17.2.18

चेहरे की झुर्रियां दूर करने के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपाय


                               

    आप निम्नलिखित सरल व आयुर्वेदिक तरीको को नियमित रूप से अपनाकर अपने चेहरे की झुर्रियों को काफी हद तक दूर रख सकती है तथा बढती उम्र में भी अपनी त्वचा को खुबसूरत व जवां रखकर दुसरो के बीच आकर्षण का केंद्र बन सकती है.
1. झुर्रियों के लिए सबसे बड़ा उपचार है कि त्वचा को शुष्क न होने दें. इसके लिए किसी आयुर्वेदिक ग्लिसरीनयुक्त क्रीम का प्रयोग किया जा सकता है. यदि चेहरे की स्निग्धा बनी रहेगी तो झुर्रियां देर में पड़ेगी, इसलिए ऐसी क्रीम का प्रयोग करें जो चेहरे को स्निग्ध बनाये रखें.
इसके अलावा नाईट क्रीम के प्रयोग से भी झुर्रियों को दूर रखा जा सकता है.


छोटे स्तनों को उन्नत और सूडोल बनाए

2. एक चमच्च ताज़ा ऑरेंज जूस में एक चमच्च प्लेन दही मिलाएं और इस मिश्रण को अपने चेहरे पर १० से १५ मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. उसके बाद हलके गुनगुने पानी से चेहरा धो लें.
3. एक चमच्च कोकोनट मिल्क के साथ एक चमच्च कोर्न स्टार्च और एक चमच्च पाइनएप्पल जूस मिलाएं. यह लेप धूप से हुए नुकसान को कम करता है.  कोकोनट मिल्क में लैक्टिक एसिड होता है, जो त्वचा को मुलायम बनता है.
4. त्वचा में ताजगी बनाएं रखने के लिए उड़द की दाल के पाउडर में गुलाबजल, ग्लिसरीन और बादाम रोगन मिलाकर चेहरे पर लगायें.

    उपरोक्त लिखे उपाय सामान्य त्वचा वाले व्यक्तियों के लिए अधिक उपयोगी सिद्ध होंगें.
5. एक चमच्च बेकिंग सोडा लें इसमें एक चमच्च दही मिलाएं और इस मिश्रण को चेहरे पर दो मिनट के लिए लगाकर छोड़ दें. फिर धीरे धीरे त्वचा की हाथ से मसाज करें और हलके गुनगुने पानी से अच्छी तरह धो लें. यह मिश्रण त्वचा के पोर साफ़ करता है और रुखी त्वचा को बिना किसी जलन के मुलायम बनाता है.
6. अपनी त्वचा को संतुलित बनाये रखने के लिए नियमित रूप से गुलाब जल का प्रयोग करें. 


नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

7. आधा चमच्च जैतून के तेल में डेढ़ चमच्च अच्छी प्रकार मसला हुआ पपीता मिलाएं और इसको ठंडा होने के लिए रख दें. इसके बाद त्वचा पर इसकी मसाज करें और 5 मिनट लगाकर छोड़ दें. फिर सूती कपड़े से बहुत आराम से इसे साफ़ करें.



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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा



     

11. एक चमच्च एलोवेरा जेल और शहद का मिश्रण बनाएं और चेहरे पर दस मिनट के लिए लगायें.
दस मिनट बाद चेहरे को गुनगुने पानी से धो लें.
12. मसूर की पिसी दाल में शहद मिलाकर गर्मियों में चेहरे पर लगाये. इससे सुखी त्वचा को ठंडक मिलती है और ब्लैक हेड्स भी दूर होते है.
· अन्तिम दो सुझाव विशेषकर रुखी त्वचा वाले व्यक्तियों के लिए है.
13. चेहरे पर रोजाना अंडे का तेल (केस्टर ऑयल) लगाने से झुर्रियों का आना कम हो जाता है और त्वचा सौम्य नजर आती है.
१४. पक्के केले के गुददे में कुछ बुँदे जैतून की तेल की मिलाकर एक पेस्ट बना लें, इस पेस्ट के नियमित उपयोग से रिंकल्स कम होने लगते है.
१५. इसके अलावा पक्के केले में नारियल का तेल मिलाकर हाथों पर हाथ धोने की तरह मले. इससे हाथों पर रिंकल्स नहीं आयंगे.
१६. एक उबले आलू को मसलकर उसमे थोडा कच्चा दूध या मलाई, चुटकी भर हल्दी मिलाकर चेहरे पर लगायें और तकरीबन 20 मिनट बाद चेहरा धो लें. यह उपाय बढती उम्र के प्रभाव को कम करता है.बाद सादे पानी से चेहरा साफ़ कर लें.
३. एक चमच्च पाइनएप्पल के रस में एक चमच्च हल्का गुनगुना कोकोनट मिल्क व डेढ़ चमच्च कॉर्नस्टार्च डालकर एक लेप तैयार कर लें. इसे चेहरे पर लगाकर दस मिनट बाद हलके गुनगुने पानी से चेहरा धो लें. यह आपके चेहरे को प्राक्रतिक खूबसूरती प्रदान करने में लाभकारी होगा.



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24.1.18

मेथी के इतने फायदे नहीं जानते होंगे आप!




घर पर आसानी से मिल जाने वाली मेथी में इतने सारे गुण है कि आप सोच भी नहीं सकते है। यह सिर्फ एक मसाला नहीं है बल्कि एक ऐसी दवा है जिसमें हर बीमारी को खत्म करने का दम है। आइए आज हम आपको मेथी के पानी के कुछ चमत्कारिक फायदे  बताते हैं।
करें ये काम-
एक पानी से भरा गिलास ले कर उसमें दो चम्‍मच मेथी दाना डाल कर रातभर के लिये भिगो दें। सुबह इस पानी को छानें और खाली पेट पी जाएं। रातभर मेथी भिगोने से पानी में एंटी इंफ्लेमेटरी और एंटी ऑक्‍सीडेंट गुण बढ जाते हैं। इससे शरीर की तमाम बीमारियां चुटकियों में खत्म हो जाती है। आइए आपको बताते है कौन सी है वो खतरनाक 7 बीमारियां जो भाग जाएंगी इस पानी को पीने से।
वजन कम करे-


 
यदि आप भिगोई हुई मेथी के साथ उसका पानी भी पियें तो आपको जबरदस्‍ती की भूख नहीं लगेगी। रोज एक महीने तक मेथी का पानी पीने से वजन कम करने में मदद मिलती है।

पेट मे गेस बनने के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार 

मधुमेह-
मेथी में galactomannan होता है जो कि एक बहुत जरुरी फाइबर कम्‍पाउंड है। इससे रक्‍त में शक्‍कर बड़ी ही धीमी गति से घुलती है। इस कारण से मधुमेह नहीं होता।
कोलेस्‍ट्रॉल लेवल घटाए-
बहुत सारी स्‍टडीज़ में प्रूव हुआ है कि मेथी खाने से या उसका पानी पीने से शरीर से खराब कोलेस्‍ट्रॉल का लेवल कम होकर अच्‍छे कोलेस्‍ट्रॉल का लेवल बढ़ता है।
ब्लड प्रेशर होगा कंट्रोल-
मेथी में एक galactomannan नामक कम्‍पाउंड और पोटैशियम होता है। ये दो सामग्रियां आपके ब्‍लड प्रेशर को कंट्रोल करने में बड़ी ही सहायक होती हैं।
गठिया रोग से बचाए-
इसमें एंटीऑक्‍सीडेंट और एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होने के नातेए मेथी का पानी गठिया से होने वाले दर्द में भी राहत दिलाती है।

