2017-01-31

जायफल (Nutmeg) के आयुर्वेदिक और औषधीय गुण// the herbal and medicinal properties of nutmeg

     

    जायफल या मीरीस्टिका फ्रेगरैन्स् एक सदाबहार वृक्ष है जो इन्डोनेशिया  मूल का  है। इस पेड़ के फल 2 अलग-अलग मसालों के स्रोत हैं- जायफल और जाविंत्री। जायफल के बीज एक पीले रंग के खाने योग्य फल के अंदर होते हैं, जिसका आकार लगभग छोटे आडू जैसा होता है। यह फल दो भाग में कटकर, जाल जैसा, लाल रंग का आकार दर्शाता है जिसके अंदर बीज बँधा रहता है। इस बीजचोल को जमा कर, सूखाकर जाविंत्री के रुप में बेचा जाता है। इस बीजचोल के बीच में गहरे रंग का चमकीला मेवे जैसा आकार होता है और इसके अंदर अंडे के आकार का बीज होता है, जिसे जायफल कहते हैं।
जायफल को अकसर जाविंत्री या कड़े परत के बिना बेचा जाता है। यह अंडाकार और लगभग 1″ लंबे होते, हल्के सिकुड़े हुए और बाहर से गहरे भुरे रंग और अंदर से हल्के भुरे रंग के होते हैं। जायफल और जाविंत्री का स्वाद लगभग समान होता है और समान गुण होते हैँ। जायफल थोड़ा मीठा होता है ओर वहीं जाविंत्री का स्वाद सौम्य होता है। जाविंत्री को अकसर हल्के व्यंजन में डाला जाता है, जहाँ यह व्यंजन को नारंगी, केसर जैसा रंग प्रदान करता है और वहीं जायफल ज़रुरी तेज़ स्वाद प्रदान करता है, जैसे चीज़ सॉस में। जायफल  को बहुधा  कद्दूकस कर के खाने में डाला जाता है।
   अत्यधिक मात्रा में प्रयोग करने पर, जायफल द्रव्य पदार्थ के रुप में काम करता है और यह जहरीला भी हो सकता है। इसलिए, हर बार में एक या दो चुटकी से ज़्यादा प्रयोग ना करें।
जायफल यूं तो सर्दियों में उपयोगी है लेकिन इसकी औषधीय महत्ता आयुर्वेद में साल भर मानी गई है। यह वेदनानाशक, वातशामक और कृमिनाशक है। स्नायविक संस्थान के लिए उपयोगी होता है। यकृत को सक्रिय करने वाला और सुपाच्य होने से पाचन संस्थान के लिए उपयोगी होता है।
जायफल के गुण : 
यह स्वाद में चरपरा, कड़वा, कसैला, पचने पर कटु तथा हल्का, चिकना, तीक्ष्ण और गर्म है। इसका मुख्य प्रभाव पाचन-संस्थान पर ग्राही रूप में पड़ता है। यह शोथहर, पीड़ाशामक, दुर्गन्धनाशक, अग्निदीपक, वायुज्वरहर तथा कटु-पौष्टिक है।
अनिद्रा, खांसी, सांस, हिचकी, शीघ्रपतन और नपुंसकता आदि व्याधियां दूर करने में उपयोगी होता है। इसके चूर्ण और तेल को उपयोग में लिया जाता है।
नपुंसकता : 
 
जायफल को घिस कर दूध में मिलाकर हफ्ते में तीन दिन पीने से नपुंसकता की बीमारी दूर होती है। यौन शक्ति बढ़ाने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके चूर्ण और तेल को शीघ्रपतन दूर करने में उपयोग में लिया जाता है।
  * इसे थोडा सा घिसकर काजल की तरह आँख में लगाने से आँखों की ज्योति बढ़ जाती है और आँख की खुजली और धुंधलापन ख़त्म हो जाता है।
*यह शरीर की स्वाभाविक गरमी की रक्षा करता है, इसलिए ठंड के मौसम में इसे जरूर प्रयोग करना चाहिए।
यह कामेन्द्रिय की शक्ति भी बढाता है।
*जायफल  आवाज में सम्मोहन भी पैदा करता है।
*जायफल और काली मिर्च और लाल चन्दन को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर चेहरे पर लगाने से चेहरे की चमक बढ़ती है, मुहांसे ख़त्म होते हैं।
*किसी को अगर बार-बार पेशाब जाना पड़ता है तो उसे जायफल और सफ़ेद मूसली 2-2 ग्राम की मात्र में मिलाकर पानी से निगलवा दीजिये, दिन में एक बार, खाली पेट, 10 दिन लगातार।
*बच्चों को सर्दी-जुकाम हो जाए तो जायफल का चूर्ण और सोंठ का चूर्ण बराबर मात्रा में लीजिये फिर 3 चुटकी इस मिश्रण को गाय के घी में मिलाकर बच्चे को चटा दीजिये। सुबह शाम चटायें।
*फालिज का प्रकोप जिन अंगों पर हो उन अंगों पर Jayephal को पानी में घिसकर रोज लेप करना चाहिए, दो माह तक ऐसा करने से अंगों में जान आ जाने की 80%संभावना देखी गयी है।प्रसव के बाद अगर कमर दर्द नहीं ख़त्म हो रहा है तो जायफल पानी में घिसकर कमर पे सुबह शाम लगाएं, एक सप्ताह में ही दर्द गायब हो जाएगा।
*पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है, इसे महीन पीसकर बीवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।
 

*जायफल के चूर्ण को शहद के साथ खाने से ह्रदय मज़बूत होता है। पेट भी ठीक रहता है।
*अगर कान के पीछे कुछ ऎसी गांठ बन गयी हो जो छूने पर दर्द करती हो तो Jayephal को पीस कर वहां लेप कीजिए जब तक गाठ ख़त्म न हो जाए, करते रहिये।
*अगर हैजे के रोगी को बार-बार प्यास लग रही है, तो Jayephal को पानी में घिसकर उसे पिला दीजिये।
जी मिचलाने की बीमारी भी Jayephal को थोड़ा सा घिस कर पानी में मिला कर पीने से नष्ट हो जाती है।
*सर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो तो बस जायफल  को पानी में घिस कर लगाएं।
*सर्दी के मौसम के दुष्प्रभाव से बचने के लिए जायफल  को थोड़ा सा खुरचिये, चुटकी भर कतरन हो जाए तो उसे मुंह में रखकर चूसते रहिये। यह काम आप पूरे जाड़े भर एक या दो दिन के अंतराल पर करते रहिये।
*आपको किन्हीं कारणों से भूख न लग रही हो तो चुटकी भर जायफल  की कतरन चूसिये इससे पाचक रसों की वृद्धि होगी और भूख बढ़ेगी, भोजन भी अच्छे तरीके से पचेगा।
*दस्त आ रहे हों या पेट दर्द कर रहा हो तो जायफल  को भून लीजिये और उसके चार हिस्से कर लीजिये एक हिस्सा मरीज को चूस कर खाने को कह दीजिये। सुबह शाम एक-एक हिस्सा खिलाएं।

पुनर्नवा के गुण,लाभ,उपचार //Punarnava benefits and treatment


    पुनर्नवा का संस्कृत पर्याय 'शोथघ्नी' (सूजन को हरनेवाली) है। पुनर्नवा (साटी) या विषखपरा के नाम से विख्यात यह वनस्पति वर्षा ऋतु में बहुतायत से पायी जाती है। शरीर की आँतरिक एवं बाह्य सूजन को दूर करने के लिए यह अत्यंत उपयोगी है।
पुनर्नवा का अभिप्राय यह है कि जो रसायन व रक्तवर्धक होने से शरीर को फिर से नया जैसा बना दे, उसे पुनर्ववा कहते हैं। पुनर्नवा का सूखा पौधा बारिश के मौसम में नया जीवन पाकर फूलने-फलने लगता है। पुनर्नवा पूरे भारत में खासकर गर्म प्रदेशों में बहुतायत से प्राप्त होता है। हर साल बारिश के मौसम में नए पौधे निकलना और गर्मी के मौसम में सूख जाना इसकी खासियत होती है। पुनर्नवा की 2 प्रकार की जातियां लाल और सफेद पाई जाती हैं। इनमें रक्त (खून) जाति वनस्पति का प्रयोग अधिकता से औषधि के रूप में किया जाता है। पुनर्नवा का कांड (तना), पत्ते, फूल सभी रक्त (खून या लाल) रंग के होते हैं। फलों के पक जाने पर वायवीय भाग सूख जाता है। परंतु भूमि में पड़ी रहती है, जो बारिश के मौसम में फिर से उग आती है।

    पुनर्नवा की तीन जातियां होती हैं। सफेद फूल वाली को विषखपरा, लाल फूल वाली को साठी और नीली फूल वाली को पुनर्नवा कहते हैं। सफेद पुनर्नवा की जड़ को पीस घी में मिलाकर आंख में लगाने से आंखों की रोशनी बढ़ती है। आंखों में अगर खुजली हो रही हो तो इसे लगाने से फायदा होता है। रतौंधी के मरीज अगर गाय के गोबर के रस में पीपल के साथ उबालकर आंख में लगायें तो रतौंधी में लाभ होता है। लाल पुनर्नवा यानी साठी कड़वी और ठंडी होती है जो कि सांस की समस्‍या, कफ, पित्‍त और खून के विकार को समाप्‍त करती है।
गुण : 
श्वेत पुनर्नवा भारी, वातकारक और पाचनशक्तिवर्द्धक है। यह पीलिया, पेट के रोग, खून के विकार, सूजन, सूजाक (गिनोरिया), मूत्राल्पता (पेशाब का कम आना), बुखार तथा मोटापा आदि विकारों को नष्ट करती है। पुनर्नवा का प्रयोग जलोदर (पेट में पानी का भरना), मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में परेशानी या जलन), घाव की सूजन, श्वास (दमा), हृदय (दिल) रोग, बेरी-बेरी, यकृत (जिगर) रोग, खांसी, विष (जहर) के दुष्प्रभाव को दूर करता है। यूनानी चिकित्सा पद्धति के अनुसार पुनर्नवा दूसरे दर्जे की गर्म और रूक्ष होती है। यह गुर्दे के कार्यो में वृद्वि करके पेशाब की मात्रा बढ़ाती है, खून साफ करती है, सूजन दूर करती है, भूख को बढ़ाती है और हृदय के रोगों को दूर करती है। इसके साथ ही यह बलवर्द्धक, खून में वृद्धि करने वाला, पेट साफ करने वाला, खांसी और मोटापा को कम करने वाला होता है।
दमा के मरीजों के लिए भी यह बहुत फायदेमंद है। दमा के मरीज चंदन के साथ मिलाकर इसका सेवन करें। इससे कफ आना बंद होता है और दमे से श्‍वांस की नली में हुई सूजन भी समाप्‍त होती है। अपच होने पर पुनर्नवा का सेवन करने से फायदा होता है। गोनोरिया होने पुनर्नवा का प्रयोग करना चाहिए। इससे पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है और गोनोरिया के घाव पेशाब के रास्‍ते बाहर निकल जाते हैं। गोनोरिया के रोगी को पुनर्नवा की जड़ पीसकर देना चाहिए।
कफ की समस्‍या होने पर थोड़ी-थोड़ी मात्रा में दिन में कई बार नीला पुनर्नवा देने से फायदा होता है। ऐसा करने से उल्‍टी के साथ कफ निकल जाता है और मरीज को आराम मिलता है। पुनर्नवा का प्रयोग करने से दिल पर खून का दबाव बढ़ता है जिसके कारण ब्‍लड सर्कुलेशन तेजी से होता है और खून से होने वाले वाले विकार नही होते हैं।
किडनी पर इसका प्रभाव पड़ता है और किडनी संबंधित बीमारियों के होने की संभावना कम होती है। हर रोज पुनर्नवा का रस 1 से 4 ग्राम देने पर गुर्दे के संक्रमण होने की कम संभावना होती है। इसमें पाया जाने वाला पोटैशियम नाइट्रेट और अन्‍य पोटैशियम के यौगिक विद्यमान होते हैं। जोड़ो में हो रहे दर्द को दूर करने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए। यह गठिया के मरीजों के लिए फायदेमंद है। 
चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
विद्राधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
*इसके पत्‍तों को पीसकर लें, उसे गरम करके जोड़ों पर लगाने से फायदा होता है।
*पुनर्नवा के पत्‍ते विषनाशक होते हैं। सांप के काटने पर पुनर्नवा के पत्‍तों को पीसकर उसका रस निकाल सांप के कटे वाली जगह पर लगाने से विष का प्रभाव कम हो जाता है। यह बिच्‍छू का विष भी कम करता है। बिच्‍छू का डंक लगने पर इसकी जड़ को पानी में घिसकर लगाने से फायदा होता है।
मात्रा : पुनर्नवा के पत्तों का रस 10 से 20 मिलीलीटर, जड़ का चूर्ण 3 से 5 ग्राम, बीजों का चूर्ण 1 से 3 ग्राम, पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) चूर्ण 5 से 10 ग्राम।
और भी-
 *पेट के रोगः गोमूत्र एवं पुनर्नवा का रस समान मात्रा में मिलाकर पियें।
*श्लीपद (हाथीरोग) : 50 मि.ली. पुनर्नवा का रस और उतना ही गोमूत्र मिलाकर सुबह शाम पियें।
*वृषण शोथः पुनर्नवा का मूल दूध में घिसकर लेप करने से वृषण की सूजन मिटती है। यह हाड्रोसील में भी फायदेमंद है।
*हृदयरोगः हृदयरोग के कारण सर्वांगसूजन हो गयी हो तो पुनर्नवा के मूल का 10 ग्राम चूर्ण और अर्जुन की छाल का 10 ग्राम चूर्ण 200 मि.ली. पानी में काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पियें।
*श्वास (दमा) : 10 ग्राम भारंगमूल चूर्ण और 10 ग्राम पुनर्नवा चूर्ण को 200 मि.ली. पानी में उबालकर काढ़ा बनायें। जब 50 मि.ली. बचे तब उसमें आधा ग्राम श्रृंगभस्म डालकर सुबह-शाम पियें।
*रसायन प्रयोगः हमेशा उत्तम स्वास्थ्य बनाये रखने के लिए रोज सुबह पुनर्नवा के मूल का या पत्ते का 2 चम्मच (10 मि.ली.) रस पियें अथवा पुनर्नवा के मूल का चूर्ण 2 से 4 ग्राम की मात्रा में दूध या पानी से लें या सप्ताह में 2 दिन पुनर्नवा की सब्जी बनाकर खायें।
*गैसः 2 ग्राम पुनर्नवा के मूल का चूर्ण, आधा ग्राम हींग तथा 1 ग्राम काला नमक गर्म पानी से लें।
स्थूलता-मेदवृद्धिः पुनर्नवा के 5 ग्राम चूर्ण में 10 ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम लें। पुनर्नवा की सब्जी बना कर खायें।
*मूत्रावरोधः पुनर्नवा का 40 मि.ली. रस अथवा उतना ही काढ़ा पियें। पुनर्नवा के पान बाफकर पेड़ू पर बाँधें। 1 ग्राम पुनर्नवाक्षार (आयुर्वेदिक औषधियों की दुकान से मिलेगा) गरम पानी के साथ पीने से तुरंत फायदा होता है।
*खूनी बवासीरः पुनर्नवा के मूल को पीसकर फीकी छाछ (200 मि.ली.) या बकरी के दूध (200 मि.ली.) के साथ पियें।
*चूहे का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 2-2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम शहद के साथ दिन में 2 बार दें।
*पागल कुत्ते का विषः सफेद पुनर्नवा के मूल का 25 से 50 ग्राम रस, 20 ग्राम घी में मिलाकर रोज पियें।
*विद्रधि (फोड़ा) : पुनर्नवा के मूल का काढ़ा पीने से कच्चा अथवा पका हुआ फोड़ा भी मिट जाता है।
*अनिद्राः पुनर्नवा के मूल का क्वाथ 100-100 मि.ली. दिन में 2 बार पीने से निद्रा अच्छी आती है।
*संधिवातः पुनर्नवा के पत्तों की भाजी सोंठ डालकर खायें।
*वातकंटकः वायुप्रकोप से पैर की एड़ी में वेदना होती हो तो पुनर्नवा में सिद्ध किया हुआ तेल पैर की एड़ी पर पिसें एवं सेंक करें।
*योनिशूलः पुनर्नवा के हरे पत्तों को पीसकर बनायी गयी उँगली जैसे आकार की सोगटी को योनि में धारण करने से भयंकर योनिशूल भी मिटता है।
*विलंबित प्रसव-मूढ़गर्भः पुनर्नवा के मूल के रस में थोड़ा तिल का तेल मिलाकर योनि में लगायें। इससे रुका हुआ बच्चा तुरंत बाहर आ जाता है।
*नेत्रों की फूलीः पुनर्नवा की जड़ को घी में घिसकर आँखों में आँजें।
*नेत्रों की खुजलीः पुनर्नवा की जड़ को शहद अथवा दूध में घिसकर आँजने से लाभ होता है।
*नेत्रों से पानी गिरनाः पुनर्नवा की जड़ को शहद में घिसकर आँखों में आँजने से लाभ होता है।
*रतौंधीः पुनर्नवा की जड़ को काँजी में घिसकर आँखों में आँजें।
*खूनी बवासीरः पुनर्नवा की जड़ को हल्दी के काढ़े में देने से लाभ होता है।
*पीलियाः पुनर्नवा के पंचांग (जड़, छाल, पत्ती, फूल और बीज) को शहद एवं मिश्री के साथ लें अथवा उसका रस या काढ़ा पियें।
*मस्तक रोग व ज्वर रोगः पुनर्नवा के पंचांग का 2 ग्राम चूर्ण 10 ग्राम घी एवं 20 ग्राम शहद में सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
*जलोदरः पुनर्नवा की जड़ के चूर्ण को शहद के साथ खायें।
*सूजनः पुनर्नवा की जड़ का काढ़ा पिलाने एवं सूजन पर लेप करने से लाभ होता है।
*पथरीः पुनर्नवामूल को दूध में उबालकर सुबह-शाम पियें।

