए कैसे इस्तेमाल करना है, यह जान लीजिए। यदि किसी को किडनी की पथरी है, तो वह तुलसी की पत्तियों को उबालकर बनाया गया काढ़ा शहद के साथ नियमित रूप से 1 माह तक पीए, उसे आराम मिलना आरंभ हो जाएगा। इसके प्रयोग से अपने आप ही कुछ समय के बाद पथरी मूत्र मार्ग से बाहर निकल आती है।

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मूत्र समस्या का बिना आपरेशन 100% समाधान

दिल की बीमारी-

तुलसी की पत्तियां खून में बन रहे कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करती हैं, इसलिए यह हृदय रोग से ग्रसित मरीजों के लिए वरदान साबित होती हैं। जिन्हें दिल की बीमारी हुई हो, उन्हें तुलसी के रस का सेवन नियमित रूप से करना चाहिए। केवल तुलसी के अलावा यदि इसके साथ हल्दी भी मिलाकर पानी पीया जाए तो अधिक लाभकारी होता है।

संक्रमण हो तो-

लेकिन जिन्हें रोग है केवल उनके लिए ही क्यों, किसी ही आम व्यक्ति के लिए तुलसी का रोज़ाना सेवन करना फायदेमंद है। उदाहरण के लिए, यदि फेस पर किसी तरह का कोई संक्रमण बन रहा है या त्वचा के निखार के लिए भी तुलसी के पानी का इस्तेमाल किया जाता है।

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चमकदार त्वचा के लिए-

आप कुछ घंटों के लिए गुनगुने पानी में तुलसी के पत्ते डालकर रख दें, बाद में इससे मुंह धो लें। रोज़ाना यह 2-3 बार करेंगे तो आपको अपनी त्वचा में एक चमकदार फर्क महसूस होगा।

थकान को करे दूर-

अब हम आपको तुलसी का एक ऐसा फायदा बताने जा रहे हैं, जिसे जानने के बाद आप जरूर इसका इस्तेमाल आरंभ कर देंगे। विशेषज्ञों के अनुसार तुलसी के इस्तेमाल से थकान दूर होती है। अब थकान तो आजकल हर दूसरे व्यक्ति को महसूस होती है, तो फिर सोच क्या रहे हैं।

रोज़ाना करें इस्तेमाल-

रोज़ाना तुलसी के पानी का सेवन करें या फिर केवल इसे चाय में डालकर भी पी सकते हैं। इससे चाय तो स्वादिष्ट लगती ही है, साथ ही तुलसी की पत्तियां शरीर से सारी थकान छू-मंतर कर देती हैं। 



25.7.15

त्वचा के रोगों का ईलाज गीली मिट्टी से //Treatment of skin diseases with wet soil



       
   शरीर में फोड़े-फुंसी, खुजली, दाद-खाज आदि सभी प्रकार के चर्म रोग प्रायः तब होते हैं, जब हमारी त्वचा पसीने के रूप में विकारों को निकालने में असमर्थ हो जाती है। नहाने में साबुन का अत्यधिक प्रयोग और व्यायाम की कमी इसका प्रमुख कारण होते हैं। साबुन तरह-तरह के केमिकलों से बने होते हैं, जो बाहर से त्वचा को भले ही साफ कर देते हों, लेकिन रोम-छिद्रों में घुसकर उनका मार्ग अवरुद्ध कर देते हैं और पसीने का निकलना रोक देते हैं।
रोम-छिद्रों से हमारा शरीर सांस भी लेता है। रोम-छिद्र बन्द हो जाने से न केवल उसे सांस लेने में रुकावट आती है, बल्कि जो विकार पसीने के रूप में निकलना चाहिए वह भी रुक जाता है और एकत्र होने लगता है। इसके अलावा केमिकल खून में भी मिल जाते हैं, जिससे खून खराब होता है और अनेक प्रकार के चर्म रोगों की भूमिका बन जाती है।
कोई भी चर्म रोग हो जाने पर सबसे पहला उपाय है सभी प्रकार के नहाने के साबुनों और बाहरी तेलों आदि का प्रयोग बन्द कर देना। इसके स्थान पर स्नान करते समय गीले किये हुए रूमाल या उसी आकार के तौलिये से शरीर को रगड़ना चाहिए। इससे न केवल रोम-छिद्र खुल जाते हैं, बल्कि शरीर का भी मालिश के रूप में अच्छा व्यायाम हो जाता है। वैसे तो गीले तौलिये से रगड़ने से ही त्वचा की बाहरी सफाई अच्छी तरह हो जाती है, फिर भी यदि कभी-कभी ऐसा लगता हो कि त्वचा अच्छी तरह साफ नहीं हुई है या बाहरी गन्दगी लग गयी हो, तो सप्ताह में केवल एक बार नहाने के साबुन का उपयोग किया जा सकता है। यह साबुन भी खादी भंडारों में मिलने वाला नीम साबुन या चन्दन साबुन होना चाहिए।

सिर्फ दो हफ्ते मे पेट की फेट गायब 

 केवल इतना करने से अधिकांश त्वचा रोग समाप्त हो जाते हैं, क्योंकि विकारों को निकलने का मार्ग मिल जाता है। यदि रोग अधिक पुराना हो, तो जल्दी ठीक करने के लिए उस स्थान पर गीली मिट्टी का लेप करना चाहिए। ऐसी मिट्टी पूरी तरह साफ की हुई होनी चाहिए और उसमें किसी भी प्रकार की गन्दगी, कूड़ा-करकट या कंकड़ नहीं होने चाहिए। इस मामले में चिकनी मिट्टी और पीली मिट्टी सबसे अच्छी होती है। सड़कों और गड्ढों की खुदाई के समय निकलने वाली मिट्टी को साफ करके उसका प्रयोग इस कार्य के लिए किया जा सकता है। वह भी न मिलने पर बाजार में सर्वत्र उपलब्ध मुल्तानी मिट्टी को पानी में घिसकर या भिगोकर उसका उपयोग करना चाहिए।

सहवास अवधि  बढ़ाने के नुस्खे 

यदि पूरे शरीर पर ही त्वचा रोग हों, तो पूरे शरीर पर मिट्टी का लेप करना चाहिए। लेप करने के बाद एकाध घंटे सुहाती धूप में बैठना चाहिए। इससे रोग जल्दी जायेगा। धूप सेवन के बाद अच्छी तरह रगड़कर नहा लेना चाहिए। यह क्रिया दो-चार बार करने से सभी प्रकार के चर्म रोगों से सहज में ही मुक्ति पाई जा सकती है। इसके साथ ही चर्म रोगियों को हर प्रकार के मिर्च-मसालों, अचार-खटाई, तली-भुनी चीजों और बाजारू पेयों तथा खाद्यों से परहेज करना चाहिए। इनके स्थान पर हरी सब्जियों, फलों और अंकुरित अन्न का उपयोग अधिक मात्रा में करना चाहिए।
पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