धनिया के  चोक़ाने वाले फ़ायदे जानकर हैरान रह जायेंगे

कैंसर से बचाए-
मेथी में ढेर सारा फाइबर होता है जो कि शरीर से विषैले तत्‍वों को निकाल फेंकती है और पेट के कैंसर से बचाती है।किडनी स्‍टोनअगर आप भिगोई हुई मेथी का पानी 1 महीने तक हर सुबह खाली पेट पियेंगे आपकी किडनी से स्‍टोन जल्‍द ही निकल जाएंगे।







आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा







20.1.18

आक के पौधे से नपुंसकता का स्थायी इलाज// Permanent cure of impotence with madar plant



     नपुंसकता  दूर करने के लिए कुछ छुहारे लें इन छुहारों की गुठली निकालकर अलग कर ले। गुठलियों के स्थान पर आक के पौधे का दूध भर कर इस पर आटा लगाकर आग पर पकने के लिए रख दें । जब आटा पक कर जल जाये तो छुहारे निकाल कर पीस ले । फिर इसकी छोटी - छोटी गोलियाँ बनाकर रात को सोते समय खाएं और ऊपर से दूध पी ले । इस उपयोग से स्तम्भन में लाभ मिलता है और गुप्तांग में कठोरता भी आएगी |  

शिश्न के रोग का उपचार करने के लिए शहद और गाय के घी में आक के पौधे का दूध बराबर मात्रा में मिलाकर किसी शीशी में ४-५ घंटे तक रख दें । फिर इसकी मालिश करे किन्तु सुपारी और इंद्री की सीवन से बचा कर रखें । और ऊपर से एरंड का पत्ता और पान बांधकर कुछ देर रखे । इस प्रकार लगातार सात दिनों तक मालिश करें । फिर १५ दिन बाद, एक महीने में २ बार मालिश करे । इससे शिश्न के सारे रोगो को फायदा मिलता है |
    आक के पौधे की जड़ को छाया में सुखाकर इसे पीस ले । लगभग २० ग्राम की मात्रा का चूर्ण को आधा किलो दूध में उबालकर इसकी दही जमा दें । फिर इस दही में से घी निकल ले । इस प्रकार का तैयार घी को खाने से नामर्दी की शिकायत दूर हो जाती है ।


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13.1.18

शारीरिक कमजोरी का होम्योपैथिक इलाज




    भारत का हर तीसरा चौथा व्यक्ति कमजोरी एवं दुबलेपन से पीड़ित है। इसका एक कारण गरीबी, भुखमरी, तंगहाली, खाने का अभाव, अधिक शारीरिक एवं मानसिक श्रम और खान-पान में उचित पोषक तत्त्वों का अभाव हो सकता है। भली-भांति शारीरिक परीक्षण करने पर बहुत-से रोगियों में डायबिटीज, टी.बी., आमाशय-आंतों के रोग, परजीवी कीड़े, खून में कमी जैसी व्याधियां पाई जाती है। समुचित उपचार करने पर कमजोरी दूर करने में आशातीत सफलता मिलती है।
कमजोरी महसूस करने के कुछ अन्य महत्त्वपूर्ण कारण इस प्रकार हैं –

हृदय रोगों से कमजोरी :

बच्चों में जोड़ों के दर्द तथा बुखार से उत्पन्न हृदय रोग के कारण संकरे हुए हृदय के वॉल्व से, कोरेनरी हृदय रोग से, उच्च रक्तचाप से, वायरल बुखार के हृदय की मांसपेशी पर दुष्प्रभाव से, फेफड़ों के कोष्ठों की सूजन से एवं फेफड़ों के दीर्घकालिक रोगों से जब हृदय फेल होने लगता है, तो रोगी कमजोरी की शिकायत करते हैं। हृदय फेल्योर के रोगी में कुछ अंग्रेजी दवाओं लेसिक्स वगैरह के दुष्प्रभाव भी होते हैं। ऐसे रोगियों को अल्कोहल तथा अल्कोहल प्रधान टॉनिकों से बचना चाहिए। रोगी को आराम कराकर कम नमक वाला सुपाच्य भोजन दें और त्वरित उपचार कराएं।
   गुर्दो के दीर्घकालिक संक्रामक रोग (क्रोनिक पाइलो नेफराइटिस); गुर्दे की पुरानी सूजन (नेफराइटिस), दोनों गुर्दो में पथरियां (स्टोन्स), मूत्रवाहिनी (यूरेटर) में पथरियां, डायबिटीज का गुर्दो पर दुष्प्रभाव, प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ा हुआ आकार समुचित उपचार के अभाव में धीरे-धीरे गुर्दो की कार्यप्रणाली को नष्ट करके उनकी कार्यक्षमता घटाते रहते हैं, जिससे क्रॉनिक रीनल फेल्योर की दशा उत्पन्न हो जाती है, जिसमें रोगी अत्यधिक कमजोरी के अलावा बहुत कम मूत्र होने, खून की कमी, जी मिचलाना, उल्टियां होना, भूख नहीं लगना, छाती में दर्द, घबराहट, सिरदर्द, हाथ-पैरों में दर्द एवं हाथ-पैरों में अवांछनीय गति इत्यादि की शिकायत करते हैं। प्राय: इन रोगियों का ब्लडप्रेशर अधिक मिलता है और त्वचा का रंग पीला बादामी-सा हो जाता है तथा रक्त में ब्लड यूरिया एवं क्रिटेनीन जैसे विषैले तत्त्वों की मात्रा बढ़ने के साथ-साथ शरीर में सूजन भी आ जाती है। इन रोगियों को भी शराब तथा प्रोटीनयुक्त टॉनिक नहीं लेने चाहिए. बल्कि ग्लूकोज, चीनी व चावल लाभदायक माने जाते हैं।
गुर्दा फेल होने से कमजोरी : 
  
कैंसर से कमजोरी : 

संक्रामक रोगों से कमजोरी :
 

लिवर, आंत, मूत्र तंत्र, श्वसन तंत्र, स्रायु तंत्र में दीर्घकालीन संक्रामक रोग होने पर संक्रमण करने वाले बैक्टीरिया, वायरस, प्रोटोजोआ कुछ विषैले पदार्थों का स्राव करते हैं, जिनसे भूख कम हो जाती है और रक्त भी ठीक प्रकार से नहीं बन पाता, जिससे रोगी कमजोरी बने रहने की शिकायत करते हैं। ऐसी स्थिति में संबंधित संक्रामक रोग का उचित उपचार आवश्यक है।
   लिवर, आमाशय, बड़ी आंत, गुर्दा, बच्चेदानी, फेफड़े, हड्डी इत्यादि के कैंसर के रोगी विभिन्न कारणों से कुछ महीनों से कमजोरी रहने की शिकायत करते हैं। इनका संदेह होने पर रोगी की भली-भांति शारीरिक परीक्षा करवानी चाहिए। ल्युकीमिया (रक्त कैंसर) के निदान के लिए रक्त की जांच आवश्यक है।
कुछ दवाओं से भी कमजोरी : आवश्यकता से अधिक इंसुलिट के सेवन से, कुछ अंग्रेजी दवाओं-जैसे लेसिक्स आदि के अधिक प्रयोग से, स्टीरॉयड दवाओं के अनाप-शनाप सेवन से भी रोगी कमजोरी की शिकायत करते हैं। इसलिए उपरोक्त दवाओं का अधिक प्रयोग हितकर नहीं है।