2017-01-29

आंकड़ा(मदार)के गुण,लाभ,उपयोग

     

     वैसे तो आकडे (मदार) का पौधा हर जगह देखने को मिल जाता है लेकिन इसके उपयोग की जानकारी कम लोगो को है इसलिए  यहाँ हम आपको इसके प्रयोग की जानकारी दे रहे है. आक-अर्क के पौधे, शुष्क, ऊसर और ऊँची भूमि में प्राय: सर्वत्र देखने को मिलते हैं|
     इस वनस्पति के विषय में साधारण समाज में यह भ्रान्ति फेंली हुई है कि आक का पौधा विषेला होता है तथा यह मनुष्य के लिये घातक है| इसमें किंचित सत्य जरूर है क्योकि आयुर्वेद संहिताओं मे भी इसकी गणना उपविषों में की गई है. यदि इसका सेवन अधिक मात्रा में कर लिया जाये तो, उलटी दस्त होकर मनुष्य यमराज के घर जा सकता है|
इसके विपरीत यदि आक का सेवन उचित मात्रा में, योग्य तरीके से, चतुर वैद्य की निगरानी में किया जाये तो अनेक रोगों में इससे बडा फायदा होता है| इसका हर अंग दवा है, हर भाग उपयोगी है एवं यह सूर्य के समान तीक्ष्य. तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायन धर्मा हैं।
   *आक के पौधे की पत्ती को उल्टा (उल्टा का मतलब पत्ते का खुदरा भाग) कर के पैर के तलवे से सटा कर मोजा पहन लें. सुबह और पूरा दिन रहने दे रात में सोते समय निकाल दें. एक सप्ताह में आपका शुगर लेवल सामान्य हो जायेगा. साथ ही बाहर निकला पेट भी कम हो जाता है|


  
*आक का हर अंग दवा है, हर भाग उपयोगी है. यह सूर्य के समान तीक्ष्ण तेजस्वी और पारे के समान उत्तम तथा दिव्य रसायनधर्मा हैं. कहीं-कहीं इसे ‘वानस्पतिक पारद’ भी कहा गया है. आक के कोमल पत्ते मीठे तेल में जला कर अण्डकोश की सूजन पर बाँधने से सूजन दूर हो जाती है. तथा कडुवे तेल में पत्तों को जला कर गरमी के घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है.
इसके कोमल पत्तों के धुंए से बवासीर शाँत होती है.
    *आक के पत्तों को गरम करके बाँधने से चोट अच्छी हो जाती है. सूजन दूर हो जाती है. आक की जड के चूर्ण में काली मिर्च पिस कर मिला ले और छोटी छोटी गोलियाँ बना कर खाने से खाँसी दूर होती है.
   *आक की जड की राख में कडुआ तेल मिलाकर लगाने से खुजली अच्छी हो जाती है. आक की सूखी डँडी लेकर उसे एक तरफ से जलावे और दूसरी ओर से नाक द्वारा उसका धूँआ जोर से खींचे शिर का दर्द तुरंत अच्छा हो जाता है.
*आक का पत्ता और ड्ण्ठल पानी में डाल रखे उसी पानी से आबद्स्त ले तो बवासीर अच्छी हो जाती है. आक की जड का चूर्ण गरम पानी के साथ सेवन करने से उपदंश (गर्मी) रोग अच्छा हो जाता है. उपदंश के घाव पर भी आक का चूर्ण छिडकना चाहिये. आक ही के काडे से घाव धोवे.
   *आक की जड को पानी में घीस कर लगाने से नाखूना रोग अच्छा हो जाता है. आक की जड छाया में सुखा कर पीस लेवे और उसमें गुड मिलाकर खाने से शीत ज्वर शाँत हो जाता है.
   *आक की जड 2 सेर लेकर उसको चार सेर पानी में पकावे जब आधा पानी रह जाय तब जड निकाल ले और पानी में 2 सेर गेहूँ छोडे जब जल नहीं रहे तब सुखा कर उन गेहूँओं का आटा पिसकर पावभर आटा की बाटी या रोटी बनाकर उसमें गुड और घी मिलाकर प्रतिदिन खाने से गठिया बाद दूर होती है. बहुत दिन की गठिया 21 दिन में अच्छी हो जाती है.
   *आक का दूध पाँव के अँगूठे पर लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है. बवासीर के मस्सों पर लगाने से मस्से जाते रहते हैं. बर्रे काटे में लगाने से दर्द नहीं होता. चोट पर लगाने से चोट शाँत हो जाती है|



आक की जड़ का चूर्ण दही के साथ खाने से स्त्री के प्रदर रोग मे लाभ होता है|
*आक के पुष्प तोड़ने पर जो दूध निकलता है उसे नारियल तेल में मिलाकर लगाने से खाज दूर होती है .इसके दूध को कडवे तेल में मिलाकर लगाने से भी लाभ होता है . _ *इसके पत्तों को सुखाकर उसकी पावडर जख्मों पर बुरकने से दूषित मांस दूर हो कर स्वस्थ मांस पैदा होता है .
* आक की मिटटी की टिकिया कीड़े पड़े हुए जख्मों पर बाँधने से कीड़े टिकिया पर आ कर मर जाते है और जख्म धीरे धीरे ठीक हो जाता है |_ 
*आक के दूध के शहद के साथ सेवन करने से कुष्ठ रोग ठीक  होता है |आक के पुष्पों का चूर्ण भी इसमें लाभकारी है |
* पेट में दर्द होने पर आक के पत्तों पर घी लगा कर गर्म कर सेके | _ स्थावर विष पर २-३ ग्राम आक की जड़ को घिस कर दिन में ३-४ बार पिलाए .आक की लकड़ी का 6 ग्राम कोयला मिश्री के साथ लेने से शरीर में जमा पारा भी पेशाब के रास्ते निकल जाता है . _   
*जहाँ के बाल उड़ गये हों वहाँ पर आक का दूध लगाने से बाल उग आते हैं. लेकिन ध्यान रहे इसका दूध आँख में नहीं जाना चाहिए वर्ना आँखें खराब हो जाती है. उपरोक्त कोई भी उपाय उत्तम वैध्य की निगरानी मे  सावधानी से ही करें।