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1.2.15

यूरिन थेरापी :मूत्र से करें रोगों का इलाज // Urine Therapy: urine to treat diseases


परिचय-
मूत्र चिकित्सा के बारे मे जहा बाइबिल मे जिक्र है वही आयुर्वेद मे इसका विस्तृत विवरण और रोगो का निदान है आयुर्वेद मे 9 प्रकार के मूत्र के बारे मे जिक्र है वर्तमान मे गोमूत्र का प्रचलन बड़ी तेजी से बढने का मुख्य कारण इससे उन रोगो का निदान भी हो रहा है जिनका प्रचलित किसी भी पद्धति मे इलाज नही है ,परन्तु यह लेख स्वमूत्र चिकित्सा के बारे मे और अनुभव के बाद लिखा हुआ है सामान्यतः स्वमूत्र चिकित्सा का सिद्धांत ,प्राकृतिक भोजन मे ही पूर्ण स्वास्थ्य के तत्व होते है के आधार पर है जैसे जैसे शरीर की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे शारारिक क्षमता घटने के कारण स्वास्थ्य के मुख्य तत्व मूत्र मे विसर्जित होने लगते है यदि इन्ही तत्वो को पुनः लिया जाए तो शरीर स्वस्थ्य होने लगता है चिकित्सा मे स्वमूत्र का मुख्य तीन प्रकार से प्रयोग किया जाता है

कालमेघ के उपयोग ,फायदे

1.बाह्य रूप से -इसमे शरीर पर मालिश इत्यादि है
2.अतः करण रूप से -इसमे स्वमूत्र को पिया जाता है
3.गंध द्वारा- स्वमूत्र की गंध को सुंघकर चिकित्सा की जाती है

स्वमूत्र का प्रयोग -
अतः करण रूप मे इसका प्रयोग जहा इसको तुरंत विसर्जित वाले का सेवन किया जाता है वही बाह्य रूप मे इसका प्रयोग तुरंत विसर्जित से लेकर 9 दिन तक पुराने वाले का प्रयोग किया जाता है इसमे प्रतिदिन एक बोतल भरतेहुए 9 बोतल भर लेते हैं 10 वे दिन ,पहली दिन वाली बोतल अर्थात 9 दिन पुराने मूत्र से शरीर पर चर्म रोग ,अन्य दर्दों वाले स्थानो पर मालिश लगातार 15-20 दिन की जाए तो चर्म व अन्य रोग दूर हो जाते हैं वही तुरंत विसर्जित वाले मूत्र को आंख,कान दर्द, जैसे अनेक रोगो मे इसकी बूंद डालकर इसका प्रयोग किया जा सकता है 

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

यदि बॉल झडते है तब इससे इनको धोया जाए तो उनका झड़ना बंद हो जाता है परहेज के नाम पर मात्र साबुन शेम्पू का प्रयोग नही करना है खाने के नाम पर मात्र सात्विक भोजन करना है ये तो मात्र कुछ उदहारण है मात्र उपरोक्त सरल विधि विधान से स्वमूत्र चिकित्सा द्वारा लगभग सभी रोगों का इलाज है इस पद्धति मे पहले रोग अपने चरम अवस्था मे आकर धीमे-धीमे उसका शमन होने लगता है यदि सामान्य अवस्था मे स्वमूत्र चिकित्सा को किया जाए तो तो शरीर उत्तम स्वास्थ्य को प्राप्त करता जाता है तब स्वमूत्र को जिसे हम सबसे घ्रृणित व त्याज्य मानते है वह तो हमारी सभी रोगो की रामवाण दवा है अर्थात एक अनार( स्वमूत्र),सौ बीमार की दवा है यह स्वमूत्र चिकित्सा मानव के लिए ही नही ,पशुयों के लिए भी उतनी उपयोगी है जितनी मानव के लिए .वैसे दवा दवे(रहस्य) की होती है और प्राण के मूल्य पर ,औषधि का हर रूप स्वीकार होता है तब क्या समाज मे स्वमूत्र का औषधि रूप प्रचलित हो पाएगा ? जिसको कभी हमारे भूतपूर्व प्रधान मंत्री मोरार जी देसाई ने जीवन जल का नाम दिया था अर्थात कलियुग का गंगाजल.

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*


स्वमूत्र चिकित्सा का अर्थ है स्वयं के मूत्र द्वारा विभिन्न बीमारियों का उपचार। इस पद्धति में न तो रोगी की नाड़ी देखने की आवश्यकता है, न एक्स-रे लेने की। न थर्मामीटर लगाना है, न सूई की जरूरत। न दवा और पथ्य का सिरदर्द है और न धन या समय खर्च करने की अनिवार्यता। इसमें स्वमूत्र ही निदानकर्ता, चिकित्सक एवं दवा है। रोगी स्वयं बिना खर्च और बिना किसी परिश्रम के स्वमूत्र सेवन कर रोगमुक्त हो सकता है।
 स्वमूत्र चिकित्सा के माध्यम से कई असाध्य बीमारियों का उपचार भी संभव है।स्वमूत्र चिकित्सा निम्न छह प्रकार से की जाती है|स्वमूत्र से सारे शरीर की मालिश स्वमूत्रपान,केवल स्वमूत्र और पानी के साथ उपवास,स्वमूत्र की पट्टी रखना,स्वमूत्र के साथ अन्य प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग|स्वमूत्र को सूर्य किरण देकर प्रावीष्ठ बड़े फोड़े, चमड़ी की सूजन, चीरे, जख्म, फफोले और आग के घाव आदि को छोड़कर शेष सभी रोगों के उपचार का आरंभ स्वमूत्र मालिश से करना चाहिए। मालिश के लिए 36 घंटे से सात-आठ दिन का पुराना स्वमूत्र ही अत्यधिक फायदेमंद सिद्ध होता है। पुराना होने पर इसमें अमोनिया नामक द्रव्य बढ़ जाता है। अमोनिया के कारण यह मूत्र शरीर के लाखों लाख छिद्रों में जल्दी से और ज्यादा परिमाण में प्रविष्ठ>हो जाता है।