मानसिक रोगों में कमजोरी : 

   डिप्रेशन, शिजोफ्रेनिया, घबराहट इत्यादि से रोगी कमजोरी बने रहने की शिकायत करते हैं, जिनका उपचार मूल कारण के अनुसार ही करना ठीक रहता है, न कि कैप्सूल अथवा टॉनिक आदि का सेवन करना।
कैसे दूर करें दुबलापन : वैसे यदि उपरोक्त वर्जित कारणों का निराकरण कर दिया जाए, तो काफी हद तक कमजोरी और दुबलेपन से छुटकारा मिल सकता है, किन्तु इन सबके साथ ही यदि हम अपने आहार-विहार पर अधिक ध्यान दें, दिनचर्या को व्यवस्थित रखें, हल्के-फुल्के व्यायाम करते रहें, तनावयुक्त रहते हुए हँसते-हँसते रहें, तो कमजोरी एवं दुबलेपन से निजात पाई जा सकती है।
सदैव भूख लगने पर ही खाएं,खूब चबा-चबाकर खाएं, भूख से सदा थोड़ा कम खाएं, भोजन के साथ पानी कम लें, अधिक मिर्च-मसाले का भोजन न करें, चाय, कॉफी, ठंडे पेय से बचे, तली हुई चीजों का पूर्ण त्याग करें, चाय-चीनी, चिकनाई कम लें, चोकरयुक्त आटे की रोटी खाएं, दालें छिलकायुक्त खाएं, सब्जियां सादी रीति से बनाकर खाएं, सलाद (नीबू, खीरा, ककड़ी, गाजर, मूली, अदरक आदि) अधिक खाएं, प्रातः काल नाश्ते में अंकुरित मुंग-चना और दलिया लें, प्रातः सोकर उठने के बाद पानी पिया करें, दिनभर पानी खूब पियें, तीसरे पहर मौसम के फल लें, रात में सोते समय दूध लें, दोपहर को रोटी, दाल, सब्जी व दही लें, रात्रि में रोटी एवं सब्जी लें, हरी सब्जियां अधिक खाएं, तली हई वस्तुएं अधिक खा लेने अथवा अन्य कोई अनाप-शनाप वस्तु खा लेने के बाद उपवास करें।
    प्राकृतिक चिकित्सकों का मत है कि वजन बढ़ाने के लिए दो-तीन दिन सिर्फ फलाहार करें। फलों के साथ चोकर मिलाकर खाएं, कब्जं दूर करने के लिए पपीता खाएं। फलाहार से भूख अधिक लगती है, पाचन-शक्ति बढ़ती है।
     शिथिलता, दुबलापन एवं कमजोरी दूर करने में व्यायाम का महत्त्व आहार से कम नहीं है। हल्के-फुल्के व्यायाम, जैसे प्रात:काल में ‘जॉगिंग’ करना, हल्के-फुल्के खेल (बैडमिंटन, टेबल टेनिस, फुटबाल आदि) थोड़ी देर खेलना सेहत के लिए फायदेमंद होता है।
    नशीली वस्तुएं-

जैसे चाय, तम्बाकू, बीड़ी, सिगरेट, पान, शराब आदि से अनेक व्याधियां हो जाती हैं और स्वस्थ व्यक्ति भी दुबला होता जाता है। अश्लील साहित्य एवं चिंतन भी न सिर्फ मानसिक, बल्कि शारीरिक स्वास्थ्य को भी शिथिल करता है।

कमजोरी का होमियोपैथिक इलाज
 
• रतिरोगों के कारण कमजोरी एवं दुबलापन हो, तो ‘एग्नसकैस्टस’, ‘फॉस्फोरिक एसिड’
• गुर्दे संबंधी परेशानी हो, तो ‘लाइकोपोडियम’, ‘बरबेरिस’
• हारमोन स्राव की गड़बड़ी से कमजोरी जुड़ी हो, तो ‘बेरयटकार्ब’, ‘आयोडियम’, ‘थायरोइडिनम’
• नसों संबंधी परेशानी के कारण कमजोरी महसूस होती हो, तो ‘फाइवफॉस’, ‘कालीफॉस’
• रक्तहीनता के कारण कमजोरी व दुबलापन हो, तो ‘चाइना’ व ‘फेरमफॉस’ एवं ‘नेट्रमम्यूर’ औषधियां उपयोगी एवं अत्यंत लाभप्रद हैं।
चूंकि होमियोपैथिक चिकित्सा पद्धति में रोग के नाम से ज्यादा रोग एवं रोगी के लक्षणों का अधिक महत्त्व है। अतः लक्षणों के आधार पर कमजोरी एवं दुबलेपन की निम्न औषधियां अत्यधिक कारगर रही हैं –
• यदि दस्त वगैरह की वजह से कमजोरी हो, तो ‘चाइना’
• बुखार वगैरह हो, तो ‘आर्सेनिक’, ‘ब्रायोनिया’
• मांसपेशियों में टूटन हो, दर्द हो, तो ‘बेलिस पेरेनिस’; पिकारिक एसिड’
• गर्भाशय संबंधी परेशानी की वजह से कमजोरी हो, तो ‘सीपिया’,
• हृदय संबंधी रोगों के कारण कमजोरी हो, तो ‘डिजिटेलिस’,’जेलसीमियम’
 किसी रोग के बाद कमजोरी हो, तो ‘एवेना सैटाइवा’
• भूख न लगती हो, तो ‘एल्फा-एल्फा’, ‘रसटॉक्स’
• प्राणशक्ति लगभग जा चुकी हुई, त्वचा ठंडी, रोगी मृतप्राय पड़ा रहता है, नाड़ी अनियमित, त्वचा पर नीलापन, बिना तेज पंखे की हवा के रोगी सांस ले ही नहीं सकता। कभी-कभी काला रक्तस्राव, मसूड़ों से, नाक से खून, गैस अधिक बनना, चेहरा पीला होना आदि लक्षण मिलने पर ‘कमजोरी’ की प्रचण्ड अवस्था में ‘काबोंवेज’ उक्त दवा 3 × से 200 शक्ति में देनी चाहिए। इसके अलावा ‘म्यूरियाटिक एसिड’ और ‘आर्सेनिक’ भी कमजोरी की उत्तम दवाएं हैं। ये 30 शक्ति में लें।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा



22.12.17

डेंगू बुखार के आयुर्वेदिक,घरेलू उपचार // Ayurvedic, home remedies of dengue fever