2017-01-28

कौंच के बीज और पौधे के औषधीय गुण लाभ,उपयोग // Kaunch seeds medicinal use



     इस का वानस्पतिक नाम मुकुना प्रूरिएंस है और यह फाबेसी परिवार का पौधा है. बात हो रही है कौंच की जो भारत के लोकप्रिय औषधीय पौधों में से एक है| यह भारत के मैदानी इलाकों में झाडि़यों के रूप में फैली हुई होती है| इस झाड़ीय पौधे की पत्तियां नीचे की ओर झुकी होती हैं. इस के भूरे रेशमी डंठल 6.3 से 11.3 सेंटीमीटर लंबे होते हैं. इस में झुके हुए गहरे बैगनी रंग के फूलों के गुच्छे निकलते हैं, जिस में करीब 6 से 30 तक फूल होते हैं|इस पौधे में सेम जैसी फलियां लगती हैं. कौंच के पौधे के सभी भागों में औषधीय गुण होते हैं|इस की पत्तियों, बीजों व शाखाओं का इस्तेमाल दवा के तौर पर किया जाता है. ज्यादातर कौंच का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की कूवत बरकरार रखने के लिए किया जता है|
वाजीकरण द्रव्य-
कौंच- कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है। कौंच के बीज, सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण तैयार कर लें। इस चूर्ण में से एक चम्मच चूर्ण सुबह और शाम दूध के साथ लेने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और वीर्य की कमी होना जैसे रोग जल्दी दूर हो जाते हैं।
जिन खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता?है, उन के लिए भी कौंच का इस्तेमाल मुफीद होता है. इस के बीजों के इस्तेमाल से याद रखने की कूवत बढ़ती है. वजन बढ़ाने में भी कौंच का इस्तेमाल कारगर साबित होता है. इस के अलावा गैस, दस्त, खांसी, गठिया दर्द, मधुमेह, टीबी व मासिकधर्म की तकलीफों के इलाज के लिए भी कौंच के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है.
कौंच के बीजों में निम्न रोगों को दूर करने की कूवत होती है:
* दर्द व पेट की तकलीफें
 * मधुमेह
* बुखार 
* खांसी, 
* सूजन
* गुर्दे की पत्थरी 
* गैस की समस्या
* नपुंसकता
 * नसों की कमजोरी
यौन संबंधी परेशानियां
कौंच को कपिकच्छू और कैवांच वगैरह नामों से भी जाना जाता है. आयुर्वेद में इसे यौन कूवत बढ़ाने वाली दवा के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. सेक्स कूवत बढ़ाने के लिए इस के बीज बेहद कारगर होते हैं. कौंच का इस्तेमाल मर्दों व औरतों की हमबिस्तरी की ख्वाहिश में इजाफा करता है. यह नपुंसकता दूर करने में मदद करती है|
*आयुर्वेद में कौंच के बीज औषधीय गुणों से भरपूर माने गए हैं | ज्यादातर कौंच के बीज का और और इसके पौधे के अन्य अंगों का इस्तेमाल लंबे समय तक सेक्स की इच्छा को बरकरार रखने के लिए किया जता है |
  *  जिन खिलाडि़यों की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है उनके लिए भी कौंच का इस्तेमाल बेहद लाभकारी होता है | इस के बीजों के इस्तेमाल से याद रखने की क्षमता भी बढ़ती है | वजन बढ़ाने के लिए भी कौंच का इस्तेमाल कारगर साबित होता है | इस के अलावा गैस, दस्त, खांसी, गठिया का दर्द, मधुमेह, टीबी व मासिक धर्म की समस्याओं के उपचार के लिए भी कौंच के बीजों का इस्तेमाल किया जाता है |
कौंच के बीजों का इस्तेमाल
कौंच के बीजों का इस्तेमाल करने के लिए उन को दूध या पानी में उबाल कर उन के ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए. इस के बाद बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए. इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबहशाम इस्तेमाल करने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है. कौंच के बीजों के साथ सफेदमूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के सुबह शाम 1 चम्मच मात्रा दूध के साथ लेने से मर्दों की तमाम सेक्स संबंधी दिक्कतों को दूर किया जा सकता है. कौंच के बीजों के साथ शतावरी, गोखरू, तालमखाना, अतिबला और नागबला को एकसाथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर के इस चूर्ण को मिश्री मिला कर 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम के वक्त दूध के साथ रोज लेने से मर्द के अंग की कूवत बढ़ती है. सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं|
*10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना व बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंधा, जायफल व रुद्रंतीफल, 20-20 ग्राम सफेदमूसली, कौंच के बीज व त्रिफला और 15-15 ग्राम त्रिकुट व गोखरू को एकसाथ मिला कर चूर्ण बना लें. इस के बाद इस मिश्रण को 16 गुना पानी में मिला कर उबालने पर जब पानी सूख जाए तो उस में 10 ग्राम भांगरे का रस मिला कर दोबारा उबालें और जब मिश्रण गाढ़ा हो जाए तो इसे आंच से उतारें और ठंडा कर के कपड़े से अच्छी तरह मसल कर छान लें और सुखा कर व पीस कर चूर्ण बनाएं| इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसंतकुसूमार रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग मिलाएं. इस मिश्रण की आधा ग्राम मात्रा शहद के साथ मिला कर सुबह शाम चाट कर उस के बाद दूध पीना बेहद फायदेमंद होता है|इस औषधि के सेवन से मर्द के बल में इजाफा होता है| इस औषधि को लेने के दौरान तेज मिर्च मसाले वाली, तली हुई व खट्टी चीजें नहीं खानी चाहिए|
*कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में ले कर बारीक पीस कर दूध मिला कर आटे की तरह गूंध कर इस की छोटीछोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तलें. इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी काफी फायदा होता है| 100-100 ग्राम कौंच के बीज, शतावरी, उड़द, खजूर, मुनक्का, दाख व सिंघाड़ा को मोटा पीस कर 1 लीटर दूध व 1 लीटर पानी मिला कर हलकी आग में पकाएं. गाढ़ा होने पर आंच से उतारें और ठंडा होने पर छानें. इस में 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिलाएं. इस मिश्रण की 50 ग्राम मात्रा में शहद मिला कर रोजाना सुबहशाम खाने से बल बढ़ता है|
*तीव्र ज्वर में मूल चूर्ण को शहद यहां गर्म जल से देने से दाह शांत होता है एवं ज्वर कम होता है। इसके जड़ का स्वरस या क्वाथ स्नायु दौर्बल्य अंगघात ,अर्दित आदि वात रोग में लाभकारी है 
नपुंसकता दोष दूर करे :- 
कौंच के बीजों के साथ सफेद मूसली और अश्वगंधा के बीजों को बराबर मात्रा में मिश्री के साथ मिला कर बारीक चूर्ण बना लें | इस चूर्ण का सुबहशाम दूध के साथ 1 चम्मच लेने से मर्दों की सही यौन संबंधी परेशानियां दूर हो जाती है |
संभोग शक्ति बढ़ाये :- 
कौंच के बीजों के साथ तालमखाना, शतावरी, गोखरू, अतिबला और नागबला को एक साथ बराबर मात्रा में मिला कर बारीक चूर्ण तैयार कर लें | इस चूर्ण में मिश्री मिलाकर दूध के साथ 2-2 चम्मच चूर्ण सुबह और शाम लेने से मर्द के यौन अंग की शक्ति बढती है | सोने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को कुनकुने दूध के साथ लेने से जिस्मानी संबंध बेहतर होते हैं।
शीघ्रपतन की समस्या दूर करे :- 
कौंच के बीजों को दूध या पानी में उबाल कर उनके ऊपर का छिलका उतार लें | अब बीजों को सुखा कर बारीक चूर्ण बना लें | इस चूर्ण की 5 ग्राम मात्रा को मिश्री व दूध में मिला कर रोज सुबह और शाम खाने से मर्दों के अंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है| 
वीर्य गाढ़ा करे :- 
कौंच के बीजों के साथ उड़द, गेहूं, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में मिला कर बारीक पीस कर इसमें दूध मिला कर आटे की तरह गूंध लें | इस की छोटी-छोटी पूडि़यां बना कर गाय के घी में तल लें | इन पूडि़यों को दूध के साथ खाने से भी वीर्य गाढ़ा करने में काफी फायदा होता है |
कौंच के अन्य लाभ :
कौंच तनाव और चिंता को दूर करती है. यह खासतौर पर यौन ग्रंथियों को मजबूती प्रदान करती है. यह तंत्रिकातंत्र के लिए एक खास पोषक तत्त्व के रूप में काम करती है।
तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियां : कौंच तंत्रिकातंत्र संबंधी परेशानियों के लिए एक खास दवा के रूप में इस्तेमाल की जाती है. यह पार्किसंस रोग में भी इस्तेमाल की जाती है।
कोलेस्ट्राल और ब्लडशुगर :
 कौंच कोलेस्ट्राल कम करने की एक खास दवा है, साथ ही यह ब्लडशुगर के स्तर को सही करने के लिए फायदेमंद दवा है. इस के अलावा यह एक मानसिक टानिक के रूप में भी कारगर होती है।

बरगद के पेड़ के औषधीय उपयोग// Medicinal use of the banyan tree

  

   विशाल  छायादार बरगद का पेड़ तो लगभग आप सभी ने देखा होगा। और आपने इस पेड़ पर लगने वाले छोटे-छोटे फल भी देखे होंगे। इसकी जड़ों की लताओं को पकड़ कर आपने खूब झूला भी झूला होगा। लेकिन आज तक इसका इस्तेमाल कभी नहीं किया होगा जैसे घर में नीम, आम, गुलाब आदि का करते हैं।
बरगद के पेड़ का औषधीय और धार्मिक दोनों ही महत्व हैं। बरगद के पेड़ के कभी भी नष्ट न होने के कारण इसे अक्षय वट भी कहा जाता है। यह भारत का राष्ट्रीय वृक्ष है। इसका वानस्पतिक नाम फाइकस बेंघालेंसिस है। इसे तमाम औषधियों में उपयोग किया जाता है। इसके अलावा इसके पत्तों से निकलने वाले दूध को भी उपचार में प्रयोग किया जाता है।
    बरगद के  फल आपके पौरुष शक्ति बढ़ाने में  मददगार है। इसके इस्तेमाल से शीघ्र पतन, स्वपनदोष, कमजोरी, प्रमेह, वीर्य का पतलापन और वीर्य के अन्य विकार दूर होते हैं। साथ ही यह काम शक्ति और स्पर्म बढ़ाने वाला होता है जिससे आप अपने विवाहित जीवन में भरपूर आनंद ले सकते हैं। यह इस्तेमाल बेहद सस्ता और चमत्कारिक परिणाम देने वाला है। यह इस्तेमाल स्पर्म की बीमारी और कमजोरी से ग्रस्त रोगियों के लिए अच्छे से अच्छे नुस्खों से कहीं अच्छा है।

फल के इस्तेमाल का तरीका
बरगद में काम शक्तिवर्धक और शुक्रवर्धक गुण पाए जाते हैं। बरगद के पेड़ में लाल लाल छोटे छोटे बेर के समान फल लगते हैं। बरगद के पेड़ के ये लाल लाल पके हुए फल हाथ से तोड़ें। जमीन पर गिरे हुए न लें। इनको जमीन पर कपड़ा बिछा कर छाया में सुखाएं। सूखने के बाद पत्थर पर पीसकर पाउडर बना लें। सुखाते समय पीसते समय लोहे का उपयोग नहीं होना चाहिए। लोहे से इन्हें नहीं छूना है। इस पाउडर के तोल के बराबर पीसी हुई मिश्री मिला लें। मिश्री भी पत्थर पर ही पीसें। भली प्रकार मिश्री और बरगद के फलों के पाउडर को मिलाकर मिट्टी के बर्तन में सुरक्षित रखें। इसकी आधी चम्मच सुबह शाम दो बार गर्म दूध से फंकी लें। इससे शीघ्र पतन समाप्त होकर काम शक्ति प्रबल हो जाती है। विवाहित जीवन का भरपूर आनंद आता है। शारीरिक स्वास्थय अच्छा होकर चेहरे पर लाली चमकने लगती है। इस सस्ते लेकिन मेहनत से भरपूर प्रयोग को करके देखें।
*बच्चे पैदा करने वाले कीटाणु (स्पर्म) यदि वीर्य में ना हो तो इस प्रयोग से बच्चे पैदा करने वाले कीटाणु वीर्य में पैदा हो जाते हैं। आदमी बच्चे पैदा करने योग्य हो जाता है। शुक्राणुओं के न होने से जो पुरुष बच्चे पैदा करने के अयोग्य घोषित कर दिए गए हैं, वो इस प्रयोग को ज़रूर करें, और ये प्रयोग करने के बाद अपना अनुभव ज़रूर बताएं, जिस से और लोगों को भी ये प्रयोग करने की प्रेरणा ले सकें।
* बरगद के फल का इस्तेमाल पौरुष शक्ति बढ़ाने के लिए किया जाता है। जहां अधिकतर लोग पौरुष शक्ति बढ़ाने के लिए वियाग्रा जैसी महंगी दवाई का इस्तेमाल करते हैं वहीं गांव में अब भी लोग बरगद के फल का इस्तेमाल करते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत है कि वियाग्रा के कई सारे साइडइफेक्ट भी होते हैं जबकि बरगद के इस फल का कोई साइडइफेक्ट भी नहीं होता।
गुप्त रोग दूर करे-
बरगद का ये फल पौरुष शक्ति बढ़ाने के साथ कई सारे गुप्त रोग भी ठीक कर करता है। इसका इस्तेमाल करने से शीघ्र पतन, स्वपनदोष, कमजोरी, प्रमेह, वीर्य का पतलापन और वीर्य संबंधी अन्य सारी समस्याएं दूर हो जाती हैं। साथ ही ये सेक्स से संबंधी हर तरह की समस्या को दूर करता है।
लो मोबीलिटी की समस्या ठीक करे-
बीते कई सालों में पुरुषों में लो मोबिलिटी की समस्या काफी सामने आई है। इस समस्या में पुरुषों का स्पर्म महिला के शरीर में ज्यादा दिन तक रह नहीं पाता जिससे महिलाओं को गर्भधारण करने में समस्या होती है। साथ ही इस कारण कई बार पुरुषों को शीघ्रपतन की भी समस्या होती है। ऐसे में लोग विवाहित जीवन का भरपूर आनंद नहीं ले पाते। इस समस्या के उपचार के लिए लोग बड़े-बड़े हकीमों और चिकित्सकों से इलाज कराते हैं। लेकिन कोई परिणाम नहीं निकलता।  जबकि इस समस्या के लिए बरगद का फल बड़ा कारगर है। इसका इस्तेमाल बहुत ही सस्ता और चमत्कारिक परिणाम देने वाला है। ये तुरंत स्पर्म की क्वांटिटी और क्वालिटी में बढ़ोतरी करता है जिससे आप अपने वैवाहिक जीवन का भरपूर आनंद उठा पाते हैं। इसका इस्तेमाल स्पर्म की बीमारी और कमजोरी से ग्रस्त रोगियों के लिए रामबाण इलाज है।
अन्य इस्तेमाल
नाक से खून बहना :
बरगद की सूखी हुई जड़ को बारीक पीस लें। अब इसमें से आधी चम्मच पाउडर को लस्सी के साथ पीने से नाक से खून बहना बंद हो जाता है। नाक में बरगद के दूध की दो बूंद डालने से भी नकसीर (नाक से खून बहना) ठीक हो जाता है।
पतले दस्त-
यदि बच्चे को पतले दस्त हो रहे हैं तो नाभि में बरगद का दूध लगाने से दस्त में आराम मिलता है। इसके अलावा एक बताशे में दो से तीन बूंद बरगद का दूध डालकर दिन में तीन चार बार रोगी को खिलाने से भी दस्त में आराम मिलता है।
कमर दर्द में -
   कमर दर्द में सिकाई करने के बाद बरगद के दूध की मालिश करने से कुछ ही दिन में आराम मिलने लगता है। ऐसा दिन में कम से कम तीन बार करना होता है। इसके अलावा बरगद का दूध अलसी के तेल में मिलाकर मालिश करने से भी कमर दर्द से छुटकरा मिलता है।यदि आपके शरीर का कोई हिस्सा जल जाता है तो बरगद का पेड़ उसमें भी राहत देता है। बरगद के पत्ते को पीसकर, उसमें जरूरत के मुताबिक दही मिला लें। अब इस लेप को जले हुए भाग पर लगाने से जलन दूर होती है। जले हुए स्थान पर बरगद की कोपल या कोमल पत्तों को गाय के दही में पीसकर लगाने से भी आराम मिलता है।
चोट, मोच और सूजन-
बरगद का दूध चोट, मोच और सूजन पर दिन में दो से तीन बार लगाने और मालिश करने से काफी आराम मिलता है। यदि कोई खुली चोट है तो बरगद के पेड़ के दूध में आप हल्दी मिलाकर चोट वाली जगह बांध लें। घाव जल्द भर जाएगा।
वीर्य का पतलापन, प्रमेह,स्वप्नदोष
 बरगद की कली, डंठल को तोड़कर इससे निकलने वाले दूध की पांच बूंदें एक बताशे पर टपका कर खा जाएं। इस प्रकार चार बताशे हर रोज खाएं। यह सूर्योदय से पहले खाएं। नित्य दूध की एक बूंद बढ़ाते जाएं। इस प्रकार दस दिन लेकर फिर एक बूंद रोज कम करते जाएं। इस प्रकार 20 दिन यह इस्तेमाल करने से वीर्य का पतलापन,प्रमेह,स्वप्नदोष ठीक हो जाता हैं|
बिवाई-
हाथों की फटी हुई हथेली हो या एडिया (बिवाई), दोनों के ही उपचार में बरगद के पेड़ का दूध काफी कारगर है। ताजे-ताजे दूध को एडियों की फटी हुई दरारों पर भरकर मालिश करते रहने से कुछ ही दिनों में वह ठीक हो जाती हैं। घांव में दूध भरने से पहले एडियों को गर्म पानी से धो लें
बार-बार पेशाब आना -
बरगद के पेड़ की छाल को सुखाकर उसका चूर्ण बना लें। अब इसमें से आधा चम्मच चूर्ण का एक कप गुनगुने पानी के साथ दिन में 3-4 बार सेवन करें। ऐसा लगातार 15 दिन तक करने से बार-बार पेशाब आने के रोग में फायदा होगा। बरगद के फल के बीज को बारीक पीसकर चौथाई चम्मच सुबह के समय गाय के दूध के साथ खाने से भी रोग ठीक हो जाता है।
बाल मजबूत-
बरगद के सूखे हुए पत्तों को जलाने पर बनी 20 ग्राम राख को अलसी के 100 मिलीलीटर तेल में मिलाकर मालिश करते रहने से सिर के उड़े हुए बाल उग आते हैं। कोमल पत्तों के रस में बराबर मात्रा में सरसों का तेल मिलाकर आग पर पकाकर गर्म कर लें, इस तेल को बालों में लगाने से बाल मजबूत बनते हैं।