प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 


प्रत्येक व्यक्ति को मालिश के लिए प्रतिदिन करीब आधा लीटर स्वमूत्र की आवश्यकता होती है। सात बड़ी शीशियों में सात दिन के पुराने स्वमूत्र का संग्रह क्रम में रखा जाए। शीशियों का मुँह हमेशा बन्द रखा जाए, ताकि उसमें कोई भी जीव-जन्तु मरने न पाए। मानव मूत्र कृमिनाशक है। उसमें कीड़े नहीं पड़ते। शीशियाँ इस क्रम में रखी जाएँ, ताकि जो शीशी खाली हो जाए वह भरती जाए। सर्दी की ऋतु में या मनुष्य की प्रकृति के अनुसार रखा हुआ मूत्र थोड़ा गरम भी किया जा सकता है।पहले रखे हुए स्वमूत्र में से एक पाव मूत्र एक कटोरी में डालकर तलवे से कमर तक मालिश करके सुखा दें और जो गंदा अंश कटोरी में बचे उसे गिरा दें। फिर एक पाव लेकर कमर से सिर तक मालिश करनी चाहिए। मालिश हलके हाथ से करनी चाहिए, ताकि रोगी या मालिश कराने वाले को कष्ट न हो। हाथ ऊपर-नीचे ले जाना चाहिए। मालिश कितनी देर की जाए यह आवश्यकतानुसार तय किया जा सकता है। अगर मालिश के लिए अपना मूत्र पर्याप्त न हो, तो दूसरे स्वस्थ व्यक्ति का (जो उसी प्रकार का आहार लेता हो) मूत्र ले सकते हैं।सभी रोग में, स्वमूत्र का प्रयोग मालिश से प्रारंभ किया जाए तो पहले सप्ताह में ही फायदा झलकने लगता है।

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13.9.14

रेकी (reiki) एक असरदार चिकित्सा पद्धति है.


 
रेकी चिकित्सा का उपयोग तनाव मुक्त जीवन और संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए किया जाता है\ व्यवसायिक अभ्यास के लिए। तन, मन और आत्मा के उत्थान के लिए। पुरातन भारतीय संस्कृति में मन के साथ शरीर के स्वास्थ्य को भी काफी महत्व दिया गया है। मन का स्वास्थ्य उŸाम रखने एवं मनोशांति प्राप्त करने के लिए शरीर का व्याधि-मुक्त होना अनिवार्य है।


   रेकी मनुष्य के मन एवं शरीर का संतुलन प्रस्थापित करने और मानसिक एवं शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्ति का एक नैसर्गिक एवं सरल उपाय है। रेकी का अर्थ रेकी एक जापानी शब्द है। इसमें ‘रे’ का अर्थ है विश्व व्यापी यानी संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली तथा ‘की’ अर्थ है ‘‘प्राण अथवा जीवन शक्ति’’ अर्थात




रेकी का अर्थ ‘‘संपूर्ण विश्व में व्याप्त रहने वाली प्राण अथवा जीवन शक्ति’’। यह एक निसर्ग शक्ति है। जो सभी प्राणी मात्र में निवास करती है तथा मनुष्य, प्राणी, पेड़, जलचर आदि सभी को गतिमान करती है। मनुष्य में यह शक्ति जन्मतः विद्यमान है। शरीर में इसकी मात्रा कम होने से शरीर में रोगों का निर्माण होता है। इस कम हुई शक्ति को रेकी के माध्यम से पुनः जागृत करके हम अपने रोगों का इलाज स्वयं कर सकते हैं।
रेकी न तो कोई धर्म है और न ही कोई पंथ है। रेकी का तंत्र, मंत्र आदि के साथ कोई संबंध नहीं है। रेकी हिप्नोटिज्म (सम्मोहन) या पारसम्मोहन न होकर केवल एक योग उपचार विधि है।



 रेकी उपचार में ध्यान रखने योग्य प्रमुख सावधानियां-

प्रत्येक बिंदु पर कम से कम 3 मिनट रेकी देना चाहिए। रेकी कभी सहस्रार चक्र और नाभि चक्र पर न दें। ये ऊर्जा के आगमन के द्वार हंै। रेकी देते समय अंगूठे को अंगुलियों से अलग न रखें। अंगूठा और अंगुलियां मिली हुई हों।



हाथों को कप की शेप में बनाए रखें, ताकि ऊर्जा का प्रवाह अधिक गतिमान हो सके। स्त्रियों को हृदय चक्र पर रेकी देते समय हाथों को 2-3 इंच दूर की स्थिति में रखना चाहिए। रोगी और चिकित्सक दोनों के पैर क्राॅस की स्थिति में नहीं होने चाहिए।


   

उपचार देने से पहले हाथों को धो लेना आवश्यक है। पूरे शरीर में रेकी देते समय शरीर के अंगों का क्रम नहीं बदलना चाहिए। दूसरों को रेकी देते समय लेटने के लिए रोगी से कहें, जो अपेक्षाकृत ज्यादा लाभप्रद है, किंतु बैठाकर, खड़ा करके, सिर अथवा मुंह झुकाकर भी रेकी दी जा सकती है। यह आवश्यक नहीं है कि स्पर्श करके ही रेकी की जाए। स्त्री के बायीं ओर पुरुष के दायीं ओर बैठकर रेकी दें|। आप हाथों को 1 से 4 इंच दूर रखकर भी रेकी दे सकते हैं। हृदय चक्र को ऊर्जा देते समय ध्यान रहे कि दाहिना हाथ बायें हाथ के नीचे रहे तथा दाहिना हाथ शरीर को स्पर्श करे।
    अन्य स्थितियों में जैसा चाहे रखें। छोटे बच्चे को गोद में लेकर रेकी देना अच्छा होता है। रेकी देते समय आगे सिर झुकाकर न बैठें अन्यथा ऊर्जा खोने लगेगी। रेकी देने से पूर्व इनर्जी बाॅडी को स्वीप कर लें। इससे शरीर में ऊर्जा की ग्रहणशीलता बढ़ जाएगी। रेकी देने के पश्चात् दाहिना हाथ सामने हृदय-चक्र पर रखकर लेट जाएं। बायां हाथ सामने ‘हारा’ पर रखें। इससे आप की नेगेटिव एनर्जी बायें हाथ के माध्यम से ‘पेडू’ से निष्क्रमित होगी तथा दायें हाथ से आप हृदय को ऊर्जा दे सकेंगे।