    आज के समय में डेंगू एक बहुत ही भयंकर संक्रामक बीमारी बनकर उभरी है। डेंगू एक उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पायी जाने वाली बीमारी है जो एडीज इजिप्टी मच्छरों के काटने से होता है। डेंगू बुखार को ब्रेक बोन बुखार के नाम से भी जाना जाता है। इस प्रजाति यानि डेंगू के मच्छर ज्यादातर दिन में काटते है, और साफ़ पानी में पैदा होते है। डेंगू का इलाज (Dengue Treatment in Hindi) समय पर करना बहुत आवश्यक है, नहीं तो कई बार समय पर इलाज न होने के कारण रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।
इसीलिए हम आपको बताने जा रहे है डेंगू के कुछ इलाज और उपचारो के बारे में:-
डेंगू बुख़ार एक खतरनाक संक्रमण है जो डेंगू वायरस के कारण होता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से यह रोग एक बड़ी समस्या बन चुका है। वर्ष 1960 से, काफी लोग डेंगू बुख़ार से पीड़ित हो रहे हैं। डेंगू वायरस से बचने के लिये कोई वैक्सीन अभी तक उपलब्ध नहीं है। इसीलिए जितना हो सके इस रोग से बचने के प्रयास करने चाहिए।
डेंगू की समस्या वयस्कों से अधिक शिशुओं तथा बच्चों में होने की अधिक संभावना होती है।
डेंगू बुखार (dengue fever in hindi) मुख्‍य रूप से तीन प्रकार का होता है- साधारण डेंगू बुखार, डेंगू हैमरेजिक बुखार (DHF) और डेंगू शॉक सिंड्रोम (DSS)।
साधारण डेंगू बुखार को क्‍लासिकल डेंगू भी खा जाता हैं, और यह सामान्‍यत: पांच से सात दिनों तक रहता है। इसमें रोगी को ठंड लगने के बाद तेज बुखार, सिर, मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द, आंखों के पिछले हिस्से में दर्द, जी मिचलाना, कमजोरी लगना, भूख न लगना के लक्षण नजर आते हैं।

डेंगू का इलाज

हर साल जुलाई से अक्टूबर के महीने में डेंगू का प्रकोप ज्यादा रहता है। इसीलिए इस समय में सतर्क रहना चाहिए। आम तौर पर डेंगू का इलाज चिकित्सकीय प्रक्रिया से करवाने में ही फायदा रहता है परन्तु इसके अलावा कई आयुर्वेदिक और घरेलू तरीको से भी डेंगू का इलाज (dengue treatment) आसानी से किया जा सकता है।
तो आईये विस्तार में चर्चा करते है डेंगू के इलाज के बारे में:-

डेंगू का घरेलू इलाज

डेंगू एक (dengue fever in hindi) विषाणु-जनित रोग है जिसके लक्षण कई अन्य बिमारिओ जैसे टाइफाइड और मलेरिया से मिलते जुलते होते है जिसके कारण डॉक्टर्स समय पर सटीक निदान नहीं कर पाते है ऐसे में घरेलू उपाय और इलाज बड़े कारगर साबित होते है।

धनिये के पत्तो का जूस (Juice of Coriander Leaves)


डेंगू के इलाज में धनिये के पत्तो के रस का सेवन करना बहुत फायदेमंद रहता है। और इसे डेंगू का सबसे अच्छा घरेलू इलाज/उपचार भी माना गया है। आप इन पत्तियों को नियमित आहार के हिस्से के रूप में शामिल कर सकते हैं या नीचे दिए गए चरणों का पालन कर सकते हैं।
चरण 1: धनिया की पत्तियों का कटोरा लें और उन्हें अच्छी तरह धो लें।
चरण 2: पानी का कटोरा लें और धनिया के पत्तों को मिला लें।
चरण 3: मिश्रण को ब्लेंडर में रखो।
चरण 4: अब इस रस का सेवन दिन में अधिक से अधिक करे।
धनिये की पत्तियों में विटामिन सी की अधिक मात्रा होती है, और वे रोग प्रतिरक्षा बढ़ाने में सहायता करते हैं।

अनार का रस (Pomegranate Juice)

डेंगू का बुखार होने पर शरीर में खून की कमी के साथ प्लैटलैट्स कि संख्या भी कम होने लगती है। जिसके कारण जी मचलने लगता है। ऐसे में अनार के रस का सेवन बेहद लाभकारी रहता है। अनार खून कि कमी को दूर करने के साथ साथ प्लेटलेट की संख्या बढ़ाने में भी मदद करता है।
इसके अलावा अनार के सेवन से कोलेस्ट्रॉल और ब्लड प्रेशर को भी कम किया जा सकता है।

मेथी (Fenugreek)

डेंगू बुखार के इलाज में मेथी की पत्तिया लेने से बुखार कम होने लगता है, और शरीर में तेज़ हो रहे दर्द में आराम मिलता है जिससे रोगी को आराम मिलता है। विश्वभर में डेंगू के इलाज के लिए यूज़ में ली जाने वाली यह एक विख्यात घरेलू उपाय है। आप पत्तियों को पानी में भिगो सकते हैं और फिर इसे पी सकते हैं या आप मेथी पाउडर का इस्तेमाल पानी में मिलाकर कर सकते है।


बाबा रामदेव द्वारा दिया गया डेंगू का इलाज

पपीते की पत्तियों का रस

कुछ लोगो का मानना है की डेंगू बुखार (dengue fever) में पपीते की पत्तियों के रस का सेवन केवल एक भ्रम है, परन्तु कई शोध पत्रों और अद्ध्यनो ने यह साबित किया है कि डेंगू में पपीता के पत्ते का रस बेहद फायदेमंद है और सबसे अच्छा घरेलू इलाज में से एक है।
डेंगू बुखार के इलाज के लिए पपीते के पत्तो का रस इस प्रकार बनाये;
चरण 1: सबसे पहले ताजा पपीता का पत्ता लें और इसे टुकड़ो में काट लें।
चरण 2: 10 मिलीलीटर ठंडे पानी के साथ पत्ते मिलाएं।
चरण 3: मिश्रण को अच्छे से मिलाये और छान ले।
चरण 4: दिन में चार बार इस रस का सेवन करे।

बंद नाक खोलने और कफ़ निकालने के अनुपम नुस्खे

पपीते में मौजूद कार्बनिक यौगिकों और पोषक तत्व शरीर में रक्त कोशिकाओं को बढ़ा सकते हैं; विटामिन सी के विशाल संसाधन प्रतिरक्षा प्रणाली को उत्तेजित करने में सहायता कर सकते हैं, और एंटीऑक्सिडेंट रक्त से अन्य विषाक्त पदार्थों को नष्ट करने का अपना काम करते हैं।
डेंगू बुखार (dengue fever) में पपीते के पत्तो के रस का सेवन को डेंगू के प्राकृतिक इलाज (Dengue natural Treatment) होने के रूप में जाना जाता है।

इस समय में पपीते की पत्तियों का इस्तेमाल न करे;

आप गर्भवती हैं या स्तनपान करवा रही है।
पपीन नामक यौगिक के लिए एलर्जी है।
आपको लाटेकस (Latex) से एलर्जी है।
आप सर्जरी से गुजर चुके हैं या जल्द ही कोई सर्जरी होने वाली है।

नीम के पत्तों का रस (Neem Leaves’ Juice)

