3.1.16

नीम के विभिन्न औषधीय उपयोग //Different use of neem


 
     नीम में इतने गुण हैं कि ये कई तरह के रोगों के इलाज में काम आता है। यहाँ तक कि इसको भारत में ‘गांव का दवाखाना’ कहा जाता है। यह अपने औषधीय गुणों की वजह से आयुर्वेदिक मेडिसिन में पिछले चार हजार सालों से भी ज्यादा समय से इस्तेमाल हो रहा है। नीम को संस्कृत में ‘अरिष्ट’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब होता है, ‘श्रेष्ठ, पूर्ण और कभी खराब न होने वाला।’
नीम के अर्क में मधुमेह यानी डायबिटिज, बैक्टिरिया और वायरस से लड़ने के गुण पाए जाते हैं। नीम के तने, जड़, छाल और कच्चे फलों में शक्ति-वर्धक और मियादी रोगों से लड़ने का गुण भी पाया जाता है। इसकी छाल खासतौर पर मलेरिया और त्वचा संबंधी रोगों में बहुत उपयोगी होती है।
इसके पत्तों में मौजूद बैक्टीरिया से लड़ने वाले गुण मुंहासे, छाले, खाज-खुजली, एक्जिमा वगैरह को दूर करने में मदद करते हैं। इसका अर्क मधुमेह, कैंसर, हृदयरोग, हर्पीस, एलर्जी, अल्सर, हिपेटाइटिस (पीलिया) वगैरह के इलाज में भी मदद करता है।


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

नीम के बारे में उपलब्ध प्राचीन ग्रंथों में इसके फल, बीज, तेल, पत्तों, जड़ और छिलके में बीमारियों से लड़ने के कई फायदेमंद गुण बताए गए हैं। प्राकृतिक चिकित्सा की भारतीय प्रणाली ‘आयुर्वेद’ के आधार-स्तंभ माने जाने वाले दो प्राचीन ग्रंथों ‘चरक संहिता’ और ‘सुश्रुत संहिता’ में इसके लाभकारी गुणों की चर्चा की गई है।
नीम के पत्तों में जबरदस्त औषधीय गुण तो है ही, साथ ही इसमें प्राणिक शक्ति भी बहुत अधिक है। अमेरिका में आजकल नीम को चमत्कारी वृक्ष कहा जाता है। दुर्भाग्य से भारत में अभी लोग इसकी ओर नहीं दे हैं। अब वे नीम उगाने की कोशिश कर रहे हैं, क्योंकि नीम को अनगिनत तरीकों से इस्तेमाल किया जा सकता है। अगर आपको मानसिक बिमारी है, तो भारत में उसको दूर करने के लिए नीम के पत्तों से झाड़ा जाता है। अगर आपको दांत का दर्द है, तो इसकी दातून का इस्तेमाल किया जाता है। अगर आपको कोई छूत की बीमारी है, तो नीम के पत्तों पर लिटाया जाता है, क्योंकि यह आपके सिस्टम को साफ कर के उसको ऊर्जा से भर देता है। अगर आपके घर के पास, खास तौर पर आपकी बेडरूम की खिड़की के करीब अगर कोई नीम का पेड़ है, तो इसका आपके ऊपर कई तरह से अच्छा प्रभाव पड़ता है।


किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

बैक्टीरिया से लड़ता नीम
दुनिया बैक्टीरिया से भरी पड़ी है। हमारा शरीर बैक्टीरिया से भरा हुआ है। एक सामान्य आकार के शरीर में लगभग दस खरब कोशिकाएँ होती हैं और सौ खरब से भी ज्यादा बैक्टीरिया होते हैं। आप एक हैं, तो वे दस हैं। आपके भीतर इतने सारे जीव हैं कि आप कल्पना भी नहीं कर सकते। इनमें से ज्यादातर बैक्टीरिया हमारे लिए फायदेमंद होते हैं। इनके बिना हम जिंदा नहीं रह सकते, लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं, जो हमारे लिए मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। अगर आप नीम का सेवन करते हैं, तो वह हानिकारक बैक्टीरिया को आपकी आंतों में ही नष्ट कर देता है।
आपके शरीर के भीतर जरूरत से ज्यादा बैक्टीरिया नहीं होने चाहिए। अगर हानिकारक बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा हो गई तो आप बुझे-बुझे से रहेंगे, क्योंकि आपकी बहुत-सी ऊर्जा उनसे निपटने में नष्ट हो जाएगी। नीम का तरह-तरह से इस्तेमाल करने से बैक्टीरिया के साथ निपटने में आपके शरीर की ऊर्जा खर्च नहीं होती।
आप नहाने से पहले अपने बदन पर नीम का लेप लगा कर कुछ वक्त तक सूखने दें, फिर उसको पानी से धो डालें। सिर्फ इतने से ही आपका बदन अच्छी तरह से साफ हो सकता है – आपके बदन पर के सारे बैक्टीरिया नष्ट हो जाएंगे। या फिर नीम के कुछ पत्तों को पानी में डाल कर रात भर छोड़ दें और फिर सुबह उस पानी से नहा लें।

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एलर्जी के लिए नीम

नीम के पत्तों को पीस कर पेस्ट बना लें, उसकी छोटी-सी गोली बना कर सुबह-सुबह खाली पेट शहद में डुबा कर निगल लें। उसके एक घंटे बाद तक कुछ भी न खाएं, जिससे नीम ठीक तरह से आपके सिस्टम से गुजर सके। यह हर प्रकार की एलर्जी – त्वचा की, किसी भोजन से होनेवाली, या किसी और तरह की – में फायदा करता है। आप सारी जिंदगी यह ले सकते हैं, इससे कोई नुकसान नहीं होगा। नीम के छोटे-छोटे कोमल पत्ते थोड़े कम कड़वे होते हैं, वैसे किसी भी तरह के ताजा, हरे पत्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
बीमारियों के लिए नीम
नीम में ऐसी भी क्षमता है कि अगर आपकी रक्त धमनियों(आर्टरी) में कहीं कुछ जमना शुरु हो गया हो तो ये उसको साफ कर सकती है। मधुमेह(डायबिटीज) के रोगियों के लिए भी हर दिन नीम की एक छोटी-सी गोली खाना बहुत फायदेमंद होता है। यह उनके अंदर इंसुलिन पैदा होने की क्रिया में तेजी लाता है।

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण मे रखता है-
कोलेस्ट्रोल रक्त में पाया जाने वाला पीले रंग का एक मोमी पदार्थ है। जब रक्त में यह अधिक हो जाता है, तब रक्त-वाहिनी धमनियों के अन्दर यह जमने लगता है, थक्का बनाकर रक्त-प्रवाह को अवरुद्ध करता है। कैलेस्ट्रोल दो तरह के होते हैं- एच.डी.एल. और एल.डी.एल.। इसमें पहला स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, दूसरा बुरा। बुरा कैलेस्ट्रोल अधिक वसायुक्त पदार्थ (तेल, घी, डालडा), माँस, सिगरेट तथा अन्य नशीले पदार्थों के सेवन से पैदा होता है। बुरा कैलेस्ट्रोल की वृद्धि से रक्त दूषित होता है, उसका प्रवाह रुकता है और हार्ट अटैक का दौरा पड़ता है। नीम एक रक्त-शोधक औषधि है, यह बुरे कैलेस्ट्रोल को कम या नष्ट करता है। नीम का महीने में १० दिन तक सेवन करते रहने से हार्ट अटैक की बीमारी दूर हो सकती है। कोयम्बटूर के एक आयुर्वेदीय अनुसंधान संस्थान में पशुओं पर प्रयोग करके देखा गया कि २०० ग्राम तक नीम पत्तियों के प्रयोग से कैलेस्ट्रोल की मात्रा काफी कम हो जाती है। लीवर की बीमारी में भी नीम पत्ती का सेवन लाभदायक पाया गया है।
*नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।

स्त्रियों के योन रोग : कारण लक्षण और उपचार

*नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालो में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
*नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।
*नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।
नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
*नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। हां पत्तियां अवश्य कड़वी होती हैं, लेकिन कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना पड़ता है मसलन स्वाद।
*नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
*नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।
*नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।


शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग
 प्रसव एवं प्रसूता काल में नीम का उपयोग
नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री के कमर में बांधने से बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है। किन्तु बच्चा पैदा होते ही नीम की जड़ को कमर से खोलकर तुरन्त फेंक देने का सुझाव दिया जाता है। यह प्रयोग देश के कुछ ग्रामीण अंचलों में होते देखा गया है। परीक्षणों के बाद आयुर्वेद ने भी इसे मान्यता दी है।
*प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है, गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है, भूख लगती है, दस्त साफ होता है, ज्वर नहीं आता, यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता। यह आयुर्वेद का मत है।
*आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल ४ माशा तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औंटकर, जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है। एक अन्य वैद्य के अनुसार नीम छाल २ तोला सोंठ, ४ माशा एवं गुण २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।

गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज


*स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है। एक बड़े व चौड़े बर्तन में नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में जो सुसुम हो, बैठने से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही सुझाव दिया जाता है। इससे सूजन भी उतर जाता है और पेशाब ठीक होने लगता है।
*नीम पत्ती को गरम कर स्त्री के कमर में बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट या पुरूषप्रसंग के समय होने वाला दर्द नष्ट होता है।
*नीम के पत्तों को पीस कर उसकी टिकिया तवे पर सेंककर पानी के साथ लेने से सहवास के समय स्त्री योनि के अन्दर या पुरूष लिंग में हुए क्षत भर जाते हैं, दर्द मिट जाता है।
घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर में नीम
*घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।


*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

*घाव चाहे छोटा हो या बड़ा नीम की पत्तियों के उबले जल से धोने, नीम पत्तियों को पीस कर उसपर छापने और नीम का पत्ता पीसकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। फोड़े-फुंसी व बलतोड़ में भी नीम पत्तियाँ पीस कर छापी जाती हैं।
*दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर छापने से लाभ होता है।
*गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है।
*नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।
*नीम का मरहम लगाने से हर तरह के विकृत, विषैले एवं दुष्ट घाव भी ठीक होते हैं। इसे बनाने की विधि इस प्रकार है-नीम तेल एक पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस एक सेर, नीम की जड़ के छाल का चूर्ण एक छटाक, नीम पत्तियों की राख ढाई तोला। एक कड़ाही में नीम तेल तथा पत्तियों का रस डालकर हल्की आँच पर पकावें। जब जलते-जलते एक छटाक रह जाय तब उसमें मोम डाल दें। गल जाने के बाद कड़ाही को चूल्हे पर से उतार कर और मिश्रण को कपड़े से छानकर गाज अलग कर दें। फिर नीम की छाल का चूर्ण और पत्तियों की राख उसमें बढ़िया से मिला दें। नीम का मरहम तैयार|
हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भस्म लगाने से लाभ होता है।
*छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।

वैवाहिक जीवन की मायूसी दूर  करें इन जबर्दस्त  नुस्खों से

प्रदर रोग में नीम
प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है। रक्त प्रदर एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।
*श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होता है।

बढ़ी हुई तिल्ली प्लीहा के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार

रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।
प्रदर रोग में (कफ होने पर) नीम का मद एवं गुडची का रस शराब के साथ लेने से लाभ होता है।
*नीम का पेड़ सूखे के प्रतिरोध के लिए विख्यात है। सामान्य रूप से यह उप-शुष्क और कम नमी वाले क्षेत्रों में फलता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 से 1200 मिमी के बीच होती है। यह उन क्षेत्रों मे भी फल सकता है जहाँ वार्षिक वर्षा 400 से कम होती है पर उस स्थिति मे इसका अस्तित्व भूमिगत जल के स्तर पर निर्भर रहता है। नीम कई अलग अलग प्रकार की मिट्टी में विकसित हो सकता है, लेकिन इसके लिये गहरी और रेतीली मिट्टी जहाँ पानी का निकास अच्छा हो, सबसे अच्छी रहती है। यह उष्णकटिबंधीय और उपउष्णकटिबंधीय जलवायु मे फलने वाला वृक्ष है और यह 22-32° सेंटीग्रेड के बीच का औसत वार्षिक तापमान सहन कर सकता है। यह बहुत उच्च तापमान को तो बर्दाश्त कर सकता है, पर 4 डिग्री सेल्सियस से नीचे के तापमान मे मुरझा जाता है। नीम एक जीवनदायी वृक्ष है विशेषकर तटीय, दक्षिणी जिलों के लिए। यह सूखे से प्रभावित (शुष्क प्रवण) क्षेत्रों के कुछ छाया देने वाले (छायादार) वृक्षों मे से एक है। यह एक नाजुक पेड़ नहीं हैं और किसी भी प्रकार के पानी (मीठा या खारा) में जीवित रहता है। तमिलनाडु में यह वृक्ष बहुत आम है और इसको सड़कों के किनारे एक छायादार पेड़ के रूप मे उगाया जाता है, इसके अलावा लोग अपने आँगन मे भी यह पेड़ उगाते हैं। शिवकाशी (सिवकासी) जैसे बहुत शुष्क क्षेत्रों में, इन पेड़ों को भूमि के बड़े हिस्से में लगाया गया है और इनकी छाया मे आतिशबाजी बनाने के कारखाने का काम करते हैं।
*नीम एक बहुत ही अच्छी वनस्पति है जो की भारतीय पर्यावरण के अनुकूल है और भारत में बहुतायत में पाया जाता है। इसका स्वाद तो कड़वा होता है लेकिन इसके फायदे तो अनेक और बहुत प्रभावशाली है।
नीम की छाल का लेप सभी प्रकार के चर्म रोगों और घावों के निवारण में सहायक है।
*नीम की दातुन करने से दांत और मसूड़े स्वस्थ रहते हैं।
*नीम की पत्तियां चबाने से रक्त शोधन होता है और त्वचा विकार रहित और कांतिवान होती है। हां पत्तियां अवश्य कड़वी होती हैं, लेकिन कुछ पाने के लिये कुछ तो खोना पड़ता है मसलन स्वाद।
*नीम की पत्तियों को पानी में उबाल उस पानी से नहाने से चर्म विकार दूर होते हैं और ये खासतौर से चेचक के उपचार में सहायक है और उसके विषाणु को फैलने न देने में सहायक है।
*नींबोली (नीम का छोटा सा फल) और उसकी पत्तियों से निकाले गये तेल से मालिश की जाये तो शरीर के लिये अच्छा रहता है।
*नीम के द्वारा बनाया गया लेप बालो में लगाने से बाल स्वस्थ रहते हैं और कम झड़ते हैं।
*नीम की पत्तियों के रस को आंखों में डालने से आंख आने की बीमारी (नेत्रशोथ या कंजेक्टिवाइटिस
*नीम की पत्तियों के रस और शहद को २:१ के अनुपात में पीने से पीलिया में फायदा होता है और इसको कान में डालने से कान के विकारों में भी फायदा होता है।
*नीम के तेल की ५-१० बूंदों को सोते समय दूध में डालकर पीने से ज़्यादा पसीना आने और जलन होने सम्बन्धी विकारों में बहुत फायदा होता है।
*नीम के बीजों के चूर्ण को खाली पेट गुनगुने पानी के साथ लेने से बवासीर में काफ़ी फ़ायदा होता है।
विभिन्न रोगों में नीम का उपयोग

*अरंडी के तेल के गुण और उपयोग 

प्रसव एवं प्रसूता काल में नीम का उपयोग
नीम की जड़ को गर्भवती स्त्री के कमर में बांधने से बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है। किन्तु बच्चा पैदा होते ही नीम की जड़ को कमर से खोलकर तुरन्त फेंक देने का सुझाव दिया जाता है। यह प्रयोग देश के कुछ ग्रामीण अंचलों में होते देखा गया है। परीक्षणों के बाद आयुर्वेद ने भी इसे मान्यता दी है।
प्रसूता को बच्चा जनने के दिन से ही नीम के पत्तों का रस कुछ दिन तक नियमित पिलाने से गर्भाशय संकोचन एवं रक्त की सफाई होती है, गर्भाशय और उसके आस-पास के अंगों का सूजन उतर जाता है, भूख लगती है, दस्त साफ होता है, ज्वर नहीं आता, यदि आता भी है तो उसका वेग अधिक नहीं होता। यह आयुर्वेद का मत है। आयुर्वेद के मतानुसार प्रसव के छ: दिनों तक प्रसूता को प्यास लगने पर नीम के छाल का औटाया हुआ पानी देने से उसकी प्रकृति अच्छी रहती है। नीम के पत्ते या तने के भीतरी छाल को औंटकर गरम जल से प्रसूता स्त्री की योनि का प्रक्षालन करने से प्रसव के कारण होने वाला योनिशूल (दर्द) और सूजन नष्ट होता है। घाव जल्दी सूख जाता है तथा योनि शुद्ध तथा संकुचित होता है।
प्रसव होने पर प्रसूता के घर के दरवाजे पर नीम की पत्तियाँ तथा गोमूत्र रखने की ग्रामीण परम्परा मिलती है। ऐसा करने के पीछे मान्यता है कि घर के अन्दर दुष्ट आत्माएं अर्थात संक्रामक कीटाणुओं वाली हवा न प्रवेश करे। नीम पत्ती और गोमूत्र दोनों में रोगाणुरोधी (anti bacterial) गुण पाये जाते हैं। गुजरात के बड़ौदा में प्रसूता को नीम छाल का काढ़ा एवं नीम तेल पिलाया जाता है, इससे भी स्वास्थ्य पर अच्छा प्रभाव पड़ता है।

वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय 

मासिक धर्म, सुजाक एवं सहवास क्षत में नीम आयुर्वेद मत में नीम की कोमल छाल ४ माशा तथा पुराना गुड २ तोला, डेढ़ पाव पानी में औंटकर, जब आधा पाव रह जाय तब छानकर स्त्रियों को पिलाने से रुका हुआ मासिक धर्म पुन: शुरू हो जाता है। एक अन्य वैद्य के अनुसार नीम छाल २ तोला सोंठ, ४ माशा एवं गुण २ तोला मिलाकर उसका काढ़ा बनाकर देने से मासिक धर्म की गड़बड़ी ठीक होती है।
स्त्री योनि में सुजाक (फुंसी, चकते) होने पर नीम के पत्तों के उबले गुनगुने जल से धोने से लाभ होता है। एक बड़े व चौड़े बर्तन में नीम पत्ती के उबले पर्याप्त जल में बैठने से सुजाक का शमन होता है और शान्ति मिलती है। पुरूष लिंग में भी सुजाक होने पर यही सुझाव दिया जाता है। इससे सूजन भी उतर जाता है और पेशाब ठीक होने लगता है।
नीम पत्ती को गरम कर स्त्री के कमर में बांधने से मासिक धर्म के समय होने वाला कष्ट या पुरूषप्रसंग के समय होने वाला दर्द नष्ट होता है।
नीम के पत्तों को पीस कर उसकी टिकिया तवे पर सेंककर पानी के साथ लेने से सहवास के समय स्त्री योनि के अन्दर या पुरूष लिंग में हुए क्षत भर जाते हैं, दर्द मिट जाता है।
प्रदर रोग (Leocorea) में नीम
प्रदर रोग मुख्यत: दो तरह के होते हैं-श्वेत एवं रक्त। जब योनि से सड़ी मछली के समान गन्ध जैसा, कच्चे अंडे की सफेदी के समान गाढ़ा पीला एवं चिपचिपा पदार्थ निकलता है, तब उसे श्वेत प्रदर कहा जाता है। यह रोग प्रजनन अंगों की नियमित सफाई न होने, संतुलित भोजन के अभाव, बेमेल विवाह, मानसिक तनाव, हारमोन की गड़बड़ी, शरीर से श्रम न करने, मधुमेह, रक्तदोष या चर्मरोग इत्यादि से होता है। इस रोग की अवस्था में जांघ के आस-पास जलन महसूस होता है, शौच नियमित नहीं होता, सिर भारी रहता है और कभी-कभी चक्कर भी आता है। रक्त प्रदर एक गंभीर रोग है। योनि मार्ग से अधिक मात्रा में रक्त का बहना इसका मुख्य लक्षण है। यह मासिक धर्म के साथ या बाद में भी होता है। इस रोग में हाथ-पैर में जलन, प्यास ज्यादा लगना, कमजोरी, मूर्च्छा तथा अधिक नींद आने की शिकायतें होती हैं।




श्वेत प्रदर में नीम की पत्तियों के क्वाथ से योनिद्वार को धोना और नीम छाल को जलाकर उसका धुआं लगाना लाभदायक माना गया है। दुर्गन्ध तथा चिपचिपापन दूर होने के साथ योनिद्वार शुद्ध एवं संकुचित होता है।
रक्त प्रदर में नीम के तने की भीतरी छाल का रस तथा जीरे का चूर्ण मिलाकर पीने से रक्तस्राव बन्द होता है तथा इस रोग की अन्य शिकायतें भी दूर होती हैं।
प्रदर रोग में (कफ होने पर) नीम का मद एवं गुडची का रस शराब के साथ लेने से लाभ होता है।
घाव, फोड़े-फुंसी, बदगांठ, घमौरी तथा नासूर में नीम
घाव एवं चर्मरोग बैक्टेरियाजनित रोग हैं और नीम का हर अंग अपने बैक्टेरियारोधी गुणों के कारण इस रोग के लिए सदियों से रामवाण औषधि के रूप में मान्यता प्राप्त है। घाव एवं चर्मरोग में नीम के समान आज भी विश्व के किसी भी चिकित्सा-पद्धति में दूसरी कोई प्रभावकारी औषधि नहीं है। इसे आज दुनियाँ के चिकित्सा वैज्ञानिक भी एकमत से स्वीकारने लगे हैं।
घाव चाहे छोटा हो या बड़ा नीम की पत्तियों के उबले जल से धोने, नीम पत्तियों को पीस कर उसपर छापने और नीम का पत्ता पीसकर पीने से शीघ्र लाभ होता है। फोड़े-फुंसी व बालतोड़ में भी नीम पत्तियाँ पीस कर छापी जाती हैं।
दुष्ट व न भरने वाले घाव को नीम पत्ते के उबले जल से धोने और उस पर नीम का तेल लगाने से वह जल्दी भर जाता है। नीम की पत्तियाँ भी पीसकर छापने से लाभ होता है।

सायनस ,नाक की हड्डी  बढ़ने के उपचार

गर्मी के दिनों में घमौरियाँ निकलने पर नीम पत्ते के उबले जल से नहाने पर लाभ होता है। नीम की पत्तियों का रस, सरसों का तेल और पानी, इनको पकाकर लगाने से विषैले घाव भी ठीक हो जाते हैं।
नीम का मरहम लगाने से हर तरह के विकृत, विषैले एवं दुष्ट घाव भी ठीक होते हैं। इसे बनाने की विधि इस प्रकार है-नीम तेल एक पाव, मोम आधा पाव, नीम की हरी पत्तियों का रस एक सेर, नीम की जड़ के छाल का चूर्ण एक छटाक, नीम पत्तियों की राख ढाई तोला। एक कड़ाही में नीम तेल तथा पत्तियों का रस डालकर हल्की आँच पर पकावें। जब जलते-जलते एक छटाक रह जाय तब उसमें मोम डाल दें। गल जाने के बाद कड़ाही को चूल्हे पर से उतार कर और मिश्रण को कपड़े से छानकर गाज अलग कर दें। फिर नीम की छाल का चूर्ण और पत्तियों की राख उसमें बढ़िया से मिला दें। नीम का मरहम तैयार।
हमेशा बहते रहने वाले फोड़े पर नीम की छाल का भष्म लगाने से लाभ होता है।
छाँव में सूखी नीम की पत्ती और बुझे हुए चूने को नीम के हरे पत्ते के रस में घोटकर नासूर में भर देने से वह ठीक हो जाता है। जिस घाव में नासूर पड़ गया हो तथा उससे बराबर मवाद आता हो, तो उसमें नीम की पत्तियों का पुल्टिस बांधने से लाभ होता है।


उकतव (एक्जिमा), खुजली, दिनाय में नीम
रक्त की अशुद्धि तथा परोपजीवी (Parasitic) कीटाणुओं के प्रवेश से उकवत, खुजली, दाद-दिनाय जैसे चर्मरोग होते हैं। इसमें नीम का अधिकांश भाग उपयोगी है।
एकजीमा में शरीर के अंगों की चमड़ी कभी-कभी इतनी विकृत एवं विद्रूप हो जाती है कि एलोपैथी चिकित्सक उस अंग को काटने तक की भी सलाह दे देते हैं, किन्तु वैद्यों का अनुभव है कि ऐसे भयंकर चर्मरोग में भी नीम प्रभावकारी होता है। एक तोला मजिष्ठादि क्वाथ तथा नीम एवं पीपल की छाल एक-एक तोला तथा गिलोय का क्वाथ एक तोला मिलाकर प्रतिदिन एक महीने तक लगाने से एक्जिमा नष्ट होता है।

कष्टसाध्य रोग जलोदर के आयुर्वेदिक घरेलू  उपचार

एक्जिमा में नीम का रस नियमित कुछ दिन तक लगाने और एक चम्मच रोज पीने से भी १०० प्रतिशत लाभ होता है। सासाराम (बिहार) के एक मरीज पर इसका लाभ होते प्रत्यक्ष देखा गया। खुजली और दिनाय में भी नीम का रस समान रूप से प्रभावकारी है।
कुटकी के काटने से होने वाली खुजली पर नीम की पत्ती और हल्दी ४:१ अनुपात में पीसकर छापने से खुजली में ९७ प्रतिशत तक लाभ पाया गया है। यह प्रयोग १५ दिन तक किया जाना चाहिए।
नीम के पत्तों को पीसकर दही में मिलाकर लगाने से भी दाद मिट जाता है।
वसंत ऋतु में दस दिन तक नीम की कोमल पत्ती तथा गोलमीर्च पीसकर खाली पेट पीने से साल भर तक कोई चर्मरोग नहीं होता, रक्त शुद्ध रहता है। रक्त विकार दूर करने में नीम के जड़ की छाल, नीम का मद एवं नीम फूल का अर्क भी काफी गुणकारी है। चर्मरोग में नीम तेल की मालिश करने तथा छाल का क्वाथ पीने की भी सलाह दी जाती है।