    रेकी सिद्धहस्त व्यक्ति की हथेलियों में यह प्राण ऊर्जा वायुमंडल में सब जगह व्याप्त भंडार से प्राप्त होती है। यह प्राण ऊर्जा व्यक्ति के ऊपरी चार चक्रों के माध्यम से होकर पहंुचती है। अतः व्यक्ति के लिए स्वीकार भाव और ग्रहण शीलता दोनों बहुत जरूरी है। एक बार रेकी शक्ति प्राप्त कर लेने के बाद व्यक्ति में यह आजीवन बनी रहती है। यह आवश्यक नहीं कि केवल रोग ग्रस्त व्यक्ति ही रेकी उपचार प्राप्त करे। स्वस्थ व्यक्ति भी रेकी की ऊर्जा प्राप्त कर सकते हैं।

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    किसी भी वैकल्पिक उपचार के साथ-साथ रेकी की भूमिका सहायक रूप में व्याधि दूर करने में दु्रत गति से सहायक होती है। रेकी स्टेज 1 में 20 प्रतिशत रेकी शक्ति प्राप्त होती है। तत्पश्चात किसी भी व्यक्ति का उपचार किया जा सकता है। रेकी स्टेज 1 प्राप्त करने के करीब तीन माह के उपरांत रेकी 2 का प्रशिक्षण लिया जा सकता हैे। रेकी स्टेज 2 में रेकी स्टेज 1 से 4 गुनी शक्ति अधिक बढ़ जाती है क्योंकि स्टेज 2 में तीन सिंबल के साथ शक्ति प्रदान की जाती है।


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     रेकी अत्यंत सुरक्षित उपचार पद्धति है। इससे किसी भी प्रकार की क्षति होने की संभावना नहीं रहती है। रेकी का उपचार व्यक्ति, पशु, कुŸो, पेड़-पौधों, बीज, फूल आदि सभी पर समान रूप से किया जा सकता है। रेकी चिकित्सा पद्धति में किसी दूरस्थ व्यक्ति का भी उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता है, किंतु इस प्रकार का उपचार स्टेज 2 रेकी के सिद्धहस्त व्यक्ति ही अपने स्थान पर रहकर कर सकते हैं। रेकी की शक्ति रेकी मास्टर द्वारा ही किसी भी व्यक्ति को प्रदान की जा सकती है। ध्यान रहे कि रेकी केवल उस अंग तक ही सीमित नहीं रहती जिस पर आप हाथ रखते हैं। यह शरीर के अन्य भागों तक भी स्वयं भी जा पहुंचती है। उदाहरणार्थ- यदि आप सिर पर हाथ रखेंगे, तो उसकी ऊर्जा पेट तक भी पहुंचेगी। रेकी की ऊर्जा ब्रह्मांडीय ऊर्जा है, अतः रेकी चिकित्सक को अपनी ऊर्जा में कोई कमी नहीं होने पाती है।

*किडनी में क्रिएटिनिन और यूरिया की समस्या के घरेलू उपचार* 

वस्तुतः तथ्य यह है कि ऊर्जा देने से घटती नहीं वरन् बढ़ती है। रेकी उपचारक मात्र एक Ÿाा माध्यम होता है। वस्तुतः वह स्वयं अपने को कर्Ÿाा भाव से पृथक रखता है। रेकी देने के समय यह नियम याद रखें कि रेकी तभी दी जाए जब कोई इसे मांगे। इसे किसी को जबरदस्ती देने का प्रयास न करें। रेकी चिकित्सक को अधिक परिणामोन्मुखी नहीं होना चाहिए। परिणाम को परमात्मा के हाथों में ही मानना चाहिए। रेकी प्राप्त करने वाले व्यक्ति को गर्मी, ठंडक, दबाव, कंपकंपी आदि की अनुभूतियां हो सकती है, अतः इससे घबराएं नहीं। रेकी किसी भी धर्म या देवी-देवता से संबंधित नहीं है। किसी भी धर्म को मानने वाला व्यक्ति रेकी शक्ति प्राप्त कर सकता है। रेकी के लिए पूजा-पाठ भी आवश्यक नहीं है। रेकी निर्जीव पदार्थांे पर भी प्रभाव डालती है। रेकी कहीं भी तथा किसी भी परिस्थिति में दी जा सकती है। वस, ट्रेन अथवा वायुयान में यात्रा करते समय भी रेकी दे सकते हैं।
    रेकी देने वालों को लहसुन, प्याज, तंबाकू, मदिरा तथा तेज किस्म की सुगंधियों से बचना चाहिए। रेकी देते समय धूम्रपान कदापि न करें। रेकी देने वाले व्यक्ति को शांतचित होना चाहिए तथा रेकी देने के पूर्व और पश्चात मैत्री भाव भरे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। रेकी देते समय मध्यम स्वर का संगीत बजाया जाय, तो परिणाम और भी अच्छे आयेंगे। क्लासिकल संगीत भी उपयोगी है। स्थान की स्वच्छता का ध्यान भी रखना आवश्यक है। कमरे का तापमान 210 से अधिक न हो। अधिक ठंडे तापमान का कमरा भी उपयुक्त नहीं होता है। रेकी प्रेम का ही दूसरा नाम है। अतः रेकी देते समय हमारा व्यवहार प्रेमपूर्ण एवं करुणामय होना चाहिए। रेकी लेने वाले और देने वाले दोनों को ही ढीले एवं आरामदायक वस्त्र पहनने चाहिए। उपचार के समय घड़ी, चश्मा, बैल्ट, जूते, टाई आदि उतार दें।

नीम के पत्ते खाने के फायदे 

साधारण व्याधियों के लिए तीन दिन का रेकी उपचार करना चाहिए, जबकि पुरानी बीमारियों में इसका उपचार कम से कम 21 दिन तक अनिवार्य है। शरीर के सभी अंगों पर कम से कम 3 मिनट तक हथेलियां रखें। पहले संपूर्ण शरीर का उपचार करें| तत्पश्चात् जिस अंग में तकलीफ हो, वहां पर 20 से 30 मिनट तक उपचार करें। अगर समय के अभाव के कारण पूर्ण रेकी उपचार संभव न हो, तो मात्र तलवों व पैरों पर रेकी का उपचार करें।
अन्य चिकित्सा प्रणालियों के साथ रेकी का उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता है जैसे मालिश, प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेदिक होम्योपैथिक आदि के साथ भी कर सकते हैं। प्रत्येक उपचार में यह काफी सहायक हो सकती है। इसे आप्रेशन, हड्डी के प्लास्टर, चोट आदि में भी प्रयोग कर सकते हैं। एलोपैथिक दवाओं के साथ रेकी का उपचार उसकी गुणवŸाा को और बढ़ा देगा। रेकी में अब क्रिस्टल, डाउसिंग, पेंडुलम और स्केनिंग का प्रयोग भी किया जाने लगा है। तथापि रेकी कोई जादुई करिश्मा नहीं है। रेकी से मनुष्य अमर नहीं होता। रेकी जन्म एवं मृत्यु को नहीं रोकती। यह तो जीवन-काल को केवल आसान बनाने में मदद करती है|