2017-01-25

आंखों में पानी आने पर घरेलू इलाज //Home Remedies for Watery Eyes


आंखों से पानी आने का कारण व लक्षण -
शरीर में पौष्टिक आहार की कमी व आंखों के उचित रखरखाव के अभाव में आंखों से पानी का स्राव होने लगता है। कई बार यह बीमारी इतनी बढ़ जाती है कि आंखों से लगातार पानी का स्राव होता रहता है। यहां तक कि पपोटे भी सूज जाते हैं।
आंखों से पानी आने के  नुस्खे -
*बादामः
 बादाम को पीसकर दूध के साथ मिलाकर पीने से आंखों में पानी आना पूरी तरह से बंद हो जाता है। यह काफी असरदार इलाज है।
*अंगूर-
आंखों से पानी बहने से दुखती आंखों में एक-दो बूंद अंगूर के रस की डालने से आखों का दर्द कम हो जाता है तथा पानी बहना भी बंद हो जाता है।
*संतरा- 
 
संतरे का एक गिलाए रस प्रतिदिन पीएं आंखों में पानी आने की बीमारी जड़ से खत्म हो जाएगी।
* आवंला-
 जब आंखों में पानी आने की बीमारी शुरू हो तब आवले के मुरब्बे का सेवन काफी लाभप्रद होता है।
* त्रिफला-
आवले की अधिकता वाले त्रिफला चूर्ण का अंजन बनाकर आंखों में लगाने से पानी आना बंद हो जाता है।
*अमरूद-
अमरूद को आग में सेककर खाने से आखों से पानी बहना थम जाता है।
*अखरोट-
 सूखे मेवे के रूप में अखरोट का प्रयोग करते रहने से आंखों में पानी आने की समस्या काबू में आ जाती है।
आंखों में खुजली का उपचार 
अंगूर-
 अंगूर का रस निकालकर आच पर पकाकर गाढ़ा बना लें। ठंडा होने पर इसे शीशी में भरकर रख लें। इसे आखों में काजल की तरह रात को लगाकर सोएं, आंखों की खुजली मिट जाएगी।

2017-01-18

डायबीटीज(मधुमेह)का होम्योपैथिक इलाज //Homeopathic treatment of diabetes

  


 आज के समय में न सिर्फ भारत अपितु समस्त विश्व में डायबीटीज एक बड़ी समस्या होती जा रही हैं। आम भाषा में इसे शक्कर की बीमारी भी कहते हैं। यह एक गंभीर रोग होता है, जो धीरे -धीरे शरीर के अन्य अंगों को भी क्षतिग्रस्त कर देता हैं। स्त्रियों और पुरुष में इसका अनुपात 1:2 होता है, अर्थात 1 स्त्री और 2 पुरुष। आइए जानते हैं कि डायबीटीज क्या है, क्यों और कैसे होती है? इसके क्या क्या लक्षण होते हैं और इसके क्या उपचार हैं|
क्या होती है डायबीटीज
हमारे शरीर में पेन्क्रियाज नाम की एक ग्रंथि होती हैं, जिसे हिन्दी में अग्नाशय कहते हैं। इस ग्रंथी से कुछ हार्मोन्स का स्त्राव होता हैं । इंसुलिन पेन्क्रियाज से स्त्रावित होने वाला एक महत्वपूर्ण हार्मोन है।
   इसी प्रकार हमारे भोजन मे कार्बोहाइड्रेट एक महवपूर्ण तत्व होता है जिससे हमें केलोरी और ऊर्जा प्राप्त होती है। कार्बोहाइड्रेट हमारे शरीर मे जाकर ग्लूकोज के छोटे छोटे कणों में बदल जाता है, और इसी ग्लूकोज को इंसुलिन शरीर की प्रत्येक कोशिका तक ले जाता हैं, जिससे शरीर को प्राप्त ऊर्जा होती हैं। जब यह इंसुलिन शरीर में बनना बंद हो जाता है या इसकी मात्रा इतनी कम रहती हैं कि कोशिकाओं तक नहीं पहुंच पाता है तो ग्लूकोज कोशिकाओं में नहीं जा पाता है और रक्त में ग्लूकोज की मात्रा बढ़ जाती है जिसे डायबीटीज कहते हैं।
एक स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति में ग्लूकोज़ का स्तर
एक स्वस्थ और सामान्य व्यक्ति में ग्लूकोज़ का स्तर भोजन के पूर्व 70 -100mg/dl और भोजन के पश्चात 120-140mg/dl होना चाहिए। यदि यह स्तर 140mg/dl से अधिक हो तो व्यक्ति को डायबिटिक माना जाता हैं।


डायबीटीज़ के कुछ कारण और होते हैं जैसे:
– इन्सुलिन की कमी
-हार्मोन्स में परिवर्तन
-तनाव
-गलत खान-पान
-उम्र
-मोटापा
-आलस और आरामदायक जीवनशैली
-कुपोषण
-दवाओं का अत्याधिक सेवन
डायबीटीज़ के प्रकार
डायबीटीज़ मुख्यतः 3 प्रकार की होती है।
टाइप 1 डायबीटीज़
इसमें इन्सुलिन नामक हार्मोन शरीर में नहीं बन पाता है जिससे ग्लूकोज़ शरीर की कोशिकाओं को ऊर्जा नहीं दे पाता है। यह प्राय: किशोरावस्था में होती हैं।
टाइप 2 डायबीटीज़
इसमें इन्सुलिन तो बनता है परन्तु इतनी कम मात्रा में जिससे रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर अनियंत्रित हो जाता हैं। यह पीढ़ी दर पीढ़ी पाया जाता हैं। लगभग 90 % लोग टाइप 2 डायबीटीज़ से ही पीड़ित होते हैं।
गेस्टेसनल डायबीटीज़
यह गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबीटीज़ होती हैं।
डायबीटीज़ के लक्षण
-कोई घाव या चोट लगने पर देर से ठीक होना
-स्त्रियों में माहवारी सम्बधित कष्ट होना

-बार-बार पेशाब होना (रात के समय अधिक)
-प्यास अधिक लगना
-वजन कम होते जाना
-थकान व कमजोरी लगना
-पैर सुन्न होना
-मुँह में सूखापन लगना

-भूख अधिक लगना
– पूरे शरीर में खुजली होना
डायबीटीज़ का होम्योपैथिक उपचार
 
डायबीटीज़ एक गंभीर रोग है। यदि कई सालों तक रक्त में ग्लूकोज़ का स्तर बढ़ा रहे तो शरीर के अन्य अंगों को भी नुकसान होने लगता है, लेकिन इसे रोगी अपनी दैनिक दिनचर्या और खान-पान में सुधार करके तथा होम्योपैथिक दवाओं द्वारा इसे न सिर्फ कंट्रोल किया जा सकता है अपितु अन्य अंगो को भी क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सकता हैं। 
आर्स-एल्ब (ARS-ALBUM)
मुँह सूखा रहे, बार बार प्यास लगे, रोगी को मरने का डर लगे, पूरे शरीर में खुजली हो, डायबीटीज़ वालो का गैंग्रीन होने पर यह दवा उपयोगी हैं।
यूरेनियम-नाइट्रेट (URANIUM-NITRATE) 
मुँह और त्वचा में सूखापन, अत्याधिक भूख और प्यास लगना, पेशाब बहुत अधिक होना, कुपोषण के कारण होने वाली डायबीटीज़ होने पर यह दवा उपयोगी हैं।
एसिड-फॉस (ACID-PHOS)
रोगी को पेशाब बहुत अधिक मात्रा में आता हैं, और उसमे शर्करा की मात्रा बहुत होती है। रोगी कमजोरी महसूस करता हैं, हाथ-पैरों में दर्द रहता है, पेशाब दूधिया रंग का होता है, मानसिक और शारीरिक रूप से कमजोर रहता है। यह दवा डायबीटीज़ इनसेपिडस और डायबीटीज़ मेलिटस में उपयोगी है।

प्लम्बम –मेट(PLUMB-MET)
तेजी से वजन कम हो, कमजोरी लगे, याददाश्त कमजोर हो जाए, पैरो में पैरालिसिस हो, कब्ज, लगातार उल्टियां होती हैं| 
अर्जेंटम -नाइट्रिकम (ARGENTUM-NITRICUM)
 
बहुमूत्र के रोगी को मीठा खाने की बहुत इच्छा हो, जी मचलाना, उलटी हो जाना, डिप्रेशन रहना, बहुत ज्यादा पेशाब होना जिसमें शर्करा की मात्रा बहुत हो तो यह दवा उपयोगी है।
नेट्रम–म्युर (NATRUM-MUR)
पूरे शरीर में डायबीटीज़ के कारण खुजली हो, त्वचा सूखी सी रहे, हर घंटे में पेशाब होने पर यह दवा उपयोगी है।
नेट्रम –सल्फ (NATRUM-SULPH)
रोगी को रात में बार बार पेशाब हो।
सीजीजियम- जम्बोलियम (syzygium-jambolanum)
अत्याधिक प्यास, कमजोरी, दुर्बलता, पेशाब की स्पेसिफिक-ग्रेविटी बढ़ी हुई, डायबीटीज़ के कारण होने वाले अल्सर, शरीर के ऊपरी भाग में छोटे-छोटे लाल रंग के दाने होने पर ये दवा दी जा सकती है।
नोट-होम्योपैथी में रोग के कारण को दूर कर के रोगी को ठीक किया जाता है। प्रत्येक रोगी की दवा उसकी शारीरिक और मानसिक अवस्था के अनुसार अलग-अलग होती है। अतःबिना चिकित्सकीय परामर्श यहां दी हुई किसी भी दवा का उपयोग न करें।

खाली पेट न लें ये आहार सेहत को होगा नुकसान// Avoid these foods at Empty Stomach


खाली पेट ना खायें आहार
खाली पेट कुछ आहारों का सेवन करना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है। कुछ खाद्य सामग्रियों में एसिड की मात्रा ज्‍यादा होती है, ऐसे में उन्‍हे खाली पेट खाना या पीना आपको नुकसान पहुंचा सकता है। । इससे पेट में मरोड़ और दर्द होने जैसी समस्या होने लगती है। शराब, केला चाय-कॉफी आदि खाली पेट नहीं लेना चाहिए।

सेहतमंद रहने के लिए खान-पान की अच्छी आदतों का होना बहुत जरूरी है। कुछ लोग वजन घटाने के चक्कर में सुबह खाली पेट कुछ एेसी चीजों का सेवन कर लेते हैं जिससे उनकी सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता हैं। खाली पेट होने से पेट में एसिड बनता है, जिससे पेट संबंधित कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुछ एेसी चीजों के बारे में बताते हैं जिन्हें खाली पेट  खाने से सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है। 
1. संतरा-
खाली पेट संतरे का सेवन नहीं करना चाहिए। संतरे में एसिड होता है, जिससे पेट में जलन होने लगती है। इससे स्टोन की समस्या भी हो सकती है।
2. शकरकंदी
शकरकंदी का खाली पेट सेवन करने से पाचन तंत्र पर प्रभाव पड़ता है। खाली पेट यह डाइजेस्ट नहीं होती, जिससे सीने में जलन होने लगती है।
3. दूध
खाली पेट दूध पीने से मसल्स कमजोर होते है। इसके अलावा कफ होने की संभावना बढ़ जाती है।
4.चटपटा भोजन व टमाटर-
 
कभी भी खाली पेट किसी भी प्रकार के चटपटे भोजन का सेवन न करें। इसमें नेचुरल एसिड होता है जो पेट के हाजमे को बिगाड़ देता है। कई बार पेट में ऐंठन भी होने लगती है। टमाटर में एसिड होता है जिसकी वजह से अगर आप इसे खाली पेट खा लेते हैं तो यह रिएक्‍ट करता है और पेट में अघुलनशील जेल का निर्माण कर देता है जो पेट में स्‍टोन बनने का कारण बन जाता है।
5. मीठी चीजें-
खाली पेट मीठी चीजों का सेवन करने से ब्लड में शुगर की मात्रा बढ़ जाती है। इससे आपको एनर्जी मिलती है लेकिन अधिक मात्रा में लेने से थकान होती है।
6. चाय-कॉफी-
खाली पेट, कॉफी का सेवन सबसे अधिक घातक होता है। इसमें कैफीन होती है जो खाली पेट लेने पर आपको बेहाल कर सकती है। कुछ खाने को न हों, तो एक गिलास पानी ही पी लें।जिस प्रकार कॉफी पीना अच्‍छा नहीं होता है, उसी प्रकार खाली पेट चााय भी न पिएं। चाय में उच्‍च मात्रा में एसिड होता है जिसकी वजह से पेट में दर्द हो सकता है।
7. दही, केला व शकरकंद-
 
दही स्‍वास्‍थ्‍यकारी होता है लेकिन खाली पेट, इसका सेवन करने से पेट में मरोड़ उठ सकती है। खाली पेट केला खाने से शरीर में मैग्‍नीशियम की मात्रा काफी बढ़ जाती है जिसकी वजह से शरीर में कैल्शियम और मैग्‍नीशियम की मात्रा में असंतुलन हो जाता है। इस कारण, सुबह खाली पेट केला न खाएं। शकरकंद में टैन्‍नीन और पैक्‍टीन होता है जिसे खाली पेट खाने पर गैस्ट्रिक एसिड की समस्‍या हो जाती है जिससे सीने में जलन हो सकती है।
8.ग्रीन टी-
ग्रीन टी में कैफीन नामक तत्व पाया जाता है। इसे खाली पेट पीने से पेट में एसिड की मात्रा बढ़ जाती है, जिससे एसिडिटी होती है।
सोडा-शराब-
सोडा में उच्‍च मात्रा में कार्बोनेट एसिड होता है। अगर आप इसे खाली पेट पी लेंगे तो मतली आ सकती है और आपको असहज महसूस हो सकता है।खाली पेट शराब का सेवन करने से पेट में जलन होने लगती है जिसकी वजह से खाना भी ठीक प्रकार से नहीं पच पाता है।