नीम के पत्ते कई बीमारियों के लिए उपयोगी माना जाता है और डेंगू उनमें से एक है। डेंगू के इलाज के लिए नीम के पत्तों का उपयोग इस प्रकार करे:
चरण 1: सबसे पहले ताजे नीम के पत्तों का एक छोटा कटोरा और ठंडे पानी का कटोरा लें।
चरण 2: पत्तियों को अच्छे से पीस कर और उन्हें फ़िल्टर करें।
चरण 3: इस मिश्रण का लगभग 10 मिलीलीटर तीन से चार बार ले।
बुखार धीरे-धीरे कम हो जाएगा। बुखार के कम होने के अगले दो से तीनो दिनों के बाद तक इसका सेवन करे।

बार बार पानी पिए (Drink Plenty of Water)

किसी भी प्रकार के बुखार जिसके कारण शरीर में पानी की कमी होती है, उसमे तरल पदार्थो का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए। इसीलिए डेंगू में जितना हो सके बार बार पानी पिए। डेंगू में तेज़ बुखार और शरीर दर्द के कारण रक्त संचार के साथ शरीर डिहाइड्रेट हो जाता है। ऐसे में शरीर को हाइड्रेट रखने के लिए अधिक से अधिक पानी (गर्म पानी बेहतर होगा) का उपयोग बहुत लाभकारी होता है।
ऐसा करने से शरीर में ताकत बनी रहती है जिससे सिरदर्द और दर्द में थोड़ी राहत मिलती है। इसी के साथ पानी शरीर से विषाक्त पदार्थों को जलाने के साथ हानिकारक रोगज़नक़ों के प्रभावों को खत्म करने में भी सहायता करता है।
डेंगू का आयुर्वेदिक इलाज


गिलोय (Giloy) से करे डेंगू का इलाज

गिलोय से डेंगू के इलाज के लिए सबसे पहले आप गिलोय बेल की डंडी ले, और डंडी के छोटे छोटे टुकड़े करें। अब इसे दो गिलास पानी मे उबालें, जब पानी आधा रह जाए तो इसे उबालना बंद कर दें। अब इसे ठंडा होने दे और ठंडा होते ही इसे रोगी को पिलाये। करीब 45 मिनट के बाद बॉडी में ब्लड प्लेटलेट्स बढ़ना शुरू हो जाएंगे।

हल्दी (Turmeric) से करे डेंगू का उपचार

हल्दी को आपकी चयापचय शक्ति यानी मेटाबोलिज्म और हीलिंग प्रक्रिया को बढ़ावा देने के लिए भी जाना जाता है। डेंगू के इलाज में आप हल्दी का सेवन आप दूध के साथ कर सकते हैं।

गेहूं के जवारे हैं अच्छे स्वास्थय की कुंजी. 

तुलसी की पत्तियों से बनी चाय
जैसा की उष्ण कटिबंधीय देशों में पारंपरिक विश्वास या ये माना जाता है कि, उबली हुई तुलसी का पानी पीने से न केवल डेंगू के लक्षण कम होते है बल्कि ये बुखार के प्रकोप को भी रोक सकता है। तुलसी के पत्तियों से बनी चाय से इस प्रकार करे डेंगू का इलाज:
चरण 1: सबसे पहले पंद्रह तुलसी के पत्तों को लें और उन्हें पानी में उबाल लें।
चरण 2: अब इस मिश्रण को ठंडा होने दे।
चरण 3: अब इस मिश्रण का हर दिन चार से पांच बार सेवन करे।
तुलसी कि पत्तो से बने पानी को पीने से पसीना अधिक आता है, जिसके परिणामस्वरूप मच्छर आपको नहीं काटते है। इसके अलावा तुलसी के पत्तो में सिनामाइक एसिड (Cinnamic acid) पाया जाता है, जो रक्त संचार (Blood Pressure), साँस लेने की समस्याओं में सुधार आदि में मदद करता है।
इसके अलावा तुलसी के पानी में २ ग्राम काली मिर्च मिलाकर इसका सेवन करने से आपकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है।
तुलसी की पत्तियों का इस्तेमाल वे व्यक्ति न करे;
जिन्ह ब्लीडिंग डिसऑर्डर है।
जिन्हे लौ ब्लड प्रेशर है

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प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा


18.12.17

सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस (गर्दन का दर्द) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार// Ayurvedic treatment of cervical spondylosis (neck pain)



   बीमारियां आजकल तेजी से इंसान के जीवन को प्रभावित कर रही हैं। छोटे रोग इंसान को आसानी से लग जाते हैं ​और एैसे में यदि इंसान अपनी सेहत पर ध्यान ना दें तो इससे उसकी परेशानी बढ़ सकती है। एैसी ही एक समस्या है सर्वाइकल के पेन की । जी हां ये दर्द हमारी गर्दन पर होता है जिसकी वजह से इसका असर हमारे रोज के काम काजों पर पड़ता है। एैसे में इस दर्द से निजात पाने के लिए क्या करना चाहिए। किन चीजों से इसका उपचार संभव है। इन सब की जानकारी हम आपको इस लेख में दे रहे हैं।
गोमूत्र और हल्दी से केन्सर का इलाज


सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस के दर्द का देसी घरेलू उपचार-
लहसुन-
जिन लोगों को अक्सर गर्दन का दर्द रहता है वे लहुसन का प्रयोग जरूर करें। जी हां 5 से 8 लहसुन की कलियां लें और थोड़ा सा सरसों का तेल लें। अब आप एक कड़ाही में सरसों का तेल डालें और उसे गर्म कर लें। और उपर से आप इसमें इन लहुसन की कलियों को डाल दें। जब यह भूरा हो जाए तब इसे छानकर किसी कटोरी में डाल दें। और फिर इससे अपने गर्दन और कंधे पर मालिश करें। एैसा आप रात को सोने से पहले करें।
सर्वाइकल स्पोंडिलोसिस (गर्दन का दर्द) का घरेलू आयुर्वेदिक उपचार तिल के तेल का इस्तेमाल  -    
शरीर को अंदर से गर्म रखकर दर्द से निजात दिलवाता है तिल का तेल। इस तेल में कई गुण होते हैं। कड़ाही के अंदर ही आप इस तेल को गर्म करें और फिर इसे अलग से रखकर इसे गुन गुना होने दें। इसके बाद आप इससे मालिश करें।। एैसा करने से गर्दन या सरवाइकल का दर्द धीरे—धीरे ठीक होेने लगता है।हरड़ का इस्तेमाल-
यदि आप हरड़ का सेवन करते हो इससे गर्दन में होने वाला सर्वाइकल दर्द ठीक हो जाएगा।

हमारा भोजन भी हमें कई तरह के दर्द से निजात दिलवा सकता है। साथ ही इससे हमारी सेहत भी अच्छी रहती है। आप अपनी डायट में पत्ता गोभी, टमाटर, मूली व खीरा के अलावा फलों का जैसे सेब, पपीता और अनार आदि को अधिक से अधिक शामिल करें।
पथ्य
परहेज करें-
आपको कुछ चीजों से परहेज जरूर करना है। एैसे में आप अधिक तली हुई चीजों, तंबाकू, धूम्रपान आदि का सेवन ना करें। इसके अलावा आप ध्यान और योग जरूर करें। इस तरह से आप सर्वाइकल पेन से जल्द ही मुक्त हो जाओगे।