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गुर्दे के रोगों की घरेलू,हर्बल चिकित्सा





गुर्दा शरीर का एक महत्वपूर्ण अंग है इसे अंग्रेजी में किडनी कहा जाता है। गुर्दे का वजन लगभग 150 ग्राम होता है| इसका आकार सेम के बीज या काजू की भांति होता है। यह शरीर में पीछे कमर की ओर रीढ़ के ढांचे के ठीक नीचे के दोनों सिरों पर स्थित होते हैं। शरीर में दो गुर्दे होते हैं। गुर्दे लाखों छलनियों तथा लगभग 140 मील लंबी नलिकाओं से बने होते हैं। गुर्दों में उपस्थित नलिकाएं छने हुए द्रव्य में से जरूरी चीजों जैसे सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम आदि को दोबारा सोख लेती हैं और बाकी अनावश्यक पदार्थों को मूत्र के रूप में बाहर निकाल देती हैं। 

किसी ख़राबी की वजह से यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर देता है तो उस स्थिति में दूसरा गुर्दा पूरा कार्य संभाल सकता है।


गुर्दे शरीर को विषाक्‍त होने से बचाते हैं और स्वस्थ रखते हैं। गुर्दों का विशेष संबंध हृदय, फेफड़ों, यकृत और प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी प्रभावित हो सकते हैं। जब गुर्दे ख़राब होते हैं तो रोगी का रक्‍तचाप बढ़ जाता है और वह धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है।



गुर्दे के कार्य -
• गुर्दा रक्त में से जल और बेकार पदार्थो को अलग करता है।
• शरीर में रसायन पदार्थों का संतुलन, हॉर्मोन्स छोड़ना, रक्तचाप नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करता है।
• यह लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में भी सहायता करता है।
• इसका एक और कार्य है विटामिन-डी का निर्माण करना, जो मनुष्य की हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत बनाता है।

• गुर्दे रक्‍त में मौजूद विकारों को छान कर साफ़ करते हैं और शरीर को स्वच्छ रखते हैं।
• खून को साफ कर मूत्र बनाने का कार्य भी गुर्दों के द्वारा ही पूरा होता है।
• गुर्दे खून में उपस्थित अनावश्यक कचरे को मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल देते हैं।
• गुर्दों के सही से काम न करने पर शरीर रोग ग्रस्त हो जाता है।


गुर्दे के रोग के कारण : -

• लगातार दूषित पदार्थ खाने, दूषित जल पीने और नेफ्रॉन्स के टूटने से गुर्दे के रोग उत्पन्न होते हैं।
• किडनी के लिए मधुमेह, पथरी और हाईपरटेंशन (उच्च रक्तचाप) बडे़ जोखिम कारक हैं।
• गंदा मांस, मछली, अंडा, फल और भोजन और गंदे पानी का सेवन गुर्दे की बीमारी का कारण बन सकते हैं।• भोजन और पेय पदार्थों में भी कीटाणुनाशकों, रासायनिक खादों, डिटरजेंट, साबुन, औद्योगिक रसायनों के अंश पाएं जाते हैं। ऐसे में फेफड़े और जिगर के साथ ही गुर्दे भी सुरक्षित नहीं हैं।
• शरीर में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण गुर्दे शरीर से व्यर्थ पदार्थो को निकालने में अक्षम हो जाते हैं |

• गुर्दे के रोग का बहुत समय तक पता नहीं चलता, लेकिन जब भी कमर के पीछे दर्द उत्पन्न हो तो इसकी जांच करा लेनी चाहिए।


गुर्दे के रोग -



गुर्दे के गंभीर रोगों को दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
1. एक्यूट रीनल फेल्योर -
इसमें गुर्दे आंशिक अथवा पूर्ण रूप से काम करना बंद कर देते हैं परंतु लगातार उपचार द्वारा यह धीरे-धीरे पुन: कार्यशील हो जाते हैं।
2. क्रोनिक रीनल फेल्योर-
यह तब होती है जब किडनी ख़राब हो या तीन माह या इससे अधिक समय से काम नहीं कर रही हो। इसका यदि ठीक प्रकार से इलाज न हो तो क्रोनिक किडनी समस्या बढ़ती जाती है। वृक्क (गुर्दा) रोग में क्रोनिक किडनी रोग के पांच चरण होते हैं। किडनी समस्या के अंतिम चरण में गुर्दे केवल पंद्रह प्रतिशत ही कार्य कर पाते हैं। इसमें नेफ्रॉन्स की अत्यधिक मात्रा में क्षति हो जाती है जिसके कारण गुर्दो की कार्य क्षमता लगातार कम होती चली जाती है।

गुर्दे की जांच -

उपर्युक्त दोनों तरह के रोगों के निदान के लिए सबसे पहले रक्त यूरिया, नाइट्रोजन तथा क्रीएटनिन का रक्त परीक्षण करवाना चाहिए।
मूत्र जांच भी करा लेना चाहिए क्योंकि इससे यह पता चलता है कि गुर्दो की कार्यशीलता और कार्य क्षमता कैसी है।



लक्षण -

• जब गुर्दा किसी रोग से रोगग्रस्त हो जाता है तो मूत्र सम्बन्धी तकलीफ शुरू हो सकती है।
• आंखों के ‍नीचे सूजन या पैरों के पंजों में सूजन हो सकती है।
• पाचन क्रिया भी कमजोर पड़ जाती है।


प्राकृतिक चिकित्सा :



1- किडनी पैक -

प्राकृतिक चिकित्सा में साधारण सी दिखने वाली क्रियाएं शरीर पर अपना रोग निवारक प्रभाव छोडती हैं | किसी सूती या खादी के कपडे की पट्टी को सामान्य ठंडे जल में भिगोकर , निचोड़कर अंग विशेष पर लपेटने के पश्चात् उसके ऊपर से ऊनी कपडे की सूखी पट्टी इस तरह लपेटी जाती है कि अन्दर वाली सूती/खादी पट्टी पूर्ण रूप से ढक जाये |