2017-01-17

कमर दर्द के घरेलू उपचार // Home remedies for back pain


   आधुनिक जीवनशैली पर चलने वाला हर एक व्यक्ति आज किसी न किसी शारीरिक या मानसिक बीमारी से ग्रस्त है।काम चाहे घर में हो या ऑफिस में, कार्य चाहे खडे़ रहकर करने का हो या बैठकर करने का अक्सर कमर में दर्द हो ही जाता है। कमर दर्द की वजह से आपको बड़ी परेशानी होती है। जिसकी वजह से आपका बैठना या खड़ा रह पाना मुशकिल हो जाता है। कमर दर्द की इस वजह से मांसपेशियों में तनाव आ जाता है और दर्द तेज होने लगता है। कमर दर्द से ज्यादातर महिलाएं परेशान रहती है। लेकिन अक्सर देखा गया है जो पुरूष बैठकर काम करते हैं उन्हें भी कमर दर्द की परेशानी होती है।सिर्फ बड़ी उम्र के लोग ही नहीं बल्कि युवा भी कमर दर्द की शिकायत करते रहते हैं। 
कमर दर्द के कारण
*कमर दर्द से परेशान वे लोग ज्यादा होते हैं जो भारी सामान को उठा ले ते हैं, या फिर उठाते रहते हैं उन्हें कमर दर्द की परेशानी ज्यादा होती है।
*ज्यादा देर तक ठंडे पानी में भीगने से भी कमर दर्द होता है।
*महिलाओं में कमर दर्द का कारण उनका वजन बढ़ना, मासिक धर्म, और श्वेत प्रदर आदि होता है।
*आयुर्वेद के अनुसार कमर दर्द की मुख्य वजह है देर रात तक जागना, किसी कठोर सीट पर बैठने से, अधिक ठंडा पानी पीने से, कमर पर किसी तरह की चोट लगने से, या अति *मैथुन करने से कमर दर्द होता है। 
अगर आप कमर दर्द से परेशान हैं तो इससे बचने के लिए आप के सामने प्रस्तुत हैं कुछ रामबाण नुस्खे जो कि बहुत कारगर तो हैं ही साथ ही इनका कोई भी साइड इफेक्ट भी नहीं होता है। 
कमर दर्द के रामबाण नुस्खे -
*मेथी का प्रयोग खाने में करते रहने से भी कमर दर्द में राहत मिलती है। मेथी के लडुओं को सेवन नियमित करते रहने से कमर दर्द नहीं होता।
 
*यदि कमर में दर्द अधिक है तो आप मेथी के तेल की मालिश कमर पर जरूर करें लाभ मिलेगा।
* रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
*200 ग्राम दूध में 5 ग्राम एरंड की गिरी को पकाकर, दिन में दो बार सेवन करने से कमर दर्द की पीड़ा जल्दी ठीक हो जाती है।
*नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
*कमर दर्द में कच्चे आलू की पुल्टिस बांधने से कमर से संबंधित दर्द समाप्त हो जाता है। लेकिन नियमित इस का प्रयोग करेगें तभी।
*कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
 
*फली का सेवन करना कमर दर्द में उपयोगी माना गया है, कुछ दिनों तक नियमित रूप से फली का सेवन करने से कमर दर्द की पीड़ा में राहत मिलती है।
*जहां दर्द होता होता है हो वहाँ 5 मिनट तक गरम सेंक, और दो मिनट ठंडा सेंक देने से तत्काल लाभ पहुंचता है।
*तिल के तेल की कमर पर मालिश करने से कमर दर्द ठीक हो जाता है। तिल के तेल को हल्की आंच में गरम करें और फिर इस तेल को कमर दर्द वाली जगह पर हल्के हाथों से मालिश करें। कमर दर्द में जल्द ही राहत मिलेगी।
*कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।

*गेहूं की बनी रोटी जो एक ओर से नहीं सिकी हो उस पर तिल के तेल को चुपड़कर कमर दर्द वाली जगह पर रखने से कमर दर्द जल्दी ठीक होता है।
*गरम पट्टी को कमर पर बांधने से कमर दर्द मे राहत मिलती है, गरम पानी में थोड़ा सेंधा नमक डालकर नहाने से भी कमर और पीठ दर्द में राहत मिलती है ।
आप इन कारगर घरेलू उपायों के जरिए कमर दर्द से छुटकारा पा सकते हैं। लेकिन इसके साथ ही आपको व्यायाम की जरूरत भी है। साथ ही सीधे खड़े होने और सीधे बैठने की आदत डालें।
*अजवाइन को तवे के ऊपर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें तथा ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। लगातार 7 दिनों तक यह प्रयोग किया जाए तो आठवे दिन से कमर दर्द में 100 फीसदी लाभ होता है।
कमर दर्द को ठीक करने के अन्य उपाय
*रोज पैदल चलने की कोशिश करें । यह कमर दर्द से राहत पाने का व्यायाम है।
*ज्यादा समय तक किसी कुर्सी या स्टूल पर झुककर न बैंठे। क्योंकि यह कमर दर्द की वजह बनता है।
*ज्यादा नर्म गद्दों पर न सोएं।
*अधिक उंचे जूते या हील पहनने से बचें।
*किसी भी सामान को अकेले न उठाएं।
*आप शरीर को व्यस्त रखें।
*अपने बैठने का पोश्चर सही रखें। और जब भी कार चलाएं तब सीट बेल्ट को टाइट करके रखें।
*कैल्शियम से बनी चीजों का सेवन अधिक करें। क्योंकि कमर दर्द की मुख्य वजह कैल्शियम की कमी होती है।
*आप हलासन, भुजंगासन और शलभासन करें।
*कमर दर्द से राहत पाने के लिए साइकिल जरूर चलाएं।
*कुर्सी पर सीधा बैठें। अधिक देर तक एक ही जगह पर न बैठें।
*सुबह शाम दिन में दो बार दो-दो छुहारे खाते रहें एैसा नियमित कुछ दिनों तक करने से कमर दर्द में राहत मिलती है।
*देशी घी में अदरक का रस मिलाकर पीते रहें, कुछ दिनों तक सेवन करने से कमर दर्द की शिकायत दूर हो जाती है।
*कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल न झुकें, बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।

2017-01-15

10 जड़ी-बूटियों से दूर करें हर समस्या

पुदीना - 
पुदीने की पत्तियां खून साफ करती हैं, सिरदर्द ठीक करती हैं, खराब गले को राहत पहुंचाती हैं, उल्टियों को रोकती हैं और दांतों की दिक्कतों से भी निजात दिलाती हैं। पुदीना ऐंटी-बैक्टीरियल भी होता है जो शरीर में बैक्टीरिया पैदा होने से रोकता है।
हल्दी - 
हल्दी का इस्तेमाल हम लगभग सभी हिन्दुस्तानी सब्जियों या खाद्य पदार्थों में करते हैं। इसकी जड़ों और पत्तियों में औषधीय गुण होते हैं। इसमें सबसे अच्छे ऐंटी-बैक्टीरियल गुण हैं।
इससे जोड़ों के दर्द आर्थराइटिस, पाचन विकार, दिल और लिवर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता है। यहां तक कि यह कैंसर सेलों को खत्म करती है और स्किन के लिए भी अच्छी होती है।
मेहंदी की पत्तियां
मेहंदी की पत्तियां मूत्रवर्धक होती हैं। वे दर्द को कम करती हैं और शरीर को डीटॉक्स करती हैं। कब्ज के इलाज में भी इनका इस्तेमाल हो सकता है। छाले, अल्सर, चोट, बुखार, हैमरेज और मासिक दर्द से भी मेहंदी की पत्तियां छुटकारा दिलाती हैं।
 
इसबगोल
इसबगोल की भूसी कब्ज का अचूक इलाज है। यह एक तरह की घुट्टी है जो आंतों को रिलैक्स करती है। इसे पीसकर जोड़ों पर लगाने से जोड़ों के दर्द से भी आराम मिलता है।
कपूर-
 इस पौधे के अनगिनत फायदे हैं। इसकी छाल से बैक्टीरिया और फंगस से निजात मिलती है, दर्द से आराम मिलता है, यह कामोत्तेजक का भी काम करता है और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ाता है।
कपूर के तेल से खांसी  दमा, हिचकी, लिवर की दिक्कतों और दांत के दर्द का इलाज किया जाता है। इसे मांसपेशियों या नसों का दर्द ठीक करने और डिप्रेशन का इलाज करने के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है।
दालचीनी
भारतीय मसालों में दालचीनी अहम है। इसके सेवन से दर्द कम होता है और अकड़न दूर होती है। यह किडनी को डि‍टॉक्स करता है और सांस संबंधी दिक्कतें दूर कर ब्लड सर्कुलेशन बढ़ाता है।
सफेद कमल
सफेद कमल की पत्तियां, फूल, बीज और जड़ों से हैजा, पेट की बीमारियों, कब्ज और आंखों के इन्फेक्शन का इलाज किया जाता है। सफेद कमल के बीजों को भी कामोत्तेजक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
   
लेमन ग्रास
यह आमतौर पर उत्तर भारत में उगाया जाता है। इसे चाय में डालकर पीने का चलन है। लेमन ग्रास शरीर, जोड़ों, सिर और मांसपेशियों के दर्द से निजात दिलाती है और स्ट्रेस से भी बचाती है।
गुलाब
गुलाब की पत्तियां खाने से दिल की सेहत बनती है, सूजन घटती है, ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है और ब्लड प्रेशर कम होता है। गुलाब की पत्तियों से भी स्ट्रेस, मासिक पीड़ा, अपच और अनिद्रा से निजात मिलती है।
सब्जा  
सब्जा को फालूदा में कूलिंग एजेंट के तौर पर डाला जाता है। इसमें ओमेगा-3 फैटी एसिड पाया जाता है। इनके सेवन से इम्युनिटी बढ़ती है, ब्लड प्रेशर कम होता है और दिल की सेहत बनती है। इन्हें खाने से स्किन अच्छी होती है और सूजन घटती है।  

2017-01-14

बुढ़ापे की बीमारियों का होम्योपैथीक इलाज // Homoeopathic treatment of geriatric diseases

    



बुढ़ापा अपने आप में एक अस्वास्थ्यकर अवस्था है। इस अवस्था में लोग कई प्रकार की बीमारियों से ग्रसित हो जाते हैं।
इनमें अल्जाइमर नाम की खास बीमारी है, जिसमें लोगों की स्मरण शक्ति धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। इसके अलावा कई तरह की शारीरिक और मानसिक अवस्थाएं कष्टकारक होती हैं। होम्योपैथी में वृद्धावस्था के लगभग सभी रोगों की दवाएं उपलब्ध हैं।
मानसिक लक्षण व उपचार जो वृद्धजन शाम के समय भयभीत रहते हैं, जिन्हें यह आशंका घेरे रहती है कि कोई दुर्भाग्य न आ जाए, भुलक्कड़, चिंताग्रस्त, उत्साहहीन, अवसादग्रस्त, जिन्हें समझया नहीं जा सकता, मोटे, थुलथुले शरीर वाले, मोटी सोच वाले, हर समय सर्दी से डरने व अधिक कपड़ों में लिपटे रहने वाले मिठाई प्रिय वृद्धजनों के लिए कैलकेरिया कार्ब-30 कारगर है।
*मानसिक चोट से ग्रस्त, शोकमग्न, हाल खुश-हाल बेचैन, हाल प्रेम-हाल झगड़ा, ऐसे परस्पर विरोधी लक्षणों वाले बुजुर्गो को अटकने की शिकायत रहती है। खाना खाने के थोड़ी देर बाद ही भूख लग जाती है, उनके लिए इग्नेशिया-200 रामबाण औषधि है जो शांत एवं प्रसन्नतायुक्त जीवन प्रदान करती है।
*घमंडी, उद्दंड, दूसरों को नफरत से देखने वाले, सभी को अपने से बहुत तुच्छ एवं छोटा समझने वाले, अत्यधिक काम भावना से ग्रसित, हर समय अपनी बढ़ाई करने वाले, हर समय ‘मैं ऐसा’, ‘मैं ऐसा’ कहने वाले, गर्म मौसम बर्दाश्त न करने वाले तथा मृत्यु भययुक्त व्यक्तियों के लिए प्लेटिना-30 एक महाऔषधि का काम करती है। एकांत भय, अकेले व अंधेरे में डरने, सोते समय भी कमरे में रोशनी जलाने वाले, पानी से डरने वाले, चमकीली चीजों से डर, भूतप्रेत दिखना,दीवार पर न होते हुए भी कीड़े रेंगते देखना, हंसाना, सीटी बजाना, चिल्लाना, गाली बकना, कभी-कभी दीन भाव से ईश्वर से प्रार्थना करना, पागल की तरह व्यवहार करना, ऐसे वृद्धजनों को स्ट्रामोनियम-1000 की एक ही मात्रा हमेशा के लिए ठीक करने की शक्ति रखती है। बहुत अधिक बोलने, बकवास करने वाले, ईष्र्यालु, समय स्थान एवं तारीख का कोई पता नहीं, नींद आने के तुरंत पहले, नींद के बीच में अथवा आधी रात को तकलीफ बढ़ जाना, हर समय गर्मी से परेशान वृद्धों के लिए लैकेसिस-200 अमृत के समान काम करती है।