सफ़ेद दाग (Leucoderma) में नीम
शरीर के विभिन्न भागों में चकते के रूप में चमड़ी का सफेद हो जाना, फिर पूरे शरीर की चमड़ी का रंग बदल जाना, धवल रोग है। इसका स्वास्थ्य पर कोई असर नहीं पड़ता, इसके होने का कारण भी बहुत ज्ञात नहीं, किन्तु यूनानी चिकित्सा का मत है कि यह रक्त की खराबी, हाजमें की गड़बड़ी, कफ की अधिकता, पेट में कीड़ों के होने, असंयमित खान-पान, मानसिक तनाव, अधिक एंटीबायोटिक दवाइयों के सेवन आदि से होता है।
नीम की ताजी पत्ती के साथ बगुची का बीज (Psora corylifolia) तथा चना (Circerarietinum) पीसकर लगाने से यह रोग दूर होता है।

ज्यादा पसीना होता है तो  करें ये उपचार 

कुष्ठरोग में नीम
दुनियाँ में २५ करोड़ से भी अधिक और भारत में पचासों लाख लोग कुष्ट रोग के शिकार हैं। सैकड़ों कोढ़ नियंत्रण चिकित्सा केन्द्रों के बावजूद इस रोग से पीड़ितों की संख्या में मामूली कमी आयी है। चमड़ी एवं तंत्रिकाओं में इसका असर होता है। यह दो तरह का होता है-पेप्सी बेसीलरी, जो चमड़ी पर धब्बे के रूप में होता है, स्थान सुन्न हो जाता है। दूसरा मल्टीबेसीलरी, इसमें मुँह लाल, उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी तथा नाक चिपटी हो जाती है। नाक से खून आता है। दूसरा संक्रामक किस्म का रोग है। इसमें डैपसोन रिफैमिसीन और क्लोरोफाजीमिन नामक एलोपैथी दवा दी जाती है। लेकिन इसे नीम से भी ठीक किया जा सकता है।
प्राचीन आयुर्वेद का मत है कि कुष्ठरोगी को बारहों महीने नीम वृक्ष के नीचे रहने, नीम के खाट पर सोने, नीम का दातुन करने, प्रात:काल नित्य एक छटाक नीम की पत्तियों को पीस कर पीने, पूरे शरीर में नित्य नीम तेल की मालिश करने, भोजन के वक्त नित्य पाँच तोला नीम का मद पीने, शैय्या पर नीम की ताजी पत्तियाँ बिछाने, नीम पत्तियों का रस जल में मिलाकर स्नान करने तथा नीम तेल में नीम की पत्तियों की राख मिलाकर घाव पर लगाने से पुराना से पुराना कोढ़ भी नष्ट हो जाता है।


पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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29.12.15

कलौंजी के गुण और लाभ


कलौंजी में बहुत सारे मिनरल्स और न्यूट्रिएंट्स होते हैं. आयरन, सोडियम, कैल्शियम, पोटैशियम और फाइबर से भरपूर कलौंजी कई प्रकार के रोगों का घर बैठे इलाज है. लगभग 15 एमीनो एसिड वाला कलौंजी शरीर के लिए जरूरी प्रोटीन की कमी भी पूरी करता है.

बालों को लाभ


कलौंजी के लाभ में से सबसे बड़ा लाभ बालों को होता है. अनहेल्दी लाइफस्टाइल, स्ट्रेस जैसी कई समस्याओं से महिला हो या पुरुष, दोनों के ही साथ बालों के गिरने की समस्या आम हो चुकी है. इसके लिए तमाम तरह के ट्रीटमेंट कराने पर भी फायदा नहीं होता. लेकिन घर में मौजूद कलौंजी इस समस्या के निपटारे में बहुत ही कारगर उपाय है. सिर पर 20 मिनट तक नींबू के रस से मसाज करें और फिर अच्छे से धो लें. इसके बाद कलौंजी का तेल बालों में लगाकर उसे अच्छे से सूखने दें. लगातार 15 दिनों तक इसका इस्तेमाल बालों के गिरने की समस्या को दूर करता है.


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

कलौंजी ऑयल, 
ऑलिव ऑयल और मेहंदी पाउडर को मिलाकर हल्का गर्म करें. ठंडा होने दें और हफ्ते में एक बार इसका इस्तेमाल करें. इससे गंजेपन की समस्या भी दूर होती है.
कलौंजी की राख को तेल में मिलाकर गंजे  सर पर मालिश करें कुछ दिनों में नए बाल पैदा होने लगेंगे. इस प्रयोग में धैर्य महत्वपूर्ण है.

कलौंजी के अन्य लाभ


डायबिटीज से बचाता है, 
पिंपल की समस्या दूर, 
मेमोरी पावर बढ़ाता है,
 सिरदर्द करे दूर,
 अस्थमा का इलाज, 
जोड़ों के दर्द में आराम,
आंखों की रोशनी,
 कैंसर से बचाव, 
ब्लड प्रेशर करे कंट्रोल|

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

कलौंजी एक बेहद उपयोगी मसाला है. इसका प्रयोग विभिन्न व्यंजनों जैसे दालों, सब्जियों, नान, ब्रेड, केक और आचार आदि में किया जाता है|
कलौंजी की सब्जी भी बनाई जाती है|
कलौंजी में एंटी-आक्सीडेंट भी मौजूद होता है जो कैंसर जैसी बीमारी से बचाता है|
कलौंजी का तेल कफ को नष्ट करने वाला और रक्तवाहिनी नाड़ियों को साफ़ करने वाला होता है. इसके अलावा यह खून में मौजूद दूषित व अनावश्यक द्रव्य को भी दूर रखता है| कलौंजी का तेल सुबह ख़ाली पेट और रात को सोते समय लेने से बहुत से रोग समाप्त होते हैं|गर्भावस्था के समय स्त्री को कलौंजी के तेल का उपयोग नहीं कराना चाहिए इससे गर्भपात होने की सम्भावना रहती है|
कलौंजी का तेल बनाने के लिए 50 ग्राम कलौंजी पीसकर ढाई किलो पानी में उबालें. उबलते-उबलते जब यह केवल एक किलो पानी रह जाए तो इसे ठंडा होने दें. कलौंजी को पानी में गर्म करने पर इसका तेल निकलकर पानी के ऊपर तैरने लगता है| इस तेल पर हाथ फेरकर तब तक कटोरी में पोछें जब तक पानी के ऊपर तैरता हुआ तेल खत्म न हो जाए. फिर इस तेल को छानकर शीशी में भर लें और इसका प्रयोग औषधि के रूप में करें|

दमा, खांसी, एलर्जीः एक कप गर्म पानी में एक चम्मच शहद तथा आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह निराहार (भोजन से पूर्व) पी लेना चाहिए, फिर रात में भोजन के बाद उसी प्रकार आधा चम्मच कलौंजी और एक चम्मच शहद गर्म पानी में मिलाकर इस मिश्रण का सेवन कर लेना चाहिए. इस प्रकार 40 दिनों तक प्रतिदिन दो बार पिया जाए. सर्दी के ठंडे पदार्थ वर्जित हैं|

मधुमेहः 

एक कप काली चाय में आधा चाय का चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह नाश्ते से पहले पी लेना चाहिए. फिर रात को भोजन के पश्चात सोने से पहले एक कप चाय में एक चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर पी लेना चाहिए. चिकनाई वाले पदार्थों के उपयोग से बचें. इस इलाज के साथ अंगे्रजी दवा का उपयोग होता है तो उसे जारी रखें और बीस दिनों के पश्चात शर्करा की जांच करा लें. यदि शक्कर नार्मल हो गई हो तो अंग्रेजी दवा बंद कर दें, किंतु कलौंजी का सेवन करते रहें|

हृदय रोगः 


एक कप दूध में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर प्रतिदिन दो बार प्रयोग करें. इस तरह दस दिनों तक उपचार चलता रहे. चिकनाई वाले पदार्थों का सेवन न करें|
नेत्र रोगों की चिकित्साः
 नेत्रों की लाली, मोतियाबिंद, आंखों से पानी का जाना, आंखों की तकलीफ और आंखों की नसों का कमजोर होना आदि में एक कप गाजर के जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल दो चम्मच शहद मिलाकर दिन में दो बार सुबह (निराहार) और रात में सोते समय लेना चाहिए. इस प्रकार 40 दिनों तक इलाज जारी रखें. नेत्रों को धूप की
अपच या पेट दर्द में आप कलौंजी का काढा बनाइये फिर उसमे काला नमक मिलाकर सुबह शाम पीजिये. दो दिन में ही आराम देखिये|
*कैंसर के उपचार में कलौजी के तेल की आधी बड़ी चम्मच को एक ग्लास अंगूर के रस में मिलाकर दिन में तीन बार लें|
*हृदय रोग, ब्लड प्रेशर और हृदय की धमनियों का अवरोध के लिए जब भी कोई गर्म पेय लें, उसमें एक छोटी चम्मच तेल मिला कर लें|
*सफेद दाग और लेप्रोसीः 15 दिन तक रोज पहले सेब का सिरका मलें, फिर कलौंजी का तेल मलें.
कलौंजी के तेल को हल्का गर्म करके जहां दर्द हो वहां मालिश करें और एक बड़ी चम्मच तेल दिन में तीन बार लें. 15 दिन में बहुत आराम मिलेगा|
एक बड़ी चम्मच कलौंजी के तेल को एक बड़ी चम्मच शहद के साथ रोज सुबह लें, आप तंदुरूस्त रहेंगे और कभी बीमार नहीं होंगे; स्वस्थ और निरोग रहेंगे |
याददाश्त बढाने के लिए और मानसिक चेतना के लिए एक छोटी चम्मच कलौंजी का तेल 100 ग्राम उबले हुए पुदीने के साथ सेवन करें|
पथरी हो तो कलौंजी को पीस कर पानी में मिलाइए फिर उसमे शहद मिलाकर पीजिये, १०-११ दिन प्रयोग करके टेस्ट करा लीजिये.कम न हुई हो तो फिर १०-११ दिन पीजिये|
अगर गर्भवती के पेट में बच्चा मर गया है तो उसे कलौंजी उबाल कर पिला दीजिये, बच्चा निकल जायेगा.और गर्भाशय भी साफ़ हो जाएगा|
किसी को बार-बार हिचकी आ रही हो तो कलौंजी के चुटकी भर पावडर को ज़रा से शहद में मिलकर चटा दीजिये|
अगर किसी को पागल कुत्ते ने काट लिया हो तो आधा चम्मच से थोडा कम करीब तीन ग्राम कलौंजी को पानी में पीस कर पिला दीजिये, एक दिन में एक ही बार ३-४ दिन करे|
जुकाम परेशान कर रहा हो तो इसके बीजों को गरम कीजिए ,मलमल के कपडे में बांधिए और सूंघते रहिये.
दो दिन में ही जुकाम और सर दर्द दोनों गायब . कलौंजी की राख को पानी से निगलने से बवासीर में बहुत लाभ होता है|
कलौंजी का उपयोग चर्म रोग की दवा बनाने में भी होता है. कलौंजी को पीस कर सिरके में मिलाकर पेस्ट बनाए और मस्सों पर लगा लीजिये. मस्से कट जायेंगे. मुंहासे दूर करने के लिए कलौंजी और सिरके का पेस्ट रात में मुंह पर लगा कर सो जाएँ|
जब सर्दी के मौसम में सर दर्द सताए तो कलौंजी और जीरे की चटनी पीसिये और मस्तक पर लेप कर लीजिये|
घर में कुछ ज्यादा ही कीड़े-मकोड़े निकल रहे हों तो कलौंजी के बीजों का धुँआ कर दीजिये|


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14.12.15

नींबू से करें रोगों का ईलाज






1) बहरापन हो तो नींबू के रस में दालचीनी का तेल मिलाकर डालें।
2) आधा कप गाजर के रस में नींबू निचोड़कर पिएं, रक्त की कमी दूर होगी।
3) दो चम्मच बादाम के तेल में नींबू की दो बूंद मिलाएं और रूई कीसहायता
से दिन में कई बार घाव पर लगाएं, घाव बहुत जल्द ठीक हो जाएगा।
4) प्रतिदिन नाश्ते से पहले एक चम्मच नींबू का रस और एक चम्मच
ज़ैतून का तेल पीने से पथरी से छुटकारा मिलता है।
5) किसी जानवर के काटे या डसे हुए भाग पर रूई से नींबू का रस लगांए,
लाभ होगा

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि

6) शुद्ध शहद में नींबू की शिकंजी पीने से मोटापा दूर होता है।
7) नींबू के सेवन से सूखा रोग दूर होता है।
8) नींबू का रस एवं शहद एक-एक तोला लेने से दमा में आराम मिलता है।
9) नींबू का छिलका पीसकर उसका लेप माथे पर लगाने से माइग्रेन ठीक होता है।
10) नींबू में पिसी काली मिर्च छिड़क कर जरा सा गर्म करके चूसने से
मलेरिया ज्वर में आराम मिलता है।
11) नींबू के रस में नमक मिलाकर नहाने से त्वचा का रंग निखरता है
और सौंदर्य बढ़ता है।

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

12) नौसादर को नींबू के रस में पीसकर लगाने से दाद ठीक होता है।
13) नींबू के बीज को पीसकर सिर पर लगाने से गंजापन दूर होता है।
14) एक गिलास गर्म पानी में नींबू डाल कर पीने से पांचन क्रिया ठीक
रहती है।
15) रक्तचाप, खांसी, क़ब्ज़ और पीड़ा में भी नींबू चमत्कारिक प्रभाव दिखाता
है।
16) विशेषज्ञों का कहना है कि नींबू का रस विटामिन सी, विटामिन, बी
कैल्शियम,फ़ास्फ़ोरस, मैग्नीशियम, प्रोटीन और कार्बोहाईड्रेट से समृद्ध
होता है।
17) विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मसूढ़ों से ख़ून रिसता हो तो प्रभावित
जगहपर नींबू का रस लगाने से मसूढ़े स्वस्थ हो जाते हैं।

बिना आपरेशन प्रोस्टेट वृद्धि की अचूक औषधि

18) नींबू का रस पानी में मिलाकर ग़रारा करने से गला खुल जाता है।
19) नींबू के रस को पानी में मिलाकर पीने से त्वचा रोगों से भी बचाव
होता है अतः त्वचा चमकती रहती है, कील मुंहासे भी इससे दूर होते
हैं और झुर्रियों की भी रोकथाम करता है।
20) नींबू का रस रक्तचाप को संतुलित रखता है।
21) अगर बॉडी में विटामिन सी की मात्रा कम हो जाए, तो एनिमिया, जोड़ों
का दर्द, दांतों की बीमारी, पायरिया, खांसी और दमा जैसी दिक्कतें हो
सकती हैं। नीबू में विटामिन सी की मात्रा ज्यादा होती है। इसलिए
इन बीमारियों से दूरी बनाने में यह आपकी मदद करता है।
22) पेट खराब, पेट फूलना, कब्ज, दस्त होने पर नीबू के रस में थोड़ी सी
अजवायन जीरा, हींग, काली मिर्च और नमक मिलाकर पीने से आपको
काफी राहत मिलेगी।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

23) गर्मी में बुखार होने पर अगर थकान महसूस हो रही हो या पीठ और
बांहों में दर्द हो, तो भी आपके पास नींबू का उपाय है। आप एक चम्मच
नींबू के रस में दस बूंद तुलसी की पत्तियों का रस, चार काली मिर्च और
दो पीपली का चूर्ण मिलाकर लें। इसे दो खुराक के तौर सुबह-शाम लें।
24) चेहरे पर मुंहासे होना एक आम समस्या है। इसे दूर करने के लिए
नींबू रस में चंदन घिसकर लेप लगाएं। अगर दाद हो गया है, तो इसी
लेप में सुहागाघिसकर लगाएं, आपको आराम मिलेगा।
25) कई बार लंबी दूरी की यात्रा करने पर शरीर में बहुत थकान महसूस
होती है। ऐसे में एक गिलास पानी में दो नींबू निचोड़कर उसमें 50 ग्राम
किशमिश भिगो दें। रातभरभीगने के बाद सुबह किशमिश पानी में मथ
लें। यह पानी दिनभर में चारबार पिएं। इससे एनर्जी मिलेगी और बॉडी
की फिटनेस भी बनी रहेगी।

*किडनी फेल रोग का अचूक इलाज*

26) अधिक थकान और अशांति के कारण कई बार नींद नहीं आती। अगर
आप भी इस समस्या से जूझ रहे हैं, तो लेमन रेमेडी अपनाएं। रात को
सोने से पहले हाथ-पांव, माथे, कनपटी व कान के पीछे सरसों के तेल
की मालिश करें।इसके बाद थोड़े से नीबू के रस में लौंग घिसकर चाट
लें। ऐसा करने से आपको नींद बहुत जल्दी आएगी।
27) मोटापे से आजकल हर तीसरा व्यक्ति परेशान होता है। इससे छुटकारा
पाने के लिए आप मूली के रस में नीबू का रस व थोड़ा नमक मिलाकर
नियमित रूप से लें। मोटापा दूर होगा।
28) अगर याददाश्त कमजोर हो गई है, तो गिरी, सोंठ का चूर्ण और मिश्री
को पीसकर नींबू के रस में मिलाएं। फिर इसे धीरे-धीरे उंगली से चाटें।

मर्दानगी(सेक्स पावर) बढ़ाने के नुस्खे

29) सुंदर दिखना तो सभी चाहते हैं। अगर आपकी भी यही चाहत है,
तो एक चम्मच बेसन, आधा चम्मच गेहूं का आटा, आधा चम्मच
गुलाब जल और आधा चम्मच नींबू का रस मिलाकर लोशन तैयार करें।
इसे धीरे-धीरे चेहरे पर मलें। कुछ ही दिनों में आपका चेहरा निखर
जाएगा।
30) जहां तक हो सके, कागजी पीले रंग के नीबू का उपयोग करें। इसमें दो
चुटकी सेंधा नमक या काला नमक मिला कर ले सकते हैं।


19.11.15

मूली के फायदे // Benefits of radishes



  सलाद हो या फिर सब्जी, मूली का प्रयोग ठंड के दिनों में हर घर में किया जाता है। सर्दी के मौसम मे मूली का भरपूर सेवन कीजिए, क्योंकि यह सेहतऔर सौंदर्य दोनों के लिए गुणकारी है। यहाँ बताएँगे सेहत के लिए मूली के फायदे -
गुर्दे संबंधी विकारों  के लिए मूली का रस और मूली दोनों ही रामबाण उपाय है। मूली के रस में सेंधा नमक मिलाकर नियमित रूप से पीने पर गुर्दे सा होते हैं और गुर्दे की पथरी भी समाप्त हो जाती है।
मूली आपकी भूख को बढ़ाती है और आपके पाचन तंत्र को बेहतर कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। गैस की परेशानी में खाली पेट मूली के टुकड़ों का सेवन फायदेमंद होता है।
दातोंका  पीलापन खत्म करना हो तो मूली के छोटे-छोटे टुकड़ों में नींबू का रस डालकर दांतों पर रगड़ें या कुछ देर तक चबाते रहें और थूक दें। इस तरह से दांतों का पीलापन कम होगा। मूली के रस का कुल्ला करने पर भी दांत मजबूत होंगे।
प्रतिदिन खाने के साथ मूली का प्रयोग करने से यकृत  और गुर्दे  स्वस्थ रहते हैं और मजबूत होते हैं। कब्ज या बवासीर की परेशानी में भी मूली बेहद उपयोगी  है। पेट संबंधी कई  समस्याओं का हल मूली के उपयोग से  हो सकता है|
 कैल्श‍ियम की भरपूर मात्रा होने से मूली आपकी हड्ड‍ियों को मजबूत करने में सहायक है। इसे खाने से जोड़ों में दर्द से भी राहत मिलती है और सूजन से भी।
रक्तसंचार को नियंत्रित करने के मामले में भी मूली का उपयोग किया  जाता है|। यह कोलेस्ट्रॉल भी कम करती है और ब्लडप्रेशर भी नियंत्रित करती है। डाइबिटीज के मरीजों के लिए मूली बेहतरीन दवा है।
लगातार हिचकी आने से परेशान हैं तो मूली के पत्ते आपकी मदद कर सकते हैं। मूली के मुलायम पत्तों का चबाकर चूसने से हिचकी आना तुरंत बंद हो जाएगा। इतना ही नहीं मुं‍ह की दुर्गंध से भी छुटकारा मिलेगा।
मोटापे से परेशान लोगों के लिए मूली लाभकारी है। इसके लिए मूली के रस में नींबू और सेंधा नमक मिलाकर पिएं। इसके सेवन से धीरे-धीरे मोटापा कम होने लगता है। दमा के मरीजों के लिए भी मूली के रस का काढ़ा पीना बहुत उपकारी है|
त्वचा को बेदाग, नर्म और मुलायम बनाने के लिए मूली के पत्तों का रस त्वचा पर लगाएं। इसके अलावा इसका पेस्ट बनाकर भी लगा सकते हैं। यह रूखी और खुश्क त्वचा से  को  मुलायम और बेदाग  बनाती है| निजात दिलाएगा और त्वचा को बेदाग बनाएगा। 


प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ जाने से मूत्र समस्या का बिना आपरेशन 100% समाधान

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12.11.15

अजवायन के रोग नाशक प्रयोग // Uses of Thyme to cure diseases


भारतीय खानपान में अजवाइन का प्रयोग सदियों से होता आया है। आयुर्वेद के अनुसार अजवाइन पाचन को दुरुस्त रखती है। यह कफ, पेट तथा छाती का दर्द और कृमि रोग में फायदेमंद होती है। साथ ही हिचकी, जी मचलाना, डकार, बदहजमी, मूत्र का रुकना और पथरी आदि बीमारी में भी लाभप्रद होती है।
सामान्य परिचय -
अजवाईंन की खेती सारे भारतवर्ष में होती है लेकिन पश्चिम बंगाल, दक्षिणी प्रदेश और पंजाब में अधिकता से पैदा होता है। इसके पौधे एक दो फुट ऊंचे और पत्ते छोटे आकार में कुछ कंटीले होते हैं। डालियों पर सफेद फूल गुच्छे के रूप में लगते हैं, जो पककर एवं सूख जाने पर अजवाइन के दानों में परिवर्तित हो जाते हैं। ये दाने ही हमारे घरों में मसाले के रूप में और औषधियों में उपयोग किए जाते हैं।
जरूरी सावधानियाँ -
1. अजवाइन पित्त प्रकृति वालों में सिर दर्द पैदा करती है और दूध कम करती है।
2. अजवाइन ताजी ही लेनी चाहिए क्योंकि पुरानी हो जाने पर इसका तैलीय अंश नष्ट हो जाता है जिससे यह वीर्यहीन हो जाती है। काढ़े के स्थान पर रस या फांट का प्रयोग बेहतर है।
3. अजवाइन का अधिक सेवन सिर में दर्द उत्पन्न करता है।
मात्रा (खुराक) : अजवाइन 2 से 5 ग्राम, तेल 1 से 3 बूंद तक ले सकते हैं।
गुण -
अजवाइन की प्रशंसा में आयुर्वेद में कहा गया है-“एका यमानी शतमन्न पाचिका” अर्थात इसमें सौ प्रकार के अन्न पचाने की ताकत होती है।
आयुर्वेदिक मतानुसार-
अजवाइन पाचक, तीखी, रुचिकारक (इच्छा को बढ़ाने वाली), गर्म, कड़वी, शुक्राणुओं के दोषों को दूर करने वाली, वीर्यजनक (धातु को बढ़ाने वाला), हृदय के लिए हितकारी, कफ को हरने वाली, गर्भाशय को उत्तेजना देने वाली, बुखारनाशक, सूजननाशक, मूत्रकारक (पेशाब को लाने वाला), कृमिनाशक (कीड़ों को नष्ट करने वाला), वमन (उल्टी), शूल, पेट के रोग, जोड़ों के दर्द में, वादी बवासीर (अर्श), प्लीहा (तिल्ली) के रोगों का नाश करने वाली गर्म प्रकृति की औषधि है।

यूनानी मतानुसार -
अजवाइन आमाशय, यकृत, वृक्क को ऊष्णता और शक्ति देने वाली, आर्द्रतानाशक, वातनाशक, कामोद्वीपक (संभोग शक्ति को बढ़ाने वाली), कब्ज दूर करने वाली, पसीना, मूत्र, दुग्धवर्द्धक, मासिक धर्म लाने वाली, तीसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है।
विभिन्न रोगों में अजवाइन से उपचार:-
1 पेट में कृमि (पेट के कीड़े) होने पर -
1) अजवायन के लगभग आधा ग्राम चूर्ण में इसी के बराबर मात्रा में कालानमक मिलाकर सोते समय गर्म पानी से बच्चों को देना चाहिए। इससे बच्चों के पेट के कीड़े मर जाते हैं। कृमिरोग में पत्तों का 5 मिलीलीटर अजवाइन का रस भी लाभकारी है।
2) अजवाइन को पीसकर प्राप्त हुए चूर्ण की 1 से 2 ग्राम को खुराक के रूप में छाछ के साथ पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
3) अजवाइन के बारीक चूर्ण 4 ग्राम को 1 गिलास छाछ के साथ पीने या अजवाइन के तेल की लगभग 7 बूंदों को प्रयोग करने से लाभ होता है।
4) अजवाइन को पीसकर प्राप्त रस की 4 से 5 बूंदों को पानी में डालकर सेवन करने आराम मिलता है।
5) आधे से एक ग्राम अजवाइन का बारीक चूर्ण करके गुड़ के साथ मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इसे दिन में 3 बार खिलाने से छोटे बच्चों (3 से लेकर 5 साल तक) के पेट में मौजूद कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
6) अजवाइन का आधा ग्राम बारीक चूर्ण और चुटकी भर कालानमक मिलाकर सोने से पहले 2 गाम की मात्रा में पिलाने से पेट में मौजूद कीड़े समाप्त हो जाते हैं।
7) अजवाइन का चूर्ण आधा ग्राम, 60 ग्राम छाछ के साथ और बड़ों को 2 ग्राम चूर्ण और 125 मिलीलीटर छाछ में मिलाकर पिलाने से लाभ होता है। अजवाइन का तेल 3 से 7 बूंद तक देने से हैजा तथा पेट के कीड़े नष्ट हो जाते हैं।
8) 25 ग्राम पिसी हुई अजवाइन आधा किलो पानी में डालकर रात को रख दें। सुबह इसे उबालें। जब चौथाई पानी रह जाये तब उतार कर छान लें। ठंडा होने पर पिलायें। यह बड़ों के लिए एक खुराक है। बच्चों को इसकी दो खुराक बना दें। इस तरह सुबह, शाम दो बार पीते रहने से पेट के छोटे-छोटे कृमि मर जाते हैं।
9) अजवाइन के 2 ग्राम चूर्ण को बराबर मात्रा में नमक के साथ सुबह-सुबह सेवन करने से अजीर्ण (पुरानी कब्ज), जोड़ों के दर्द तथा पेट के कीड़ों के कारण उत्पन्न विभिन्न रोग, आध्मान (पेट का फूलना और पेट में दर्द आदि रोग ठीक हो जाते हैं।
10) पेट में जो हुकवर्म नामक कीडे़ होते हैं, उनका नाश करने के लिए अजवाइन का बारीक चूर्ण लगभग आधा ग्राम तक खाली पेट 1-1 घंटे के अंतर से 3 बार देने से और मामूली जुलाब (अरंडी तैल नही दें) देने से पेट के कीड़े निकल जाते हैं। यह प्रयोग, पीलिया के रोगी और निर्बल पर नहीं करना चाहिए।


2. गठिया का दर्द -


1) जोड़ों के दर्द में पीड़ित स्थानों पर अजवाइन के तेल की मालिश करने से राहत मिलेगी।
2) गठिया के रोगी को अजवाइन के चूर्ण की पोटली बनाकर सेंकने से रोगी को दर्द में आराम पहुंचता है।
3) जंगली अजावयन को अरंड के तेल के साथ पीसकर लगाने से गठिया का दर्द  ठीक होता है।
4) अजवाइन का रस आधा कप में पानी मिलाकर आधा चम्मच पिसी सोंठ लेकर
ऊपर से इसे पीलें। इससे गठिया का रोग ठीक हो जाता है।
5) 2-3 ग्राम दालचीनी पिसी हुई में 3 बूंद अजवाइन का तेल डालकर सुबह-शाम
सेवन करें। इससे गठिया- दर्द् ठीक होता है।
3. मिट्टी या कोयला खाने की आदत -
एक चम्मच अजवाइन का चूर्ण रात में सोते समय नियमित रूप से 3 हफ्ते तक खिलाएं। इससे बच्चों की मिट्टी खाने की आदत छूट जाती है।
4. पेट में दर्द -
एक ग्राम काला नमक और 2 ग्राम अजवाइन गर्म पानी के साथ सेवन कराएं।
5. स्त्री रोगों में -
प्रसूता (जो स्त्री बच्चे को जन्म दे चुकी हो) को 1 चम्मच अजवाइन और 2 चम्मच गुड़ मिलाकर दिन में 3 बार खिलाने से कमर का दर्द दूर हो जाता है और गर्भाशय की शुद्धि होती है। साथ ही साथ भूख लगती है व शारीरिक शक्ति में वृद्धि होती है तथा मासिक धर्म की अनेक परेशानियां इसी प्रयोग से दूर हो जाती हैं। नोट : प्रसूति (डिलीवरी) के पश्चात योनिमार्ग में अजवाइन की पोटली रखने से गर्भाशय में जीवाणुओं का प्रवेश नहीं हो पाता और जो जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं वे नष्ट हो जाते है। जीवाणुओं को नष्ट करने के लिए योनि-मार्ग से अजवाइन का धुंआ भी दिया जाता है तथा अजवाइन का तेल सूजन पर लगाया जाता है।
6. खांसी -
1) एक चम्मच अजवाइन को अच्छी तरह चबाकर गर्म पानी का सेवन करने से लाभ होता है।
2) रात में चलने वाली खांसी को दूर करने के लिए पान के पत्ते में आधा चम्मच अजवाइन लपेटकर चबाने और चूस-चूसकर खाने से लाभ होगा। 1 ग्राम साफ की हुई अजवाइन को लेकर रोजाना रात को सोते समय पान के बीडे़ में रखकर खाने से खांसी में लाभ मिलता है।
3) जंगली अजवाइन का रस, सिरका तथा शहद को एक साथ मिलाकर रोगी को रोजाना दिन में 3 बार देने से पुरानी खांसी, श्वास, दमा एवं कुक्कुर खांसी (हूपिंग कफ) के रोग में लाभ होता है।
4) अजवाइन के रस में एक चुटकी कालानमक मिलाकर सेवन करें। और ऊपर से गर्म पानी पी लें। इससे खांसी बंद हो जाती है।
5) अजवाइन के चूर्ण की 2 से 3 ग्राम मात्रा को गर्म पानी या गर्म दूध के साथ दिन में 2 या 3 बार लेने से भी जुकाम सिर दर्द, नजला, मस्तकशूल (माथे में दर्द होना) और कृमि (कीड़ों) पर लाभ होता है।
6) कफ अधिक गिरता हो, बार-बार खांसी चलती हो, ऐसी दशा में अजवाइन का बारीक पिसा हुआ चूर्ण लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, घी 2 ग्राम और शहद 5 ग्राम में मिलाकर दिन में 3 बार खाने से कफोत्पित्त कम होकर खांसी में लाभ होता है।
7) खांसी तथा कफ ज्वर यानि बुखार में अजवाइन 2 ग्राम और छोटी पिप्पली आधा ग्राम का काढ़ा बनाकर 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में सेवन करने से लाभ होता है।
8) 1 ग्राम अजवाइन रात में सोते समय मुलेठी 2 ग्राम, चित्रकमूल 1 ग्राम से बने काढ़े को गर्म पानी के साथ सेवन करें।
9) 5 ग्राम अजवाइन को 250 मिलीलीटर पानी में पकायें, आधा शेष रहने पर, छानकर नमक मिलाकर रात को सोते समय पी लें।
10) खांसी पुरानी हो गई हो, पीला दुर्गन्धमय कफ गिरता हो और पाचन क्रिया मन्द पड़ गई हो तो अजवाइन का जूस दिन में 3 बार पिलाने से लाभ होता है।
7. बिस्तर में पेशाब करना -
सोने से पूर्व 1 ग्राम अजवाइन का चूर्ण कुछ दिनों तक नियमित रूप से खिलाएं।
8. बार पेशाब आना-
1) 2 ग्राम अजवाइन को 2 ग्राम गुड़ के साथ कूट-पीसकर, 4 गोली बना लें, 3-3 घंटे के अंतर से 1-1 गोली पानी से लें। इससे बहुमूत्र रोग दूर होता है।
2) अजवाइन और तिल मिलाकर खाने से बहुमूत्र रोग ठीक हो जाता है।
3) गुड़ और पिसी हुई कच्ची अजवाइन समान मात्रा में मिलाकर 1-1 चम्मच रोजाना 4 बार खायें। इससे गुर्दे का दर्द भी ठीक हो जाता है।
4) जिन बच्चे को रात में पेशाब करने की आदत होती है उन्हें रात में लगभग आधा ग्राम अजवाइन खिलायें।

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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आंवला के फायदे // Amla 's benefits

आंवले का फल हो या इसका जूस, सेहत के लिए कितना फायदेमंद है, इसका उल्लेख  आयुर्वेद से लेकर एलोपैथ तक विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में आपको मिलेगा ही।
विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- आमलकी धात्री। हिन्दी- आंवला। मराठी- काम्वट्ठा, आंवला। गुजराती- आँवला। कन्नड़-मलयालम- नेल्लि। तमिल- नेल्लिकाई। तेलुगू- उशीरिकई, उसरकाम। फारसी- आमलज। इंग्लिश- एम्बलिक माइरोबेलेन। लैटिन- एम्बिलिका आफिसिनेलिस। 
उपयोग -
 त्रिफला की 3 औषधियों में से आंवला एक है। इसे सूखे चूर्ण के रूप में अन्य औषधियों के साथ नुस्खे के रूप में और अचार, चटनी, मुरब्बे के रूप में सेवन किया जाता है। च्यवनप्राश, ब्राह्मरसायन, धात्री लौह और धात्री रसायन आदि आयुर्वेदिक योग तैयार करने में आंवला काम आता है। यह अनेक रोगों को नष्ट करने वाला पोषक, धातुवर्द्धक और रसायन है। आयुर्वेद ने इसे 'अमृतफल' कहा है। 
लिखता हूँ आंवला  के गुण जो आपकी सेहत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है-


मोटापा  मे हितकारी- 

आंवले के सेवन से शरीर में प्रोटीन का स्तर अधिक होता है और नाइट्रोजन का संतुलन रहता है जिससे फैट्स बर्न होता है और वजन घटाने में मदद मिलती है।

पेट के रोगों मे अमृत तुल्य -

आंवला में फाइबर की अधिकता है। यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ट्रैक को साफ रखता है और शरीर के टॉक्सिन दूर रखता है। 

एसीडिटी  की समस्या मे लाभकारी-

इसका कसैला स्वाद शरीर में पाचन ठीक रखने वाले एन्जाइम्स को सक्रिय रहता है जिससे एसिडिटी कम करने में आसानी होती है।

डायबीटीज़  मे उपयोगी-

आंवले के सेवन से शरीर में शुगर का स्तर संतुलित रहता है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स क्रीएटिनाइन के सीरम का स्तर सामान्य करता है और शरीर में ऑक्सीडेटिव तत्व को कम करता है जिससे ग्लूकोज नियंत्रित रहता है।

त्वचा के लिए उत्तम -

आंवले में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में हैं जो त्वचा को सेहतमंद रखते हैं और शरीर के टॉक्स‌िन दूर करते हैं। इसके नियमित सेवन से मुहांसे और झुर्रियों की समस्या कम हो जाती है।


बालों के लिए  फायदेमंद-

आंवले में विटामिन सी और एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में हैं जो बालों के प्राकृतिक रंग को बरकरार रखते हैं और यह बालों के लिए प्राकृतिक कंडिशनर का काम करता है।

कोलेस्ट्रॉल घटाने के लिए -


इसमें विटामिन सी, अमीनो एसिड व पेसटिन हैं जो शरीर में बैड कोलेस्ट्रॉल का स्तर घटाते हैं और गुड कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं। यह आर्ट्रीज व रक्त कोशिकाओं में फैट्स जमने से भी बचाव करता है।

केन्सर से बचाव-

आंवला में एंटीऑक्सीडेंट्स अच्छी मात्रा में है जो कार्सिनोजेनिक कोशिकाओं को बढ़ने से रोकते हैं और कैंसर से बचाव करते हैं।

मूड ठीक रखता है-

आंवले में एंटीऑक्सीडेंट्स अधिक हैं जो दिमाग की कोशिकाओं को नष्ट होने से बचाते हैं और इसमें मौजूद नियोपाइनफ्राइन नामक तत्व मूड से जुड़ी क्रियाओं को नियंत्रित रखता है।

मोतियाबिंद ,रतौंधी मे लाभप्रद -

इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट्स रेटीन को ऑक्सीडाइज होने से बचाकते हैं। इसके नियमित सेवन से मोतियाबिंद व रतौंधी जैसी समस्याओं से बचा जा सकता है। 

गठिया मे सेवनीय-


इसमें एंटी इन्फ्लामेट्री गुण है जो गठिया में होने वाले दर्द और सूजन को कम करने में मददगार है। इसमें मौजूद विटामिन सी शरीर में कैल्शियम के पाचन में मदद करता है जिससे ऑस्टियोपोरोसिस जैसे रोगों से बचना आसान हो सकता है।
एक साबुत आंवला दाल या शाक बनते समय शुरू से ही डाल दीजिए तो यह दाल-शाक बनने के दौरान पक जाएगा। आंवले को ठण्डा होने पर मसलकर इसमें शकर या मिश्री मिलाकर भोजन के साथ शाक की तरह खाते जाइए। इस प्रकार आप एक आंवला प्रतिदिन भोजन के साथ तब तक खाते रहिए जब तक आपको हरा व ताजा आंवला मिलता रहे।

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11.11.15

कष्ट साध्य रोगों की मंत्र -चिकित्सा //Spells doom diseases






कई बार देखा गया है कि कोई भयंकर रूप से बीमार हो गया है लेकिन सभी प्रकार की चिकित्सीय जांच किसी बीमारी का कोई लक्षण नहीं बताती तो हो सकता हो कि जातक प्रेत बाधा से पीड़ित हो।
किसी भी प्रेत बाधा से मुक्त होने लिए लगातार 21 दिन तक प्रतिदिन सूर्यास्त के समय गाय का आधा किलो दूध लें तथा उसमें नौ बूंद शुद्ध शहद और 10 बूंद गंगाजल डालें। शहद और गंगाजल मिश्रित दूध को शुद्ध बर्तन में रखकर शुद्ध वस्त्र पहनकर हर-हर गंगे बोलते हुए घर में छिड़काव करें।
छिड़काव करने के बाद मुख्य दरवाजे पर आकर शेष बचे हुए दूध को धार बांधकर वहीं पर गिरा दें और बोलें-
संकट कटे मिटे सब पीरा
जो सुमिरे हनुमत बलवीरा

यह क्रिया 21 दिन तक करते रहें।
अब हम कुछ मंत्रों का उल्लेख  करेंगे जो रोग व्याधि -मुक्ति  मे  सहायक होते हैं-

कैंसर रोग


ॐ नम: शिवाय शंभवे कर्केशाय नमो नम:

यह मंत्र किसी भी तरह के कैंसर रोग में लाभदायक होता है।

मस्तिष्क रोग


ॐ उमा देवीभ्यां नम:।

यह मंत्र मस्तिष्क संबंधी विभिन्न रोगों जैसे सिरदर्द, हिस्टीरिया, याददाश्त जाने आदि में लाभदायी माना जाता है।


मूत्राषय प्रदाह(cystitis)के सरल उपचार



आंखों के रोग

ॐ शंखिनीभ्यां नम:।

इस मंत्र से जातक को मोतियाबिंद सहित रतौंधी, नेत्र ज्योति कम होने आदि की परेशानी में लाभ मिलता है।

हृदय रोग

ॐ नम: शिवाय संभवे व्योमेशाय नम:।

हृदय संबंधी रोगों से अधिकांश लोग पीड़ित होते हैं। इसलिए अगर वे इस मंत्र का जप करें, तो उन्हें लाभ मिलता है।


वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय 


स्नायु रोग

ॐ धं धर्नुधारिभ्यां नम:।




कान संबंधी रोग

ॐ व्हां द्वार वासिनीभ्यां नम:।

कर्ण विकारों को दूर करने में यह मंत्र आश्चर्यजनक भूमिका निभाता है।



कफ संबंधी रोग




श्वास (दमा) रोग

ॐ नम: शिवाय संभवे श्वासेशाय नमो नम:।


पक्षाघात (लकवा) रोग

ॐ नम: शिवाय शंभवे खगेशाय नमो नम:।


इन मंत्रों की शक्ति से रोग भागते हैं मंत्रों में गजब की शक्ति होती है। इनका नियमित जप न केवल जातक को मानसिक शांति देता है, बल्कि उन्हें होने वाली गंभीर बीमारियों को भी दूर भगा सकता हैं अब आप कितना करते है यह तो आप पर निर्भर करता हैं। इसमे कोई अतिशोक्ति नही यदि कुछ रोग जड से सामाप्त हो जाये। 


फिशर होने के कारण लक्षण और उपचार


हर समस्या का बस एक उपाय : गायत्री मंत्र

वेदों का सर्वश्रेष्ठ मंत्र : गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र:-

ॐ भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।

शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र को वेदों का सर्वश्रेष्ठ मंत्र बताया गया है। इसके जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। गायत्री मंत्र का जप का पहला समय है प्रात:काल, सूर्योदय से थोड़ी देर पहले मंत्र जप शुरू किया जाना चाहिए। जप सूर्योदय के पश्चात तक करना चाहिए।

मंत्र जप के लिए दूसरा समय है दोपहर का। दोपहर में भी इस मंत्र का जप किया जाता है।

तीसरा समय है शाम को सूर्यास्त के कुछ देर पहले मंत्र जप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप करना चाहिए। इन तीन समय के अतिरिक्त यदि गायत्री मंत्र का जप करना हो तो मौन रहकर या मानसिक रूप से जप करना चाहिए। मंत्र जप तेज आवाज में नहीं करना चाहिए।

लंबाई बढ़ाने के जबर्दस्त उपाय


गायत्री मंत्र का अर्थ -

सृष्टिकर्ता प्रकाशमान परामात्मा के तेज का हम ध्यान करते हैं, वह परमात्मा का तेज हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर चलने के लिए प्रेरित करें।

अथवा
उस प्राणस्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें।


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि 

सेक्स का महारथी बनाने और मर्दानगी बढ़ाने वाले अचूक नुस्खे



1.10.15

सिर दर्द के सरल उपचार// Simple treatment of headache



*ज्यादा से ज्यादा आराम करें,सिर दर्द में फायदा होगा |
*सिर पर बर्फ की ठंडी पट्टी रखें|
*गर्म पानी से नहाने से सर दर्द ठीक होता है|
*सर की तेल मालिश करने से राहत मिलती है|
*थोडा थोड़ा कई बार खाएं| भर पेट खाने से बचें|
सिर दर्द के सरल उपचार
*ज्यादा शराब पीने से सर दर्द बढ़ता है|
*सर दर्द रोगी को खूब पानी पीने की आदत डालना चाहिए|
*सिर दर्द रोगी थोड़ी मात्रा में चाय या काफी ले सकते हैं | कुछ आराम लगता है|
*बहुत ज्यादा शोर ,ज्यादा प्रकाश,और अँधेरे कमरे में फिल्म देखना सर दर्द को बढ़ा देते हैं|
*काम करने के दौरान थकावट महसूस हो तो कुछ देर आराम करलें|


पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

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