किडनी पैक के लाभ -


    गुर्दों के अतिरिक्त पेट के समस्त रोगों,पुरानी पेचिस, कोलायिटिस,पेट की नयी-पुरानी सूजन,अनिद्रा,बुखार एवं स्त्रियों के गुप्त रोगों की रामबाण चिकित्सा है | इसे रात्रि भोजन के दो घंटे बाद पूरी रात तक लपेटा जा सकता है |

किडनी पैक के लिए आवश्यक साधन -


* खद्दर या सूती कपडे की पट्टी इतनी चौड़ी जो पेडू सहित नाभि के तीन-चार अंगुल ऊपर तक आ जाये एवं इतनी लम्बी कि पेट के तीन-चार लपेट लग सकें |
* सूती कपडे से दो इंच चौड़ी एवं इतनी ही लम्बी ऊनी पट्टी |


विधि -

     खद्दर या सूती पट्टी को ठन्डे पानी में भिगोकर अच्छी तरह से निचोड़ लें तत्पश्चात पेडू से नाभि के तीन – चार अंगुल ऊपर तक लपेट दें ,इसके ऊपर से ऊनी पट्टी इस तरह से लपेट दें कि नीचे वाली गीली पट्टी पूरी तरह से ढक जाये |एक से दो घंटा या सारी रात इसे लपेट कर रखें |


2- कमर (पीठ पर) की गर्म – ठंडी सेंक :-

     प्रातः कमर पर गर्म-ठंडी सेंक गुर्दों के लिए अत्यंत लाभदायक है | गर्म-ठंडी सेंक के लिए एक रबड़ की थैली में गर्म पानी भरें | एक बर्तन में खूब ठंडा पानी रख लें | गर्म सेंक रबड़ की थैली से एवं ठंडी सेंक पानी में एक छोटा तौलिया भिगोकर निम्नलिखित क्रम से करें -
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 1 मिनट
• गर्म सेंक – 3 मिनट ठंडी सेंक - 3 मिनट
   यदि गर्म सेंक के लिए रबड़ की थैली उपलब्ध न हो तो ठंडी सेंक की तरह गर्म पानी में छोटा तौलिया भिगोकर, हल्का निचोड़कर सेंक की जा सकती है | सेंक के दौरान तौलिया प्रति मिनट पुनः पानी में भिगोकर बदलते रहें |


आहार चिकित्सा एवं परहेज -

नियंत्रित आहार से खराब किडनी को ठीक किया जा सकता है।
• नियमित नींबू, आलू का रस और हमेशा शुद्ध जल का अधिक से अधिक सेवन करें।
• गुर्दे की सूजन से पीड़ित रोगी को भोजन करने के तुरंत बाद मूत्र त्याग करना चाहिए। इससे न सिर्फ गुर्दे की बीमारी से बचे रहेंगे बल्कि कमर दर्द, लिवर के रोग, गठिया, पौरुष ग्रंथि की वृद्धि आदि अनेक बीमारियों से भी बचाव होगा।
• गुर्दे के रोग में बथुआ फायदेमन्द होता है। पेशाब कतरा-कतरा सा आता हो या पेशाब रुक-रुककर आता हो तो इसका रस पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है।
• गुर्दे के रोगी को आलू खाना चाहिए। इसमें सोडियम की मात्रा बहुत पायी जाती है और पोटेशियम की मात्रा कम होती है।
• गुर्दे की खराबी से यदि पेशाब बनना बन्द हो गया हो तो मूली का रस 20-40 मिलीलीटर दिन में 2 से 3 बार पीना चाहिए।
• पुनर्नवा के 10 से 20 मिलीलीटर पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) का काढ़ा सेवन करने से गुर्दे के रोगों में बेहद लाभकारी होता है।
• गाजर और ककड़ी या गाजर और शलजम का रस पीने से गुर्दे की सूजन, दर्द व अन्य रोग ठीक होते हैं। यह मूत्र रोग के लिए भी लाभकारी होता है।

परहेज -

• ज्यादा मात्रा में दूध, दही, पनीर व दूध से बनी कोई भी वस्तु न खाएं।
• इस रोग से पीड़ित रोगी को मांस, मछली, मुर्गा, चॉकलेट, काफी, दूध, चूर्ण, बीयर, वाइन आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।

• गुर्दा रोग में सूखे फल(ड्राई फ्रूट), केक, पेस्ट्री, नमकीन, मक्खन नहीं खाना चाहिए।
• भोजन में मसालेदार भोज्य पदार्थ का सदा के लिए त्याग कर दें।
• नमक का प्रयोग कम से कम करें |
• तनाव और प्रदूषण से दूर रहें।

योग चिकित्सा :-

1. खड़े होकर किए जाने वाले आसन :
वृक्षासन, ताड़ासन,अंर्धचंद्रासन, 

त्रिकोणासन




और पश्चिमोत्तनासन।

2. बैठकर किए जाने वाले आसन :

उष्ट्रासन
और योगमुद्रा ।

3. लेटकर किए जाने वाले आसन : 


धनुरासन  और 
हलासन 
यदि उपरोक्त आसन न कर सकें तो सूर्यनमस्कार और खड़े रहकर किए जाने वाले अंग संचालन को नियमित करें। 




विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -







इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl






हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl








जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 

सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 




 केस रिपोर्ट 2-

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट






दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 
mg/dl

urea 22  mg/dl



21.10.10

चुंबक से करें रोगों का ईलाज// How to cure diseases with magnet therapy?








चुम्बक चिकित्सा क्या है?