*सब पर संदेह करना, दवा पीने से मना करना जैसे उसे जहर दिया जा रहा हो, अपने पति/पत्‍नी,बेटा, बेटी पर भी अविश्वास करना, कल्पना करना कि लोग उसके पीछे पड़े हों, षड्यन्त्र कर रहे हों, लोगों को बात करते देख सोचना कि उसकी चुगली की जा रही है, पीछे मुड़कर देखना कि कोई पीछा तो नहीं कर रहा, अनिद्रा से ग्रसित बुजुर्गो के लिए हायोसिमस-30 अत्यंत लाभकारी है तथा सदा के लिए मस्तिष्क से संदेहशीलता को मिटा देता है।
शारीरिक लक्षण एवं उपचार मनुष्य के शरीर में जितनी लचक रहेगी, उतना ही वह जवान रहेगा।
होम्योपैथी में कुछ औषधियां शरीर के अंगों एवं मांसपेशियां को अधिक वर्षो तक लचीला रखती हैं, जिससे आदमी फुर्तीला एवं कार्यशील रह सकता है।
* थियोसिनामाइन 3एक्स धमनियों एवं नाड़ियों की कड़ेपन को समय-समय पूर्व आने से रोकने में सक्षम है। बार-बार पाखाना आना, थोड़े चिकने पाखाने के साथ जोर की आवाजें आना, शरीर में बेहद कमजोरी का अनुभव, हर समय चिड़चिड़ापन, जीवन का भूतकाल नशे एवं व्यसनों में व्यतीत, वर्तमान में भी नशे की लत न छोड़ सकने वाले तथा सर्दी में भयभीत वृद्धजनों के लिए नक्स वोमिका-30 अत्यंत लाभकारी साबित हुई है।
*वृद्ध व्यक्तियों के जीवन में जब शारीरिक एवं मानसिक हृास की प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो शक्तिहीनता, याददाश्त की कमी, हृदय रोग, प्रोस्टेट गं्रथि की सूजन आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं। जीना बोझ लगने लगता है, ऐसे में बरायटा कार्ब- 30 वृद्धजनों को उत्साहयुक्त जीवन देती है। पाचन क्रिया का मंद होना, लिवन में कमजोरी, पेट में हवा भरना, उठने पर कमर मानो टूट ही जाएगी ऐसी कमजोरी महसूस करना, शरीर में जीवन की शक्ति की कमी एवं दिनोंदिन शारीरिक क्षीणता आदि लक्षणयुक्त बुजुर्गो के लिए लाइकोपोडियम-200 नवजीवन देती है।
*सिर को दाएं-बाएं घुमाने से चक्कर लगना, माथे में सुन्नपन, पैर की ओर से लकवे का ऊपर की ओर बढ़ना, प्रोस्टेट ग्रंथि की सूजन से रुक- रुककर पेशाब होना, किसी गं्रथि का कड़ापन जैसे कैंसर, ट्यूमर आदि, दिन में खांसी नहीं पर रात में सूखी खांसी जैसे लक्षणों के लिए कोनियम- 30 सुबह-शाम फायदा पहुंचाती है।
 

*जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, वैसे-वैसे शरीर में जकड़न बढ़ने लगती है।
स्नायु, धमनियां, जोड़ एवं मांसपेशियां कड़ी होने लगती हैं, अधिक ठंड लगना, फिर भी ठंडा भोजन पसंद करना, बार-बार नक्सीर फूटना, बायीं तरफ लेटने से रोग बढ़ना ऐसे वृद्धजनों के लिए फॉस्फोरस-30 की एक मात्रा प्रति सप्ताह लेनी चाहिए। होम्योपैथी दवाएं बुढ़ापे में जीवनी शक्ति कमजोर पड़ने पर खासतौर पर कारगर साबित हुई हैं।
*अन्य चिकित्सा पद्धतियों की दवाओं में स्ट्रांग केमिकल मौजूद रहते हैं, जिनकी जहरीली पाश्र्व क्रियाएं मौजूद रोग से भी अधिक हानिकारक सिद्ध होती हैं। यह गलत धारणा है कि होम्योपैथी दवाएं धीरे-धीरे काम करती हैं, जबकि आजकल उपलब्ध जर्मन हाई पोटेंसी दवाएं बिना किसी साइड इफेक्ट्स के अत्यंत शीघ्र रोग को मिटाने में सक्षम हैं तथा कम खर्च में रोगी को स्वस्थ कर देती हैं।
*बुढ़ापे का ध्यान आते ही मन सिहर जाता है। दांत विहीन मुंह चेहरे पर झुर्रियां, कमजोर शरीर, जोड़ों में दर्द, यही है बुढ़ापे की निशानी। बुढ़ापा आने का कारण है- भोजन में पौष्टिक तत्वों की कमी, क्षमता से अधिक मेहनत, स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता का अभाव, मानसिक तनाव आदि। यह सब ऐसी समस्याएँ है जो आदमी को समय से पहले बूढ़ा और लाचार बना देती है। बुढ़ापा आना शरीर की एक निश्चित प्रक्रिया है, शरीर की कोशिकाओं के काम करने की एक सीमा होती है जब यह सीमा समाप्त हो जाती है तब बुढ़ापा घेरने लगता है। बुढ़ापा निश्चित है। फिर भी हम कुछ सावधानी अपनाकर अपने रहन-सहन आहार-विहार में परिवर्तन कर इसे समय से पहले आने से रोक सकते है। होम्योपैथिक दवाइयाँ बुढ़ापे को समय से पूर्व आने से रोक सकने में सक्षम तो है ही साथ ही बुढ़ापे की तकलीफ को कम करने एवं उनसे छुटकारा दिलाने में भी लाभदायक है। *वृद्धावस्था का सबसे पहले असर त्वचा पर पड़ना शुरू होता है। विशेषकर चेहरे की त्वचा परात्वचा ढीली हो जाती है। इससे चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती है। इससे बचने के लिये आवश्यक है कि शरीर को गर्म हवा, तेज धूप, गंदगी से बचाएँ। व्यायाम करें खुली हवा में टहले। होम्योपैथी की सीपिया, सिकेल का साइलीसिया और सारसपरिला आदि दवाइयाँ बुढ़ापे की झुर्रियों से मुक्ति दिला सकती है।
*जवानी का भरा-पूरा शरीर बुढ़ापे में कमजोर हो जाता है। शरीर में ताकत नहीं रहती। उठना-बैठना मुश्किल हो जाता है। इस समस्या से बचने के लिये जरूरी है कि युवा अवस्था में संतुलित और पौष्टिक अहार लिया जाये। बुढ़ापे में शरीर की कमजोरी को दुरूस्त रखने के लिये अल्काल्फा क्यू एवं ऐबेना सेटाइवा क्यू का प्रयोग किया जा सकता है।
 

*वृद्धावस्था की एक बड़ी समस्या है भूलने की आदत चिकित्सीय भाषा में इसे सेनाइल डिमेन्सिया कहा जाता है। एसिडफास, लाइकोपोडियम, वैराइटाकार्व एवं एनाकार्डियम आदि दवाइयां चिकित्सक की सलाह पर ली जायें तो भूलने की समस्या पर काबू पाया जा सकता है।
* वृद्धावस्था में प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने की सम्भावना ज्यादा रहती है। इस रोग में पेशाब के समय दर्द आदि तकलीफें होती है। जब प्रोस्टेट ग्रंथि ज्यादा बढ़ जाती है तो एलोपैथिक चिकित्सक केवल आपरेशन का उपाय बताते है। जबकि होम्योपैथिक दवाईयों द्वारा इस समस्या पर काबू पाया जा सकता है। इस रोग में पेशाब में जलन, बूंद-बूंद कर पेशाब आना, पेशाब के समय दर्द आदि तकलीफें होती है। इस समस्या से निबटने में सेबाल सेरूलाटा क्यू, परेरा ब्रावा क्यू, मर्कसाल आदि दवाइयाँ काफी लाभप्रद है।
*बुढ़ापे में अनेक लोगों की कमर झुक जाती है। इसका प्रमुख कारण है। शरीर की हड्डियों में भुरभुरापन आदि। यह कैल्शियम की कमी से होता है। यदि जवानी में कैल्शियम युक्त आहार पर्याप्त मात्रा में लिये जाएँ व साथ ही साथ कैल्फेरिया कास 6 एक्स प्रयोग किया जाये तो इस समस्या तथा इससे होने वाली तकलीफों से बचा जा सकता है।
*वृद्धावस्था में आर्थराइटिस, गठिया एवं जोड़ों के रोग घेर लेेते हंै। इसमें रसटाक्स, लीडम पाल, रूटा जी , अर्निका, ब्रायोनिया जैसी दवाइयाँ रामबाण की तरह असर करती है।
*वृद्धावस्था में रक्त धमनियों में मोटेपन की समस्या ज्यादा रहती है। चिकित्सीय भाषा में इसे आर्टिरयो स्क्लोरोसिस कहा जाता है। काली म्यूर, ब्राइटा म्योर, आरम नेट्रम म्यूरेटिकम जैसी होम्योपैथिक दवाइयाँ इस समस्या से निबटने में काफी कारगरहैं।
* वृद्धावस्था में मोतियाबिंद की समस्या आम है। काफी लोग इससे पीडि़त रहते है। यदि समय से उपचार न कराया जाय तो अंधापन भी हो सकता है। सिनरेरिया मेरिटिमा सक्कस डालने की दवाई एवं कैल्केरिया फ्लोर एवं कोनियम खाने की होम्योपैथिक दवाइयाँ मोतियाबिंद होने से रोकती हैं।
* वृद्धावस्था में कुछ लोगो के कानो से सीटी की आवाजें आने लगती है। जिससे सुनने में काफी परेशानी होती है। इस समस्या के लिये थायोसिनमिनम होम्योपैथिक औषधि काफी फायदेमंद है। कम सुनाई पड़ने की समस्या में एम्ब्राग्रेसिया औषधि इस तकलीफ से छुटकारा दिलाने से सहायक होती है। बुढ़ापा कष्टदायक न हो। वह समय से पहले न आयें इसके लिये होम्योपैथिक दवाइयों का प्रयोग करें

2017-01-13

शरीर के लिए फायदेमंद दही वसंत ऋतु मे हानिकारक क्यूँ



वसंत ऋतु
इस ऋतु में सूर्य की तीक्ष्णता बढ़ने से कफ पिघलने लगता है जिस कारण शरीर की अग्नि ख़ास तौर पर जठराग्नि मंद पड़ जाती है.
पथ्यापथ्य: जौ, शहद, आम का रस लेना इस ऋतु में हितकर है. किण्वित आसव, अरिस्ट अथवा काढ़ा या फिर गन्ने का रस लेना इस ऋतु में लाभकारी है. मुश्किल से पचने वाले ठोस , ठंडे, मीठे, अम्लीय, वसायुक्त, पदार्थ नही लेने चाहिए.
जीवनचर्या: व्यायाम, सुखी घर्षण वाली मालिश, नास्य, मालिश के बाद कपूर, चंदन और कुमकुम-युक्त पानी से स्नान, इस ऋतु में करने योग्य है. इस ऋतु में दिन में अतिरिक्त स्नान नही करना चाहिए.
    दही का भोजन के अंग एवं औषध के रूप में प्रचलन प्राचीनकाल से अनवरत चला आ रहा है। दही का शरीर को पोषण करने के साथ-साथ औषधीय प्रयोग भी है।
दही के गुणकर्मों के अनुसार आयुर्वेद में दही सेवन के तरीके एवं उसका किन व्यक्ति/ रोगी को सेवन निषेध एवं ऋतु अनुसार सेवन विधि का वर्णन विस्तृत रूप में प्राप्त होता है। परंतु वर्तमान समय में दही सेवन के तरीके, समय, प्रयोग आदि को अनदेखा किया जाता रहा। जिससे कफज रोग, जुकाम, कोलेस्ट्राल, मोटापा आदि बढ़ने में मदद मिलती है।
दही का प्रयोग कोलेस्ट्राल बढ़ने पर न करें क्योंकि दही में एक आयुर्वेदोक्त विशेष गुण 'अभिष्यंद' होता है। अभिष्यंद गुण/ कर्म, शरीर के स्रोतों (चेनल्स) धमनी आदि में अवरोध उत्पन्न करता है। अतः यह कोलेस्ट्रोल को और अधिक बढ़ाता है व धमनी में अधिक रुकावट उत्पन्न करता है। अभिष्यंद गुण के कारण ही इसे अतिसार रोग होने पर प्रयोग किया जाता है जिससे अतिसार बंद हो जाता है दही का भोजन के अंग एवं औषध के रूप में प्रचलन प्राचीनकाल से अनवरत चला आ रहा है। दही का शरीर को पोषण करने के साथ-साथ औषधीय प्रयोग भी है। दही के गुणकर्मों के अनुसार आयुर्वेद में दही सेवन के तरीके एवं.उसका किन व्यक्ति/रोगी को सेवन निषेध है।
   सामान्य जन में दही के प्रति यह धारणा होती है कि दही शीत होती है परंतु वास्तविकता यह है कि दही 'ऊष्ण' होता है। यह धारण इसलिए व्याप्त है कि दही कफ को बढ़ाता है एवं अभिष्यंदी होने से जुकाम आदि के लक्षण शरीर में उत्पन्न हो जाते हैं। ऊष्ण होने के कारण इसे ऊष्ण ऋतुओं में सेवन नहीं करना बताया है परंतु प्रायः सर्वजन इसका प्रयोग ग्रीष्म ऋतु में करते हैं। यदि ग्रीष्म ऋतु में प्रयोग करना भी है तो उसमें शक्कर आदि पदार्थ या आयुर्वेद में बताए पदार्थों को डालकर सेवन करना चाहिए या संस्कार करके प्रयोग करना चाहिए। संस्कार करने से दही या औषध आदि के गुण परिवर्तित हो जाते हैं। 'लस्सी' इसका श्रेष्ठ उदाहरण है एवं ग्रीष्म ऋतु में सेवन योग्य है। दही का प्रयोग हेमंत, शिशिर एवं वर्षा ऋतु में करना चाहिए।