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11.12.17

शिवलिंगी बीज के गुण उपयोग



    शिवलिंगी बीज एक आयुर्वेदिक औषधि हैं जिसका घटक सिर्फ एक बीज ही हैं और वो हैं ब्रयोनोप्सिस लेसिनियोसा का बीज जिसे समान्यतया शिवलिंगी कहा जाता हैं। शिवलिंगी बीज का प्रयोग पुरे देश में प्रजनन क्षमता बढ़ाने और स्त्रियों के रोग विकारो को दूर करने के लिए किया जाता हैं,इसका प्रयोग स्वस्थ बच्चे के जन्म के लिए भी किया जाता हैं। इसके अलावा शिवलिंगी बीज लिवर, श्वसन, पाचन तंत्र, गठिया, चयापचय विकारों और संक्रामक रोगों के लिए भी लाभदायक हैं,साथ में इसके सेवन से इम्युनिटी भी बढ़ती हैं। महिलायो में बाँझपन की समस्या मुख्यता हार्मोन्स के असन्तुलन की वजह से होती हैं पर शिवलिंगी बीज हार्मोन्स का संतुलन बनाये रखने में असरदार हैं,जिसकी वजह से महिलायो में बाँझपन की समस्या नही होती।
शिवलिंगी बीज के लाभ एवं उपयोग

  महिलाओं के यौन स्वास्थ्य में सुधार के लिए -


     शिवलिंगी बीज महिलाओं के रोगों की रोकथाम के लिए अत्यंत लाभदायक हैं जैसे महिलाओं की प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए इससे बेहतर और बिना दुष्प्रभावो के और कोई उत्पाद नही हैं इसके अलावा यह हार्मोन्स को संतुलित करता हैं जिससे महिलायो को मासिक धर्म अनियमितताओं से छुटकारा मिलता हैं।

गर्भधारण के लिए-

जैसा की पहले भी बताया गया हैं की यह औषधि हार्मोन्स को संतुलित करती हैं,जिसके परिणामस्वरूप महिलायो को सुरक्षित गर्भधारण करने में शिवलिंगी बीज मदद करती हैं और जो महिलाये बार बार हो रहे गर्भपात की समस्या से जूझ रही हो, उनके लिए भी यह लाभदायक हैं।
 
बाँझपन के लिए-

बाँझपन को दूर करने के लिए शिवलिंगी बीज एक उपयोगी औषधि हैं।
अन्य रोगों में भी लाभदायक
स्त्री रोगों के अलावा शिवलिंगी बीज इम्युनिटी बढ़ाने के लिए भी एक अच्छी औषधि हैं और गठिया, जोड़ो के दर्द, दमा और पाचन सम्बन्धी रोगों की रोकथाम करने में भी यह सहायक हैं।

औषधीय मात्रा निर्धारण एवं व्यवस्था-

शिवलिंगी बीजो को कूट कर पीस और छान लें, इसके बाद इसका पाउडर बना के रख लें। अच्छे परिणामो के लिए पुत्रजीवक बीजो के चूर्ण और शिवलिंगी पाउडर को मिक्स कर लें इसके बाद इस मिश्रण का एक चम्मच दिन में दो बार लें एक बार सुबह नाश्ते से एक घंटे पहले और शाम के भोजन के एक घंटे पहले और इसके सेवन से सम्बंधित सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह दिया जाता हैं की इस औषधि का सेवन गाय के दूध के साथ करना चाहिए और वो भी उस गाय के दूध के साथ जिसका बछड़ा हो।

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उलट कम्बल के लाभ और औषधीय प्रयोग

   

    उलट कम्बल गर्भाशय संबंधी विकारो की रोकथाम के लिए उपयुक्त औषधि हैं। इसके अलावा इसका सेवन करने से गठिया, गठिये में होने वाले दर्द, कष्टार्तव, मधुमेह जैसी समस्याओं में फायदा होता हैं। उलट कम्बल से साइनसाइटिस से होने वाले सिरदर्द से भी राहत मिलती हैं।

औषधीय भाग

जड़ और जड़ की छाल उलट कम्बल (एब्रोमा ऑगस्टा) का महत्वपूर्ण औषधीय भाग हैं। इसकी जड़ों का प्रयोग आयुर्वेदिक दवाओं में किया जाता हैं। यह गर्भाशय के लिए टॉनिक, आर्तवजनक, गर्भाशय के विकारो से मुक्त करने वाला और पीड़ानाशक होता हैं। इसी वजह से इसका प्रयोग भारतीय पारंपरिक दवाईयों में भी किया जाता हैं। कुछ मामलों में इसकी पत्तियां और तना भी राहत प्रदान करने का काम करती हैं।

आँव रोग (पेचिश) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार

औषधीय कर्म

उलट कम्बल में निम्नलिखित औषधीय गुण है:
गर्भाशय-बल्य
गर्भाशय उतेजक
आर्तव जनन
वेदनास्थापन – पीड़ाहर (दर्द निवारक)
चिकित्सकीय संकेत 
उलट कम्बल निम्नलिखित व्याधियों में लाभकारी है:

वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय 

रजोरोध

अनियमित माहवारी (अनियमित ऋतुस्त्राव)
संधिशोथ 

उलट कम्बल के लाभ और औषधीय प्रयोग

उलट कम्बल कई बिमारियों के लिए एक बहुत अच्छी आयुर्वेदिक औषधि हैं। इसके कुछ लाभ और औषधीय प्रयोग इस प्रकार हैं।
उलट कम्बल के जड़ की छाल मासिक धर्म को नियंत्रित करने सहायक हैं। यह औषधि हार्मोन्स को संतुलित करती हैं। जिससे अंडे (अंडाणु) के बनने की प्रक्रिया भी संतुलित होती हैं।

रजोरोध, अनियमित माहवारी और अंडे (अंडाणु) का न बनना

यह औषधि दोनों तरह की रजोरोध में भी लाभदायक हैं। यह अंडाशय को उभारता हैं, जिससे हार्मोन्स संतुलित होते हैं। यह माहवारी को शुरू करने में सहायक है।
माहवारी न आती हो (रजोरोध के इलाज के लिए)
इन बिमारियों में उलट कम्बल की जड़ की छाल का चूर्ण (1 to 3 ग्राम) और काली मिर्च (125 से 500 मिलीग्राम) दिये जाते हैं। इस औषषि का सेवन पानी के साथ तब तक किया जाता हैं जब तक की माहवारी शुरू न हो जाये।

माहवारी नियमित करने के लिए

इस औषधि का सेवन माहवारी आने की तिथि से सात दिन पहले शुरू किया जाता हैं। महावरी के चार दिन बाद तक इस औषधि को दिया जाता हैं। इस उपाय से माहवारी नियमित हो जाती हैं। ऐसे ही इसका प्रयोग कम से कम चार महीनो तक करना चाहिए।

मलेरिया रोग के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

कष्टार्तव

उलट कंवल जड़ की छाल माहवारी में होने वाली दर्द और माहवारी से पहले के दर्द और अन्य लक्षण पर भी अपना असर डालती हैं। इन रोगों का उपचार करने के लिए, जड़ की छाल के चूर्ण का सेवन माहवारी आने की तारीख से 3 से 7 दिन पहले शुरू करना चाहिए। इसका सेवन तब तक करना चाहिए जब तक ब्लीडिंग रुक न जाये।