विविध रोगों मे चुंबकीय शक्ति से रोग ग्रस्त अंगों एवं शारीरिक प्रणालियों को प्रभावित करने की विधि को चुंबक चिकित्सा कहते हैं। चुंबक थिरेपी में चुंबक का प्रयोग दो तरह से किया जाता है।
१. सार्वदैहिक चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग हथेलियों और पैरों के तलवों पर किया जाता है।
२. स्थानीय चुंबक चिकित्सा--इसमें चुंबक का प्रयोग रोग ग्रस्त भाग पर किया जाता है।
सार्वदैहिक प्रयोग के अंतर्गत उत्तरी ध्रुव एवं दक्षिणी ध्रुव वाले चुंबक का एक जोडा आवश्यक है। अब हमारे शरीर के विध्युतीय सह संबंध के आधार पर इनका उपयोग जरूरी है। लेकिन अधिकांश मामलों मे 



उत्तरी ध्रुव चुंबक का इस्तेमाल शरीर के दांये भाग पर ,आगे की तरफ़ और शरीर के ऊपरी भाग पर विशेषतौर पर किया जाता है। दक्छिणी ध्रुव चुंबक का प्रयोग शरीर के बांये भाग पर , पीठ पर और शरीर के निचले अंगों पर किया जाता है।
स्थानीय प्रयोग करते समय दर्द,सूजन ,रोग संक्रमण को अधिक महत्व देना होता है। सीधा नियम यह है कि जब रोग नाभि से ऊपर के हिस्सों में हो तो चुंबक हथेली पर लगावें। और अगर रोग नाभी से नीचे के भाग में हो तो चुंबक का प्रयोग तलवों पर करना चाहिये। रीढ की हड्डी की तकलीफ़ों, घुटना, पैर ,नाक और आंख के रोगों में जरूरत लगे तो दो तीन चुंबक एक साथ प्रयोग कर सकते हैं। उदाहरण के तौर पर अंगूठे में दर्द हो तो दो चुंबकों के बीच अंगूठा रखने से शीघ्र लाभ होता है।

चुंबक चिकित्सा के लाभ--

चुंबक चिकित्सा इतनी सरल है कि इसका प्रयोग किसी भी समय और शरीर के किसी भी भाग पर आसानी से किया जा सकता है।
चुंबकत्व से रक्त परिसंचरण तन्त्र को शक्ति प्राप्त होती है जिसके फ़लस्वरूप कई रोगों में उपकार होते देखा गया है। शरीर के अंगों की थकावट,सूजन और पीडा का निवारण होता है। चुंबक का असर कभी कभी तो तो इतना ज्यादा और तुरंत होता है कि एक बार के प्रयोग से रोग शमन हो जाता है,दूसरी बार चुंबक लगाने की आवश्यकता नहीं पडती। उदाहरण के लिये दांत में दर्द और मौच आने पर एक ही प्रयोग काफ़ी रहता है। हम एक ही चुंबक का कई रोगियों पर प्रयोग कर सकते हैं इसे पानी में उबालने या जंतु रहित करने की जरूरत नहीं पडती। फ़िर भी अगर चर्म विकृतियों पर चुंबक का इस्तेमाल करें तो चुंबक को महीन कपडे में लपेटकर प्रयोग करें। बाद में कपडे को धोलें। एक अच्छी बात यह है कि चुंबक उपचार की आदत नहीं पडती। चुंबक चिकित्सा कभी भी किसी भी समय बंद की जा सकती है।शारीरिक दर्दों को नष्ट करने की चुंबक में आश्चर्यजनक शक्ति है। पीडा किसी भी कारण से हो,चुंबक चिकित्सा अपना प्रभाव प्रदर्शित करती है। इससे शरीर की सभी क्रियाएं ठीक होकर रोगमुक्ति में सहायता मिलती है।
शरीर के जिस भाग पर चुंबक लगानी है उसके मुताबिक अलग-अलग साईज के चुंबकों का प्रयोग ठीक रहता है। जैसे आंख पर छोटे और कम शक्ति के चुंबक लगाते हैं जबकि अगर शरीर के विस्तृत भाग में दर्द और सूजन हो तो बडे आकार के अधिक शक्ति वाले चुंबक लगाना उचित रहता है। आंख और हृदय जैसे कोमल अंगों पर शक्तिशाली चूबक नहीं लगाना चाहिये। बडे आकार की एवंकठोर मांसपेशियों जैसे एडी,घुटनों और कुल्हों पर अधिक शक्तिशाली और बडे चुंबक का प्रयोग उत्तम रहता है।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा



29.7.10

वाटर थिरेपी से करें रोगों का ईलाज

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वाटर थिरेपी (water therapy)चिकित्सा विधि रोगों का ईलाज करने में बेहद चमत्कारी साबित हुई है।बिना दवाई लिये रोगी को रोग मुक्त करने की पानी में असीम शक्ति है। इसके नियम पूर्वक प्रयोग से अनेकों कष्ट साध्य रोग भी ठीक हो जाते हैं।

वाटर थेरेपी कैसे करें?


सुबह जल्दी उठें। बिस्तर छोडते ही करीब डेढ लिटर पानी पी जाएं। बाद में मुहं धोना और ब्रश ईत्यादि करें। ध्यान रखें कि पानी पीने के ४५ मिनिट बाद तक कुछ न खाएं कुछ न पीयें। संक्षेप में यही वाटर थिरेपी कहलाती है। अगर आपको लगे कि उपलब्ध पानी निर्मल नहीं है तो पानी को उबालकर ठंडा करलें। क्या यह संभव है कि व्यक्ति एक ही बार में १.५० लिटर पानी पी सकता है। हां,शुरू में थोडी दिक्कत मेहसूस होगी लेकिन कुछ समय बाद में आदत पड जाएगी। बासी मुहं पानी पीने में क्या तुक है? दर असल रात भर की लार(सेलिवा) पानी के जरिये पेट में पहुंचाना इसका उद्देश्य हो सकता है। जहां तक मुहं में मौजूद जीवाणुओं का सवाल है तो इनके पेट में उतरने से कोइ नुकसान नहीं होता है। हमारी जठराग्नी इन जीवाणुओं को नष्ट कर देती है।
अगर आप १.५ लिटर पानी एक दफ़ा में नहीं पी सकें तो पहिले एक लिटर पानी पीयें। ५ मिनिट बाद आधा लिटर पीयें। इसका भी वही प्रभाव होगा। वाटर थिरेपी का प्रभाव बढाने के लिये यह प्रक्रिया दिन में दो या तीन बार भी की जा सकती है।जहां तक इस चिकित्सा से होने वाले लाभ का सवाल है मेरा मानना है कि आप जब तक इसे खुद व्यवहार में नहीं लाएंगे आपको विश्वास होगा ही नहीं कि वाटर थिरेपी इतना जबर्दस्त प्रभाव रखती है।
वाटर थिरेपी के दौरान दिन भर में याने २४ घंटे में मौसम के मुताबिक ४से ६ लिटर पानी पीना उत्तम है।