आगामी बसंत ऋतु में दही का सेवन न करें क्योंकि बसंत ऋतु में कफ का स्वाभाविक प्रकोप होता है एवं दही कफ को बढ़ाता है। अतः कफ रोग से व्यक्ति ग्रसित हो जाते हैं। दही में अधिक कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन होता है एवं गुण-कर्मों के आधार पर यह अमृत तुल्य है परंतु अमृत का भी युक्ति से प्रयोग न करने पर वह विषतुल्य मारक हो जाता है एवं युक्तिपूर्वक विष का प्रयोग भी अमृत.तुल्य गुणकारी होता है अतः दही का प्रयोग उसके बताए गए प्रयोग निर्देशों के आधार पर करें।
निम्न परिस्थितियों में दही का सेवन कदापि न करें।
* पित्त विकार एवं कफ विकार
* रक्त विकार
* शोथ (सूजन)
* मेदोरोग (मोटापा)
* कोलेस्ट्रोल वृद्धि होने पर
दही में अधिक कार्बोहाइड्रेड, प्रोटीन होता है एवं गुण-कर्मों के आधार पर यह अमृत तुल्य है परंतु अमृत का भी युक्ति से प्रयोग न करने पर वह विषतुल्य मारक हो जाता है एवं युक्तिपूर्वक विष का प्रयोग भी अमृत तुल्य गुणकारी होता है
वैसे तो दही सबके लिये फायदेमंद होती है लेकिन आयुर्वेद के अनुसार इसे रात को खाने से बचना चाहिये। रात के वक्‍त दही शरीर में कफ दोष बढ़ाती है।
आयुर्वेद की माने तो रात के वक्‍त हमारे शरीर में कफ की प्राकृतिक प्रबलता बढ जाती है। इसलिये रात को दही का सेवन नहीं करना चाहिये क्‍योंकि यह समस्‍या को और भी ज्‍यादा बढा देगी जिससे पेट का रोग होगा।दही टेस्‍ट में खट्टी, तासीर में गर्म और पचाने में भारी होती है। यह वसा, ताकत, कफ, पित्त, पाचन शक्ति बढ़ाती है। शरीर में यदि सूजन आदि हो तो, दही खाने से हमेशा बचना चाहिये क्‍योंकि यह सूजन को और भी ज्‍यादा बढ़ा देती है। ध्‍यान दें, कि यह बात केवल खट्टी दही खाने के बारे में कही जा रही है।
खट्टी दही को कभी भी गरम कर के नहीं खाना चाहिये। दही को ना केवल रात में ही बल्‍कि बसंत में भी नहीं खाना चाहिये।पेट की समस्‍या हो या फिर पेशाब से संबन्‍धित समस्‍या, दही को शहद, घी, चीनी और आंवले के साथ खाने पर राहत मिलती है।
आयुर्वेद के नियम के अनुसार दही को जितना हो सके रात में खाने से बचना चाहिये। पर अगर आप को दही खानी ही खानी है तो दही खाते वक्‍त उसमें चुटकी भर काली मिर्च पावडर मिला लेना चाहिये। आप इसमें मेथी पावडर भी मिला सकते हैं।  

यह पेट से संबन्‍धित रोगों को भी दूर कर देगी।
रात को दही में शक्‍कर मिला कर बिल्‍कुल भी ना खाएं। दही की जगह पर आप बटर मिल्‍क यानी मठ्ठा या छाछ 

का सेवन करें तो अति उत्‍तम होगा।
दही, भारतीय थाली का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है. थाली में दही होने का मतलब है कि आपकी थाली स्वादिष्ट होने के साथ ही पौष्ट‍िक भी है.
हाल में हुई एक स्टडी के अनुसार, दही में मौजूद तत्व शरीर को कई तरीके से फायदा पहुंचाते हैं. ये प्रो-बायोटिक फूड कैल्शियम से भरपूर होता है. कैल्शियम की उपस्थिति दांत और हड्डियों को मजबूती देने का काम करती है.
कैल्शियम के साथ ही ये विटामिन और दूसरे ऐसे कई पोषक तत्वों से भी भरपूर है जो शरीर के लिए जरूरी होते हैं. दही पाचन क्रिया के लिए भी बहुत कारगर है. य‍हां कुछ ऐसे ही कारणों का उल्लेख है जिससे ये साबित होता है कि दही खाना स्वास्थ्य के लिए बहुत फायदेमंद है:
1. रोग-प्रतिरोधक क्षमता के लिए
हर रोज एक चम्मच दही खाने से भी रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. इसमें मौजूद गुड बैक्टीरिया इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाते हैं.
2. दांतों के लिए फायदेमंद
दही दांत के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है. इसमें भरपूर मात्रा में कैल्शियम और फॉस्फोरस उपस्थित होता है. ये हड्ड‍ियों की मजबूती के लिए भी बहुत फायदेमंद है. ये ऑस्ट‍ियोपोरोसिस और गठिया में राहत देने का काम करता है.
3. वजन घटाने में कारगर
दही में बहुत अधिक मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है. ये एक ऐसा तत्व है जो शरीर को फूलने नहीं देता है और वजन नहीं बढ़ने देने में सहायक होता है.
4. तनाव कम करने में
दही खाने का सीधा संबंध मस्त‍िष्क से है. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि दही का सेवन करने वालों को तनाव की शिकायत बहुत कम होती है. इसी वजह से विशेषज्ञ रोजाना दही खाने की सलाह देते हैं.
5. ऊर्जा के लिए
अगर आप खुद को बहुत थका हुआ महसूस कर रहे हैं तो हर रोज दही का सेवन करना आपके लिए अच्छा रहेगा. ये शरीर को हाइड्रेटेड करके एक नई ऊर्जा देने का काम करता है

2017-01-08

सोरायसिस चर्म रोग एवं होम्योपैथिक उपचार// Psoriasis skin disease and homeopathic remedies

   इस समय देश की 5 फीसदी आबादी सोरायसिस की शिकार है। सोरायसिस त्वचा की ऊपरी सतह का चर्म रोग है जो वैसे तो वंशानुगत है लेकिन कई कारणों से भी हो सकता है। आनु्वंशिकता के अलावा इसके लिए पर्यावरण भी एक बड़ा कारण माना जाता है। यह असाध्य बीमारी कभी भी किसी को भी हो सकती है। कई बार इलाज के बाद इसे ठीक हुआ समझ लिया जाता है जबकि यह रह-रहकर सिर उठा लेता है। शीत ऋतु में यह बीमारी प्रमुखता से प्रकट होती है।
सोरायसिस चमड़ी की एक ऐसी बीमारी है जिसके ऊपर मोटी परत जम जाती है। दरअसल चमड़ी की सतही परत का अधिक बनना ही सोरायसिस है। त्वचा पर भारी सोरायसिस की बीमारी सामान्यतः हमारी त्वचा पर लाल रंग की सतह के रूप में उभरकर आती है और स्केल्प (सिर के बालों के पीछे) हाथ-पाँव अथवा हाथ की हथेलियों, पाँव के तलवों, कोहनी, घुटनों और पीठ पर अधिक होती है। 1-2 प्रतिशत जनता में यह रोग पाया जाता है।
सोरायसीस के लक्षण-
रोग से ग्रसित (आक्रांत) स्थान की त्वचा चमकविहीन, रुखी-सूखी, फटी हुई और मोटी दिखाई देती है तथा वहाँ खुजली भी चलती है। सोरायसिस के क्रॉनिक और गंभीर होने पर 5 से 40 प्रतिशत रोगियों में जोड़ों का दर्द और सूजन जैसे लक्षण भी पाए जाते हैं एवं कुछ रोगियों के नाखून भी प्रभावित हो जाते हैं और उन पर रोग के चिह्न (पीटिंग) दिखाई देते हैं।
सोरायसिस रोग होने के कारण-
सोरायसिस क्यों होता है इसका सीधे-सीधे उत्तर देना कठिन है क्योंकि इसके मल्टीफ्लेक्टोरियल (एकाधिक) कारण हैं। अभी तक हुई खोज (रिसर्च) के अनुसार सोरायसिस की उत्पत्ति के लिए मुख्यतः जेनेटिक प्री-डिस्पोजिशन और एनवायरमेंटलफेक्टर को जवाबदार माना गया है।  


सोरायसिस हेरिडिटी (वंशानुगत) रोगों की श्रेणी में आने वाली बीमारी है एवं 10 प्रश रोगियों में परिवार के किसी सदस्य को यह रोग रहता है।
किसी भी उम्र में नवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों को भी हो सकती है। यह इंफेक्टिव डिसिज (छूत की बीमारी) भी नहीं है। सामान्यतः यह बीमारी 20 से 30 वर्ष की आयु में प्रकट होती है, लेकिन कभी-कभी इस बीमारी के लक्षण क्रॉनिक बीमारियों की तरह देरी से उभरकर आते हैं। सोरायसिस एक बार ठीक हो जाने के बाद कुछ समय पश्चात पुनः उभर कर आ जाता है और कभी-कभी अधिक उग्रता के साथ प्रकट होता है। ग्रीष्मऋतु की अपेक्षा शीतऋतु में इसका प्रकोप अधिक होता है।
रोग होने पर क्या करें:
सोरायसिस होने पर विशेषज्ञ चिकित्सक के बताए अनुसार निर्देशों का पालन करते हुए पर्याप्त उपचार कराएँ ताकि रोग नियंत्रण में रहे। थ्रोट इंफेक्शन से बचें और तनाव रहित रहें, क्योंकि थ्रोट इंफेक्शन और स्ट्रेस सीधे-सीधे सोरायसिस को प्रभावित कर रोग के 

लक्षणों में वृद्धि करता है। त्वचा को अधिक खुश्क होने से भी बचाएँ ताकि खुजली उत्पन्न न हो। परहेज नाम पर मात्र मदिरा और धूम्रपान का परहेज है क्योंकि ये दोनों ही सीधे सीधे इस व्याधि को बढाते है.
उपचार:
सोरायसिस के उपचार में बाह्य प्रयोग के लिए एंटिसोरियेटिक क्रीम/ लोशन/ ऑइंटमेंट की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन जब बाह्योपचार से लाभ न हो तो मुँह से ली जाने वाली एंटीसोरिक और सिमटोमेटिक होम्योपैथिक औषधियों का प्रयोग आवश्यक हो जाता है।
होम्योपैथिक औषधियाँ: - लक्षणानुसार मरक्यूरस सौल, नेट्रम सल्फ, मेडोराइनम, लाईकोपोडियम, सल्फर, सोराइन्म, आर्सेनिक अल्ब्म, ग्रफाइट्स, इत्यादि अत्यंत कारगर होम्योपैथिक दवाएँ हैं।

अनिद्रा रोग की होम्योपैथिक चिकित्सा // Homeopathic treatment of insomnia

    उत्तम स्वस्थ्य  के लिए सिर्फ उचित भोजन  लेना ही काफी नहीं है। अच्छी नींद भी स्वस्थ रहने के लिए उतनी ही जरूरी है। आजकल कई प्रोफेशन  में डिफरेंट शिफ्ट्स में काम होता है। ऐसे में सबसे ज्यादा नींद पर असर पड़ता है। कई बार तो ऐसा होता है कि टुकड़ों में नींद पूरी करनी पड़ती है, लेकिन छोटी-छोटी नैप लेना सेहत के लिहाज से बेहद खराब होता है। एक रिसर्च के मुताबिक, खराब नींद यानि छोटे-छोटे टुकड़ों में ली गई नींद बिल्कुल न सोने से भी ज्यादा खतरनाक होती है। इससे कई तरह की बीमारियां शरीर को शिकार बना सकती हैं।
     टुकड़ों में सोने वाले लोग सुबह उठकर भी तारो ताजा  नहीं अनुभव  करते हैं। रिसर्च में यह साबित हो चुका है। अमेरिका के जॉन हॉपकिंस विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अपने शोध में दो तरह की नींद का अध्ययन किया है। इसमें रुकावट के साथ सोने वाली नींद और कम समय के लिए ही सही लेकिन शांति वाली नींद शामिल है। इन लोगों के मिजाज को जब तुलना  किया गया तो पाया कि टुकड़ों में सोने वाले लोगों की तुलना में शांति से सोने वाले लोगों का मूड बेहतर था।
    खराब नींद किडनी पर भी बुरा असर डालती है। शरीर में ज्यादातर प्रोसेस नैचरल डेली रिद्म (सरकाडियन क्लॉक या शरीर की प्राकृतिक घड़ी) के आधार पर होते हैं। ये हमारी नींद से ही कंट्रोल होता है। एक रिसर्च के मुताबिक जब सोने की साइकल बिगड़ती है तो किडनी को नुकसान होता है। इससे किडनी से जुड़ी कई बीमारियां हो सकती हैं।
     आधी-अधूरी नींद दिल के लिए भी खतरे की घंटी है। इससे हार्ट डिजीज होने के चांस तो बढ़ते ही हैं, साथ ही दिल का दौरा भी पड़ सकता है। एक रिसर्च में खराब नींद की शिकायत करने वालों में अच्छी नींद लेने वालों के मुकाबले 20 फीसदी ज्यादा कोरोनरी कैल्शियम पाया गया।
    कम नींद लेने से दिमाग सही तरह से काम नहीं कर पाता है। इसका सीधा असर हमारी याद‌्‌दाश्त पर पड़ता है। इसके अलावा, पढ़ने, सीखने व डिसीजन लेने की क्षमताएं भी इफेक्ट होती हैं। खराब नींद से स्ट्रेस लेवल भी बढ़ता है और इमोशनली वीक लोग डिप्रेशन के भी शिकार हो सकते हैं।
होम्योपैथिक उपचार में प्रयुक्त विभिन्न औषधियों से चिकित्सा–
नींद लाने के लिए बार-बार कॉफिया औषधि का सेवन करना होम्योपैथी चिकित्सा नहीं है, हां यदि नींद न आना ही एकमात्र लक्षण हो दूसरा कोई लक्षण न हो तब इस प्रकार की औषधियां लाभकारी है जिनका नींद लाने पर विशेष-प्रभाव होता है- कैल्केरिया कार्ब, सल्फर, फॉसफोरस, कॉफिया या ऐकानाइट आदि।
* पैसिफ्लोरा इंकारनेट- नींद न आने की परेशानी को दूर करने के लिए यह औषधि अधिक उपयोगी होती है। उपचार करने के लिए इस औषधि के मल-अर्क का एक बूंद से 30 बूंद तक उपयोग में लेना चाहिए।
 
*लाइकोडियम- दोपहर के समय में भोजन करने के बाद नींद तेज आ रही हो और नींद खुलने के बाद बहुत अधिक सुस्ती महसूस हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए लाइकोडियम औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
 *चायना- रक्त-स्राव या दस्त होने के कारण से या शरीर में अधिक कमजोरी आ जाने की वजह से नींद न आना या फिर चाय पीने के कारण से अनिद्रा रोग हो गया हो तो उपचार करने के लिए चायना औषधि 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक है।


 *इग्नेशिया – किसी दु:ख के कारण से नींद न आना, कोई सगे सम्बंधी की मृत्यु हो जाने से मन में दु:ख अधिक हो और इसके कारण से नींद न आना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को इग्नेशिया औषधि की 200 शक्ति का सेवन करना चाहिए। यदि किसी रोगी में भावात्मक या भावुक होने के कारण से नींद न आ रही हो तो उसके इस रोग का उपचार इग्नेशिया औषधि से करना लाभदायक होता है। हिस्टीरिया रोग के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग का उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 200 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है। यदि रोगी को नींद आ भी जाती है तो उसे सपने के साथ नींद आती है, देर रात तक सपना देखता रहता है और रोगी अधिक परेशान रहता है। नींद में जाते ही अंग फड़कते हैं नींद बहुत हल्की आती है, नींद में सब-कुछ सुनाई देता है और उबासियां लेता रहता है लेकिन नींद नहीं आती है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए इग्नेशिया औषधि का उपयोग करना उचित होता है। मन में दु:ख हो तथा मानसिक कारणों से नींद न आए और लगातार नींद में चौक उठने की वजह से नींद में गड़बड़ी होती हो तो उपचार करने के लिए इग्नेशिया औषधि की 3 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।
* कैल्केरिया कार्ब – इस औषधि की 30 शक्ति का उपयोग दिन में तीन-तीन घंटे के अंतराल सेवन करने से रात के समय में नींद अच्छी आने लगती है। यह नींद किसी प्रकार के नशा करने के समान नहीं होती बल्कि स्वास्थ नींद होती है।
 *कॉफिया – खुशी के कारण नींद न आना, लॉटरी या कोई इनाम लग जाने या फिर किसी ऐसे समाचार सुनने से मन उत्तेजित हो उठे और नींद न आए, मस्तिष्क इतना उत्तेजित हो जाए कि आंख ही बंद न हो, मन में एक के बाद दूसरा विचार आता चला जाए, मन में विचारों की भीड़ सी लग जाए, मानसिक उत्तेजना अधिक होने लगे, 3 बजे रात के बाद भी रोगी सो न पाए, सोए भी तो ऊंघता रहें, चौंक कर उठ बैठे, नींद आए भी ता स्वप्न देखें। इस प्रकार के लक्षण रोगी में हो तो उसके इस रोग का उपचार करने के लिए कॉफिया औषधि की 200 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। यह नींद लाने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि है। यदि गुदाद्वार में खुजली होने के कारण से नींद न आ रही हो तो ऐसी अवस्था में भी इसका उपयोग लाभदायक होता है। रोगी के अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए कॉफिया औषधि की 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है।
* जेल्सीमियम – यदि उद्वेगात्मक-उत्तेजना (इमोशनल एक्साइटमेंट) के कारण से नींद न आती हो तो जेल्सीमियम औषधि के सेवन से मन शांत हो जाता है और नींद आ जाती है। किसी भय, आतंक या बुरे समाचार के कारण से नींद न आ रही हो तो जेल्सीमियम औषधि से उपचार करने पर नींद आने लगती है। बुरे समाचार से मन के विचलित हो जाने पर उसे शांत कर नींद ले आते हैं। अधिक काम करने वाले रोगी के अनिंद्रा रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का उपयोग करना चाहिए। ऐसे रोगी जिनकों अपने व्यापार के कारण से रात में अधिक बेचैनी हो और नींद न आए, सुबह के समय में उठते ही और कारोबार की चिंता में डूब जाते हो तो ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए जेल्सीमियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
* ऐकोनाइट – बूढ़े-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तथा इसके साथ ही उन्हें घबराहट हो रही हो, गर्मी महसूस हो रही हो, चैन से न लेट पाए, करवट बदलते रहें। ऐसे बूढ़े रोगियों के इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए ऐकोनाइट औषधि की 30 का उपयोग करना लाभकारी है। यह औषधि स्नायु-मंडल को शांत करके नींद ले आती है। किसी प्रकार की बेचैनी होने के कारण से नींद न आ रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइट औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
* कैम्फर – नींद न आने पर कैम्फर औषधि के मूल-अर्क की गोलियां बनाकर, घंटे आधे घंटे पर इसका सेवन करने से नींद आ जाती है।
 *बेलाडोना – मस्तिष्क में रक्त-संचय होने के कारण से नींद न आने पर बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। रोगी के मस्तिष्क में रक्त-संचय (हाइपरमिया) के कारण से रोगी ऊंघता रहता है लेकिन मस्तिष्क में थाकवट होने के कारण से वह सो नहीं पाता। ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए के लिए भी बेलाडोना औषधि उपयोगी है। रोगी को गहरी नींद आती है और नींद में खर्राटें भरता है, रोगी सोया तो रहता है लेकिन उसकी नींद गहरी नहीं होती। रोगी नींद से अचानक चिल्लाकर या चीखकर उठता है, उसकी मांस-पेशियां फुदकती रहती हैं, मुंह भी लगतार चलता रहता है, ऐसा लगता है मानो वह कुछ चबा रहा हो, दांत किटकिटाते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी का मस्तिष्क शांत नहीं रहता। जब रोगी को सोते समय से उठाया जाता है तो वह उत्तेजित हो जाता है, अपने चारों तरफ प्रचंड आंखों (आंखों को फाड़-फाड़कर देखना) से देखता है, ऐसा लगता है कि मानो वह किसी पर हाथ उठा देगा या रोगी घबराकर, डरा हुआ उठता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है। अनिद्रा रोग को ठीक करने के लिए कैमोमिला औषधि का उपयोग करने पर लाभ न मिले तो बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करें।

 
*काक्युलस- यदि रात के समय में अधिक जागने के कारण से नींद नहीं आ रही हो तो ऐसे रोगी के इस लक्षण को दूर करने के लिए काक्युलस औषधि की 3 से 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए। जिन लोगों का रात के समय में जागने का कार्य करना होता है जैसे-चौकीदार, नर्स आदि, उन्हें यदि नींद न आने की बीमारी हो तो उनके के लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद है। यदि नींद आने पर कुछ परेशानी हो और इसके कारण से चक्कर आने लगें तो रोग को ठीक करने के लिए कौक्युलस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
*सल्फर – रोगी की नींद बार-बार टूटती है, जारा सी भी आवाजें आते ही नींद टूट जाती है, जब नींद टूटती है तो रोगी उंघाई में नहीं रहता, एकदम जाग जाता है, रोगी की नींद कुत्ते की नींद के समान होती है। रोगी के शरीर में कहीं न कहीं जलन होती है, अधिकतर पैरों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
 नक्स वोमिका – रोगी का मस्तिष्क इतना कार्य में व्यस्त रहता है कि वह रात भर जागा रहता है, व्यस्त मस्तिष्क के कारण नींद न आ रही हो, मन में विचारों की भीड़ सी लगी हो, आधी रात से पहले तो नींद आती ही नहीं यादि नींद आती भी है तो लगभग तीन से चार बजे नींद टूट जाती है। इसके घंटे बाद जब वह फिर से सोता है तो उठने पर उसे थकावट महसूस होती है, ऐसा लगता है कि मानो नींद लेने पर कुछ भी आराम न मिला हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
किसी रोगी को आधी रात से पहले नींद नहीं आती हो, शाम के समय में नींद नहीं आती हो और तीन या चार बजे नींद खुल जाती हो, इस समय वह स्वस्थ अनुभव करता है लेकिन नींद खुलने के कुछ देर बाद उसे फिर नींद आ घेरती है और तब नींद खुलने पर वह अस्वस्थ अनुभव करता है, इस नींद के बाद तबीयत ठीक नहीं रहती। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए नक्स वोमिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कब्ज बनना, पेट में कीड़ें होना, अधिक पढ़ना या अधिक नशा करने के कारण से नींद न आए तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए नक्स वोमिका औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।
*पल्स – रोगी शाम के समय में बिल्कुल जागे हुए अवस्था में होता है, दिमाग विचारों से भरा हो, आधी रात तक नींद नहीं आती, बेचैनी से नींद बार-बार टूटती है, परेशान भरे सपने रात में दिखाई देते हैं, गर्मी महसूस होती है, उठने के बाद रोगी सुस्त तथा अनमाना स्वभाव का हो जाता है। आधी रात के बाद नींद न आना और शाम के समय में नींद के झोकें आना, रोगी का मस्तिष्क व्यस्त हो अन्यथा साधारण तौर पर तो शाम होते ही नींद आती है और 3-4 बजे नींद टूट जाती है, इस समय रोगी रात को उठकर स्वस्थ अनुभव करता है, यह इसका मुख्य लक्षण है-शराब, चाय, काफी से नींद न आए। ऐसी अवस्था में रोगी को पल्स औषधि का सेवन कराना चाहिए।
 *कैमोमिला – दांत निकलने के समय में बच्चों को नींद न आए और जंहाई आती हो और बच्चा औंघता रहता हो लेकिन फिर भी उसे नींद नहीं आती हो, उसे हर वक्त अनिद्रा और बेचैनी बनी रहती है। ऐसे रोगियों के इस रोग को ठीक करने के लिए कैमोमिला औषधि की 12 शक्ति का सेवन कराने से अधिक लाभ मिलता है।
* बेल्लिस पेरेन्निस- यदि किसी रोगी को सुबह के तीन बजे के बाद नींद न आए तो बेल्लिस पेरेन्निस औषधि के मूल-अर्क या 3 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी है।


 कैनेबिस इंडिका- अनिद्रा रोग (ओब्सीनेट इंसोम्निया) अधिक गंभीर हो और आंखों में नींद भरी हुई हो लेकिन नींद न आए। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए कैनेबिस इंडिका औषधि के मूल-अर्क या 3 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद है। इस प्रकार के लक्षण होने पर थूजा औषधि से भी उपचार कर सकते हैं।
* सेलेनियम – रोगी की नींद हर रोज बिल्कुल ठीक एक ही समय पर टूटती है और नींद टूटने के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार करने के लिए सेलेनियम औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
* ऐम्ब्राग्रीशिया – रोगी अधिक चिंता में पड़ा रहता है और इस कारण से वह सो नहीं पाता है, वह जागे रहने पर मजबूर हो जाता है। व्यापार या कोई मानसिक कार्य की चिंताए होने से नींद आने में बाधा पड़ती है। सोने के समय में तो ऐसा लगता है कि नींद आ रही है लेकिन जैसे ही सिर को तकिए पर रखता है बिल्कुल भी नींद नहीं आती है। इस प्रकार की अवस्था उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्राग्रीशिया औषधि की 2 या 3 शक्ति का उपयोग करना लाभदायक होता है। इस औषधि का उपयोग कई बार करना पड़ सकता है।
*पल्सेटिला- रात के समय में लगभग 11 से 12 बजे नींद न आना। इस लक्षण से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
* सिमिसि- यदि स्त्रियों के वस्ति-गन्हर की गड़बड़ी के कारण से उन्हें अनिद्रा रोग हो तो उनके इस रोग का उपचार करने के लिए सिमिसि औषधि की 3 शक्ति का उपयोग किया जाना चाहिए।
 *साइना- पेट में कीड़ें होने के कारण से नींद न आने पर उपचार करने के लिए साइना औषधि की 2x मात्रा या 200 शक्ति का उपयोग करना लाभदाक है।
 फॉसफोरस – रोगी को दिन के समय में नींद आती रहती है, खाने के बाद नींद नहीं आती लेकिन रात के समय में नींद बिल्कुल भी नहीं आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
वृद्ध-व्यक्तियों को नींद न आ रही हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।
आग लगने या संभोग करने के सपने आते हों और नींद देर से आती हो तथा सोकर उठने के बाद कमजोरी महसूस होता हो तो इस प्रकार के कष्टों को दूर करने के लिए फॉसफोरस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
रोगी को धीरे-धीरे नींद आती है और रात में कई बार जाग पड़ता है, थोड़ी नींद आने पर रोगी को बड़ा आराम मिलता है, रोगी के रीढ़ की हड्डी में जलन होती है और रोग का अक्रमण अचानक होता है। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए फॉसफोरस औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना अधिक लाभकारी है।
* टैबेकम- यदि स्नायविक-अवसाद (नर्वस ब्रेकडाउन) के कारण से अंनिद्रा रोग हुआ हो या हृदय के फैलाव के कारण नींद न आने के साथ शरीर ठंडा पड़ गया हो, त्वचा चिपचिपी हो, घबराहट हो रही हो, जी मिचलाना और चक्कर आना आदि लक्षण हो तो रोग को ठीक करने के लिए टैबेकम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।
 
*ऐवैना सैटाइवा – स्नायु-मंडल पर ऐवैना सैटाइवा औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। ऐवैना सैटाइवा जई का अंग्रेजी नाम है। जई घोड़ों को ताकत के लिए खिलाई जाती है जबकि यह मस्तिष्क को ताकत देकर अच्छी नींद लाती है। कई प्रकार की बीमारियां शरीर की स्नायु-मंडल की शक्ति को कमजोर कर देती है जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आती है। ऐसी स्थिति में ऐवैना सैटाइवा औषधि के मूल-अर्क के 5 से 10 बूंद हल्का गर्म पानी के साथ लेने से स्नायुमंडल की शक्ति में वृद्धि होती है जिसके परिणाम स्वरूप नींद भी अच्छी आने लगती है। अफीम खाने की आदत को छूड़ाने के लिए भी ऐवैना सैटाइवा औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
* स्कुटेलेरिया – यदि किसी रोगी को अंनिद्रा रोग हो गया हो तथा सिर में दर्द भी रहता हो, दिमाग थका-थका सा लग रहा हो, अपनी शक्ति से अधिक काम करने के कारण उसका स्नायु-मंडल ठंडा पड़ गया हो तो ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए स्कुटेलेरिया औषधि का प्रयोग आधे-आधे घंटे के बाद इसके दस-दस बूंद हल्का गर्म पानी के साथ देते रहना चाहिए, इससे अधिक लाभ मिलेगा|