संधिशोथ

उलट कम्बल का प्रयोग संधिशोथ में बहुत ही कम किया जाता हैं। मगर इस औषधि में सूजन और पीड़ा कम करने वाले गुण होते हैं। इस गुणों की वजह से संधिशोथ के रोगियों को जोड़ो में होने वाली सूजन और पीड़ा से राहत मिलती हैं।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

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27.11.17

शरीर के विषैले तत्वों से छुटकारा पाने के आसान तरीके



    विषहरण करना (Detox), या विषहरण आहार-संयम शरीर को विषाक्त पदार्थों से मुक्त करने की पद्धति है। 
    क्या आप हमेशा सुस्ती का अनुभव करते हैं? क्या अचानक से आपके चेहरे पर मुहांसे और त्वचा पर फुंसी निकल आती हैं? क्या आप अपने पाचन तंत्र में गड़बड़ी महसूस कर रहे हैं? अगर हां, तो आपके शरीर को डीटाक्स करने की जरूरत है। एक स्वस्थ्य जिंदगी का सबसे बड़ा राज यह है कि अपने शरीर से विषैले तत्वों को निकाला जाए। इसलिए अब तक आप अपने शरीर के साथ जो बुरा करते आए हैं, उन्हें सुधार लें। आइए हम आपको बताते हैं कुछ आसान तरीके, जिन्हें अपना कर आप अपने शरीर में मौजूद विषैले तत्वों से छुटकारा पा सकते हैं।
   *एंटी-ऑक्सीडेंट की आदत डालें डीटाक्सीफाइ का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप ज्यादा से ज्यादा फल और हरी सब्जियां खाएं। इससे लीवर एंजाइम सक्रिय होंगे और शरीर में मौजूद नुकसानदायक पदार्थो को बाहर निकालने में मदद करेंगे।
विषहरण-फलाहार करें: 

अपने को भूखा रखे बिना उपवास करने का एक शानदार तरीका विषहरण-फलाहार है। इसके जहां कई अन्य स्वास्थ्य वर्द्धक फायदे हैं, वहीं पर्याप्त मात्रा में फल खाने से आपकी ऊर्जा के स्तर में बढ़ोतरी हो सकती है, वजन संतुलित करने में मदद मिल सकती है, यहां तक कि आघात (stroke) की संभावना को भी कम किया जा सकता हैं। कई प्रकार के फलों के समन्वय या सिर्फ एक ही किस्म का फल खाकर आप विषहरण कर सकते हैं। सर्वोत्तम परिणाम के लिए, वह फल चुनिए जिसे खाने में आपको मज़ा आता है, इससे आप अपने को पीड़ित महसूस नहीं करेंगे। केवल फलाहार पर एक बार में लगातार 7 दिनों से ज्यादा न रहें।
इन फलों में सर्वाधिक विषहारी क्षमता होती है और संतरे, कीनू, अंगूर, नींबू इनमें शामिल हैं।आप इन्हें ऐसे ही खा सकते हैं, या अन्य फलों में इन्हें मिलाकर खा सकते हैं। एक बार फिर ध्यान दीजिए, केवल फलाहार पर एक बार में लगातार 7 दिनों से ज्यादा न रहें।
*खट्टे फल खाएँ: 
*अंगूर-विषहरण (grape detox) को आजमाइए: 
अंगूर में रिज्वेराट्रोल होते हैं, जो कैंसर और मधुमेह से रक्षा कर सकते हैं, और संभवतः खून के थक्कों को रोक सकते हैं। यह पोटैशियम और विटामिन C का एक बड़ा स्रोत भी है। 3-5 दिनों तक अंगूर के सिवाय कुछ भी न खाएँ।
*ऑर्गेनिक प्रोडक्ट का चयन करें कीटनाशक दवाइयों और विषैले तत्वों के खतरे से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि ऑर्गेनिक फूड का सहारा लिया जाए।
हर्बल चाय का सेवन करें 
पाचन तंत्र की समस्या से निजात पाने के लिए ग्रीन टी या कैमोमाइल टी का सेवन करें। इससे नींद भी अच्छी आएगी। ये चाय शरीर में रक्त संचार को भी बढ़ाता है, जो शरीर से विषैले तत्वों को हटाने में मददगार होते हैं।

सोरायसिस(छाल रोग) के आयुर्वेदिक उपचार 

*हल्का खाना खाएं 
लगातार हल्का आहार लें और करीब एक महीने तक शराब से दूर रहें। इस विधि से न सिर्फ आपकी ऊर्जा बढ़ेगी, बल्कि इससे आपके वजन के साथ-साथ कोलेस्ट्रोल और ब्लड सूगर का स्तर भी कम होगा
हर दिन 45 मिनट व्यायाम करें अपने दिन की शुरुआत ब्रिस्क वॉकिंग, रनिंग, जॉगिंग या साइकलिंग से करें। इससे शरीर के साथ-साथ दिमाग को भी लाभ पहुंचेगा।
*सिर्फ पेय लेकर उपवास करें: 
2-3 दिनों के लिए पेय (पानी, चाय, फलों का रस, सब्जी का रस, और / या प्रोटीन शेक) के अलावा कुछ भी न खाएँ। तरल आहार कैलोरी की मात्रा को सीमित करके वजन घटाने में काफी मदद कर सकते हैं, और माना जाता है कि, कुछ जहरीले तत्वों को बाहर निकालकर ये आपके शरीर की सफाई करते हैं, हालाँकि इस दावे के पक्ष में किसी ठोस अनुसंधान का साक्ष्य नहीं है।
सिर्फ पेय लेकर उपवास के दौरान फल और / या सब्जियों का रस शामिल करना न भूलें, जिससे आपके शरीर को उचित पोषण मिलना निश्चित हो सके।
*आपका लक्ष्य यदि वजन कम करना है, तो पेय उपवास ख़त्म होते ही आपको अपने खाने की आदतों में परिवर्तन करना होगा, वरना आप घटाए गए वजन को जल्दी ही दोबारा हासिल कर लेंगे।
चीनी को कहें ना अगर आप अपने शरीर के मेटाबोलिज्म को बढ़ाना चाहते हैं और इसे विषैले तत्वों से दूर रखना चाहते हैं, तो चीनी सेवन की मात्रा घटा दीजिए। हर तरह के मीठे से जहां तक हो सके दूरी बनाइए।
*खुद का एंटी-ऑक्सीडेंट बनाएं
 ज्यादा से ज्यादा लहसुन और अंडे खाएं। ये सल्फ्यूरिक तत्वों से भरपूर होते हैं। ये तत्व शरीर में ग्लूथाथीओन नामक एंटी-ऑक्सीडेंट के निर्माण में सहायक होते हैं। ये शरीर में मौजूद रसायन और भारी धातु सहित अन्य विषैले तत्वों को भी बाहर निकाल देते हैं।

छोटे वक्ष को उन्नत और सूडोल बनाएँ

*पर्याप्त मात्रा में पानी पीजिए: 
आपकी सेहत के लिए पर्याप्त पानी आवश्यक है। कई प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी फायदों के अलावा, यह आपके शरीर के तरल पदार्थ के स्तर को बनाए रखने में मदद करता है, जिससे शरीर से मुख्य जहरीले तत्वों, रक्त की यूरिया नाइट्रोजन आदि को बाहर निकालने में गुर्दे को काफी सहायता मिलती है।
नींबू का शरबत पीजिए। पानी में नींबू, संतरा, या मुसम्मी घोलकर दिन भर पीते रहें। इन फलों में साइट्रिक एसिड होता है, जो शरीर की वसा (fat) में कटौती करता है।इसके अतिरिक्त, पानी में स्वाद लाने से रोजाना 8 ग्लास पी पाना आपके लिए आसान हो जाएगा! नींबू से दांतों के अम्लीय क्षय (acid erosion) को रोकने के लिए भोजन के अंतराल में ब्रश करते रहें।
*योग करें 
योग न सिर्फ डीटाक्सीफाइ में मददगार होता है, बल्कि इससे दिमाग को भी फायदा पहुंचता है। हर सुबह आप कुछ साधारण योग करके भी अपने शरीर के विषैले तत्वों से छुटकारा पा सकते हैं।
नाक की करें सफाई हम एक ऐसे वातावरण में रहते हैं, जो धूल और प्रदुषण से भरे पड़े हैं। इससे आपको एलर्जी हो सकती है। इससे बचने के लिए अपने नाक को नियमित रूप से धोएं। ऐसा करने पर वायु प्रदुषक से छुटकारा मिलेगा और नींद भी अच्छी आएगी।
*गहरी सांस लें गहरी सांस लें। इससे स्वास्थ्य बेहतर होने के साथ-साथ पूरे शरीर में ऑक्सीजन का भी अच्छे से संचार होगा।
*सात दिनों तक केवल फल और सब्जियां खायें: फलों और सब्जियों में विटामिन, खनिज तत्व (minerals) और अन्य पोषक तत्व (nutrients) होते हैं, जिनकी जरूरत सेहतमंद रहने के लिए आपके शरीर को पड़ती है। शरीर को उचित मात्रा में आवश्यक पोषक तत्व मिलता रहे, यह निश्चित करने के लिए विविधतापूर्ण आहार लेने का ख़ास ख़याल रखें। अपने 7 दिवसीय उपवास के दौरान क्या खाना है, यह तय करने के लिए आगे बताए गए गाइड का इस्तेमाल कीजिए:
राजमा, काली सेम, सेब, सोयाबीन, ब्लूबेरी, और वज्रांगी (artichoke) से रेशे (fiber) प्राप्त करें।
गाजर, केले, लीमा बीन्स (फली), सफेद आलू, पकाये गए साग, और शकरकंद से पोटैशियम प्राप्त करें।
कीवी, स्ट्रॉबेरी, गोभी, फूलगोभी, टमाटर, संतरा, अंकुरित ब्रसेल्स, आम, और शिमला मिर्च से विटामिन C लें।
पकाई हुई पालक, खरबूजे, शतावरी, संतरे, और लोबिया से फोलेट (folate) प्राप्त कीजिए।
रुचिरा (avocado), जैतून, और नारियल से स्वास्थ्यकारी वसा (good fat) पाइए।
*धीरे-धीरे खाएं खाना 
धीरे-धीरे खाएं। भले ही इसमें ज्यादा समय लगे, पर भोजन को अच्छी तरह से चबाएं। धीरे-धीरे खाने से पाचन की समस्या से निजात मिलेगा और आप अपने भोजन का आनंद भी उठा सकेंगे।
*लेमन जूस पीएं एक ग्लास लेमन जूस पीने से न सिर्फ शरीर शुद्ध होता है, बल्कि इससे शरीर में क्षार की मात्रा भी बढ़ती है। यह एक सर्वश्रेष्ठ डीटाक्स ड्रिंक है। इसलिए ताजे लेमन जूस पीने पर ज्यादा ध्यान दें।
जूस पीएं ताजे फलों और सब्जियों के जूस पीने की मात्रा को बढ़ाएं।
*माइक्रोवेव से बचें खाने को माइक्रोवेव में रखने से इसमें मौजूद प्रोटीन की संरचना बदल जाती है। इसे खाने से शरीर को काफी नुकसान पहुंचता है। इतना ही नहीं, माइक्रोवेव से रेडिएशन भी निकलता है, जो शरीर को नुकसान पहुंचाता है।
*कुछ आदतों को छोड़ें अगर आप सिगरेट और शराब का अधिक सेवन करते हैं, तो यह आदत छोड़ दें। यहां तक की थोड़ा सिगरेट पीना भी शरीर के लिए नुकसानदायक होता है। इसके अलावा, अगर आप शराब पीते हैं, तो इसे जहां तक हो सके, कम से कम पीएं।
*आराम भी करें आलस्य और सुस्ती से छुटकारा पाने के लिए जरूरी है कि आप पर्याप्त नींद लें। इस बात को सुनिश्चित करें कि आप हर दिन 8 घंटे की नींद लेते हों।

बालों के झड़ने और गंजेपन के रामबाण उपचार 

*ध्यान कीजिए : 
कई धर्मों और दर्शन में मन को एकाग्रचित्त करने और मन में शांति-भाव विकसित करने के एक माध्यम के रूप में उपवास का समर्थन है। अपने शरीर को विष-मुक्त करते समय, शिकवे-शिकायतें, क्रोध, उदासी, और अन्य नकारात्मक भावों से अपने आप को दूर करने का प्रयास करें। जिस समय आप खाना बना रहे हैं, या खा रहे हैं, उस समय का उपयोग अपने लक्ष्यों और आकांक्षाओं के बारे में सोचने में करें। एक डायरी या जर्नल में अपनी सोच को परिष्कृत कीजिए।





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हस्त मैथुन से उत्पन्न यौन दुर्बलता के उपचार

25.11.17

भोजन मे कार्बोहाईड्रेट का महत्व जाने



यह सच है कि भोजन से कार्बोहाइड्रेट की कटौती करने से वजन अचानक से कम होता है लेकिन शरीर में इसकी कमी हो जाती है। भोजन में पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइड्रेट के नहीं होने से ब्लड ग्लूकोज कम हो जाता है साथ ही साथ शरीर में स्टोर ग्लाइकोजेन भी कम हो जाता है। और लगातार कार्बोहाइड्रेट की कमी रहने से कई सारी परेशानियों के लक्षण उभरने लगते हैं।

ऐसिडोसिस : जब शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है तो कार्बोहाइड्रेट की स्थिति में ग्लाइकोलाइसिस लिपोलाइसिस और केटोजेनेसिस की ओर शिफ्ट हो जाता है। केटोजेनेसिस की वृद्धि से रक्त और शरीर के अन्य टिशूज में अम्लता बढ़ जाती है इससे धमनियों के रक्त का पीएच मान बदल जाता है और इसकी वजह से कोशिकाओं की अपूरणीय क्षति हो जाती है।
हाइपोग्लाइसेमिया :
कार्बोहाइड्रेट के अभाव में ग्लूकोज की अनुपलब्धता हो जाती है जिससे कि ब्लड शुगर का स्तर गिर जाता है।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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