वाटर थिरेपी के लाभ--

दिन भर तरो ताजा उत्साहित मेहसूस होना, शरीर की कांति में वृद्धि ,मोटापा से मुक्ति,तनाव से मुक्ति , हाजमा अच्छा होना।
जल-चिकित्सा भारत और जापान में बहुत समय पहिले से ही अस्तित्व में है। भारत में तांबे के पात्र में रात भर रखे पानी को पीने का निर्देश दिया गया है।
जापान की मेडिकल सोसायटी ने अपने शोध में निम्न रोगों का १०० प्रतिशत सफ़ल इलाज वाटर थिरेपी के जरिये बताया है-
सिर दर्द,
बदन का दर्द,
दमा,
मिर्गी,
मोटापा,
संधिवात,
बवासीर,
कब्ज,
हृदय के विकार,
गुर्दे के विकार,
गुर्दे की पथरी,
मस्तिष्क ज्वर,
टी बी
औरतों के मासिक धर्म के विकार,
अतिसार,
उल्टी होना,(vomiting)
आंखों के सभी रोग,
कान के रोग,
गले की बीमारियां,
कितने दिनो में दूर होगी बीमारी?
जापान की मेडिकल सोसायटी ने रोग मुक्ति के लिये निम्न अवधि उल्लेखित की है--
हाई ब्लड प्रेशर (high blood pressure) ३० दिन
पेट के रोग १० दिन
कब्ज (constipation)१० दिन
टी बी ९० दिन
मधुमेह ३० दिन
अंत में सलाह देना चाहूगा कि आप अपने जीवन में पानी को विशेष महत्व दें। स्वस्थ्य व्यक्ति भी वाटर थिरेपी से लाभान्वित हो सकते हैं। यह बिना खर्चे का प्रभावशाली ईलाज है।

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज

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12.7.10

मिट्टी के प्रयोग से रहें निरोग (मड थिरेपि)

                                                     (मड थेरेपी के लिए इमेज परिणाम
   प्राकृतिक चिकित्सा में माटी का प्रयोग कई रोगों के निवारण में प्राचीन काल से ही होता आया है। नई वैग्यानिक शोध में यह प्रमाणित हो चुका है कि माटी चिकित्सा की शरीर को तरो ताजा करने जीवंत और उर्जावान बनाने में महती उपयोगिता है। चर्म विकृति और घावों को ठीक करने में मिट्टी चिकित्सा अपना महत्व साबित कर चुकी है। माना जाता रहा है कि शरीर माटी का पुतला है और माटी के प्रयोग से ही शरीर की बीमारियां दूर की जा सकती हैं।

    नंगे पैर जमीन पर चलना स्वास्थ्य के लिये उपकारी है। इस प्रक्रिया में धरती की उर्जा शरीर को प्राप्त होती है। धरती-चिकित्सा करने वाले अपने शरीर को मिट्टी के घोल में डुबा देते हैं केवल सिर बाहर रखा जाता है। यह विश्वास किया जाता है कि ऐसा करने से हमारा शरीर चिकित्सा की दृष्टि से उपयोगी खनिज तत्व गृहण कर लेता है। जमीन में जो चुम्बकत्व होता है उसका आवश्यक अंश भी शरीर को उपलब्ध हो जाता है। प्राकृतिक चिकित्सा में माटी चिकित्सा के कई रूप है। गीली मिटी के घोल में स्नान, सूती कपडे पर गीली मिट्टी रखकर मड पेक से चिकित्सा करना आदि। मड पेक का प्रयोग घावों,गूमडे-गांठ,शरीर में पुरानी सूजन, वेदना निवारण के लिये किया जाता है। यह चिकित्सा विधान उचित खान-पान के नियमों को व्यवहार में लाते हुए किया जाता है। गीली मिट्टी का प्रयोग जल चिकित्सा की बनिस्बत ज्यादा लम्बे समय तक शरीर में नमी और ठंडाई बनाये रखता है। मड पेक चिकित्सा से शरीर के रोम कूप शिथिल हो जाते हैं,रक्त खिंचकर चमडी की सतह पर आ जाता है, शरीर के अंदरूनी अवरोध हट जाते हैं,शरीर में उष्मा संचरण संतुलित हो जाता है,और शरीर में मौजूद विष तत्व का निष्कासन हो जाता है


दमा( श्वास रोग) के असरदार उपचार



कैसे बनाएं मड पेक-जमीन के ऊपर की करीब आधा इंच मिट्टी हटाकर नीचे की मिट्टी इकट्ठा करें। यह मिट्टी एकदम शुद्ध होनी चाहिये ,याने इसमें कंकड,पत्थर वगैरह नहीं होना चाहिये। अब इस मिट्टी में गरम पानी डालते जाएं और घोल बनाते जाएं। इसे ठंडा होने दें। अब जरूरत के मुताबिक आकार का कपडे का टुकडा बिछाकर उस पर यह गीली मिट्टी एकरस फ़ैला दें। यह हुई मड पेक तैयार करने की विधि। इसे रोग प्रभावित स्थान पर आधे से एक घंटा रखना चाहिये। इस चिकित्सा से सामान्य कमजोरी और नाडी मंडल के रोग दूर किये जा सकते हैं। यह प्रयोग ज्वर उतारने में सफ़ल है,फ़्लू का ज्वर और खसरा रोग में भी इसके चमत्कारी परिणाम आते हैं। इस चिकित्सा से गठिया रोग सूजन,आंख और कान के रोग, वात विकार, लिवर और गुर्दे की कार्य प्रणाली में व्यवधान, पेट के रोग,कब्ज, यौन रोग, शरीर के दर्द, सिर दर्द और दांत के दर्द आदि रोगों शमन होता है।
मिट्टी को गीला कर घोल बनाकर उससे स्नान करना मिट्टी चिकित्सा का दूसरा रूप है। पूरे शरीर पर यह कीचड चुपडा जाता है। इसे बनाने के लिये मिट्टी को गरम पानी डालते हुए घोला जाता है। यह घोल शरीर पर भली प्रकार लगाकर ऊपर से एक -दो कंबल भी लपेट दिये जाते हैं। आधा-एक घंटे बाद गरम जल से नहालें। बाद में थोडे समय ठंडा पानी से स्नान करें। इस प्रकार के कीचड स्नान से त्वचा रोगों मे आशातीत लाभ होता है। चमडी मे रौनक आ जाती है। रंग रूप में निखार आता है। नियमित रूप से कीचड स्नान करने से सोरियासिस,सफ़ेद दाग और यहां तक कि कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाते हैं। जोडों के दर्द,गठिया रोग में यह बेहद फ़ायदेमंद उपचार है।

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि